एबीएन सेंट्रल डेस्क। इस दीवाली पर हम एक नए दूरसंचार युग में होंगे और उसकी उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। 5जी सेवाएं शुरू होने के बाद आने वाले बदलाव में न केवल इंटरनेट की गति में काफी अधिक इजाफा होगा बल्कि प्रति उपभोक्ता औसत राजस्व (एआरपीयू) में भी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। यह एक ऐसा मानक है जो दूरसंचार कंपनियों और दूरसंचार क्षेत्र की सेहत को परखता है। भारत में प्रति माह एआरपीयू दुनिया में सबसे कम वाली श्रेणी में रहा है और दूरसंचार कंपनियों ने लगातार कोशिश की है कि इसमें सुधार करके इस क्षेत्र को नये सिरे से संवारा जा सके। इस तमाम बातचीत के बावजूद दूरसंचार कंपनियों के लिए एआरपीयू में इजाफा निहायत कम रहा है। इसकी वजह यह डर है कि प्रतिस्पर्धा के कारण कीमतें कम होने से उपभोक्ता दूर होंगे। दूरसंचार सेवा प्रदाताओं ने शुल्क दरों में मामूली इजाफा करने की दिशा में छोटे कदम भी नहीं उठाए। देश की बड़ी दूरसंचार कंपनियों के लिए भी प्रति माह एआरपीयू 200 रुपये से कम है। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण के अंतिम आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2022 में उद्योग जगत का औसत 127.12 रुपये प्रति माह था। रिलायंस और भारती समूहों के वित्तीय नतीजों के मुताबिक जून में समाप्त तिमाही में जियो का एआरपीयू 175.7 रुपये और एयरटेल का 183 रुपये प्रति माह था। शीर्ष दूरसंचार कंपनी रिलायंस जियो का एआरपीयू पिछले साल की समान अवधि की तुलना में केवल 4.8 फीसदी बढ़ा। दूरसंचार क्षेत्र के प्रमुख कारोबारियों के बीच हो रही चर्चाओं से लगता है कि 5जी की शुरुआत होने के बाद यह तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है। वरिष्ठ अधिकारी शुल्क दरों और एआरपीयू से संबंधित गणित लगाने में लगे हैं क्योंकि 5जी की शुरुआत बस होने ही वाली है। इनमें से कुछ कंपनियों का अनुमान है कि प्रति माह एआरपीयू में 20 से 25 प्रतिशत का इजाफा हो सकता है क्योंकि उपभोक्ता अधिक से अधिक डेटा की खपत करेंगे। अगर यह सब कंपनियों के अनुमान के मुताबिक हुआ तो यह उच्च राजस्व के लिए उचित मॉडल होगा, वह भी कंपनियों द्वारा बिना शुल्क में इजाफा किए। अब तक के संकेत तो यही हैं कि 5जी शुल्क दरें संभवत: 4जी से बहुत अलग न हों, दूरसंचार कंपनियां अभी इस विषय पर किसी निर्णय पर नहीं पहुंच सकी हैं। हकीकत में शुल्क दरों को लेकर काफी संघर्ष देखने को मिल सकता है। यदि एआरपीयू 5जी के साथ 25 प्रतिशत से अधिक होता है तो एयरटेल और जियो दोनों के लिए 200 रुपये का स्तर पार करना मुश्किल होगा। अभी तक दूरसंचार उद्योग इसी फॉर्मूले पर काम कर रहा है कि डेटा का उपयोग कई गुना बढ़ जाएगा क्योंकि 5जी तकनीक में इंटरनेट की गति काफी तेज होगी। हालांकि प्रति जीबी लागत में शायद बहुत बदलाव न आए। डेटा की खपत में इजाफे को लेकर यह आशावादी विचार मौजूदा खपत के रुझान पर आधारित है। हमने काफी पहले एक बात सुनी थी कि आने वाले समय में डेटा की मांग तेल की तरह होगी। अब 5जी के आगमन के पहले चर्चा है कि सबस्क्राइबर डेटा की खपत एकदम पानी की तरह करेंगे। केवल तेल और पानी के साथ तुलना की जगह और भी कई तरह के आकलन हैं। इस क्षेत्र पर नजर बनाए हुए अधिकारी कदम दर कदम आगे बढ़ रहे हैं ताकि बेहतर शुल्क दर और एआरपीयू आंकड़ा हासिल किया जा सके। मौजूदा रुझान से संकेत मिलता है कि यूट्यूब और ऑनलाइन गेमिंग फोन डेटा के इस्तेमाल में शीर्ष पर हैं। अनुमान है कि उपभोक्ता यूट्यूब पर एक्स फ्रेम का इस्तेमाल कर रहा है और 5जी तकनीक आने के बाद वह उसका तीन गुना फ्रेम इस्तेमाल करने लगेगा। फ्रेम प्रति सेकंड यानी एफपीएस एक इकाई है जो यूट्यूब या ऑनलाइन वीडियो गेम में वीडियो कैप्चर का आकलन करता है। एफपीएस में सुधार के साथ वीडियो और अधिक सहज ढंग से चलेंगे। दूरसंचार कंपनियां 5जी वीडियो कॉल से भी उम्मीद लगा रही हैं कि उसमें काफी इजाफा होगा। अनुमान लगाया जा रहा है कि 5जी के आगमन के बाद इस क्षेत्र में उपभोक्ता 20 जीबी डेटा प्रतिमाह से बढ़कर 50-60 जीबी डेटा प्रतिमाह तक पहुंच सकते हैं। जाहिर है इस क्षेत्र में काफी संभावनाएं मौजूद हैं क्योंकि आने वाले समय में उपभोक्ता कारोबार से लेकर कृषि तक काफी कुछ इंटरनेट से संचालित होने की उम्मीद बढ़ रही है। हालांकि उद्योग जगत के अंदरूनी स्रोतों की मानें तो चिप की कमी एक बहुत बड़ी चुनौती है। इस कमी के कारण ही दूरसंचार कंपनियां एक साथ 5जी सेवाओं को देशव्यापी स्तर पर शुरू नहीं कर पा रही हैं। मेट्रो शहरों में 5जी सेवा शुरू होने वाली है जबकि शेष भारत को अभी इसके लिए प्रतीक्षा करनी होगी। डेटा की खपत बढ़ने से जहां एआरपीयू 200 रुपये का आंकड़ा पार कर सकता है, वहीं शायद दूरसंचार कंपनियों के लिए 5जी तकनीक पर किए गए निवेश की लागत निकालने के लिए इतना काफी न हो। इसके अलावा काफी कुछ इस बात पर भी निर्भर करेगा कि 4जी से कितने उपभोक्ता 5जी में जाते हैं और इस प्रक्रिया में कितना समय लगता है? उपयोग के मामलों से ही इस बदलाव की दर निर्धारित होगी लेकिन एक शीर्ष अधिकारी का कहना है कि करीब दो तिहाई 4जी उपभोक्ता बहुत जल्दी 5जी का रुख कर लेंगे। इस बीच भारतीय मोबाइल कांग्रेस की आगामी बैठक यानी भारतीय दूरसंचार उद्योग की अहम शिखर बैठक में भी हमें 5जी के भविष्य की झलक अवश्य देखने को मिलेगी। आशा की जा रही है कि एक बार फिर मुकेश अंबानी और सुनील मित्तल एक साथ मंच पर होंगे और इस निर्णायक घड़ी में दूरसंचार क्षेत्र की ओर से कोई बड़ा संदेश जारी करेंगे।
एबीएन नॉलेज डेस्क। जब आप घर से दूर होते हैं तो अपने बुजुर्ग माता-पिता, छोटे बच्चे या यहां तक कि अपने प्यारे पालतू जानवर की सुरक्षा के बारे में चिंतित रहते हैं? अब चिंता करने की जरूरत नहीं है क्योंकि भारत की अग्रणी कम्युनिकेशन्ससॉल्यूशनप्रोवाइड, भारती एयरटेल (एयरटेल) ने आज एक सहज, एंड-टू-एंड होम सर्विलांससॉल्यूशनएक्ससेफ के लॉन्च की घोषणा की है, जो एक एंड-टू-एंड होम सर्विलांससिस्टम है और उपयोग में बेहद आसान है। इसमें कई तरह के वाई-फाईबेस्डएडवांस्ड कैमरे हैं, जो ग्राहकों को घर से दूर रहने पर भी उन्हें अपने घरों से जोड़े रखते हैं, जिससे उन्हें मानसिक शांति मिलती है। ग्राहक https://www.airtel.in/xsafe/ पर जाकर या एयरटेल थैंक्सऐप में लॉग-इन करके मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, बैंगलोर, चेन्नई और कोलकाता सहित 40 शहरों में उपलब्ध एक्ससेफडिवाइस अपने लिए बुक कर सकते हैं। भारती एयरटेल के सीईओहोम्स वीर इंदर नाथ ने इस नई गृह सुरक्षा प्रणाली एक्ससेफके लॉन्च के अवसर पर बोलते करते हुए कहा, हम लगातार अपने ग्राहकों के फीडबैक पर ध्यान देते हैं और महामारी के बाद उनमें से कई ने अपने प्रियजनों की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की है। ऐसे ग्राहक जो अपने घर से दूर रहते हैं, उन ग्राहकों के लिए, एक्ससेफ एक आदर्श विकल्प है। ग्राहक इस यूजरफ्रेंडली, एंड-टू-एंड होम सर्विलांससॉल्यूशन के साथ अपने प्रियजनों को देख सकते हैं। कैमरे में मौजूद दोतरफा संचार प्रणाली के माध्यम से, वे घर के सदस्यों के साथ कहीं से भी संवाद करने में सक्षम होंगे।
एबीएन नॉलेज डेस्क। उल्का पिंड पृथ्वी से टकरा कर जीवन खत्म कर सकते हैं, वैज्ञानिकों को यह चिंता हमेशा रही है। इस खतरे से निपटने के लिए नासा का अंतरिक्ष यान डार्ट धरती से 68 लाख किमी दूर एक उल्का पिंड डिमोर्फोस से टकराने जा रहा है। यह पिंड 525 फुट की डाइडिमोस नामक चट्टानी उल्का की परिक्रमा करता है। टकराव से उल्काओं का मार्ग बदलने की उम्मीद है। इसीलिए इसे डबल एस्ट्रॉयड री-डायरेक्शन टेस्ट यानी डार्ट नाम मिला है। यह टक्कर इंटरनेट पर लाइव देखी जा सकेगी। टक्कर भारतीय समयानुसार 27 सितंबर को सुबह 4:44 बजे होगी। इस दौरान यान की गति 22,500 किमी प्रति घंटा होगी। क्यों पड़ी इस परीक्षण की जरूरत : दोनों उल्काएं वैसे तो पृथ्वी के लिए खतरा नहीं है। फिर भी परखा जा रहा है कि भविष्य में कोई उल्का अगर सच में पृथ्वी की ओर आई तो क्या हम उसका मार्ग बदल सकते हैं? इसे पृथ्वी की सुरक्षा का परीक्षण मिशन कहा जा रहा है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि टक्कर से उल्काओं का मार्ग बदलेगा। दोनों उल्काओं के पथ पर वैज्ञानिकों की नजर लंबे समय से है। टक्कर के बाद बदलाव का पता दूरबीनों से लगाया जायेगा। 2,500 करोड़ रुपये का डार्ट, उपग्रह भी साथ : • 24 नवंबर 2021 में धरती से प्रक्षेपित डार्ट पर 2,500 करोड़ खर्च। • ड्रेको उल्का इस टक्कर के हर सेकंड की तस्वीरें लेने में मदद करेगा। • एक छोटा उपग्रह लाइट इटैलियन क्यूबसैट भी भेजा गया है, जो टकराव से पहले यान से अलग होकर पूरी घटना का गवाह बनेगा। • इससे टकराव की 3 मिनट बाद तक की बेहद साफ तस्वीरें ली जायेंगी।
एबीएन नॉलेज डेस्क। मोबाइल सिम कार्ड के एक किनारे पर कट का निशान होता है, पर कभी सोचा है कि ऐसा क्यों है। मोबाइल नेटवर्क कंपनियों ने इसे खास मकसद से बनाया है, जानिए, इसका क्या काम है... समय के साथ तकनीक में भी कई बदलाव आ रहे हैं। मोबाइल से लेकर सिम के आकार तक में बदलाव हुआ है। नतीजा, अब यूजर्स को बेहतर सुविधाएं मिल रही हैं। मोबाइल सिम कार्ड की बात करें तो पहले सामान्य सिम आते थे जो आयताकार होते हैं। इसके बाद सिम के आकार में थोड़ा बदलाव किया गया, जो चौंकाने वाला था। सामान्य सिम के एक किनारे को काट दिया गया। इतना ही नहीं, उस सिम को जहां पर लगाया गया उस स्लॉट में भी वही डिजाइन दी गई। चौंकाने वाली बात यह है कि ज्यादातर लोगों को यह नहीं मालूम कि आखिर सिम में बदलाव क्यों किया गया? उसके एक किनारे पर कट क्यों बनाया गया और मोबाइल नेटवर्क कंपनियों के ऐसा करने से यूजर पर क्या असर पड़ा? इन सवालों के समुचित जवाब यहां हैं। इसलिए सिम में कट लगाने की नौबत आई : शुरुआती दौर में ऐसे फोंस आते थे जिसमें सिम लगाने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी, इन्हें पोस्टपेड फोन कहा जाता था। फिर प्रीपेड फोन का चलन शुरू हुआ और कंपनियों ने सिम बनाने शुरू किये। सिम के चारों कोने बराबर बनाए जाते थे, इसलिए लोगों को इसे स्लॉट में लगाते समय में यह समझ नहीं आता था कि वो सीधा लगा रहे हैं या उल्टा। ठीक से न लगने पर वो बार-बार इसे लगाने की कोशिश करते थे। ज्यादातर मामलों में सिम उल्टा लगाने के कारण वो या तो फंस जाता था या फिर सिम में लगी चिप खराब हो जाती थी। इस समस्या का हल ढूंढने के लिए कंपनियों ने सिम की डिजाइन में बदलाव करने की योजना बनाई। बदलाव के बाद ऐसा सिम बनाया जो एक किनारे पर कटा हुआ था। कितने काम का साबित हुआ यह बदलाव : कंपनियों ने सिम के एक हिस्से पर कट लगाकर रिलीज करना शुरू किया। सिम की डिजाइन में बदलाव के कारण कंपनियों को मोबाइल में लगाई जाने वाली सिम ट्रे को भी बदलना पड़ा। इसके बाद इसे मोबाइल में लगाना आसान हुआ। सिम ट्रे में बने आकार में सिम को फिट करना आसान हो गया। इस तरह सिम के खराब होने या इसकी चिप खराब होने के मामले बंद हो गये। कट मार्क के कारण यूजर को इसे ट्रे में लगाने का तरीका ज्यादा आसान लगा। सिम कार्ड का नया आकार दुनियाभर में इतना पॉपुलर हुआ कि इसे लगभग सभी कंपनियों ने अपनाया। इतना ही नहीं इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आइएसओ ओर से भी मान्यता मिली। वर्तमान में सिम कार्ड बनाने वाली फ्रांस की कंपनी आइडिमिया दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी है। अब आइडिमिया भारत को दुनिया का सिम कार्ड हब बनाने की योजना बना रही है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, आइडिमिया कंपनी भारत में सिम कार्ड के प्रोडक्शन का विस्तार करने की तेयारी में है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारत-ब्रिटेन की संयुक्त उद्यम उपग्रह संचार कंपनी वनवेब ने श्रीहरिकोटा से किये जाने वाले प्रक्षेपण से पहले सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (एसडीएससी-एसएचएआर) में 36 उपग्रहों के आगमन की घोषणा की। इस लॉन्च के साथ ही वनवेब के अपने जेन 1 एलईओ श्रृंखला के 70 प्रतिशत से अधिक उपग्रह कक्षा में स्थापित कर चुका होगा जो दुनिया भर में हाई स्पीड- लो लेटेंसी कनेक्टिविटी सेवाएं देने की ओर अग्रसर है। वनवेब ने इस प्रक्षेपण को सुविधाजनक बनाने के लिए भारत की राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की वाणिज्यिक शाखा, न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) के साथ भागीदारी की है। यह प्रक्षेपण कंपनी का कुल 14वां प्रक्षेपण होगा और उपग्रहों को सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सबसे भारी इसरो रॉकेट, जीएसएलवी-एमके 3 द्वारा कक्षा में स्थापित किया जायेगा। न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड के अध्यक्ष सह प्रबंध निदेशक राधाकृष्णन डी ने कहा, भारत से जीएसएलवी-एमके3 पर 36 वनवेब उपग्रहों का प्रक्षेपण एनएसआईएल और इसरो के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। पृथ्वी के करीब से रविवार को एक विशाल एस्टेरॉयड (क्षुद्रग्रह) गुजरेगा। यह स्टैच्यू ऑफ यूनिटी से भी लगभग 210 मीटर बड़ा है। नासा की प्रयोगशाला (जेपीएल) के अनुसार, 2005 आरएक्स3 नामक एस्टेरॉयड 62,820 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हमारे ग्रह की ओर बढ़ रहा है। स्पेस एजेंसी के मुताबिक, यह एस्टेरॉयड करीब 17 साल (2005 में) पहले पृथ्वी के करीब से गुजरा था। तब से लेकर अब तक नासा की जेट प्रोपल्जन लैबोरेटरी इस पर नजर बनाये हुए है। नासा के मुताबिक, आरएक्स3 अगली बार मार्च 2036 में धरती के पास से गुजरेगा। नासा ने 10 सितंबर को चेतावनी जारी कर बताया था कि इस महीने एक सप्ताह में चार एस्टेरॉयड पृथ्वी के करीब आएंगे। इनमें से एक 2005 आरएक्स3 है। गुजर चुके हैं दो एस्टेरॉयड : • 2022 क्यूएफ : इसकी खोज अगस्त 2022 में हुई थी। यह 140 फुट चौड़ा एस्ट्रॉयड है, जो 11 सितंबर को धरती के सबसे नजदीक था। यह 30,384 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पृथ्वी के 73 लाख किलोमीटर करीब आया था। • 2008 आरडब्ल्यू : इसे 2008 में खोजा गया था। यह 12 सितंबर को 36,756 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पृथ्वी के 67 लाख किलोमीटर करीब आया था। यह लगभग 310 फुट बड़ा था। • 2020 पीटी4: 39,024 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पृथ्वी के 71,89,673 किलोमीटर के करीब आयेगा। • 2022 क्यूडी1: 242 फुट बड़े इस एस्ट्रॉयड को अगस्त 2022 में खोजा गया था। नासा के अनुसार, यह 16 सितंबर को 34,200 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से धरती के 74 लाख किलोमीटर करीब आ जायेगा। • 2022 क्यूबी37 : 18 सितंबर को 2005 आरएक्स3 के साथ-साथ यह एस्टेरॉयड भी हमारे ग्रह के करीब से गुजरेगा। इसकी रफ्तार 33,192 किलोमीटर प्रति घंटा होगी और पृथ्वी के 65 लाख किलोमीटर पास आ जायेगा। एस्टेरॉयड से टकराने के लिए तैयार है नासा : अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा इस महीने के अंत में अपना डार्ट (डबल एस्टेरॉयड रिडायरेक्शन टेस्ट) मिशन लॉन्च करने वाली है। इसके तहस नासा एस्टेरॉयड को टक्कर मारकर नष्ट करने की तैयारी कर रहा है। नासा का अंतरिक्ष यान 26 दिसंबर को करीब 7:14 बजे इस मिशन को लॉन्च करने वाला है। भारतीय समयानुसार यह 27 सितंबर की सुबह 4.44 बजे लॉन्च होगा। इस मिशन के तहत हमारे पृथ्वी को खतरा पैदा करने वाले किसी भी एस्टेरॉयड की दिशा को बदला जा सकेगा या उसे नष्ट किया जा सकेगा। इस अंतरिक्ष यान का इस्तेमाल करके एस्टेरॉयड की दिशा मोडने वाली इस प्रक्रिया को कायनेटिक इंपेक्ट मेथड कहा जा रहा है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। खाड़ी के देशों में एक ऐसा शहर है, जो अपने नये-नये कारनामों से दुनिया को हैरान करता रहता है। दरअसल, हम बात कर रहे हैं दुबई शहर की, जो अपने आर्किटेक्चर और अपने यहां मौजूद इमारतों के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं। यहां पर मौजूद बुर्ज अल-खलीफा इमारत के बारे में शायद ही दुनिया में कोई ऐसा व्यक्ति हो, जो ना जानता हो। दुबई के रेगिस्तान में खड़ी ये दुनिया की सबसे ऊंची इमारत है। इस इमारत की ऊंचाई देख लोग दंग रह जाते हैं। वहीं, अब दुबई एक बार फिर से दुनिया को हैरान करने वाला है, क्योंकि इसने अपनी जमीन पर चांद को उतारने की तैयारी कर ली है। दरअसल, दुबई अब अपना खुद का चांद बना रहा है, जो चंद्रमा के आकार का एक रिजोर्ट होने वाला है। चांदनुमा रिजोर्ट का डिजाइन कनाडा की कंपनी मून वर्ल्ड रिजोर्ट इंक कर रही है। इस चांद का आकार 735 फीट होगा। यहां गौर करने वाली बात ये है कि इस चांद को बनाने में 5 अरब डॉलर लगने वाले हैं। भारतीय रुपये में इसकी तुलना करें, तो दुबई चांद को अपनी जमीन पर तैयार करने में लगभग 40 हजार करोड़ रुपये खर्च करने वाला है। इसके अलावा, इस विशालकाय चांद को बनाने में 48 महीने का वक्त लगेगा, यानि की ये लोगों के लिए 4 साल में बनकर तैयार होगा। दुबई का चांद देखने पहुंचेंगे सालाना 25 लाख : दुबई में पहले से ही कई सारे लग्जरी और टूरिस्ट प्लेस मौजूद हैं, जिनमें दुबई मॉल और अटलांटिस पाम जुमारेह मौजूद है। इन लग्जरी होटलों और मॉल्स की लिस्ट में अब ये चांद भी जुड़ जायेगा। माना जा रहा है कि इस नए रिजॉर्ट में घूमने के लिए हर साल 25 लाख लोग पहुंचने वाले हैं। अरबियन बिजनेस से बात करते हुए मून वर्ल्ड रिजोर्ट इंक के को-फाउंडर माइकल आर हेंडरसन ने कहा, दुबई में चांद की थीम वाला ये होटल शहर की अर्थव्यवस्था को और जान देने वाला है। इससे हॉस्पिटैलिटी, एंटरटेनमेंट, एजुकेशन, टेक्नोलॉजी और स्पेस टूरिज्म जैसे सेक्टर्स को बढ़ावा मिलेगा। चांद पर होंगे 300 प्राइवेट स्काई विला : अरबियन बिजनेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दुबई का चांद 10 एकड़ में फैला हुआ होगा, जिसमें वेलनेस सेंटर, नाइटक्लब, आवास (300 प्राइवेट स्काई विला) और होटल रूम मौजूद होंगे। ये जगह चांद की सतह से भी घिरी हुई होगी और इसमें एक लूनर कॉलोनी भी शामिल होगी। स्पेस टूरिज्म का सस्ते में मजा उठाने वाले लोगों के लिए ये एक शानदार जगह होगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि स्काई विला के मालिक रिसॉर्ट में एक एक्सक्लूसिव प्राइवेट क्लब का मेंबर भी बन पायेंगे। फिलहाल कंपनी संभावित ग्राहकों को चांद पर जगह बेचने के लिए रोड शो भी कर रही है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। कहा जाता है कि इस धरती पर कुछ भी अनश्वर नहीं है, जो भी यहां आया है, उसे एक दिन जाना है। हमारे वेद पुराणों में भी अमरत्व को लेकर ऐसी चर्चा है। लेकिन, आज तक ऐसा कोई जवाब नहीं मिला, जो अमरता के रहस्य को खोल सके। देवी-देवताओं को छोड़ दें तो पुराणों में स्पष्ट लिखा है कि इंसान का शरीर नश्वर है, लेकिन इस दावे को स्पेन के वैज्ञानिक चुनौती देने जा रहे हैं। हाल ही में स्पेन की एक यूनिवर्सिटी के साइंटिस्ट्स ने जेलीफिश पर एक रिसर्च किया और उस रिसर्च के आधार पर उम्मीद की जा रही है कि वे बस अमरत्व से एक कदम की दूरी पर हैं। स्पेन की यूनिवर्सिटी आॅफ ओविएडो के डिपार्टमेंट आॅफ बायोकेमिस्ट्री एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी के रिसर्चर ने धरती के इकलौते ऐसे जीव पर एक्सपेरिमेंट किया है, जिसे अमरत्व के करीब माना जाता है। वह जीव जेलीफिश है, जिसे टरीटॉप्सिस डोहरनी के नाम से भी जाता है। इस जीव में वापस युवावस्था में लौटने की क्षमता होती है, यानी कि जब इसके शरीर में कोई क्षति पहुंचती है तो वह खुद फिर से युवा बना लेता है। इस तरह से वह जब तक चाहे, तब तक जीवित रह सकता है। प्रोसीडिंग्स आॅफ द नेशनल एकेडमी आॅफ साइंसेज में प्रकाशित इस स्टडी को कंपैरेटिव जीनोमिक्स आॅफ मोर्टल एंड इम्मोर्टल निडेरियन्स अनवील्स नोवेल कीज बिहाइंड रिजुवेनेशन कहा जाता है। इस रिसर्च के जरिए वैज्ञानिकों ने उम्र को कम करने वाली जेलीफिश के जीनोम को अनुक्रमित किया और डीएनए के सटीक हिस्से को अलग करने में कामयाब रहे। इसी हिस्से का उपयोग करके जेलीफिश अपनी उम्र कम करके खुद को दोबारा युवा बना लेता है। यह रिसर्च यूनिवर्सिटी आॅफ ओविएडो के डॉ। कार्लोस लोपेज-ओटिन के नेतृत्व में हुआ। इनकी टीम ने जेलीफिश के आनुवंशिक अनुक्रम को उनकी लंबी उम्र के रहस्य का पता लगाने और मानव उम्र बढ़ाने के नए सुराग खोजने की उम्मीद को देखते हुए मैप किया। उन्होंने यह पता लगाया कि टी। डोहरनी के जीनोम में भिन्नताएं हैं जो इसे डीएनए की प्रतिलिपि बनाने और मरम्मत करने में बेहतर बना सकती हैं और वे टेलोमेरेस नामक गुणसूत्रों के सिरों को बनाए रखने में बेहतर प्रतीत होते हैं। वहीं, मनुष्यों में उम्र के साथ टेलोमेयर की लंबाई कम होती दिखाई गई है।
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