एबीएन डेस्क। देश में 5G एक मृग मरीचिका या Mirage के जैसे हो गया है। जैसे ही लगता है कि बस अब इसकी लॉन्चिंग हो ही जाएगी, तभी कोई अड़ंगा लग जाता है। नीतियों, इक्विपमेंट, चाइनीज वेंडर्स, फिर स्पेक्ट्रम (5G Spectrum) की कीमतों से होता हुआ 5G के हकीकत बनने का संघर्ष अब प्राइवेट एंटरप्राइज और टेलीकॉम ऑपरेटरों की रस्साकसी के बीच फंस गया है। पूरा देश टकटकी लगाए देख रहा है कि कब 5G की घंटी उनके फोनों में बजेगी? कब बिना बफरिंग के वीडियो देखने का मजा मिलेगा? बात तो जुलाई महीने में ही इसके नीलामी (5G Auction) की हो रही है। लेकिन यह अभी देखने वाली बात होगी कि नीलामी कब शुरू होती है और सर्विस का श्रीगणेश कब तक हो पाता है। पहले ये उम्मीद थी कि जुलाई में स्पेक्ट्रम की नीलामी हो जाएगी और अगस्त में इसकी औपचारिक लॉन्चिंग, लेकिन ये आस अब टूटती दिख रही है। 5G स्पेक्ट्रम पर नई रार छिड़ गई है। इस दफा मैदान में टेक कंपनियां और टेलीकॉम ऑपरेटर लाव-लश्कर लेकर आमने-सामने हैं। 5G नेटवर्क को लेकर एमेजॉन इंडिया, मेटा, TCS, L&T जैसी कंपनियों के ब्रॉडबैंक इंडिया फोरम यानी BIF और सर्विस प्रोवाइडर्स के बीच तकरार है। BIF में शामिल कंपनियां चाहती हैं कि दुनियाभर की तर्ज पर भारत में भी सरकार उन्हें सीधे स्पेक्ट्रम दे और इस पर न के बराबर एडमिनिस्ट्रेटिव फीस ले। इन कंपनियों का ये भी दावा है कि चूंकि उनका पब्लिक नेटवर्क्स से कोई लेनादेना नहीं है, ऐसे में देश की सिक्योरिटी को भी कोई खतरा नहीं है। यही नहीं, सरकार को अच्छा-खासा रेवेन्यू भी उनसे मिलेगा। इसके उलट, टेलीकॉम ऑपरेटरों के संगठन सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन (COAI) ने साफ बोल दिया है कि अगर इन प्राइवेट एंटरप्राइजेज को कैप्टिव नेटवर्क्स खड़े करने की इजाजत दी गई तो टेलीकॉम ऑपरेटरों के लिए धंधा करना बेमानी हो जाएगा। COAI का कहना है कि इन कंपनियों को पीछे के दरवाजे से टेलीकॉम के धंधे में उतरने की इजाजत बिलकुल नहीं दी जानी चाहिए। इसके जवाब में टेक कंपनियों ने कहा है कि उन्हें 5G नेटवर्क मिलने से टेलीकॉम ऑपरेटरों को रेवेन्यू लॉस होने की थ्योरी फर्जी है। ट्राई चाहता था कि प्राइवेट कंपनियों को अलग से स्पेक्ट्रम आवंटित कर दिया जाए। लेकिन, डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकॉम यानी DoT ने इसे खारिज कर दिया। क्या है DoT का तर्क : DoT का मानना है कि प्राइवेट एंटरप्राइजेज को टेलीकॉम ऑपरेटरों से स्पेक्ट्रम लीज पर लेना चाहिए। हालांकि, इस पर अंतिम फैसला कैबिनेट में ही होगा। BIF को उम्मीद है कि सरकार DoT के तर्क को खारिज कर देगी और उन्हें अलग से स्पेक्ट्रम आवंटित किए जाने पर ही मुहर लगेगी। अब ये सब कवायद पूरी होने में वक्त लगना तय है। हो सकता है मसला कोर्ट भी चला जाए। लेकिन, बात यहीं तक रुकी नहीं है। अभी एक मसला स्पेक्ट्रम की प्राइसिंग का भी अटका पड़ा है। भले ही ट्राई ने हाल में स्पेक्ट्रम की रिजर्व प्राइसिंग पर अपनी सिफारिशों में कीमतों को 35 से 40 फीसदी तक कम कर दिया है। लेकिन, कंपनियां इस दाम को भी ज्यादा बता रही हैं। अर्न्स्ट एंड यंग EY ने भी हाल में ही कहा है कि भारत में स्पेक्ट्रम का दाम दुनिया के मानकों के मुकाबले कहीं ज्यादा है। सरकार भी उहापोह में है और अभी तक कैबिनेट 5G स्पेक्ट्रम की कीमतों को तय नहीं कर पाई है। खैर, 5G की राह में पचड़े तमाम हैं और सरकार अभी अनिश्चय की स्थिति में है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। हाइपर्शन की गिनती दुनिया के सबसे लम्बे पेड़ों में की जाती है। इसकी लम्बाई 379 फीट को पार कर चुकी है। ऐसे पेड़ों की अपनी जितनी भी खूबियां हैं, उसमें एक खूबी यह भी है कि ये 90 डिग्री की सीध में ही बढ़ते हैं। कभी सोचा है कि से इतनी सीध में ही क्यों बढ़ते हैं। किसी भी पेड़ के 90 डिग्री में बढ़ने के लिए फैक्टर जिम्मेदार होते हैं। जानिए, ऐसा कैसे होता है? पौधे की ग्रोथ के लिए तीन चीजें सबसे ज्यादा जरूरी हैं। प्रकाश, कार्बन-डाई-आॅक्साइड और पानी। किसी भी पेड़ की लंबाई में सूरज की रोशनी का अहम रोल होता है। सूरज की रोशनी के कारण उनमें क्लोरोफिल के निर्माण को बढ़ावा मिलता है। आसान भाषा में समझें तो क्लोरोफिल की मदद से ही ये अपना भोजना बना पाते हैं। अब सवाल उठता है कि सूर्य का प्रकाश तो हर पेड़-पौधे को मिलता है, लेकिन हर पौधा लम्बे होने का रिकॉर्ड नहीं बना पाता। कुछ ही पेड 90 डिग्री की सीध में आगे बढ़ पाते हैं। हर पौधे का अपना एक जीन होता है। यही जीन ही तय करता है पेड़ लम्बा होगा या छोटा। खास जीन की प्रजाति वाले पौधे एक खास रिकॉर्ड बनाते हैं। जो पेड़ 90 डिग्री की सीध में बढ़ने का रिकॉर्ड बनाते हैं, उनके लिए आसपास का महौल भी निर्भर करता है। कुछ ऐसे पेड़ भी होते हैं जिन्हें प्रकाश की अधिक जरूरत होती है। अगल-बगल पेड़ होने के कारण जब उन्हें प्रकाश नहीं मिल पाता तो वो प्रकाश पाने के लिए ऊपर की तरफ बढ़ते हैं। एक यह भी वजह है इनकी लंबाई के लिए। कई पेड़ों की प्रजाति ही ऐसी होती है, जो अपनी लम्बाई के लिए जाने जाते हैं। इस तरह पेड़ों की लम्बाई के लिए कई फैक्टर काम करते हैं।
एबीएन नॉलेज डेस्क। धरती के बाहर जीवन है या नहीं, यह शोध का रोचक विषय रहा है। इस पूरे ब्रह्माण्ड में धरती पर ही जीवन है या दूर आसमान, बादलों के पार भी जीवन संभव है? अंतरिक्ष अनंत है, इसकी कोई सीमा नहीं है। मनुष्य एक हद तक अंतरिक्ष के बारे में जानकारी ले सकता है, इससे आगे की खबर स्वयं प्रकृति समय-समय पर धरती पर रहने वाले बुद्धिजीवियों को देता रहता है। जापान के वैज्ञानिकों का दावा है कि धरती के बाहर भी जीवन है। जापानी शोधकर्ताओं ने एक क्षुद्रग्रह में अमीनो एसिड की खोज की है। उन्होंने हायाबुसा 2 मिशन द्वारा एस्टेरॉयड रयुगु से लौटे नमूनों में 20 अमीनो एसिड की पहचान की। वैज्ञानिकों का दावा है कि, अंतरिक्ष से आने वाले एस्टेरॉयड में 20 अमीनो एसिड पाए गए हैं। उन्होंने कहा ये अमीनो एसिड यह पुष्टि करता है कि धरती के बाहर दूर गगन में भी जीवन है। होक्काइडो यूनिवर्सिटी के भू-विज्ञान के प्रोफेसर हिसायोशी युरीमोटो ने स्पेस डॉट कॉम को बताया कि पानी और कार्बनिक पदार्थों से भरपूर अरबों साल पहले पृथ्वी को दिए गए जीवन का एक संभावित स्त्रोत है। शोधकर्ताओं का कहना है कि, सभी जीवित चीजों को प्रोटीन की आवश्यकता होती है और अमीनो एसिड से ही इसे तैयार किया जाता है। इससे यह साबित होता है कि धरती के बाहर भी जीवन है। इससे पहले भी वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में कहा था कि एस्टोरॉयड में कार्बन और ऑर्गेनिक मैटर पाए जाते हैं। जापानी शोधकर्ताओं की इस रिसर्च में यह साबित भी हुआ है। जापानी स्पेस एजेंसी जाक्सा को इस रिसर्च से कई उम्मीदे हैं। जाक्सा का मानना है कि इस शोध के जरिए कई रहस्य सामने आ सकते हैं। जैसे धरती के बाहर जीवन की कितनी संभावना है। धरती के बाहर इंसान का जीवन क्या वाकई में संभव है। रिसर्च से इन सवालों का जवाब भी इस शोध से पता लग सकता है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारतीय रेल हर रोज लाखों लोगों को अपने गंतव्य तक पहुंचाने का काम करती है। रेलवे की ओर से हर वर्ग के यात्री को हरसंभव सुविधाएं देने की कोशिश की जाती है। इसके अलावा रेलवे यात्रियों और उसके सामान को सुरक्षा देने की कोशिश करता है। कई बार होता है कि यात्री अपना सामान ट्रेन में छोड़ देते हैं, इस स्थिति में रेलवे की कोशिश रहती है कि वो सामान यात्री को मिल जाए। ऐसे में जानते हैं जब ट्रेन में बैग छूट जाता है तो उसका क्या किया जाता है... जब कभी किसी यात्री का बैग ट्रेन में छूट जाता है तो उसे स्टेशन पर जमा करवा दिया जाता है। दरअसल, छूटे हुए बैग आदि को रेलवे कर्मचारी स्टेशन मास्टर को जमा करवा देते हैं। इसके बाद सामान के आधार पर आगे की प्रक्रिया डिसाइड होती है। जैसे मान लीजिए अगर बैग में कोई ज्वैलरी आदि है तो इसे 24 घंटे ही रेलवे स्टेशन पर रखा जाता है। अगर 24 घंटे में कोई इस सामान पर क्लेम करता है तो उसे दे दिया जाता है। अगर कोई क्लेम नहीं करता है तो उसे जोनल ऑफिस में भेज दिया जाता है। वहीं, अगर सामान्य सामान होता है तो तीन महीने का टाइम होता है। रेलवे अधिकारी इसे तीन महीने तक अपने पास ही रखते हैं और उसके बाद उसे आगे भेज दिया जाता है। लंबे समय तक सामान पड़े रहने पर उसे बेचने या निपटारे के भी नियम हैं। कभी बैग छूट जाए तो क्या करें : अगर कभी आपका बैग ट्रेन में छूट जाए तो आप रेलवे पुलिस को इसकी जानकारी दे। आप आरपीएफ में इसकी एफआईआर भी दर्ज करवा सकते हैं। ऐसे में रेलवे और पुलिस की जिम्मेदारी बनती है कि वो आपके सामान को ढूंढने का प्रयास करते हैं। इस कई तरह से जांच आगे बढ़ती है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। हवाई चप्पल तो आप सभी पहनते होंगे! मतलब स्कूल, कॉलेज, दफ्तर वगैरह भले ही जूते पहनकर जाते होंगे, लेकिन घर पर, मॉर्निंग वॉक वगैरह करते समय आप हवाई चप्पल ही पहनते होंगे! दिनभर जूते पहनने के बाद घर लौटकर हवाई चप्पल में जो आराम मिलता है, वह और कहां! चमड़े के चप्पल-जूते या फिर डिजाइनर फुटवियर एक तरफ और हवाई चप्पल एक तरफ। हवाई चप्पल को स्लीपर भी कहा जाता है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इसके अलग नाम हो सकते हैं, लेकिन भारत में हम सभी इसे हवाई चप्पल ही कहते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं, इसका नाम हवाई चप्पल कब और क्यों पड़ा? दो फीते वाले इस हवाई चप्पल का डिजाइन बहुत ही पुराने समय से चला आ रहा है। न केवल भारत, बल्कि चीन, जापान, अमेरिका समेत दुनिया के अलग-अलग देशों में इस तरह की चप्पलों की पुरानी तस्वीरें मिलती हैं। हालांकि सवाल ये है कि इसका नाम हवाई चप्पल ही क्यों पड़ा। ये हवाई शब्द इसमें क्यों और कैसे जुड़ा, इसकी कहानी दिलचस्प है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस दो पट्टे वाली चप्पल के नाम में हवाई जुड़ा, अमेरिका में मौजूद हवाई आईलैंड की वजह से। दरअसल, इस आइलैंड पर टी नाम का एक पेड़ होता है, जिससे रबरनुमा फैब्रिक तैयार कर के चप्पलें बनाई जाती हैं। शुरुआत में इसी वजह से इस चप्पल के नाम में हवाई शब्द जुड़ गया और यह हवाई चप्पल हो गया। हालांकि कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, हवा जैसी हल्की होने के कारण इसके नाम में हवाई शब्द जुड़ा। इसके इतिहास के बारे में बताया जाता है कि वर्ष 1880 में जापान के गांवों से मजदूरों को फैक्ट्रियों, कल-कारखानों और खेतों में काम करने के लिए अमेरिका के हवाई आईलैंड लाया गया था। उन्हीं के साथ चप्पलों का यह डिजाइन हवाई आइलैंड पहुंचा। वर्ष 1932 में कोबलर एल्मर स्कॉट ने हवाई आइलैंड पर चप्पल बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले रबरनुमा फैब्रिक को जापानी डिजाइन में ढाला और हवाई चप्पलें अस्तित्व में आईं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हवाई चप्पलों का सबसे पहले इस्तेमाल प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिकी सैनिकों ने किया था। हवाई चप्पल का नाम फेमस करने के पीछे हवाइनाज की भूमिका बताई जाती है, जो ब्राजील का एक फुटवियर ब्रांड है। वर्ष 1962 में हवाइनाज ने रबर की चप्पलें लॉन्च की थीं। नीली स्ट्रिप के साथ सफेद-नीले रंग की ये वही चप्पलें थीं, जिसकी तस्वीर हवाई चप्पल का नाम लेते ही हमारे जेहन में उभरती है। वहीं भारत के घर-घर में हवाई चप्पल को पहुंचाने में बाटा कंपनी की भूमिका मानी जाती है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा आने वाले सालों में कई बड़े अभियानों पर काम करने जा रही है। इसमें चंद्रमा और मंगल पर भेजे जाने वाले मानव अभियान भी शामिल हैं। हाल ही में एजेंसी ने अमेरिकी उद्योग, शिक्षा, अंतरराष्ट्रीय समुदाय, और लोगों से अपने डीप स्पेस एक्सप्लोरेशन अभियानों और कार्यक्रमों की रणनीति और उद्देश्यों के लिए सुझाव मांगे हैं। इसके साथ ही नासा ने मंगल और चंद्रमा अभियानों के लिए उच्च स्तरीय उद्देश्यों की सूची भी जारी की है। इसमें उनसे मंगल अभियान की योजना के बारे में भी कुछ जानकारी भी है। कितने दिन रुकेंगे मंगल पर : नासा के लक्ष्यों में मंगल के लिए उसका महत्वाकांक्षी मानव अभियान है। इस अभियान में दो लोग मंगल की सतह पर 30 दिन के लिए रुकेंगे। नासा ने लोगों से फीडबैक मांगा है कि उसकी योजना कैसी चल रही है। इसके लिए पूर्वनियत आखिरी तारीख को 31 मई से आगे बढ़ा कर 3 जून कर दिया गया है। क्या आगे खिसका है अभियान : नासा ने बताया है कि उसका लक्ष्य मंगल पर जाने के लिए 2030 दशक के अंत या फिर 2040 के दशक के शुरुआत में है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि दो साल पहले ही यह लक्ष्य 2030 के दशक की शुरुआत से मध्य तक का अनुमानित किया गया था। फिर भी इस बार तो समय बताया जा रहा है उसमें माना गया रहै कि फंडिंग और तकनीकी की वजह से इस कार्यक्रम के कालक्रम में बदलाव नहीं आएगा। गुरुत्व की विविधता : नासा के अनुसार अब भी पृथ्वी से मंगल तक जाने, वहां रुकने और फिर वापस आने में 500 दिन का ही समय लगेगा। इसके अलावा कई तरह की चुनौतियों का सामना करना होगा। गुरुत्व की विविधता भी एक समस्या होगी। अंतरिक्ष यात्री महीनों सूक्ष्मगुरुत्व में रहकर सफर करते हुए मंगल पर पहुंचेंगे जहां उन्हें मंगल के गुरुत्व का सामना करना होगा जो पृथ्वी के गुरुत्व का एक तिहाई है। नासा का सुझाव : नासा ने सुझाया है कि इस समस्या से निपटना का एक रास्ता यह हो सकता है कि मिशन के दौरान क्रू सदस्य दबाव वाले रोवर में ही रहें। नासा क स्पेस आर्कीटेक्चर्स के निदेशक कर्ट वोगेल ने कहा,हम विज्ञान पर ज्यादा जोर देना चाहते हैं इसलिए हमें उन्हें हालात के आदी होने से पहले बाहर चहलकदमी करने पर जोर नहीं देंगे। अपोलो कार्यक्रम की तरह : फिलहाल नासा के इस मिशन की योजना शुरुआती चरणों में हैं और बाद में बदल भी सकती है। फिलहाल, नासा ऐसे अंतरिक्ष यान के उपयोग पर विचार कर रहा है जो हाइब्रिड रॉकेट चरण हो (यानि जिसमें रासानियक और विद्युत नोदन दोनों का उपयोग हो। इस अभियान में चार लोग मंगल तक लंबी यात्रा तक जाएंगे जिनमें से दो सतह पर उतरेंगे। यह अपोलो कार्यक्रम की ही तरह है जिसमें तीन यात्री जाते थे।
एबीएन नॉलेज डेस्क। वैज्ञानिकों ने सुपर टमाटर विकसित किया है। उनका दावा है कि यह खास तरह का टमाटर है। इसमें उतना विटामिन-डी है जितना दो अंडों में होता है। यह बच्चे और वयस्क की रोजाना की विटामिन-डी3 की जरूरत को पूरा कर देगा। इतना ही नहीं, यह इंसानों में कई बीमारियों जैसे- कैंसर, डिमेंशिया और पार्किंसंस डिजीज के पनपने के खतरे को कम करेगा। इस टमाटर को तैयार करने वाले नॉर्विक के जॉन इंस सेंटर के वैज्ञानिकों का कहना है, दुनियाभर ऐसे लोगों की संख्या काफी ज्यादा है जो विटामिन-डी की कमी से जूझ रहे हैं। कैसे तैयार हुआ सुपर टमाटर : ब्रिटिश वैज्ञानिकों का कहना है, इस सुपर टमाटर को जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से तैयार किया गया है। आसान भाषा में समझें तो हर पौधे और इंसान का अपना एक जीन होता है। जीन में बदलाव करने पर उस चीज में भी परिवर्तन होने लगते हैं। इसे ही जेनेटिक इंजीनियरिंग कहते हैं। सुपर टमाटर के जीन में ऐसा ही बदलाव किया गया है कि इससे अधिक विटामिन-डी3 मिल सके। वैज्ञानिकों का कहना है जेनेटिक इंजीनियरिंग के जरिए इसमें इतना बदलाव किया गया है कि यह दो अंडे या 28 ग्राम टूना फिश से मिलने वाले विटामिन-डी की कमी पूरी कर सकता है। क्यों खास है यह टमाटर : डेलीमेल की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनियाभर में करीब 100 करोड़ लोग विटामिन-डी की कमी से जूझ रहे हैं, जिसकी वजह से कई तरह की बीमारियां बढ़ती हैं। विटामिन-डी आमतौर पर सुबह-सुबह सूरज की हल्की धूप में बैठने पर शरीर में बनता है, लेकिन सर्दियों के दिनों में धूप नहीं मिल पाती, इसलिए विटामिन-डी की कमी हो सकती है। ऐसे में विटामिन-डी की कमी पूरी करने के लिए मछली, रेड मीट, अंडे पर निर्भर रहता पड़ता है। ब्रिटेन में हर 6 में से एक इंसान विटामिन-डी की कमी से जूझ रहा है। ऐसे में सुपर टमाटर इसका अच्छा सोर्स हो सकता है। विटामिन-डी क्यों जरूरी है, अब इसे समझ लेते हैं : शरीर में कैल्शियम के अवशोषण के लिए विटामिन-डी होना बहुत जरूरी है। ऐसा न होने पर हड्डियां, दांत और मांसपेशियां कमजोर हो सकती हैं। इसकी कमी होने पर बच्चों में रिकेट्स नाम की बीमारी हो सकती है और वयस्कों में हड्डियों में दर्द बना रह सकता है, जिसे ऑस्टियोमेलेसिया कहा जाता है। इसके अलावा विटामिन-डी मूड को बेहतर बनाता है, रोगों से लड़ने की क्षमता यानी इम्युनिटी को बढ़ाता है और बेहतर नींद के लिए जिम्मेदार होता है। शोधकर्ताओं का कहना है, पौधों के जरिए विटामिन-डी की पूर्ति ठीक से नहीं हो पाती, इसके लिए ज्यादातर मांसाहार खानपान पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे में सुपर टमाटर एक बेहतर विकल्प है, जिसे शाकाहारी और मांसाहारी दोनों लोग चुन सकते हैं।
एबीएन नॉलेज डेस्क। आजकल टैटू बनवाना एक नया फैशन बन गया है और काफी लोग शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर टैटू बनवा रहे हैं। लेकिन, टैटू को लेकर कहा जाता है कि इसे बनवाने के कई तरह नुकसान होते हैं। इन नुकसान में नौकरी ना लगने के तर्क के साथ ये भी कहा जाता है कि टैटू बनवाने के बाद कोई व्यक्ति कभी भी ब्लड डोनेट नहीं कर सकता है। इंटरनेट पर कई रिपोर्ट्स में और सोशल मीडिया पर यह जानकारी शेयर की जाती है कि जिस व्यक्ति ने अपने शरीर के किसी हिस्से में टैटू करवा रखा है तो वो जिंदगी भर ब्लड डोनेट नहीं कर सकता है। हालांकि, डॉक्टर्स का इस मामले में कुछ और कहना है। ऐसे में आज हम आपको बताते हैं कि सोशल मीडिया पर टैटू और ब्लड डोनेशन को लेकर जो जानकारी शेयर की जाती है, उसमें कितनी सच्चाई है। दरअसल, सोशल मीडिया पर टैटू को लेकर कई गलत जानकारी दी जाती है तो जानते हैं ये तथ्य कितने सही है और इस पर डॉक्टर्स का क्या कहना है? क्या है इसका सच : डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट के अनुसार, ऐसा नहीं है कि एक बार टैटू करवाने के बाद व्यक्ति कभी भी खून डोनेट नहीं कर सकता है। टैटू करवाने के बाद भी एक व्यक्ति आसानी से ब्लड डोनेट कर सकता है। लेकिन, इस रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर किसी ने हाल ही में टैटू करवाया है तो वो ब्लड डोनेट नहीं कर सकता है। टैटू करवाने के करीब 6 महीने बाद तक कोई भी व्यक्ति ब्लड डोनेट नहीं कर सकता है और इसके बाद डोनेट कर सकता है। इसके अलावा पीयरसिंग को लेकर भी कहा जाता है कि अगर किसी ने पीयरसिंग करवाई है तो वो व्यक्ति भी ब्लड डोनेट नहीं कर सकता है। हालांकि, इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि अगर किसी ने बॉडी पियरसिंग किसी हेल्थ प्रोफेशनल और पियरसिंग से होने वाली सूजन ठीक हो गई है, तो पियरसिंग करवाने के करीब 12 घंटे बाद भी ब्लड डोनेट किया जा सकता है। इसलिए अगर आप ब्लड डोनेट करना चाहते हैं तो पहले इन बातों का जरूर ध्यान रखें। क्या कहते हैं एक्सपर्ट : वहीं, इस पर एशियन हॉस्पिटल की एसोसिएट डायरेक्टर (लेबोरेट्री) डॉक्टर उमा रानी का कहना है, अगर किसी ने टैटू बनवाया है तो वो एक साल तक ब्लड डोनेट नहीं कर सकते हैं। टैटू को मल्टीपल पियरसिंग माना जाता है, इसलिए कुछ दिन का इंतजार करना आवश्यक है। इसके अलावा अगर शरीर में कोई छोटी सी भी सर्जरी हुई है तो ऐसी स्थिति में ब्लड डोनेट के लिए वैट करना होता है। इसके अलावा दिल्ली के पीएसआरआई हॉस्पिटल की डॉक्टर विनीता का कहना है, अगर किसी व्यक्ति ने टैटू करवाया है तो 6 महीने तक ब्लड डोनेट नहीं कर सकता है। दरअसल, टैटू में निडल से काफी पियरसिंग होती है और इससे काफी इंफेक्शन हो सकते हैं। ऐसे में उसके एचआईवी, हेपेटाइटस बी आदि हो सकते हैं और ये ट्रांसमिसबल होते हैं, इससे दूसरे मरीज के होने के कारण बढ़ जाते हैं। वहीं, अगर किसी ने हेल्थ एक्सपर्ट से पियरसिंग करवाया है तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन अगर कहीं से भी पियरसिंग करवाई है तो इसके लिए वेट करना चाहिए। इसके साथ ही जिन लोगों के बुखार, जुकाम आदि है तो भी ब्लड डोनेट से बचना चाहिए।
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