एबीएन सेंट्रल डेस्क। सोशल मीडिया यूजर्स को अचानक उस समय झटका लग गया जब देश और दुनिया में व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम डाउन हो गया। जिसकी वजह से यूजर्स को मैसेज भेजने और प्राप्त करने में परेशानी उठानी पड़ी। खबरों की मानें तो करीब आधे घंटे वॉट्सएप सेवाएं बाधित रही। सर्वर डाउन होने की वजह से दुनिया भर के करोड़ों यूजर्स को मैसेज भेजने में परेशानी का सामना करना पड़ा।
बताते चलें कि पिछले ही महीने फेसबुक, इंस्टाग्राम डाउन हो गया था। ऐप डाउन होने के तुरंत बाद एक्स पर #व्हाट्सएप्प डाउन और #इंस्टाग्राम डाउन ट्रेंड करने लगे। व्हाट्सऐप बुधवार को रात करीब 11:45 बजे बड़े पैमाने पर बंद हो गया। इससे दुनिया भर में यूजर्स प्रभावित हुए।
ऐप या उसके वेब वर्जन को खोलने की कोशिश करने वालों को एक एरर मैसेज मिला जिसमें कहा गया था कि सेवा अनुपलब्ध है।
एक्स सहित विभिन्न सोशल मीडिया पर, उपयोगकर्ताओं ने मैसेजिंग एप्लिकेशन पर साथ आने वाली समस्याओं के बारे में पोस्ट किया। वेबसाइट मॉनिटरिंग सेवा डाउनडिटेक्टर ने इस दौरान व्हाट्सऐप कनेक्टिविटी को लेकर समस्याओं में वृद्धि दर्ज की।
बीते महीने यानी 5 फरवरी को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक और इंस्टाग्राम सर्वर अचानक से डाउन हो गया था। ज्यादातर लोग इंस्टाग्राम और फेसबुक नहीं चला पा रहे थे। कुछ यूजर्स फेसबुक से अचानक साइन आउट हो गये थे। इस आउटेज का असर इंस्टाग्राम के साथ-साथ मैसेंजर पर भी पड़ रहा था।
टीम एबीएन । संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम द्वारा जारी नई रिपोर्ट ‘फूड वेस्ट इंडेक्स रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में हर साल करीब 7.8 करोड़ टन से ज्यादा भोजन कचरे में फैंक दिया जा रहा है। प्रति व्यक्ति के हिसाब से देखें तो देश में सालाना औसतन 55 किलोग्राम भोजन बर्बाद किया जाता है। यह आंकड़े घरों में हो रहे फूड वेस्ट से जुड़े हैं। इससे पहले 2021 में जारी फूड वेस्ट इंडेक्स रिपोर्ट में प्रति व्यक्ति बर्बाद किए जा रहे भोजन का यह आंकड़ा सालाना 50 किलोग्राम दर्ज किया गया था। वहीं यदि भारत में उस साल घरों के कुल फूड वेस्ट 6.88 करोड़ टन दर्ज किया गया।
दुनिया भर में 105 टन भोजन की बर्बादी
संयुक्त राष्ट्र फूड वेस्ट इंडेक्स रिपोर्ट 2024 में जारी यदि वैश्विक आंकड़ों को देखें तो सालाना कुल खाद्य उत्पादन का 19 फीसदी बर्बाद हो रहा है, जो करीब 105.2 करोड़ टन के बराबर है। दूसरी ओर दुनिया में 78.3 करोड़ लोग खाली पेट सोने को मजबूर हैं। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया का हर व्यक्ति सालाना करीब 79 किलोग्राम भोजन बर्बाद कर रहा है, जो दुनिया में प्रतिदिन 100 करोड़ थालियों जितने आहार के बर्बाद होने के बराबर है। रिपोर्ट में हैरान कर देने वाली बात यह सामने आई है कि एक तरफ तो जहां कई अफ्रीका देश भुखमरी का सामना कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ नाइजीरिया जैसे देश भी हैं जहां हर व्यक्ति साल में करीब 113 किलोग्राम भोजन बर्बाद कर देता है। इसी तरह मिस्र में हर व्यक्ति औसतन 163 किलोग्राम भोजन बर्बाद हो रहा है। वहीं तंजानिया में यह आंकड़ा 152 और रवांडा में 141 दर्ज किया गया है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने वायु सेना के चिनूक हेलिकॉप्टर की मदद से शुक्रवार को रीयूजेबल लॉच व्हीकल पुष्पक की सफल लैंडिंग करायी।
पुष्पक की सफल लैंडिंग के बाद वायु सेना ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर एक पोस्ट में लिखा कि उसने इस अभियान के लिए चिनूक हेलिकॉप्टर की मदद ली। वायु सेना ने इस अभियान का वीडियो जारी करते हुए कहा कि पुष्पक को वायु सेना के चिनूक हेलिकॉप्टर में साढे चार किलोमीटर की निर्धारित ऊंचाई और निश्चित स्थान पर ले जाकर छोड़ा गया।
इसके बाद इसरो ने इस यान की सफल लैंडिंग करायी। वायु सेना ने इस उपलब्धि के लिए इसरो को बधाई दी है। वायु सेना ने कहा है कि उसके सैनिक भविष्य में भी इस तरह के अभियानों में महत्वपूर्ण योगदान देते रहेंगे।
एबीएन नॉलेज डेस्क। रिसर्च रिपोर्ट कहती है, गैस से चलने वाली कारों के मुकाबले इलेक्ट्रिक व्हीकल के ब्रेक और टायर 1850 गुना ज्यादा प्रदषण फैलाते हैं। स्टडी इसलिए चौंकाती है क्योंकि अब तक माना जाता रहा है कि पेट्रोल और डीजल के मुकाबले इलेक्ट्रिक व्हीहल प्रदूषण के मामले में ज्यादा सुरक्षित हैं।
आमतौर पर माना जाता है कि इलेक्ट्रिक वाहन पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं क्योंकि इनसे प्रदूषण कम फैलता है, लेकिन इस पर हुई रिसर्च रिपोर्ट चौंकाती है। एमिशन डाटा का एनालिसिस करने वाली फर्म एमिशन एनालिटिक्स ने एक स्टडी करायी। स्टडी में यह पता करने की कोशिश की गयी कि गैस और दूसरे ईधन के मुकाबले ईवी यानी इलेक्ट्रिक व्हीकल पर्यावरण के लिए कितने सुरक्षित है।
रिसर्च के नतीजों में चौंकाने वाले परिणाम सामने आए। रिसर्च रिपोर्ट कहती है, गैस से चलने वाली कारों के मुकाबले इलेक्ट्रिक व्हीकल के ब्रेक और टायर 1850 गुना ज्यादा प्रदषण फैलाते हैं। स्टडी इसलिए चौंकाती है क्योंकि अब तक माना जाता रहा है कि पेट्रोल और डीजल के मुकाबले इलेक्ट्रिक व्हीहल प्रदूषण के मामले में ज्यादा सुरक्षित हैं। ये ग्रीन हाउस गैसों का कम उत्सर्जन करते हैं। लेकिन नई रिसर्च ने इस पर खुलासे किये हैं। इसके साथ ही इनकी वजह भी बताई है।
एमिशन एनालिटिक्स की रिपोर्ट कहती है, इलेक्ट्रिक वाहनों का वजन ज्यादा होता है। वजन ज्यादा होने के कारण इसके टायर जल्दी घिसते हैं। यानी तेजी से इनकी उम्र घटती है। ये हवा में नुकसान पहुंचाने वाले केमिकल रिलीज करते हैं। ज्यादातर टायर क्रूड आॅयल से निकले सिंथेटिक रबर से तैयार किए जाते हैं। ये प्रदूषण की वजह बनते हैं।
पेट्रोल इंजन के मुकाबले एश् की बैटरी ज्यादा भारी होती है। यह अतिरिक्त वजन ही ब्रेक और टायर पर पड़ता हैऔर इनकी उम्र तेजी से कम होती है। रिसर्च रिपोर्ट में टेस्ला के मॉडल और फोर्ड एफ-150 लाइटनिंग का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि दोनों ही गाड़ियों में करीब 1800 पाउंड की बैटरी लगी है। पेट्रोल कार के मुकाबले इन इलेक्ट्रिक वाहनों में लगी आधे टन की इस बैटरी से 400 गुना अधिक उत्सर्जन होता है। इस तरह सुरक्षित माने जाने वाले इलेक्ट्रिक वाहन भी प्रदूषण से मुक्त नहीं हैं।
रिसर्च रिपोर्ट में इलेक्ट्रिक वाहनों में इस्तेमाल होने वाली बैटरी पर चिंता जतायी गयी है। कहा गया है कि पर्यावरण को सुरक्षित रखने के बैटरी को डिकम्पोज करना भी जरूरी है। अगर बैटरी को ठीक से खत्म नहीं किया जाता है तो पर्यावरण के लिए खतरा बढ़ता है। इसलिए ईवी की बैटरी भी अहम पहलू है।
इससे पहले हुई रिसर्च में बैटरी को डिकम्पोज करने के लिए बरती जाने वाली लापरवाही को पर्यावरण के लिए खतरा बताया जा चुका है। इस तरह कहा जा सकता है कि पर्यावरण के लिए अब तक सुरक्षित माने जाने वाले ईवी उतने भी सुरक्षित नहीं हैं, इनको लेकर जितना दावा किया जाता है। यही वजह है कि इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर हुई यह स्टडी चौंकाती है और पर्यावरण को सुरक्षित बनाने की दिशान में अलर्ट भी करती है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। दुनिया के कारोबार में अपने पैर तेजी से जम रही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कई लोगों को बेरोजगार कराने की कगार पर है। जहां इस टेक्नाॅलजी का ढेरों फायदें है वहीं इसके नुकसान से आम आदमी का जीवन खतरे में है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जहां साइबर ठगी के मामले बढ़ गये हैं। वहीं इसने डीप फेक जैसे नए फ्रॉड के तरीकों से लाखों की जिंदगी को जोखिम में डाल दिया है।
वहीं, एक्सपर्ट्स ने बड़े पैमाने पर एआई से नौकरियां जाने की आशंका जतायी है।
खासतौर पर आईटी इंडस्ट्री की संस्था नासकॉम के चेयरमैन राजेश नांबियार ने चेतावनी और चिंता जाहिर करते हुए बताया कि इससे सबसे बड़ा खतरा बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग यानी बीपीओ सेक्टर पर है।
अगर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने बीपीओ सेक्टर में नौकरियों की जगह लेना शुरू कर दिया तो कई लोगों की नौकरियां खत्म हो जायेंगी। हालांकि राजेश नांबियार ने कहा है कि इससे भारतीय टेक इंडस्ट्री के मुख्य आधार सॉफ्टवेयर सर्विस इंडस्ट्री के कर्मचारियों को ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है। हालांकि देश की जीडीपी में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखने वाले 250 अरब डॉलर के भारतीय टेक सेक्टर की नौकरियों पर भी एआई का असर जरूर पड़ेगा।
नांबियार के मुताबिक, अगर आईटी सेक्टर में लोगों को नौकरी बचानी है तो उन्हें एआई का इस्तेमाल करना सीखना होगा। इसी वजह से ज्यादातर आईटी सर्विस देने वाली कंपनियां अपने कर्मचारियों को एआई में ट्रेन करने के लिए निवेश कर रही हैं।
कंपनियों को पता है कि आने वाले समय में अपने क्लाइंट्स की डिमांड को आसानी से पूरा करने के लिए एआई का सहारा लेना पड़ेगा। नांबियार ने कहा कि जेनरेटिव एआई ऑफिस वाली नौकरियों पर ज्यादा असर डालेगा। हर कंपनी इस एआई तकनीक का इस्तेमाल कर अपनी लागत घटायेगी और मुनाफा ज्यादा बटोरेगी।
उन्होंने कहा कि एआई आने वाले 5-10 सालों में काफी पैर पसार लेगी। इतना ही नहीं ब्रोकरेज में इक्विटी एनालिस्ट या statistician की नौकरी पर एआई संकट पैदा कर सकता है।
एबीएन सेट्रल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार को पश्चिम बंगाल के दौरे पर रहे। इस दौरान पीएम ने राजधानी कोलकाता में 15,400 करोड़ रुपये की कई कनेक्टिविटी परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया। अपने दौरे में पीएम मोदी ने छह नयी मेट्रो ट्रेनों को हरी झंडी दिखायी। इसमें भारत की पहली अंडरवॉटर मेट्रो रेल परियोजना भी शामिल है।
आइये तस्वीरों में जानते हैं कोलकाता में शुरू की गयी अंडरवॉटर मेट्रो रेल परियोजना क्या है? इसका निर्माण कब शुरू हुआ था? परियोजना कहां से कहां तक के लिए है? इसकी खासियत क्या है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को कोलकाता में अंडरवाटर मेट्रो ट्रेन को हरी झंडी दिखायी गयी। यह परियोजना हावड़ा मैदान और एस्प्लेनेड के बीच चालू हुई है।
इसके साथ भारत में नदी के नीचे पहली सुरंग भी यातायात के लिए खुल जाएगी। उद्घाटन के बाद प्रधानमंत्री ने अंडरवॉटर मेट्रो रेल की सवारी भी की। अंडरवाटर मेट्रो रेल ईस्ट-वेस्ट मेट्रो गलियारा का हिस्सा है। कोलकोता में इस गलियारे का काम 2009 में शुरू हुआ। मार्च 2024 में भारत की पहली अंडरवॉटर मेट्रो रेल सेवा शुरू हो गई।
अंडरवाटर मेट्रो में यात्रियों को कई सुविधाएं मिलेंगी। टिकट के दाम 5 रुपये से लेकर 50 रुपये तक होंगे।ईस्ट-वेस्ट मेट्रो गलियारा परियोजना के तहत हुगली नदी के नीचे हावड़ा मैदान मेट्रो स्टेशन बना है। स्टेशन सतह से 33 मीटर नीचे बना हावड़ा मैदान भारत का सबसे गहरा मेट्रो स्टेशन है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। खगोलविदों को हमारे सौर मंडल में तीन ऐसे चंद्रमा दिखे हैं जो पहले अज्ञात थे। इनमें से दो चंद्रमा वरुण और एक चंद्रमा अरुण के चारों ओर चक्कर लगा रहा है। हवाई और चिली में शक्तिशाली भूमि-आधारित दूरबीनों का उपयोग करके दूर स्थित इन छोटे चंद्रमाओं को देखा गया और अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ के लघु ग्रह केंद्र ने शुक्रवार को इसकी घोषणा की।
इसी के साथ वरुण के चारों ओर चक्कर लगा रहे चंद्रमा की ज्ञात संख्या 16 और अरुण के चारों ओर घूम रहे चंद्रमा की ज्ञात संख्या 28 हो गयी है। इस खोज में मदद करने वाले वाशिंगटन स्थित कार्नेगी इंस्टीट्यूशन फॉर साइंस के खगोलशास्त्री स्कॉट शेपर्ड ने बताया कि वरुण के नए चंद्रमाओं में से एक की ज्ञात कक्षीय यात्रा अब तक सबसे लंबी है।
उन्होंने बताया कि छोटे बाह्य चंद्रमा को सूर्य से सबसे दूर स्थित विशाल बर्फीले ग्रह वरुण के चारों ओर एक चक्कर पूरा करने में लगभग 27 साल लगते हैं। उन्होंने बताया कि अरुण की परिक्रमा कर रहा नया चंद्रमा इस ग्रह के चंद्रमाओं में संभवत: सबसे छोटा है और इसका अनुमानित व्यास केवल पांच मील (आठ किलोमीटर) है।
उन्होंने कहा, हमें लगता कि अभी ऐसे कई और छोटे चंद्रमा हो सकते हैं, जिनकी खोज की जानी बाकी है। बता दें कि इससे पहले नासा/ जेपीएल सोलर सिस्टम डायनेमिक्स टीम के अनुसार, हमारे सौर मंडल में ग्रहों की परिक्रमा करने वाले चंद्रमाओं की वर्तमान संख्या 290 है इनमें पृथ्वी के लिए एक चंद्रमा; मंगल ग्रह के लिए दो, बृहस्पति पर 95, शनि पर 146, यूरेनस पर 27, नेप्च्यून पर 14 और बौने ग्रह प्लूटो के लिए 5 है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बताया है कि इनसैट 3डीएस सैटेलाइट सफलतापूर्वक पृथ्वी की जियोसिंक्रोनस कक्षा में स्थापित हो गया है। इसरो ने बताया कि सभी चार लिक्विड एपोजी मोटर फायरिंग पूरी हो गयी हैं।
अब सैटेलाइट के आर्बिट टेस्टिंग लोकेशन पर 28 फरवरी 2024 तक पहुंचने की उम्मीद है। जियोसिंक्रोनस कक्षा में एक नाक्षत्र दिवस 23 घंटे, 56 मिनट और 4 सेकेंड के बराबर होता है। जिसमें सैटेलाइट की कक्षा पृथ्वी के घूर्णन के समान हो जाती है। ये कक्षा गोलाकार या गैर-गोलाकार प्रकार की हो सकती है।
इसरो की सैटेलाइट इनसैट-3डीएस को बीती 17 फरवरी को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से लॉन्च किया गया था। इनसैट-3डीएस को जीएसएलवी एफ-14 लॉन्च व्हीकल से अंतरिक्ष में भेजा गया था।
जीएसएलवी-एफ14 को नॉटी बॉय के नाम से भी जाना जाता है। दरअसल इस जीएसएलवी के 40 फीसदी लॉन्च असफल रहे हैं। यही वजह है कि इस रॉकेट का नाम नॉटी बॉय पड़ गया है।
इनसैट 3डीएस सैटेलाइट एक मौसम उपग्रह है, जो इनसैट-3डी सैटेलाइट का उन्नत स्वरूप है। इनसैट-3डीएस सैटेलाइट की मदद से मौसम संबंधी और प्राकृतिक आपदाओं की सटीक जानकारी मिल सकेगी। इनसैट-3डीएस से समुद्र की सतह और इसके तापमान के मौसम पर पड़ने वाले असर का अध्ययन किया जा सकेगा।
साथ ही इनसैट 3डीएस की मदद से डेटा संग्रह प्लेटफॉर्म्स से डेटा का संग्रह किया जा सकेगा। इनसैट-3डीएस की पूरी फंडिंग भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने की है। इस सैटेलाइट से पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत आने वाले भारतीय मौसम विभाग, नेशनल सेंटर फॉर मीडियम रेंज वेदर फॉरकास्टिंग, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ ट्रॉपिकल मीटियोरोलॉजी, नेशनल इंस्टीट्यूट आफ ओसीन टेक्नोलॉजी, इंडियन नेशनल सेंटर फॉर ओसीन इनफोर्मेशन सर्विस और कई अन्य एजेंसियों को इनसैट-3डीएस से फायदा मिलेगा।
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