एबीएन नॉलेज डेस्क। धरती पर पानी कैसे आया? ये सवाल लंबे समय से चर्चा का विषय है और अभी तक इसका पुख्ता जवाब नहीं मिला है। हालांकि, इसे लेकर कई तरह के दावे जरूर किए गए हैं और हर बार वैज्ञानिक धरती पर पानी आने के अलग अलग कारण बताते हैं। अब इस संदर्भ में एक और दावा किया गया है और बताया धरती पर पानी आने की कुछ संभावनाएं बताई गई है। हाल ही में एक स्टडी सामने आई है, जिसमें बताया गया है कि पृथ्वी पर पानी आने की वजह एस्टेरॉइड है। यह स्टजी जापान की एक वैज्ञानिक टीम की ओर से की गई है। दरअसल, जापान ने एक एस्टरॉइड की स्टडी के लिए हायाबूसा-2 नाम का स्पेसक्राफ्ट भेजा था। इस एस्टेरॉइड का नाम रीयुगू है, जिस पर रिसर्च की जा रही थी। अब इस एस्टेरॉइड पर लगी धूल की स्टडी से पानी का संकेत मिला है। वैसे यह सैंपल साल 2020 में आ गए थे और अब उस पर जांच की जा रही थी। इसके जरिए दावा किया जा रहा है कि इस एस्टेरॉइड पर पुराने मौलिक तत्व मिले थे। धूल के कणों में कई ऑर्गेनिक मैटेरियल मिले थे, जो धरती पर जीवन की उत्पत्ति के सोर्स हो सकते हैं। इसके असात ही इसमें अमोनी एसिड्स को लेकर भी कई बातें सामने आई हैं। अब एस्टेरॉइड से ग्रह और धरती बनने की बातें सामने आ रही हैं। जानकारी मिली है कि ऑर्गेनिक रिच-सी टाइप एस्टेरॉयड के जरिए धरती पर पानी आया हो सकता है। इसमें कुछ चीजें ऐसी मिली हैं, जिनके आधार पर कहा जा रहा है कि 450 करोड़ साल पहले एस्टेरॉयड रीयुगू पर जीवन के संकेत थे।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। मुंबई में डबल डेकर बस के ऊपरी हिस्से में बैठकर हवा खाना अब बीते दिनों की बात होगी; क्योंकि बेस्ट ने पहली इलेक्ट्रिक एसी डबल डेकर बस बृहस्पतिवार को सड़क पर उतार दी है। इसमें यात्रा को लेकर मुंबईवासी खासे उत्साहित हैं। वर्षों से पारंपरिक डबल डेकर बस में यात्रा करने वाले कई यात्री इस बात से सहमत दिखे कि नयी इलेक्ट्रिक एसी डबल डेकर बस में लगी बड़े शीशे वाली खिड़कियों से नजारा और बेहतर दिखेगा। हिंदुजा समूह की प्रमुख कंपनी अशोक लेलैंड की इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) इकाई स्विच मोबिलिटी ने बृहस्पतिवार को यहां देश की पहली इलेक्ट्रिक डबल डेकर वातानुकूलित बस का अनावरण किया। 65 सीटो वाली नयी बसें मुंबई नगर निकाय की सार्वजनिक परिवहन इकाई बृहन्मुंबई विद्युत आपूर्ति और परिवहन (बेस्ट) उपक्रम के मौजूदा डबल-डेकर बेड़े की जगह लेंगी। आर्किटेक्ट विवेक पी ने कहा, बचपन में मुझे आगे की सीट पर बैठना पसंद था। बस में बैठकर बाहर का नजारा और हवा के झोंके अलग ही आनंद देते थे। मैं अपनी दादी का हाथ छुड़ाकर बस के ऊपरी हिस्से में अगली सीट पर बैठने के लिए दौड़ पड़ता था। नयी बसों में हम यह सब चीजें याद करेंगे। इस बीच, कई यात्री नयी इलेक्ट्रिक बस पर किए गए पेंट के रंगों को लेकर इसकी आलोचना कर रहे हैं। उनका कहना है कि बस पर लाल की तुलना में काले रंग को अधिक तरजीह दी गई है। एक यात्री अक्षय मराठे ने ट्वीट किया, डबल डेकर बस पर काले रंग का जोर अधिक है। दो डेक के बीच का रंग लाल होना चाहिए। नयी बस में पुरानी डबल डेकर के विपरीत दो सीढ़ियां हैं, जिनमें से एक पिछली तरफ जबकि दूसरी चालक सीट के पीछे है। नयी डबल डेकर बस के अंदरुनी डिजाइन में हरे-सफेद रंग की सीट दी गई है, जिसमें बेल्ट भी है। वहीं, यात्रियों की सुविधाओं के तहत लैपटॉप और मोबाइल फोन चार्जिंग पॉइंट भी दिए गए हैं।
एबीएन नॉलेज डेस्क। आने वाले समय में लैपटॉप, मोबाइल फोन सहित सभी इलेक्ट्रॉनिक पोर्टेबल उपकरण एक ही चार्जर से चार्ज हो सकेंगे। सरकार इस मामले में विशेषज्ञों का समूह स्थापित करेगी। यह समूह दो महीने में इस पर रिपोर्ट देगा। उपभोक्ता मामलों के सचिव रोहित कुमार सिंह ने बुधवार को यह जानकारी दी। उन्होंने इस उद्योग से जुड़े लोगों के साथ बैठक की थी। बैठक में एसोचैम, आईआईटी कानपुर, आईआईटी बीएचयू, फिक्की, सीआईआई सहित तमाम संगठन के प्रतिनिधि शामिल थे। उन्होंने कहा कि भारत में दो प्रकार के चार्जर पर विचार हो सकता है। इसमें सी टाइप पोर्ट भी शामिल होगा। सचिव रोहित कुमार सिंह ने कहा, इस महीने समूह बन जायेगा। उसे दो महीने में रिपोर्ट देनी होगी। इससे जुड़े संघ और निर्माता ई-कचरे की चिंताओं से सहमत हैं, फिर भी इस पर चर्चा की मांग की गई है। रोहित सिंह ने कहा, यह एक जटिल मुद्दा है। चार्जर के निर्माण में भारत का अपना एक स्थान है। अंतिम निर्णय लेने से पहले हमें हर किसी के नजरिये से इसे समझना होगा। इसमें उद्योग, ग्राहक, निर्माता और पर्यावरण जैसे क्षेत्र हैं। प्रत्येक हितधारक का एक अलग नजरिया है। उनके लिए अलग विशेषज्ञ समूह बनाये जायेंगे।
एबीएन नॉलेज डेस्क। चंद्रमा की उत्पत्ति के बारे में नया शोध सामने आया है। वैज्ञानिकों ने पहली बार ठोस प्रमाण खोजा है, जिससे पता चला है कि चंद्रमा में मौजूद हीलियम और नियॉन जैसा गैसें धरती की पांच परतों में से एक मेंटल से मिली हैं। साइंस एडवांसेज जर्नल में प्रकाशित खोज उस सिद्धांत को और भी मजबूत करती है, जिसमें कहा गया है कि चंद्रमा की उत्पत्ति धरती और अन्य खगोलीय पिंड की टक्कर की वजह से हुई है। इस अध्ययन के जरिये उन जटिल सवालों का जवाब तलाशने में भी मदद मिल सकती है, जिससे पता चल सकता है कि आखिर पृथ्वी, चंद्रमा और अन्य खगोलीय पिंड की उत्पत्ति कैसे हुई है। मेंटल गैस धरती के अंदर करीब 2,890 किमी तक स्थित है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। दूरसंचार कंपनी भारती एयरटेल इसी महीने से 5जी सेवाएं शुरू करने जा रही है। कंपनी का लक्ष्य मार्च, 2024 तक देश के सभी शहरों तथा प्रमुख ग्रामीण क्षेत्रों में 5जी सेवाएं शुरू करने का है। कंपनी के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) गोपाल विट्टल ने मंगलवार को यह जानकारी दी। उन्होंने यह भी कहा कि देश में मोबाइल सेवाओं की कीमत काफी कम है और इसे बढ़ाये जाने की जरूरत है। विट्टल ने कहा, हमारा 5जी सेवाएं अगस्त से शुरू करने का इरादा है। जल्दी ही इसे देशभर में पहुंचाया जाएगा। हमें भरोसा है कि हम मार्च, 2024 तक देश के प्रत्येक शहर और प्रमुख ग्रामीण इलाकों में 5जी सेवाएं शुरू कर देंगे। उन्होंने कंपनी के वित्तीय परिणाम पर बातचीत में कहा, वास्तव में, देश में 5,000 शहरों में नेटवर्क क्रियान्वयन की विस्तृत योजना पूरी तरह तैयार है। यह कंपनी के इतिहास में अबतक का सबसे बड़ा क्रियान्वयन होगा। भारती एयरटेल ने हाल में संपन्न स्पेक्ट्रम नीलामी में पूरे देश में 3.5 गीगाहर्ट्ज और 26 गीगाहर्ट्ज बैंड में 19,867.8 मेगाहर्ट्ज फ्रीक्वेंसी हासिल की। कंपनी ने कुल 43,040 करोड़ रुपए में निम्न और मध्यम बैंड में स्पेक्ट्रम खरीदा है। विट्टल ने कहा कि कंपनी का पूंजी व्यय मौजूदा स्तर पर बना रहेगा। उन्होंने महंगे और बेहतर माने जाने वाले 700 मेगाहर्ट्ज बैंड में स्पेक्ट्रम खरीदने की जरूरत को तवज्जो नहीं दी। इस बैंड में स्पेक्ट्रम से अन्य बैंड के मुकाबले दूरसंचार सेवाओं के लिए कम मोबाइल टावर लगाने की जरूरत होती है। उन्होंने कहा, हमारी प्रतिस्पर्धी कंपनियां के पास बड़े स्तर पर मध्यम बैंड स्पेक्ट्रम नहीं है। अगर हमारे पास इतने बड़े स्तर पर मूल्यवान मध्यम बैंड में स्पेक्ट्रम नहीं होता, तो हमारे लिए 700 मेगाहर्ट्ज बैंड में स्पेक्ट्रम लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। विट्टल ने कहा कि कंपनी के पास 900 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम बैंड है और उसकी तुलना में 700 मेगाहर्ट्ज बैंड में नेटवर्क से कोई अतिरिक्त कवरेज नहीं मिलता है। उन्होंने कहा कि एयरटेल की मासिक प्रति ग्राहक औसत कमाई (एआरपीयू) 183 रुपये है और इसके जल्दी ही शुल्क दरों में वृद्धि के साथ 200 रुपये तथा अंतत: 300 रुपये पर पहुंचने का अनुमान है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से मच्छर अन्य लोगों की तुलना में किसी एक व्यक्ति की तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं। न्यू मैक्सिको स्टेट यूनिवर्सिटी में सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रोफेसर डॉ जगदीश खुबचंदानी ने अनुसार यदि घर में सात व्यक्ति हैं तो किसी एक व्यक्ति को मच्छर सबसे ज्यादा काटते हैं और उसके मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया आदि बीमारियों की चपेट में आने की अत्यधिक आशंका रहती है। डॉ खुबचंदानी ने कहा कि मच्छर करीब 3,500 से अधिक प्रकार हैं जिनमें से कुछ ही लोगों को काटते हैं। खास बात यह है केवल मादा मच्छर ही लोगों को काटती हैं क्योंकि उन्हें अपने अंडों के लिए प्रोटीन के स्रोत के रूप में रक्त की आवश्यकता होती है। एनोफिलीज प्रजाति के मच्छर मलेरिया, पीले बुखार और डेंगू का कारण बनने वाले विषाणुओं समेत कई जानलेवा बीमारी के लिए जिम्मेदार हैं। वर्ष 1968 की शुरुआत में एक अध्ययन में पाया गया कि पीले बुखार के लिए जिम्मेदार मच्छर लैक्टिक एसिड से अत्याधिक आकर्षित होते हैं। इसे मच्छरों के लिए एक हस्ताक्षर मानव गंधक कहा गया है। व्यायाम करते समय लैक्टिक एसिड अधिक बनता है, इसलिए व्यायाम करने के बाद साबुन से अच्छी तरह स्नान कर लेना चाहिए। उन्होंने कहा, हमें भाने वाली तुलसी, लैवेंडर, लेमन थाइम और गेंदे के फूल जैसे सुगंधित पौधे की खुशबू से मच्छर दूर रहते हैं। उन्होंने कहा कि एक से अधिक अध्ययनों से पता चला है कि मच्छरों को आकर्षित करने अथवा दूर रखने में व्यक्तियों का रक्त समूह भी जिम्मेदार है। ब्लड ग्रुप ‘ए’ वाले लोगों के लिए यह अच्छी खबर है। मच्छरों को यह ग्रुप कम आकर्षक लगता है, लेकिन ब्लड ग्रुप ‘ओ’ के लिए यह इतना अच्छा नहीं है। इस ब्लड ग्रुप वाले लोगों से मच्छर ‘ए’ ग्रुप वाले की तुलना में दोगुना आकर्षित होते हैं, लेकिन ‘ओ’ ग्रुप वाले व्यक्तियों के लिए राहत की बात है कि वे गंभीर मलेरिया की चपेट में नहीं आते हैं। इन अध्ययनों में शरीर की गंध, शरीर का रंग, त्वचा का तापमान और बनावट, त्वचा पर रहने वाले रोगाणुओं, गर्भावस्था की स्थिति, मनुष्यों द्वारा उत्सर्जित कार्बन डाइआॅक्साइड, शराब और आहार के प्रकार पर चर्चा की गई है। कुल मिलाकर, अध्ययनों से पता चलता है कि गर्भवती महिलाएं, उच्च शरीर के तापमान और पसीने वाले लोग, विविध त्वचा सूक्ष्म जीवों की उपस्थिति, और गहरे रंग की त्वचा वाले लोग मच्छर को अधिक संवेदनशील हो सकते हैं।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने रविवार (7 अगस्त 2022) को देश का नया रॉकेट लॉन्च किया। लॉन्चिंग आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर के लॉन्च पैड एक से सफलतापूर्वक की गई। स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (Small Satellite Launch Vehicle - SSLV) में EOS02 और AzaadiSAT सैटेलाइट्स भेजे गए हैं, लॉन्चिंग सफल रही। रॉकेट ने सही तरीके से काम करते हुए दोनों सैटेलाइट्स को उनकी निर्धारित कक्षा में पहुंचा दिया। रॉकेट अलग हो गया लेकिन उसके बाद सैटेलाइट्स से डेटा मिलना बंद हो गया। ISRO प्रमुख एस सोमनाथ ने कहा कि इसरो मिशन कंट्रोल सेंटर लगातार डेटा लिंक हासिल करने का प्रयास कर रहा है, हम जैसे ही लिंक स्थापित कर लेंगे, देश को सूचित करेंगे। EOS02 एक अर्थ ऑब्जरवेशन सैटेलाइट हैं, जो 10 महीने के लिए अंतरिक्ष में काम करेगा। इसका वजन 142 किलोग्राम है। इसमें मिड और लॉन्ग वेवलेंथ इंफ्रारेड कैमरा लगा है, जिसका रेजोल्यूशन 6 मीटर है, यानि यह रात में भी निगरानी कर सकता है। AzaadiSAT सैटेलाइट्स स्पेसकिड्ज इंडिया नाम की देसी निजी स्पेस एजेंसी का स्टूडेंट सैटेलाइट है, इसे देश की 750 लड़कियों ने मिलकर बनाया था।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत के इतिहास के पन्नों में साल 1995 का जिक्र इंटरनेट की वजह से किया जाता है। साल 1995 में ही भारत में सबसे पहले इंटरनेट की शुरुआत हुई थी। यह कारनामा 15 अगस्त 1995 को कियागया था और इस दिन से भारत में इंटरनेट सर्विस की शुरुआत हो गई। बता दें कि 1995 में विदेश संचार निगम लिमिटेड ने पहली बार पब्लिक इंटरनेट की शुरुआत की थी। इससे पहले आम आदमी के लिए इंटरनेट की सुविधा नहीं थी। वैसे इससे पहले भी इंटरनेट की सुविधा थी, लेकिन कमर्शियल स्तर पर 1995 में शुरुआत हुई। रिपोर्ट्स के अनुसार, 1986 में एनसीएसटी और आईआईटी के बीत ईमेल के लिए डायल उप की शुरुआत हुई। इसके साथ ही शिक्षा आदि के लिए इंटरनेट इस्तेमाल होता था। मगर 1995 में इसे कमर्शियल स्तर पर शुरू किया गया। इस वक्त इंटरनेट काफी महंगा था और कहा जाता है कि उस वक्त स्पीड 10 केबीपीएस थी और 250 घंटे के इंटरनेट के लिए 15 हजार रुपये तक देने पड़ते थे। ऐसे में उस वक्त काफी महंगा इंटरनेट था। उस दौरान प्रोफेशनल्स, नॉन प्रोफेशनल्स, कमर्शियल, एक्सपोटर्स और सर्विस प्रोवाइडर को अलग-अलग रेट पर इंटरनेट मिलता था। साथ ही इनके प्लान 9.6 केबीपीएस, 64 केबीपीएस और 128 केबीपीएस के आधार पर होते थे। इसके लिए इंटरनेट यूजर्स को लाखों रुपये खर्च करने पड़ते थे और इंटरनेट चलाने के लिए भी एक लैंडलाइन फोन की आवश्यकता होती थी।
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