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Published / 2022-06-05 08:08:26
कड़वा सच : देश में हर 36वें नवजात की एक साल के भीतर हो जाती है मौत

एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत में जन्म लेने वाला हर 36वां बच्चा एक वर्ष की आयु तक भी जिंदा नहीं रह पाता है। एक साल से पहले ही किसी न किसी कारण उसकी मौत हो जाती है। यानी वह अपना पहला जन्मदिन भी नहीं मना पाता है। बहुत नवजात शिशुओं की तो 6 महीने और 3 महीने के अंदर ही जान चली जाती है। इसके पीछे कुपोषण और अन्य बीमारियों समेत कई कारण होते हैं। आधिकारिक आंकड़ों से यह पता चलता है कि पिछले कुछ दशकों में नवजात मृत्यु दर में कमी आई है। इसके बावजूद भारत में अभी भी प्रत्येक 36 में से एक शिशु की उसके जन्म के प्रथम वर्ष के अंदर मौत हो जाती है। हेल्थ एक्सपर्ट इस दिशा में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंंत्रालय को और ज्यादा ध्यान देने की जरूरत पर बल डालते हैं। बता दें कि नवजात मृत्यु दर (IMR) को किसी देश या क्षेत्र के संपूर्ण स्वास्थ्य परिदृश्य के एक अहम संकेतक के तौर पर व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है। किसी क्षेत्र में एक निर्धारित अवधि में प्रति एक हजार जन्म पर नवजातों की मृत्यु के रूप में आईएमआर को परिभाषित किया जाता है। यह मृत्यु शिशु के जन्म से एक साल से कम आयु तक की ली जाती है। 1971 में 1000 में 129 शिशुओं की हो जाती थी मौत : भारत के महापंजीयक द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, आईएमआर का मौजूदा स्तर 1971 की तुलना में एक-चौथाई कम है। 1971 में जहां प्रति एक हजार जीवित शिशु पर 129 नवजात की मौत हो जाती थी, वहीं वर्ष 2020 के लिए यह आंकड़ा प्रति एक हजार जीवित शिशु पर 28 नवजात की मौत का है। पिछले 10 वर्षों में आईएमआर में करीब 36 प्रतिशत की कमी देखी गई है और अखिल भारतीय स्तर पर आईएमआर का स्तर पिछले दशक में 44 से गिर कर 28 हो गया। आंकड़ों के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में यह 48 से घट कर 31 हो गया और शहरी इलाकों में यह 29 से घट कर 19 हो गया। इस तरह क्रमश: करीब 35 प्रतिशत और 34 प्रतिशत दशकीय गिरावट प्रदर्शित होती है। जन्म दर में आई बहुत कमी कहा गया है कि पिछले दशकों में आईएमआर में गिरावट के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक 36 में एक नवजात की मृत्यु उसके जीवन के प्रथम वर्ष में हो गई। वर्ष 2020 में अधिकतम आईएमआर मध्यप्रदेश (43) में और न्यूनतम मिजोरम (तीन) में दर्ज की गई। बुलेटिन में कहा गया है कि पिछले पांच दशकों में अखिल भारतीय स्तर पर जन्म दर में काफी कमी आई है जो 1971 के 36.9 से घट कर 2020 में 19.5 हो गई। ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों में इसका अंतर भी इन वर्षों में कम हुआ है। हालांकि जन्म दर पिछले पांच दशकों में शहरी क्षेत्रों की तुलना में गामीण इलाकों में अधिक बना हुआ है। ग्रामीण और शहरी इलाकों में अंतर : पिछले दशक में जन्म दर करीब 11 प्रतिशत घटी है। यह 2011 के 21.8 से घट कर 2020 में 19.5 हो गयी। ग्रामीण इलाकों में इसमें करीब नौ प्रतिशत की कमी आई है, जो 23.3 से घट कर 21.1 हो गई। वहीं, शहरों इलाकों में यह 17.6 से घट कर 16.1 हो गई जो करीब नौ प्रतिशत की गिरावट है।

Published / 2022-06-04 13:25:32
मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं को संवर्धित करता है योग : प्राचार्य एसके मिश्रा

टीम एबीएन, रांची। आजादी का अमृत महोत्सव वर्ष में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2022 के मद्देनजर एसआर डीएवी पब्लिक स्कूल, पुंदाग में साप्ताहिक पाठ्य सहगामी / पाठ्येत्तर क्रियाओं का आयोजन किया गया, जिसमें योगाभ्यास के साथ - साथ कक्षा नवम से द्वादश तक के विद्यार्थियों के लिए निबंध लेखन तथा स्लोगन लेखन, कक्षा षष्ठ से अष्टम तक के विद्यार्थियों के लिए चित्रांकन तथा पोस्टर निर्माण प्रतियोगियों का आयोजन किया गया, जिनमें विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। इन आयोजनों के दौरान सीबीएसई द्वारा जारी दिशा निर्देशों का सख्ती से पालन किया गया। मौके पर प्राचार्य एसके मिश्रा ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए योग एवं प्राणायाम को दिनचर्या में शामिल करने का आह्वान किया। उन्होंने ‘योग: कर्मसु कौशलम’ गीता वाणी का जिक्र करते हुए कहा कि योग मानवीय संवेदनाओं एवं मूल्यों का विकास करता है। प्राणायाम मानसिक संतुलन, एकाग्रता, बुद्धि एवं चातुर्य विकसित करता है। प्राचार्य के अनुसार आज के विद्यार्थी ही कल के भारत के कर्णधार हैं। उनकी शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक शक्ति देश के नव निर्माण के साथ-साथ मानवता के विकास में भी सहायक सिद्ध होगी। डीएवी संस्थान बच्चों को मूल्यपरक शिक्षण देने के साथ-साथ उनके सर्वांगीण विकास के लिए कृतसंकल्प है। योग एवं प्राणायाम सत्र का संचालन विद्यालय के खेल शिक्षक सह योग प्रशिक्षक आशीष जायसवाल के निर्देशन में संपन्न हुआ। सप्ताह भर चले इस कार्यक्रम को सफल बनाने में विद्यालय के सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं का सराहनीय योगदान रहा।

Published / 2022-06-02 15:04:36
मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं को विकसित करता है योग : आचार्य मुक्तरथ

टीम एबीएन, रांची। आज झारखण्ड के सुदूर क्षेत्र में डीएवी सिल्ली में मानवता विषयक योग कार्यक्रम को आयोजित किया गया। सत्यानंद योग मिशन मानव मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं पर आधारित प्रशिक्षण को लेकर कृतसंकल्पित है। आज हमारा मिशन डीएवी सिल्ली के सीनियर छात्र-छात्राओं तथा शिक्षकों के लिए ‘योग और मानवता’ विषय पर योग प्रशिक्षण सह सेमिनार को आयोजित किया, जिसमें सैकड़ों बच्चे स्वामी मुक्तरथ जी से एकाग्रता, मेधा- स्मृति, मानसिक सबलता और भावनात्मक संतुलन के लिए प्राणायाम और मेडिटेशन के गुर सीखे। विद्यालय के प्राचार्य एके मिश्रा सहित कई शिक्षक भी सेमिनार में उपस्थित थे। आचार्य मुक्तरथ जी ने कहा आज मनुष्य को स्वावलंबी बनने के साथ परोपकारी, कर्तव्यनिष्ठ, दूसरों के प्रति संवेदना रखने वाला और अपने नैतिक गुणों को विकसित करने में ध्यान देने की जरूरत है। हमारा स्वास्थ्य और संस्कार पारिवारिक सुख और सामंजस्य,घरेलू वातावरण, समाज की रीति-रिवाज और परिवेश पर बहुत हद तक निर्भर करता है। यहीं से हम अपने भीतर संवेदनशीलता के गुणों को भी विकसित करते हैं। जिस परिवार में योग का प्रचलन है वह जरूर सुखी रहता है और उनसे समाज को भी एक दिशा मिलती है। आज हमें इन्हीं गुणों को विकसित करने की आवश्यकता है जिससे प्रतिस्पर्धा में द्वेष न हो, दूसरों के दु:ख-दर्द के साथ हमारी सहानुभूति हो, हममें राष्ट्रीय भावना कूट-कूट कर भरी हो और हम एक नेक इन्सान बन देश की उन्नति में, मानवता के विकास में खड़े उतरें। प्राचार्य एके मिश्रा ने कहा हमारा डीएवी संस्थान भी बच्चों में इन्हीं मूल्यों पर आधारित विद्या को प्रदान करने हेतू कृतसंकल्पित है।

Published / 2022-05-28 15:50:50
अब अमूल का आर्गेनिक गेहूं आटा खायेगा इंडिया...

एबीएन बिजनेस डेस्क। अमूल ब्रांड के तहत प्रोडक्ट्स की पेशकश करने वाली डेयरी कंपनी गुजरात को-आपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडेरेशन लिमिटेड यानी जीसीएमएमएफ ने आर्गेनिक गेहूं आटा की पेशकश करते हुए शनिवार को आर्गेनिक फूड के बाजार में उतरने की घोषणा की। जल्द आएंगे ये प्रोडक्ट्स : जीसीएमएमएफ ने एक बयान में कहा कि इस कारोबार के तहत उतारा गया पहला प्रोडक्ट्स अमूल आर्गेनिक होल व्हीट आटा है। कंपनी आगे चलकर मूंग दाल, तुअर दाल, चना दाल और बासमती चावल जैसे उत्पाद भी बाजार में उतारेगी। आॅर्गेनिक खेती करने वाले किसानों की बढ़ेगी आय : कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर आर एस सोढी ने कहा कि आॅर्गेनिक खेती करने वाले किसानों को एक साथ लाया जाएगा और दूध एकत्र करने के मॉडल को ही इस कारोबार में भी अपनाया जाएगा। इससे आॅर्गेनिक खेती करने वाले किसानों की आय बढ़ेगी और आॅर्गेनिक खाद्य उद्योग को अधिक लोकतांत्रिक बनाया जा सकेगा। किसानों का बाजार से जुड़ाव एक बड़ी चुनौती : बयान में कहा गया कि किसानों का बाजार से जुड़ाव एक बड़ी चुनौती है, वहीं आॅर्गेनिक जांच सुविधाएं भी महंगी हैं इसलिए अमूल आॅर्गेनिक खेती करने वाले किसानों को बाजार से जोड़ने के अलावा देशभर में पांच स्थानों पर आॅर्गेनिक जांच प्रयोगशालाएं भी स्थापित करेगी। इस तरह की पहली प्रयोगशाला अहमदाबाद में अमूल फेड डेयरी में बनाई जा रही है। जून के पहले हफ्ते से मिलने लगेगा आटा : आॅर्गेनिक आटा जून के पहले हफ्ते से गुजरात में सभी अमूल पार्लरों और खुदरा दुकानों पर मिलने लगेगा। जून के बाद से गुजरात, दिल्ली-एनसीआर, मुंबई और पुणे में भी आॅनलाइन आॅर्डर किया जा सकेगा। एक किलोग्राम आटे की कीमत 60 रुपये और पांच किलो आटा 290 रुपये का होगा।

Published / 2022-05-27 16:09:47
बड़ी कठिन डगर है केदारनाथ धाम तक रेल पहुंचाने की...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (साई मनीष)। रेल विकास निगम लिमिटेड (आरवीएनएल) केदारनाथ धाम तक बड़ी रेल लाइन बिछाने के पक्ष में नहीं है। आरवीएनएल 73,000 करोड़ रुपये की लागत से तैयार होने वाली चार धाम रेल परियोजना की क्रियान्वयन एजेंसी है। आठ साल तक इस क्षेत्र का सर्वेक्षण और अध्ययन करने के बाद आरवीएनएल ने एक आंतरिक समीक्षा रिपोर्ट में कहा है कि केदारनाथ तक रेल पटरी बिछाने में कुछ तकनीकी कठिनाइयां हैं और खर्च भी बहुत आएगा। इससे कोई सामरिक मकसद भी पूरा नहीं हो पाएगा। इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और भारतीय सेना की सामरिक जरूरतों को देखते हुए यह बड़ी रेल लाइन चार धाम रेल परियोजना के लिए काफी महत्त्वपूर्ण है। अप्रैल में सौंपी गई इस आंतरिक रिपोर्ट में कहा गया है, यह रेल पटरी सुदूर क्षेत्र में बिछाई जाएगी, जहां आबादी काफी कम है। इससे स्थानीय लोगों को भी लाभ नहीं होगा। इन बातों को ध्यान में रखते हुए केदारनाथ धाम के लिए यह रेल लाइन फायदेमंद नहीं दिख रही है और इससे मकसद भी पूरा नहीं हो पाएगा। चार धाम रेल परियोजना दुनिया की सबसे महत्त्वाकांक्षी एवं चुनौतीपूर्ण रेलवे परियोजना है। यह परियोजना शुरू करने का विचार 2014 में आया था। परियोजना के तहत 300 किलोमीटर लंबी रेल लाइन बिछाने की योजना है। यह लाइन सुरंगों, पुलों और पहाड़ी क्षेत्रों में तीव्र ढाल से होते हुए यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ को जोड़ेगी। ये सभी स्थान उत्तराखंड में हैं। यमुनोत्री और गंगोत्री को देहरादून के निकट डोईवाला से जोड़ने की योजना थी। इसी तरह ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन का विस्तार कर इसे भारतीय सेना के लिए सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण केदारनाथ और बदरीनाथ से जोड़ने की योजना थी। वर्ष 2014 में आरवीएनएल ने एक सर्वेक्षण किया था, जिसमें चारों स्थानों को जोड़ने के लिए 30 मार्गों का अध्ययन किया था। इसके बाद ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन को चमोली जिले में सैकोट से जोड़ने की योजना पर अमल होता। सैकोट से दो रेल लाइन निकलतीं, जिनमें से एक केदारनाथ और दूसरी बदरीनाथ तक पहुंचती। केदारनाथ मार्ग पर सोनप्रयाग तक रेल लाइन बिछाने की योजना था। यह स्टेशन समुद्र तल से 1,654 मीटर ऊंचाई पर बनना था। सोनप्रयाग से केदारनाथ महज 13 किलोमीटर है मगर 3,553 मीटर ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ तक पहुंचने के लिए चढ़ाई काफी दुर्गम है। अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए सर्वेक्षण करने की जिम्मेदारी तुर्की की एक कंपनी को 2018 में सौंपी गई थी। कंपनी ने इस पूरे क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन करने के बाद अपनी अंतिम रिपोर्ट हाल में सौंप दी। रिपोर्ट में कहा गया है कि सैकोट के बाद एक लाइन केदारनाथ की तरफ मुड़ जाएगी और सोनप्रयाग तक जाकर रुक जाएगी। सोनप्रयाग रेलवे स्टेशन से केदारनाथ जाने के लिए 18 किलोमीटर की पैदल दूरी तय करनी होती। मगर आरवीएनएल ने देखा कि सैकोट तक तो रेल लाइन आ सकती है मगर उससे आगे मक्कूमठ से सोनप्रयाग तक रेल मार्ग तैयार करना असंभव होगा। कंपनी ने कहा कि विभिन्न भूगर्भीय चुनौतियों और निर्माण से जुड़ी कठिनाइयों के कारण रेल लाइन बिछाना चुनौतीपूर्ण होता। आरवीएनएल ने अपनी आंतरिक समीक्षा रिपोर्ट में कहा है कि केदारनाथ रेल लाइन से कोई रणनीतिक लाभ नहीं मिलता और 214 किलोमीटर लंबाई के कारण ऋषिकेश से सोनप्रयाग तक यह रेल लाइन सड़क मार्ग से भी लंबी होगी। कंपनी ने कहा कि दोनों स्थानों के बीच हवाई सेवा (45 किलोमीटर) शुरू करना वित्तीय लिहाज से भी अधिक फायदेमंद रहेगा।

Published / 2022-05-27 13:07:59
दुखद... इस साल शुरू हुई चारधाम यात्रा से अब तक 91 तीर्थयात्रियों की मौत

एबीएन सोशल डेस्क। इस साल 3 मई को तीर्थयात्रा शुरू होने के बाद से अब तक कुल 91 तीर्थयात्रियों की जान चली गई है। साथ ही 26 मई को यात्रा के दौरान 16 तीर्थयात्रियों की मृत्यु हुई थी। वहीं डीजी स्वास्थ्य डॉ शैलजा भट्ट ने इसकी पुष्टि की है। उत्तराखंड की महानिदेशक (डीजी) स्वास्थ्य शैलजा भट्ट ने शुक्रवार को हुई मौतों के पीछे प्राथमिक कारण दिल का दौरा बताया। उनका कहना है, ज्यादातर तीर्थयात्रियों की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई। साथ ही, चारधाम में स्वास्थ्य सेवाओं को पहले की तुलना में मजबूत किया गया है। अतिरिक्त 169 डॉक्टरों को तैनात किया गया है। बता दें कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की उपस्थिति में अक्षय तृतीया के अवसर पर 3 मई को श्रद्धालुओं के लिए गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट खुलने के साथ चारधाम यात्रा की शुरुआत हुई। इसके अतिरिक्त केदारनाथ के कपाट 6 मई को खुले, जबकि बद्रीनाथ के कपाट 8 मई को खुले।

Published / 2022-05-25 15:41:49
समुद्री तट पर सैकड़ों व्हेलों की मौत से बेपरवाह दुनिया...

एबीएन डेस्क (मनोज शर्मा)। आॅस्ट्रेलिया के वेस्ट कोस्ट तस्मानिया में मार्की हार्बर पर फंसी करीब 460 पायलट व्हेलों के पॉड में से ज्यादातर की मौत हो गई। छिछले तटों की ओर आकर फंसी केवल 50 व्हेलों की जान बचाई जा सकी। दक्षिणी आॅस्ट्रेलिया के तस्मानिया में मार्की हार्बर के पास के छिछले पानी में करीब 460 पायलट व्हेलों का समूह आ फंसा था। तमाम प्रयासों के बावजूद उनमें से केवल 50 व्हेलों को बचाया जा सका। इस पॉड यानि पायलट व्हेलों के समूह के ज्यादातर सदस्य हार्बर के छिछले पानी में थीं जबकि कुछ गहरे पानी की ओर बढ़ने में कामयाब हो गई थीं। पायलट व्हेलें महासागरीय डॉल्फिन की एक किस्म होती हैं, जिसके सदस्य 7 मीटर (23 फीट) तक लंबे और 3 टन तक भारी हो सकते हैं। कम गहरे पानी में जाकर फंस गई व्हेलों को बचाने के लिए बड़े स्तर पर बचाव अभियान चलाए जा रहे हैं। इसके लिए व्हेलों के पास भारी मात्रा में ठंडा पानी ले जाकर उन्हें एक झूले जैसी चीज पर टांगने की कोशिश की जाती है और इस तरह उन्हें धीरे धीरे गहरे पानी की ओर ले जाकर छोड़ दिया जाता है। तस्मानिया के पार्क्स और वाल्डलाइफ सर्विस के क्षेत्रीय प्रबंधक निक डेका ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया, हमने एक ऐसा तरीका आजमाने पर सहमति बनाई, जिसमें पहले एक झूले जैसी चीज को व्हेल के नीचे से गुजारा जाता है जो नाव से जुड़ा होता है। इसके अलावा गहरे पानी में भी क्रू मौजूद होता है। बचाव अभियान से जुड़े 60 से भी अधिक लोगों में स्थानीय मछुआरे, स्वयंसेवी और पेशेवर शामिल हैं। इस समय यहां पानी इतना ठंडा है कि खास वेटसूट पहन कर काम करने के बावजूद सभी बचावकर्मी छोटी शिफ्टों में काम कर रहे हैं ताकि ज्यादा ठंड लगने के कारण उन्हें हाइपोथर्मिया नाम की स्वास्थ्य परेशानी का सामना ना करना पड़े। वन्यजीव जीवविज्ञानी क्रिस कार्लयन ने बताया, हम बड़े और संकट में पड़े जानवरों से निपट रहे हैं। ना केवल इसमें कई कई दिन का समय लग जाता है बल्कि भावनात्मक रूप से भी यह काफी कठिन होता है। कार्लयन कहते हैं कि चूंकि यह एक प्राकृतिक घटना है इसलिए यह स्वीकार कर सकते हैं कि कुछ जानवरों की जान जा सकती है। वैज्ञानिकों को अब तक नहीं पता चला है कि हमेशा समूह में यात्रा करने वाली पायलट व्हेलें कभी कभी समुद्र तटों की ओर क्यों बढ़ जाती हैं। स्तनधारियों की यह प्रजाति आम तौर पर किसी नेता के नेतृत्व में चलती है और अपने पॉड में किसी के घायल हो जाने या परेशानी में पड़ने पर उसे अकेला नहीं छोड़तीं और उसके चारों ओर इकट्ठी हो जाती हैं। इस इलाके में अकसर व्हेलों को समुद्री तटों पर देखा जाता रहा है। लेकिन इतनी बड़ी संख्या में इन्हें कभी नहीं देखा गया था। इसके पहले सन 2009 में तस्मानिया के पास करीब 200 भटकी हुई व्हेलें दिखी थीं। आॅस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के पास के इलाकों में कई किस्म की व्हेलें मिलती हैं। हर साल ये व्हेलें छोटे समूहों से लेकर 1,000 जैसी बड़ी तादाद में पॉड बना कर दूर दूर के पानी में माइग्रेट करती हैं। 2018 में भी न्यूजीलैंड में इसी तरह फंसने से एक ही हफ्ते के भीतर 200 से अधिक पायलट व्हेलों की मौत हो गई थी।

Published / 2022-05-24 07:32:37
चारधाम यात्रा : अब तक 65 यात्रियों की गयी जान, केदारनाथ में सबसे ज्यादा मौत

एबीएन सेंट्रल डेस्क। उत्तराखंड स्थित पवित्र हिन्दू तीर्थ स्थल चारधाम की यात्रा में इस बार श्रद्धालु बड़ी संख्या में दर्शनों को पहुंच रहे हैं। कोरोना के दौरान चार धाम यात्रा बंद दो साल तक बंद रही थी लेकिन इस साल यात्रा निर्धारित समय पर शुरू हुई तो हिंदू धर्म के लोगों में इसे लेकर जबरदस्त उत्साह नजर आ रहा है। 63 श्रद्धालुओं की मौत : चारधाम यात्रा के दौरान अब तक 63 श्रद्धालुओं की मौत हुई है। बताया जाता है कि श्रद्धालुओं की मौत के सबसे अधिक मामले केदारनाथ यात्रा के दौरान दर्ज किए गए हैं। कुल 65 में से 30 मौतें सिर्फ केदारनाथ यात्रा के दौरान हुई हैं। यमुनोत्री में 19, बद्रीनाथ में 12 और गंगोत्री में 4 श्रद्धालुओं की मौत हुई है। चारधाम यात्रा के दौरान हुई तीर्थयात्रियों की मौत के पीछे सबसे बड़ी वजह दिल का दौरा पड़ने को बताया जा रहा है। अब तक 12 लाख भक्त कर चुके हैं दर्शन : गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ में सोमवार शाम तक कुल 12 लाख 1518 (12,01,518) भक्तों ने दर्शन लाभ प्राप्त किए हैं। बदरीनाथ धाम कपाट खुलने की तिथि आठ मई से 22 मई शाम तक कुल 2,81,584 और केदारनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि 6 मई से 22 मई शाम तक 2,98,234 भक्तों ने दर्शन किए हैं। इस तरह कुल 5,79,818 भक्त यहां दर्शन कर चुके हैं। दूसरी ओर, उत्तरकाशी जनपदान्तर्गत, स्थित गंगोत्री मन्दिर समिति के प्रतिनिधि के अनुसार, 3 मई को कपाट खुलने के बाद सोमवार शाम चार बजे तक कुल 1,82,677 और इसी दिन यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने के बाद से आज शाम तक 1,32,870 श्रद्वालुओं ने दर्शन किए हैं। इस तरह इन दोनों धामों पर अभी तक कुल 3,20,947 श्रद्धालुओं ने दर्शन किए हैं। इस तरह चारों धामों में कुल 12,01,518 ने दर्शन किए हैं। उल्लेखनीय है कि केदारनाथ-बदरीनाथ मंदिरों के आंकड़े नेटवर्क न होने के कारण लगभग एक दिन बाद उपलब्ध हो पाते हैं।

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