एबीएन सेंट्रल डेस्क। पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज में 155 मिमी/52 कैल एडवांस्ड टोड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS) का परीक्षण सफलतापूर्वक किया गया। डीआरडीओ (DRDO) ने इसकी जानकारी दी। डीआरडीओ के मुताबिक, ये परीक्षण 26 अप्रैल से 2 मई 2022 के बीच किया गया। एडवांस्ड टोड आर्टिलरी गन सिस्टम डीआरडीओ द्वारा विकसित की गई एक आधुनिक तोप है। इस तोप को भारत फोर्ज लिमिटेड और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड द्वारा निर्मित किया गया है। अब तक इसके छह से सात परीक्षण हो चुके हैं। इसे सबसे पहले 26 जनवरी 2017 को गणतंत्र दिवस परेड पर लोगों के सामने प्रदर्शित किया गया था। इस सफल परीक्षण से सेना की भविष्य की युनौतियों से निपटा जा सकेगा और सेना की मारक क्षमता और मजबूत होगी। बता दें कि इसका पहला परीक्षण 2016 में हुआ था। अगर इसकी खासियत की बात करें तो इसका वजन 18 टन है। यह सबसे लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम स्वदेशी तोप है। इसकी नली यानी बैरल की लंबाई 8060 मिलिमीटर है। यह माइनस 3 डिग्री से लेकर प्लस 75 डिग्री तक एलिवेशन ले सकता है। इसकी फायरिंग रेंज 48 किलोमीटर है। एडवांस्ड टोड आर्टिलरी गन सिस्टम को विकसित करने में करीब चार साल लगे हैं। बता दें कि भारतीय सेना के पास 155 mm की यह गन फिलहाल सात हैं। टैंक विध्वंसक हेलिना मिसाइल का दूसरा सफल परीक्षण पिछले महीने की 12 तारीख को टैंक विध्वंसक हेलिना मिसाइल का हेलीकॉप्टर के जरिए दूसरा सफल परीक्षण किया गया था। रक्षा मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि हेलिना का पहला सफल परीक्षण एक दिन पहले किया गया था। दोनों परीक्षण उन्नत हल्के हेलीकॉप्टर के जरिए से किए गए। बयान में कहा गया, आज का परीक्षण विभिन्न परिधि और ऊंचाई से किया गया। योजना के अनुसार, मिसाइल ने टैंक प्रतिकृति लक्ष्य पर सटीक निशाना साधा। परीक्षण के दौरान सेना के वरिष्ठ कमांडर और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के वैज्ञानिक मौजूद थे। मंत्रालय ने कहा कि परीक्षण के साथ ही इमेजिंग इन्फ्रा-रेड कौशल प्रणाली सहित मिसाइल की पूरी प्रणाली का प्रदर्शन सफल रहा है जिससे हेलिना को सशस्त्र बलों में शामिल करने में मदद मिलेगी। हेलिना हर मौसम में दिन या रात कभी भी निशाना साधकर लक्ष्य नष्ट करने में सक्षम है और यह पारंपरिक बख्तरबंद प्रणालियों तथा युद्धक टैंकों को तबाह कर सकती है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। ये तो आप जानते हैं कि एक घंटे में 60 मिनट होती है और एक मिनट में 60 सेकेंड्स होती है। लेकिन, कभी आपने सोचा है कि आखिर इसकी शुरुआत कैसे हुई होगी और सबसे पहले 60 के आधार पर गणना किसने की होगी। ये जानना काफी दिलचस्प है कि आखिर सबसे पहले 60 वाले इस कंसेप्ट की किस तरह शुरुआत हुई और सबसे पहले इसकी शुरुआत किसने की थी। इसके बाद आप समझ पाएंगे कि समय में एक घंटे में 60 मिनट और 60 सेकेंड्स का कंसेप्ट किस तरह से शुरू हुआ। डीडब्ल्यू हिंदी की एक रिपोर्ट के अनुसार, बेबीलॉग के लोगों द्वारा विकसित की गई यह एक प्राचीन प्रणाली पर आधारित होता है, जो मेसोपोटामिया की सभ्यता में रहते थे। रिपोर्ट के अनुसार, उन लोगों ने बाएं हाथ के अंगूठे से चार अगुंलियों के 12 हिस्सों को गिना था, जिसे एक पवित्र अंक माना था। इसके बाद उन्होंने रात और दिन को इस 12 के आधार पर बांट दिया। हालांकि, उस वक्त तक उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि पृथ्वी सूर्य के चक्कर लगाने में 24 घंटे का समय लेती है। लेकिन, उन्होंने पहले ही 12-12 के आधार पर यह तय कर लिया था और दिन-रात वैसे ही तय किया था, जिसे अलग अलग दुनिया की तरह माना। इससे ही दिन में 24 घंटे की बात को आधार मिला और यह बाद में सच भी साबित हुआ। एक घंटे में 60 मिनट का कैसे पता किया : दरअसल, उन्होंने अपने दाहिने हाथ के जरिए अपने बाएं हाथ की चार उंगुलियों के हिस्सों को अलग अलग उंगलियों और अंगूठे से गिना, जिसका जोड़ 60 निकला। हालांकि, उस वक्त तक समय की जानकारी सटीक जानकारी जरूरी नहीं थी। उस वक्त केवल खगोलशास्त्री ही इस 60 का इस्तेमाल समय की सटीक गणना के लिए करते थे। माना जाता है कि इन लोगों की इस गणना सिस्टम की वजह से घंटे में 60 मिनट के कंसेप्ट के बारे में पता चला। द गार्डियन की एक रिपोर्ट भी बताती है कि एक मिनट में 60 सेकेंड और एक घंटे में 60 मिनट की बात बैबीलोन के लोग से पता चली है, जो मैथ्स आदि के लिए सेक्सागेसिमल सिस्टम का इस्तेमाल करते थे और ये गणना 60 पर आधारित थी। इस रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने अपना ये नंबर सिस्टम सुमेरियों से प्राप्त की जो 3500 ईसा पूर्व में इसका उपयोग कर रहे थे। बताया जाता है कि ये सिस्टम ही दिन और रात के लिए 12 उपखंडों का उपयोग करने, 60 घंटे और मिनट के लिए इसका इस्तेमाल होता है। 60 ही क्यों : अब सवाल ये है कि आखिर वे लोग 60 को इतना अहम क्यों मानते हैं। दरअसल, 60 एक ऐसी संख्या है, जिससे सबसे ज्यादा तरीकों से बराबर हिस्सों में बांटा जा सकता है। यानी 60 में काफी संख्या का भाग दिया जा सकता है, जैसे 2,3,5,10,12 आदि। ऐसे में 60 के आधार पर कई गणना की गई और उस गणना के आधार पर मिनट, सेकेंड, घंटे के कंसेप्ट को समझने में मदद मिली। ऐसे में कहा जा सकता है कि एक घंटे में 60 मिनट और 1 मिनट में 60 सेकेंड का कंसेप्ट बैबीलॉन के लोगों की देन हो सकती है।
टीम एबीएन, रांची। झारखंड में अब अगर शराब पीकर गाड़ी चलाने की सोच रहे हैं तो हो जाएं सावधान। दरअसल, धनबाद के बीसीसीएल (भारत कोकिंग कोल लिमिटेड) में काम करने वाले इंजीनियरों ने कमाल कर दिखाया है। उन्होंने एक ऐसी डिवाइस का आविष्कार किया है, जिससे यदि व्यक्ति ने शराब पी रखी है तो गाड़ी स्टार्ट नहीं होगी। वहीं अगर गाड़ी का इंजन पहले से ही चल रहा है तो और ड्राइविंग सीट पर कोई व्यक्ति शराब पीकर बैठता है तो इंजन खुद ही बंद हो जाएगा। धनबाद के 3 इंजीनियर अजीत यादव, सिद्धार्थ सुमन और मनीष बलमुचू ने इस तकनीक का नाम ह्यस्मार्ट सेफ्टी सिस्टम अगेंस्ट अल्कोहल इन व्हीकल (एसएसएसएएवी) दिया है। इस तकनीक के तहत एक ऐसी डिवाइस बनाई गई है, जिसे ड्राइविंग सीट के सामने लगाया जाता है। यह डिवाइस ड्राइविंग सीट पर बैठने वाले शख्स की सांस को सेंसर के जरिए पकड़ लेती है। डिवाइस के जरिए सड़क दुर्घटनाओं से मिलेगी निजात : वहीं तीनों इंजीनियर ने पाया कि कोयला क्षेत्र में ट्रांसपोर्टिंग करने वाली गाड़ियों की दुर्घटनाओं में ज्यादातर मामलों में ड्राइवर के शराब के नशे में होने की बात सामने आती है। इसके बाद उन्होंने ऐसी तकनीक को विकसित करने का फैसला लिया, जिससे ड्राइवर को शराब पीने से रोका जा सके। उन्होंने कंपनी को इस डिवाइस के उपयोग का सुझाव भी दिया है। BCCL के पूर्वी क्षेत्र के जीएम ने कही ये बात : बीसीसीएल के पूर्वी क्षेत्र के जीएम एसएस दास ने कहा कि इस डिवाइस को आगे के परीक्षण के लिए डीजीएमएस (डायरेक्टर जेनरल माइंस सेफ्टी) के पास भेजा जायेगा। उनके अप्रूवल के बाद इसका इस्तेमाल करने की दिशा में कदम उठाया जा सकता है। बता दें कि कोल इंडिया की अनुषंगी कंपनी बीसीसीएल की वार्षिक सुरक्षा प्रदर्शनी में इस तकनीक का प्रदर्शन भी किया जा चुका है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। एक सरकारी रिपोर्ट में अमेरिका की सनक व सीक्रेट मून मिशन को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। वाइस मीडिया के हाथ लगी इस सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका चांद पर परमाणु विस्फोट करके सुरंग बनाने की फिराक में था। यह बात बेशक साइंस-फिक्शन मूवी की कहानी लगती है, लेकिन कई सालों से अमेरिका हकीकत में इस पर रिसर्च कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने इस योजना पर भारी-भरकम खर्च भी किया लेकिन उसका यह प्लान सफल नहीं हुआ। वाइस मीडिया के अनुसार, चांद पर विस्फोट करके सुरंग बनाने की बात नेगेटिव मास प्रोपल्जन रिपोर्ट में की गई है। अमेरिकी रिसर्चर्स का मानना है कि चांद के बीचों-बीच बेहद हल्के मेटल्स मिल सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ये स्टील से एक लाख गुना ज्यादा हल्के हो सकते हैं, लेकिन इनकी ताकत स्टील जितनी ही होगी। रिपोर्ट में इस मून मिशन के लिए उस समय करीब 22 मिलियन डॉलर फंड किए जाने की बात की गई है। रिपोर्ट के अनुसार करीब 1600 पन्नों के इन दस्तावेजों में एडवांस्ड एयरोस्पेस थ्रेट आइडेंटिफिकेशन प्रोग्राम (AATIP) और एडवांस्ड एयरोस्पेस वेपन्स सिस्टम ऐप्लिकेशन प्रोग्राम (AAWSAP) का जिक्र किया गया है। इन दोनों ही योजनाओं को अमेरिका की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) ने फंड किया था। रिपोर्ट में रिसर्च प्रपोजल, कॉन्ट्रैक्ट और मीटिंग नोट्स शामिल हैं। दस्तावेजों में कहा गया है कि अमेरिका में AATIP के तहत UFO से जुड़ी रहस्यमयी टेक्नोलॉजी पर रिसर्च भी की जा रही थी। AATIP साल 2007 से 2012 तक सक्रिय था। यह लोगों की नजर में तब आया, जब 2017 में प्रोग्राम के पूर्व डायरेक्टर ने पेंटागन से इस्तीफा दे दिया था। अब 5 साल बाद ये बात सामने आई है कि AATIP की रिसर्च केवल UFO तक सीमित न होकर दूसरी एडवांस्ड टेक्नोलॉजी पर भी चल रही थी। रिपोर्ट के मुताबिक AAWSAP मिशन के तहत अमेरिका ऐसी टेक्नोलॉजी पर रिसर्च कर रहा था, जो हम सिर्फ फिल्मों में देखते हैं। इसमें चांद पर न्यूक्लियर एक्सप्लोजन करने, इनविजिबल होने के लिए कपड़ा बनाने, एंटी ग्रैविटी टेक्नोलॉजी और टाइम ट्रैवलिंग मशीन बनाने जैसे मिशन्स पर रिसर्च की जा रही थी। हालांकि, अब तक इनमें से कोई भी चीज सच में नहीं हो पाई है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। अंतरिक्ष में कई रहस्य छिपे हैं। अंतरिक्ष में रोजाना कई ऐसी गतिविधियां होती हैं, जो हमारे लिए शोध का विषय रही हैं। ऐसी ही एक गतिविधि है उल्का पिंडों की बारिश या टूटते तारों का दिखना। ऐसा ही नजारा शुक्रवार रात से अगले कुछ दिनों तक देखने को मिलेगा। सालाना लिरिड उल्का पिंडों की यह बारिश भारतीय शहरों से भी देखने को मिलेगी। ऐसा नजारा अब 29 अप्रैल तक रोज आसमान में देखा जा सकेगा। हालांकि, विशेषज्ञों को कहना है कि कहीं कहीं पर चांद अपनी रोशनी के जरिये ऐसा नजारा दिखने से रोक सकता है। वहीं, खगोलविदों का मानना है कि चांद की रोशनी की वजह से जब उल्कापिंडों को देखना मुमकिन ना हो तो इसे सुबह तड़के देखा जा सकता है। इस साल इस नजारे को देखने में दिक्कत आएगी क्योंकि चांद इसकी दृश्यता 20 से 25 फीसदी तक कम कर देगा। वहीं विशेषज्ञों ने कहा है कि हर घंटे कम से कम 10-15 उल्कापिंडों को बारिश होगी। इन्हें दिल्ली, कोलकाता के साथ-साथ देश के कुछ अन्य हिस्सों से भी देखा जा सकता है। अगले कुछ दिन रात करीब 8:31 बजे इनकी बारिश चरम पर देखी जा सकती है। नासा के अनुसार लिरिड उल्का पिछले 2,700 वर्षों से देखे जा रहे हैं और रात के आकाश में चमकते धूल के निशान और लकीरों को पीछे छोड़ने के लिए जाने जाते हैं। सितारों के लायरा नक्षत्र के नाम पर इनका नाम रखा गया है। यह उल्का धूमकेतु थैचर द्वारा छोड़े गए मलबे के क्षेत्र का हिस्सा हैं। जो वर्तमान में सूर्य से दूर सौर मंडल के माध्यम से चल रहा है। यह अगले 45 साल में अपनी ट्रैजेक्टरी को उलट देगा। धूमकेतु को लंबी अवधि के धूमकेतु के रूप में वगीर्कृत किया गया है और इसे एक बार सूर्य की परिक्रमा करने में 415 वर्ष लगते हैं। मलबे के क्षेत्र तब बनते हैं जब धूमकेतु छोटे-छोटे टुकड़ों को पीछे छोड़ते हुए गुजरते हैं। पृथ्वी की स्थिति के आधार पर जब यह इन मलबे के क्षेत्रों में पहुंचता है तो उल्का वर्षा बनाने के लिए वातावरण में कई टुकड़े जल जाते हैं। लिरिड उल्का की बारिश करीब 3 बार होगी। 3 महीने तक कोई भी टूटा तारा या उल्का पिंड की बारिश देखने को नहीं मिली है। इसे लेकर विशेषज्ञों में उत्साह है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। आप वेजिटेरियन हैं या नॉनवेजिटेरियन? यानी आप शाकाहारी हैं या मांसाहारी? इस सवाल पर कुछ लोगों का जवाब होता है कि वे शाकाहारी हैं, बस अंडा खा लेते हैं। इसके लिए एक नया वर्ड एजिटेरियन होता है। अब सवाल ये है कि अंडा शाकाहार है मांसाहार? क्या आप बता सकते हैं कि अंडा वेज है या नॉनवेज? नहीं बता सकते तो कोई बात नहीं। हम आपको बता देते हैं कि अंडा शाकाहार है या मांसाहार। दरअसल, अंडा वेज भी है और नॉनवेज भी। अब आप सोचेंगे कि ऐसा कैेस हो सकता है! क्षेत्रीय कुक्कुट प्रक्षेत्र भागलपुर की निदेशक डॉ अंजली ने इस बारे में विस्तार से समझाया है। उनके मुताबिक, अगर मुर्गी बिना मुर्गे के संसर्ग में आए अंडा देती है तो उसे टेबल परपस या शाकाहारी अंडा कहा जा सकता है। यहां अंतर फर्टिलाइज्ड अंडे और अनफर्टिलाइज्ड अंडे का होता है। यानी मुर्गियां बिना मुर्गे से संबंध बनाए भी अंडा दे सकती हैं। मुर्गी के अंडा देने की एक नैचुरल प्रक्रिया होती है। चूजा उत्पादन के लिए इनक्वेटर हेचरीज का यूज करते हैं। इसके लिए 10 मुर्गी पर एक मुर्गा छोड़ा जाता है। इस केज में जो अंडा होगा, वह फर्टिलाइज अंडा होगा और उससे चूजा निकल सकता है। ऐसे अंडे को नॉन वेजिटेरियन अंडा कहा जाता है। यानी मुर्गी, मुर्गे के संपर्क में आने के बाद फर्टिलाइजेशन से अंडा देती है। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि अंडे से चूजा निकलता है, इसलिए यह मांसाहार हुआ। लेकिन आपको बता दें कि बाजार में ज्यादातर अंडे अनफर्टिलाइज्ड होते हैं, जिनसे कभी चूजे बाहर नहीं निकल पाएंगे। ऐसे अंडों को टेबल परपस से तैयार किया जाता है। मुर्गी जब 6 महीने की हो जाती है तो हर एक-डेढ़ दिन में अंडे देती है, लेकिन इसके लिए जरूरी नहीं कि उसे मुर्गे से संबंध बनाना पड़े। डॉक्टर अंजली के मुताबिक, शाकाहारी और मांसाहारी अंडे में फर्क करने का एक आसान सा तरीका है। इस तरीके में अंडे को एक टेबल पर बने खांचे में रखा जाता है। इसके बाद बंद कमरे में उस टेबल के नीचे एक बल्ब जलाते हैं। बल्ब की रोशनी एक-एक अंडे के नीचे से गुजारी जाती है। इसमें जिस अंडे से रोशनी पार हो जाए या अंडा पूरी तरह से लाल दिखे तो वह शाकाहारी अंडा होगा। मांसाहार वाले अंडे में ऐसी बात नहीं नजर आएगी।
टीम एबीएन, रांची। देश का गर्व इसरो का जिक्र जब भी आता है तब एक आम हिंदुस्तानी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। अंतरिक्ष की दुनिया में तहलका मचाने वाले देशी इसरो के हर प्रोजेक्ट का हमसफर रहा है रांची का एचईसी। अब 2022 से 24 तक इसरो के गगनयान मिशन को मजबूती के साथ पूरा करने में जोरशोर से जुटी है मदर इंडस्ट्री एचईसी। एचईसी के इसरो प्रोजेक्ट एचएमबीपी के चीफ आॅफ प्लानिंग जेपी प्रसाद बताते हैं कि इसरो के किसी भी मिशन की सफलता पर देशभर में जब तालियों की गूंज सुनाई देती है, तब उस गूंज की आवाज से रांची का एचईसी भी गौरवान्वित महसूस करता है। 2001 से ही एचईसी इसरो के कई प्रोजेक्टस को बिना किसी डिफेक्ट्स को लगातार पूरा करता आ रहा है। अब 2022 से 24 तक के इसरो के गगनयान प्रोजेक्ट्स को एचईसी एक टीम भावना के साथ पूरा करने में जुट गया है। इसरो की ओर से डिमांड किए गये पांच प्रोडक्ट्स को एचईसी अबतक पूरा कर श्रीहरिकोटा भेज चुका है। और अब बचे दो प्रोजेक्ट्स पर तेजी से काम चल रहा है। इन 5 प्रोडक्ट्स को तैयार कर भेजा गया श्रीहरिकोटा : एचएसडी- होरिजेंटल स्लाइडिंग डोर का काम पूरा कर श्रीहरिकोटा भेजा गया, 56 मीटर ऊंचाई, इसका काम रॉकेट को एसेंबल के दौरान डोर को क्लोज करने के लिए फोल्डिंग प्लेटफॉर्म- काम पूरा कर श्रीहरिकोटा भेजा गया, 10 लेयर के प्लेटफार्म का इस्तेमाल सैटेलाइट को एसेंबल करन के लिए ह्वील बोगी- मार्च में काम पूरा कर श्रीहरिकोटा भेजा गया, देश में पहली बार इस तरह का प्रोजेक्ट एचइसी में पूरा किया गया, सैटेलाइट और रॉकेट को ले जाने का भार इसी पर होता है। एमएलपी- मोबाइल लॉन्चिंग पेडस्टल के खुद का भार 1000 टन होता है। यह रॉकेट और सैटेलाइट से जुड़े सामानों को उठाकर लॉन्चिंग तक ले जाता है। इओटी- इलेक्ट्रॉनिक ओवरहेड ट्रेवली क्रेन 200 टन का भार उठाने में सक्षम होता है। रॉकेट और सैटेलाइट के एसेंबल से जुड़े सामानों को उठाने में सक्षम इसरो के तमाम प्रोजेक्टस को पूरा करने के लिए बकायदा एचईसी में अलग-अलग आॅपरेशन हेड के नेतृत्व में काम चल रही है। इसमें सतीश कुमार प्रोजेक्ट आॅफिसर, राम जनम प्रसाद डिजाइनिंग, संजय सिन्हा सर्विसेज एंड मेंटेनेंस और जयंत चटर्जी प्लानिंग प्रोडक्शन की जिम्मेदारी दी गयी है। बात चंद्रयान और मंगलयान की हो या फिर कमिंग सून गगनयान की एचईसी के बनाये प्रोडक्ट इसरो में कल और आज भी अपनी उपयोगिता को साबित कर रहे हैं। मार्च में इसरो के चेयरमैन ने भी अपने दौरे के दौरान एचईसी की जमकर तारीफ की थी। एचईसी के कर्मचारी भी इसरो के प्रोजेक्ट्स से जुड़ने पर खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं। उनकी मानें तो उन्हें इस प्रोजेक्ट्स से जुड़कर एक गौरव और देशभक्ति को जाहिर करने का एहसास होता है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। आज हमारी जिंदगी की बैटरी पर निर्भरता काफी बढ़ गई है। स्मार्टफोन गाड़ियां, स्मार्टवॉच से लेकर तमाम डिवाइस अब बैटरी पर चलते हैं। इन डिवाइसों के चलते ज्यादा लंबे वक्त तक चलने वाली सस्ती बैटरियों की डिमांड भी बढ़ गई है। लेकिन इसी बीच एक ऐसी टेक्नोलॉजी पर काम हो रहा है, जिससे बैटरी 2-4 साल तक नहीं बल्कि 28 हजार साल तक काम करेगी। जानिए क्या है ये डायमंड बैटरी टेक्नोलॉजी और कैसे काम करेगी? techbriefs.com की रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले वक्त में बैटरी अब नैनो डायमंड बैटरी (NDP) पर काम करेगी। ये हाई पॉवर, डायमंड-आधारित अल्फा, बीटा और न्यूट्रॉन वोल्टाइक बैटरी होती है, जो अपने पूरे लाइफ स्पैन में इस्तेमाल होने के दौरान परंपरागत केमिकल बैटरी से अलग ग्रीन एनर्जी देगा। NDB एक न्यूक्लियर जेनरेटर की तरह काम करता है। NDB टेक्नोलॉजी के लिए पॉवर सोर्स इंटरमीडिएट और हाई लेवल रेडियो आइसोटॉप्स होता है जिन्हें सिंथेटिक हीरे के कई लेवल सिक्योरिटी के जरिए शील्डेड किया जाता है। सेल्फ-चार्जिंग प्रोसेस के चलते ये बैटरी 28,000 साल तक चल सकती है, इससे कोई भी डिवाइस या मशीन के पूरी जिंदगी के लिए चार्ज रह सकती है। इस सेल्फ चार्जिंग प्रोसेस के लिए बैटरी को सिर्फ प्राकृतिक हवा की जरूरत होती है। इसका इस्तेमाल कई ऐसे मशीनों और डिवाइसों में हो सकता है, जो अभी तक नहीं हुआ है। इनमें अंतरिक्ष विज्ञान जैसे क्षेत्र प्रमुख हैं। किस टेक्नोलॉजी पर करती है काम : ये डायमंड बैटरियां परमाणु कचरे से बनती हैं। DW की रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में 3 लाख टन से ज्यादा का परमाणु कचरा मौजूद है। इन बैटरियों को परमाणु रिएक्टर से निकले रेडियोधर्मी ग्रेफाइट घटकों को गर्म करके बनाया जाता है। इसके जरिए रेडियोधर्मी कार्बन को कार्बन14 गैस में बदला जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान भारी दवाब डालकर इसे कृत्रिम हीरे में बदला जाता है। ये ऐसे हीरे होते हैं, जो बिजली की सप्लाई करने में सक्षम होते हैं। इन हीरों का उपयोग सभी तरह और आकारों बैटरियों में किया जा सकता है। बाजार में अभी तक इन बैटरियों को बनाया नहीं गया है लेकिन कंपनियां इनके प्रोटोटाइप पर काम कर रही हैं। एक अनुमान के मुताबिक इस साल तक ये बैटरी बाजार में आ जानी चाहिए। पूरी जिंदगी काम करने वाली डिवाइसों में इन बैटरियों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसे सेंसर, घड़ियां और पेसमेकर्स आदि। ये वो डिवाइस हैं, जहां बैटरी बदलना काफी मुश्किल होता है। इसके अलावा इन बैटरियों का इस्तेमाल भविष्य में अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भी किया जा सकता है। अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले रॉकेट और सैटेलाइट आदि एक से ज्यादा बैटरियों को जोड़कर और अधिक ऊर्जा पैदा की जा सकती है। ये ऊर्जा इतनी हो सकती है कि किसी गांव या कस्बे को रोशन कर सकती है। इन बैटरियों के खतरा क्या : DW की रिपोर्ट के मुताबिक इन बैटरियों में हल्की मात्रा में रेडियोधर्मिता होती है। इसलिए लीक नहीं होने दिया जा सकता है। ये इंसानों के लिए बहुत ज्यादा खतरनाक नहीं होता है, लेकिन ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी इसका के जरिए इसको काबू पाया जा सकता है। इन बैटरियों निगरानी के जरिए इन्हें दोबारा इस्तेमाल में लाया जा सकता है।
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