समाज

View All
Published / 2022-10-28 14:50:11
नहाय-खाय के साथ चार दिवसीय छठ अनुष्ठान प्रारंभ

टीम एबीएन, हजारीबाग। हजारीबाग सुन लीं अरजिया हमार, हे छठी मैया... शहर में शुक्रवार से सूर्योपासना का महापर्व छठ का चार दिवसीय अनुष्ठान नहाय-खाय के साथ शुरू हो गया। शहर घाटों पर छठ गीत बजने लगी। श्रद्धालुओं ने घरों पर स्नान कर लौकी की सब्जी और अरवा चावल ग्रहण कर छठ व्रत का संकल्प लिया। व्रतियों का 36 घंटे का निराहार-निर्जला व्रत शनिवार को खरना के बाद शुरू होगा। रविवार को सायंकालीन व सोमवार को उदीयमान सूर्य को प्रात:कालीन अर्घ्य देने के बाद व्रती पारण करके चार दिवसीय अनुष्ठान का समापन करेगी। धार्मिक मान्यता है कि छठ महापर्व में नहाय-खाय से पारण तक व्रतियों पर षष्ठी माता की कृपा बरसती है। झारखंड-बिहार में छठ महापर्व पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। अपने शहर हजारीबाग में भी काफी तादाद में श्रद्धालु छठ महापर्व कर रहे हैं। श्रद्धालुओं के घरों में छठी मैया और हर-हर गंगे के जयकारे शुक्रवार की सुबह से ही गूंजने लगे, जिससे उनके घरों का नजारा बदला-बदला दिख रहा था। छठ व्रती व उनके परिजन छठ के पारंपरिक गीत दर्शन देहू न आपार हे छटी मैया...उगऽ हे सूरजदेव अरघ के बेरिया... गाते हुए सुबह से ही पूजा में लगे हुए थे। कई श्रद्धालु घाटों पर प्रसाद के लिए पानी लेकर गये। फिर कई छठ व्रतियों ने हर हर गंगे और हे छठी मैया के जयकारे लगाते हुए गंगा में आस्था की डुबकी लगायी। जिसके पश्चात छठ व्रतियों ने अपने अपने घरों में लौकी की सब्जी, चने की दाल और अरवा चावल बनाकर भगवान भास्कर को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण किये। दूसरी ओर भारी संख्या में व्रतियों ने अपने-अपने घरों में अरवा चावल, चने की दाल व कद्दू की सब्जी बनाकर भोजन किया। व्रतियों व उनके परिजनों ने नहाय-खाय के साथ ही खरना व सायंकालीन, प्रात:कालीन अर्घ्य की भी तैयारी की। घरों की छतों पर खरने के प्रसाद के लिए गेहूं साफ करके सुखाये गये। गेहूं के पूरी तरह से सूखने तक व्रती व अन्य सदस्य वहीं बैठे रहे।

Published / 2022-10-27 22:34:04
श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का दर्शन समय बढ़ा

एबीएन सोशल डेस्क। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर दर्शन समय में वृद्धि करने का निवेदन शासन व प्रशासन ने स्वीकार कर लिया है। परिवर्तन नीचे लिखे अनुसार हुआ है- भविष्य में प्रात:काल 6:30 बजे जागरण आरती में उपस्थित रहने के लिए अधिकतम 30 भक्तों को प्रवेश पत्र दिये जायेंगे। यह प्रवेश पत्र मोहल्ला रामकोट स्थित राम कचहरी मंदिर में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के कैंप कार्यालय से जारी होंगे। पुलिस द्वारा सुरक्षा जांच व अन्य सभी व्यवस्थाएं सदैव के अनुसार ही रहेंगी। अन्य सभी भक्त सदैव के समान प्रात: काल 7 से दर्शन के लिए प्रवेश कर सकेंगे। यह प्रवेश अब 11:30 बजे दोपहर तक रहेगा। भोग आरती में 30 भक्त अधिकतम प्रवेश पत्र लेकर उपस्थित रह सकेंगे। भोग आरती दोपहर 12 बजे होगी। भगवान की विश्राम अवधि दिन में 12:30 बजे से दोपहर पश्चात 2 बजे तक रहेगी। दो बजे से दर्शन के लिए सर्व सामान्य भक्त सदैव के समान प्रवेश कर सकेंगे। यह प्रवेश अब सायंकाल 7 बजे तक होगा। भोग आरती में सायंकाल को अधिकतम 60 व्यक्ति प्रवेश पत्र के साथ उपस्थित रह सकेंगे। भोग आरती रात्रि 7:30 बजे होगी। यह व्यवस्था आगामी 29 अक्टूबर 2022 ज्ञान पंचमी से प्रारंभ होगी। उक्त जानकारी श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र, अयोध्या के महामंत्री चंपत राय ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।

Published / 2022-10-27 15:51:15
बाबा केदारनाथ के कपाट आज से बंद

एबीएन सोशल डेस्क। केदारनाथ में बाबा केदार के कपाट आज सुबह बंद कर दिये गये। केदारनाथ के कपाट आज गुरुवार सुबह 8:30 बजे शीतकाल के लिए बंद कर दिये गये। केदारनाथ की पंचमुखी डोली प्रथम पड़ाव रामपुर के लिए रवाना होगी। यह डोली कल 28 अक्टूबर को विश्वनाथ मंदिर गुप्तकाशी पहुंचेगी, जबकि 29 अक्टूबर को डोली शीतकालीन गद्दीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर उखीमठ पहुंचेगी।

Published / 2022-10-23 20:38:58
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय में धूमधाम से मनी दिवाली

टीम एबीएन, हजारीबाग। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के हजारीबाग के मुख्य सेवा केंद्र पर दीपावली का त्योहार बड़े ही धूमधाम से हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर महालक्ष्मी, श्री नारायण तथा श्री गणेश, मां काली की चैतन्य झांकी सजाई गई। इस झांकी का उद्घाटन दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। इसमें विशेष गणमान्य लोगों ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। मौके पर बैंक ऑफ इंडिया मुख्य ब्रांच के मैनेजर पूनम, बैंक ऑफ इंडिया रामनगर ब्रांच के मैनेजरअभय कुमार गुप्ता, एसबीआई के एरिया ऑफिसर अनिमेष दत्ता, बैंक ऑफ बड़ौदा के कैसियर मंजू, केंद्र संचालिका ब्रह्माकुमारी हर्षा दीदी, देवांगना सेवा केंद्र की संचालिका ब्रह्माकुमारी तृप्ति दीदी ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन किया। ब्रह्माकुमारी हर्षा दीदी ने दीपावली का अर्थ बताते हुए कहा कि दीपावली दीपकों का त्यौहार है। इस त्योहार में 15 दिन पहले से घरों की कोने-कोने की सफाई की जाती है। कोई भी कोना बाकी ना रह जाए। इस दिन नये कपड़े पहनते हैं तथा सभी स्नेह में गले मिलते हैं और एक दूसरे का मुख्य मिठा करते हैं। इन सभी बातों का आध्यात्मिक अर्थ यही है कि बाह्य सफाई के साथ-साथ हमारी आत्मा की सफाई कर अपने कर्मों को श्रेष्ठ बनाने का ज्ञान परमात्मा हमको देते हैं और ज्ञान रत्नों से हमारा श्रृंगार करते हैं तभी पवित्रता का नया शरीर हम को मिलता है। हमारे संस्कारों में जब श्रेष्ठता आ जायेगी, तब हम संस्कार मिलन की रास करेंगे। यह त्योहार सिर्फ बाह्य रूप से न मनाकर हमें इसके आध्यात्मिक अर्थ को जानकर मनाना चाहिए। दीपावली कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष के अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। अर्थात जब इस संसार में अज्ञानता का घोर अंधेरा छा जाता है, तब स्वयं परमात्मा निराकार शिव इस धरा पर अवतरित होकर हम-सब के आत्मा रुपी दीपकों में ज्ञान घृत डाल कर और राजयोग की बाती डालकर आत्मा के बुझे दीप को जगाते हैं। तब हम सब आत्मा जागती जोत बनकर औरों के आत्मा रूपी दीपक को जगाते हैं और अपने में सद्गुण की धारणा करके संस्कारों के महाराश करते हैं। जब एक दूसरे की ज्योति जग जाती है यही चैतन्य दीपमाला का यादगार स्थूल में दीपावली मनाते हैं। इस तरह के अनेक गूढ़ रहस्यों से दीदी ने अवगत कराया। इसके पश्चात दीपावली की हार्दिक बधाइयां दी गई तथा छोटे छोटे नन्हे-मुन्ने बाल कलाकारों ने नृत्य और कविता के माध्यम से सभी को दीपावली रोशनी के इस त्यौहार की शुभकामनाएं दी। तत्पश्चात सभी को प्रसाद वितरण भी किया गया। इस कार्यक्रम में लगभग डेढ़ सौ लोगों ने उपस्थित हो इस कार्यक्रम का लाभ लिया। इसके साथ ही गुरुवार दिनांक 27 -10 -2022 को सेवा केंद्र पर भैया दूज और चित्रगुप्त पूजा का कार्यक्रम भी रखा गया है।

Published / 2022-10-22 18:15:31
जानें छठ पूजा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व...

टीम एबीएन, टाटीझरिया (संदीप शास्त्री)। शास्त्रों एवं पुराणों के विशेषज्ञ मतानुसार शास्त्री संदीप पांडेय ने कहा कि छठ पूजा धार्मिक सांस्कृतिक और आस्था का लोकपर्व है। यही एक मात्र ऐसा त्योहार है जिसमे सूर्य देव का पूजन कर उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। हिंदू धर्म मे सूर्य की उपासना का विशेष महत्व है। वे ही एक ऐसे देवता है। जिन्हें प्रत्यक्ष रूप से देखा जाता है। वेदों में सूर्य देव को जगत की आत्मा कहा जाता है। सूर्य के प्रकाश में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता पायी जाती है। सूर्य के शुभ प्रभाव से व्यक्ति को आरोग्य, तेज और आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है। यह चार दिवसीय उत्सव है। जिसकी शुरुआत कार्तिक महीना शुक्लपक्ष चतुर्थी से नहाय खाय के साथ आरंभ होता है और कार्तिक शुक्ल पक्ष के सप्तमी तिथि को समापन होता है। व्रत आरंभ विधि : प्रथम दिवस- चतुर्थी तिथि को नहाय खाय से मतलब है कि इस दिन स्नान के बाद पूजा घर की साफ-सफाई की जाती है और मन की तामसिक प्रवृति से बचने के लिए शाकाहारी भोजन किया जाता है। द्वितीय दिवस- पंचमी तिथि को खरना। खरना का अर्थ छठ पूजा का दूसरा दिन है। खरना का मतलब पूरे दिन के उपवास से है। इस दिन व्रत रखने वाली व्यक्ति या स्त्रियां जल की एक बूंद तक ग्रहण नहीं करते हैं। संध्या के समय गुड़ की खीर, दूध चावल का हविस तथा फलों का ईश्वर को भोग लगा खाती है। तृतीय दिवस- छठ पर्व के तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान सूर्य को अर्घ्य। इस वर्ष 30 अक्टूबर 2022 को हृषिकेश पञ्चाङ्ग के अनुसार शुभ मुहूर्त संध्या-5:34 को देने का उल्लेख है। शाम को बांस की बनी टोकरी, फलों, ठेकुआ, चावल के लड्डू आदि से अर्घ्य का सूप सजाया जाता है, जिसके बाद व्रती अपने परिवार के साथ सूर्य को अर्घ्य देते हैं। अर्घ्य के समय सूर्य को जल और दूध चढ़ाया जाता है।और प्रसाद भरे सुप से छठी मैया की पूजा की जाती है। सूर्य देव की उपासना के बाद छठी मइया की गीत गायी जाती हैं। चतुर्थ दिवस- सप्तमी तिथि को हृषिकेश पञ्चाङ्ग मतानुसार 31 अक्टूबर 2022 दिन सोमवार को प्रात:- 6:27 मिनट को अर्घ्य अर्पण सूर्य देव को किये जाने का पञ्चाङ्ग मत है। उसके बाद छठी मइया की पूजा की जाती है। बाकी देशाचार के अनुसार भास्कर को अर्घ्य अर्पण किया जा सकता है। इसमें कोई प्रतिबंध नहीं है। छठ पूजा विधि : छठ पूजा आरंभ करने से पहले निम्न सामग्रियों को इक्कठा कर लें और फिर सूर्य देव को विधि विधान से अर्घ्य देकर पूजन करें- बांस की 3 बड़ी टोकरी, बांस या पीतल के बने 3 सूप, कांसा का थाली, तांबा का लोटा, दूध और ग्लास। चावल, लाल सिंदूर, दीपक, नारियल, हल्दी, अदरख, गन्ना, पान पत्ता, कपूर, जाफर, काफर, सुपाड़ी, सुथनी शकरकंद, नाशपती, बड़ा नींबू (डेंभा), मधु (शहद) चंदन, धूप, धूपबती, प्रसाद के रूप में ठेकुआ, पंचमेवा, काजू, किशमिस, बादाम, मूंगफली, पिस्ता, मखान, नारियल जलवाला, नवीन वस्त्र समेत अन्य पूजन सामग्री को इकट्ठा कर लें। छठ पूजा से जुड़ी पौराणिक कथा : छठ व्रत का उल्लेख ब्रह्मवैवर्त पुराण से लिया गया। प्राचीन काल मे कथा के अनुसार प्रथम मानव स्वयंभु मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत को कोई संतान नहीं थी। राजा बहुत दु:खी रहते थे। महाश्री कश्यप ने राजा से पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करने को कहा। महाश्री की आज्ञानुसार राजा ने पुत्र प्राप्ति के यज्ञ कराया। इसके फलस्वरूप कुछ महीने के बाद राजा की धर्मपत्नी महारानी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया। लेकिन दुर्भाग्य से वह शिशु मृत पैदा हुआ। इस बात से राजा और अन्य परिजन कुटुंब जन बेहद दु:खी थे। तभी आकाश से एक विमान उतरा जिसमें माता जगत जननी दुर्गा के षष्ठम अवतार माता कात्यायनी विराजमान थी। तब राजा ने उनसे विनय और नम्रतापूर्वक प्रणाम किया। जब राजा ने माता से प्रणाम कर प्रार्थना की, तो माता ने उन्हें परिचय दिया। राजा के कष्टों वेदनाओं को सुना और राजा से कहा कि मैं ब्रह्म की मानस पुत्री देवी षष्ठी देवी कात्यायनी हूं। मैं विश्व मे बालको की रक्षा करती हूं और नि:संतानों को सन्तान प्राप्ति की वरदान देती हूं। इसके बाद देवी ने मृत शिशु को आशीष देते हुए हाथ लगाया, जिससे वह जीवित हो गया। देवी की इस कृपा से राजा बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने षष्ठी देवी से व्रत को जानकर उनकी विधिवत पूजा, अर्चना, आराधना, हवन आरती की। मान्यता है कि इसके बाद से संपूर्ण भारतवर्ष धीरे-धीरे इस महाव्रत छठ पूजा चारों ओर प्रचार-प्रसार हो गया। इसी दिन तिथि महीने से यह व्रत का आरंभ हुआ। उदाहरणस्वरूप इसी प्रकार से रामायण और महाभारत जैसे अनन्य ग्रंथों में भी देखा जा सकता है।

Published / 2022-10-22 17:17:56
जानें छठ पूजा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व...

टीम एबीएन, टाटीझरिया (संदीप शास्त्री)। शास्त्रों एवं पुराणों के विशेषज्ञ मतानुसार शास्त्री संदीप पांडेय ने कहा कि छठ पूजा धार्मिक सांस्कृतिक और आस्था का लोकपर्व है। यही एक मात्र ऐसा त्योहार है जिसमे सूर्य देव का पूजन कर उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। हिंदू धर्म मे सूर्य की उपासना का विशेष महत्व है। वे ही एक ऐसे देवता है। जिन्हें प्रत्यक्ष रूप से देखा जाता है। वेदों में सूर्य देव को जगत की आत्मा कहा जाता है। सूर्य के प्रकाश में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता पायी जाती है। सूर्य के शुभ प्रभाव से व्यक्ति को आरोग्य, तेज और आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है। यह चार दिवसीय उत्सव है। जिसकी शुरुआत कार्तिक महीना शुक्लपक्ष चतुर्थी से नहाय खाय के साथ आरंभ होता है और कार्तिक शुक्ल पक्ष के सप्तमी तिथि को समापन होता है। व्रत आरंभ विधि : प्रथम दिवस- चतुर्थी तिथि को नहाय खाय से मतलब है कि इस दिन स्नान के बाद पूजा घर की साफ-सफाई की जाती है और मन की तामसिक प्रवृति से बचने के लिए शाकाहारी भोजन किया जाता है। द्वितीय दिवस- पंचमी तिथि को खरना। खरना का अर्थ छठ पूजा का दूसरा दिन है। खरना का मतलब पूरे दिन के उपवास से है। इस दिन व्रत रखने वाली व्यक्ति या स्त्रियां जल की एक बूंद तक ग्रहण नहीं करते हैं। संध्या के समय गुड़ की खीर, दूध चावल का हविस तथा फलों का ईश्वर को भोग लगा खाती है। तृतीय दिवस- छठ पर्व के तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान सूर्य को अर्घ्य। इस वर्ष 30 अक्टूबर 2022 को हृषिकेश पञ्चाङ्ग के अनुसार शुभ मुहूर्त संध्या-5:34 को देने का उल्लेख है। शाम को बांस की बनी टोकरी, फलों, ठेकुआ, चावल के लड्डू आदि से अर्घ्य का सूप सजाया जाता है, जिसके बाद व्रती अपने परिवार के साथ सूर्य को अर्घ्य देते हैं। अर्घ्य के समय सूर्य को जल और दूध चढ़ाया जाता है।और प्रसाद भरे सुप से छठी मैया की पूजा की जाती है। सूर्य देव की उपासना के बाद छठी मइया की गीत गायी जाती हैं। चतुर्थ दिवस- सप्तमी तिथि को हृषिकेश पञ्चाङ्ग मतानुसार 31 अक्टूबर 2022 दिन सोमवार को प्रात:- 6:27 मिनट को अर्घ्य अर्पण सूर्य देव को किये जाने का पञ्चाङ्ग मत है। उसके बाद छठी मइया की पूजा की जाती है। बाकी देशाचार के अनुसार भास्कर को अर्घ्य अर्पण किया जा सकता है। इसमें कोई प्रतिबंध नहीं है। छठ पूजा विधि : छठ पूजा आरंभ करने से पहले निम्न सामग्रियों को इक्कठा कर लें और फिर सूर्य देव को विधि विधान से अर्घ्य देकर पूजन करें- बांस की 3 बड़ी टोकरी, बांस या पीतल के बने 3 सूप, कांसा का थाली, तांबा का लोटा, दूध और ग्लास। चावल, लाल सिंदूर, दीपक, नारियल, हल्दी, अदरख, गन्ना, पान पत्ता, कपूर, जाफर, काफर, सुपाड़ी, सुथनी शकरकंद, नाशपती, बड़ा नींबू (डेंभा), मधु (शहद) चंदन, धूप, धूपबती, प्रसाद के रूप में ठेकुआ, पंचमेवा, काजू, किशमिस, बादाम, मूंगफली, पिस्ता, मखान, नारियल जलवाला, नवीन वस्त्र समेत अन्य पूजन सामग्री को इकट्ठा कर लें। छठ पूजा से जुड़ी पौराणिक कथा : छठ व्रत का उल्लेख ब्रह्मवैवर्त पुराण से लिया गया। प्राचीन काल मे कथा के अनुसार प्रथम मानव स्वयंभु मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत को कोई संतान नहीं थी। राजा बहुत दु:खी रहते थे। महाश्री कश्यप ने राजा से पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करने को कहा। महाश्री की आज्ञानुसार राजा ने पुत्र प्राप्ति के यज्ञ कराया। इसके फलस्वरूप कुछ महीने के बाद राजा की धर्मपत्नी महारानी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया। लेकिन दुर्भाग्य से वह शिशु मृत पैदा हुआ। इस बात से राजा और अन्य परिजन कुटुंब जन बेहद दु:खी थे। तभी आकाश से एक विमान उतरा जिसमें माता जगत जननी दुर्गा के षष्ठम अवतार माता कात्यायनी विराजमान थी। तब राजा ने उनसे विनय और नम्रतापूर्वक प्रणाम किया। जब राजा ने माता से प्रणाम कर प्रार्थना की, तो माता ने उन्हें परिचय दिया। राजा के कष्टों वेदनाओं को सुना और राजा से कहा कि मैं ब्रह्म की मानस पुत्री देवी षष्ठी देवी कात्यायनी हूं। मैं विश्व मे बालको की रक्षा करती हूं और नि:संतानों को सन्तान प्राप्ति की वरदान देती हूं। इसके बाद देवी ने मृत शिशु को आशीष देते हुए हाथ लगाया, जिससे वह जीवित हो गया। देवी की इस कृपा से राजा बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने षष्ठी देवी से व्रत को जानकर उनकी विधिवत पूजा, अर्चना, आराधना, हवन आरती की। मान्यता है कि इसके बाद से संपूर्ण भारतवर्ष धीरे-धीरे इस महाव्रत छठ पूजा चारों ओर प्रचार-प्रसार हो गया। इसी दिन तिथि महीने से यह व्रत का आरंभ हुआ। उदाहरणस्वरूप इसी प्रकार से रामायण और महाभारत जैसे अनन्य ग्रंथों में भी देखा जा सकता है।

Published / 2022-10-22 17:17:13
दीपावली पर सीएम आदर्श उच्च विद्यालय इचाक में रंगोली प्रतियोगिता

टीम एबीएन, इचाक हजारीबाग। दीपों का त्योहार दीपावली के अवसर पर सीएम आदर्श उच्च विद्यालय इचाक में रंगोली प्रतियोगिता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें कक्षा चार से दशम वर्ग के छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। जिसमें कक्षा दशम के छात्राओं ने प्रथम स्थान प्राप्त किये। अष्टम वर्ग के छात्रों ने द्वितीय स्थान प्राप्त किये। तृतीय स्थानों में क्लास सप्तम नवम अ, नवम ब, चतुर्थ स्थान में दशम ब और छठा वर्ग के छात्र प्राप्त किये। जिसमें रानी कुमारी, प्रिया कुमारी, लक्ष्मी कुमारी, करण कुमार, प्रेम कुमार, पायल कुमारी, कुमकुम कुमारी, निशा कुमारी, स्वीटी कुमारी, दिव्या कुमारी, मुस्कान कुमारी इत्यादि छात्र-छात्राओं का विशेष योगदान रहा। विद्यालय के प्राचार्य जीवन कुमार ने बच्चों को संबोधित करते हुए कहे कि सभी विद्यार्थी घर शांति पूर्वक दीपावली का पर्व मनायें। पटाखे का प्रयोग ना करें। इससे पर्यावरण प्रदूषण फैलता है। प्रो मनोज कुमार ने कहा कि घर में मिट्टी के दीये जलायें और बड़ों का सम्मान करें। विद्यालय के सचिव मनीष कुमार ने कहा कि ज्यादा ध्वनि वाले पटाखे का इस्तेमाल नहीं करें। कार्यक्रम को सफल बनाने में शिक्षक ओंकार मेहता, प्रो मुन्ना पांडे, कुमारी अंजली, राजेश प्रसाद, युगेश कुमार, बैजनाथ प्रसाद मेहता, सुलेखा कुमारी, धर्मेंद्र कुमार दास, संगीता कुमारी, सतेंद्र राणा, सुरेंद्र शर्मा, वासुदेव पांडेय, खुर्शीद आलम, शेखर कुमार आदि का विशेष योगदान रहा।

Published / 2022-10-22 13:58:44
मंडा-पुआ और करंज का तेल...यदि ये तीनों एक साथ दिखने का मतलब आदिवासियों की दिवाली

एबीएन सोशल डेस्क। फूस, पुआल के साथ मिट्टी लेपकर दीवारों को फिर से चिकना कर लिया गया है। बारिश के कारण जहां-जहां दीवारों में दरारें आ गई थीं तो उन्हें भर लिया गया है। रामराज मिट्टी और गेरू से दीवारें रंगी जाने लगी हैं और कहीं-कहीं चूना भी डाल दिया गया है। पनारे, आंगन, गोठ की जगह और पशुओं के बाड़े भी साफ करने में लोग जुटे हुए हैं। घूरे का स्थान दूर कर लिया गया है। कातिक की आमौसा से पहले ये सारी तैयारी कर लेनी है, इसलिए दशमी के अगले दिन से हर कोई इस काम में जुट गया है। नारियल और बांस की झाड़ू लाई गई है। इन सबसे जिन घर-दुआरों की सफाई हो रही है, वो जमीन झारखंड की है और ये कच्चे-पक्के घर यहां के स्थानीय आदिवासी परिवारों के हैं। वो तैयारी में जुटे हैं कि कातिक की आमौसा को लक्ष्मी मइया आयेंगी। लक्ष्मी मइया उनके लिए वन और प्रकृति की देवी भी हैं। उनकी वजह से ही घर में धान आया है। देवी के स्वागत की पूरी तैयारी है। त्योहार मनाने की जिस खांटी विधा का ऊपर जिक्र किया गया है, ये झारखंड के आदिवासियों की दीपावली की तैयारी है। बाजारवाद और अर्थवाद की बड़ी-बड़ी आंकड़ेबाजी से कोसों दूर, चाइनीज लड़ियों के कारण कुम्हारों की बदहाली की चिंता से अलग और पटाखों-प्रदूषण की बहस-बाजियों से हटके झारखंड के आदिवासी दीपावली को प्रकृति के पर्व के तौर पर मनाते हैं। उनकी ये दिवाली 3 दिनों की होती है और इन तीन दिनों के लिए आदिवासी समुदाय हफ्तों पहले से तैयारी में जुट जाता है। बारिश के बाद से घर-बार ठीक किए जाते हैं। घरों के आगे लिपाई-बुहार होता है और फिर सब साफ-सुथरा करके दीपावली मनाने के लिए आदिवासी जुट जाते हैं। दिवाली के पहले का एक दिन, जिसे हम लोग धनतेरस कहते हैं, उस दिन आदिवासी घर को सजाना-संवारना शुरू करते हैं। ये सजावट चावल के आटे, हल्दी और गेरू से होती है। दूसरे दिन पशुओं को नहला कर साफ किया जाता है। शहरी लोग इस दिन नरक चतुर्दशी मनाते हैं। तीसरे दिन दीपावली होती है। इस दिन आदिवासियों में करंज के तेल से दीए जलाने की परंपरा है। करंज के तेल के दीये इसलिए जलाए जाते हैं ताकि बरसात के बाद उत्पन्न होने वाले तमाम कीड़े इसके धुएं और लौ से नष्ट हो जायें। पर्यावरण पूरी तरह से शुद्ध हो जाये। करंज का तेल आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर होता है। इससे कई तरह की दवाएं भी बनती हैं। यह सेहत के लिए काफी फायदेमंद होता है। वह प्रदूषण फैलाने वाली किसी वस्तु का उपयोग नहीं करते हैं।

Page 176 of 219

Newsletter

Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.

We do not share your information.

Tranding

abnnews24

सच तो सामने आकर रहेगा

टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।

© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse