ज्ञान विज्ञान

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Published / 2023-06-14 21:30:52
इंस्टाग्राम के नये फीचर से सकते में ट्विटर

एबीएन सेंट्रल डेस्क। ट्विटर को टक्कर देने के लिए इंस्टाग्राम एक बड़ी योजना पर कार्य चल रहा है। एक रिपोर्ट में बताया गया है कि कई सारे बड़े कंटेंट क्रिएटर्स के साथ मेटा इस प्रोग्राम की टेस्टिंग कर रही है, ताकि लोगों के इंटरेस्ट पता चले, सेलिब्रिटीज के इंटरेस्ट पता चले और ट्विटर का विकल्प दिया जा सके। 

बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियां रोज संघर्ष कर रही हैं मार्केट में बने रहने के लिए और एक दूसरे से आगे निकलने के लिए। जैसा कि हम सबको पता है एक तरफ फेसबुक की पैरेंट कंपनी मेटा न केवल फेसबुक बल्कि इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप जैसे बड़े सफल एप्लीकेशंस को लीड करती है, वहीं शॉर्ट मेसेजिंग प्लेटफार्म के तौर पर ट्विटर ने बेहद मजबूत पकड़ बना ली है।  

अकेले ट्विटर एक बड़े इनफ्लुएंसर प्लेटफार्म के तौर पर उभर आया है। चाहे किसी मुद्दे पर चर्चा हो, ट्रेंड हो ट्विटर ने अपना एक अलग मार्केट में स्थान बनाया है। अब जाहिर तौर पर ये दोनों सोशल मीडिया कंपनियां हैं और इसलिए एक दूसरे के साथ उठापटक जारी रहती है। इस कड़ी में मेटा प्लेटफार्म का इंस्टाग्राम इसी तरह का एक एप्लीकेशन लाने के तैयारी में है।  

जी हां आप सही सुन रहे हैं ट्विटर को टक्कर देने के लिए इंस्टाग्राम एक बड़ी योजना पर कार्य चल रहा है। एक रिपोर्ट में बताया गया है कि कई सारे बड़े कंटेंट क्रिएटर्स के साथ मेटा इस प्रोग्राम की टेस्टिंग कर रही है, ताकि लोगों के इंटरेस्ट पता चले, सेलिब्रिटीज के इंटरेस्ट पता चले और ट्विटर का विकल्प दिया जा सके।  

कुछ रिपोर्ट में यह भी बताया जा रहा है कि यह एक इंस्टाग्राम से अलग होगा हालांकि इंटरकनेक्टिविटी बनी रहेगी। इसका मतलब कि जिस प्रकार से आप फेसबुक और इंस्टाग्राम में इंटरकनेक्टिविटी देखते हैं, कुछ कुछ वैसी ही नये ऐप के साथ भी होगी।  अभी तक जो जानकारी मिली है उसके मुताबिक यह एप्लीकेशन लोगों को टेक्स्ट शेयर किये गये लिंक फोटो एवं वीडियो के जरिये अपने दोस्तों से जुड़ने का मौका देगा। 

इसके अलावा फैन और फॉलोवर  सिर्फ एक क्लिक पर प्रभावशाली लोगों से जुड़ सकेंगे। तो अब इंतजार है इंस्टग्राम के इस नए सुविधा को जिसके बारे में कहा जा रहा है कि यह ट्विटर को टक्कर देने वाला है।

Published / 2023-06-14 18:38:56
वाह रे चीन... जमीन-पानी दोनों जगह उड़ान भर सकती है उड़न तस्तरी

चीन ने बनायी दुनिया की पहली उड़न तश्तरी

एबीएन नॉलेज डेस्क। मानव निर्मित इस उड़न तश्तरी का हाल ही में चीन के दक्षिणी शहर शेनझेन में परीक्षण भी हो चुका है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यह इलेक्ट्रानिक उड़न तश्तरी हवा तथा जमीन दोनों से टैक आफ और लैंडिंग करने में सक्षम है। 

आसमान में उड़न तश्तरी के बारे में आपने सुना होगा, कई बार इन्हें ऐसा स्पेस शिप बताया जाता है जिस पर एलियन सवार हैं, हालांकि इसकी कभी पुष्टि नहीं हुई, न ही कोई इसे पास से देख सका, लेकिन आने वाले समय में ये ख्वाहिश पूरी हो सकती है, चीन ने दुनिया की पहली उड़न तश्तरी बना ली है।

मानव निर्मित इस उड़न तश्तरी का हाल ही में चीन के दक्षिणी शहर शेनझेन में परीक्षण भी हो चुका है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यह इलेक्ट्रानिक उड़न तश्तरी हवा तथा जमीन दोनों से टैक आफ और लैंडिंग करने में सक्षम है। चीन में निर्मित यह उड़न तश्तरी ईवीटीओएल यानी इलेक्ट्रिक वर्टिकल टेक आफ और लैंडिंग की तर्ज पर बनाया गया है। 

यानी 15 मिनट की उड़ान में ही यह 656 फीट की ऊंचाई तक पहुंच सकता है। इसे शेनझेल शहर की यूएफओ पावर टेक्नोलॉजी ने विकसित किया है। इसमें 12 प्रोपेलर लगे हैं, पायलट की सीट इनके बीच में डिजाइन की गयी है। चीन में इस उड़न तश्तरी को विकसित करने में तीन साल का समय लगा। 

चीनी मीडिया के मुताबिक यह उड़न तश्तरी को ऐसे डिजाइन किया गया है कि यह पानी या जमीन कहीं से भी उड़ान भर सकती है। कंपनी की ओर से जो वीडियो जारी किया गया है, उसमें यह शेनझेल झील के ऊपर उड़ान भरती नजर आ रही है। हालांकि कंपनी ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि आम लोगों के लिए इसे कब से शुरू किया जायेगा। 

उड़न तश्तरी के सफल परीक्षण के बाद अब चीन उड़ने वाली कार बनाने जा रहा है, एक एयरोस्पेस कंपनी ने ये दावा किया है, कंपनी का दावा है कि अगले दो साल में उड़ने वाली कार बाजार में उतार दी जायेगी। इसकी कीमत तकरीबन 3 लाख 50 हजार डॉलर रहने की संभावना है। 

इससे पहले इजरायल ने हाल ही फ्लाइंग टैक्सी का परीक्षण किया था। यह परीक्षण पूरी तरह सफल रहा था, दो लोगों ने फ्लाइंग टैक्सी में बैठकर 30 किलोमीटर तक की यात्रा भी पूरी की थी। इजरायल की पर्यटन मंत्री ने दावा किया था कि जल्द ही आम लोगों की सुविधा के लिए इसे शुरू किया जायेगा।

Published / 2023-06-13 13:52:51
जानें कैसे नयनों को मिलता है रंग

  • दुनिया की सबसे दुर्लभ आंखों का रंग क्या

एबीएन नॉलेज डेस्क। दुनियाभर में लोगों की आंखें अलग अलग रंगों की होती हैं। काली, भूरी, नीली, पीली, हरी। क्या आपको मालूम है कि दुनियाभर में आंखों का सबसे दुर्लभ रंग क्या है। क्यों ये दुर्लभ है। क्या ये बात आपको हैरान नहीं करती कि मानव आंखें अलग अलग रंगों की क्यों होती हैं। 

भारत में आमतौर पर लोगों की आंखें काली और भूरी होती हैं लेकिन जब हम नीली या दूसरी रंगों की आंखों वाले लोगों को देखते हैं तो बरबस उनकी आंखें हमें आकर्षित करती हैं। वैसे मानव आंखों में रंगों का गजब की विविधता दुनियाभर में पायी जाती है। अगर आप ये समझते हैं कि बच्चे की आंखों का रंग वैसा ही होगा, जैसा माता-पिता का होगा तो ये गलत साबित हो सकता है। 

माता-पिता की आंखों के रंग के आधार पर बच्चे की आंखों के रंग का अनुमान नहीं लगा सकते। हमारी आंख के बीच में पुतली लगभग हमेशा काले रंग की होती है, इसके चारों ओर रंगीन वलय, जिसे परितारिका कहा जाता है, कितने भी रंगों की हो सकती है पारितारिका को अंग्रेजी में आइरिश भी कहते हैं। 

सबसे आम परितारिका का रंग भूरा है। इसका मतलब है कि पृथ्वी पर किसी भी अन्य रंग की तुलना में अधिक लोगों की आंखें भूरी हैं लेकिन सबसे दुर्लभ आंखों का रंग क्या है? हरे रंग को दुनिया का सबसे दुर्लभ आंखों का रंग बताया गया है। 

2014 के अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थल्मोलॉजी के सर्वेक्षण में पाया गया कि सिर्फ 9 प्रतिशत लोगों की आंखें हरी हैं, जबकि 45 प्रतिशत की आंखें हल्के भूरे रंग की हैं। 18 प्रतिशत की भूरी आंखें हैं और 27 प्रतिशत की नीली आंखें हैं। कभी कभी लोगों की आंखें लाल या गुलाबी होती हैं लेकिन ऐल्बिनिज्म जैसे रोग का परिणाम हो सकता है। 

इन मामलों में आंख के अंदर की रक्त वाहिकाएं उन्हें गुलाबी या लाल रूप देती हैं। हेटरोक्रोमिया नामक एक अन्य दुर्लभ स्थिति में लोगों की दोनों आंखों का रंग अलग अलग हो सकता है। उनकी एक भूरी आंख और एक नीली आंख हो सकती है। हेटरोक्रोमिया वाले अधिकांश लोग इसके साथ पैदा होते हैं आपकी आंखों का रंग विभिन्न जीनों से तय होता है, जो आपको विरासत में मिला है। 

आंखों के रंग का आनुवंशिकी एक जटिल विज्ञान है जो एक बच्चे के माता-पिता की आंखों के रंग से परे जाता है। उदाहरण के तौर पर नीली आंखों वाले दो माता-पिता भूरी आंखों वाला बच्चा पैदा कर सकते हैं। ज्यादातर समय, लोगों की आंखों का रंग जीवनभर एक जैसा रहता है। 

नीली आंखों वाले बच्चे की आंखें उनके पहले वर्ष या यहां तक कि उनके पहले कुछ वर्षों में काली हो सकती हैं हालांकि, ऐसी कई स्थितियां हैं जिनके कारण किसी व्यक्ति की आंखों का रंग बदल जाता है। उदाहरण के लिए, मोतियाबिंद आंखों को धुंधला बना सकता है। चोट लगने से भी आंखों के रंग में बदलाव आ सकता है।

Published / 2023-06-10 22:10:19
फ्रिज में रखने के बाद भी आखिर क्यों फट जाता है दूध

  • कहां ये सबसे ज्यादा सुरक्षित, वैज्ञानिकों ने खोला राज

एबीएन नॉलेज डेस्क। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर दूध की उम्र को लम्बे समय तक बरकरार चाहते हैं तो फ्रिज में इसकी सही लोकेशन को चुनें। दूध को फटने से बचाने के लिए सिर्फ फ्रिज में रखना ही काफी नहीं। उसे सही जगह पर रखना जरूरी है। ऐसा करके उसे लम्बे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

विशेषज्ञों की एक टीम का कहना है कि दूध को लम्बे समय तक बचाने के लिए आमतौर पर लोग इसे दरवाजे की तरफ रखते हैं, लेकिन यह इसकी सही लोकेशन नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा करके दूध की उम्र को हम कम कर देते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, अगर दूध को फटने से बचाना चाहते हैं तो उसे फ्रिज के मुख्य हिस्से में रखें, न कि दरवाजे वाले हिस्से में क्योंकि यह फ्रिज का सबसे कम ठंडा हिस्सा होता है।

यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के फूड पॉलिसी के रीडर डॉ क्रिश्चियन रेनॉड्स कहते हैं, दूध खराब होने जाने वाली चीज है। इसलिए यह सबसे जरूरी बात है कि इसे फ्रिज के किस हिस्से में स्टोर करें और वहां का तापमान कितना हो। इस रिसर्च प्रोजेक्ट से जुड़े डॉ रेनॉल्ड्स कहते हैं, हमारे पास हाउसहोल्ड स्टीमुलेशन मॉडल है जो पिछले 6 साल से इस बात पर नजर रख रहा है कि लोग कैसे दूध का इस्तेमाल करते हैं। 

वह कहते हैं, फ्रिज का तापमान 0 से 5 डिग्री सेंटीग्रेड होता है। इतने तापमान के बीच ऐसी चीजों को सुरक्षित रखा जा सकता है। अगर तापमान 5 डिग्री से नीचे रहता है तो दूध की लाइफ एक दिन अधिक बढ़ायी जा सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि चीज और दूध जैसी चीजों को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने के लिए उसे डोर वाले हिस्से में अंदर की तरफ न रखें ताकि इसे से कम से कम तापमान मिले और खराब न हो। 

ब्रिटेन में ऐसा देखा गया है कि लोग इसे फ्रिज के तापमान को मेंटेन नहीं रखते। ऐसे में यह ध्यान रखना चाहिए कि फ्रिज में किस चीज के लिए कितना तापमान मेंटेन रखना चाहिए। विशेषज्ञ कहते हैं, यह नियम सिर्फ दूध के बारे में ही नहीं है बल्कि दूसरे डेयरी प्रोडक्ट के लिए है। चीज, दही जैसे डेयरी प्रोडक्ट को फ्रिज के सबसे गहरे हिस्से में स्टोर किया जाना चाहिए।

लेकिन आमतौर पर ऐसा नहीं होता क्योंकि दूध के पैकेट पर एक्सपायरी डेट तक नहीं उबालते और फ्रिज में रखना पसंद करते हैं। ऐसे में उन्हें पर्याप्त तापमान नहीं मिलता, जितना मिलना चाहिए। नतीजा फ्रिज में रखने के बाद भी कई बार दूध के फटने का खतरा रहता है।

Published / 2023-06-08 14:52:48
जानें आखिर क्यों हरे रंग का हो गया सूर्य...

आखिर क्यों हम नहीं देख पाते ये कलर

एबीएन नॉलेज डेस्क। आखिर ये पीला तारा हमें क्यों अलग-अलग रंग में दिखता है सबसे अहम सवाल ये है कि आखिर सूर्य का मूल रंग क्या है और कैसे ये इंद्रधनुष के सभी रंगों का उत्सर्जन करता है। आइये समझते हैं : - 
आकाश में जब सूर्य निकते तो बेहद भव्य नजर आता है। 

उस वक्त ये रंगीन दिखता है, लेकिन दिन में एक दम पीला नजर आता है। शाम को फिर ये अलग रंग का हो जाता है, आपने कभी सोचा है क्यों? आखिर ये पीला तारा हमें क्यों अलग-अलग रंग में दिखता है? सबसे अहम सवाल ये है कि आखिर सूर्य का मूल रंग क्या है और कैसे ये इंद्रधनुष के सभी रंगों का उत्सर्जन करता है। 

आइये समझते हैं। आसान भाषा में कहें तो सूर्य तो सिर्फ चमकता है, लेकिन उसकी चमक यानी प्रकाश जब वायुमंडल में गैस के कणों से टकराता है तो यह इंद्रधनुष के सभी रंगों में बदल जाता है। लॉर्ड रेले ने इसकी खोज की थी और उन्हीं के नाम पर इस प्रक्रिया को रेले स्कैटरिंग कहा जाता है। 

सूर्य की रोशनी से इंद्रधनुष के सभी रंग उत्सर्जित हेाते हैं, यदि स्पेक्ट्रम से देखा जाये तो हमें जो दिखाई देता है उस पर यकीं करना खुद मुश्किल हो जाता है। साइंस एबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक सूर्य की रोशनी में हरा रंग सबसे ज्यादा दिखाई देता है। इससे ऐसा लगता है कि जैसे सूर्य हरे रंग का का है। 

आप सोच रहे होंगे कि जब सूर्य हरे रंग को सबसे ज्यादा उत्सर्जन करता है तो ये हमें हरा क्यों नहीं दिखता? इसका कारण हमारा वायुमंडल है, दरअसल ये कम तरंग दैर्ध्य के प्रकाश को बिखेरता है। आसान भाषा में कहें तो ये नीले हिस्से से प्रकाश को फ़िल्टर करता है, इसीलिए हमें आसमान नीला और सूर्य पीला दिखाई देता है। 

बेशक सूरज की रोशनी से सबसे ज्यादा हरा रंग उत्सर्जित होता है, लेकिन इसके अलावा भी इसमें सारे रंग मौजूद होते हैं। दोपहर के बाद सूर्य सफेद रंग का भी नजर आता है, ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि उस वक्त प्रकाश वायुमंडल के पतले हिस्से से गुजर रहा होता है। धरती से बेशक इसमें कम अंतर दिखे, लेकिन स्पेस से उस वक्त सूर्य एक सफेद गेंद की तरह ही नजर आता है।

Published / 2023-05-29 19:31:02
नाविक से लैस जवान होंगे और सशक्त

आज नेविगेशन सैटेलाइट एनवीएस-1 का होगा प्रक्षेपण 

एबीएन नॉलेज डेस्क। नाविक से लैस होकर जवान और सशक्त व घातक होंगे। अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (जीएसएलवी) से नेविगेशन सैटेलाइट नाविक एनवीएस-1 को सोमवार को सुबह 10:42 बजे  प्रक्षेपित किया। यह सैटेलाइट खासकर सशस्त्र बलों को मजबूत करने और नौवहन सेवाओं की निगरानी के लिए बनाया गया है।  

नाविक अमेरिकी ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) का जवाब है। नाविक का इस्तेमाल स्थलीय, हवाई और समुद्री परिवहन, लोकेशन-आधारित सेवाओं, निजी गतिशीलता, संसाधन निगरानी, सर्वेक्षण और भूगणित, वैज्ञानिक अनुसंधान, समय प्रसार और आपात स्थिति में किया जाएगा।  

भारत अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (जीएसएलवी) से नेविगेशन सैटेलाइट नाविक को प्रक्षेपित करने की तैयारी पूरी कर ली है। 

वैज्ञानिकों ने सोमवार को प्रक्षेपित किए जाने वाले सैटेलाइट के लिए 27.5 घंटे की उल्टी गिनती रविवार सुबह 7.12 बजे शुरू की। नाविक अमेरिकी ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) का जवाब है। नाविक (भारत का स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम) सेवाओं की निरंतरता सुनिश्चित करेगा।

Published / 2023-05-22 13:35:43
धूमकेतु के चारों ओर मिला पानी

  • नासा के जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप ने की चौंकाने वाली खोज

एबीएन नॉलेज डेस्क। नासा के जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप ने सौरमंडल में पानी के भंडार का पता लगाया है। वैज्ञानिकों को पहली बार धूमकेतु के आस-पास जल वाष्प  के प्रमाण मिले हैं। लंबी जद्दोजहद के बाद वैज्ञानिकों को यह सफलता मिली है। वैज्ञानिकों का कहना है जल वाष्प वाला यह स्थल मंगल और बृहस्पति के बीचोंबीच स्थित है।

गौरतलब है कि 2005 में कैसिनी नामक नासा के एक अंतरिक्ष यान ने चंद्रमा की सतह पर बर्फीले कणों की खोज की थी लेकिन जेडब्ल्यूएसटी की ताजा रिपोर्ट से अब पता चलता है कि अब इसकी मात्रा पहले की तुलना में अधिक हो गयी है। जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की रिपोर्ट से वैज्ञानिकों का उत्साह बढ़ गया है।

नेचर पत्रिका में प्रकाशित हुई रिपोर्ट
जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप दुनिया की सबसे बड़ी दूरबीन है। नासा ने इसे दिसंबर 2021 में अंतरिक्ष में भेजा था। इस दूरबीन ने धूमकेतु और उसके आस-पास की दुनिया की गहन छानबीन की है।

इस खोजबीन के तहत ही वेब स्पेस टेलीस्कोप को धूमकेतु के आसपास जल वाष्प मिले हैं। इसे बड़ी सफलता के तौर पर माना जा रहा है। वास्तव में पहली बार सौरमंडल में गैस पायी गयी है। यह पानी के भंडार होने की ओर इशारा करता है। अब वेब स्पेस टेलीस्कोप की रिपोर्ट के आधार पर वैज्ञानिक लेखकों ने बताया है कि इससे सौरमंडल में पानी के स्रोतों को विस्तार से समझने मंन मदद मिल सकती है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक इससे दुनिया भर के वैज्ञानिकों को अन्य ग्रह प्रणालियों के अध्ययन में भी काफी सहायता मिलेगी। इससे अंतरिक्ष के कई रहस्य सुलझ सकते हैं। इससे ये भी जाना जा सकेगा कि पृथ्वी जैसे ग्रह से सौरमंडल में मिले जल स्रोत का क्या रिश्ता है?

जल वाष्प का किया जा सकता है संरक्षण
नासा के वैज्ञानिकों ने वेब स्पेस टेलीस्कोप की रिपोर्ट के आधार पर भविष्य की कई योजनाओं और अनुमानों की ओर भी ईशारा किया है।

वैज्ञानिकों ने बताया है कि इससे साबित होता है कि पानी की बर्फ को बृहस्पति की कक्षा के अंदर संरक्षित किया जा सकता है। अगर ऐसा होगा तो काफी अहम हो सकता है।
हालांकि वैज्ञानिकों ने यह भी कहा है कि जिस धूमकेतु के आस पास जल वाष्प मिले हैं, वे सामान्य धूमकेतु नहीं हैं। उसे 238पी/रीड नाम दिया गया है।

वैसे वैज्ञानिकों को दो बातों पर आश्चर्य हुआ कि यह अन्य धूमकेतुओं के उलट है क्योंकि इसमें कोई कार्बन डाइऑक्साइड नहीं है। दूसरे – फिलहाल यह नहीं बताया जा सकता कि यहां पानी आखिर कैसे आया।

Published / 2023-05-21 17:24:58
जुलाई में चंद्रयान-3 को लॉन्च करेगा इसरो

सटीक लैंडिंग पहला टारगेट

एबीएन नॉलेज डेस्क। भारत चांद पर कदम रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। आने वाले दिनों में हिंदुस्तान भी कह सकेगा कि धरती से चांद बहुत पास है; क्योंकि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) महत्वाकांक्षी चंद्र मिशन चंद्रयान-3 को लॉन्च करने की तैयारी के अंतिम चरण में है। 

स्पेसक्राफ्ट यूआर राव सैटेलाइट सेंटर में पेलोड के फाइनल असेंबली में है। चंद्रयान-3 मिशन लैंडिंग साइट के आसपास लूनार रेजोलिथ, लूनार सीसमिसिटी, लूनार सरफेस प्लाज्मा एनवायरनमेंट एंड इलीमेंट के थर्मो-फिजकल प्रोपर्टीज का अध्ययन करने के लिए साइंटफिक इंस्ट्रूमेंट को ले जायेगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, स्पेसक्राफ्ट जुलाई में लॉन्च होने वाला है। इसकी पुष्टि एक सीनियर अधिकारी ने कर दी है।

उनका कहना है कि चंद्रयान-3 को जुलाई के पहले या दूसरे सप्ताह में लॉन्च किया जा सकता है। हालांकि इसकी आखिरी तारीख को लेकर अभी तक कोई फैसला नहीं लिया गया है। इस साल मार्च के महीने में ही चंद्रयान- 3 स्पेसक्राफ्ट ने जरूरी टेस्ट को सफलतापूर्वक पूरा किया था।

चंद्रयान मिशन के तीसरे स्पेसक्राफ्ट को श्रीहरिकोटा में सतीश धवन स्पेस सेंटर से भारत के सबसे भारी लॉन्च व्हीकल मार्क- III से लॉन्च किया जायेगा। इसे जीएसएलवी एमके III भी कहा जाता है। स्पेसक्राफ्ट में तीन सिस्टम जोडे़ गये हैं, जिसमें प्रोपुलेशन, लैंडर और रोवर शामिल हैं। इसरो प्रमुख एस सोमनाथ ने अभी हाल ही में कहा था कि चंद्रयान-3 का पहला उद्देश्य सटीक लैंडिंग होना है। इसके लिए आज बहुत सारे काम किए जा रहे हैं, जिसमें नये इंस्ट्रूमेंट को बनाना, बेहतर एल्गोरिदम को बनावा, फेल्योर मोड का ध्यान रखना शामिल है। इसरो ने सीई-20 क्रायोजेनिक इंजन के फ्लाइट एक्सप्टेंस होट टेस्ट को पूरा कर लिया है, जो चंद्रयान -3 के लॉन्च व्हीकल के क्रायोजेनिक अपर स्टेज को पावर देगा। ये होट टेस्ट 25 सेकंड की प्लांड अवधि में तमिलनाडु के महेंद्रगिरि में इसरो प्रोपुलेशन कॉमप्लेक्स की हाई एल्टीट्यूड टेस्ट फैसिलिटी में किया गया था। चंद्रयान-3 लैंडर का भी यू आर राव सैटेलाइट सेंटर में सफल ईएमआई /ईएमसी टेस्ट किया गया था।

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