एबीएन नॉलेज डेस्क। भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक के बाद एक सफलता हासिल कर रहा है। आज (शनिवार 17 फरवरी) इसरो एक बार फिर से इतिहास रचने जा रहा है। दरअसल, इसरो आज मौसम के बगड़ते मिजाज का पता लगाने वाले एक उपग्रह को लॉन्च करने जा रहा है।
इस सैटेलाइट का कमसद मौसम की सटीक जानकारी देना है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) इस सैटेलाइट का नाम आईएनएसएटी- 3डीएस है। जिसे नॉटी बॉय के के उपनाम से भी जाना जाता है। इस उपग्रह की लॉन्चिंग जियोसिंक्रोनस लॉन्च व्हीकल से की जायेगी।
इसरो के मुताबिक, रॉकेट जीएसएलवी-एफ14 आज यानी शनिवार शाम 5.35 बजे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से उड़ान भरेगा। लॉन्चिंग के करीब 20 मिनट बाद जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर आर्बिट में तैनात हो जायेगा।
इस रॉकेट का ये 16वां मिशन होगा। जिसे स्वदेशी रूप से विकसित किया गया है जो क्रायोजेनिक इंजन का इस्तेमाल करके आज 10वीं बार उड़ान भरेगा।
जानकारी के मुताबिक, इनसैट-3 डीएस उपग्रह भूस्थैतिक कक्षा में स्थापित किए जाने वाला तीसरी पीढ़ी का मौसम विज्ञान उपग्रह का अनुवर्ती मिशन है। जिसे भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा वित्त पोषित किया गया है।
इसरो ने इस संबंध में एक्स पर एक ट्वीट कर कहा कि जीएसएलवी-एफ14/इनसैट-3डीएस मिशन: 17 फरवरी, 2024 को 17.35 बजे प्रक्षेपण के लिए 27.5 घंटे की उल्टी गिनती शुरू हो गयी है।
अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा है : इंटेलिजेंट वही है जो अपने आप को बदलना जानता है। समय के साथ बदलना जरूरी है। जो समय के साथ नहीं चलते वे पीछे छूट जाते हैं। कई क्षेत्रों में अपने आप को बदलने की सख्त जरूरत है। आज पढ़ाई और करियर से संबंधित बदलाव के बारे में बात कर रहा हूं। इस पर गौर करें।
आज करियर की कमी नहीं है। सैकड़ों करियर हैं। कमी है जानकारी की। जरूरत है परंपरागत सोच से बाहर आने की।
मूल मंत्र : लियो टॉलस्टॉय ने कहा है - हर कोई दुनिया बदलने की सोचता है, कोई अपने आप को नहीं बदलता। आज का समय है, अपने आप को बदलने का। आज का युग है- ज्ञान और स्पेशलाइजेशन का। स्मार्टनेस और बोल्डनेस का। अच्छे कम्युनिकेशन स्किल्स का। 12वीं के बाद सोच समझकर जॉब ओरिएंटेड कोर्स करें, अच्छे आॅगेर्नाइजेशन से करें। तभी चूमेगी सफलता आपके कदम।
एबीएन नॉलेज डेस्क। स्वस्तिक अत्यन्त प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति में मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है। इसीलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वास्तिक चिह्न अंकित करके उसका पूजन किया जाता है। स्वस्तिक शब्द सु+अस+क से बना है। सु का अर्थ अच्छा, अस का अर्थ सत्ता या अस्तित्व और क का अर्थ कर्त्ता या करने वाले से है।
इस प्रकार स्वास्तिक शब्द का अर्थ हुआ अच्छा या मंगल करने वाला। अमरकोश में भी स्वस्तिक का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है। अमरकोश के शब्द हैं - स्वास्तिक, सर्वतोऋद्ध अर्थात् सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो।
इस प्रकार सवास्तिक शब्द में किसी व्यक्ति या जाति विशेष का नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण या वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना निहित है। स्वास्तिक शब्द की निरुक्ति है- स्वस्तिक क्षेम कायति, इति स्वस्तिकः अर्थात् कुशलक्षेम या कल्याण का प्रतीक ही स्वस्तिक है।
स्वास्तिक में एक दूसरे को काटती हुई दो सीधी रेखाएं होती हैं, जो आगे चलकर मुड़ जाती हैं। इसके बाद भी ये रेखाएं अपने सिरों पर थोड़ी और आगे की तरफ मुड़ी होती हैं। स्वस्तिक की यह आकृति दो प्रकार की हो सकती है।
प्रथम स्वस्तिक, जिसमें रेखाएं आगे की ओर इंगित करती हुई हमारे दायीं ओर मुड़ती हैं। इसे स्वास्तिक कहते हैं। यही शुभ चिह्न है, जो हमारी प्रगति की ओर संकेत करता है। दूसरी आकृति में रेखाएं पीछे की ओर संकेत करती हुई हमारे बायीं ओर मुड़ती हैं। इसे वामावर्त स्वस्तिक कहते हैं। भारतीय संस्कृति में इसे अशुभ माना जाता है।
जर्मनी के तानाशाह हिटलर के ध्वज में यही वामावर्त स्वस्तिक अंकित था। ऋग्वेद की ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गयी है। सिद्धान्त सार ग्रन्थ में उसे विश्व ब्रह्माण्ड का प्रतीक चित्र माना गया है।
उसके मध्य भाग को विष्णु की कमल नाभि और रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित किया गया है। अन्य ग्रन्थों में चार युग, चार वर्ण, चार आश्रम एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार प्रतिफल प्राप्त करने वाली समाज व्यवस्था एवं वैयक्तिक आस्था को जीवन्त रखने वाले संकेतों को स्वस्तिक में ओत-प्रोत बताया गया है।
मंगलकारी प्रतीक चिह्न स्वस्तिक अपने आप में विलक्षण है। यह मांगलिक चिह्न अनादि काल से सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त रहा है। अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक को मंगल- प्रतीक माना जाता रहा है।
विघ्नहर्ता गणेश की उपासना धन, वैभव और ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी के साथ भी शुभ लाभ, स्वास्तिक तथा बहीखाते की पूजा की परम्परा है। इसे भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान प्राप्त है। इसीलिए जातक की कुण्डली बनाते समय या कोई मंगल व शुभ कार्य करते समय सर्वप्रथम स्वस्तिक को ही अंकित किया जाता है।
घर के मुख्य दरवाजे पर स्वास्तिक मुख्य द्वार के ऊपर मध्य में और शुभ और लाभ बाईं और दाईं तरफ लिखते हैं। स्वास्तिक की दोनों अलग-अलग रेखाएं गणपति जी की पत्नी रिद्धि-सिद्धि को दर्शाती हैं।
राजकुमारी पाण्डेय
एबीएन सोशल डेस्क। सनातन धर्म में प्राचीन काल से पूजा-पाठ को महत्व दिया जाता है। जिसके लिए लोग मंदिरों में जाते हैं। सभी मंदिरों में गर्भ गृह के सामने आपको घंटिया दिखाई देंगी।
आमतौर पर लोग मंदिर के अंदर जाते ही पहले घंटी बजाते हैं। इतना ही नहीं हिंदू धर्म में मंदिरों के बाहर घंटी बांधने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। लेकिन क्या आपको पता है कि आखिर क्यों मंदिर में जाने से पहले घंटी बजायी जाती है?
दरअसल, सुबह और शाम के समय मंदिरों में पूजा और आरती होती है।जब आरती होती है तो मंदिर परिसर में विशेष लय और धुन में छोटी-छोटी घंटियां बजाई जाती हैं। धार्मिक मान्यता के मुताबिक जब मंदिरों में घंटी बजायी जाती हैं तो मंदिर में स्थापित भगवान की प्रतिमा में चेतना जागृत होने लगती है। उस दौरान पूजा-पाठ करना काफी फलदाई माना जाता है।
इतना ही नहीं पुराणों में भी बताया गया है कि मंदिर में घंटी बजाने से मनुष्य के कई जन्मों का पाप खत्म हो जाता है।धार्मिक मान्यता के साथ-साथ मंदिर में घंटी बजाने के पीछे वैज्ञानिक वजह भी है।
वैज्ञानिक मान्यता के मुताबिक जब किसी मंदिर में घंटी बजती है तो वातावरण में कंपन होता और यह वायुमंडल की वजह से काफी दूर तक जाता है। उस दौरान जहां तक घंटी की आवाज सुनाई देती है वहां आसपास जीवाणु विषाणु सब खत्म हो जाते हैं।
जिससे मंदिर और उसके आसपास का वातावरण भी शुद्ध होता है। इतना ही नहीं धार्मिक मान्यता के मुताबिक मंदिर में घंटी बजाने से नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं। इससे लोगों के सुख और समृद्धि के द्वार भी खुलते है।
अयोध्या के प्रसिद्ध कथा वाचक और संत समिति के महामंत्री पवन दास शास्त्री बताते हैं कि घंटी बजाने से जो घंटी का कंपन है वह शरीर के अंदर चैतन्यता को जागृत कर देता है। दूसरी बात यह है कि हम जिस देवता का दर्शन करने जा रहे हैं उस देवता में भी चैतन्यता का संचार हो जाये।
इतना ही नहीं पूरे वातावरण में चैतन्यता का संचार हो इसलिए मठ मंदिरों में घंटी बजाने का विधान है। घंटी हमेशा फूल की ही बनी होती है। जिसको कांसा कहा जाता है उसके कंपन से सबको चैतन्यता मिलती है।
एबीएन सोशल डेस्क। अयोध्या में बन रहे भव्य राम मंदिर के उद्घाटन की तैयारियां जोरों से चल रही हैं और इसकी गूंज विदेशों तक पहुंच गयी है। देशवासियों की नहीं बल्कि पूरी दुनिया की नजर 22 जनवरी को होने वाले वाले राम मंदिर के उद्घाटन समारोह पर टिकी हैं। यही वजह है कि #अयोध्या राम मंदिर ट्रैंड कर रहा है। राम मंदिर ने धार्मिक पर्यट को नया आयाम दे दिया है।
धार्मिक स्थलों के बारे में जानने के इच्छुक दुनिया भर के लोगों में राम मंदिर को लेकर अलग के्रज है और अयोध्या राम मंदिर को सर्च करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के फैसले के बाद से तो यहां के बारे में जानने वालों की संख्या आसमान छू गयी।
राम मंदिर के उद्घाटन की तिथि के आ जाने के अयोध्या के बारे में सर्च करने वालों की संख्या 1806 फीसदी बढ़ी थी। अयोध्या के बारे में सबसे ज्यादा सर्च 30 दिसंबर को की गयी। इस दिन अयोध्या एयरपोर्ट का उद्घाटन हुआ था और साथ ही अयोध्या के पुनर्निर्मित रेलवे स्टेशन से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 नयी नवेली अमृत भारत एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखायी थी।
आनलाइन ट्रेवल प्लेटफॉर्म मेक माय ट्रिप के अनुसार, पिछले दो साल में धार्मिक जगहों के बारे में सर्च करने वालों की संख्या लगभग 97 फीसदी बढ़ गयी है। साल 2021 से 2023 के बीच लोग यात्राओं के लिए धार्मिक स्थलों को प्राथमिकता दे रहे हैं। इनमें भी आकर्षण का केंद्र अयोध्या और वहां बन रहा राम मंदिर है।
मेक माय ट्रिप के आंकड़ों के अनुसार, फिलहाल अयोध्या के बारे में लोग सबसे ज्यादा सर्च कर रहे हैं। यह आंकड़ा 585 फीसदी तक बढ़ चुका है। कंपनी के अनुसार, अमेरिका से 22.5 फीसदी और खाड़ी देशों से 22.2 फीसदी सर्च इस बारे में की गयी। इसके अलावा कनाडा, नेपाल और आस्ट्रेलिया के लोग भी अयोध्या और राम मंदिर के बारे में जानना चाह रहे हैं।
कंपनी के आनलाइन आंकड़ों के मुताबिक लोगों में धार्मिक यात्राएं करने की रुचि तेजी से बढ़ी है। पिछले 2 सालों में लोगों की प्राथमिकताएं तेजी से बदली हैं। अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण से यह सोच और ज्यादा मजबूत होती जा रही है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। चांद पर उतरने के बाद भारत ने एक और इतिहास रच दिया है। सूर्य मिशन पर निकले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के आदित्य एल-1 ने अपनी मंजिल लैग्रेंज प्वाइंट-1 (एल1) पर पहुंच कर एक कीर्तिमान हासिल किया है।
इसी के साथ आदित्य-एल 1 अंतिम कक्षा में भी स्थापित हो गया। यहां आदित्य दो वर्षों तक सूर्य का अध्ययन करेगा और महत्वपूर्ण आंकड़े जुटायेगा। भारत के इस पहले सूर्य अध्ययन अभियान को इसरो ने 2 सितंबर को लॉन्च किया था।
इसरो की इस सफलता पर पीएम मोदी ने भी खुशी जाहिर की है। उन्होंने ट्वीट कर इसरो की सराहना करते हुए लिखा कि भारत ने एक और मील का पत्थर हासिल किया। भारत की पहली सौर वेधशाला आदित्य-एल 1 अपने गंतव्य तक पहुंच गयी।
सबसे जटिल अंतरिक्ष मिशनों में से एक को साकार करने में हमारे वैज्ञानिकों के अथक समर्पण का प्रमाण है। यह असाधारण उपलब्धि सराहना योग्य है। हम मानवता के लाभ के लिए विज्ञान की नयी सीमाओं को आगे बढ़ाना जारी रखेंगे। उन्होंने आगे कहा कि वह इस असाधारण उपलब्धि की सराहना करने में देश के साथ शामिल हैं।
एल-1 प्वाइंट के आसपास के क्षेत्र को हेलो आर्बिट के रूप में जाना जाता है, जो सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के बीच मौजूद पांच स्थानों में से एक है, जहां दोनों पिंडों का गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के बीच साम्यता है।
मोटे तौर पर ये वे स्थान हैं, जहां दोनों पिंडों की गुरुत्व शक्ति एक दूसरे के प्रति संतुलन बनाती है। पृथ्वी और सूर्य के बीच इन पांच स्थानों पर स्थिरता मिलती है, जिससे यहां मौजूद वस्तु सूर्य या पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में नहीं फंसती है।
एल-1 बिंदु पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर है। यह पृथ्वी और सूर्य के बीच की कुल दूरी का केवल 1 फीसदी है। दोनों पिंडों की कुल दूरी 14.96 करोड़ किलोमीटर है। इसरो के एक वैज्ञानिक के अनुसार हेलो आॅर्बिट सूर्य के चारों ओर पृथ्वी के घूमने के साथ-साथ घूमेगा।
इसरो के इस अभियान को पूरी दुनिया में उत्सुकता से देखा जा रहा है, क्योंकि इसके सात पेलोड सौर घटनाओं का व्यापक अध्ययन करेंगे और वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय को डाटा मुहैया करायेंगे, जिससे सभी सूर्य के विकिरण, कणों और चुंबकीय क्षेत्रों का अध्ययन कर पाएंगे।
अंतरिक्ष यान में एक कोरोनोग्राफ है, जो वैज्ञानिकों को सूर्य की सतह के बहुत करीब देखने और नासा व यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के सौर और हेलिओस्फेरिक वेधशाला (एसओएचओ) मिशन के डाटा को पूरक डाटा मुहैया कराएगा। क्योंकि, आदित्य एल-1 अपनी स्थिति में स्थित एकमात्र वेधशाला है।
शुक्रवार को आदित्य एल-1 को अंतरिक्ष में सफर करते हुए 126 दिन पूरे हो गये। अपनी यात्रा शुरू करने के 16 दिन बाद यानी 18 सितंबर से आदित्य ने वैज्ञानिक डाटा एकत्र करना और सूर्य की इमेजिंग शुरू कर दी थी।
वैज्ञानिकों को अब तक एल-1 से सौर ज्वालाओं के हाई-एनर्जी एक्स-रे, फुल सोलर डिस्क इमेज मिल चुके हैं। पीएपीए और एएसपीईएक्स के सोलर विंड आयन स्पेक्ट्रोमीटर सहित चार उपकरण फिलहाल सक्रिय हैं और अच्छी तरह से काम कर रहे हैं। हेलो आर्बिट में पहुंचने के बाद सूईट पेलोड सबसे पहले सक्रिय होगा।
आदित्य पर सात वैज्ञानिक पेलोड तैनात किए गए हैं। इनमें विजिबल एमिशन लाइन कोरोनोग्राफ (वीईएलसी), सोलर अल्ट्रावॉयलेट इमेजिंग टेलीस्कोप (सूइट), सोलर लो एनर्जी एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर (सोलेक्सस), हाई-एनर्जी एल1 आॅर्बिटिंग एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर (हेल1ओएस) शामिल हैं, जो सीधे तौर पर सूर्य को ट्रैक करें।
वहीं, तीन इन-सीटू (मौके पर) मापने वाले उपकरण हैं, जिनमें आदित्य सोलर विंड पार्टिकल एक्सपेरिमेंट (एएसपीईएक्स), प्लाज्मा एनालाइजर पैकेज फॉर आदित्य (पीएपीए), और एडवांस थ्री डाइमेंशनल हाई रिजोल्यूशन डिजिटल मैग्नेटोमीटर (एटीएचआरडीएम) शामिल हैं।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारत ने साल की शुरुआत खगोल विज्ञान के सबसे बड़े रहस्यों में से एक ब्लैक होल के बारे में जानकारी जुटाने के लिए उपग्रह भेज कर की है। सुबह 9.10 बजे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के इस पहले एक्स-रे पोलरीमीटर उपग्रह यानी एक्सपोसैट को रॉकेट पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी) सी 58 के जरिए लॉन्च किया।
यह महज 21 मिनट में अंतरिक्ष में 650 किमी ऊंचाई पर जायेगा। इस रॉकेट का यह 60वां मिशन होगा। इस मिशन में एक्सपोसैट के साथ साथ 10 अन्य उपग्रह भी पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित होंगे।
इसरो ने बताया कि इस उपग्रह का लक्ष्य सुदूर अंतरिक्ष से आने वाली गहन एक्स-रे का पोलराइजेशन यानी ध्रुवीकरण पता लगाना है। यह किस आकाशीय पिंड से आ रही हैं, यह रहस्य इन किरणों के बारे में काफी जानकारी देते हैं। पूरी दुनिया में एक्स-रे ध्रुवीकरण को जानने का महत्व बढ़ा है।
यह पिंड या संरचनाएं ब्लैक होल, न्यूट्रॉन तारे (तारे में विस्फोट के बाद उसके बचे अत्यधिक द्रव्यमान वाले हिस्से), आकाशगंगा के केंद्र में मौजूद नाभिक आदि को समझने में मदद करता है। इससे आकाशीय पिंडों के आकार और विकिरण बनाने की प्रक्रिया को समझने में मदद मिलेगी।
एबीएन नॉलेज डेस्क। साल 2023 राजनीतिक मायनों से झारखंड में बहुत हलचल भरी रही। जहां लिफाफा प्रकरण ने मौजूदा राज्य सरकार को हिला कर रख दिया, तो वहीं कांग्रेस सांसद धीरज साहू के घर से मिले 351 करोड़ रुपये कैश ने पूरे देश-विदेश का ध्यान अपनी ओर खींचा। वहीं, 4 साल बाद विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष मिला तो वहीं बेबी देवी के सिर पर जीत का ताज सजा। आइये जानते हैं उन मुद्दों को जो इस साल चर्चा का विषय बना रहा।
प्रदेश की भाजपा सरकार ने सीएम हेमंत सोरेन पर पत्थर खनन मामले को लेकर सवाल उठाया था। इसके साथ ही उनकी विधानसभा की सदस्यता रद्द किए जाने की मांग की थी, जिसे लेकर राज्यपाल को लिफाफा भी भेजा गया था, जिसे राज्यपाल ने समीक्षा के लिए रखते हुए कहा था कि अभी लिफाफा नहीं खुला है। ऐसे में जहां विपक्ष हेमंत सरकार को गिराने में लगी हुई थी तो वहीं अपने कुछ विश्वसत नेताओं की निगरानी में हेमंत अपने सभी विधायकों को लेकर छत्तीसगढ़ रवाना हो गये थे और करीब हफ्तेभर तक वहीं के पांच सितारा रिसॉर्ट में सभी विधायकों को ठहराया गया था।
साल 2023 में बाबूलाल मरांडी को भाजपा ने प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी। इसी के साथ पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास को ओडिशा का राज्यपाल बना दिया गया। पूर्व मंत्री अमर बाउरी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का दर्जा दिया गया। बता दें कि पहले नेता प्रतिपक्ष के लिए बाबूलाल मरांडी का नाम प्रस्तावित था, लेकिन कुछ वजहों की वजह से आखिर चार साल बाद नेता प्रतिपक्ष का पद भरा गया और अमर बाउरी को चुना गया।
झारखंड के स्वर्गीय शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो के निधन के बाद डुमरी विधानसभा में उपचुनाव किया गया, जिसमें उनकी पत्नी बेबी देवी को चुनाव में उतारा गया और इस चुनाव में आजसू प्रत्याशी यशोदा देवी को हराते हुए बेबी देवी के सिर पर जीत का ताज सजा।
कांग्रेस नेता धीरज साहू की चर्चा तो मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक पर बनी रही। इतना ही नहीं आईटी रेड में अलमारी में मिले 351 करोड़ कैश की तस्वीर तो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुई। खबर तब सुर्खियों में बन गयी जब रेड के लिए तीन दर्जन गई नोट काउंटिंग मशीन भी नोटों की काउंटिंग के लिए कम पड़ गयी।
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