एबीएन सोशल डेस्क। सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा की चाल दुनियाभर के खगोल प्रेमियों को आज (30 अप्रैल) आंशिक सूर्यग्रहण का दृश्य दिखाएगी। हालांकि, उस वक्त भारत में रात होने के कारण देश में साल का यह पहला ग्रहण नजर नहीं आएगा। उज्जैन की प्रतिष्ठित शासकीय जीवाजी वेधशाला के अधीक्षक डॉ राजेंद्र प्रकाश गुप्त ने शुक्रवार को यह जानकारी दी। उन्होंने बताया, भारतीय मानक समय के मुताबिक आंशिक सूर्यग्रहण की शुरुआत 30 अप्रैल और 1 मई के बीच रात 12 बजकर 15 मिनट और तीन सेकंड पर होगी और यह रात दो बजकर 11 मिनट व दो सेकंड पर अपने चरम पर पहुंचेगा। उन्होंने बताया कि ग्रहण के चरम पर सूर्य और पृथ्वी के बीच चंद्रमा कुछ इस तरह आ जाएगा कि पृथ्वीवासियों को सौरमंडल का मुखिया सूर्य 63.9 प्रतिशत ढंका नजर आएगा। श्री गुप्त ने बताया कि आंशिक सूर्यग्रहण भारतीय मानक समय के मुताबिक एक मई को तड़के चार बजकर सात मिनट व पांच सेकंड पर खत्म होगा। उन्होंने यह भी बताया कि यह अद्भुत खगोलीय घटना दक्षिणी अमेरिका के दक्षिणी भाग, आंतरिक उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी प्रशांत महासागर और दक्षिणी अटलांटिक महासागर क्षेत्र में देखी जा सकेगी।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की कर्ताधर्ता संस्था श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास को रविवार को गंभीर हालत में लखनऊ स्थित मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया। मेदांता अस्पताल से जारी बुलेटिन के मुताबिक 84 वर्षीय महंत नृत्य गोपाल दास को मूत्र नली में संक्रमण और गुर्दे की गंभीर समस्या के चलते रविवार दोपहर करीब 12 बजकर 30 मिनट पर अस्पताल में भर्ती कराया गया। अस्पताल पहुंचने के बाद महंत नृत्य गोपाल दास का तुरंत इलाज शुरू किया गया। उन्हें क्रिटिकल केयर विभाग के चिकित्सकों की निगरानी में रखा गया है। उनकी हालत गंभीर मगर स्थिर है। महंत नृत्य गोपाल दास अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करा रहे श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं। उन्हें नवंबर 2020 में भी सांस लेने में परेशानी थी। इसके बाद अक्टूबर 2021 में कोविड-19 संक्रमण से संक्रमित होने के बाद उन्हें मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। पिछले दिनों किए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के लेटेस्ट आंकड़ों में बताया गया है कि हर तीन में से दो भारतीय मांसाहारी हैं। हालांकि देशभर में अलग-अलग हिस्सों के औसत आंकड़ों से इसकी समानता नहीं है। राज्यवार आंकड़ों पर गौर करें तो उत्तर भारत और मध्य भारत में व्यापक स्तर पर शाकाहार ही प्रचलित है। मांसाहार की बात करें, तो महिलाओं की तुलना में पुरुषों की संख्या अधिक है। 23 फीसदी महिलाओं ने कभी चिकन, मटन या मछली नहीं खाई है, वहीं पुरुषों में यह आंकड़ा महज 15 फीसदी है। यानी कि हर 4 में से 3 महिलाएं, जबकि हर 6 में से 5 पुरुष मांसाहारी हैं। उत्तर और मध्य भारत की बात करें तो पंजाब, हरियाणा, जम्मू कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 50.7 फीसदी महिलाएं और करीब 33 फीसदी पुरुष नॉनवेज नहीं लेते। उत्तर और मध्य भारत में कुल आबादी में शाकाहारी लोगों की संख्या राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुनी है। सबसे ज्यादा शाकाहारी (80 फीसदी महिलाएं और 56 फीसदी पुरुष) लोग हरियाणा में हैं। आंकड़े के मुताबिक, वेजिटेरियन्स में हरियाणा के बाद राजस्थान (75 फीसदी महिलाएं और 63 फीसदी पुरुष) और पंजाब (70 फीसदी महिलाएं और 41 फीसदी पुरुष) का नंबर आता है। वहीं बात करें पूर्वोत्तर, पूर्वी और दक्षिण भारत की, तो यहां सबसे कम शाकाहारी यानी सबसे ज्यादा मांसाहारी लोग पाए जाते हैं। अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, मेघालय, त्रिपुरा और सिक्किम में करीब-करीब 99 फीसदी लोग मांसाहारी हैं। इन राज्यों में केवल 1.6 फीसदी महिलाएं और 1.3 फीसदी पुरुष शाकाहारी हैं। पूर्वी राज्यों में पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा और बिहार की बात करें तो यहां करीब 10 फीसदी आबादी ने कभी मटन, चिकन या मछली का सेवन नहीं किया है। यानी यहां 10 फीसदी लोग शाकाहारी और 90 फीसदी लोग मांसाहारी हैं। पश्चिमी भारत में शाकाहारियों की संख्या राष्ट्रीय औसत से अधिक (31 फीसदी महिलाएं और 23 फीसदी पुरुष) है। इनमें सबसे ज्यादा हिस्सेदारी गुजरात की है। गुजरात भारत में चौथा सबसे अधिक शाकाहारी लोगों वाला प्रदेश है। गुजरात में करीब 61 फीसदी महिलाएं और 50 फीसदी पुरुष नॉनवेज नहीं खाते। कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और तेलंगाना समेत दक्षिण भारत में केवल 8 फीसदी महिलाएं और 5 फीसदी पुरुष ऐसे हैं, जो कभी नॉनवेज नहीं खाते। गोवा में केवल 3 फीसदी महिलाएं और 4 फीसदी पुरुष शाकाहारी हैं, जबकि महाराष्ट्र में 28 फीसदी महिलाएं और 17 फीसदी पुरुष शाकाहारी हैं। इस तरह पूरे भारत में खानपान को लेकर विविधता पाई जाती है। शाकाहारी और मांसाहारी लोगों का अनुपात भी पूरे देश में क्षेत्र के अनुसार बहुत अलग है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। देश की दिग्गज इंजीनियरिंग कंपनी लार्सन एंड टुब्रो ने नया कीर्तिमान रच दिया है। एलएंडटी के इंजीनियरों ने केवल 26 दिन में पहाड़ को चीरकर एक किलोमीटर से ज्यादा लंबी सुरंग बना डाली है। यह सुरंग उत्तराखंड में त्रषिकेश-कर्णप्रयाग रेल मार्ग पर बनायी गयी है।ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल प्रोजेक्ट 16,216 करोड़ रुपये का है। इस रेल प्रोजेक्ट के तहत शिवपुरी से ब्यासी तक के बीच की 1 किलोमीटर सुरंग सिर्फ 26 दिन में ही बनकर तैयार हो गई। यह एक नया रिकॉर्ड है। इस बड़ी उपलब्धि के लिए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने रेल विकास निगम और एलएंडटी की सराहना की है। उन्होंने कहा कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद एलएंडटी ने यह कीर्तिमान रचा है। 100 किलोमीटर की होगी टनल : 125 किलोमीटर लंबे इस प्रोजेक्ट के पूरा हो जाने पर देवप्रयाग, टिहरी गढ़वाल और कर्णप्रयाग आपस में रेल लाइन से जुड़ जाएंगे। इसके तहत 100 किलोमीटर रेल लाइन सुरंगों के भीतर से ही गुजरेगी। अब तक 35 किलोमीटर से ज्यादा सुरंगें बनाई जा चुकी हैं। 17 और सुरंगें बनाई जानी हैं। 17 सुरंगों में से 11 सुरंगों की लंबाई 6 किलोमीटर से ज्यादा होगी। इन सुरंगों का व्यास 8 मीटर होगा। इनमें 6 मीटर व्यास की निकासी सुरंग भी शामिल हैं। केंद्र सरकार ने उत्तराखंड में विकास की गति को बढ़ाते हुए रेल लाइनों के विस्तार पर तेजी से काम शुरू कर दिया है। यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ यानी चारधाम यात्रा को भी रेलवे लाइन से जोड़ने का काम शुरू हो चुका है।
एबीएन सोशल डेस्क। अमरनाथ तीर्थयात्रा के लिए अब तक 33,000 से ज्यादा लोगों ने पंजीकरण कराया है। अधिकारियों ने रविवार को यह जानकारी दी। श्रद्धालु इस तीर्थयात्रा के लिए निर्धारित बैंक शाखाओं से परमिट पाने की कवायद में जुटे हैं। यह 43 दिवसीय यात्रा कोरोना वायरस महामारी के कारण दो साल बाद 30 जून से शुरू होनी है। श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड (एसएएसबी) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) नितीश्वर कुमार ने बताया, यात्रा के लिए शनिवार तक 33,795 श्रद्धालुओं ने पंजीकरण कराया है। गर्भवती महिलाएं पंजीकरण की पात्र नहीं : तीर्थयात्रा के लिए व्यवस्था की निजी रूप से निगरानी कर रहे कुमार ने कहा कि 22,229 श्रद्धालुओं ने ऑनलाइन माध्यम से तथा 11,566 ने ऑफलाइन माध्यम (बैंकों) से पंजीकरण कराया है। सरकार इस साल तीर्थयात्रियों के कुशलक्षेम के लिए रास्ते में उनकी गतिविधि पर नजर रखने के वास्ते रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (आरएफआईडी) प्रणाली भी शुरू कर रही है। वार्षिक तीर्थयात्रा का प्रबंधन करने वाले एसएएसबी ने तीर्थयात्रियों के पंजीकरण के लिए देशभर में बैंक 566 शाखाओं को निर्धारित किया है। इसके साथ ही इसकी वेबसाइट पर भी पंजीकरण की सुविधा उपलब्ध है। एसएएसबी के अनुसार, 13 साल से कम या 75 साल से अधिक उम्र के व्यक्ति और छह सप्ताह से अधिक की गर्भवती महिलाएं पंजीकरण की पात्र नहीं हैं। पहले आओ पहले पाओ - अधिकारियों ने बताया कि तीर्थयात्रियों को एक आवेदन, एसएएसबी द्वारा चयनित अस्पतालों से अनिवार्य स्वास्थ्य प्रमाणपत्र, चार तस्वीरें और 120 रुपये का शुल्क देना होगा। उन्होंने बताया कि जिन लोगों ने पिछले साल यात्रा के लिए पंजीकरण कराया था लेकिन यात्रा नहीं कर पाए थे, उन्हें केवल 20 रुपये का शुल्क देना होगा। अधिकारियों ने कहा कि पंजीकरण और यात्रा परमिट पहले आओ पहले पाओ के आधार पर दिया जाएगा। गौरतलब है कि अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 निरस्त किए जाने के मद्देनजर अमरनाथ यात्रा बीच में ही रोक दी गई थी जबकि कोरोना वायरस महामारी के कारण पिछले दो वर्ष के दौरान केवल सांकेतिक यात्रा हुई है।
एबीएन सोशल डेस्क। अलग-अलग रंगों वाले साबुन का इस्तेमाल तो जरूर किया गया होगा, पर कभी सोचा है कि इनसे जो झाग निकलता है तो सफेद ही क्यों होता है। जो रंग साबुन का होता है, वैसा ही रंग झाग का क्यों नहीं होता। इसके पीछे भी विज्ञान है, जो बताता है कि ऐसे साबुन से हाथ धोने के बाद उसका रंग कहां खो जाता है, जानिए ऐसा क्यों होता है… विज्ञान कहता है कि किसी भी चीज का अपना रंग नहीं होता, चीजों के रंगीन की दिखने की वजह होती है प्रकाश की किरणें। अगर कोई चीज प्रकाश की सभी किरणों को अवशोषित कर लेती है तो वह काली दिखती है। वहीं, जब ये प्रकाश की सभी किरणों को परावर्तित कर देती है तो चीज सफेद दिखाई देती है। झाग के मामले में भी ऐसा होता है। इसके अलावा साबुन में इस्तेमाल होने वाली डाई अधिक प्रभावी नहीं होती। एथेंस साइंस की रिपोर्ट के मुताबिक, साबुन का रंग कोई भी हो जब इसका झाग बनता है तो इसमें पानी, हवा और साबुन होता है। यही गोल आकार लेकर बुलबुलों के रूप में दिखते हैं। जब इन पर प्रकाश की किरणें पड़ती हैं तो परावर्तित हो जाती हैं। ऐसा होने पर ये ट्रांसपेरेंट बुलबुले सफेद नजर आते हैं और सबको लगता है कि साबुन के रंग का असर नहीं दिख रहा है। विज्ञान कहता है कि साबुन के झाग से बनने वाले छोटे-छोटे बुलबुले सतरंगी पारदर्शी फिल्म से बने होते हैं, लेकिन ये ट्रांसपेरेंट होते हैं। यह वजह है कि जब इन पर प्रकाश की किरण पड़ती है तो सभी रंग परावर्तित हो जाते हैं। विज्ञान के मुताबिक, जब ऐसा होता है तो वो चीज सफेद नजर आती है। यही वजह है साबुन के हरे या पीले होने के बावजूद झाग सफेद ही निकलता है। यही नियम समुद्र और नदियों पर भी लागू होता है। अक्सर आपने देखा होगा कि समुद्र या महासागर नीले रंग में रंगे हुए नजर आते हैं, लेकिन जब आप पास जाकर पानी को देखते हैं तो इसका रंग नीला नहीं होता। दरअसल, पानी में सूर्य किरणों को एब्जॉर्ब करने की पावर होती है। दिन के समय जब सूर्य की किरणें पानी पर पड़ती हैं तो प्रकाश से निकलने वाली दूसरे रंग की किरणों को पानी एब्जॉर्ब कर लेता है, लेकिन नीले रंग की किरण को परावर्तित (रिफ्लेक्ट) कर देता है। प्रकाश के इसी परावर्तन के कारण समुद्र का रंग नीला दिखाई तो देता है, लेकिन हकीकत में यह नीला नहीं होता।
एबीएन सोशल डेस्क। देश में सरकार के अधीन मंदिरों को हिंदू संगठनों और समाज को सौपने के लिये एक आंदोलन चलाया जा रहा है। इस बीच तमिलनाडु सरकार ने तमिलनाडु सरकार के हिन्दू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स विभाग ने चेन्नई के टी नगर स्थित अयोध्या मंडपम को अपने नियंत्रण में ले लिया है, जिसको लेकर राज्य में सियासी पारा चढ़ा हुआ है। अयोध्या मंडपम के देखभाल और रख-रखाव का जिम्मा श्रीराम समाज के पास रहा है। इसे सरकार के नियंत्रण में लाने का आदेश दिसंबर 2013 में तत्कालीन जे जयललिता सरकार द्वारा जारी किया गया था। वहीं, 64 वर्ष पुराने इस स्थल को हिन्दू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स विभाग ने जैसे ही अपने नियंत्रण में लिया, इसका जमकर विरोध होने लगा। इस मुद्दे को लेकर राज्य की भाजपा यूनिट ने एमके स्टालिन सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। मंदिर का रखरखाव करने वाले श्रीराम समाज ने तर्क दिया है कि अयोध्या मंडपम न तो यह मंदिर है और न ही जनता के पैसे से बनाया गया है और न ही जनता ने पूजा नहीं की। समाज की तरफ से कहा गया है कि यहां पर कोई भी मूर्ति नहीं है। 2013 के सरकारी आदेश में कहा गया था कि हिन्दू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स एक्ट 1959 के सेक्शन (6) 20 के मुताबिक, श्रीराम समाज एक सार्वजनिक मंदिर है। जबकि, हिन्दू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स के एक अधिकारी का कहना था, यहां पर मूर्तियां हैं और नियमित पूजा की जाती हैं। मंदिर में पूजा के लिए लोगों का आना-जाना लगा रहता है। वे हुंडियाल (कलेक्शन बॉक्स) के जरिए एक बड़ी राशि बटोर रहे हैं अधिकारी का कहना है कि समाज के कुछ सदस्यों ने मंदिर और धन के कुप्रबंधन की शिकायतों के बाद 2013 में एक आदेश जारी किया था। तमिलनाडु सरकार का ये विभाग हिन्दू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स एक्ट 1959 के अनुसार, राज्य में 35,000 से अधिक मंदिरों की देखभाल करता है। इसके अंतर्गत ऐतिहासिक संरचनाओं का रखरखाव, जीर्णोद्धार करना, कल्याणकारी योजनाओं को लागू करना आदि शामिल हैं। समाज द्वारा मद्रास हाई कोर्ट में दायर एक रिट याचिका को 31 मार्च को खारिज कर दिया गया था। वहीं, सरकार के नियंत्रण में लिए जाने के बाद एक नई याचिका पर अदालत ने 12 अप्रैल को तुरंत दखल देने से इनकार कर दिया और सरकार से इस मामले में 21 अप्रैल तक जवाब दाखिल करने को कहा है। पूरे मामले पर सीएम एमके स्टालिन ने भाजपा पर इस मामले का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया और कहा वे इसमें सफल नहीं होंगे।
एबीएन नॉलेज डेस्क। गर्मी में अब फ्रीज राहत देने का काम कर रहा हैं। जब इस भयानक गर्मी में फ्रीज में रखा ठंडा पानी गले से उतरता है तो काफी सुकून मिलता है। लेकिन, कहीं आप पानी ठंडा करने के लिए कोल्ड ड्रिंक या पुरानी वाटर बोतल का इस्तेमाल करते हैं? दरअसल, कई लोग कोल्ड ड्रिंक की बोतल को या फिर मिनरल वॉटर की बोतल को कई दिन तक पानी भरकर रखने के लिए इस्तेमाल करते हैं। क्या आप जानते हैं ऐसा करना हानिकारक है और ये बोतल किस तरह से आपको नुकसान पहुंचाती है... जब इन बोतलों में लंबे समय तक इस्तेमाल करते हैं इनमें fluoride और arsenic जैसे तत्व पैदा हो जाते हैं और ये शरीर के लिए काफी नुकसान दायक होते हैं। कहा जाता है कि ये शरीर में स्लो पॉइजन के रूप में काम करते हैं। कई रिपोर्ट में सामने आया है कि प्लास्टिक की बोतल में रखे पानी से आपके इम्यून सिस्टम पर बी काफी असर पड़ता है। इससे पैदा होने वाले कैमिकल आपके शरीर पर गहरा असर डालते हैं। प्लास्टिक में फैथलेट्स जैसे केमिकल की मौजूदगी की वजह से लिवर कैंसर का खतरा भी बढ़ जाता है। लंबे वक्त तक इन बोतलों में पानी रखने से बीपीए का निर्माण होता है, जिसका मतलब है Biphenyl A। यह एक तरह का केमिकल होता है जो आपके शरीर में मोटापा, डायबिटीज आदि बीमारियों का कारण बनता है। इसके अलावा जब इन बोतल में रखा पानी गर्म होता है या फिर सूरज की रोशनी के संपर्क में आता है तो इससे टोक्सिन पैदा होने लगते हैं, जो कई लोगों के कैंसर का कारण भी बनते हैं।
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