एबीएन नॉलेज डेस्क। नासा के जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप ने सौरमंडल में पानी के भंडार का पता लगाया है। वैज्ञानिकों को पहली बार धूमकेतु के आस-पास जल वाष्प के प्रमाण मिले हैं। लंबी जद्दोजहद के बाद वैज्ञानिकों को यह सफलता मिली है। वैज्ञानिकों का कहना है जल वाष्प वाला यह स्थल मंगल और बृहस्पति के बीचोंबीच स्थित है।
गौरतलब है कि 2005 में कैसिनी नामक नासा के एक अंतरिक्ष यान ने चंद्रमा की सतह पर बर्फीले कणों की खोज की थी लेकिन जेडब्ल्यूएसटी की ताजा रिपोर्ट से अब पता चलता है कि अब इसकी मात्रा पहले की तुलना में अधिक हो गयी है। जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की रिपोर्ट से वैज्ञानिकों का उत्साह बढ़ गया है।
नेचर पत्रिका में प्रकाशित हुई रिपोर्ट
जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप दुनिया की सबसे बड़ी दूरबीन है। नासा ने इसे दिसंबर 2021 में अंतरिक्ष में भेजा था। इस दूरबीन ने धूमकेतु और उसके आस-पास की दुनिया की गहन छानबीन की है।
इस खोजबीन के तहत ही वेब स्पेस टेलीस्कोप को धूमकेतु के आसपास जल वाष्प मिले हैं। इसे बड़ी सफलता के तौर पर माना जा रहा है। वास्तव में पहली बार सौरमंडल में गैस पायी गयी है। यह पानी के भंडार होने की ओर इशारा करता है। अब वेब स्पेस टेलीस्कोप की रिपोर्ट के आधार पर वैज्ञानिक लेखकों ने बताया है कि इससे सौरमंडल में पानी के स्रोतों को विस्तार से समझने मंन मदद मिल सकती है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक इससे दुनिया भर के वैज्ञानिकों को अन्य ग्रह प्रणालियों के अध्ययन में भी काफी सहायता मिलेगी। इससे अंतरिक्ष के कई रहस्य सुलझ सकते हैं। इससे ये भी जाना जा सकेगा कि पृथ्वी जैसे ग्रह से सौरमंडल में मिले जल स्रोत का क्या रिश्ता है?
जल वाष्प का किया जा सकता है संरक्षण
नासा के वैज्ञानिकों ने वेब स्पेस टेलीस्कोप की रिपोर्ट के आधार पर भविष्य की कई योजनाओं और अनुमानों की ओर भी ईशारा किया है।
वैज्ञानिकों ने बताया है कि इससे साबित होता है कि पानी की बर्फ को बृहस्पति की कक्षा के अंदर संरक्षित किया जा सकता है। अगर ऐसा होगा तो काफी अहम हो सकता है।
हालांकि वैज्ञानिकों ने यह भी कहा है कि जिस धूमकेतु के आस पास जल वाष्प मिले हैं, वे सामान्य धूमकेतु नहीं हैं। उसे 238पी/रीड नाम दिया गया है।
वैसे वैज्ञानिकों को दो बातों पर आश्चर्य हुआ कि यह अन्य धूमकेतुओं के उलट है क्योंकि इसमें कोई कार्बन डाइऑक्साइड नहीं है। दूसरे – फिलहाल यह नहीं बताया जा सकता कि यहां पानी आखिर कैसे आया।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारत चांद पर कदम रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। आने वाले दिनों में हिंदुस्तान भी कह सकेगा कि धरती से चांद बहुत पास है; क्योंकि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) महत्वाकांक्षी चंद्र मिशन चंद्रयान-3 को लॉन्च करने की तैयारी के अंतिम चरण में है।
स्पेसक्राफ्ट यूआर राव सैटेलाइट सेंटर में पेलोड के फाइनल असेंबली में है। चंद्रयान-3 मिशन लैंडिंग साइट के आसपास लूनार रेजोलिथ, लूनार सीसमिसिटी, लूनार सरफेस प्लाज्मा एनवायरनमेंट एंड इलीमेंट के थर्मो-फिजकल प्रोपर्टीज का अध्ययन करने के लिए साइंटफिक इंस्ट्रूमेंट को ले जायेगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, स्पेसक्राफ्ट जुलाई में लॉन्च होने वाला है। इसकी पुष्टि एक सीनियर अधिकारी ने कर दी है।
उनका कहना है कि चंद्रयान-3 को जुलाई के पहले या दूसरे सप्ताह में लॉन्च किया जा सकता है। हालांकि इसकी आखिरी तारीख को लेकर अभी तक कोई फैसला नहीं लिया गया है। इस साल मार्च के महीने में ही चंद्रयान- 3 स्पेसक्राफ्ट ने जरूरी टेस्ट को सफलतापूर्वक पूरा किया था।
चंद्रयान मिशन के तीसरे स्पेसक्राफ्ट को श्रीहरिकोटा में सतीश धवन स्पेस सेंटर से भारत के सबसे भारी लॉन्च व्हीकल मार्क- III से लॉन्च किया जायेगा। इसे जीएसएलवी एमके III भी कहा जाता है। स्पेसक्राफ्ट में तीन सिस्टम जोडे़ गये हैं, जिसमें प्रोपुलेशन, लैंडर और रोवर शामिल हैं। इसरो प्रमुख एस सोमनाथ ने अभी हाल ही में कहा था कि चंद्रयान-3 का पहला उद्देश्य सटीक लैंडिंग होना है। इसके लिए आज बहुत सारे काम किए जा रहे हैं, जिसमें नये इंस्ट्रूमेंट को बनाना, बेहतर एल्गोरिदम को बनावा, फेल्योर मोड का ध्यान रखना शामिल है। इसरो ने सीई-20 क्रायोजेनिक इंजन के फ्लाइट एक्सप्टेंस होट टेस्ट को पूरा कर लिया है, जो चंद्रयान -3 के लॉन्च व्हीकल के क्रायोजेनिक अपर स्टेज को पावर देगा। ये होट टेस्ट 25 सेकंड की प्लांड अवधि में तमिलनाडु के महेंद्रगिरि में इसरो प्रोपुलेशन कॉमप्लेक्स की हाई एल्टीट्यूड टेस्ट फैसिलिटी में किया गया था। चंद्रयान-3 लैंडर का भी यू आर राव सैटेलाइट सेंटर में सफल ईएमआई /ईएमसी टेस्ट किया गया था।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) दो महीने से भी कम समय में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर अंतरिक्ष यान को उतारने के लिए महत्वपूर्ण तकनीकों का प्रदर्शन करने के उद्देश्य से अपने महत्वाकांक्षी चंद्रयान -3 मिशन को प्रक्षेपित करने की तैयारी कर रहा है।
चंद्रयान-3 मिशन लैंडिंग स्थल के आसपास के क्षेत्र में चंद्र रेजोलिथ (ढीली असमेकित चट्टान और धूल का एक क्षेत्र जो सतह पर स्थित हो), चंद्र भूकंपीयता, चंद्र सतह प्लाज्मा पर्यावरण और मौलिक संरचना के ताप-भौतिकीय गुणों का अध्ययन करने के लिए वैज्ञानिक उपकरणों को लेकर जाता है।
अंतरिक्ष विभाग के तहत आने वाली राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी के बेंगलुरु स्थित मुख्यालय में एक वरिष्ठ अधिकारी ने बृहस्पतिवार को बताया, चंद्रयान-3 मिशन जुलाई के दूसरे हफ्ते में निर्धारित है।
इसरो के अधिकारियों के अनुसार, जहां लैंडर और रोवर पर इन वैज्ञानिक उपकरणों का दायरा चंद्रमा का विज्ञान की थीम के अनुरूप होगा, वहीं एक अन्य प्रायोगिक उपकरण चंद्रमा की कक्षा से पृथ्वी के स्पेक्ट्रो-पोलरिमेट्रिक सिग्नेचर का अध्ययन करेगा, जो चंद्रमा से विज्ञान थीम के अनुसार होगा।
इस साल मार्च में, चंद्रयान -3 अंतरिक्ष यान ने आवश्यक परीक्षणों को सफलतापूर्वक पूरा किया। इसरो के एक अधिकारी ने कहा, चंद्रयान -3, चंद्रयान -2 का अनुवर्ती मिशन है, जो चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित लैंडिंग और उसकी सतह पर घूमने समेत उसके सभी चरणों की क्षमता प्रदर्शित करता है। इसमें लैंडर और रोवर विन्यास शामिल हैं।
एबीएन नॉलेज डेस्क। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने चंद्रमा की मिट्टी से ऑक्सीजन निकालने में कामयाबी हासिल की है।
इस पहला का लाभ आने वाले दिनों में चांद की यात्रा के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों को मिलने वाला है। वैज्ञानिक अपनी इस कामयाबी से उत्साहित हैं।
बताया गया है कि यह ऑक्सीजन इतनी मात्रा में है कि अंतरिक्ष यात्रियों की एक दिन की जरूरत पूरी करना संभव है। नासा अंतरिक्ष यात्रियों का एक दल चांद पर भेजने की तैयारियों को अंतिम रूप देने में लगा है।
ऐसे में समय में मिली यह सफलता महत्वपूर्ण है; क्योंकि ऑक्सीजन जीवन को चलाने की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। बिना इसके पृथ्वी पर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती, अंतरिक्ष की तो महती जरूरत है।
चंद्रमा की मिट्टी से ऑक्सीजन : नासा के जानसन स्पेस सेंटर के वैज्ञानिकों को यह कामयाबी मिली है।
पिछले सप्ताह नासा ने अपनी इस उपलब्धि को सार्वजनिक किया है। यह उपलब्धि दुनिया के किसी भी स्पेस सेंटर को पहली बार मिली है, चंद्रमा की मिट्टी से ऑक्सीजन निकाली गयी हो।
यह ऑक्सीजन चांद पर कई अन्य तरीके से मददगार हो सकता है। विज्ञान की भाषा में इसे इन-सीटू रिसोर्स यूटिलाइजेशन के नाम से पहचाना जा रहा है।
नासा का अगला प्लान
नासा इन दिनों अपने आर्टमिस मिशन की तैयारियों में जुटा है। यह मिशन अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर भेजने को तय किया गया है।
मिशन का उद्देश्य चंद्रमा की सतह पर लंबे समय तक यात्रियों की मौजूदगी बनाये रखना है। ऑक्सीजन की समस्या का समाधान मिलने के साथ ही इस समस्या का समाधान मिलता हुआ दिख गया है।
कार्बो थर्मल रिडक्शन डिमॉन्स्ट्रेशन टीम से जुड़े वैज्ञानिकों ने डर्टी थर्मल वैक्यूम चैंबर का इस्तेमाल करके चंद्रमा पर पाए जाने वाले इस इको सिस्टम को तैयार किया।
इसके अंदर का वातावरण चंद्रमा जैसा होता है। कार्बो थर्मल रिएक्टर वह जगह है, जहां ऑक्सीजन निकालने की प्रक्रिया पूरी की जाती है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। गर्म जलवायु हिमालय के ग्लेशियरों को पिघला रही है। भारतीय उपमहाद्वीप के अरबों लोगों के लिए ये ग्लेशियर पानी के सबसे महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इन ग्लेशियरों की बर्फ सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियों को पोषित करती है।
ग्लेशियरों की बर्फ सिर्फ जीवनदायक जल का स्रोत ही नहीं है, यह पृथ्वी और हमारे महासागरों के ऊपर एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। ये चमकीले सफेद धब्बे अंतरिक्ष में अतिरिक्त गर्मी को परावर्तित करते हैं और ग्रह को ठंडा रखते हैं।
सिद्धांत रूप से आर्कटिक भूमध्य रेखा की तुलना में ठंडा रहता है क्योंकि सूर्य से अधिक गर्मी बर्फ से परावर्तित होकर वापस अंतरिक्ष में चली जाती है। दुनिया भर के ग्लेशियर कई सौ साल पुराने हो सकते हैं।
इनसे हमें यह वैज्ञानिक रिकॉर्ड मिलता है कि समय के साथ जलवायु कैसे बदल गई है। उनके अध्ययन से हमें इस बात की बहुमूल्य जानकारी मिलती है कि हमारा ग्रह किस हद तक तेजी से गर्म हो रहा है।
एंटार्कटिका और आर्टिक के बाद दुनिया का तीसरा बड़ा बर्फ का भंडार हिमालय के पर्वतों में पाया जाता है। अब इस दुर्गम क्षेत्र के पहले संपूर्ण अध्ययन से पता चला है कि हिमालय के ग्लेशियर अपनी अरबों टन बर्फ गंवा चुके हैं।
समय-समय पर अनेक वैज्ञानिक अध्ययनों में हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने के बारे में चेतावनी दी जा चुकी है। लेकिन नई बात यह है कि यह नुकसान वैज्ञानिकों द्वारा लगाए अनुमानों से कहीं बहुत ज्यादा है।
एक नये अध्ययन से पता चलता है कि हिमालय की झीलों में खत्म होने वाले ग्लेशियरों के बड़े पैमाने पर नुकसान को काफी कम करके आंका गया है। इसकी वजह यह है कि उपग्रह पानी के नीचे होने वाले ग्लेशियर के परिवर्तनों को देखने में अक्षम हैं।
शोधकर्ताओं ने पाया कि पिछले आकलन में वृहत हिमालय में झील में समाप्त होने वाले ग्लेशियरों के कुल नुकसान को 6.5 प्रतिशत कम करके आंका गया था। मध्य हिमालय में 10 प्रतिशत कम आकलन हुआ, जहां हिमनद से बनी झीलों का विकास सबसे तेज था।
इस क्षेत्र से एक दिलचस्प मामला गेलोंग को झील का है, जिसमें ग्लेशियर क्षति का 65 प्रतिशत कम आकलन हुआ है। पानी के नीचे बड़े पैमाने पर होने वाले परिवर्तनों का पता लगाने में उपग्रह इमेजिंग की सीमाएं हैं। इसी वजह से यह चूक हुई।
इससे ग्लेशियरों के संपूर्ण नुकसान के बारे में हमारी समझ में अंतर आया है। इस क्षेत्र में 2000 से 2020 तक सिकुड़ते हुए ग्लेशियरों से बनी झीलों की संख्या में 47 प्रतिशत, क्षेत्रफल में 33 प्रतिशत और आयतन में 42 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
इस विस्तार के परिणामस्वरूप ग्लेशियर द्रव्यमान का 2.7 जीटी (ग्रॉस टनेज) का अनुमानित नुकसान हुआ। पिछले अध्ययनों ने इस नुकसान पर विचार नहीं किया था क्योंकि प्रयुक्त उपग्रह डेटा केवल झील के पानी की सतह को माप सकते हैं, लेकिन पानी के नीचे की बर्फ को नहीं नाप सकते जो पानी में बदल जाती है।
क्षेत्रीय जल संसाधनों और हिमनद-झीलों में आकस्मिक बाढ़ के प्रभावों को समझने के लिए ये निष्कर्ष बहुत महत्वपूर्ण है। झील में समाप्त होने वाले ग्लेशियरों से बड़े पैमाने पर होने वाले नुकसान को समझकर शोधकर्ता इन ग्लेशियरों के वार्षिक द्रव्यमान संतुलन का अधिक सटीक आकलन कर सकते हैं।
नया अध्ययन हिमालय के ग्लेशियरों के नुकसान के कारणों को समझने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। साथ ही शोध यह भी दशार्ता है कि दुनिया में झील में समाप्त होने वाले ग्लेशियरों के बड़े पैमाने पर हो रहे नुकसान को भी समझने की जरूरत है। पूरी दुनिया में 2000 और 2020 के बीच ग्लेशियरों का नुकसान 12 प्रतिशत होने का अनुमान है।
आस्ट्रिया की ग्राज यूनिवर्सिटी आफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिक और इस अध्ययन के सह-लेखक टोबियास बोल्च ने कहा कि ग्लेशियरों के नुकसान के पूवार्नुमान मॉडलों में झील में समाप्त होने वाले ग्लेशियरों के नुकसान को भी शामिल किया जाना चाहिए। एक अन्य सह-लेखक डेविड रोंस ने कहा कि 21वीं सदी में ग्लेशियरों के कुल नुकसान में झील में समाप्त होने वाले ग्लेशियरों का प्रमुख योगदान बना रहेगा।
बड़े पैमाने पर नुकसान होने पर ग्लेशियर मौजूदा अनुमानों की तुलना में अधिक तेजी से गायब हो सकते हैं। ग्लेशियरों के अधिक सटीक अध्ययन से शोधकर्ता हिमालय के संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र में भविष्य में जल संसाधन की उपलब्धता का बेहतर अनुमान लगा सकते हैं। आज पृथ्वी पर लगभग 10 प्रतिशत भूमि क्षेत्र ग्लेशियरों की बर्फ से ढंकी हुई है।
लगभग 90 प्रतिशत बर्फ अंटार्कटिका में है, जबकि शेष 10 प्रतिशत ग्रीनलैंड की आइस कैप में है। अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड में तेजी से ग्लेशियरों के पिघलने से भी समुद्र की धाराएं प्रभावित होती हैं, क्योंकि भारी मात्रा में ग्लेशियरों का पिघला हुआ ठंडा हुआ पानी समुद्र के गर्म पानी में प्रवेश कर रहा है।
इससे समुद्र की धाराएं धीमी हो रही हैं। जैसे-जैसे जमीन पर बर्फ पिघलेगी, समुद्र के स्तर का बढ़ना जारी रहेगा। वैसे 1900 की शुरुआत से ही दुनिया भर के कई ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इसकी मुख्य वजह मानवीय गतिविधियां हैं। औद्योगिक क्रांति के बाद कार्बन डाइआक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन ने तापमान बढ़ा दिया।
ध्रुवों में भी तापमान बढ़ा। इसके परिणामस्वरूप ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। अगर हम आने वाले दशकों में उत्सर्जन पर काफी हद तक अंकुश लगाने में कामयाब भी हो जाते हैं तो भी 2100 से पहले दुनिया के बचे हुए ग्लेशियरों में से एक-तिहाई पिघल जाएंगे।
जहां तक समुद्री बर्फ की बात आती है, तो आर्कटिक में सबसे पुरानी और सबसे मोटी बर्फ का 95 प्रतिशत हिस्सा पहले ही खत्म हो चुका है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि उत्सर्जन अनियंत्रित रूप से बढ़ता रहा, तो वर्ष 2040 तक गर्मियों में आर्कटिक बर्फ मुक्त हो सकता है क्योंकि समुद्र और हवा का तापमान तेजी से बढ़ता रहेगा। (लेखक विज्ञान मामलों के जानकार हैं।)
एबीएन नॉलेज डेस्क। वैज्ञानिकों ने एक रहस्यमयी ब्लू होल की खोज की है। ये ब्लू होल वैज्ञानिकों के लिए पहेली बन गयी है क्योंकि वो भी अभी तक पता नहीं लगा पाये हैं कि इसका निर्माण कैसे हुआ? ये ब्लू होल 900 फीट गहरा है। वैज्ञानिकों ने इसे धरती का दूसरा सबसे गहरा ब्लू होल बताया है।
मैक्सिको के युकाटन प्रायद्वीप पर ये सिंक होल मिला है। कैरेबियन सागर और युकाटन प्रायद्वीप समेत तटीय क्षेत्रों में पाये जाने वाले अद्वितीय वातावरण होते हैं। ये ब्लू होल चेतुमल खाड़ी की विशाल गुफा में मिला है, जो पानी के अंदर 900 फीट गहराई में है।
ये करीब 13,660 वर्गमीटर में फैली हुई है। इस गुफा को ताम जा नाम दिया गया है, जिसका मायन में अर्थ गहरा पानी होता है। पानी में डूबी हुई ब्लू होल की लगभग गोलागार आकृति है, जो सतह पर ढलान वाली खड़ी भुजाओं के साथ होती है।
जर्नल फ्रंटियर्स इन मरीन साइंस में ये स्टडी प्रकाशित हुई है। इस स्टडी में बताया गया कि थर्मोहलाइन, स्कूबा ड्राइवर्स, पानी के नमूने, इको-साउंड सर्वे आदि की मदद से इसका पहला ड्राफ्ट तैयार किया गया। साल 2021 में पहली बार खोजा गया ये ब्लू होल इस बात की झलक देख सकती है कि समुद्री दुनिया में जीवन कैसे विकसित हुआ होगा।
ब्लू होल में साल 2021 में लगायी पहली डुबकी
ब्लू होल चेतुमल खाड़ी के मध्य में पाया गया था, जहां पानी में डूबे कार्स्टिक सिंकहोल्स को स्थानीय भाषा में पोजस नाम दिया गया है। रिसर्चर्स ने सितंबर 2021 में केमिकल वाटर के नमूने के लिए ब्लू होल में स्कूबा डाइब लगायी। ब्लू होल की संरचना को एक शंकु के आकार के रूप में बताया जा सकता है। ब्लू होल की अधिकतम पानी की गहराई 270 एमबीएसएल से अधिक है।
स्टडी करने वाली टीम ने ब्लू होल के अंदर लवणता और तापमान में महत्वपूर्ण बदलाव देखा। बकि ब्लू होल के अंदर गहरी परतों पर लवणता के मूल्य बताते हैं कि इनका मुख्य जल स्रोत समुद्री जल है।
कहां है सबसे गहरा ब्लू होल
पृथ्वी पर सबसे गहरा ब्लू होल दक्षिण चीन सागर में है और ये 987 फीट गहरा है। ब्लू होल बनने की मुख्य वजह चूना पत्थर हैं। जब समुद्र का पानी इनसे मिलता है तो ये ब्लूहोल का निर्माण होता है। चूना पत्थर की बात करें तो ये झरझरा होने की वजह से पानी में आसानी से घुल जाता है।
एक्टपर्ट्स का मानना है कि हिमयुगों में ब्लू होल बने होंगे। ऐसे में हजारों साल पहले जब आखिरी हिमयुग का अंत हुआ होगा, तो समुद्र के जल स्तर में वृद्धि हुई और ये गुफाएं पानी से भर गयी।
एबीएन नॉलेज डेस्क। स्पेस एक्स ने गुरुवार को अंतरिक्ष में एक नया इतिहास रचने से चूक गया। अमेरिका के टेक्सास शहर से अब तक का सबसे बड़ा रॉकेट स्टारशिप लॉन्च हुआ, लेकिन कुछ ही समय बाद यह विफल हो गया। ये रॉकेट एलन मस्क की कंपनी स्पेस एक्स ने बनाया है। यह स्टारशिप का पहला आर्बिटल टेस्ट था।
इस रॉकेट को भारतीय समयानुसार शाम 7 बजकर 3 मिनट पर टेक्सास के बोका चिका फेसिलिटी से टेस्ट फ्लाइट के लिए लॉन्च किया गया था। लॉन्च के बाद शुरुआत में तो सब ठीक लग रहा था, लेकिन आर्बिट में जाने से पहले ही इसमें कुछ खराबी आयी जिससे यह ब्लास्ट हो गया।
इस ब्लास्ट की वजह से रॉकेट के हवा में ही चिथड़े उड़ गये। कंपनी के एक अधिकारी ने कहा है कि स्टारशिप के साथ वह हुआ है जिसमें वह रेपिड अनप्लांड डिसेम्बली कहते हैं। अब इस रॉकेट लांचिंग का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
इसमें साफ दिख रहा है कि लॉन्चिंग के बाद यह रॉकेट जमीन से बहुत ऊंचाई पर पहुंच चुका था। लेकिन अचानक ही इसमें विस्फोट हो गया। इसे एलन मस्क से लिए बड़ा झटका बताया जा रहा है। हालांकि इस स्टारशिप के असफल लांचिग के बाद भी स्पेसएक्स ने इस प्रयास को सराहा है।
कंपनी ने कहा कि टीम डेटा को रिव्यू करना जारी रखेंगीं और अगले फ्लाइट टेस्ट की दिशा में काम करेंगी। स्टारशिप के फेल होने के बाद भी स्पेसएक्स हेडक्वार्टर में एम्प्लॉइज खुशी मनाते दिखाई दिए क्योंकि रॉकेट का लॉन्चपैड से उड़ना ही बड़ी सफलता है।
स्पेस-एक्स के स्टारशिप को पहले 17 अप्रैल को भारतीय समयानुसर शाम 6 बजकर 50 मिनट पर लॉन्च किया जाना था, लेकिन कुछ तकनीकी खराबी के चलते इसकी लॉन्चिंग टाल दी गई थी। स्पेस-एक्स के स्टारशिप स्पेसक्राफ्ट और इस बड़े रॉकेट को मिलाकर इन्हें स्टारशिप नाम दिया गया है। ये स्टारशिप 100 लोगों को एक साथ मंगल ग्रह पर ले जाने में सक्षम होगा।
ये इंसानों को दुनिया के किसी भी कोने में एक घंटे से कम समय में पहुंचाने में सक्षम होगा। इस स्टारशिप को दुनिया का सबसे बड़ा रॉकेट बताया जाता है। इसकी ऊंचाई 394 फीट और व्यास 29.5 फीट है। यह रॉकेट दो हिस्से में बंटा हुआ है। ऊपर वाले हिस्से की ऊंचाई 164 फीट है। इसके अंदर 1200 टन ईंधन आता है। दूसरा हिस्से की ऊंचाई 226 फीट है। ये रीयूजेबल है।
यानी यह स्टारशिप को एक ऊंचाई तक ले जाकर वापस आ जायेगा। इसके अंदर 3400 टन ईंधन आता है। इसे 33 रैप्टर इंजन ऊर्जा प्रदान करते हैं। 2 साल पहले स्पेसएक्स ने चालक दल के चंद्र लैंडर के रूप में स्टारशिप का उपयोग करने के लिए नासा से लगभग 3 अरब डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट किया था। नासा के आर्टेमिस मून प्रोग्राम के तहत स्टारशिप का उपयोग किया जायेगा। स्पेसएक्स और नासा मिलकर एसएलएस रॉकेट और ओरियन कैप्सूल के जरिए अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा की सतह तक पहुंचायेंगे।
एबीएन नॉलेज डेस्क। साल का पहला सूर्य ग्रहण शुरू हो चुका है। साल का पहला सूर्य ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा और न ही देश पर इसका कोई प्रभाव देखने को मिलेगा।
ऑस्ट्रेलिया में यह सूर्य ग्रहण दिखना शुरू हो चुका है। ग्रहण सुबह 7 बजकर 4 मिनट से शुरू हो चुका है और दोपहर 12 बजकर 29 मिनट पर खत्म होगा। इस सूर्य ग्रहण की अवधि 5 घंटे 24 मिनट की होगी। बता दें कि आज वैशाख अमावस्या भी है।
कहां-कहां दिखेगा सूर्य ग्रहण
यह सूर्य ग्रहण भारत में नहीं दिखेगा। यह कंबोडिया, चीन, अमेरिका, माइक्रोनेशिया, मलेशिया, फिजी, जापान, समोआ, सोलोमन, बरूनी, सिंगापुर, थाईलैंड, अंटार्कटिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, वियतनाम, ताइवान, पापुआ न्यू गिनी, इंडोनेशिया, फिलीपींस, दक्षिण हिंद महासागर और दक्षिण प्रशांत महासागर जैसी जगहों पर ही दिखाई देगा।
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