एबीएन नॉलेज डेस्क। एक टूटे चीनी रॉकेट का 3 टन वजनी कचरा 9,300 किमी प्रति घंटे की रफ्तार के साथ चांद की सतह से टकराने वाला है। इस दौरान चांद पर इतना बड़ा गड्ढा हो सकता है, जिसमें ट्रैक्टर जितने बड़े कई वाहन समा सकते हैं। चांद की यह सतह ऐसी जगह पर मौजूद है जहां धरती की दूरबीनों की नजर तक नहीं पड़ सकती है। यहां तक कि उपग्रह से लिए गए चित्रों की पुष्टि में भी कई हफ्ते या माह लग सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन का यह रॉकेट करीब एक दशक पहले अंतरिक्ष में छोड़ा गया था और तभी से यह अंतरिक्ष में इधर-उधर भटक रहा है। हालांकि चीनी अधिकारियों ने इस रॉकेट के चीन का होने पर संदेह जताया है। लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि इस टक्कर से चांद की सतह पर 10 से 20 मीटर का गड्ढा हो जाएगा और चांद की धूल उड़कर सतह पर सैकड़ों किलोमीटर दूर तक फैल जाएगी। पृथ्वी के पास ही अंतरिक्ष में तैर रहे कचरे पर नजर रखना तुलनात्मक रूप से आसान होता है। गहरे अंतरिक्ष में भेजी जाने वाली चीजों के किसी दूसरी चीज से टकराने की संभावना भी कम होती है और उन्हें अक्सर जल्दी ही भुला भी दिया जाता है। लेकिन यह रॉकेट चांद की उस दिशा में है जो पृथ्वी से दिखाई नहीं देता है। चीन ने इस सतह पर तीन वर्ष पहले एक सैटेलाइट लांच करने में सफलता पाई है। बिल ग्रे ने लगाया इस कचरे का पता : सिर्फ शौकिया तौर पर खगोलीय जासूस की भूमिका निभा रहे मुट्ठी भर अंतरिक्ष पर्यवेक्षक ऐसे कचरे पर नजर रखते हैं। इसी तरह के एक पर्यवेक्षक बिल ग्रे ने जनवरी में इस रॉकेट के चांद से टकराने के मार्ग का पता लगाया। ग्रे एक गणितज्ञ और एक भौतिकशास्त्री हैं। शुरू में उन्होंने स्पेसएक्स को इसका जिम्मेदार माना था, लेकिन बाद में ग्रे ने एक माह बाद बताया कि अब वे जान चुके हैं कि वह रहस्यमयी चीज कुछ और है। चीन बोला- वह रॉकेट जल चुका है : बिल ग्रे ने बताया, संभव है कि वो एक चीनी रॉकेट का तीसरा चरण है जिसने 2014 में चांद पर एक परीक्षण कैप्सूल भेजा था। कैप्सूल वापस आ गया लेकिन रॉकेट उसके बाद भटकता ही रहा। हालांकि चीनी अफसरों ने कहा, वह रॉकेट पृथ्वी के वायुमंडल में लौटने के बाद जल गया था। लेकिन एक जैसे नाम वाले दो चीनी मिशन थे जिनमें एक यह परीक्षण उड़ान थी और दूसरी 2020 का चांद की सतह से पत्थरों के सैंपल लाने वाला मिशन। इस संबंध में धरती के पास अंतरिक्षीय कचरे पर नजर रखने वाले अमेरिकी कमांड ने बुधवार को बताया कि 2014 के मिशन वाला चीनी रॉकेट कभी धरती के वायुमंडल में लौटा ही नहीं।
एबीएन डेस्क। गूगल एक शार्ट नाम है, गूगल का पूरा नाम “GLOBAL ORGANIZATION OF ORIENTED GROUP LANGUAGE OF EARTH" है। सर्च इंजन के साथ साथ गूगल एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनी है, एडवरटाईजमेंट, Analytics, Cloud Computing, Play Store, अपना खुद का ब्राउज़र यहा तक कि अपना खुद का ऑपरेटिंग सिस्टम (एंड्राइड) भी है और गूगल इन सभी से पैसा कमाती है। गूगल की शुरुआत : लैरी पेज और सर्गेई ब्रिन ने शुरुआत में अपने सर्च इंजन का नाम बैकरब रखा था। इस नाम के रखने की वजह ये थी, कि यह सर्च इंजन पिछली कड़ियों के आधार पर किसी साइट की प्रायोरिटी तय करता था, Google.com डोमेन को 15 सितंबर, 1997 को पंजीकृत किया गया था और इसे 4 सितंबर 1988 को शुरू किया गया, Edword kasner और James Newman के द्वारा लिखी गई एक किताब जिसका नाम Mathemetics and Immagination मे लिखे गये एक शब्द गूगल से प्रेरित हो कर रखा था इसका मतलब वह नंबर जिसमें एक के बाद सौ शून्य हों। जिस समय बनाया गया था, उस समय सर्च इंजन का रिजल्ट, पेज की प्रॉयोरिटी पर निर्भर करता था, जो वेब पेज पर की वर्ड की गणना से तय करते थ, लेकिन लैरी और सर्गेई के अनुसार एक बेहतर सर्च सिस्टम वह है, जो वेब पेज के संबंध में पूरी जानकारी दे, इस नए तकनीक को उन्होनें पेजरैंक का नाम दिया।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। व्हाट्सऐप ने जनवरी 2022 के दौरान 18.58 लाख भारतीय खातों को प्रतिबंधित किया है। कंपनी ने मंगलवार को जारी अपनी मासिक रिपोर्ट में यह जानकारी दी। कंपनी ने नियमों का उल्लंघन करने वालों को रोकने और उनका पता लगाने के लिए अपने शिकायत विभाग तथा अपने तंत्र के जरिए उपयोगकर्ताओं से प्राप्त शिकायतों के आधार पर यह कार्रवाई की है। व्हाट्सऐप को 495 भारतीय खातों के खिलाफ शिकायतें मिलीं, जिसमे से 285 खातों को बंद करने की अपील की गई थी और उसमे से 24 को प्रतिबंधित कर दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार 18.58 लाख खातों में से ज्यादातर को कंपनी ने अपने संसाधनों के जरिये हानिकारक व्यवहार के आधार पर प्रतिबंधित किया है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। यूक्रेन पर रूसी हमले को लेकर सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्री पर शिकंजा कसते हुए गूगल समेत प्रमुख तकनीकी कंपनियां रूस की सरकारी मीडिया को अपने मंचों का उपयोग करने से रोकने की तरफ कदम बढ़ा रही हैं ताकि वे दुष्प्रचार एवं गलत सूचनाओं को प्रसार नहीं कर सकें। गूगल ने मंगलवार को घोषणा की कि वह यूरोप में ऐसे यूट्यूब चैनल को तत्काल प्रभाव से ब्लॉक कर रहा है। हालांकि, साफ किया कि इसे पूरी तरह प्रभावी होने में थोड़ा समय लगेगा। इसके अलावा, सोशल मीडिया मंचों का संचालन करने वाली अमेरिका की अन्य प्रमुख कंपनियों ने भी क्रेमलिन (रूसी राष्ट्रपति कार्यालय) की पहुंच को सीमित करने को लेकर जबरदस्त बदलाव किए हैं। इसके तहत ट्विटर ने इनके द्वारा साझा की गई सामग्री पर एक लेबल लगाया है ताकि लोगों को पता चल सके कि ये सामग्री रूसी सरकार द्वारा प्रसारित है। इससे इतर आर्थिक झटका देते हुए रूसी मीडिया के चैनल की विज्ञापन से होने वाली आय में भी कटौती की जा रही है। फेसबुक की पूर्व जननीति निदेशक केटी हारबथ का कहना है कि अमेरिकी कंपनियों द्वारा उठाए गए ये कदम क्रेमलिन द्वारा कथित तौर पर सोशल मीडिया मंचों का सहारा लेकर दुष्प्रचार करने से रोकना है। फेसबुक और इंस्टाग्राम का संचालन करने वाली कंपनी मेटा ने सोमवार को घोषणा की कि वह यूरोप में रूस की रशिया टुडे (आरटी) और स्पुतनिक सेवाओं की पहुंच को सीमित करेगी। इसके बाद गूगल ने भी मंगलवार को यूरोप में इन दोनों सेवाओं के यूट्यूब चैनल प्रतिबंधित करने का ऐलान किया। हालांकि, आरटी और अन्य रूसी सरकारी मीडिया के फेसबुक पेज अमेरिका में प्रभावित नहीं हुए हैं।
एबीएन डेस्क। विश्व में सबसे पहले सूरज कहां निकलता है, इसका जवाब आसान नहीं है; क्योंकि धरती घूम रही है। ऐसे में धरती का कौन सा इलाका सूर्य के सबसे पहले आता है यह बताना काफी मुश्किल है। हालांकि अब मनुष्य ने अपने हिसाब से धरती को अक्षांश, देशांतर के रूप में विभाजित किया है। साथ ही पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण चार दिशाएं भी तय की हैं। दुनिया में जापान का मिनामी तोरीशीमा धुर पूर्व में है। इसलिए वहां सबसे पहले सूर्योदय मान सकते हैं। अभी तक जापान को सबसे पहले सूर्योदय की धरती माना जाता था लेकिन सभी देशों ने GMT (Greenwich Mean Time) के टाइम को मान्यता दे दी है। ऐसे में न्यूज़ीलैंड अपने आप सूर्योदय की धरती बन गयी है। एक तरफ जहां न्यूज़ीलैंड का समय GMT+13 है। वहीं दूसरी तरफ जापान का समय GMT+9 है। जिस वक्त न्यूज़ीलैंड में सुबह के 6 बज रहे होते हैं, उस वक्त जापान में रात के 2 बज रहे होते हैं। इसके अलावा जब भी न्यू इयर यानी नए साल की बात आती है, तो सबसे पहले न्यूज़ीलैंड में न्यू इयर मनाया जाता है। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों में मनाया जाता है। ऐसे में नए टाइम जोन के अनुसार दुनिया में सबसे पहले सूरज न्यूज़ीलैंड में निकलता है। तो अब आप जान गए होंगे कि विश्व में सबसे पहले सूरज कहां निकलता है। पुराने जमाने में जापान को सूर्योदय की धरती मानी जाती थी। लेकिन अब नए टाइम जोन GMT के अनुसार न्यूज़ीलैंड वह देश है जहां सबसे पहले सूर्योदय होता है। भारत की बात करें, तो अरुणाचल प्रदेश वह राज्य है जहां सबसे पहले सूरज निकलता है। इस राज्य में डोंग वैली की देवांग घाटी में सबसे पहले सूर्य उगता है। इसे देखने देश विदेश से पर्यटक आते रहते हैं।
एबीएन डेस्क। टायर का रंग काला क्यों होता है लाल, पीला या सफ़ेद क्यों नहीं होता? तो आज हम आपको इसी बारे में बताने जा रहे हैं और इसके पीछे का कारण भी बतायेंगे। टायर की बात करें तो हर आदमी इस चीज से वाकिफ होगा क्योंकि टायर किसी भी वाहन का प्रमुख अंग है। टायर की वजह से ही एक वाहन लम्बा सफ़र तय कर पाते हैं। लेकिन टायर को देखकर भी यही सवाल उठता है कि ये टायर काले क्यों होते हैं और अब तो टेक्नोलॉजी में काफी बदलाव आ गया। अब भी टायरों को किसी दूसरे कलर में क्यों नहीं बनाया जाता है? भारत में लगभग सभी चीजें काफी बाद में आती है। लेकिन जो देश टेक्नोलॉजी में सबसे आगे है वहां के वाहन के टायर अभी भी काले क्यों बनाये जा रहे हैं? तो जानेंगे इसके पीछे की वजह। टायर का इतिहास काफी पुराना है क्योंकि आदिमानव के ज़माने भी टायर बनाये जाते थे। लेकिन उस समय रबर जैसी किसी चीज की खोज नहीं हुई थी। जब रबर की खोज हुई तो इसके टायर भी बनाये गए, जो काफी काम में आने लगे। लेकिन अभी भी इन टायर में कमी थी क्योंकि साधारण रबर के टायर जल्दी घिस जाते थे। इसके बाद थोड़ी और रिसर्च की गयी और पाया गया कि रबर में कार्बन और सल्फर मिलाकर इसे मजबूत किया जा सकता है। वैसे आपको पता होगा कि रबर का प्राकतिक रंग स्लेटी होता है लेकिन जब इसमें कार्बन और सल्फर मिलाया जाता है तो इसका रंग काला हो जाता है। रबर में कार्बन मिलाने से बहुत बड़ा फायदा हुआ है क्योंकि जहां साधारण रबर से बना टायर 10 किलोमीटर चल सकता है वहीं कार्बन और सल्फर युक्त रबर का टायर 1 लाख किलोमीटर से ज्यादा चल सकता है इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि टायर बनाने के लिए रबर में कार्बन और सल्फर मिलाना कितना जरुरी है। चुकीं रबर में कार्बन और सल्फर मिलाते है इसलिए टायर का रंग काला हो जाता है। क्या होगा अगर टायर को किसी दूसरे कलर में बनाया जाए : आपने छोटे बच्चों की साईकिल में लगे रंगीन टायर को देखा होगा इनके रंगीन होने की वजह से ही ये टायर ज्यादा समय तक नहीं चल पाते है। हालांकि ये रंगीन टायर ठोस होते हैं। इनमें किसी भी तरह से हवा नहीं भरी जाती है इसलिए ये टायर थोड़ी टक्कर दे जाते हैं। अब आप भी जानना चाहते होंगे कि क्या होगा अगर टायर को किसी कलर में बनाया जाए। वैसे आपको इस सवाल का जबाव मिल गया होगा। रंगीन टायर ज्यादा देर तक नहीं टिकेंगे क्योंकि जब टायर को रंगीन करने के लिए उसमें रंगीन पदार्थ मिलाया जायेगा, तो टायर में कार्बन और सल्फर की मात्रा पर असर पड़ेगा और हमें पता है कि टायर कार्बन और सल्फर की वजह से ही मजबूत रहते है। हालांकि अभी तक कई कंपनियां रंगीन टायर बना चुकीं है, लेकिन इनका बहुत कम प्रयोग हो रहा है। अब आप जान गए होंगे कि टायर का रंग काला क्यों होता है। आपने कभी टायर को जलते हुए देखा होगा तो उसमें काला धुआं निकलता है वो कार्बन का काला धुआं होता है। अभी कार्बन युक्त टायर काफी अच्छी सर्विस दे रहे हैं। इसलिए इनके कलर में कोई छेड़छाड़ नहीं कर रहा है। लेकिन जिस तरह से टेक्नोलॉजी में बदलाव देखने मिल रहा है। टायर के कलर बदलने का समाधान भी ढूढ़ लिया जायेगा और भविष्य में आपको सड़क पर चल रहे बड़े वाहनों में भी रंगीन टायर देखने को मिल सकते हैं।
एबीएन डेस्क। आपने अपने जीवन काल में अभी तक पानी के कई टंकियां देखी होंगी, लेकिन मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपने टंकी गोल ही देखी होगी। चौकोर या तिकोनी नहीं। नगर निगम की बड़ी पानी की टंकी हो, जो करीब 100 फुट ऊंचाई पर स्थापित की जाती है या फिर घर के बाथरूम में सप्लाई के लिए रखी जाने वाली 500 लीटर की टंकी, एक बात समान होती है कि सब के सब गोल ही होती है। जबकि जिस स्थान पर वह रखी होती है यदि चौकोर होती तो स्थापित करने के लिए शायद ज्यादा अच्छा होता है। सवाल यह है कि पानी की टंकी गोल क्यों बनाई जाती है? "टंकी गोल क्यों होती है" विषय विशेषज्ञ ने बताया : भारतीय नौसेना से रिटायर परिमल कुमार घोष बताते हैं कि यह केवल पानी की टंकियों के आकार की बात नहीं है। परन्तु अधिक से अधिक वस्तुओं के आकार गोल होने के पीछे भौतिकी विज्ञान के सूत्र व पदार्थ के मौलिक आकार पर बाहरी प्रभाव, दबाव एवं पारिपार्शिक परिस्थिति की प्रतिक्रिय आदि के सिद्धान्त पर ही आधारित हैं। गोलाकार वस्तु के कोई कोण नहीं होता है, बल्कि हरेक बिन्दु सम दूरत्य व समानुपातिक तरीके से विन्यास होने के कारण उन पर घर्षण व दबाव बराबर एवं समपरिमान क्षेत्र में समानुपातिक विस्तारित व वितरित हो जाते हैं। इसके परिणाम स्वरूप गोलाकार वस्तु के किसी भी एक स्थान पर दबाव या प्रतिक्रिया सीमित नहीं रहती हैं। सरल शब्दों में समझिए : यदि पानी की टंकी को चौकोर बना दिया जाएगा तो उसके चार कोण स्थापित हो जाएंगे। ऐसी स्थिति में जब टंकी के अंदर पानी भरा जाएगा और जब टंकी से पानी निकाला जाएगा तब पानी में हलचल होगी और कोण होने के कारण हलचल थोड़ा तेज हो जाएगी। इसके चलते टंकी की उम्र कम होती चली जाएगी। कुछ कंपनियां ग्राहकों की मांग पर चौकोर पानी की टंकी बनाती है परंतु ऐसी टंकियों के निर्माण और विक्रय की प्रक्रिया बहुत धीमी होती है।
एबीएन डेस्क। वैज्ञानिक उस तरीके पर काम कर रहा है, जिससे पशुओं के गर्भ में मानव-कोशिकाओं का विकास हो सकेगा। वैज्ञानिक उस तरीके पर काम कर रहा है, जिससे पशुओं के गर्भ में मानव-कोशिकाओं का विकास हो सकेगा। जानवरों के गर्भाशय में इंसानी कोशिकाओं को प्रत्यारोपित करने पर जो जीव जन्म लेगा, वो आधा इंसान-आधा पशु हो, ऐसे खतरे भी हैं। इसी के चलते अमेरिका तक ने इस प्रयोग पर रोक लगा दी थी। जापान के एक स्टेम-सेल वैज्ञानिक को वहां की सरकार ने एक खास शोध के लिए सरकारी सहायता देने की शुरुआत की है। वैज्ञानिक उस तरीके पर काम कर रहा है, जिससे पशुओं के गर्भ में मानव-कोशिकाओं का विकास हो सकेगा। यानी जानवर एक तरह से सरोगेट मां की तरह काम करेंगे, जिनकी कोख से वैसी कोई चीज जन्म लेगी, जिसके शरीर में इंसानी अंग हों। जापानी स्टेम सेल वैज्ञानिक को मिली इजाजत : विज्ञान की दुनिया में इंसान एक से बढ़कर एक प्रयोग कर रहा है। कृत्रिम अंग प्रत्यारोपण जैसी मुश्किल और एक समय पर असंभव समझी जाने वाली प्रक्रिया अब आम है। इसी कड़ी में वैज्ञानिक और आगे बढ़ने की सोच रहे हैं। जापान में हिरोमित्सू नकॉची नाम के वैज्ञानिक, जो यूनिवर्सिटी आॅफ टोक्यो में स्टेम सेल के अगुआ हैं, उन्हें जापान सरकार ने जानवरों की कोख में इंसानी भ्रूण के विकास पर प्रयोग करने की इजाजत दे दी। वैज्ञानिक अपनी टीम समेत इसपर काम भी शुरू कर चुके हैं। टीम की योजना ये है कि पहले चूहों के एंब्रियो में मानव कोशिकाएं विकसित की जाएं और फिर उस एंब्रियो को सरोगेट जानवरों के गर्भ में प्रत्यारोपित कर दिया जाए। इस प्रयोग का असल मकसद इंसानी शिशु बनाना नहीं, बल्कि ऐसे पशु तैयार करना है, जिनके शरीर के अंग मानव कोशिकाओं से बने हों ताकि जरूरतमंद इंसानों में ये प्रत्यारोपित किए जा सकें। देशों ने कहा गलत : जापान से पहले कई देश इसे कुदरत से खिलवाड़ बताते हुए ऐसे प्रोजेक्ट को नामंजूर कर चुके हैं। इनमें अमेरिका भी एक देश है। वहां साल 2015 से पहले लैब्स में इस तरह की कोशिशें चल रही थीं लेकिन फिर नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ हेल्थ इसे गलत बताते हुए इस तरह के किसी भी प्रोजेक्ट पर रोक लगा दी। वहीं जापान के साइंटिस्ट कुदरती प्रक्रिया को चुनौती देते हुए जानवर की कोख से इंसान के जन्म लेने के प्रोजेक्ट पर जुट गए हैं। अगर ये हो सका तो ये साइंस का सबसे बड़ा कारनामों में से एक हो सकता है। इस तरह होगा प्रयोग : जापान के साइंटिस्ट ने इसका खाका भी तैयार कर लिया है, कि कैसे इस प्रोजेक्ट को अंजाम देना है। शुरूआती तौर पर इसमें चूहे के गर्भाशय में ह्यूमन सेल्स डेवलप किए जाएंगे। इसके बाद के चरण में जानवर की कोख में सेरोगेसी की संभावना देखी जाएगी। यानी इंसान के भ्रूण को जानवर के गर्भाशय में डेवलप करने की प्रक्रिया पर काम किया जाएगा। क्या है सरोगेसी की प्रक्रिया : इसमें अगर किसी महिला को गर्भाशय से जुड़ी बड़ी समस्या होती है तो वो गर्भ में शिशु को धारण नहीं कर पाती। या फिर बार-बार गर्भपात होता है। ऐसे मामलों में किसी दूसरी महिला के गर्भाशय में मानव भ्रूण को विकसित किया जाता है। इसकी प्रक्रिया बड़ी नॉर्मल होती है और ऐसे कई मशहूर सेलिब्रेटी हुए हैं, जिन्होंने इस विधि से संतान हासिल की है। इस विधि में माता-पिता के शुक्राणु का मेल परखनली विधि से करवा कर भ्रूण को सरोगेट मदर (किराए की कोख वाली महिला) के गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया में बच्चे का जेनेटिक संबंध माता-पिता से ही होता है, बस भ्रूण का विकास और उसका जन्म सरोगेसी के जरिए होता है। इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए अब मानव भ्रूण का विकास किसी जानवर के गर्भाशय में करने की तैयारी चल रही है। यूनिवर्सिटी आॅफ टोक्यो में इस प्रोजेक्ट पर काम भी शुरू हो गया है। खतरनाक शक्ल ले सकता है जापान का ये प्रोजेक्ट : जापान के मशहूर जेनेटिसिस्ट हिरोमित्सू नकॉची ने इस प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू कर दिया है। पहले पहल जानवर के गर्भाशय में मानव अंगों को उगाने की प्रक्रिया पर काम होगा, जिसे किसी जरूरतमंद इंसान को प्रत्यारोपित किया जा सके। आगे हो सकता है ये खतरा : इस प्रोजेक्ट में सबसे खतरनाक बात ये है कि ये इसका अगला चरण अपने मकसद से भटक सकता है। अगर ये प्रोजेक्ट कामयाब हो गया तो फिर संभव है कि आने वाले वक्त में एक ऐसा जीव अस्तित्व में आ जाए जो आधा इंसान और आधा जानवर हो। या फिर ये भी हो सकता है कि गर्भ में भ्रूण के पलने से इंसानी कोशिकाएं किसी तरह बढ़ते हुए पशु के दिमाग तक भी पहुंच जाएं। ऐसे में उसका मस्तिष्क बुरी तरह से प्रभावित हो सकता है। इसी बात को देखते हुए दुनिया के कई देशों ने इस तरह के प्रोजेक्ट रोक दिए। ऐसे प्रोजेक्ट को आर्थिक सहायता देनी बंद कर दी। हालांकि जापान की एजुकेशन और साइंस मिनिस्ट्री ने सालभर पहले इसे अप्रूव कर दिया। इधर काम में लगे वैज्ञानिकों का कहना है कि हम जानवर के गर्भाशय में अचानक से मानव अंग नहीं उगा लेंगे। हम धीरे-धीरे उस चरण तक पहुंचेंगे। हमारा एडवांस रिसर्च हमें उस जगह तक ले जाएगा। उनका प्लान है कि इस प्रोसेस को धीरे-धीरे अंजाम दिया जाए। पहले जानवरों के हाइब्रिड गर्भाशय उगाने पर काम होगा।
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