एबीएन नॉलेज डेस्क। खगोलविदों को हमारे सौर मंडल में तीन ऐसे चंद्रमा दिखे हैं जो पहले अज्ञात थे। इनमें से दो चंद्रमा वरुण और एक चंद्रमा अरुण के चारों ओर चक्कर लगा रहा है। हवाई और चिली में शक्तिशाली भूमि-आधारित दूरबीनों का उपयोग करके दूर स्थित इन छोटे चंद्रमाओं को देखा गया और अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ के लघु ग्रह केंद्र ने शुक्रवार को इसकी घोषणा की।
इसी के साथ वरुण के चारों ओर चक्कर लगा रहे चंद्रमा की ज्ञात संख्या 16 और अरुण के चारों ओर घूम रहे चंद्रमा की ज्ञात संख्या 28 हो गयी है। इस खोज में मदद करने वाले वाशिंगटन स्थित कार्नेगी इंस्टीट्यूशन फॉर साइंस के खगोलशास्त्री स्कॉट शेपर्ड ने बताया कि वरुण के नए चंद्रमाओं में से एक की ज्ञात कक्षीय यात्रा अब तक सबसे लंबी है।
उन्होंने बताया कि छोटे बाह्य चंद्रमा को सूर्य से सबसे दूर स्थित विशाल बर्फीले ग्रह वरुण के चारों ओर एक चक्कर पूरा करने में लगभग 27 साल लगते हैं। उन्होंने बताया कि अरुण की परिक्रमा कर रहा नया चंद्रमा इस ग्रह के चंद्रमाओं में संभवत: सबसे छोटा है और इसका अनुमानित व्यास केवल पांच मील (आठ किलोमीटर) है।
उन्होंने कहा, हमें लगता कि अभी ऐसे कई और छोटे चंद्रमा हो सकते हैं, जिनकी खोज की जानी बाकी है। बता दें कि इससे पहले नासा/ जेपीएल सोलर सिस्टम डायनेमिक्स टीम के अनुसार, हमारे सौर मंडल में ग्रहों की परिक्रमा करने वाले चंद्रमाओं की वर्तमान संख्या 290 है इनमें पृथ्वी के लिए एक चंद्रमा; मंगल ग्रह के लिए दो, बृहस्पति पर 95, शनि पर 146, यूरेनस पर 27, नेप्च्यून पर 14 और बौने ग्रह प्लूटो के लिए 5 है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बताया है कि इनसैट 3डीएस सैटेलाइट सफलतापूर्वक पृथ्वी की जियोसिंक्रोनस कक्षा में स्थापित हो गया है। इसरो ने बताया कि सभी चार लिक्विड एपोजी मोटर फायरिंग पूरी हो गयी हैं।
अब सैटेलाइट के आर्बिट टेस्टिंग लोकेशन पर 28 फरवरी 2024 तक पहुंचने की उम्मीद है। जियोसिंक्रोनस कक्षा में एक नाक्षत्र दिवस 23 घंटे, 56 मिनट और 4 सेकेंड के बराबर होता है। जिसमें सैटेलाइट की कक्षा पृथ्वी के घूर्णन के समान हो जाती है। ये कक्षा गोलाकार या गैर-गोलाकार प्रकार की हो सकती है।
इसरो की सैटेलाइट इनसैट-3डीएस को बीती 17 फरवरी को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से लॉन्च किया गया था। इनसैट-3डीएस को जीएसएलवी एफ-14 लॉन्च व्हीकल से अंतरिक्ष में भेजा गया था।
जीएसएलवी-एफ14 को नॉटी बॉय के नाम से भी जाना जाता है। दरअसल इस जीएसएलवी के 40 फीसदी लॉन्च असफल रहे हैं। यही वजह है कि इस रॉकेट का नाम नॉटी बॉय पड़ गया है।
इनसैट 3डीएस सैटेलाइट एक मौसम उपग्रह है, जो इनसैट-3डी सैटेलाइट का उन्नत स्वरूप है। इनसैट-3डीएस सैटेलाइट की मदद से मौसम संबंधी और प्राकृतिक आपदाओं की सटीक जानकारी मिल सकेगी। इनसैट-3डीएस से समुद्र की सतह और इसके तापमान के मौसम पर पड़ने वाले असर का अध्ययन किया जा सकेगा।
साथ ही इनसैट 3डीएस की मदद से डेटा संग्रह प्लेटफॉर्म्स से डेटा का संग्रह किया जा सकेगा। इनसैट-3डीएस की पूरी फंडिंग भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने की है। इस सैटेलाइट से पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत आने वाले भारतीय मौसम विभाग, नेशनल सेंटर फॉर मीडियम रेंज वेदर फॉरकास्टिंग, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ ट्रॉपिकल मीटियोरोलॉजी, नेशनल इंस्टीट्यूट आफ ओसीन टेक्नोलॉजी, इंडियन नेशनल सेंटर फॉर ओसीन इनफोर्मेशन सर्विस और कई अन्य एजेंसियों को इनसैट-3डीएस से फायदा मिलेगा।
एबीएन नॉलेज डेस्क। हिन्दू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि पर होलिका दहन का पर्व मनाया जाता है। इसके अगले दिन होली का त्योहार होता है।
साल 2024 में होली का त्योहार 25 मार्च को मनाया जायेगा। लेकिन, इस बार की होली कुछ खास है। होली के दिन ही 2024 का पहला चंद्र ग्रहण भी लगेगा, जिसका प्रभाव पर्व पर नजर आने वाला है।
हिंदी पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि यानी 25 मार्च 2024 सोमवार को साल का पहला चंद्र ग्रहण लगेगा। यह चंद्र ग्रहण सुबह 10 बजकर 23 मिनट से शुरू होगा, जो दोपहर 3 बजकर 2 मिनट तक रहेगा। ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि साल का पहला चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देने वाला है। लेकिन, इसका प्रभाव 12 राशि के ऊपर जरूर अवश्य पड़ेगा।
होली के दिन चंद्र ग्रहण कन्या राशि में लगने जा रहा है। इस राशि में राहु पहले से ही विराजमान हैं। इसके चलते कन्या राशि को चंद्र ग्रहण के दिन संभल कर रहने की जरूरत है।।चोट-चपेट की संभावनाएं ज्यादा बढ़ जायेंगी और स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है।
ज्योतिषाचार्य के अनुसार, इस चंद्र ग्रहण को भारत में नहीं देखा जा सकेगा, जिस कारण से इसका सूतक काल भी मान्य नहीं होगा। सूतक मान्य नहीं होने से इसका प्रभाव होली के त्योहार पर नहीं पड़ेगा, इसलिए आप बिना किसी चिंता के होली का त्योहार मना सकते हैं। हालांकि, राशि अनुसार इसका प्रभाव मान्य होगा।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक के बाद एक सफलता हासिल कर रहा है। आज (शनिवार 17 फरवरी) इसरो एक बार फिर से इतिहास रचने जा रहा है। दरअसल, इसरो आज मौसम के बगड़ते मिजाज का पता लगाने वाले एक उपग्रह को लॉन्च करने जा रहा है।
इस सैटेलाइट का कमसद मौसम की सटीक जानकारी देना है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) इस सैटेलाइट का नाम आईएनएसएटी- 3डीएस है। जिसे नॉटी बॉय के के उपनाम से भी जाना जाता है। इस उपग्रह की लॉन्चिंग जियोसिंक्रोनस लॉन्च व्हीकल से की जायेगी।
इसरो के मुताबिक, रॉकेट जीएसएलवी-एफ14 आज यानी शनिवार शाम 5.35 बजे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से उड़ान भरेगा। लॉन्चिंग के करीब 20 मिनट बाद जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर आर्बिट में तैनात हो जायेगा।
इस रॉकेट का ये 16वां मिशन होगा। जिसे स्वदेशी रूप से विकसित किया गया है जो क्रायोजेनिक इंजन का इस्तेमाल करके आज 10वीं बार उड़ान भरेगा।
जानकारी के मुताबिक, इनसैट-3 डीएस उपग्रह भूस्थैतिक कक्षा में स्थापित किए जाने वाला तीसरी पीढ़ी का मौसम विज्ञान उपग्रह का अनुवर्ती मिशन है। जिसे भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा वित्त पोषित किया गया है।
इसरो ने इस संबंध में एक्स पर एक ट्वीट कर कहा कि जीएसएलवी-एफ14/इनसैट-3डीएस मिशन: 17 फरवरी, 2024 को 17.35 बजे प्रक्षेपण के लिए 27.5 घंटे की उल्टी गिनती शुरू हो गयी है।
अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा है : इंटेलिजेंट वही है जो अपने आप को बदलना जानता है। समय के साथ बदलना जरूरी है। जो समय के साथ नहीं चलते वे पीछे छूट जाते हैं। कई क्षेत्रों में अपने आप को बदलने की सख्त जरूरत है। आज पढ़ाई और करियर से संबंधित बदलाव के बारे में बात कर रहा हूं। इस पर गौर करें।
आज करियर की कमी नहीं है। सैकड़ों करियर हैं। कमी है जानकारी की। जरूरत है परंपरागत सोच से बाहर आने की।
मूल मंत्र : लियो टॉलस्टॉय ने कहा है - हर कोई दुनिया बदलने की सोचता है, कोई अपने आप को नहीं बदलता। आज का समय है, अपने आप को बदलने का। आज का युग है- ज्ञान और स्पेशलाइजेशन का। स्मार्टनेस और बोल्डनेस का। अच्छे कम्युनिकेशन स्किल्स का। 12वीं के बाद सोच समझकर जॉब ओरिएंटेड कोर्स करें, अच्छे आॅगेर्नाइजेशन से करें। तभी चूमेगी सफलता आपके कदम।
एबीएन नॉलेज डेस्क। स्वस्तिक अत्यन्त प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति में मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है। इसीलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वास्तिक चिह्न अंकित करके उसका पूजन किया जाता है। स्वस्तिक शब्द सु+अस+क से बना है। सु का अर्थ अच्छा, अस का अर्थ सत्ता या अस्तित्व और क का अर्थ कर्त्ता या करने वाले से है।
इस प्रकार स्वास्तिक शब्द का अर्थ हुआ अच्छा या मंगल करने वाला। अमरकोश में भी स्वस्तिक का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है। अमरकोश के शब्द हैं - स्वास्तिक, सर्वतोऋद्ध अर्थात् सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो।
इस प्रकार सवास्तिक शब्द में किसी व्यक्ति या जाति विशेष का नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण या वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना निहित है। स्वास्तिक शब्द की निरुक्ति है- स्वस्तिक क्षेम कायति, इति स्वस्तिकः अर्थात् कुशलक्षेम या कल्याण का प्रतीक ही स्वस्तिक है।
स्वास्तिक में एक दूसरे को काटती हुई दो सीधी रेखाएं होती हैं, जो आगे चलकर मुड़ जाती हैं। इसके बाद भी ये रेखाएं अपने सिरों पर थोड़ी और आगे की तरफ मुड़ी होती हैं। स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती है।
प्रथम स्वस्तिक, जिसमें रेखाएं आगे की ओर इंगित करती हुई हमारे दायीं ओर मुड़ती हैं। इसे स्वास्तिक कहते हैं। यही शुभ चिह्न है, जो हमारी प्रगति की ओर संकेत करता है। दूसरी आकृति में रेखाएं पीछे की ओर संकेत करती हुई हमारे बायीं ओर मुड़ती हैं। इसे वामावर्त स्वस्तिक कहते हैं। भारतीय संस्कृति में इसे अशुभ माना जाता है।
जर्मनी के तानाशाह हिटलर के ध्वज में यही वामावर्त स्वस्तिक अंकित था। ऋग्वेद की ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गयी है। सिद्धान्त सार ग्रन्थ में उसे विश्व ब्रह्माण्ड का प्रतीक चित्र माना गया है।
उसके मध्य भाग को विष्णु की कमल नाभि और रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित किया गया है। अन्य ग्रन्थों में चार युग, चार वर्ण, चार आश्रम एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार प्रतिफल प्राप्त करने वाली समाज व्यवस्था एवं वैयक्तिक आस्था को जीवन्त रखने वाले संकेतों को स्वस्तिक में ओत-प्रोत बताया गया है।
मंगलकारी प्रतीक चिह्न स्वस्तिक अपने आप में विलक्षण है। यह मांगलिक चिह्न अनादि काल से सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त रहा है। अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक को मंगल- प्रतीक माना जाता रहा है।
विघ्नहर्ता गणेश की उपासना धन, वैभव और ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी के साथ भी शुभ लाभ, स्वास्तिक तथा बहीखाते की पूजा की परम्परा है। इसे भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान प्राप्त है। इसीलिए जातक की कुण्डली बनाते समय या कोई मंगल व शुभ कार्य करते समय सर्वप्रथम स्वस्तिक को ही अंकित किया जाता है।
घर के मुख्य दरवाजे पर स्वास्तिक मुख्य द्वार के ऊपर मध्य में और शुभ और लाभ बाईं और दाईं तरफ लिखते हैं। स्वास्तिक की दोनों अलग-अलग रेखाएं गणपति जी की पत्नी रिद्धि-सिद्धि को दर्शाती हैं।
राजकुमारी पाण्डेय
एबीएन सोशल डेस्क। सनातन धर्म में प्राचीन काल से पूजा-पाठ को महत्व दिया जाता है। जिसके लिए लोग मंदिरों में जाते हैं। सभी मंदिरों में गर्भ गृह के सामने आपको घंटिया दिखाई देंगी।
आमतौर पर लोग मंदिर के अंदर जाते ही पहले घंटी बजाते हैं। इतना ही नहीं हिंदू धर्म में मंदिरों के बाहर घंटी बांधने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। लेकिन क्या आपको पता है कि आखिर क्यों मंदिर में जाने से पहले घंटी बजायी जाती है?
दरअसल, सुबह और शाम के समय मंदिरों में पूजा और आरती होती है।जब आरती होती है तो मंदिर परिसर में विशेष लय और धुन में छोटी-छोटी घंटियां बजाई जाती हैं। धार्मिक मान्यता के मुताबिक जब मंदिरों में घंटी बजायी जाती हैं तो मंदिर में स्थापित भगवान की प्रतिमा में चेतना जागृत होने लगती है। उस दौरान पूजा-पाठ करना काफी फलदाई माना जाता है।
इतना ही नहीं पुराणों में भी बताया गया है कि मंदिर में घंटी बजाने से मनुष्य के कई जन्मों का पाप खत्म हो जाता है।धार्मिक मान्यता के साथ-साथ मंदिर में घंटी बजाने के पीछे वैज्ञानिक वजह भी है।
वैज्ञानिक मान्यता के मुताबिक जब किसी मंदिर में घंटी बजती है तो वातावरण में कंपन होता और यह वायुमंडल की वजह से काफी दूर तक जाता है। उस दौरान जहां तक घंटी की आवाज सुनाई देती है वहां आसपास जीवाणु विषाणु सब खत्म हो जाते हैं।
जिससे मंदिर और उसके आसपास का वातावरण भी शुद्ध होता है। इतना ही नहीं धार्मिक मान्यता के मुताबिक मंदिर में घंटी बजाने से नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं। इससे लोगों के सुख और समृद्धि के द्वार भी खुलते है।
अयोध्या के प्रसिद्ध कथा वाचक और संत समिति के महामंत्री पवन दास शास्त्री बताते हैं कि घंटी बजाने से जो घंटी का कंपन है वह शरीर के अंदर चैतन्यता को जागृत कर देता है। दूसरी बात यह है कि हम जिस देवता का दर्शन करने जा रहे हैं उस देवता में भी चैतन्यता का संचार हो जाये।
इतना ही नहीं पूरे वातावरण में चैतन्यता का संचार हो इसलिए मठ मंदिरों में घंटी बजाने का विधान है। घंटी हमेशा फूल की ही बनी होती है। जिसको कांसा कहा जाता है उसके कंपन से सबको चैतन्यता मिलती है।
एबीएन सोशल डेस्क। अयोध्या में बन रहे भव्य राम मंदिर के उद्घाटन की तैयारियां जोरों से चल रही हैं और इसकी गूंज विदेशों तक पहुंच गयी है। देशवासियों की नहीं बल्कि पूरी दुनिया की नजर 22 जनवरी को होने वाले वाले राम मंदिर के उद्घाटन समारोह पर टिकी हैं। यही वजह है कि #अयोध्या राम मंदिर ट्रैंड कर रहा है। राम मंदिर ने धार्मिक पर्यट को नया आयाम दे दिया है।
धार्मिक स्थलों के बारे में जानने के इच्छुक दुनिया भर के लोगों में राम मंदिर को लेकर अलग के्रज है और अयोध्या राम मंदिर को सर्च करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के फैसले के बाद से तो यहां के बारे में जानने वालों की संख्या आसमान छू गयी।
राम मंदिर के उद्घाटन की तिथि के आ जाने के अयोध्या के बारे में सर्च करने वालों की संख्या 1806 फीसदी बढ़ी थी। अयोध्या के बारे में सबसे ज्यादा सर्च 30 दिसंबर को की गयी। इस दिन अयोध्या एयरपोर्ट का उद्घाटन हुआ था और साथ ही अयोध्या के पुनर्निर्मित रेलवे स्टेशन से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 नयी नवेली अमृत भारत एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखायी थी।
आनलाइन ट्रेवल प्लेटफॉर्म मेक माय ट्रिप के अनुसार, पिछले दो साल में धार्मिक जगहों के बारे में सर्च करने वालों की संख्या लगभग 97 फीसदी बढ़ गयी है। साल 2021 से 2023 के बीच लोग यात्राओं के लिए धार्मिक स्थलों को प्राथमिकता दे रहे हैं। इनमें भी आकर्षण का केंद्र अयोध्या और वहां बन रहा राम मंदिर है।
मेक माय ट्रिप के आंकड़ों के अनुसार, फिलहाल अयोध्या के बारे में लोग सबसे ज्यादा सर्च कर रहे हैं। यह आंकड़ा 585 फीसदी तक बढ़ चुका है। कंपनी के अनुसार, अमेरिका से 22.5 फीसदी और खाड़ी देशों से 22.2 फीसदी सर्च इस बारे में की गयी। इसके अलावा कनाडा, नेपाल और आस्ट्रेलिया के लोग भी अयोध्या और राम मंदिर के बारे में जानना चाह रहे हैं।
कंपनी के आनलाइन आंकड़ों के मुताबिक लोगों में धार्मिक यात्राएं करने की रुचि तेजी से बढ़ी है। पिछले 2 सालों में लोगों की प्राथमिकताएं तेजी से बदली हैं। अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण से यह सोच और ज्यादा मजबूत होती जा रही है।
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