एबीएन नॉलेज डेस्क। साल का पहला सूर्य ग्रहण वैशाख अमावस्या के दिन लगने जा रहा है। इस बार सूर्य ग्रहण 20 अप्रैल को लगेगा। यह सूर्य ग्रहण सुबह 7 बजकर 4 मिनट से प्रारंभ होगा और दोपहर 12 बजकर 29 मिनट तक रहेगा। ज्योतिषों के मुताबिक सूर्य ग्रहण न तो भारत में दिखेगा और न ही इसका कोई प्रभाव भारत में रहने वाले लोगों पर पड़ेगा। इस बार का सूर्य ग्रहण बेहद खास रहने वाला है क्योंकि ये सूर्य ग्रहण तीन रूपों में देखने को मिलेगा, इनमें आंशिक, पूर्ण और कुंडलाकार सूर्य ग्रहण शामिल होंगे। वैज्ञानिकों ने इसे हाइब्रिड सूर्य ग्रहण का नाम दिया है। हाइब्रिड सूर्य ग्रहण 100 साल में एक ही बार लगता है।
आंशिक सूर्य ग्रहण- जब चंद्रमा सूर्य के किसी छोटे हिस्से के सामने आकर रोशनी रोकता है, तब आंशिक सूर्य ग्रहण होता है।
कुंडलाकार सूर्य ग्रहण- जब चंद्रमा सूर्य के बीचोंबीच आकर रोशनी रोकता है, तब चारों तरफ एक चमकदार रोशनी का गोला बनता है, इसे रिंग ऑफ फायर कहते हैं।
पूर्ण सूर्य ग्रहण- जब पृथ्वी, सूर्य तथा चंद्रमा एक सीधी रेखा में होते हैं, इसके कारण पृथ्वी के एक भाग पर पूरी तरह से अंधेरा छा जाता है, तब पूर्ण सूर्य ग्रहण की स्थिति बनती है।आंशिक, पूर्ण और कुंडलाकार सूर्य ग्रहण का मिश्रण होता है। यह सूर्य ग्रहण लगभग 100 साल में एक ही बार देखने को मिलता है। इस सूर्य ग्रहण के समय चंद्रमा की धरती से दूरी न तो ज्यादा होती है और न कम।
यह सूर्य ग्रहण भारत में नहीं दिखेगा। यह सूर्य ग्रहण कंबोडिया, चीन, अमेरिका, माइक्रोनेशिया, मलेशिया, फिजी, जापान, समोआ, सोलोमन, बरूनी, सिंगापुर, थाईलैंड, अंटार्कटिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, वियतनाम, ताइवान, पापुआ न्यू गिनी, इंडोनेशिया, फिलीपींस, दक्षिण हिंद महासागर और दक्षिण प्रशांत महासागर जैसी जगहों पर ही दिखाई देगा।
एबीएन नॉलेज डेस्क। अब कंप्यूटर आपके हर प्रश्न का उत्तर मिनटों में देंगे और इसी लर्गिंग मशीन इतनी तेजी से काम करेगी की कि आप भी हैरान रह जायेंगे। जी हां, अल्फाबेट इंक गूगल ने दावा किया है कि उसने दुनिया का सबसे तेज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सुपरकंप्यूटर बनाया है।
गूगल का दावा है कि यह एनवीडिया सिस्टम की तुलना में तेज और अधिक कुशल है, इतना ही नहीं इसका लर्निंग मॉडल टेक भी काफी स्ट्रांग है। गूगल ने टेन्सर प्रोसेसिंग यूनिट (टीपीयू) नामक अपनी कस्टम चिप तैयार की है। यह कृत्रिम एआई प्रशिक्षण पर कंपनी के 90% से अधिक मानव प्रश्नों के उत्तर देने में सक्षम है। कंपनी की तरफ से बताया गया कि उसने टेन्सरफ्लो, जैक्स और लिंग्वो में एमएल मॉडल का इस्तेमाल करते हुए यह उपलब्धि हासिल की है।
चार मॉडल को तीस सेकेंड के प्रशिक्षित किया गया है। इस परिप्रेक्ष्य में साल 2015 में उपलब्ध सबसे उन्नत हार्डवेयर एक्सीलेरेटर पर इनमें से किसी एक मॉडल को प्रशिक्षित करने में तीन हफ्ते से अधिक का समय लगा है। गूगल ने कहा कि उसने एआई मॉडल को चलाने और प्रशिक्षित करने के लिए डिज़ाइन किये गये कस्टम घटकों के साथ 4,000 से अधिक टीपीयू के साथ एक प्रणाली का निर्माण किया था।
यह 2020 से चल रहा है, और इसका उपयोग गूगल के पीएएलएम मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए किया गया था, जो 50 दिनों में ओपन एएल के जीपीटी मॉडल के साथ प्रतिस्पर्धा करता है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। नासा ने सोमवार को चार एस्ट्रोनॉट्स के नाम अनाउंस किए हैं जो कि 50 सालों बाद चांद की यात्रा करेंगे। क्रिस्टीना कोच, विक्टर ग्लोवर, रीड वाइजमैन और जेरेमी हैनसन अपोलो मिशन के खत्म होने के बाद यह चार एस्ट्रोनॉट्स पहले ह्यूमन्स होंगे, जो चांद से वापस लौटेंगे।
यह चारों एस्ट्रोनॉट्स अर्टिमस – 2 के साथ चांद की यात्रा करेंगे। अमेरिका इस मिशन को 2024 के लिए तैयार कर रहा है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारतीय मूल के अमेरिकी सॉफ्टवेयर और रोबोटिक इंजीनियर अमित क्षत्रिय को नासा के नये चंद्र से मंगल कार्यक्रम का पहला अध्यक्ष नामित किया गया है। यह कार्यक्रम अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा की चंद्रमा पर दीर्घकालिक उपस्थिति की तैयारियों को सुनिश्चित करेगा ताकि मानव को अंतरिक्ष विज्ञान की नई उपलब्धि के तहत लाल ग्रह (मंगल) तक भेजा जा सके।
एजेंसी ने गुरुवार को घोषणा की कि क्षत्रिय नासा द्वारा गठित कार्यालय के पहले प्रमुख के तौर पर तत्काल प्रभाव से अपना काम शुरू करेंगे। नासा द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि नए कार्यालय का उद्देश्य एजेंसी की चंद्रमा और मंगल पर मानव अन्वेषण गतिविधियों को अंजाम देना है ताकि पूरी मानवता को उसका लाभ मिल सके।
नासा के प्रशासक बिल नेल्सन ने कहा कि अन्वेषण का स्वर्ण काल अब हो रहा है और नया कार्यालय यह सुनिश्चित करने में नासा की मदद करेगा कि वह चंद्रमा पर सफलतापूर्वक दीर्घकालिक उपस्थिति दर्ज करे और मानवता को मंगल ग्रह की ओर छलांग लगाने हेतु तैयारियों को पूरा किया जा सके...।
नेल्सन ने कहा कि चंद्रमा से मंगल कार्यक्रम कार्यालय नासा को चंद्रमा तक मिशन को पूरा करने और मंगल ग्रह पर पहली बार मानव को भेजने की तैयारियों में मदद करेगा। विज्ञप्ति के मुताबिक क्षत्रिय चंद्रमा और मंगल ग्रह पर मानव मिशन की योजना बनाने और उन्हें लागू करने के लिए जिम्मेदार होंगे। अमित क्षत्रिय ने एकीकृत अंतरिक्ष प्रक्षेपण प्रणाली ओरियन और एक्प्लोरेशन ग्राउंड सिस्टम प्रोग्राम का निर्देशन और नेतृत्व किया है।
पूर्व में क्षत्रिय ने सामान्य अन्वेषण प्रणाली विकास संभाग के कार्यवाहक एसोसिएट निदेशक पद पर कार्य किया है। क्षत्रिय ने वर्ष 2003 में अंतरिक्ष कार्यक्रम में अपने करियर की शुरुआत की थी। वर्ष 2014 से 2017 तक वह अंतरिक्ष केंद्र उड़ान निदेशक के पद पर रहे। क्षत्रिय भारत से अमेरिका आये पहली पीढ़ी के प्रवासी की संतान हैं और उन्होंने कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से गणित विज्ञान में स्नातक किया है और टेक्सास विश्वविद्यालय से गणित में एमए की उपाधि हासिल की है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत में 2023 में ऑनलाइन गलत सूचना के लिए सर्च ट्रेंड अब तक के सबसे उच्च स्तर पर पहुंच गया है, ऐसे में गूगल ने शुक्रवार को कहा कि इसका अबाउट दिस रिजल्ट (इस परिणाम के बारे में) फीचर 9 भारतीय भाषाओं सहित वैश्विक स्तर पर उपलब्ध होगा, ताकि दुनिया भर के लोगों को जानकारी का मूल्यांकन करने और यह समझने में मदद मिल सके कि यह कहां से आ रहा है।
गूगल ने एक ब्लॉगपोस्ट में कहा- अब, चाहे आप हिंदी, बंगाली, मराठी, तमिल, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, तेलुगु या पंजाबी में खोज रहे हों, आपको गूगल खोज पर अधिकांश परिणामों के आगे तीन बिंदु दिखाई देंगे। उन तीन बिंदुओं पर टैप करने से आपको इस बारे में और जानने का एक तरीका मिल जाता है कि जो जानकारी आप देख रहे हैं वह कहां से आ रही है और हमारे सिस्टम ने कैसे निर्धारित किया कि यह आपकी क्वेरी के लिए उपयोगी हो सकती है। इसके साथ, उपयोगकर्ता उन साइटों के बारे में अधिक सूचित निर्णय लेने में सक्षम होंगे जिन पर वह जाना चाहते हैं और कौन से परिणाम उनके लिए सबसे अधिक सहायक होंगे।
गलत सूचनाओं का मुकाबला करने के लिए, गूगल ने मीडिया साक्षरता विशेषज्ञों के साथ भागीदारी की है ताकि प्रतिभागियों को गलत जानकारी का पता लगाने के बारे में बेहतर समझ प्राप्त करने में मदद करने के लिए प्रशिक्षण विकसित किया जा सके।
भारत में, कंपनी ने फैक्टशाला के साथ भागीदारी की, जो एक सहयोगी और बहु-हितधारक मीडिया साक्षरता नेटवर्क है, जिसका नेतृत्व 250 से अधिक पत्रकार और अन्य विशेषज्ञ करते हैं, जो 15 से अधिक भारतीय भाषाओं में स्थानीय रूप से तैयार कार्यशालाएं और कार्यक्रम चलाते हैं। इस साल, कंपनी ने कहा कि फैक्टशाला मीडिया और सामुदायिक संगठनों को मीडिया साक्षरता में सहायता के लिए नये और अभिनव प्रारूपों के साथ प्रयोग करने में मदद करने के लिए एक इनक्यूबेटर कार्यक्रम शुरू कर रही है और 500 कॉलेजों के सहयोग से युवाओं और पहली बार मतदाताओं के लिए एक अभियान चलायेगी।
2016 से, जीएनआई इंडिया ट्रेनिंग नेटवर्क और गूगल के टीचिंग फेलो के माध्यम से, उन्होंने 60,000 से अधिक पत्रकारों और मीडिया छात्रों को भारत में ऑनलाइन गलत सूचना का पता लगाने और उसे खारिज करने के लिए आवश्यक कौशल पर प्रशिक्षित किया है। 15 से अधिक भाषाओं में 1,200 से अधिक कार्यशालाओं की पेशकश से 1,450 से अधिक न्यूजरूम और 1,200 विश्वविद्यालयों को लाभ हुआ है।
इसके अलावा, टेक दिग्गज ने उल्लेख किया कि उसने 2022 में जीएनआई फैक्ट चेक अकादमी भी लॉन्च किया, ताकि न्यूजरूम को डेटा के साथ भ्रामक दावों को सत्यापित करने और जलवायु संबंधी गलत सूचना से निपटने के लिए क्षमता निर्माण में मदद मिल सके। 2022 के अंत में, यू-ट्यूब ने हिट पॉज भी लॉन्च किया, जो दर्शकों को भारत में गलत सूचना का पता लगाने और उसका मूल्यांकन करने में मदद करने के लिए एक कार्यक्रम है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारतीय रेलवे का नेटवर्क काफी बड़ा है। रोजाना लाखों की संख्या में लोग एक जगह से दूसरी जगह की यात्रा करते हैं। रेलवे यात्रियों की सुविधाएं के लिए नई-नई तरह की ट्रेनों की भी शुरुआत करता रहता है। कुछ साल पहले शुरू की गयी वंदे भारत एक्सप्रेस के जरिये रेलवे ने लोगों को बड़ी सौगात दी है।
अब तक दस रूट्स पर चलायी जा चुकी वंदे भारत ट्रेनों को आगे भी कई अन्य रूट्स पर शुरू करने का ऐलान किया जा चुका है। ट्रेनों से जुड़ी चीजों के बारे में जानने के लिए यात्री काफी उत्सुक रहते हैं। रेलवे भी ट्रेनों को लेकर तरह-तरह जानकारियां लोगों को देता रहता है, ताकि उन्हें भारतीय रेलवे के बारे में और अधिक इंफोर्मेशन मिल सके।
इसी तरह रेलवे ने हाल ही में बताया है कि ट्रेनों के कोच के पीछे जो क्रॉस का सिंबल बनाया जाता है, उसका क्या मतलब होता है? आमतौर पर यह साइन आखिरी कोच के पीछे पीले रंग से बनाया जाता है, ताकि दूर से दिख सके। रेलवे ने बताया है कि यह सिंबल बताता है कि यह ट्रेन का आखिरी कोच है।
इसके जरिए रेलवे अधिकारी कन्फर्म करते हैं कि ट्रेन के सभी कोच रवाना हो गये हैं और कोई भी कोच बचा नहीं है। इसके अलावा ट्रेन के आखिरी डिब्बे पर क्रॉस चिह्न के होने का एक और महत्व है। ट्रेन के आखिरी डिब्बे पर क्रॉस का निशान किसी दुर्घटना को बचाने के मिशन के साथ हाइलाइट किया जाता है, क्योंकि यह इस बात की पुष्टि करने में मदद करता है कि साइन वाला उस ट्रेन का आखिरी डिब्बा है।
साथ ही, दूर से यह दिखाई भी आसानी से दे जाता है। इसके अलावा, इससे यह भी पता चलता है कि यह ट्रेन किसी भी हादसे का शिकार नहीं हुई है। आखिरी में सिंबल देखकर रेलवे कर्मचारी आसानी से पता लगा सकते हैं कि ट्रेन का सफर पूरी तरह से सुरक्षित रहा और कोई भी दुर्घटना नहीं हुई। वहीं, अगर ट्रेन से सिंबल वाला कोच गायब होता है तो फिर स्टेशन मास्टर अलर्ट हो जाता है और यह जानकारी आगे देता है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। सूर्य की सतह पर ब्लैक कलर के होल को कोरोनल होल कहा जाता है। इसकी लंबाई तीन लाख और चौड़ाई चार लाख किलोमीटर है। इसमें बैक टू बैक 20-30 पृथ्वी समा सकती है।
नासा के वैज्ञानिकों को सूर्य की सतह पर एक विशालकाय होल दिखा है। इस होल का आकार पृथ्वी से 20 गुना बड़ा है। इस होल को कोरोनल होल कहा जाता है। इस होल के दिखने के बाद सूर्य की सतह पर अंधेरा छा गया है। सूर्य में इस विशालकाय होल को देखते हुए एनओएए ने भू चुंबकीय तूफानों की चेतावनी दी है। बता दें कि एनओएए एक अमेरिकी फेडरल एजेंसी है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सूर्य की सतह पर गड्ढे के बाद 29 लाख किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं पृथ्वी की तरफ बढ़ रही है। शुक्रवार को इसे पृथ्वी से टकराने की आशंका है। इसके पृथ्वी से टकराने के बाद इसका क्या प्रभाव होगा, इस पर कड़ी नजर रखी जा रही है।
सूर्य से निकलने वाले कण उपग्रहों, मोबाइल फोन और जीपीएस को प्रभावित कर सकता है। बता दें कि नासा के एसडीओ ने 23 मार्च को सूर्य के साउथ पोल के नजदीक कोरोनल होल की खोज की थी। ये छेद सौर हवा को अंतरिक्ष में अधिक आसानी से फैला पाते हैं। इसकी रेटिंग जी1 से जी5 तक होती है।
नासा के वैज्ञानिक एलेक्स यंग के मुताबिक, मौजूदा कोरोनल होल बहुत बड़ा है। इसकी लंबाई तीन लाख और चौड़ाई चार लाख किलोमीटर है। इसमें बैक टू बैक 20-30 पृथ्वी समा सकती है। नासा के मुताबिक, सूर्य की सतह पर ब्लैक कलर के होल को कोरोनल होल कहा जाता है।
ये ब्लैक इसलिए दिखते हैं क्योंकि वे आसपास के प्लाज्मा की तुलना में ठंडे, कम घने क्षेत्र हैं और खुले एकध्रुवीय चुंबकीय क्षेत्र के क्षेत्र हैं। ये छेद सूर्य पर किसी भी समय और स्थान पर विकसित हो सकते हैं।
एबीएन नॉलेज डेस्क। अंतरिक्ष की अपनी अलग दुनिया है। यहां पर पल-पल घटनाएं घटती रहती हैं। वैज्ञानिक इसका पता लगाने के लिए दिन-रात स्टडी में लगे रहते हैं। दो दिन पहले की बात जब आसमान अलग-अलग रंग बदल रहा था। फिनलैंड, अमेरिका और कनाडा में ये देखा गया। जब कैमरे में ये सब रिकॉर्ड हो गया तो लोग इसको देखकर चौंकने लगे थे। मगर ये सही था। ब्लैक होल के बारे में सबने सुना होगा।
धन्य हो साइंटिस्ट स्टीफन हॉकिंग का जिन्होंने इसके तमाम रहस्यों को उजागर किया था। आसमान में गुलाबी, हरा, लाल… कई रंगों में दिख रहा था। वैज्ञानिकों ने एक और बड़ी घटना की जिक्र किया है जो कि पृथ्वीवासियों के लिए अच्छा नहीं है। स्पेस में जब पहली बार ब्लैक होल दिखा तो साइंटिस्ट्स हैरान हो गये। इसकी ग्रेवटी इतनी तगड़ी थी कि ये प्रकाश को भी सोख जाता है। अब एक बड़े ब्लैकहोल की दिशा बदल गयी है। चौंकाने वाली बात ये है कि इससे निकलने वाला रेडिएशन पृथ्वी तक पहुंच रहा है।
सुनने और पढ़ने में आपको जितना आसान ये लग रहा है दरअसल ये बहुत बड़ी घटना है। ब्लैकहोल का डायरेक्शन बदलना साधारण नहीं है। वैज्ञानिक पता लगाने में जुटे हुए हैं कि आखिर अंतरिक्ष में ये घटना कैसे घटी। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। लेकिन इसका कोई पुख्ता कारण अभी तक नहीं मिला है।
कयास ये लगाये गये हैं कि इसके पीछे का कारण हो सकता है एक गैलेक्सी यानी आकाशगंगा का दूसरे गैलेक्सी से टकराना। अब इसके टकराने के बाद ब्लैकहोल का डायरेक्शन चेंज हुआ और अब जो इसकी दिशा है वो पृथ्वी की तरफ हो गयी। ये गैलेक्सी हमसे 657 मिलियन प्रकाश वर्ष दूर स्थित हैं। इसका नाम है पीबीसी जे2333.9-2343।
उन्होंने पाया कि अंतिरक्ष में हुई इस घटना से 90 डिग्री तक घुमाव हुआ है। अब इसका केंद्र पृथ्वी की ओर है। ब्लैकहोल एक अनसुलझा रहस्य है। आप इसको विवादास्पद भी कह सकते हैं। इसकी खोज में वैज्ञानिकों ने सालों साल निकाल दिये। मगर आज भी इसके कई सवाल रहस्यमय ही हैं।
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