ज्ञान विज्ञान

View All
Published / 2025-07-30 18:34:36
अपने सबसे महंगे मिशन की ओर निकल पड़ा इसरो

  • ISRO का अब तक का सबसे महंगा मिशन, खर्च सुनकर हो जाएंगे दंग

एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अब तक कई महत्वाकांक्षी और सफल अंतरिक्ष मिशन लॉन्च किए हैं जिन्होंने भारत की वैज्ञानिक प्रगति को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसरो का अब तक का सबसे महंगा मिशन कौन सा है? आज 30 जुलाई 2025 को इसरो ने अपने सबसे महंगे मिशन NISAR (नासा-इसरो सिंथेटिक अपर्चर रडार) को श्रीहरिकोटा से GSLV-F16 रॉकेट के जरिए सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया है।

दुनिया का सबसे महंगा अर्थ-इमेजिंग सैटेलाइट

NISAR मिशन NASA और ISRO का एक संयुक्त प्रोजेक्ट है जिसकी अनुमानित लागत करीब 1.5 बिलियन डॉलर है जो भारतीय रुपये में लगभग 12,500 करोड़ रुपये बैठती है। यह सिर्फ इसरो का ही नहीं बल्कि दुनिया का सबसे महंगा अर्थ-इमेजिंग सैटेलाइट मिशन है। इस प्रोजेक्ट में इसरो की हिस्सेदारी करीब 788 करोड़ रुपये की है।

पृथ्वी की बदलती सतह पर रखेगा नज़र
NISAR सैटेलाइट की खासियतें इसे बेहद खास बनाती हैं:

  • वजन और रडार सिस्टम: इस सैटेलाइट का वजन 2,392 किलोग्राम है और यह ड्यूल-फ्रीक्वेंसी रडार सिस्टम से लैस है।
  • दोहरी फ्रीक्वेंसी तकनीक: यह पहला ऐसा सैटेलाइट है जो दो अलग-अलग रडार फ्रीक्वेंसी - NASA के L-बैंड और ISRO के S-बैंड - का उपयोग करेगा।
  • उद्देश्य: इस मिशन का मुख्य उद्देश्य पृथ्वी की सतह पर होने वाले सूक्ष्म बदलावों को ट्रैक करना है।

भूकंप और ज्वालामुखी की गतिविधियां।

भूस्खलन और ग्लेशियरों की हलचल।

जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की निगरानी।

  • हाई-रिजॉल्यूशन मैपिंग: यह सैटेलाइट हर 12 दिन में पृथ्वी की सतह का हाई-रिजॉल्यूशन नक्शा तैयार करेगा जो आपदा प्रबंधन, कृषि और जल प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अमूल्य सहायता प्रदान करेगा।
  • सहयोग: नासा ने इस मिशन के लिए L-बैंड रडार, GPS और डेटा रिकॉर्डर उपलब्ध कराए हैं जबकि इसरो ने S-बैंड रडार, सैटेलाइट बस और लॉन्च सिस्टम का योगदान दिया है।

NISAR की लागत इसरो के अन्य प्रमुख मिशनों की तुलना में कई गुना ज़्यादा है:

  • मंगलयान मिशन: भारत को मंगल ग्रह तक पहुंचाने वाला यह मिशन केवल 450 करोड़ रुपये में पूरा हुआ था।
  • चंद्रयान-3: चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाले इस मिशन की लागत 615 करोड़ रुपये थी।

NISAR की इतनी ज़्यादा लागत की मुख्य वजह इसकी अत्याधुनिक तकनीक और नासा के साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग है जो इसे एक अभूतपूर्व और भविष्योन्मुखी परियोजना बनाता है। यह सैटेलाइट पृथ्वी विज्ञान के क्षेत्र में एक क्रांति ला सकता है और हमें अपने ग्रह को समझने में अभूतपूर्व मदद करेगा।

Published / 2025-07-15 21:31:11
स्वागतम्... अंतरिक्ष से धरती पर शुभांशु शुक्ला की सुरक्षित लैंडिंग

धरती पर लौटे शुभांशु शुक्ला, समंदर में लैंड हुआ ग्रेस 

एबीएन नॉलेज डेस्क। 15 जुलाई 2025 दोपहर 3 बजे भारतीय समयानुसार, भारतीय अंतरिक्ष यात्री ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने अपनी 18 दिन लंबी अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आइएसएस) यात्रा पूरी करके धरती पर कदम रखा। यह उनकी पहली अंतरिक्ष यात्रा थी जो एक्सिओम मिशन 4 (एएक्स-4) का हिस्सा थी। शुभांशु स्पेसएक्स के ग्रेस यान में बैठकर कैलिफोर्निया तट के पास प्रशांत महासागर में सुरक्षित उतर गये। यह लैंडिंग भारत के अंतरिक्ष इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय साबित होगी। 

अंतरिक्ष में शुभांशु का सफर और मिशन 

शुभांशु शुक्ला 25 जून 2025 को फाल्कन 9 रॉकेट से अंतरिक्ष के लिए रवाना हुए थे। अगले दिन आइएसएस से जुड़कर उन्होंने वहां लगभग 18 दिन बिताये। इस दौरान उन्होंने 60 से ज्यादा वैज्ञानिक प्रयोग किये, जिनमें मांसपेशियों की कमजोरी, मानसिक स्वास्थ्य पर अंतरिक्ष के प्रभाव और अंतरिक्ष में फसल उगाने जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल थे। इन प्रयोगों से मानव जीवन को बेहतर समझने और भविष्य में लंबे अंतरिक्ष अभियानों के लिए मदद मिलेगी। 

14 जुलाई की शाम 4:45 बजे (भारतीय समयानुसार) ग्रेस यान ने आइएसएस से अलग होकर पृथ्वी की ओर प्रस्थान किया। लौटने के लिए यान ने डीआर्बिट बर्न प्रक्रिया अपनाई, यानी कक्षा से बाहर निकलने के लिए इंजन जलाए और गति कम की। यह प्रक्रिया आवश्यक थी ताकि यान सही स्थान पर सुरक्षित लैंडिंग कर सके। यान वायुमंडल में 27,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से घुसा। इस दौरान उसकी हीट शील्ड ने तापमान 1600 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने से बचाया। 

घर्षण की वजह से यान के आस-पास प्लाज्मा की एक गर्म परत बन गयी, जिससे कुछ देर के लिए संचार बाधित हो गया। यह प्रक्रिया हर अंतरिक्ष मिशन की सामान्य और जरूरी कड़ी होती है। वायुमंडल से बाहर आते ही यान के पैराशूट खुल गये और उसकी गति धीमी हुई। 15 जुलाई को दोपहर 3 बजे ग्रेस यान प्रशांत महासागर में सुरक्षित रूप से उतर गया। 

लैंडिंग के दौरान जोरदार सोनिक बूम सुनाई दिया जो इसकी उच्च गति का प्रमाण था। तुरंत रिकवरी टीम नौकाओं और हेलीकॉप्टरों के साथ पहुंची और शुभांशु समेत पूरा एएक्स-4 दल सुरक्षित निकाला गया। इस दल में कमांडर पैगी व्हिटसन, स्लावोश उजनांस्की-विस्निव्स्की और टिबोर कपु भी शामिल थे।

Published / 2025-07-15 11:51:42
आखिर एक पनडुब्बी महीनों तक छुपी कैसे रहती है?

एबीएन नॉलेज डेस्क। वर्जीनिया क्लास जैसी आधुनिक पनडुब्बियाँ महीनों तक छुपी रह सकती हैं, और इसका राज है इनकी उन्नत स्टील्थ तकनीक (एडवांस्ड स्टील्थ टेक्नोलॉजी)।

इनकी बाहरी सतह पर एनेकोइक टाइल्स (अनेचोइस टाइल्स) लगी होती हैं — ये खास तरह की रबर की परतें होती हैं जो सोना (Sonar) तरंगों को सोख लेती हैं, उन्हें वापस नहीं लौटातीं। इससे दुश्मन के लिए पनडुब्बी को पकड़ पाना बेहद मुश्किल हो जाता है।

इन पनडुब्बियों में बेहद शांत प्रोपेलर (साइलेंट प्रॉपल्लेर्स) और शोर कम करने वाली मशीनें (साउंड-डेडनिंग सिस्टम) होती हैं, जो इनकी आवाज़ को न्यूनतम बना देती हैं। नतीजा — ये पानी के नीचे लगभग पूरी तरह चुपचाप चल सकती हैं।

अगर दुश्मन का सोनार इन्हें पकड़ने के करीब आ जाए, तो ये पनडुब्बियाँ 200 मीटर या उससे भी गहराई तक गोता लगा सकती हैं। वहाँ समुद्र में तापमान, दबाव और नमक की परतें इतनी जटिल होती हैं कि ध्वनि तरंगें मुड़ जाती हैं, बिखर जाती हैं — जिससे पनडुब्बी का पता लगाना और भी कठिन हो जाता है। यही कारण है कि ये समुद्र के साए महीनों तक छुपे रह सकते हैं — बिना किसी को पता चले।

Published / 2025-07-14 22:07:25
22 घंटे बाद धरती पर वापस लौटेंगे शुभांशु शुक्ला

शुभांशु शुक्ला समेत 4 अंतरिक्ष यात्री आइएसएस से रवाना, 22 घंटे बाद पृथ्वी पर होगी वापसी 

एबीएन नॉलेज डेस्क। ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला और एक्सिओम-4 के अन्य अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी पर वापसी के लिए अंतरिक्ष यान में सवार होकर अंतरिक्ष स्टेशन से रवाना हो चुके हैं। अनडॉकिंग के लगभग 22.5 घंटे बाद कैलिफोर्निया के तट पर यान के पहुंचने की उम्मीद है और अंतरिक्ष कैप्सूल को एक विशेष जहाज द्वारा वापस लाया जाएगा। यान के मंगलवार को भारतीय समयानुसार दोपहर 3:01 बजे कैलिफोर्निया के तट पर पहुंचने की उम्मीद है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने अंतरिक्ष स्टेशन से रवानगी का लाइव प्रसारण किया। 

अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला और उनकी टीम के अंतरिक्ष स्टेशन से रवानगी की खबर मिलते ही केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा अंतरिक्ष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जितेंद्र सिंह ने ट्वीट किया। उन्होंने लिखा, ह्लशुभांशु, आपका स्वागत है। पूरा देश आपके घर वापस आने का बेसब्री से इंतजार कर रहा है। क्योंकि आप अ७्रङ्मे4 को सफलतापूर्वक अनडॉक करने के बाद अपनी वापसी यात्रा शुरू कर रहे हैं।

शुभांशु शुक्ला और एक्सिओम-4 के तीन अन्य अंतरिक्ष यात्री अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) पर 18 दिनों के प्रवास के बाद पृथ्वी पर वापस लौट रहे हैं। मिशन पायलट शुक्ला के साथ कमांडर पैगी व्हिटसन, मिशन विशेषज्ञ पोलैंड के स्लावोज उज्नान्स्की-विस्नीवस्की और हंगरी के टिबोर कापू हैं। 

ड्रैगन ग्रेस अंतरिक्ष यान का है, जो इसे अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन से जोड़ता था, भारतीय समयानुसार दोपहर 2:37 बजे बंद कर दिया गया। फिर चालक दल के सदस्य भारतीय समयानुसार दोपहर 4:35 बजे रवाना हो गए। एक्सिओम-4 मिशन ने अपनी अंतरिक्ष यात्रा 25 जून को शुरू की थी, जब ड्रैगन अंतरिक्ष कैप्सूल को ले जाने वाला फाल्कन-9 रॉकेट फ्लोरिडा से आईएसएस की ओर रवाना हुआ था।

Published / 2025-07-13 18:40:02
चांद पर भी आते हैं भूकंप!

Moonquake:  NASA ने खोला रहस्य

एबीएन नॉलेज डेस्क। जब भी हम भूकंप की बात करते हैं तो हमारा ध्यान धरती पर आता है लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि चांद पर भी भूकंप आता है? जी हां, चांद की सतह पर भी कंपन महसूस किए गए हैं जिन्हें मूनक्वेक (Moonquake) कहा जाता है। यह एक बेहद दिलचस्प और वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण विषय है जिसे NASA ने अपोलो मिशनों के दौरान खोजा और सिद्ध किया।

पहली बार कब पता चला चांद पर भूकंप आता है?

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA ने साल 1969 से 1977 के बीच चलाए गए Apollo मिशन के दौरान चांद पर विशेष यंत्र यानी सीस्मोमीटर (Seismometer) लगाया था। इस उपकरण ने चांद की सतह पर कंपन दर्ज किए जिससे पता चला कि वहां भी भूकंप आते हैं। यह पूरी तरह वैज्ञानिकों के लिए एक नया और हैरान करने वाला विषय था।

चांद पर भूकंप क्यों आता है?

चांद पर भूकंप आने के कई कारण हो सकते हैं। NASA के अनुसार, मुख्य रूप से चार कारण बताए गए हैं:

  1. पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण खींचतान (Deep Moonquakes) : चांद और पृथ्वी के बीच गुरुत्व बल काम करता है। जब पृथ्वी की खिंचतान ज्यादा होती है तब चांद के भीतर गहराई में हलचल होती है जिससे गहरे मूनक्वेक्स आते हैं।
  2. सतह पर दरारें और खिंचाव (Shallow Moonquakes) : चांद की सतह में दरारें या टूट-फूट भी भूकंप का कारण बनती हैं। यह हलचल सतही स्तर पर होती है पर इसका प्रभाव काफी तेज़ होता है।
  3. तापमान में भारी बदलाव (Thermal Moonquakes) : चांद पर दिन और रात के बीच तापमान का अंतर सैकड़ों डिग्री का होता है। इस बदलाव से सतह में तनाव बनता है जो भूकंप का कारण बनता है।
  4. उल्का पिंडों की टक्कर (Meteorite Impacts) : जब कोई उल्कापिंड चांद से टकराता है तो इससे भी वहां भूकंप जैसे झटके महसूस होते हैं।

चांद पर भूकंप कितनी देर तक रहता है?

  • धरती की तुलना में चांद पर आने वाले भूकंप थोड़े अलग होते हैं। यहां पर:
  • कंपन अक्सर कम तीव्रता के होते हैं
  • लेकिन उनकी एनर्जी ज्यादा देर तक बनी रहती है
  • कुछ मूनक्वेक 10 मिनट तक चल सकते हैं
  • कई बार सतह पर दरारें पड़ जाती हैं और कुछ टुकड़े अपनी जगह से खिसक जाते हैं

Published / 2025-07-09 21:10:37
अब लीजिये... अंतरिक्ष में मेथी और मूंग उपजा रहे शुभांशु शुक्ला

अंतरिक्ष में किसान बने ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला; उगा रहे हैं मेथी और मूंग के बीज 

एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर अपने 14 दिवसीय प्रवास के 12 दिन पूरे कर चुके हैं। इन 10 दिनों में उन्होंने कई प्रयोग किये। प्रयोगों के क्रम में उन्होंने किसान की भी भूमिका निभायी। उन्होंने अपने साथ ले गये मेथी और मूंग के बीजों का अंकुरण किया। 

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) में स्प्राउट्स प्रोजेक्ट को सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण अंकुरण और पौधों के शुरुआती विकास और उन पर पड़ने वाले असर का अध्ययन करने के लिए अंजाम दिया जा रहा है।  बता दें कि पृथ्वी पर स्प्राउट्स प्रोजेक्ट का नेतृत्व कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, धारवाड़ के रविकुमार होसामणि और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, धारवाड़ के सुधीर सिद्धपुरेड्डी कर रहे हैं। 

एक्सिओम स्पेस की ओर से इस शोध को लेकर जारी बयान में कहा गया है कि पृथ्वी पर वापस आने के बाद इन बीजों को कई पीढ़ियों तक उगाया जायेगा। जिससे कि उनके आनुवंशिकी, सूक्ष्मजीवी पारिस्थितिकी तंत्र और पोषण प्रोफाइल में होने वाले परिवर्तनों की जांच की जा सके।  

भारतीय वैज्ञानिकों के लिए खुलेंगे नये रास्ते 

अपने प्रयोगों को लेकर शुभांशु ने एक्सिओम स्पेस की मुख्य वैज्ञानिक डॉ लूसी लोव से बात की। इस बातचीत में भारतीय अंतरिक्ष यात्री ग्रुप कैप्टन शुक्ला ने उनके द्वारा किए जा रहे वैज्ञानिक प्रयोगों की जानकारी दी और बोले की वे बेहद व्यस्त हैं। शुभांशु शुक्ला ने कहा कि जब से हम यहां आये हैं, तब से ही काफी व्यस्त हैं। 

हम अंतरिक्ष स्टेशन पर बहुत सारे प्रयोग कर रहे हैं, जिन्हें लेकर मैं बेहद उत्साहित हूं। इस मिशन से माइक्रोग्रैविटी के लिए रास्ते खुलेंगे और इससे भारतीय वैज्ञानिकों के लिए नई राह खुलेगी। मुझे बेहद गर्व है कि इसरो दुनियाभर के संस्थानों के साथ मिलकर काम कर रहा है। 

कई और वैज्ञानिक प्रयोग कर रहे शुभांशु 

शुभांशु ने बताया कि वह कई वैज्ञानिक प्रयोग कर रहे हैं, जिनमें स्टेम सेल का अध्ययन, माइक्रोग्रैविटी में बीजों का विकास, अंतरिक्ष में मस्तिष्क पर पड़ने वाला असर आदि प्रयोग शामिल हैं। शुभांशु ने कहा कि वे स्टेम सेल के अध्ययन वाले प्रयोग को लेकर बेहद उत्साहित हैं। इससे पता चलेगा कि क्या सप्लीमेंट्स लेने से चोट की रिकवरी तेज होती है या नहीं। 

भारतीय अंतरिक्ष यात्री ने कहा कि वैज्ञानिकों और अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन के बीच पुल बनना मेरे लिए गर्व की बात है। ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला एक्सिओम-4 मिशन के क्रू का हिस्सा हैं। जिसने 25 जून को नासा के केनेडी स्पेस सेंटर से स्पेसएक्स के फाल्कन 9 रॉकेट से उड़ान भरी थी।

एक्सिओम-4 मिशन 14 दिन का है। अपने अंतरिक्ष प्रवास को खत्म कर 10 जुलाई के बाद मौसम की स्थिति के आधार पर किसी भी दिन पृथ्वी पर वापसी कर सकते हैं। वे फ्लोरिडा तट पर उतरेंगे। हालांकि नासा ने अभी तक एक्सिओम-4 मिशन को अंतरिक्ष स्टेशन से अलग करने की तारीख की घोषणा नहीं की है।

Published / 2025-07-07 21:53:17
वज्रपात से नुकसान के साथ कुछ फायदा भी, जानें कैसे...

आसमान से बिजली गिरने के बाद पैदा होती है ये सब्जी, कीमत और फायदे जानकर चौंक जायेंगे आप 

टीम एबीएन, रांची। अमूमन मानसून के आगमन के साथ ही सब्जियों के दाम आसमान छूने लगते है। इस दौरान लोगों के सब्जियां खरीदने में पसीना छूट जाते हैं। ऐसी ही कुछ झारखंड की राजधानी रांची से सामने आया है, जहां एक खास तरह की सब्जी का दाम 100, 200 या फिर 300 रुपये किलो नहीं बल्कि 1000 से 1200 किलो तक है। 

इसके बावजूद लोग इस खरीदने के लिए साल भर इंतजार करते हैं। खास बात यह है कि इस सब्जी की पैदावार खेत में नहीं होती है। राजधानी रांची समेत झारखंड के विभिन्न जिलों के बाजारों में इन दिनों एक खास तरह की सब्जी का आगमन हुआ है। इस सब्जी का नाम रुगड़ा है, जिसे शाकाहारी मटन भी कहा जाता है। 

इस सब्जी के आगमन के साथ यह बाजार का राजा बन गया है, न सिर्फ अपने आसमान छूते दाम के कारण बल्कि अपने लाजवाब स्वाद के कारण भी इसकी काफी मांग है। यह सब्जी न सिर्फ विटामिन और प्रोटीन से भरपूर है, बल्कि इसे ब्लड प्रेशर और हाइपरटेंशन के मरीजों के लिए भी रामबाण माना जाता है। 

इम्यूनिटी बूस्टर सब्जी 

डॉक्टर का भी मानना है कि रुगड़ा का सेवन इंसान के इम्यूनिटी सिस्टम को बेहतर बनाता है। इस सब्जी में विटामिन बी, विटामिन सी, कैल्शियम, फास्फोरस, पोटेशियम और तांबा भी पाया जाता है। इसमें कैलोरी बहुत कम मात्रा में होती है। दरअसल, रुगड़ा मशरूम प्रजाति की ही सब्जी मानी जाती है, लेकिन यह जमीन के ऊपर मशरूम की तरह नहीं उगती है। बल्कि इसकी पैदावार जमीन के अंदर ही होती है, जो बारिश के केवल 2 महीने यानी जून और जुलाई में सखुआ के पेड़ के इर्द-गिर्द तेज बारिश और वज्रपात के कारण धरती को चीरता हुई निकलती है। 

जानें क्या है कीमत 

ग्रामीणों की माने तो जितनी अधिक बारिश और वज्रपात होगा उतनी अधिक मात्रा में सखुआ के जंगल और सखुवा के पेड़ के आसपास की धरती को फाड़ कर रुगड़ा निकलेगा। अंडरग्राउंड मशरूम के नाम से भी कई लोग इस सब्जी को जानते हैं। ऐसे तो रुगड़ा की 12 प्रजातियां होती है, जिसमें सफेद रुगड़ा ही सर्वाधिक पौष्टिक माना जाता है। 

यह सब्जी झारखंड की समृद्ध खानपान की संस्कृति को जीवंत रखने के साथ ही साथ झारखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाती है। इस सब्जी की कीमत 50 या फिर 100 रुपये किलो नहीं बल्कि 1000 से 1200 रुपये किलो है।

Published / 2025-07-07 12:50:00
दुनियाभर के पासवर्ड लीक होने से मची खलबली

  • भारत के करोड़ों यूज़र्स हो जाएं सावधान, सरकार ने जारी कर दी नई चेतावनी

एबीएन नॉलेज डेस्क। भारत की साइबर सुरक्षा एजेंसी CERT-In ने एक बड़ा अलर्ट जारी किया है जिसमें बताया गया है कि दुनिया भर में करीब 16 अरब से ज़्यादा पासवर्ड लीक हो चुके हैं। 

इसे अब तक की सबसे बड़ी डेटा लीक घटनाओं में से एक माना जा रहा है और इसका असर भारत के करोड़ों इंटरनेट यूज़र्स पर पड़ सकता है खासकर उन पर जो Apple, Google, Facebook, Telegram, GitHub और VPN सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं।

CERT-In की रिपोर्ट के मुताबिक लीक हुए ये पासवर्ड करीब 30 से ज़्यादा डेटा डंप्स से जुटाए गए हैं जिनके मुख्य स्रोत हैं:

  • इंफो-स्टीलर मालवेयर: यह यूज़र्स के कंप्यूटर या ब्राउज़र को संक्रमित करता है।
  • गलत ढंग से कॉन्फ़िगर किए गए डेटाबेस: जैसे ओपन Elasticsearch सर्वर।

इस लीक में केवल पासवर्ड ही नहीं बल्कि निम्न जानकारियाँ भी शामिल हैं:

  • यूज़रनेम और पासवर्ड
  • सेशन कुकीज़
  • ऑथेंटिकेशन टोकन
  • अकाउंट से जुड़ी मेटाडेटा जानकारी

16 अरब से अधिक पासवर्ड लीक हो चुके हैं और यह घटना हर इंटरनेट यूज़र के लिए एक चेतावनी है। भले ही आपने अब तक कोई संदिग्ध गतिविधि न देखी हो लेकिन अपनी डिजिटल सुरक्षा को मज़बूत करना अब बेहद ज़रूरी है। अपने पासवर्ड बदलिए MFA चालू कीजिए और अपने ऑनलाइन अकाउंट्स को सुरक्षित कीजिए।

Page 4 of 53

Newsletter

Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.

We do not share your information.

abnnews24

सच तो सामने आकर रहेगा

टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।

© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse