ज्ञान विज्ञान

View All
Published / 2023-05-02 23:47:17
जानें किस एजेंसी ने चंद्रमा की मिट्टी से निकाला ऑक्सीजन

एबीएन नॉलेज डेस्क। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने चंद्रमा की मिट्टी से ऑक्सीजन निकालने में कामयाबी हासिल की है।

इस पहला का लाभ आने वाले दिनों में चांद की यात्रा के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों को मिलने वाला है। वैज्ञानिक अपनी इस कामयाबी से उत्साहित हैं।

बताया गया है कि यह ऑक्सीजन इतनी मात्रा में है कि अंतरिक्ष यात्रियों की एक दिन की जरूरत पूरी करना संभव है। नासा अंतरिक्ष यात्रियों का एक दल चांद पर भेजने की तैयारियों को अंतिम रूप देने में लगा है।

ऐसे में समय में मिली यह सफलता महत्वपूर्ण है; क्योंकि ऑक्सीजन जीवन को चलाने की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। बिना इसके पृथ्वी पर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती, अंतरिक्ष की तो महती जरूरत है।

चंद्रमा की मिट्टी से ऑक्सीजन : नासा के जानसन स्पेस सेंटर के वैज्ञानिकों को यह कामयाबी मिली है।

पिछले सप्ताह नासा ने अपनी इस उपलब्धि को सार्वजनिक किया है। यह उपलब्धि दुनिया के किसी भी स्पेस सेंटर को पहली बार मिली है, चंद्रमा की मिट्टी से ऑक्सीजन निकाली गयी हो।

यह ऑक्सीजन चांद पर कई अन्य तरीके से मददगार हो सकता है। विज्ञान की भाषा में इसे इन-सीटू रिसोर्स यूटिलाइजेशन के नाम से पहचाना जा रहा है।

नासा का अगला प्लान
नासा इन दिनों अपने आर्टमिस मिशन की तैयारियों में जुटा है। यह मिशन अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर भेजने को तय किया गया है।

मिशन का उद्देश्य चंद्रमा की सतह पर लंबे समय तक यात्रियों की मौजूदगी बनाये रखना है। ऑक्सीजन की समस्या का समाधान मिलने के साथ ही इस समस्या का समाधान मिलता हुआ दिख गया है।

कार्बो थर्मल रिडक्शन डिमॉन्स्ट्रेशन टीम से जुड़े वैज्ञानिकों ने डर्टी थर्मल वैक्यूम चैंबर का इस्तेमाल करके चंद्रमा पर पाए जाने वाले इस इको सिस्टम को तैयार किया।

इसके अंदर का वातावरण चंद्रमा जैसा होता है। कार्बो थर्मल रिएक्टर वह जगह है, जहां ऑक्सीजन निकालने की प्रक्रिया पूरी की जाती है।

Published / 2023-04-29 21:43:40
अनुमान से ज्यादा पिघल रहे हैं हिमालयी ग्लेशियर

मुकुल व्यास 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। गर्म जलवायु हिमालय के ग्लेशियरों को पिघला रही है। भारतीय उपमहाद्वीप के अरबों लोगों के लिए ये ग्लेशियर पानी के सबसे महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इन ग्लेशियरों की बर्फ सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियों को पोषित करती है। 

ग्लेशियरों की बर्फ सिर्फ जीवनदायक जल का स्रोत ही नहीं है, यह पृथ्वी और हमारे महासागरों के ऊपर एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। ये चमकीले सफेद धब्बे अंतरिक्ष में अतिरिक्त गर्मी को परावर्तित करते हैं और ग्रह को ठंडा रखते हैं। 

सिद्धांत रूप से आर्कटिक भूमध्य रेखा की तुलना में ठंडा रहता है क्योंकि सूर्य से अधिक गर्मी बर्फ से परावर्तित होकर वापस अंतरिक्ष में चली जाती है। दुनिया भर के ग्लेशियर कई सौ साल पुराने हो सकते हैं। 

इनसे हमें यह वैज्ञानिक रिकॉर्ड मिलता है कि समय के साथ जलवायु कैसे बदल गई है। उनके अध्ययन से हमें इस बात की बहुमूल्य जानकारी मिलती है कि हमारा ग्रह किस हद तक तेजी से गर्म हो रहा है। 

एंटार्कटिका और आर्टिक के बाद दुनिया का तीसरा बड़ा बर्फ का भंडार हिमालय के पर्वतों में पाया जाता है। अब इस दुर्गम क्षेत्र के पहले संपूर्ण अध्ययन से पता चला है कि हिमालय के ग्लेशियर अपनी अरबों टन बर्फ गंवा चुके हैं। 

समय-समय पर अनेक वैज्ञानिक अध्ययनों में हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने के बारे में चेतावनी दी जा चुकी है। लेकिन नई बात यह है कि यह नुकसान वैज्ञानिकों द्वारा लगाए अनुमानों से कहीं बहुत ज्यादा है। 

एक नये अध्ययन से पता चलता है कि हिमालय की झीलों में खत्म होने वाले ग्लेशियरों के बड़े पैमाने पर नुकसान को काफी कम करके आंका गया है। इसकी वजह यह है कि उपग्रह पानी के नीचे होने वाले ग्लेशियर के परिवर्तनों को देखने में अक्षम हैं। 

शोधकर्ताओं ने पाया कि पिछले आकलन में वृहत हिमालय में झील में समाप्त होने वाले ग्लेशियरों के कुल नुकसान को 6.5 प्रतिशत कम करके आंका गया था। मध्य हिमालय में 10 प्रतिशत कम आकलन हुआ, जहां हिमनद से बनी झीलों का विकास सबसे तेज था। 

इस क्षेत्र से एक दिलचस्प मामला गेलोंग को झील का है, जिसमें ग्लेशियर क्षति का 65 प्रतिशत कम आकलन हुआ है। पानी के नीचे बड़े पैमाने पर होने वाले परिवर्तनों का पता लगाने में उपग्रह इमेजिंग की सीमाएं हैं। इसी वजह से यह चूक हुई। 

इससे ग्लेशियरों के संपूर्ण नुकसान के बारे में हमारी समझ में अंतर आया है। इस क्षेत्र में 2000 से 2020 तक सिकुड़ते हुए ग्लेशियरों से बनी झीलों की संख्या में 47 प्रतिशत, क्षेत्रफल में 33 प्रतिशत और आयतन में 42 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 

इस विस्तार के परिणामस्वरूप ग्लेशियर द्रव्यमान का 2.7 जीटी (ग्रॉस टनेज) का अनुमानित नुकसान हुआ। पिछले अध्ययनों ने इस नुकसान पर विचार नहीं किया था क्योंकि प्रयुक्त उपग्रह डेटा केवल झील के पानी की सतह को माप सकते हैं, लेकिन पानी के नीचे की बर्फ को नहीं नाप सकते जो पानी में बदल जाती है। 

क्षेत्रीय जल संसाधनों और हिमनद-झीलों में आकस्मिक बाढ़ के प्रभावों को समझने के लिए ये निष्कर्ष बहुत महत्वपूर्ण है। झील में समाप्त होने वाले ग्लेशियरों से बड़े पैमाने पर होने वाले नुकसान को समझकर शोधकर्ता इन ग्लेशियरों के वार्षिक द्रव्यमान संतुलन का अधिक सटीक आकलन कर सकते हैं। 

नया अध्ययन हिमालय के ग्लेशियरों के नुकसान के कारणों को समझने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। साथ ही शोध यह भी दशार्ता है कि दुनिया में झील में समाप्त होने वाले ग्लेशियरों के बड़े पैमाने पर हो रहे नुकसान को भी समझने की जरूरत है। पूरी दुनिया में 2000 और 2020 के बीच ग्लेशियरों का नुकसान 12 प्रतिशत होने का अनुमान है। 

आस्ट्रिया की ग्राज यूनिवर्सिटी आफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिक और इस अध्ययन के सह-लेखक टोबियास बोल्च ने कहा कि ग्लेशियरों के नुकसान के पूवार्नुमान मॉडलों में झील में समाप्त होने वाले ग्लेशियरों के नुकसान को भी शामिल किया जाना चाहिए। एक अन्य सह-लेखक डेविड रोंस ने कहा कि 21वीं सदी में ग्लेशियरों के कुल नुकसान में झील में समाप्त होने वाले ग्लेशियरों का प्रमुख योगदान बना रहेगा। 

बड़े पैमाने पर नुकसान होने पर ग्लेशियर मौजूदा अनुमानों की तुलना में अधिक तेजी से गायब हो सकते हैं। ग्लेशियरों के अधिक सटीक अध्ययन से शोधकर्ता हिमालय के संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र में भविष्य में जल संसाधन की उपलब्धता का बेहतर अनुमान लगा सकते हैं। आज पृथ्वी पर लगभग 10 प्रतिशत भूमि क्षेत्र ग्लेशियरों की बर्फ से ढंकी हुई है। 

लगभग 90 प्रतिशत बर्फ अंटार्कटिका में है, जबकि शेष 10 प्रतिशत ग्रीनलैंड की आइस कैप में है। अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड में तेजी से ग्लेशियरों के पिघलने से भी समुद्र की धाराएं प्रभावित होती हैं, क्योंकि भारी मात्रा में ग्लेशियरों का पिघला हुआ ठंडा हुआ पानी समुद्र के गर्म पानी में प्रवेश कर रहा है।

 इससे समुद्र की धाराएं धीमी हो रही हैं। जैसे-जैसे जमीन पर बर्फ पिघलेगी, समुद्र के स्तर का बढ़ना जारी रहेगा। वैसे 1900 की शुरुआत से ही दुनिया भर के कई ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इसकी मुख्य वजह मानवीय गतिविधियां हैं। औद्योगिक क्रांति के बाद कार्बन डाइआक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन ने तापमान बढ़ा दिया। 

ध्रुवों में भी तापमान बढ़ा। इसके परिणामस्वरूप ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। अगर हम आने वाले दशकों में उत्सर्जन पर काफी हद तक अंकुश लगाने में कामयाब भी हो जाते हैं तो भी 2100 से पहले दुनिया के बचे हुए ग्लेशियरों में से एक-तिहाई पिघल जाएंगे। 

जहां तक समुद्री बर्फ की बात आती है, तो आर्कटिक में सबसे पुरानी और सबसे मोटी बर्फ का 95 प्रतिशत हिस्सा पहले ही खत्म हो चुका है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि उत्सर्जन अनियंत्रित रूप से बढ़ता रहा, तो वर्ष 2040 तक गर्मियों में आर्कटिक बर्फ मुक्त हो सकता है क्योंकि समुद्र और हवा का तापमान तेजी से बढ़ता रहेगा। (लेखक विज्ञान मामलों के जानकार हैं।)

Published / 2023-04-27 20:01:55
900 फीट गहरा ब्लू होल बना पहेली, वैज्ञानिक भी हैरान?

एबीएन नॉलेज डेस्क। वैज्ञानिकों ने एक रहस्यमयी ब्लू होल की खोज की है। ये ब्लू होल वैज्ञानिकों के लिए पहेली बन गयी है क्योंकि वो भी अभी तक पता नहीं लगा पाये हैं कि इसका निर्माण कैसे हुआ? ये ब्लू होल 900 फीट गहरा है। वैज्ञानिकों ने इसे धरती का दूसरा सबसे गहरा ब्लू होल बताया है। 

मैक्सिको के युकाटन प्रायद्वीप पर ये सिंक होल मिला है। कैरेबियन सागर और युकाटन प्रायद्वीप समेत तटीय क्षेत्रों में पाये जाने वाले अद्वितीय वातावरण होते हैं। ये ब्लू होल चेतुमल खाड़ी की विशाल गुफा में मिला है, जो पानी के अंदर 900 फीट गहराई में है। 

ये करीब 13,660 वर्गमीटर में फैली हुई है। इस गुफा को ताम जा नाम दिया गया है, जिसका मायन में अर्थ गहरा पानी होता है। पानी में डूबी हुई ब्लू होल की लगभग गोलागार आकृति है, जो सतह पर ढलान वाली खड़ी भुजाओं के साथ होती है। 

जर्नल फ्रंटियर्स इन मरीन साइंस में ये स्टडी प्रकाशित हुई है। इस स्टडी में बताया गया कि थर्मोहलाइन, स्कूबा ड्राइवर्स, पानी के नमूने, इको-साउंड सर्वे आदि की मदद से इसका पहला ड्राफ्ट तैयार किया गया। साल 2021 में पहली बार खोजा गया ये ब्लू होल इस बात की झलक देख सकती है कि समुद्री दुनिया में जीवन कैसे विकसित हुआ होगा। 

ब्लू होल में साल 2021 में लगायी पहली डुबकी 

ब्लू होल चेतुमल खाड़ी के मध्य में पाया गया था, जहां पानी में डूबे कार्स्टिक सिंकहोल्स को स्थानीय भाषा में पोजस नाम दिया गया है। रिसर्चर्स ने सितंबर 2021 में केमिकल वाटर के नमूने के लिए ब्लू होल में स्कूबा डाइब लगायी। ब्लू होल की संरचना को एक शंकु के आकार के रूप में बताया जा सकता है। ब्लू होल की अधिकतम पानी की गहराई 270 एमबीएसएल से अधिक है। 

स्टडी करने वाली टीम ने ब्लू होल के अंदर लवणता और तापमान में महत्वपूर्ण बदलाव देखा। बकि ब्लू होल के अंदर गहरी परतों पर लवणता के मूल्य बताते हैं कि इनका मुख्य जल स्रोत समुद्री जल है। 

कहां है सबसे गहरा ब्लू होल 

पृथ्वी पर सबसे गहरा ब्लू होल दक्षिण चीन सागर में है और ये 987 फीट गहरा है। ब्लू होल बनने की मुख्य वजह चूना पत्थर हैं। जब समुद्र का पानी इनसे मिलता है तो ये ब्लूहोल का निर्माण होता है। चूना पत्थर की बात करें तो ये झरझरा होने की वजह से पानी में आसानी से घुल जाता है। 

एक्टपर्ट्स का मानना है कि हिमयुगों में ब्लू होल बने होंगे। ऐसे में हजारों साल पहले जब आखिरी हिमयुग का अंत हुआ होगा, तो समुद्र के जल स्तर में वृद्धि हुई और ये गुफाएं पानी से भर गयी।

Published / 2023-04-20 23:01:24
लॉन्च के कुछ ही देर बाद अमेरिका का स्पेस एक्स फटा

  • लॉन्च के कुछ ही पल बाद आसमान में फट गया स्पेस एक्स का रॉकेट, दूसरा प्रयास भी फेल

एबीएन नॉलेज डेस्क। स्पेस एक्स ने गुरुवार को अंतरिक्ष में एक नया इतिहास रचने से चूक गया। अमेरिका के टेक्सास शहर से अब तक का सबसे बड़ा रॉकेट स्टारशिप लॉन्च हुआ, लेकिन कुछ ही समय बाद यह विफल हो गया। ये रॉकेट एलन मस्क की कंपनी स्पेस एक्स ने बनाया है। यह स्टारशिप का पहला आर्बिटल टेस्ट था।

इस रॉकेट को भारतीय समयानुसार शाम 7 बजकर 3 मिनट पर टेक्सास के बोका चिका फेसिलिटी से टेस्ट फ्लाइट के लिए लॉन्च किया गया था। लॉन्च के बाद शुरुआत में तो सब ठीक लग रहा था, लेकिन आर्बिट में जाने से पहले ही इसमें कुछ खराबी आयी जिससे यह ब्लास्ट हो गया।

इस ब्लास्ट की वजह से रॉकेट के हवा में ही चिथड़े उड़ गये। कंपनी के एक अधिकारी ने कहा है कि स्टारशिप के साथ वह हुआ है जिसमें वह रेपिड अनप्लांड डिसेम्बली कहते हैं। अब इस रॉकेट लांचिंग का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

इसमें साफ दिख रहा है कि लॉन्चिंग के बाद यह रॉकेट जमीन से बहुत ऊंचाई पर पहुंच चुका था। लेकिन अचानक ही इसमें विस्फोट हो गया। इसे एलन मस्क से लिए बड़ा झटका बताया जा रहा है। हालांकि इस स्टारशिप के असफल लांचिग के बाद भी स्पेसएक्स ने इस प्रयास को सराहा है। 

कंपनी ने कहा कि टीम डेटा को रिव्यू करना जारी रखेंगीं और अगले फ्लाइट टेस्ट की दिशा में काम करेंगी। स्टारशिप के फेल होने के बाद भी स्पेसएक्स हेडक्वार्टर में एम्प्लॉइज खुशी मनाते दिखाई दिए क्योंकि रॉकेट का लॉन्चपैड से उड़ना ही बड़ी सफलता है।

स्पेस-एक्स के स्टारशिप को पहले 17 अप्रैल को भारतीय समयानुसर शाम 6 बजकर 50 मिनट पर लॉन्च किया जाना था, लेकिन कुछ तकनीकी खराबी के चलते इसकी लॉन्चिंग टाल दी गई थी। स्पेस-एक्स के स्टारशिप स्पेसक्राफ्ट और इस बड़े रॉकेट को मिलाकर इन्हें स्टारशिप नाम दिया गया है। ये स्टारशिप 100 लोगों को एक साथ मंगल ग्रह पर ले जाने में सक्षम होगा। 

ये इंसानों को दुनिया के किसी भी कोने में एक घंटे से कम समय में पहुंचाने में सक्षम होगा। इस स्टारशिप को दुनिया का सबसे बड़ा रॉकेट बताया जाता है। इसकी ऊंचाई 394 फीट और व्यास 29.5 फीट है। यह रॉकेट दो हिस्से में बंटा हुआ है। ऊपर वाले हिस्से की ऊंचाई 164 फीट है। इसके अंदर 1200 टन ईंधन आता है। दूसरा हिस्से की ऊंचाई 226 फीट है। ये रीयूजेबल है।

 यानी यह स्टारशिप को एक ऊंचाई तक ले जाकर वापस आ जायेगा। इसके अंदर 3400 टन ईंधन आता है। इसे 33 रैप्टर इंजन ऊर्जा प्रदान करते हैं। 2 साल पहले स्पेसएक्स ने चालक दल के चंद्र लैंडर के रूप में स्टारशिप का उपयोग करने के लिए नासा से लगभग 3 अरब डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट किया था। नासा के आर्टेमिस मून प्रोग्राम के तहत स्टारशिप का उपयोग किया जायेगा। स्पेसएक्स और नासा मिलकर एसएलएस रॉकेट और ओरियन कैप्सूल के जरिए अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा की सतह तक पहुंचायेंगे।

Published / 2023-04-20 10:03:43
साल के पहले सूर्य ग्रहण की ऑस्ट्रेलिया से आयी पहली तस्वीर

एबीएन नॉलेज डेस्क। साल का पहला सूर्य ग्रहण शुरू हो चुका है। साल का पहला सूर्य ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा और न ही देश पर इसका कोई प्रभाव देखने को मिलेगा।

ऑस्ट्रेलिया में यह सूर्य ग्रहण दिखना शुरू हो चुका है। ग्रहण सुबह 7 बजकर 4 मिनट से शुरू हो चुका है और दोपहर 12 बजकर 29 मिनट पर खत्म होगा। इस सूर्य ग्रहण की अवधि 5 घंटे 24 मिनट की होगी। बता दें कि आज वैशाख अमावस्या भी है। 

कहां-कहां दिखेगा सूर्य ग्रहण

यह सूर्य ग्रहण भारत में नहीं दिखेगा। यह कंबोडिया, चीन, अमेरिका, माइक्रोनेशिया, मलेशिया, फिजी, जापान, समोआ, सोलोमन, बरूनी, सिंगापुर, थाईलैंड, अंटार्कटिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, वियतनाम, ताइवान, पापुआ न्यू गिनी, इंडोनेशिया, फिलीपींस, दक्षिण हिंद महासागर और दक्षिण प्रशांत महासागर जैसी जगहों पर ही दिखाई देगा।

Published / 2023-04-17 12:54:39
क्या सचमुच मंगल पर पहुंच जायेगा इंसान...

  • दुनिया का सबसे बड़ा रॉकेट आज होगा लॉन्च

एबीएन नॉलेज डेस्क। यह अब तक बनाये गये रॉकेट सबसे ऊंचा है। 395 फीट लंबा है। स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से लगभग 90 फीट अधिक लंबा है। इस रॉकेट बूस्टर में सबसे ज्यादा इंजन भी लगाये गये हैं। सुपर हेवी को नीचे की तरफ लगाया गया है, चंद्रमा और मंगल ग्रह पर इंसानों को भेजने का एलन मस्क ने सपना देखा है, जिसे साकार करने के लिए वो लगातार कोशिशों में जुटे हुए हैं।

इस बीच मस्क की कंपनी स्पेसएक्स आज बड़ा कारनामा करने जा रही है। वह दुनिया के सबसे बड़े रॉकेट स्टारशिप को लॉन्च करेगी। यह स्टारशिप रॉकेट अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले किसी अन्य व्हीकल से अधिक शक्तिशाली है। इसको लेकर एलन मस्क ने ऐलान कर दिया है कि यह लॉन्चिंग की कोशिश सोमवार को की जायेगी। एलन मस्क ने रविवार रात ट्विटर यूजर्स के साथ एक ऑडियो बातचीत में कहा कि वह हम वास्तव में इस रॉकेट को लॉन्च करने के लिए उत्साहित हैं।

दरअसल, पहला संयुक्त स्टारशिप स्पेसक्राफ्ट और सुपर हेवी बूस्टर टेक्सास के बोका चिका से स्टारबेस फैसिलिटी से लॉन्च किया जायेगा। इसका स्थानीय समय सुबह 7 बजे है। अगर भारतीय समय की बात की जाये तो शाम 5 बजकर 30 मिनट पर लॉन्च होगा। 

स्पेसएक्स ने बताया है कि लॉन्चिंग का लाइव प्रसारण किया जायेगा। इस रॉकेट के मदद से इंसान किसी दूसरे ग्रह पर जा सकेगा। एलन मस्क का सपना है कि साल 2029 तक इंसानों को मंगल ग्रह पर भेजा जाये और वहां पर बस्ती बसायी जाये। यही वजह है कि संयुक्त स्टारशिप और सुपर हेवी की पहली टेस्ट फ्लाइट तैयार है, जो कि 395 फीट लंबा (120 मीटर) है। 

नासा ने 2025 में आर्टेमिस 3 मिशन पर उपयोग किए जाने वाले मून लैंडर एस्ट्रोनॉट बनने के लिए स्टारशिप को चुना है। 1972 के बाद से चंद्रमा पर उतरने वाला पहला चालक दल होगा, लेकिन पहले स्पेसएक्स को डिजाइन को ठीक करना होगा। यह अब तक बनाये गए रॉकेट सबसे ऊंचा है। 395 फीट लंबा है। स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से लगभग 90 फीट अधिक लंबा है। 

इस रॉकेट बूस्टर में सबसे ज्यादा इंजन भी लगाये गये हैं। सुपर हेवी को नीचे की तरफ लगाया गया है, जोकि ऊपरी स्टारशिप व्हीकल को ऑर्बिट में ले जायेगा। इसमें स्पेसएक्स के 33 शक्तिशाली रैप्टर इंजन हैं। ये 16 मिलियन पाउंड का थ्रस्ट जनरेट करेंगे, जो अपोलो एस्ट्रोनॉट्स को चंद्रमा तक ले जाने वाले सैटर्न "वी" से कहीं अधिक है। स्टारशिप को पूरी तरह से दोबारा इस्तेमाल करने के लिहाज से डिजाइन किया गया है।

Published / 2023-04-14 18:56:01
दूरसंचार विभाग और ट्राई में अंतरिक्ष स्पेक्ट्रम की नीलामी पर मतभेद

सुरजीत दास गुप्ता

एबीएन नॉलेज डेस्क। अंतरिक्ष आधारित संचार के लिए स्पेक्ट्रम आवंटन के विवादास्पद मसले पर दूरसंचार विभाग और भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के बीच मतभेद सामने आये हैं। दूरसंचार विभाग अपने इस रुख पर अड़ा हुआ है कि अंतरिक्ष आधारित संचार के लिए स्पेक्ट्रम की नीलामी की जानी चाहिए और उसने नियामक से इसके तौर-तरीकों पर काम करने का अनुरोध किया है। 

हालांकि कुछ दिन पहले अंतरिक्ष आधारित संचार के लिए स्पेक्ट्रम का आवंटन शीर्षक से एक परामर्श पत्र जारी करने वाले ट्राई ने हितधारकों से इन सवालों का जवाब देने के लिए कहा है कि क्या अंतरिक्ष आधारित संचार के लिए स्पेक्ट्रम बैंड की नीलामी की जानी चाहिए या प्रशासनिक तरीके से पेश किया जाना चाहिए अथवा क्या कोई अन्य विकल्प हो सकता है। इस प्रकार इस मसले को व्यापक रूप से खुला छोड़ा जा रहा है। 

ज्यादातर दूरसंचार कंपनियों ने यह कहते हुए सरकार द्वारा तय कीमतों पर स्पेक्ट्रम की पेशकश करने का विरोध किया है कि समान सेवाओं के लिए समान अवसर होना चाहिए। उनका तर्क है कि चूंकि वे नीलामी में स्पेक्ट्रम खरीदते हैं, इसलिए अंतरिक्ष संचार आधारित ब्रॉडबैंड की भी नीलामी की जानी चाहिए, जो ग्राहकों के लिए उसी तरह की सेवा होती है। 

लेकिन सुनील मित्तल द्वारा संचालित वनवेब जैसी उपग्रह कंपनियों ने इस कदम का यह संकेत करते हुए विरोध किया है कि विश्व स्तर पर अंतरिक्ष संचार के लिए स्पेक्ट्रम की नीलामी नहीं की जाती है और देश इसे सरकार द्वारा तय मूल्य तंत्र के रूप में प्रदान करते हैं। 

इस मसले की शुरुआत सितंबर 2021 में हुई थी, जब दूरसंचार विभाग ने उपयुक्त आवृत्ति बैंड, ब्लॉक आकार, आरक्षित मूल्य और अंतरिक्ष आधारित संचार सेवाओं के लिए नीलामी की जाने वाली स्पेक्ट्रम की मात्रा की सिफारिश करने के लिए ट्राई को सुझाव भेजा था। 

ट्राई ने स्पष्टीकरण मांगा, जिस पर दूरसंचार विभाग ने कहा कि 5जी की तैनाती की आवश्यकता के कारण नियामक अंतरिक्ष आधारित संचार पर सिफारिशों को बाद में ले सकता है, क्योंकि उनकी प्रतिक्रिया में समय लगेगा। 

पिछले साल अगस्त में दूरसंचार विभाग ने ट्राई से अंतरिक्ष संचार सेवाओं की मांग का आकलन करने के लिए परामर्श करने और उसके अनुसार प्रत्येक बैंड में नीलामी के लिए रखे जाने वाले स्पेक्ट्रम की मात्रा पर सिफारिशें प्रदान करने का दोबारा अनुरोध किया था। 

इसने यह भी कहा कि उसने विशेष आधार पर अंतरिक्ष स्पेक्ट्रम की नीलामी की परिकल्पना की है। तथा ट्राई से उपग्रह और स्थलीय नेटवर्क जैसे कई सेवा लाइसेंधारकों के बीच नीलामी वाले स्पेक्ट्रम को साझा करने की व्यावहारिकता को देखने के लिए कहा। 

अक्टूबर 2022 में एक पत्र में ट्राई ने दूरसंचार विभाग से स्पष्टीकरण मांगा था कि नीलामी के जरिये अंतरिक्ष आधारित संचार के लिए किस प्रकार की लाइसेंस वाली सेवाओं और स्पेक्ट्रम की परिकल्पना की गई है। दूरसंचार विभाग ने जवाब दिया कि ट्राई विस्तृत जांच के बाद अंतरिक्ष आधारित प्रत्येक संचार सेवाओं के लिए उपयुक्त सिफारिशें प्रदान कर सकता है।

Published / 2023-04-12 08:33:04
अब ट्विटर से ब्लू टिक हटाने की तैयारी, जानें क्यों और कब से...

एबीएन सेंट्रल डेस्क। ट्विटर ब्लू टिक को लेकर एक बड़ा अपडेट सामने आया है। दरअसल,  ट्विटर के सीईओ एलन मस्क ने ऐलान किया है कि इस माइक्रो ब्लॉगिंग वेबसाइट पर सत्यापित ब्लू टिक धारकों के अकाउंट से अब 20 अप्रैल के बाद ब्लू टिक हट जायेंगे। ट्वीट में उन्होंने जानकारी देते हुए कहा है कि लेगेसी ब्लू चेकमार्क 20 अप्रैल से हटा दिये जायेंगे।

20 अप्रैल के बाद अब वहीं केवल से ब्लू टिक चेकमार्क रख पाएंगे जो ट्विटर ब्लू के सदस्य होंगे। इसकी शुरुआत साल 2009 में हुई थी।जिसके  जरिए मशहूर हस्तियों जैसे पॉलिटिकल लीडर्स, सिलेब्रिटीज आदि के अकाउंट को वेरिफाइड दिखाने वाला ब्लू टिक दिया गया।

हालांकि कंपनी पहले ब्लू टिक के लिए चार्ज नहीं लेती थी पर एलन मस्क के आते ही कीबड़े बदलाव हुए जिसमें उन्होंने ट्विटर की इस सर्विस के लिए फीस वसूलने का ऐलान कर दिया था।

इतना ही नहीं एलन मस्क ने कुछ दिनों पहले ट्विटर के लोगों की आइकॉनिक ब्लू बर्ड को हटाकर कुत्ते का लोगो लगा दिया था। इसके साथ कई बड़ी संख्या में ट्विटर से कर्मचारियों की छंटनी भी करनी पड़ी थी।

Page 20 of 53

Newsletter

Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.

We do not share your information.

abnnews24

सच तो सामने आकर रहेगा

टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।

© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse