एबीएन नॉलेज डेस्क। हमारे सौरमंडल में पृथ्वी बहुत अनोखा ग्रह है। इसकी बहुत सारी विशेषताएं हैं जो सौरमंडल के किसी दूसरे ग्रह में नहीं होती हैं। हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिक भी दूसरे ग्रहों का अध्ययन कर यह पता लगाने का प्रयास करते रहते हैं कि कहीं किसी ग्रह या उपग्रह में पृथ्वी जैसी विशेषताएं तो नहीं हैं। अब अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम ने यह सिद्ध किया है कि हमारे सौरमंडल का सबसे छोटा ग्रह, बुध में भी भूचुंबकीय तूफान आते हैं जैसे कि पृथ्वी पर आते हैं। इससे पहले यह माना जाता था कि भूचुंबकीय तूफान केवल पृथ्वी पर ही आ सकते हैं, लेकिन इस खोज ने यह धारणा बदल दी है। क्या दूसरे ग्रहों में आ सकता है ऐसा तूफान : इस शोध में अमेरिक, कनाडा और चीन के वैज्ञानिक शामिल थे जिसमें अलास्का फेयरबैंक्स जियोफिजिकल इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी के अंतरिक्ष भौतिकी की प्रोफेसर हुई जांग की प्रमुख भूमिका थी। शोधकर्ताओं ने सबसे पहले इस प्रश्न का समाधान निकाला कि क्या दूसरे ग्रहों में भूचुंबकीय तूफान हो सकता है या नहीं। प्रमुख प्रश्नों के उत्तर : शोधकर्ताओं का प्रयास यह जानने का था कि क्या किसी ग्रह के आकार की इस तरह के तूफानों के होने की निर्भरता होती है या नहीं या क्या दूसरे ग्रहों में भी पृथ्वी की तरह आयनमंडल होता है। शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन के नतीजे दो शोधपत्रों में पिछले महीने ही प्रकाशित किए हैं जिसमें जांग दोनों ही पत्रों में सहलेखक हैं। वलय प्रवाह : पहले शोधपत्र में यह सिद्ध किया गया है कि बुध ग्रह के पास डोनट के आकार का एक वलय प्रवाह का क्षेत्र है जिसमें आवेशित कण ध्रुवों को छोड़कर ग्रह के चारों ओर घूम रहे हैं। वहीं दूसरे शोधपत्र में शोधकर्ताओं ने यह सिद्धकिया है कि इस वलय प्रवाह के कारण ही बुध में भूचुंबकीय तूफान आते हैं। सौर पवनों का व्यवधान : भूचुंबकीय तूफान किसी ग्रह के मेग्नेटोस्फियर में वह व्यवधान होते हैं जो सौर पवनों की ऊर्जा के हस्तांतरण के कारण पैदा होते हैं। ऐसे ही भूचुंबकीय तूफान के कारण पृथ्वी के ध्रुवों पर ऑरोर बनते हैं और उनकी वजह से रेडियो संचार को नष्ट कर सकते हैं। यह पड़ताल चाइना टेक्नोलॉजिकल साइंसेस नाम के जर्नल में प्रकाशित हुई हैं। वलय प्रवाह के आधार पर : इसअध्ययन के लेखक पेकिंग यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑप स्पेस फिजिक्स एंड एप्लाइड टेक्नोलॉजी के क्वीगांग जोंग हैं। वह शोधपत्र एक ही दिन पहले प्रकाशित शोधपत्र के आधार पर है जिसने आंकड़ों के आधार पर यह पुष्टि की कि बुध ग्रह के पास एक वलय प्रवाह है। पृथ्वी के पास भी एक वलय प्रवाह है। पृथ्वी के जैसे ही तूफान : वलय प्रवाह वालाशोध पत्र नेच कम्यूनिकेशन्स में प्रकाशित हुआ है जिसके लेखक जिउटोंग झाओ हैं जो पेकिंग यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑप स्पेस फिजिक्स एंड एप्लाइड टेक्नोलॉजी के ही हैं। इन शोधों में भाग लेने वाले कुल 14 वैज्ञानिकों में से सात दोनों में शामिल थे। शोधकर्ताओं ने बताया कि बुध पर इन तूफानों की प्रक्रियाएं पृथ्वी की तूफानों के जैसी ही थीं। फर्क इतना है कि बुध का मैग्नेटिक फील्ड बहुत कमजोर है और वहां कोई वायुमंडल नहीं है। इन तूफानों की पुष्टि मैसेंजर प्रोब के आंकड़े और सूर्य से निकलने वाली कोरोना द्रव्य उत्क्षेपण के अध्ययन से हो सकी थी। अप्रैल 2014 में सूर्य से निकलने वाली इस आवेशित प्लाज्मा ने इस वलय को दबा दिया था और उसकी ऊर्जा बहुत बढ़ा दी थी। इसी वजह से भूचंबकीय तूफान आया था।
एबीएन नॉलेज डेस्क। स्पेसएक्स ने फ्लोरिडा के केप कैनावेरल स्पेस फोर्स स्टेशन से 40 अंतरिक्ष यान को अंतरिक्ष में ले जाने के लिए फाल्कन-9 रॉकेट को सफलतापूर्वक लॉन्च किया। स्पेसएक्स ने कहा कि लॉन्च कंपनी के चौथे स्मॉलसैट राइडशेयर मिशन का प्रतिनिधित्व करता है। जानकारी के अनुसार, फाल्कन-9 रॉकेट को अंतरिक्ष में 40 अंतरिक्ष यान ले जाया जाता है, जिसमें क्यूब उपग्रह, सूक्ष्म उपग्रह, पिकोसैट, गैर-तैनाती होस्टेड पेलोड और अंतरिक्ष यान ले जाने वाला एक कक्षीय स्थानांतरण वाहन शामिल है, जिसे बाद में तैनात किया जाना है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। यूरोप और एशिया को जोड़ने वाला दुनिया का सबसे लम्बा हैंगिंग आम जनता के लिए खोल दिया गया है। तुर्की में बना यह ब्रिज कई मायनों में खास है। 20,503 करोड़ रुपये की लागत से बने इस ब्रिज को तैयार होने में 5 साल का वक्त लगा है। इसे तुर्की और दक्षिण कोरिया की कंपनी ने मिलकर तैयार किया है। जानिए, इस ब्रिज की खासियतें और इससे आम लोगों को कितनी राहत मिलेगी। इस ब्रिज का नाम है 1915 कैनेकेल ब्रिज। इसके नाम में 1915 जोड़ने की भी एक खास वजह है। दरअसल, प्रथम विश्व युद्ध के समय ब्रिटिश सेना के डडार्नेलेस खाड़ी पर कब्जा करना चाहती है, लेकिन ओटोमन साम्राज्य ने ब्रिटिश सेना के इस मंजूबे पर पानी फेर दिया था। इसलिए इसे यह नाम दिया गया। 6 लेन वाली सड़क के इस ब्रिज की लम्बाई 4.60 किलोमीटर है। वहीं, इसकी चौड़ाई 45.06 मीटर है। इस ब्रिज को तैयार होने में पूरा 5 साल लगा है। ब्रिज के निर्माण की शुरूआत 26 फरवरी, 2017 को हुई थी और 26 जनवरी, 2022 को यह बनकर तैयार हुआ। अब इसे आम लोगों के लिए खोला जा चुका है। कैनेकेल ब्रिज तुर्की का दूसरा सबसे ऊंचा ब्रिज है। इससे पहले से बने यहां के सबसे ऊंचे ब्रिज का नाम है यावुज सुल्तान सलीम ब्रिज। इतना ही नहीं, कैनेकेल ब्रिज यूरोप और एशिया को जोड़ता है। यह ब्रिज अब तुर्की की राजधानी इस्तांबुल के बाहर यूरोप और एशिया को मात्र 6 मिनट की यात्रा से जोड़ देता है। इस ब्रिज पर बने दोनों टावरों की ऊंचाई 1,043 फीट है। ब्रिज बनने से पहले फेरी से खाड़ी को पार करने में डेढ़ घंटा लगता था, लेकिन अब ब्रिज बनने के बाद इसे पार करने में मात्र 6 मिनट का समय लगता है।
एबीएन डेस्क। फिल्म जगत के लोगों के लिए एकेडमी अवॉर्ड यानी ऑस्कर सबसे अहम पुरस्कारों में से एक है। आज 94वें ऑस्कर अवॉर्ड्स की घोषणा की जा रही है, जिसपर सभी सिनेमा प्रेमियों की निगाहें टिकी हैं। अगर भारत की बात करें तो एंटरटेनमेंट वर्ल्ड के सबसे बड़े अवॉर्ड के लिए भारत की तरफ से तमिल फिल्म कूजांगल को नॉमिनेट किया गया है। आप ऑस्कर अवॉर्ड्स के विजेताओं की लिस्ट तो देख ही रहे होंगे, लेकिन ऑस्कर अवॉर्ड्स से जुड़ी ऐसी बातें हैं, जो आपको जानना जरूरी है और काफी दिलचस्प भी हैं। ऐसे में आज हम आपको ऑस्कर की ट्रॉफी के बारे में बता रहे हैं, जिसे पाने का हर फिल्ममेकर या कलाकार का सपना होता है। तो जानते हैं कि आखिर ऑस्कर अवॉर्ड्स की जो ट्रॉफी मिलती है, उसमें किसकी मूर्ति होती है और इस खास ट्रॉफी की क्या कहानी है… मूर्ति के पीछे कौन है? बता दें कि पहला ऑस्कर अवॉर्ड इवेंट 16 मई 1929 को आयोजित किया गया था। सन 1927 में एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स एंड साइंसेज की मीटिंग में पहली बार ट्रॉफी के डिजाइन पर चर्चा की गई। इस दौरान लॉस एंजिल्स के कई कलाकारों से अपने-अपने डिजाइन सामने रखने को कहा गया। इस दौरान मूर्तिकार जॉर्ज स्टैनली की बनाई हुई मूर्ति को पसंद किया गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, ऑस्कर अवॉर्ड में जो ट्रॉफी दी जाती है कहते हैं कि उसकी प्रेरणा मैक्सिकन फिल्ममेकर और एक्टर एमिलियो फर्नांडीज थे। ऐसे में माना जाता है कि इस मूर्ति के पीछे फर्नांडीज है और ये उनकी ही तस्वीर है। क्या है मूर्ति बनने की कहानी : बता दें कि साल 1904 को मैक्सिको के कोआहुइलिया में जन्में एमिलियो मैक्सिको की क्रांति के दौर में बड़े हुए। हाई स्कूल ड्रॉप आउट फर्नांडीज, ह्यूरितिस्ता विद्रोहियों के ऑफिसर बन गए। उन्हें सजा भी सुनाई गई, लेकिन वो वहां से भाग गए। इसके बाद फर्नांडीज, हॉलीवुड में एक्स्ट्रा वर्क करने लगे। यहां पर उन्हें साइलेंट फिल्म स्टार डोलोरेस डेल रियो ने एल इंडियो नाम दिया था। वह एक्ट्रेस रियो के अच्छे दोस्त बन गए थे। रियो मेट्रो गोल्डविन मेयर स्टूडियो के आर्ट डायरेक्टर और एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स एंड साइंसेज के सदस्य कैड्रिक गिबॉन्स की पत्नी थीं। डेल रियो ने फर्नांडीज को गिबॉन्स से मिलवाया जो उस समय स्टैच्यू की डिजाइन पर काम कर रहे थे। गिबॉन्स ने फर्नांडीज से एक स्केच के लिए पोज देने के लिए कहा जो 8.5 पौंड के वजन वाली ट्रॉफी का आधार था। फर्नांडीज ने बेमन ने पोज दिया और वो आइकॉनिक पोज हो गया। जॉर्ज स्टैनली इसे तैयार किया और लॉस एंजिल्स में सन् 1929 में हुए पहले ऑस्कर समारोह में यही ट्रॉफी सौंपी गई। इसलिए इस ऑस्कर की ट्रॉफी के पीछे फर्नांडीस को माना जाता है। क्या एक डॉलर है इसकी कीमत? ऑस्कर के नियम के अनुसार ऑस्कर विजेता उसकी ट्रॉफी का पूरा मालिकाना हक नहीं होता है। विजेता ट्रॉफी को चाहकर भी कहीं और नहीं बेच सकता। अगर कोई विजेता इस ट्रॉफी को बेचना चाहता है तो तो सबसे पहले यह इस ट्रॉफी को देने वाली अकेडमी को ही बेचना होगा। वहीं एकेडमी इस ट्रॉफी को सिर्फ 1 डॉलर में ही खरीदेगी। इसलिए इस ट्रॉफी की कीमत एक डॉलर मानी जाती है। हालांकि, इसके बनाए जाने की खर्चे की बात करें तो इसमें काफी खर्चा होता है। ऑस्कर में भारत का प्रदर्शन : 94 सालों से चले आ रहे इस अवॉर्ड में अब तक भारत की चार फिल्मों को जगह मिल चुकी है- मदर इंडिया, सलाम बॉम्बे, श्वास (मराठी) और लगान। पहला ऑस्कर अवॉर्ड 1929 में आयोजित किया गया था, वहीं साल 1957 से भारत की फिल्में ऑस्कर के लिए भेजी जा रही हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। कर्नाटक के कैगा में 2023 में 700 मेगावाट के परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए नींव डालने के साथ भारत अगले तीन वर्षों में फ्लीट मोड में एक साथ 10 परमाणु रिएक्टरों के निर्माण कार्यों को गति देने के लिए तैयार है। नींव के लिए कंक्रीट डालने (एफपीसी) के साथ परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों का निर्माण अब पूर्व-परियोजना चरण से आगे बढ़कर निर्माण को गति देने का संकेत है, जिसमें परियोजना स्थल पर उत्खनन गतिविधियां शामिल हैं। परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) के अधिकारियों ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर संसदीय समिति को बताया, कैगा इकाइयों 5 और 6 का एफपीसी 2023 में अपेक्षित है, गोरखपुर हरियाणा अणु विद्युत परियोजन इकाइयों 3 और 4 और माही बांसवाड़ा राजस्थान परमाणु ऊर्जा परियोजना इकाई 1 से 4 का एफपीसी 2024 में अपेक्षित है और 2025 में चुटका मध्य प्रदेश परमाणु ऊर्जा परियोजना इकाइयों 1 और 2 का एफपीसी होने की संभावना है। केंद्र ने जून 2017 में 700 मेगावाट के 10 स्वदेशी विकसित दबावयुक्त भारी जल संयंत्र (पीएचडब्ल्यूआर) के निर्माण को मंजूरी दी थी। ये 10 पीएचडब्ल्यूआर 1.05 लाख करोड़ रुपये की लागत से बनाए जाएंगे। यह पहली बार है जब सरकार ने लागत कम करने और निर्माण के समय में तेजी लाने के उद्देश्य से एक बार में 10 परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों के निर्माण को मंजूरी दी थी। डीएई अधिकारी कहा कि फ्लीट मोड परियोजनाओं के लिए थोक स्तर पर खरीद की जा रही थी जिसमें स्टीम जेनरेटर, एसएस 304 एल जाली ट्यूब और एंड शील्ड के लिए प्लेट, प्रेशराइजर फोर्जिंग, ब्लीड कंडेनसर फोर्जिंग, 40 स्टीम जनरेटर के लिए इंकोलॉय-800 ट्यूब, रिएक्टर हेडर के निर्माण के लिए ऑर्डर दिए गए थे। उन्होंने कहा कि गोरखपुर इकाई 3 और 4 तथा कैगा इकाई 5 और 6 के टरबाइन आइलैंड के लिए इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण पैकेज प्रदान किए गए हैं। फ्लीट मोड के तहत पांच साल की अवधि में एक परमाणु ऊर्जा संयंत्र के निर्माण की उम्मीद है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत ने आज ओडिशा के बालासोर तट पर मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल वायु रक्षा प्रणाली (का सफल परीक्षण किया है। यह परीक्षण बालासोर तट पर किया गया है। इसकी जानकारी DRDO के एक अधिकारी ने दी है। उन्होंने बताया कि यह एयर डिफेंस सिस्टम भारतीय सेना का हिस्सा है। अधिकारी ने कहा कि इस परीक्षण में मिसाइल ने काफी दूर से ही अपने टारगेट पर सीधा हमला कर दिया। इससे पहले, भारत ने 23 मार्च को सतह से सतह पर मार करने वाली ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का सफल परीक्षण किया था। यह परीक्षण अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में किया गया था। रक्षा अधिकारी ने इस बात की जानकारी दी थी। उन्होंने बताया था कि इस मिसाइल ने सीधे अपने टारगेट को अचीव किया। एयर चीफ मार्शल वीआर चौधरी ने इस सतह से सतह पर मार करने वाली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के सफल परीक्षण पर बधाई भी दी थी। डिफेंस सेक्टर पर लगातार जोर दे रहा भारत : गौरतलब है कि भारत लगातार अपने डिफेंस बजट को बढ़ा रहा है। देश का फोकस डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भर बनने का है। इसलिए केंद्र सरकार भारत के डिफेंस इंपोर्ट (आयात) को घटाने और एक्सपोर्ट (निर्यात) को बढ़ाने के लिए लगातार काम कर रही है। पिछले आठ सालों में भारत के हथियार निर्यात में 6 गुना उछाल आया है। चालू वित्त वर्ष में भारत ने अब तक 11607 करोड़ रुपए के हथियार का निर्यात किया है। रक्षा राज्य मंत्री अजय भट्ट ने लोकसभा में इसकी जानकारी दी थी। उन्होंने बताया था कि वित्त वर्ष 2014-15 में भारत ने 1941 करोड़ के हथियार का निर्यात किया था जो वित्त वर्ष 2021-22 में अब 11,607 करोड़ रुपए पर पहुंच गया है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। शोधकर्ताओं के सामने इंसानी खून को लेकर चौंकाने वाला मामला सामने आया है। शोधकर्ताओं को पहली बार इंसानी खून में प्लास्टिक के टुकड़े मिले हैं जो अति सूक्ष्म यानि माइक्रोप्लास्टिक हैं। इस शोध के लिए नीदरलैंड के वैज्ञानिकों ने 22 गुमनाम स्वस्थ वयस्क डोनर्स से रक्त के नमूने लिए और पाया कि इनमें से 17 (77.2%) के रक्त में माइक्रोप्लास्टिक था। इस खोज को "बेहद चिंताजनक" बताया जा रहा है। इससे पहले माइक्रोप्लास्टिक्स मस्तिष्क, आंत, अजन्मे बच्चों के प्लेसेंटा और वयस्कों और शिशुओं के मल में पाए गए हैं, लेकिन रक्त के नमूनों से पहले कभी नहीं पाया गया। अध्ययन में पांच प्रकार के प्लास्टिक का हुआ परीक्षण नीदरलैंड में व्रीजे यूनिवर्सिटिट एम्स्टर्डम में अध्ययन लेखक प्रोफेसर डिक वेथाक ने बताया कि हमें अनुसंधान का विस्तार करना होगा और नमूना आकार, मूल्यांकन किए गए पॉलिमर की संख्या आदि में वृद्धि करनी होगी। जर्नल एनवायरनमेंट इंटरनेशनल में प्रकाशित इस अध्ययन में पांच प्रकार के प्लास्टिक - पॉलीमेथाइल मेथैक्रिलेट (पीएमएमए), पॉलीप्रोपाइलीन (पीपी), पॉलीस्टाइनिन (पीएस), पॉलीइथाइलीन (पीई), और पॉलीइथाइलीन टेरेफ्थेलेट (पीईटी) के लिए परीक्षण किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि रक्त के 50 प्रतिशत नमूनों में पॉलीइथाइलीन टेरेफ्थेलेट (पीईटी) था। नमूनों में यह सबसे प्रचलित प्लास्टिक प्रकार था। PET एक स्पष्ट, मजबूत और हल्का प्लास्टिक है जो व्यापक रूप से खाद्य पदार्थों और पेय पदार्थों की पैकेजिंग के लिए उपयोग किया जाता है, विशेष रूप से सुविधाजनक आकार के शीतल पेय, जूस और पानी। केवल एक तिहाई (36%) में पॉलीस्टाइनिन होता है, जिसका उपयोग पैकेजिंग और भंडारण में किया जाता है, जबकि लगभग एक चौथाई (23%) में पॉलीइथाइलीन होता है, जिससे प्लास्टिक वाहक बैग बनाए जाते हैं। केवल एक व्यक्ति (5%) में पॉलीमेथाइल मेथैक्रिलेट था और किसी भी रक्त के नमूने में पॉलीप्रोपाइलीन नहीं था। एक नमूने में तीन तरह के प्लास्टिक : चौंकाने वाली बात यह है कि शोधकर्ताओं ने एक ही रक्त के नमूने में तीन अलग-अलग प्रकार के प्लास्टिक पाए। रक्त के नमूने लिए जाने से ठीक पहले प्लास्टिक के संपर्क में आने के कारण उनके रक्त में माइक्रोप्लास्टिक्स वाले और नहीं होने के बीच अंतर हो सकता है। उदाहरण के लिए एक स्वयंसेवक जिसने अपने रक्त में माइक्रोप्लास्टिक्स के लिए सकारात्मक परीक्षण किया, हो सकता है कि उसने हाल ही में प्लास्टिक-लाइन वाले कॉफी कप से पिया हो।
एबीएन नॉलेज डेस्क। ऐसे बहुत कम लोग होंगे, जिन्हें घूमना पसंद नहीं होगा। हर कोई घूमना पसंद करता है। कोई एक शहर से एक शहर तो कोई दूसरे राज्य घूमने जाते हैं। वहीं, जिनका बजट ज्यादा होता है वो दूसरे देशों में घूमने जाते हैं। लेकिन, अब तो लोगों ने स्पेस में जाना शुरू कर दिया है और अंतरिक्ष में घूमने जा रहे हैं। आपने खबरों में पढ़ा होगा कि अब आम लोग भी अंतरिक्ष में घूमने जा रहे हैं। इस खबर के बाद लोगों के मन में सवाल आता है कि आखिर अंतरिक्ष जाने में कितने रुपये खर्च होते हैं। अंतरिक्ष घूमने जा रहे हैं लोग : अब अंतरिक्ष में सैलानियों को ले जाने की बात की जा रही है। कुछ लोग तो हाल ही में अंतरिक्ष में जाकर आ चुके हैं। कुछ दिनों से अंतरिक्ष घूमने का आइडिया काफी जोर पकड़ रहा है। वैसे ये बात दूसरी है कि आपके इस शौक के लिए पर्यावरण को काफी नुकसान होता है। यानी जब एक बार अंतरिक्ष जाते हैं तो इस ट्रिप में पर्यावरण काफी प्रदूषित होता है। पर्यावरण पर होने वाले नुकसान के बारे में चर्चा करने से पहले आपको बताते हैं कि इसमें कितना खर्चा होना वाला है। कितना होगा खर्चा : बता दें कि रिचर्ड ब्रैंसन, जेफ बेजोस, एलॉन मस्क जैसे अरबपति लोगों को अंतरिक्ष की सैर करवाने में जुटे हैं। रिचर्ड ब्रैंसन की कंपनी ने अब लोगों से बुकिंग भी शुरू कर दी है और इसमें बुकिंग करके अंतरिक्ष में जाया जा सकता है। लेकिन, अगर इसकी कीमत की बात करें तो अंतरिक्ष में जाने की बुकिंग के लिए 4.5 लाख डॉलर की जरूरत है यानी करीब 3 करोड़ 43 लाख रुपये। ये टिकट वो ही बुक करवा सकते हैं, जिन्होंने पहले से करीब डेढ़ लाख डॉलर देकर बुक किया हुआ है। मगर इसकी शुरुआत अभी नहीं की जाएगी और 1000 लोगों की बुकिंग होने के बाद ये ट्रिप शुरु होगी। अभी तक कई फ्लाइट स्पेस में भेजी है। जब स्पेसएक्स ने अपनी फ्लाइट आकाश में भेजी थी तो उन्होंने 4 लोगों को 3 दिन के लिए भेजा था। हालांकि, अभी तक इन कंपनियों ने घोषणा नहीं की है कि अंतरिक्ष घूमाने के लिए उन्होंने कितने रुपये लिए थे। वैसे आपको बता दें कि स्पेस में जाने से पहले से कई टेस्ट और लंबी ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है। उसके बाद ही इच्छुक लोगों को अंतरिक्ष में भेजा जाता है। पहले कई रिपोर्ट्स में एपी के हवाले से कहा गया है कि स्पेस में जाने वाले लोगों का करीब 55 मिलियन का खर्चा होने वाला है। भारतीय करेंसी में इस कंवर्ट करें तो यह 401,65,48,250 यानी 4 अरब 1 करोड़ 65 लाख 48 हजार 250 रुपये होता है। ऐसे में अगर आपको भी कभी स्पेस में जाने का अवसर मिलता है तो आपके पास कम से कम इतने रुपये होने चाहिए। वहीं, जोफ बेजोस की यात्रा के लिए कहा गया कि बेजोस महज चार मिनट तक अंतरिक्ष में रहे, इसके लिए उन्होंने करीब 5.4 अरब डॉलर (लगभग 4,01,94,76,50,000 रुपये) खर्च किए।
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