एबीएन नॉलेज डेस्क। तीन मार्च को पूर्ण चंद्रग्रहण है। इसे खास माना जा रहा है। जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा तीनों ही एक लाइन में आ जाते हैं, तो पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है। इसे ही चंद्र ग्रहण कहते हैं। इस दौरान चंद्रमा लाल नजर आयेगा। इसे ब्लड मून भी कहा जाता है। यानी चंद्रमा सीधे पृथ्वी की छाया से गुजरेगा। मंगलवार शाम को चमकीले और पूर्ण चंद्रमा पर एक गहरी छाया पड़नी शुरू हो जायेगी। एक बार जब चंद्रमा पूरी तरह से छाया में डूब जायेगा, तो वह लाल रंग की चमक लेने लगेगा।
अगर मौसम साफ रहा तो आप इसे देख सकते हैं। खगोलविदों के अनुसार पूर्वोत्तर भारत में दृश्यता बेहतर रहने की संभावना है, लिहाजा वहां पर इसे स्पष्टता के साथ देखा जा सकता है। असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, नागालैंड और मिजोरम में देखा जा सकेगा। आप इसे दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता से भी देख सकते हैं।
हालांकि, यहां से शायद उतना क्लियर विजन न आये। इसे देखने के लिए विशेष चश्मे की जरूरत नहीं है। आप नंगी आंखों से इसे देख सकते हैं। इसका स्वास्थ्य पर भी कोई असर नहीं पड़ेगा। वैज्ञानिक दृष्टि से चंद्र ग्रहण एक खगोलीय घटना है। अत: इसका स्वास्थ्य या दैनिक जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि, धर्म-कर्म के जानकार ऐसा नहीं मानते हैं।
शास्त्रों में चंद्र ग्रहण को लेकर कई तरह की बातें लिखी हैं। ग्रहण शुरू होने से पहले ही सूतक काल की शुरुआत हो जाती है। इस काल के दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं होता है। इस बार भी नौ घंटे पहले सूतक काल की शुरुआत हो रही है। आप सूतक काल में पूजा-पाठ नहीं कर सकते हैं। ग्रहण समाप्त होने के बाद लोग स्नान और पूजा पाठ करते हैं।
ज्योतिष अनुसार 3 मार्च को सुबह 09:39 बजे से सूतक काल शुरू हो जायेंगे, जो ग्रहण समाप्त होने के साथ खत्म होंगे। दिल्ली के प्रसिद्ध कल्काजी मंदिर के महंत पीठाधीश्वर सुरेंद्रनाथ अवधूत ने एबीएन को बताया, इस बार का चंद्र ग्रहण दोपहर 3:20 से शुरू होकर 6:57 तक रहेगा।
पंडित उमाशंकर मिश्र का कहना है कि ग्रहण काल के दौरान मंत्र जप और मानसिक पूजा श्रेष्ठ मानी गयी है। ग्रहण समाप्त होने के बाद (शाम 06:57 बजे के बाद) पूरे घर में गंगाजल का छिड़काव करें, स्नान करें और दान-पुण्य करें। इसके बाद ही अगले दिन यानी 4 मार्च को सुरक्षित और हर्षोल्लास के साथ होली का आनंद लें।
लखनऊ के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य डॉ उमाशंकर मिश्र का कहना है कि ग्रहण काल के दौरान सिंह, कन्या और कुंभ राशि वालों को विशेष सावधानी बरतें, जबकि मेष और मिथुन के लिए समय शुभ रहेगा। ग्रहण काल में नकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। ज्योतिषीय दृष्टि से इससे बचें।
धार्मिक मान्यता है कि जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ था, तब राहु ने अमृत पान कर लिया था। वह असुर था। इसलिए भगवान विष्णु ने उसका सिर काट दिया। उसके सिर को राहु और उसके धड़ को केतु कहा जाता है। मान्यता है कि तभी से राहु और केतु, सूर्य और चंद्रमा को ग्रसते हैं, इसलिए ग्रहण लगता है।
दरअसल, चंद्रमा के सामने जब पृथ्वी आती है, तो उसकी छाया चंद्रमा पर पड़ती है। इस वजह से ब्लड मून दिखता है। इसकी लालिमा उस समय पृथ्वी के वायुमंडल की स्थिति पर निर्भर करती है। वायुमंडल में जितना अधिक धूल होगा, उतनी ही कम रोशनी निकल पाएगी, इससे चंद्रमा गहरा लाल दिखेगा। इसके ठीक उलट, अगर वायुमंडल में धूल भरा नहीं होगा, तो यह रोशनी को अधिक मात्रा में गुजरने देगा, इसलिए चंद्रमा नारंगी रंग का दिखाई देगा।
वायुमंडल से केवल लाल प्रकाश ही गुजर पाता है, क्योंकि नीला प्रकाश (जिसकी तरंगदैर्ध्य कम होती है) बिखर जाता है। इसे रेले प्रकीर्णन कहा जाता है। यही वह प्रक्रिया है जिसके कारण आकाश नीला दिखाई देता है। नीला प्रकाश वायुमंडल से होकर चंद्रमा की ओर नहीं जाता, क्योंकि यह पूरे आकाश में बिखर जाता है। दिन के समय आकाश में हम कहीं भी देखें, हमारी नजर नीले प्रकाश की उन बिखरी हुई किरणों में से किसी एक पर जरूर पड़ेगी।
क्योंकि सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की कक्षा के सापेक्ष चंद्रमा की कक्षा बहुत थोड़ी झुकी हुई है, इसलिए तीनों पिंड हमेशा पूरी तरह से एक सीध में नहीं आते जिससे हम पूर्ण चंद्र ग्रहण देख सकें। अगले छह चंद्र ग्रहणों के दौरान, चंद्रमा पृथ्वी की छाया में पूरी तरह से डूबने के बजाय केवल कुछ देर के लिए ही प्रवेश करेगा।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत ने अपने पहले मानव अंतरिक्ष मिशन की यात्रा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए गगनयान कार्यक्रम के लिए ड्रोग पैराशूट का सफल भार परीक्षण किया है।
रक्षा मंत्रालय ने गुरुवार को बताया कि यह परीक्षण रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की टर्मिनल बैलिस्टिक्स अनुसंधान प्रयोगशाला, चंडीगढ़ स्थित रेल ट्रैक रॉकेट स्लेज सुविधा में किया गया। रेल ट्रैक रॉकेट स्लेज एक विशेष गतिशील परीक्षण सुविधा है जिसका इस्तेमाल उच्च गति के एयरोडायनमिक और बैलिस्टिक मूल्यांकन के लिए व्यापक रूप से किया जाता है।
यह परीक्षण बुधवार को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, एरियल डिलीवरी अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन तथा टर्मिनल बैलिस्टिक्स अनुसंधान प्रयोगशाला की समर्पित टीमों की भागीदारी के साथ किया गया।
रेल ट्रैक रॉकेट स्लेज का यह गतिशील परीक्षण जिसमें वास्तविक उड़ान के अधिकतम भार से भी अधिक योग्यता स्तर भार का अनुकरण किया गया, पैराशूट के अतिरिक्त डिज़ाइन सुरक्षा मार्जिन को प्रदर्शित करता है। यह परीक्षण उच्च शक्ति रिबन पैराशूट के डिज़ाइन और निर्माण में भारत की विशेषज्ञता को सिद्ध करता है।
यह उपलब्धि एक बार फिर टर्मिनल बैलिस्टिक्स अनुसंधान प्रयोगशाला के उन्नत परीक्षण सुविधा तथा तकनीकी विशेषज्ञता प्रदान कर अंतरिक्ष और रक्षा कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित करती है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गगनयान ड्रोग पैराशूट के सफल योग्यता परीक्षण के लिए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और उद्योग जगत को बधाई दी।
उन्होंने कहा कि यह परीक्षण आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने की दिशा में एक और बड़ा कदम है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव तथा रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत ने भी परीक्षण से जुड़ी सभी टीमों को बधाई दी।
एबीएन कैरियर डेस्क। जैसे-जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की दुनिया बढ़ती जा रही है, हर प्रोफेशनल के मन में एक ही डर है, क्या मेरी जॉब सेफ है? इसी मुद्दे पर अक समिट में रॉकेट के को-फाउंडर और चार्टर्ड अकाउंटेंट से अक एक्सपर्ट बने दीपक धनक ने अपनी राय सभी के सामने रखी। जहां उन्होंने बताया कि समय के साथ अपडेट हो रहे लोगों को कोई खतरा नहीं है।
जब दीपक धनक से सवाल किया कि क्या एआई चार्टर्ड अकाउंटेंट्स की जगह ले लेगा, तो उन्होंने साफ कहा, मुझे नहीं लगता कि एआई या कोई भी टूल किसी इंसान की जगह ले पायेगा। लेकिन जो व्यक्ति जो इन टूल्स को समझता है और इनका इस्तेमाल करना जानता है, वो बिल्कुल उस शख्स को रिप्लेस कर देगा जो एआई को यूज नहीं कर रहा है।
दीपक धनक ने बताया कि काम दो तरह के होते हैं। पहला जो बहुत बोरिंग होते हैं और दूसरा जो कोर वैल्यू वाले होते हैं। आज हम प्रोसेस और स्पीड के समय में गैर-जरूरी कामों में उलझ गये हैं। एआई इन कामों को संभाल लेगा, जिससे प्रोफेशनल्स के पास उन कामों के लिए ज्यादा समय होगा जिसमें वो माहिर हैं।
समिट में धनक ने वाइब कोडिंग के कॉन्सेप्ट पर भी राय रखी। उन्होंने बताया कि पहले सॉफ्टवेयर या वेबसाइट बनाने के लिए कोडिंग और इसकी जानकारी होना जरूरी थी। लेकिन वाइब कोडिंग के जरिये अब आप केवल प्रॉम्प्ट लिखकर सॉफ्टवेयर तैयार कर सकते हैं। एआई मॉडल आपके शब्दों को तकनीकी बारीकियों में बदल देंगे।
दीपक ने जोर देकर कहा कि भविष्य में केवल एफिशिएंसी ही जीत का पैमाना नहीं होगी। जीत इस बात पर निर्भर करेगी कि आपका समाधान कितना गहरा है, प्रोडक्टिविटी कितनी है और वो क्लाइंट की जरूरतों के हिसाब से कितना अनुरुप है। कुल मिलाकर एआई चार्टर्ड अकाउंटेंट्स का दुश्मन नहीं, बल्कि उनका सबसे बड़ा हथियार बनने वाला है। शर्त बस इतनी है कि आपको समय के साथ खुद को बदलना होगा।
एबीएन नॉलेज डेस्क। भारत के डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और पत्रकारिता विषय पर एक चर्चा का आयोजन किया। इसका आयोजन दिल्ली में चल रहे इंडिया एआई इंपैक्ट समिट के दौरान किया गया। इस परिचर्चा में देश के बड़े मीडिया संस्थानों के प्रतिनिधियों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सदस्यों ने भाग लिया।
इस परिचर्चा में यह समझने की कोशिश की गई कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पत्रकारिता को कैसे बदल रहा है और भारत को इस बदलाव को जिम्मेदारी से कैसे अपनाना चाहिए. कार्यक्रम का संचालन अशीष फेरवानी ने किया।
इसमें इंडिया टुडे ग्रुप, दैनिक भास्कर ग्रुप, अमर उजाला ग्रुप, बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड, द हिंदू ग्रुप और इंटरनेशनल न्यूज मीडिया एसोसिएशन के वरिष्ठ पदाधिकारी और अधिकारी शामिल थे.
कार्यक्रम में डीएनपीए की महासचिव सुजाता गुप्ता ने कहा कि AI के दौर में पत्रकारिता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है।
AI यह बदल रहा है कि खबरें कैसे बनती हैं, फैलती हैं और उन पर भरोसा कैसे किया जाता है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में पत्रकारिता सिर्फ कंटेंट नहीं, बल्कि लोकतंत्र की मजबूत नींव है। इसलिए AI के विकास में जवाबदेही और भरोसा बहुत जरूरी है।
चर्चा में यह बात भी सामने आई कि खबरों को AI में दूसरे कंटेंट से अलग तरीके से देखा जाना चाहिए। खबरों का असर चुनाव, बाजार, समाज और राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ता है। इसलिए पत्रकारिता को सिर्फ इंटरनेट की सामान्य जानकारी नहीं माना जा सकता। यह मेहनत, निवेश और संपादकीय जिम्मेदारी से तैयार की जाती है।
चर्चा में भाग लेने वाले पैनल में शामिल सदस्यों का कहना था कि न्यूजरूम में AI मददगार हो सकता है, लेकिन अंतिम जिम्मेदारी इंसानों की ही रहनी चाहिए। अगर AI खबरों का सार बनाता है और उन्हें आगे फैलाता है, तो उसे भी जिम्मेदारी के साथ काम करना होगा।
एबीएन नॉलेज डेस्क। प्रत्येक साल की तरह इस साल भी खगोलीय घटनाएं घटेंगी या फिर कहें उस ग्रहण की स्थिति बनेगी, जिसका नाम आते ही अक्सर लोगों का मन तमाम तरह की आशंकाओं से घिर जाता है।
फरवरी 2026 में लगने जा रहे साल के पहले सूर्य ग्रहण को लेकर भी लोग इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि यह 16 को लगेगा या फिर 17 फरवरी को? सूर्य ग्रहण भारत में दिखेगा या नहीं?
इसका सूतक लगेगा या नहीं? सूर्य ग्रहण का किस राशि पर क्या प्रभाव पड़ेगा? अगर आप भी सूर्य ग्रहण को लेकर कुछ ऐसी ही स्थिति से गुजर रहे हैं तो आइए उनके जवाब जाने-माने ज्योतिषविद् पं. कृष्ण गोपाल मिश्र से जानते हैं।
साल 2026 का पहला सूर्य ग्रहण 17 फरवरी 2026 को भारतीय समयानुसार दोपहर 03:26 बजे से प्रारंभ होगा और और इसका मध्य समय 05:42 बजे और यह 07:52 बजे बजे खत्म होगा।
ज्योतिषाचार्य कृष्ण गोपाल मिश्र के अनुसार साल का पहला सूर्य ग्रहण भारत में नहीं नजर आएगा। यह सिर्फ अंटार्टिका और दक्षिण अफ्रीका की तरफ नजर आएगा।
पंचांग के अनुसार किसी भी सूर्य ग्रहण का सूतक 12 घंटे पहले लग जाता है। चूंकि यह सूर्य ग्रहण भारत में बिल्कुल भी नजर नहीं आएगा इसलिए इसका सूतक भी यहां पर मान्य नहीं होगा।
ऐसी स्थिति में भारत में रहने वाले लोगों अमावस्या के दिन किए जाने वाले पूजा-पाठ से लेकर धार्मिक एवं सामान्य कार्य को बगैर किसी रोक-टोक के जारी रखेंगे। इस दिन पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध पर कोई मनाही नहीं रहेगी।
एबीएन नॉलेज डेस्क। जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की चर्चा होती है तो आमतौर पर अमेरिका और चीन की बड़ी टेक कंपनियों के मॉडल्स का नाम सामने आता है, लेकिन बेंगलुरु स्थित स्टार्टअप Sarvam AI ने इस सोच को बदल दिया है। भारत में ही फाउंडेशनल AI मॉडल्स तैयार कर रही यह कंपनी अब वैश्विक स्तर पर पहचान बना रही है। हाल ही में इसके दो टूल्स Sarvam Vision और Bulbul ने अंतरराष्ट्रीय AI दुनिया में खास जगह बनाई है।
Sarvam Vision एक एडवांस्ड AI टूल है, जो ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन यानी OCR तकनीक पर काम करता है। इस तकनीक की मदद से डॉक्युमेंट्स, इमेज या स्कैन की गई फाइलों से टेक्स्ट को पढ़ा और समझा जाता है। Sarvam Vision ने कई अहम बेंचमार्क्स पर ChatGPT, Google Gemini और Anthropic Claude जैसे मशहूर AI मॉडल्स से बेहतर नतीजे दिए हैं, जिसकी जमकर सराहना हो रही है।
Sarvam AI के को-फाउंडर प्रत्युष कुमार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस उपलब्धि की जानकारी साझा की। उनके मुताबिक, Sarvam Vision ने OmniDocBench v1.5 के इंग्लिश सबसेट में 93.28 प्रतिशत की सटीकता हासिल की है। यह बेंचमार्क इस बात को परखता है कि कोई AI सिस्टम असली दुनिया के जटिल डॉक्युमेंट्स को कितनी अच्छी तरह समझ पाता है। इस टेस्ट में कठिन डिजाइन, तकनीकी टेबल और गणितीय फॉर्मूले भी शामिल होते हैं, जहां पारंपरिक OCR सिस्टम अक्सर कमजोर साबित होते हैं।
Sarvam Vision की इस सफलता के बाद Sarvam AI को वैश्विक स्तर पर चर्चा मिल रही है। पहले कंपनी को केवल भारतीय भाषाओं पर फोकस करने को लेकर सवालों का सामना करना पड़ता था, लेकिन अब वही सवाल तारीफ में बदल चुके हैं। कई टेक एक्सपर्ट्स का मानना है कि Sarvam का OCR और स्पीच मॉडल्स उन कमियों को पूरा कर रहे हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय AI सिस्टम्स लंबे समय से नजरअंदाज करते आए हैं।
Sarvam AI को लेकर आम यूजर्स भी अपने सकारात्मक अनुभव साझा कर रहे हैं। कई लोगों का कहना है कि उन्होंने Sarvam Vision का इस्तेमाल किया और यह टूल वास्तविक जरूरतों में काफी असरदार साबित हुआ। इससे साफ है कि यह तकनीक सिर्फ टेस्टिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यावहारिक उपयोग में भी मजबूत प्रदर्शन कर रही है।
OCR के अलावा Sarvam AI ने टेक्स्ट-टू-स्पीच वॉयस मॉडल Bulbul V3 भी लॉन्च किया है। यह AI सिस्टम लिखे हुए टेक्स्ट को प्राकृतिक और स्पष्ट आवाज में बदलता है। कंपनी के अनुसार, Bulbul V3 उनका अब तक का सबसे सक्षम वॉयस मॉडल है, जिसे खासतौर पर भारतीय भाषाओं के लिए तैयार किया गया है। फिलहाल इसमें 11 भारतीय भाषाओं और 35 से अधिक वॉयस का सपोर्ट मौजूद है, और आगे इसमें और भाषाएं जोड़ी जाएंगी।
Sarvam AI की यह कामयाबी दिखाती है कि भारत में विकसित AI मॉडल्स अब सिर्फ देश तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी बड़ी टेक कंपनियों को कड़ी चुनौती देने की क्षमता रखते हैं।
एबीएन नॉलेज डेस्क। गूगल ने एंड्रॉयड यूजर्स के लिए बड़ा सिक्योरिटी अलर्ट जारी किया है। कंपनी ने साफ कर दिया है कि एंड्रॉयड 12 या उससे पुराने वर्जन पर चल रहे फोन अब सिक्योरिटी अपडेट नहीं पाएंगे।
इसका सीधा मतलब है कि ऐसे डिवाइस नए मालवेयर और स्पायवेयर अटैक के लिए ज्यादा असुरक्षित हो गए हैं। दुनियाभर में करीब एक अरब एंड्रॉयड यूजर्स इस जोखिम वाले जोन में आ चुके हैं। अगर आपका फोन अपडेट नहीं हो पा रहा, तो उसे बदलने की सलाह दी गई है।
गूगल ने पुष्टि की है कि एंड्रॉयड 12 या उससे पुराने वर्जन पर चल रहे स्मार्टफोन को अब नए सिक्योरिटी पैच नहीं मिलेंगे। लेटेस्ट आंकड़ों के अनुसार सिर्फ करीब 57.9 प्रतिशत डिवाइस ही एंड्रॉयड 13 या उससे ऊपर के वर्जन पर हैं।
बाकी डिवाइस सिक्योरिटी के मामले में फ्रीज हो चुके हैं। 2021 या उससे पहले लॉन्च हुए ज्यादातर फोन इस समस्या से प्रभावित हैं। इसका मतलब है कि सिस्टम की कमजोरियों को अब आधिकारिक तौर पर ठीक नहीं किया जाएगा। इससे हैकिंग और डेटा चोरी का खतरा बढ़ जाता है।
एबीएन नॉलेज डेस्क। हिमालय को हम हमेशा मजबूती, ऊंचाई और स्थिरता का प्रतीक मानते आये हैं, लेकिन अब वैज्ञानिकों की एक चौंकाने वाली खोज ने इस सोच को हिला दिया है। हिमालय की ऊंची चोटियों के नीचे धरती के भीतर एक ऐसी प्रक्रिया चल रही है, जिसे देखकर वैज्ञानिक भी हैरान हैं।
ताजा शोध में सामने आया है कि तिब्बत के नीचे भारतीय टेक्टॉनिक प्लेट सिर्फ टकरा नहीं रही, बल्कि अंदर ही अंदर दो हिस्सों में फट रही है। अब तक यह माना जाता था कि भारतीय प्लेट यूरेशियन प्लेट से टकराकर हिमालय को ऊपर उठा रही है। लेकिन नये सबूत बताते हैं कि कहानी इससे कहीं ज्यादा जटिल है।
भूकंप से निकलने वाली तरंगें धरती के भीतर की संरचना का एक्स-रे जैसी जानकारी देती हैं। इन्हीं तरंगों का अध्ययन करते हुए वैज्ञानिकों को पता चला कि भारतीय प्लेट की निचली परत भारी और घनी होने के कारण टूटकर नीचे की ओर धंस रही है, जबकि उसकी ऊपरी परत अब भी उत्तर दिशा में खिसक रही है।
यानी प्लेट झुक नहीं रही, बल्कि परत-दर-परत अलग हो रही है। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में डीलैमिनेशन कहा जाता है, और हिमालय क्षेत्र में इसका इतना स्पष्ट प्रमाण पहली बार मिला है।
अब तक प्लेट टेक्टॉनिक्स के मॉडल यह मानते थे कि महाद्वीपीय प्लेटें या तो एक-दूसरे के नीचे जाती हैं या मुड़कर ऊपर उठती हैं। लेकिन भारतीय प्लेट का इस तरह अंदर से छिल जाना एक नयी सोच को जन्म देता है।
अमेरिका और चीन के वैज्ञानिकों की एक संयुक्त टीम ने दक्षिणी तिब्बत में 90 से ज्यादा सीस्मिक स्टेशन लगाये। इन उपकरणों से मिले डेटा की मदद से वैज्ञानिकों ने धरती के अंदर की 3डी संरचना तैयार की इस मॉडल में साफ दिखा कि जमीन की सतह से करीब 100 किलोमीटर नीचे भारतीय प्लेट टूटकर अलग हो रही है। यह प्रक्रिया लाखों-करोड़ों सालों से धीरे-धीरे चल रही है।
इस खोज के कई दूरगामी नतीजे हो सकते हैं। वैज्ञानिकों को अब यह समझने में मदद मिलेगी कि इस इलाके में भूकंप बार-बार क्यों आते हैं। इसके अलावा हिमालय और तिब्बत में पाये जाने वाले गर्म पानी के झरनों में मिलने वाली हीलियम-3 गैस को भी इसी प्रक्रिया से जोड़ा जा रहा है। प्लेट के टूटने से धरती के अंदर की गर्मी और गैसों को बाहर आने का रास्ता मिल सकता है।
हालांकि यह खोज बेहद अहम है, लेकिन वैज्ञानिक जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालने के मूड में नहीं हैं। मोनाश यूनिवर्सिटी के भूवैज्ञानिक फैबियो कैपिटानियो का कहना है कि यह धरती के भीतर चल रही बेहद लंबी प्रक्रिया का सिर्फ एक छोटा सा दृश्य है। उनके मुताबिक, हमने अभी सिर्फ एक झलक देखी है, पूरी कहानी समझने के लिए और गहरे अध्ययन की जरूरत है।
अब वैज्ञानिक सैटेलाइट डेटा और कंप्यूटर सिमुलेशन की मदद से इस प्रक्रिया को और विस्तार से समझने की तैयारी कर रहे हैं। 3डी मॉडलिंग से यह पता लगाया जाएगा कि प्लेट के टूटने से भविष्य में भूकंप का खतरा कितना बढ़ सकता है। एक बात तय है—हिमालय सिर्फ बाहर से ही नहीं, अंदर से भी दुनिया के सबसे रहस्यमय पहाड़ों में से एक है।
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