एबीएन सोशल डेस्क। भारतीय परिवारों ने वर्ष 2021-22 के दौरान 23,700 करोड़ रुपये दान किये, जिसमें से सबसे अधिक दान धार्मिक संगठनों को मिला। अशोक विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में यह बात सामने आई है। अशोक विश्वविद्यालय में सामाजिक प्रभाव और परोपकार केंद्र और वल्र्ड पैनल डिवीजन ऑफ कंटार द्वारा हॉऊ इंडिया गिव्स, 2021-22 शीर्षक से जारी रिपोर्ट के मुताबिक भारतीयों ने ज्यादातर दान नकद दिया। इस अध्ययन के लिए 18 राज्यों के कुल 81,000 परिवारों को सर्वेक्षण में शामिल किया गया। अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है, धार्मिक आस्था प्राथमिक तौर पर भारतीयों को दान करने के लिए प्रेरित करती है। वहीं, वित्तीय संकट से गुजर रहे परिवारों की मदद की इच्छा और पारिवारिक परम्परा दान देने के अन्य प्रेरक कारण हैं। दक्षिण भारत ने सबसे अधिक औसत राशि दान की, उसके बाद पश्चिम भारत का स्थान आता है। पूर्वी और उत्तर भारत में दान देने के मामले सबसे अधिक रहे। अध्ययन में खुलासा हुआ कि 64 प्रतिशत परिवारों ने धार्मिक संगठनों को दान दिया। अध्ययन के मुताबिक अनुमान है कि धार्मिक संगठनों को करीब 16,600 करोड़ रुपये की राशि दान की गई, जो कुल दान का करीब 70% है। वहीं, कुल दान का 12% भिखारियों को मिला है, यानी उन्हें 2,900 हजार करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं।
टीम एबीएन, चौपारण (हजारीबाग)। प्रतिदिन स्नान करना यानि नहाना सेहत की दृष्टि से अनिवार्य होता है। लेकिन प्राचीन धर्मग्रंथों में स्नान के लिए सुनिश्चित समय निर्धारित है। पढ़ें विस्तार से... (1) मुनि स्नान : 4 से 5 बजे के बीच सुबह का स्नान सर्वोत्तम है। (2) देव स्नान : 5 से 6 बजे के बीच किया गया स्नान उत्तम है। (3) मानव स्नान : 6 से 8 के बीच सुबह किया गया स्नान सामान्य है। (4) राक्षस स्नान : 8 बजे के बाद स्नान करना नहीं चाहिए, वह राक्षस स्नान है, जो एकदम वर्जित है। उक्त बातें आज मुकुंद साव ने एक धार्मिक गोष्ठी में अपने संबोधन में कहा। उन्होंने कहा कि हर स्नान के अलग-अलग लाभ हैं। मुनि स्नान घर में सुख, शांति, समृद्धि, विद्या, बल, आरोग्य, चेतना प्रदान करता है। देव स्नान घर में यश, कीर्ति, धन, वैभव, सुख, शांति, संतोष प्रदान करता है। मानव स्नान कार्य में सफलता, भाग्य, अच्छे कर्मों की सूझ, परिवार में एकता प्रदान करता है परंतु राक्षसी स्नान घर में दरिद्रता, हानि, क्लेश, धन हानि और परेशानी लाता है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि किसी भी परिस्थिति में 8 बजे सुबह के पूर्व स्नान कर लें। श्री साव ने बताया कि स्नान करते समय कुछ और बातों को ध्यान में रखना चाहिए। सुसुम पानी से नहाना स्वास्थ्य वर्धक होता है। नहाने के पूर्व लघुशंका यानि पेशाब अवश्य करना चाहिए और नहाने के बाद 2 ग्लास स्वच्छ जल जरूर पियें। तीन कार्य करने के बाद स्नान करना अति अनिवार्य है। शव का अंतिम संस्कार में जाने के बाद, बाल कटवाने के बाद और शरीर में तेल मालिश करने के बाद। धार्मिक और आध्यात्मिक लाभ के साथ-साथ यह सेहत के लिए भी लाभदायक है। साथ ही शौच जाने के बाद बिना स्नान किए धार्मिक अनुष्ठानों में भाग नहीं लेना चाहिए। नहाते समय एक बात को और ध्यान में रखना चाहिए कि पहले पैर धोयें। फिर हाथ धोयें। फिर कंधा पर पानी डालें और अंतिम में माथा झुकाकर माथा में पानी डालें ताकि पहला पानी शरीर पर नहीं जाकर नीचे गिर जाये और तब अंतिम में पूरा शरीर पर पानी डालें। खड़ा होकर माथे पर बाल्टी से पानी डालकर नहाना एकदम नुकसान दायक है। उससे पानी भी ज्यादा बर्बाद होता है तथा लकवा का झटका आने की ज्यादा आशंका रहती है। नहाने के बाद खुला बदन में सूर्य की रोशनी पड़ना भी सेहत के लिए लाभदायक है।
टीम एबीएन, लोहरदगा। जिले भर में रविवार को महिलाओं ने जीवित्पुत्रिका का व्रत पूरे विधि-विधान के साथ मनाया। शनिवार को नहाय-खाय के साथ प्रारंभ हुआ जीवित्पुत्रिका व्रत सोमवार को सूर्योदय के साथ समाप्त हो गया। रविवार को महिलाओं ने अपनी संतान की लंबी उम्र व सुख-समृद्धि की कामना को ले 24 घंटे का निर्जला व्रत रखते हुए कथा का श्रवण किया। सोमवार को पारण के साथ जीवित्पुत्रिका व्रत का समापन हो गया। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से संतान को लंबी उम्र के साथ-साथ सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। कई स्थानों पर इस व्रत को बड़े ही वृहद पैमाने पर मनाया जाता है। पर्व की खास बातें हैं पर्व के दौरान जहां शुद्धता का खास ख्याल रखा जाता है वही अपने आचार-विचार में भी शुद्धता अपनाई जाती है। जीवित्पुत्रिका व्रत महिलाएं सामूहिक रूप से एक स्थान पर एकत्रित हो पूरे विधि-विधान के साथ धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेती है।
एबीएन सोशल डेस्क। सनातन धर्म में यात्राओं का कहीं कोई उल्लेख नहीं है। यात्रा की परंपरा बुद्ध के साथ शुरू हुई। उन्होंने सबसे पहले बोधगया से सारनाथ की यात्रा की। फिर जगह-जगह गये। क्योंकि उन्हें अपने विचार रखने थे। अपना ज्ञान बांटना था। फिर आदिगुरु शंकराचार्य ने एक यात्रा की। अखंड भारत को एक सूत्र में पिरोने वाली यात्रा। चार दिशाओं में चार धाम स्थापित किये। मिथिला में शास्त्रार्थ किया। बौद्ध विहारों में पड़े आलसी भिक्षुओं को कर्त्तव्य पथ पर लाने के लिए गांव-गांव गये और हिंदुत्व की पुनर्स्थापना की। उसके बाद सीधे हम आते हैं गांधी जी की दांडी यात्रा से। इसका उद्देश्य था अंग्रेजों के खिलाफ जन जागरण। फिर आजादी के बाद आये विनोबा भावे। उन्होंने जमींदारों से जमीन लेकर गरीबों में बांटने के लिए भूदान यज्ञ शुरू किया। इसके लिए भी वे जगह- जगह गये। फिर आया जयप्रकाश आंदोलन। इसमें भी गुजरात से शुरू हुई नव निर्माण यात्रा बिहार आते-आते जन आंदोलन बन चुका था। इसी कड़ी की अंतिम यात्रा थी आडवाणी की रथयात्रा। जयप्रकाश आंदोलन और रथयात्रा दोनों का निहितार्थ सत्ता परिवर्तन था और सफल भी रहीं। यह यात्राएं स्वत: स्फूर्त थीं। लोग जुड़ते गये कारवां बनता गया। यात्री गांव में रुकते थे, वहीं भाषण होते थे। जो मिला खा लिया, जहां रात हुई सो गये। इसी कड़ी में नागरकोइल तमिलनाडु से शुरू हुई राहुल गांधी की यात्रा हाईटेक यात्रा है। एसी कंटेनर हैं। बेड है। किचन है। बाथरूम है। सारी सुविधाएं हैं। वैसे नागरकोइल के ही कामराज थे, जिन्होंने डूबते कांग्रेस को बचाने के लिए उम्रदराज कांग्रेसियों के रिटायरमेंट का एक कार्यक्रम चलाया था, जिसे कामराज प्लान कहा जाता है। अभी राहुल गांधी केरल से सांसद हैं। राहुल गांधी के अलावा कांग्रेस के चारों दिग्गज नेता दक्षिण से हैं, शशि थरूर, मल्लिकार्जुन खड़गे, जयराम रमेश, वी श्रीनिवास। इसीलिए यात्रा की शुरुआत दक्षिण से हुई है; क्योंकि शुरू- शुरू में भीड़ इकट्ठा करना जरूरी है। अभी तक भारत की परिभाषा कश्मीर से कन्याकुमारी तक थी मगर कांग्रेस ने उल्टा कर दिया। यह राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने की यात्रा है। यह ईडी से बचाने की यात्रा है। उधर, नीतीश कुमार की यात्रा पूरी हो चुकी है। झामुमो नेता रायपुर यात्रा से लौट चुके हैं। केजरीवाल ने भी हरियाणा से अपनी यात्रा शुरू कर दी है। मगर ये यात्राएं न धार्मिक हैं, न राजनैतिक ना सामाजिक। यह यात्राएं खुद को जीवित रखने की, प्रासंगिक बनाये रखने की कवायद भर है। (साभार : झारखण्ड सरकार से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी निरन्तर नारायण के फेसबुक वॉल से)
एबीएन सेंट्रल डेस्क (रथीन भद्रा)। 14 सितंबर, 1949 के दिन हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला था। तब से हर साल यह दिन हिंदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हिंदी दिवस क्यों मनाया जाता है? इसके पीछे एक वजह है। दरअसल, साल 1947 में जब अंग्रेजी हुकूमत से आजाद हुआ तो देश के सामने भाषा को लेकर सबसे बड़ा सवाल था। क्योंकि भारत में सैकड़ों भाषाएं और बोलियां बोली जाती है। 6 दिसंबर 1946 में आजाद भारत का संविधान तैयार करने के लिए संविधान का गठन हुआ। संविधान सभा ने अपना 26 नवंबर 1949 को संविधान के अंतिम प्रारूप को मंजूरी दे दी। आजाद भारत का अपना संविधान 26 जनवरी 1950 से पूरे देश में लागू हुआ। लेकिन भारत की कौन सी राष्ट्रभाषा चुनी जाएगी ये मुद्दा काफी अहम था। काफी सोच विचार के बाद हिंदी और अंग्रेजी को नए राष्ट्र की भाषा चुना गया। संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी को अंग्रजों के साथ राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार किया था। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि इस दिन के महत्व देखते हुए हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाए। बता दें पहला हिंदी दिवस 14 सितंबर 1953 में मनाया गया था।
एबीएन सोशल डेस्क। मंदिर अंदर से काफी खूबसूरत है और इसकी खूबसूरती देखती ही बनती है। मंदिर के मुख्य हॉल में भगवान की मूर्तियां स्थापित की गयी हैं और यहां एक बड़ा सा 3डी प्रिंटेड गुलाबी कमल है जो पूरे गुंबद को काफी खूबसूरत बना रहा है। लोग दुबई शॉपिंग के लिए जाते हैं, बुर्ज खलीफा देखने के लिए जाते हैं लेकिन अब यहां जो भव्य और दिव्य हिंदू मंदिर बना है वह भी दुबई के मुख्य आकर्षणों में शुमार हो गया है। मुस्लिम बाहुल्य दुबई में बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं जिसमें खासकर हिंदू आबादी को इस मंदिर के बन जाने से बड़ी खुशी हुई है क्योंकि अब तक यहां उनका कोई उपासना स्थल नहीं था। दुबई का हिंदू मंदिर देखने के लिए सिर्फ स्थानीय लोग ही नहीं आ रहे बल्कि पूरे संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के हजारों निवासी दर्शन के लिये उमड़ रहे हैं। वैसे इस मंदिर को औपचारिक रूप से आम लोगों के लिए हालांकि पांच अक्टूबर को दशहरे के दिन खोला जाएगा लेकिन फिलहाल लोगों को स्लॉट बुक कराके मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी जा रही है। हम आपको बता दें कि भले यह हिंदू मंदिर हो लेकिन यहां सभी धर्मों के लोगों का स्वागत है। यहां स्थापित 16 देवताओं की मूर्तियां देखने और मंदिर की भव्य साज सज्जा को अपने कैमरे में कैद करने के लिए बड़ी संख्या में उपासक और आगंतुक आ रहे हैं। मंदिर अंदर से काफी खूबसूरत है और इसकी खूबसूरती देखती ही बनती है। मंदिर के मुख्य हॉल में भगवान की मूर्तियां स्थापित की गयी हैं और यहां एक बड़ा सा 3डी प्रिंटेड गुलाबी कमल है जो पूरे गुंबद को काफी खूबसूरत बना रहा है। बता दें कि यह हिंदू मंदिर पूजा गांव के रूप में पहचाने जाने वाले मशहूर जबेल अली में स्थित है। इस जगह कई चर्च और गुरु नानक दरबार गुरुद्वारा भी स्थित है। बताया जा रहा है कि यह मंदिर 7853 गज में फैला हुआ है और किसी भी मुस्लिम देश में अब तक का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है। उल्लेखनीय है कि मंदिर प्रबंधन ने हाल ही में अपनी वेबसाइट के माध्यम से क्यूआर-कोड आधारित बुकिंग प्रणाली चालू करने के साथ एक सितंबर को मंदिर का अनौपचारिक (सॉफ्ट) उद्घाटन किया था। मंदिर में पहले दिन से ही और विशेष रूप से सप्ताहांत में बड़ी संख्या में आगंतुक आ रहे हैं। फिलहाल भीड़ प्रबंधन और सामाजिक दूरी सुनिश्चित करने के लिए क्यूआर-कोड के माध्यम से सीमित प्रवेश दिया जा रहा है। हम आपको बता दें कि यह मंदिर सुबह साढ़े छह बजे से रात आठ बजे तक खुला रहता है। यहां आने के लिए लोग इतने उतावले हैं कि अक्टूबर के अंत तक सप्ताहांत के लिए अधिकांश बुकिंग पहले ही हो चुकी है। बताया जा रहा है कि बुकिंग प्रणाली अक्टूबर के अंत तक जारी रहेगी। उसके बाद आम जनता मंदिर के खुलने के समय में किसी भी वक्त दर्शन करने के लिए स्वतंत्र होगी। फिलहाल कई लोग ऐसे भी देखे जा रहे हैं जो बुकिंग नहीं होने के चलते अंदर नहीं जा पा रहे हैं तो बाहर से ही दर्शन कर रहे हैं। मंदिर प्रबंधन ने लोगों से गुजारिश की है कि वह मंदिर आने के लिए सार्वजनिक परिवहन के साधनों का उपयोग करें क्योंकि निजी वाहनों में आने से ट्रैफिक जाम की समस्या उत्पन्न हो सकती है। बता दें कि वर्तमान में मंदिर में एकमात्र गतिविधि वैदिक श्लोकों के जप की हो रही है, जिसके लिये 14 पंडितों का एक समूह विशेष रूप से भारत से आया है। यह जप हर दिन सुबह साढ़े सात बजे से 11 बजे तक और फिर दोपहर साढ़े तीन बजे से रात साढ़े आठ बजे तक होता है। आगंतुकों को यहां हो रहे मंत्रोच्चार में भाग लेने की अनुमति है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। संयुक्त राष्ट्र की श्रम एजेंसी की ओर से जारी रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि पिछले साल के अंत तक दुनिया भर में करीब पांच करोड़ लोग आधुनिक गुलामी के पीड़ित रहे थे, जो या तो बंधुआ मजदूरी में धकेल दिए गए या उनका जबरन विवाह कर दिया गया। यह आंकड़ा पांच साल पहले आई संस्था की पिछली रिपोर्ट से 25 प्रतिशत अधिक आंकी गई है। जबकि जबरन विवाह के मामलों में प्रति व्यक्ति सबसे अधिक संख्या अरब देशों में पाये गये। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और साझेदार व्यावसायिक यौन शोषण जैसे चिंताजनक रुझानों की ओर इशारा करते हैं, जो चार में से लगभग एक व्यक्ति को प्रभावित करते हैं जो बंधुआ मजदूरी के अधीन हैं। इससे गरीबों, महिलाओं और बच्चों पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का कहना है कि 5 करोड़ लोग या हर 150 लोगों में से एक शख्स या तो जबरन बंधुआ मजदूरी में फंसे हुए हैं या उनकी जबरन शादी कर दी गई। आधुनिक गुलामी में रहने वालों की संख्या 1 करोड़ बढ़ी : संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय प्रवासी मामलों के संगठन और आधुनिक दासता पर काम करने वाले अधिकार समूह वॉक फ्री फाउंडेशन के साथ आईएलओ ने बताया कि 2021 के अंत में बंधुआ मजदूरों की संख्या 2.8 करोड़ थी। एक दिन पहले सोमवार को जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि एक साल पहले के आंकड़ों के आधार पर 2017 में इस तरह की आखिरी रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद से इस तरह के आंकड़ों में आधुनिक गुलामी में रहने वाले लोगों की संख्या एक करोड़ बढ़ी है। इसमें यह भी कहा गया है कि दो-तिहाई वृद्धि अकेले जबरन विवाह से जुड़ा हुआ है। अरब देशों में सबसे ज्यादा जबरन विवाह : वॉक फ्री फाउंडेशन के संस्थापक निदेशक ग्रेस फॉरेस्ट ने न्यूयॉर्क में एजेंसी से साक्षात्कार में कहा कि यह वृद्धि ग्रीस की कुल आबादी के बराबर है। रिपोर्ट के अनुसार, सभी जबरन विवाह के मामलों में से दो तिहाई से अधिक मामले एशिया-प्रशांत क्षेत्र में पाए गए जो दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला क्षेत्र है लेकिन प्रति व्यक्ति सबसे अधिक संख्या अरब देशों में है, जहां लगभग प्रति 1,000 में से पांच लोग जबरन विवाह वाले थे। श्रमिकों, व्यवसायों और सरकारों को साथ लाने का काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र श्रम एजेंसी के महानिदेशक गाय राइडर ने सबसे मिलकर काम करने का आह्वान किया और कहा, इसमें ट्रेड यूनियन, नियोक्ता समूह, नागरिक समाज और आम लोग, सभी को महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभानी हैं।
टीम एबीएन, रांची। उत्तर प्रदेश की वाराणसी जिला न्यायालय ने ज्ञानवापी मामले पर महत्वपूर्ण फैसला देते हुए ज्ञानवापी स्थित शृंगार गौरी के नियमित दर्शन-पूजन और विग्रहों के संरक्षण को निर्देशित किया है। इस फैसला से समस्त सनातन हिंदू समाज आनंदित, उत्साहित व उल्हासित हैं, यह बात विश्व हिंदू परिषद के प्रांत मंत्री डॉ बिरेंद्र साहू ने कहा। प्रांत मंत्री डॉ बिरेंद्र साहू ने कहा जिला न्यायाधीश डॉ.अजय कृष्ण विश्वेश की न्यायालय में पोषणीयता पर फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया कि श्रृंगार गौरी-ज्ञानवापी याचिका में आगे सुनवाई होगी। वहीं मुस्लिम पक्ष की याचिका निरस्त कर दी गई है, यह विदेशी आक्रांताओं पर भारतीय हिंदू संस्कृति की विजय है। डॉ साहू ने कहा, गजनी, गोरी, औरंगजेब, तुगलक, अकबर जैसे आक्रांताओं के द्वारा हमारे अनेकों मानबिंदुओं को क्षति पहुंचाने अथवा लूटने का काम किया गया था, इसका पुनरुद्धार करना हम हिंदू समाज का कर्तव्य बनता है। अपने कर्तव्य को समझते हुए विगत 600 वर्षों से अपने मानबिंदुओं को मूल रूप में प्राप्त करने के लिए हिंदू समाज ने संघर्ष करते आ रहे हैं। यह फैसला इसी कर्तव्य के भविष्य का मार्ग को प्रशस्त करने का काम करेगा। उन्होंने कहा कि न्यायालय का यह फैसला साबित कर दिया कि मथुरा के श्रीकृष्ण मंदिर सहित भारत के सैकड़ों प्राचीन सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक मान बिंदुओं पर प्लेसेस ऑफ़ वरशिप एक्ट 1991 लागू नहीं होगा, क्योंकि ये पुरातन है, प्राचीन है, जिस पर 15 अगस्त,1947 की स्थिति लागू नहीं हो सकता। डॉ साहू ने फैसला पर अपनी खुशी व्यक्त करते हुए कहा भगवान शिव के अन्यतम भक्त भगवान नंदी के प्रतीक्षा का समय अब पूर्ण होने वाला है। (लेखक विहिप के झारखंड प्रांत मंत्री हैं।)
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