एबीएन नॉलेज डेस्क। खगोलीय घटनाओं को वैज्ञानिक नजरिए से देखने-समझने का अभ्यास करने वाले लोगों के लिए चंद्र ग्रहण धर्म से इतर भी गूढ़ अर्थ रखता है।
आज साल 2025 के अंतिम चंद्र ग्रहण के दौरान देशभर में ब्लड मून देखा गया। लगभग तीन साढ़े घंटे से अधिक समय तक चांद पर धरती की छाया पड़ती रही। चंद्रग्रहण की पूरी अवधि में पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के बीच रही और चांद पर सूर्य का प्रकाश सीधे नहीं पड़ा।
देशभर से इस खगोलीय घटना की तस्वीरें सामने आई हैं। दिल्ली-एनसीआर, लखनऊ, गुवाहाटी, तिरुवनंतपुरम और चेन्नई जैसे शहरों से चांद और ब्लड मून की अलग-अलग छवियां सामने आईं। देखिए ब्लड मून यानी रक्त जैसी लालिमा लिए चंद्रमा की चुनिंदा तस्वीरें।
एबीएन नॉलेज डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो और जापान की अंतरिक्ष एजेंसी जाक्सा के बीच चंद्रयान-5 मिशन के लिए हुए समझौते का स्वागत किया।
यह मिशन लूनर पोलर एक्सप्लोरेशन (एलयूपीईएक्स) परियोजना के तहत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव और वहां छिपे संसाधनों, खासकर पानी की बर्फ (लूनर वॉटर) की खोज करेगा। यह भारत का पांचवां चंद्रयान मिशन होगा।
इससे पहले 2023 में भारत ने चंद्रयान-3 के जरिये इतिहास रचते हुए चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफल लैंडिंग की थी, जिसकी दुनियाभर में सराहना हुई। जापान के प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा के साथ वार्ता के बाद संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में मोदी ने कहा, हम इसरो और जाक्सा के बीच चंद्रयान-5 मिशन के लिए सहयोग का स्वागत करते हैं।
हमारी सक्रिय भागीदारी अब पृथ्वी की सीमाओं से आगे बढ़ चुकी है और यह मानवता की प्रगति का प्रतीक बनेगी। पीएम मोदी ने कहा कि भारत की वैज्ञानिक यात्रा दृढ़ निश्चय, मेहनत और नवाचार का परिणाम है। उन्होंने बताया कि जापानी तकनीक और भारतीय नवाचार मिलकर नई ऊंचाइयों को छुएंगे।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को कहा कि भारत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सेमी क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन और विद्युत प्रणोदन प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है और देश अपने वैज्ञानिकों के प्रयास से जल्द ही गगनयान की उड़ान भरेगा।
श्री मोदी ने राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस पर देश के वैज्ञानिकों और तकनीक सेवाओं को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि आज भारत अंतरिक्ष क्षेत्र में निरंतर नए आयाम तय कर रहा है। अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का प्रशासन और जन सुविधा के क्षेत्र में इस्तेमाल हो रही है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि आज भारत सेमी क्रायोजेनिक इंजन और इलेक्ट्रिक प्रपल्सन जैसी नयी उभरती प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में में तेजी से आगे बढ़ रहा है। जल्द ही, आप सब वैज्ञानिकों की मेहनत से, भारत गगनयान की उड़ान भी भरेगा... और आने वाले समय में, भारत अपना स्पेस स्टेशन भी बनायेगा।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस भारत के युवाओं में उत्साह और आकर्षण का अवसर बन गया हैजो देश के लिए गर्व की बात है। श्री मोदी ने कहा कि मैं स्पेस सेक्टर से जुड़े सभी लोगों को, वैज्ञानिकों को, सभी युवाओं को नेशनल स्पेस डे की बधाई देता हूं। आज अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी भारत में राजकाज का भी हिस्सा बन रही है।
उन्होंने कहा कि फसल बीमा योजना में उपग्रह आधारित आकलन हो रहा है। मछुआरों को उपग्रह से मिल रही जानकारी और सुरक्षा प्रदान की जा रही ह। आपदा प्रबंधन का कार्य हो या प्रधानमंत्री गज शक्ति कार्यक्रम में भू स्थानक सूचना का अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल हो, आज अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत की प्रगति सामान्य नागरिकों का जीवन आसान बना रही है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। पितृ पक्ष का आरंभ और साल 2025 का दूसरा चंद्र ग्रहण 7 सितंबर को एक साथ लग रहे हैं। ये ग्रहण रात 9 बजकर 58 मिनट से शुरू होकर 1 बजकर 26 मिनट तक रहेगा। साल का दूसरा चंद्र ग्रहण संपूर्ण एशिया, ऑस्ट्रेलिया, पश्चिमी व उत्तरी अमेरिका, यूरोप, न्यूजीलैंड, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका के पूर्वी क्षेत्रों में दिखाई देगा। इसके साथ-साथ भारत में भी मान्य होगा।
ये पूर्ण चंद्र ग्रहण होगा, जो कुंभ राशि और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में होने जा रहा है। ग्रहण के समय राहु और चंद्रमा से सप्तम भाव में सूर्य, केतु और बुध ग्रह विराजित रहेंगे। चंद्रमा से अष्टम भाव में मंगल, छठे में शुक्र, पंचम में बृहस्पति और दूसरे भाव में शनि मौजूद रहेंगे।
7 सितंबर 2025 को साल का दूसरा चंद्र ग्रहण भारत में दिखेगा। ग्रहण का सूतक काल भी मान्य होगा। सूतक का आरंभ 7 सितंबर को दोपहर 12 बजकर 58 मिनट से होगा, जो रात 1 बजकर 26 मिनट तक रहेगा।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारत के अपने अंतरिक्ष मिशन गगनयान की तैयारी का 80 प्रतिशत काम पूरा हो गया है और इस साल के अंत तक पहला मानव रहित मिशन लॉन्च किया जायेगा जबकि साल 2027 के आरंभ में अंतरिक्ष यात्रियों को भेजा जायेगा।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष वी. नारायणन ने गुरुवार को यहां एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान बताया कि गगनयान मिशन की तैयारी का काम जोरशोर से चल रहा है। व्हीकल हेल्थ मैनेजमेंट सिस्टम, क्रू इस्केप सिस्टम और पैराशूट का विकास आदि समेत 80 प्रतिशत तैयारी पूरी कर ली गयी है। शेष 20 प्रतिशत काम भी मार्च 2026 तक पूरे कर लिये जायेंगे।
एबीएन नॉलेज डेस्क। एक दिन 24 घंटे का होता है। लेकिन साइंस की एक ऐसी स्टडी सामने आयी है जो बताती है कि 60 करोड़ साल पहले एक दिन 21 घंटे का होता था। पृथ्वी का रोटेशन धीमा हो रहा है जिससे दिन की लंबाई औसतन प्रति शताब्दी लगभग 1.8 मिलीसेकंड बढ़ जाती है। इसी वजह से 60 करोड़ साल पहले 21 घंटे का एक दिन होता था।
साइंस में हर दिन नए खुलासे होते हैं। हाल ही में एक ऐसा खुलासा हुआ है जिसको जानकर आप भी चौंक जायेंगे। पूरे दिन में कितने घंटे होते हैं। इस सवाल का आप बड़ी ही आसानी से जवाब दे सकते हैं। 24 घंटे, लेकिन अगर मैं यह कहूं कि 60 करोड़ साल पहले एक दिन 24 नहीं बल्कि 21 घंटे का होता था।
मेरी बात सुनकर आप शायद विश्वास न करें। लेकिन, चलिए आपको साइंस की ऐसी स्टडी बताते हैं जिससे मेरी बात को समझनने और इस पर विश्वास करने में आपको आसानी होगी। एक दिन में 24 घंटे होते हैं यानी 86,400 सेकंड।
एक दिन के 24 घंटे यह वो समय होता है, जितने समय में पृथ्वी को एक बार घूमने में समय लगता है। हालांकि, पृथ्वी बिल्कुल समान रूप से नहीं घूमती है। आमतौर पर, धीरे-धीरे पृथ्वी का रोटेशन धीमा हो रहा है जिससे दिन की लंबाई औसतन प्रति शताब्दी लगभग 1.8 मिलीसेकंड बढ़ जाती है। इसका मतलब यह है कि 60 करोड़ साल पहले एक दिन सिर्फ 21 घंटे का होता था।
दिन की लंबाई में जो समय के साथ यह बदलाव आया है यह कई चीजों की वजह से आया है। जिसमें चांद और सूरज के ज्वारीय प्रभाव, पृथ्वी के अंदर कोर-मेंटल युग्मन और ग्रह पर मास का वितरण शामिल है। इसी के साथ भूकंप यानी भूकंप की गतिविधि, ग्लेशियर, मौसम, महासागर और पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र भी दिन की लंबाई पर असर डालता है।
साल 2020 में वैज्ञानिकों ने एक चौंकाने वाली खोज की थी। उन्होंने पाया था कि पृथ्वी धीमी होने के बजाय तेजी से घूमने लगी है। यह अब पिछले 50 वर्षों में किसी भी समय की तुलना में अधिक तेजी से घूम रही है। जहां एक समय में सामने आता था कि पृथ्वी का रोटेशन धीमा हो रहा है। वहीं, स्टडी में अब सामने आ रहा है कि यह बढ़ रहा है।
अभी तक, वैज्ञानिक पूरी तरह से निश्चित नहीं हैं कि पृथ्वी की रोटेशन दर में जो यह तेजी आ रही है इसके पीछे की वजह क्या है। लेकिन कुछ ने सुझाव दिया है कि यह 20 वीं शताब्दी के दौरान ग्लेशियरों के पिघलने या नॉर्थ हेमिस्फीयर के ग्लेशियर में बड़ी मात्रा में पानी के इकट्ठा होने के कारण हो सकता है।
हालांकि, विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह पृथ्वी की रोटेशन में जो यह तेजी आई है या अस्थायी है, यह कुछ ही समय के लिए है। भविष्य में एक बार फिर पृथ्वी धीमी होने लगेगी। लेकिन, अब सवाल उठता है कि क्या अभी के लिए, क्या हमें चिंतित होना चाहिए?
हालांकि, इसका हमारे रोजाना के जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन जीपीएस उपग्रह, स्मार्टफोन, कंप्यूटर और संचार नेटवर्क जैसी टेक्नॉलोजी पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है, जो सभी बेहद सटीक समय सिस्टम पर निर्भर हैं। लेकिन ऐसी समस्याओं पर काबू पाया जा सकता है। तो नहीं, हमें चिंतित नहीं होना चाहिए झ्र जब तक कि दिन का छोटा होना मानव गतिविधि के कारण न हो।
एबीएन नॉलेज डेस्क। अब शरीर की गंध सिर्फ पसीना या साफ-सफाई का संकेत नहीं, बल्कि स्वास्थ्य की सूचक भी बन सकती है। ताजा वैज्ञानिक शोधों में यह सामने आया है कि शरीर से निकलने वाली गंध से कई गंभीर बीमारियों जैसे पार्किंसन, मलेरिया, कैंसर और अन्य का पता लगाया जा सकता है। आइये जानते हैं इस नए वैज्ञानिक खुलासे के बारे में...
यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के वैज्ञानिकों ने पार्किंसन रोग के मरीजों की त्वचा से निकलने वाले विशेष कंपाउंड्स का पता लगाया है। उन्होंने sebum के नमूनों का विश्लेषण कर 30 ऐसे volatile organic compounds (VOCs) खोजे, जो केवल पार्किंसन के मरीजों में पाए गए। इनमें eicosane और octadecanal शामिल हैं।
इससे अब मात्र 3 मिनट में skin swab टेस्ट से पार्किंसन की बीमारी का पता चल सकता है। प्रोफेसर पेर्डिटा बैरन के अनुसार, यह खोज बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि पहली बार किसी बीमारी को उसकी गंध से इतनी सटीकता से पहचाना गया है।
2018 में केन्या में हुई एक रिसर्च में पाया गया कि मलेरिया संक्रमित बच्चों के पैर से निकलने वाली गंध में heptanal, octanal और nonanal जैसे aldehydes की अधिकता होती है। यह गंध मच्छरों को आकर्षित करती है, जिससे मलेरिया का प्रसार तेज होता है।
कुत्ते कैंसर जैसी बीमारियों की गंध पहचानने में माहिर होते हैं। MIT के वैज्ञानिक एंड्रियास मर्सिन की टीम ने RealNose.ai नाम से एक आर्टिफिशियल नाक विकसित की है, जो इंसानी गंध को पहचानने के लिए मशीन लर्निंग और इंसानी olfactory receptors का उपयोग करती है। इसका उद्देश्य कुत्तों से भी बेहतर और तेज़ गंध पहचानना है ताकि बीमारी का पता जल्द लगाया जा सके।
इन शोधों से पता चलता है कि भविष्य में बिना ब्लड टेस्ट या बायोप्सी के, केवल शरीर की गंध से ही बीमारियों का पता लगाया जा सकेगा। यह एक नया डायग्नोसिस का तरीका बन सकता है, जो मरीजों के लिए सरल और जल्दी परिणाम देगा।
एबीएन नॉलेज डेस्क। माइक्रोसॉफ्ट ने एक अमेरिकी स्टार्टअप के साथ 12 साल के लिए 1.7 अरब डॉलर का समझौता किया है। यह समझौता न केवल उसके एआई और क्लाउड सेवाओं के बुनियादी ढांचे को बढ़ाने के लिए है, बल्कि उसके जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने में मदद के लिए भी है। वॉल्टेड डीप के साथ इस समझौते के तहत, यह तकनीकी दिग्गज मानव अपशिष्ट, गोबर और अन्य जैविक उपोत्पाद, जिन्हें सामूहिक रूप से बायोस्लरी कहा जाता है, खरीदेगा और उन्हें लगभग 5,000 फीट जमीन के नीचे इंजेक्ट करेगा।
इसके साथ, इसकी योजना पृथ्वी से 4.9 मिलियन मीट्रिक टन कार्बन डाइआॅक्साइड हटाने की है। यह सौदा माइक्रोसॉफ्ट द्वारा अपने एआई डेटा सेंटर संचालन के विस्तार के तुरंत बाद हुआ है, जिससे उसका कार्बन फुटप्रिंट बढ़ रहा है - 2020 और 2024 के बीच लगभग 23-30%।
कंपनी ने एआई इंफ्रास्ट्रक्चर से लगभग 75.5 मिलियन मीट्रिक टन कार्बन डाइआॅक्साइड समतुल्य उत्सर्जित किया। वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के अनुसार, कार्बन निष्कासन की औसत लागत लगभग 350 डॉलर प्रति टन होने के कारण, यह सौदा कचरे को कार्बन भंडारण में बदलने की दिशा में अब तक के सबसे महत्वपूर्ण निवेशों में से एक है।
ये उत्सर्जन न केवल प्रत्यक्ष ऊर्जा उपयोग से, बल्कि बड़े पैमाने पर हार्डवेयर, निर्माण सामग्री (स्टील, कंक्रीट) के उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखलाओं जैसे अप्रत्यक्ष स्रोतों से भी आते हैं, जिन्हें स्कोप 3 उत्सर्जन कहा जाता है। इसके बावजूद, कंपनी 2030 तक कार्बन-नकारात्मक बनने की योजना बना रही है।
रिपोर्टों के अनुसार, बायोस्लरी को जमीन के नीचे रखने से प्राकृतिक अपघटन को रोका जा सकेगा, जिससे मीथेन जैसी शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें वायुमंडल में उत्सर्जित होंगी। ग्लोबल वार्मिंग के संदर्भ में, मीथेन को उड2 से कम से कम चार गुना ज्यादा हानिकारक माना जाता है।
इस समझौते का उद्देश्य अन्य पर्यावरणीय जोखिमों को भी कम करना है, जिसमें बायोसॉलिड्स के निपटान के पारंपरिक तरीके, जैसे कि उन्हें खेतों में फैलाना, भी शामिल है। यह तरीका न केवल जल प्रदूषण के लिए जिÞम्मेदार है, बल्कि पीएफएएस जैसे पदार्थों से होने वाले रासायनिक संदूषण के लिए भी जिम्मेदार है। वॉल्टेड डीप की सीईओ जूलिया रीचेलस्टीन ने इंक के साथ एक साक्षात्कार में कहा, हम सतह-स्तर की समस्या को जमीन के नीचे स्थायी रूप से बंद करके हल कर रहे हैं।
इतना ही नहीं, माइक्रोसॉफ्ट ने 2050 तक अपने सभी ऐतिहासिक उत्सर्जनों को हटाने की भी प्रतिबद्धता जतायी है। इसके लिए, कंपनी ने पहले ही 83 मिलियन टन से अधिक मूल्य के कार्बन रिमूवल क्रेडिट खरीद लिये हैं, जिनमें से 59 मिलियन तो सिर्फ इसी वर्ष खरीदे गये हैं।
माइक्रोसॉफ्ट के ऊर्जा एवं कार्बन निष्कासन के वरिष्ठ निदेशक, ब्रायन मार्स ने वॉल्टेड डीप के समाधान को स्केलेबल, कम जोखिम वाला और वास्तव में स्थायी बताया। यह समझौता अब तक का दूसरा सबसे बड़ा कार्बन निष्कासन समझौता है, जो माइक्रोसॉफ्ट द्वारा एटमोसक्लियर को 15 वर्षों में 6.75 मिलियन टन कार्बन उत्सर्जन के लिए 2.36 बिलियन डॉलर की प्रतिबद्धता के बाद दूसरा सबसे बड़ा समझौता है।
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