एबीएन एडिटोरियल डेस्क। नयी पीढ़ी तो आपातकाल की विभीषिका से बिल्कुल अपरिचित है। बातचीत के क्रम में इस पीढ़ी ने आपातकात शब्द जरूर सुना होगा लेकिन 25-26 जून, 1975 की रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश पर थोपे गये आपातकाल के दंश की कई पीढ़ियां भुक्तभोगी हैं।
अंग्रेजों से आजाद होने के बाद भारत लोकतांत्रिक देश तो बन गया, लेकिन ठीक 25 साल बाद तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी की ओर से थोपी गयी इमरजेंसी में लोकतंत्र की धज्जियां उड़ गयी थी। 25 जून 1975 की आधी रात में अपनी सत्ता बनाये रखने के लिए इंदिरा ने तानाशाही का ऐसा नमूना पेश किया, जो उस पीढ़ी के लोग अब भी नहीं भूल पाये हैं।
बीते साल 25 जून को लोकसभा अध्यक्ष चुने जाने के तुरंत बाद ओम बिरला ने आपातकाल की निंदा करते हुए एक प्रस्ताव पढ़ा, जिसमें आपातकाल को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा संविधान पर हमला बताया गया। इस कदम के बाद सदन में कांग्रेस सांसदों ने विरोध किया। कांग्रेस की ओर से कहा गया कि पांच दशक पुराने इस काले दौर का स्मरण नहीं किया जाना चाहिए। संयोगवश, इंडिया ब्लॉक के सदस्यों ने एक दिन पूर्व 24 जून को सदस्य के रूप में शपथ लेते समय संविधान की प्रतियां उठायी थीं।
ऐसे में अहम सवाल यह है कि क्या कांग्रेस आपातकाल को सही मानती है या फिर यह चाहती है कि लोकतंत्र को कलंकित करने और संविधान का निरादर करने वाले इस तानाशाही भरे कदम का स्मरण नहीं किया जाना चाहिए? क्या कांग्रेस कांग्रेस चाहती है कि आपातकाल पर चर्चा नहीं होनी चाहिए। लेकिन आपातकाल के भुगतभोगी आम लोगों और नेताओं का मानना है कि अतीत की भूलों को विस्मृत करने से उनके दोहराए जाने का खतरा बढ़ जाता है।
वास्तव में कांग्रेस और उसके नेता आपातकाल की गलती को स्वीकार नहीं करते। अगर वह अपनी गलती स्वीकार करते तो वह यह कहने की हिम्मत जुटाते कि 49 साल पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ओर से देश पर आपातकाल थोपने और राजनीतिक विरोधियों, मीडिया एवं जनता के खिलाफ दमन का चक्र चलाना एक भूल थी।
कांग्रेस को आपातकाल की याद दिलाना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि पिछले कुछ समय से वह संविधान के खतरे में होने का फर्जी हौवा खड़ा कर उसके प्रति प्रतिबद्धता जताने में लगी हुई है। यह ठीक है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का संख्या बल बढ़ा है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह दबे-छिपे स्वर में आपातकाल को सही ठहराने की कोशिश करती दिखने लगे। उसकी यह कोशिश तो आपातकाल के स्मरण को और अधिक आवश्यक ठहराती है।
यदि वह संविधान के प्रति इतनी ही अधिक प्रतिबद्ध है तो फिर यह क्यों नहीं स्वीकार करना चाहती कि इंदिरा गांधी ने अपनी संसद सदस्यता खारिज किये जाने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए आपातकाल का सहारा लिया और इस क्रम में इसी संविधान को कुचला और उसकी प्रस्तावना को मनमाने तरीके से बदल दिया।
नयी पीढ़ी तो आपातकाल की विभीषिका से बिल्कुल अपरिचित है। बातचीत के क्रम में इस पीढ़ी ने आपातकात शब्द जरूर सुना होगा लेकिन 25-26 जून, 1975 की रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश पर थोपे गए आपातकाल के दंश की कई पीढ़ियां भुक्तभोगी हैं। आपातकाल के दौरान पूरा देश कारागार में परिवर्तित हो गया था।
विपक्ष के सभी नेताओं को रात में ही जगा कर नजदीकी जेल में जबरन उन्हें डाल दिया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस और जमात-ए-इस्लामी सहित 26 संगठनों पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। आपातकाल के मुखर आलोचक रहे फिल्मी कलाकारों को भी इसका दंश झेलना पड़ा। किशोर कुमार के गानों को रेडियो और दूरदर्शन पर बजाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। देव आनंद को भी अनौपचारिक प्रतिबंध का सामना करना पड़ा था।
आपातकाल की कहानी को बार-बार दोहराना इसलिए भी जरूरी है कि आज की युवा पीढ़ी कम से कम यह जान ले कि जो आजादी और स्वतंत्रता उसे अनायास मिली है, सहज सुलभ है, वह दरअसल कितने बलिदानों से मिली है और उसे कायम रखने के लिए कितनी लड़ाइयां हुई हैं! लोगों को पता चलना चाहिए कि संविधान की हत्या किसे कहते हैं।
पूर्व उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू के शब्दों में, आपातकाल की घोषणा ने देश की लोकतांत्रिक संरचना को हिला कर रख दिया। लोकतांत्रिक व्यवस्था के कमजोर पक्षों पर व्यापक विचार विमर्श हुआ और देश ने दोबारा कभी भी इसे नहीं लगाये जाने का प्रण किया। यह प्रतिज्ञा तभी बनी रहेगी जब देश बार बार उस आपातकाल से मिलने वाले सबक को याद करता रहेगा। खास कर, युवाओं को आजाद भारत के उस काले अध्याय की जानकारी और उससे मिले सबक को जानना होगा।
देश में आपातकाल लागू होने के बाद कई त्रासद घटनाएं हुईं। दिल्ली का तुर्कमान गेट कांड भी इनमें एक था। मुस्लिम बहुल उस इलाके को संजय गांधी ने दिल्ली के सौंदर्यीकरण के नाम पर खाली करा दिया। यह काम लोगों की सहमति से नहीं, बल्कि जबरन किया गया गया। बुल्डोजर से लोगों के घर ढहाये गये। जिन्होंने विरोध किया, उन्हें जेलों में ठूंस दिया गया। विरोध के दौरान पुलिस ने लाठियां बरसायी और आंसू गैस के गोले छोड़े। पुलिस ने गोलियां भी चलायी। चार लोगों की जान चली गयी।
संजय गांधी ने तब तक परिवार नियोजन का अभियान छेड़ दिया था। सड़क से भिखारियों, झोपड़पट्टी के लोगों और राहगीरों को पकड़ कर जबरन नसबंदी के टार्गेट पूरे किये जाने लगे। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में 18 अक्टूबर 1976 को नसबंदी अभियान का विरोध कर रहे आंदोलकारियों पर पुलिस ने सीधी फायरिंग कर दी थी। जिसमें 42 बेगुनाहों की मौत हो गयी थी। मृतकों की स्मृति में यहां शहीद चौक बना हुआ है। एक रिपोर्ट के मुताबिक इमरजेंसी के दौरान देशभर में 1 करोड़ 10 लाख से ज्यादा लोगों की नसबंदी कर दी गयी थी।
तत्कालीन अटार्नी जनरल नीरेन डे ने तब सुप्रीम कोर्ट में यह कबूल किया था कि जीने का अधिकार स्थगित है। यदि स्टेट आज किसी की जान भी ले ले तो भी उसके खिलाफ कोई व्यक्ति कोर्ट की में नहीं जा सकता। ऐसे मामलों को सुनने के कोर्ट के अधिकार खत्म कर दिये गये हैं। ऐसा तो अंग्रेजों के राज में भी नहीं था। विलायती शासन में भी कम से कम जनता को कोर्ट में जाने की छूट तो मिली हुई थी।
आपातकाल की अवधि के दौरान सत्ता के दुरुपयोग, कदाचार और ज्यादतियों के विभिन्न पहलुओं की जांच के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेसी शाह की अध्यक्षता में शाह आयोग का गठन किया था। आयोग द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि आपातकाल के दौरान एक लाख से ज्यादा लोगों को निवारक हिरासत कानूनों के तहत गिरफ्तार किया गया था।
24 जून 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इमरजेंसी का जिक्र करते हुए कहा- जो लोग इस देश के संविधान की गरिमा को समर्पित हैं, जो लोग भारत की लोकतांत्रिक परंपराओं पर निष्ठा रखते हैं, उनके लिए 25 जून न भूलने वाला दिवस है। इमरजेंसी के विरोध में केंद्र की बीजेपी सरकार ने हर साल 25 जून को संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया है। असल में, संविधान हत्या दिवस मनाने का मकसद संविधान की हत्या करने वालों और इस घटना से लोगों को हुई तकलीफों के बारे में आज की पीढ़ी को परिचित कराना है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, जब भी मैं निराशा होता हूं, तब इतिहास के पन्नों को पलटकर सत्य और प्रेम की जीत को दोहराने वाले तथ्यों का स्मरण करता हूं। इतिहास के पन्नों पर आतातायी और हत्यारे भी रहे हैं और कुछ पल के लिए वो अजेय भी दिखे लेकिन यह खास ख़्याल रखें कि अंत में उनका खात्मा हुआ है। जीत हमेशा सत्य की हुई है। हमें अपने कटु अनुभवों से सीख लेने की आवश्यकता है, ताकि न्यू इंडिया के सपने को साकार कर सकें।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। बिरसा मुंडा जी के शोषण मुक्त समाज की कल्पना आज भी संघर्ष की राह पर है हम चाह कर भी जनता को उनके मौलिक अधिकार का सुख नहीं दे पाये। आज भी जीवन जीने के न्यूनतम आवश्यकताओं के लिए जन समुदाय संघर्ष कर रहा है। इस चिंता को अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के दृष्टिकोण से अगर देखा जाए तो समाज में आर्थिक समानता का ना होना और एक दूसरे के शोषण करने की प्रवृत्ति का हावी होना भी एक महत्वपूर्ण कारक नजर आता है झारखंड के सामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य में बिरसा मुंडा का शोषण-मुक्त समाज की स्थापना ग्राहक पंचायत की दृष्टि से भी झारखंड की एक आवश्यकता है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि उलगुलान केवल विद्रोह नहीं था, वह एक सामाजिक चेतना थी— शोषण, अन्याय और असमानता के विरुद्ध एक संवेदनशील जन आंदोलन था। बिरसा मुंडा ने जिस शोषण-मुक्त समाज की कल्पना की थी, वह आज के उपभोक्तावादी समाज में भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी 19 वीं सदी में थी। उनका संघर्ष केवल जमींदारी और अंग्रेजी शासन के खिलाफ नहीं था, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में न्याय, समानता और स्वावलंबन की स्थापना के लिए था।
देखा जाये तो ग्राहक पंचायत का मूलभूत दर्शन और भगवान बिरसा मुंडा की सोच की दिशा और दृष्टिकोण बिल्कुल एक है। अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत का मूल मंत्र ग्राहक : एवं राजा है और बिरसा मुंडा की सामाजिक चेतना दोनों ही जनसत्ता, अधिकार और जागरूकता के स्तंभों पर आधारित हैं।
बिरसा मुंडा ने जीवन के हर स्तर पर शोषण के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। आज झारखंड में ग्राहक भी एक ऐसे ही शोषण तंत्र से जूझ रहा है— चाहे वह महंगे दामों पर मिलावटी सामान हो या मुनाफाखोरी, घटिया सेवा, नकली उत्पाद, या डिजिटल धोखाधड़ी।
झारखंड के उपभोक्ताओं की आज की स्थिति चिंताजनक है।ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की भारी कमी है। उपभोक्ता अधिकारों के बारे में जानकारी का अभाव है। मूलभूत आवश्यकताओं में मिलावट, जैसे राशन, दूध, दवा, खाद-बीज आदि में व्यापक शोषण देखने को मिलता है।आदिवासी समुदाय, जो बिरसा मुंडा की विरासत को आगे बढ़ाते हैं, सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। उनके संसाधनों का दोहन, बाजार में ठगी और जानकारी का अभाव उनके आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी शोषण को गहरा करता है।
अब यह प्रश्न उठ सकता है कि बिरसा मुंडा के विचारों को ग्राहक पंचायत कैसे आगे बढ़ा सकती है? इसके लिए न्यायसंगत बाजार व्यवस्था की स्थापना करनी होगी क्योंकि बिरसा मुंडा समानता के पक्षधर थे। ग्राहक पंचायत भी मुनाफाखोरी और भेदभावपूर्ण मूल्य निर्धारण के खिलाफ कार्य कर रही है। हर वर्ग को गुणवत्तायुक्त, सही दाम पर वस्तुएं मिलें, यही उसका लक्ष्य है।
स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देना भी आवश्यक है । बिरसा ने स्वदेशी जीवनशैली और प्रकृति के अनुरूप जीवन को महत्व दिया। ग्राहक पंचायत स्थानीय उत्पादों, पारंपरिक ज्ञान और ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देकर आत्मनिर्भरता की दिशा में कार्य कर सकती है। शिक्षा और जागरूकता अभियान जारी रखना होगा।बिरसा ने समाज को जगाया था। ग्राहक पंचायत भी झारखंड में उपभोक्ता शिक्षा को मिशन के रूप में ले रही हैं, विद्यालयों, पंचायतों, बाजारों और आदिवासी क्षेत्रों में जन-जागरूकता फैलाकर।
शोषण के विरुद्ध संगठनात्मक शक्ति को एकजुट होना होगा। बिरसा मुंडा ने जनसंगठन खड़ा किया था। ग्राहक पंचायत भी ग्राहकों का ऐसा संगठित मंच है जो प्रशासन, उत्पादक और व्यापारियों के समक्ष उपभोक्ताओं के अधिकारों की आवाज बुलंद करता है। नव झारखंड की ओर अग्रसर होना है तो बिरसा मुंडा की प्रेरणा से ग्राहक पंचायत की दिशा को अंगीकार करना ही होगा। आज झारखंड को एक ऐसे जन आंदोलन की आवश्यकता है जो शोषण के आधुनिक रूपों उपभोक्ता ठगी, डिजिटल धोखाधड़ी, अनियंत्रित मूल्य वृद्धि, मिलावट और कॉपोर्रेट वर्चस्व के विरुद्ध संगठित हो।
अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत इस भूमिका को निभाने में सक्षम है, क्योंकि वह न केवल एक संस्था है बल्कि जनजागरण पर आधारित सामाजिक आंदोलन है । यह एक ऐसा उलगुलान है, जो ग्राहकों को राजा बना सकता है, और बाजार को सेवा का माध्यम! (लेखक अखिल भरतीय ग्राहक पंचायत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र (बिहार, झारखंड) के संगठन मंत्री हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अन्तत: भारत ने सैन्य क्षेत्र में थियेटर कमान की स्थापना और थियेटर कमांडर की नियुक्ति करने का महत्वपूर्ण निर्णय ले लिया। आॅपरेशन सिंदूर के सफल क्रियान्वयन के बाद रक्षा बजट में वृद्धि के प्रस्ताव और पांचवीं पीढ़ी के आक्रामक गहराई से भेदने वाले अत्याधुनिक लड़ाकू विमान एडवांस्ड मीडियम कॉम्बेट एयरक्राफ्ट परियोजना को मंजूरी देने के साथ यह एक सामयिक सामरिक निर्णय है।
बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य और भारत की सीमाओं के पास पसरे शत्रुओं के अतीत और इरादों को देखते हुए यह कदम पहले ही उठाने की जरूरत थी। सरकार ने डेढ़ वर्ष से लंबित थियेटर कमान के गठन की जमीनी तैयारियों का क्रियान्वयन शुरू कर दिया है। केंद्र ने अंतर सेवा संगठन अधिनियम (कमांड, नियंत्रण और अनुशासन) यानी (इंटर सर्विसेज आॅगेर्नाइजेशन (कमांड, कंट्रोल एंड डिसिप्लिन एक्ट 2023)) बुधवार को राजपत्र में अधिसूचित कर दिया। यह थियेटर कमान के गठन का प्रथम चरण है।
जाहिर है, आपरेशन सिंदूर की सफलता के बाद केंद्र सरकार ने अपनी रक्षा तैयारियों को और मजबूती प्रदान करनी शुरू कर दी है। हालांकि रक्षा मंत्रालय ने सेनाओं की दक्षता बढ़ाने के लिए थियेटर कमान के गठन का निर्णय पहले कर लिया था। इसके तहत भारतीय सशस्त्र सेनाओं की तीनों सेवाओं की ऐसी कमानें गठित होंगी, जिसमें थल, नभ, जल सेना सहित अर्धसैनिक बलों को भी शामिल किया जा सकता है।
यह लंबे समय से प्रतीक्षित सामरिक महत्व का सुधार है जो भविष्य के युद्धों को लड़ने के लिए सैन्य संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग करने के लिए है। संसद से 2023 को पारित इस अधिनियम को इसी 27 मई को सरकार ने भारत के राजपत्र में अधिसूचित कर दिया है। इस महत्वपूर्ण कदम का उद्देश्य एक निश्चित भौगोलिक इकाई में सेना के तीनों अंगों के एक समूह को प्रभावी कमांड, सटीक नियंत्रण और कुशल कामकाज को बढ़ावा देना है, जिससे सशस्त्र बलों के बीच तालमेल बेहतर होगा। यह अधिनियम आईएसओ के कमांडर-इन-चीफ और आफिसर-इन-कमांड को मजबूत और प्रभावी बनायेगा।
दरअसल थियेटर कमान का अर्थ है एक क्षेत्रीय इकाई में सेना, नौसेना और वायु सेना के समन्वित संचालन के लिए एक ही कमांडर के अधीन एकीकृत करना। यह एक ऐसी सैन्य संरचना है, जो विभिन्न सैन्य शाखाओं के बीच समन्वय और दक्षता को बढ़ायेगी। सैन्य क्षेत्र में थिएटर कमान में थियेटर का मतलब एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से है, जहां सैन्य अभियान या आपरेशन किये जाते हैं।
यह एक ऐसा क्षेत्र होता है जहां युद्ध, सैन्य रणनीति, या सुरक्षा से संबंधित गतिविधियां केंद्रित होती हैं। थियेटर शब्द का उपयोग सैन्य संदर्भ में इसलिए किया जाता है क्योंकि यह एक युद्ध क्षेत्र या आपरेशनल क्षेत्र को दशार्ता है, जैसे कि एक नाटक के मंच की तरह, जहां सभी नाटक के सभी भागों, आयामों, पहलुओं की गतिविधियां एक निर्देशक के निर्देश में समन्वित एवं सुचारु रूप से संपन्न होती हैं। थियेटर कमांड की स्थापना एकीकृत बल प्रयोग, परिचालन दक्षता और संसाधनों के अधिकतम उपयोग के लिए रक्षा मंत्रालय का 2025 के लिए चुने गए नौ क्षेत्रों में से एक है, जिसे मंत्रालय ने सुधारों का वर्ष घोषित किया है।
राजपत्र में अधिसूचित संदर्भ के अनुसार, यह अधिनियम थियेटर कमांड की स्थापना के लिए कानूनी आधार प्रदान करता है। इस अधिनियम से तीन भौगोलिक कमान (उत्तरी, पश्चिमी, समुद्री) प्रस्तावित किए गए हैं। लखनऊ में चीन-केंद्रित उत्तरी थियेटर कमान, जयपुर में पाकिस्तान-केंद्रित पश्चिमी थियेटर कमान और तिरुवनंतपुरम में हिन्द महासागर या तटीय थियेटर कमान स्थापित करने का प्रस्ताव है, जो एक सीमा, एक बल की अवधारणा के अनुरूप होगा।
प्रत्येक थियेटर कमान में सेना, नौसेना, और वायुसेना की इकाइयां एकीकृत रूप से काम करती हैं, ताकि उस क्षेत्र में सैन्य रणनीति को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके। कमान का सर्वोच्च अधिकारी थियेटर कमांडर होता है जो एक सैन्य अधिकारी होता है, जो एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र (थियेटर आफ आपरेशन) में सैन्य अभियानों का नेतृत्व करता है। और उस क्षेत्र में सभी सैन्य बलों (सेना, नौसेना, वायुसेना) के संचालन को समन्वयित करता है। यह एक परिचालन कमांडर की (आपरेशनल) भूमिका है, जो युद्ध या संकट के दौरान रणनीति और कमान को लागू करती है।
इन कमानों के लिए चुने गये थियेटर कमांडर सामान्य रूप से थलसेना से लेफ्टिनेंट जनरल, नौसेना से वाइस एडमिरल या वायुसेना से एयर मार्शल स्तर का अधिकारी हो सकता है, जिसे कमांड की जिम्मेदारी दी जायेगी। यह एक एग्जीक्यूटिव पद है, जो विशिष्ट थियेटर के लिए ही गठित होगी, स्थायी नहीं। पहले के सशस्त्र बलों के कानूनी ढांचे में त्रि-सेवा मामलों में निश्चित विधिक सीमाएं निर्धारित थीं, क्योंकि एक सेवा के अधिकारी को दूसरी सेवा के कर्मियों पर अनुशासनात्मक और प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग करने का अधिकार नहीं था।
उदाहरण के लिए, एक संयुक्त कमांड का नेतृत्व करने वाला तीन-सितारा जनरल अपने अधीन सेवा करने वाले वायुसेना या नौसेना कर्मियों न कोई निर्देश दे सकता था न ही उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकता था। ऐसी शक्तियों की कमी का कमांड, नियंत्रण और अनुशासन पर सीधा प्रभाव पड़ता था। थियेटर कमानों की स्थापना से अब स्थिति बदल जायेगी। थियेटराइजेशन अभियान का नेतृत्व रक्षा स्टाफ के प्रमुख (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान कर रहे हैं।
दुनिया के कई देशों की रक्षा सेवाओं में थियेटर कमांडर का पद या इसके समकक्ष संरचना मौजूद है, खासकर उन देशों में जिनके पास बड़े और संगठित सैन्य बल हैं, वे एकीकृत सैन्य अभियानों के लिए थियेटर कमांड सिस्टम का उपयोग करते हैं। चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी में 2016 से पांच थियेटर कमांड हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में थियेटर कमांडर की भूमिका को जियोग्राफिक कम्बैटेंट कमांडर कहा जाता है। रूस में थियेटर कमांडर की अवधारणा सैन्य जिलों (मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट) के रूप में है। जापान की सेल्फ-डिफेंस फोर्सेस में क्षेत्रीय कमांड हैं, लेकिन ये थियेटर कमांडर की तुलना में कम एकीकृत हैं।
आस्ट्रेलियाई रक्षा बलों में आपरेशनल कमांड होते हैं, लेकिन थियेटर कमांडर का पद नहीं है। पाकिस्तान की सेना में क्षेत्रीय कोर कमांडर होते हैं, जो कुछ हद तक थियेटर कमांडर की भूमिका निभाते हैं। उत्तर कोरिया, वियतनाम और अन्य कुछ देशों में क्षेत्रीय सैन्य कमांड हैं, लेकिन इन्हें स्पष्ट रूप से थियेटर कमांडर नहीं मान सकते। वैसे विश्व के सामरिक जगत में क्षेत्रीय थियेटर कमांड की अवधारणा को पहली बार प्रथम विश्व युद्ध के अंतिम दिनों में एमिएंस की लड़ाई में लागू किया गया था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लगभग सभी भाग लेने वाले देशों ने एकीकृत कमांड के सिद्धांतों को अपनाया।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि संयुक्त सेवाओं की एकीकृत संरचनाएं (थियेटर कमान) नयी युद्ध क्षमताओं को बनाने और समन्वय करने में मदद करेंगी। साथ ही भविष्य की प्रौद्योगिकी और रणनीति को तेजी से आत्मसात करने में सहायता करेंगी क्योकि थियेटराइजेशन की अवधारणा एकल सेवा संचालन की कमियों को कम करने और आधुनिक युद्ध का समर्थन करने का प्रयास करती है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
टीम एबीएन, रांची। यह हम सब जानते हैं कि जब तक हवाई जहाज में पेटी बांधने का संकेत आन रहता है तब तक यात्रियों को सीट की बेल्ट (पेटी) खोलनी नहीं हैं और अपने स्थान से उठना भी नहीं है। ऐसा यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा के लिए होता है। हवाई जहाज के उड़ने या उतरने तथा मौसम खराब होने के समय पेटी बांधे रहने का संकेत आन रहता है क्योंकि उस समय हवाई जहाज बहुत हिलता है और अगर यात्री ने सीट की पेटी नहीं बांधी है तो उसे चोट लगने की संभावना होती है। अभी हाल में मैं भुबनेश्वर से हवाई जहाज से रांची आ रहा था।
जहाज के उड़ते समय जहाज के कप्तान ने नियमानुसार सीट की पेटी बांधने का संकेत आन कर दिया। अभी जहाज भुवनेश्वर से उड़ा ही था व पेटी बांधे रहने का संकेत आन ही था कि एक यात्री ने अपनी सीट की पेटी खोल दी और सीट से उठने लगा। तुरंत एयर होस्टेस ने माइक पर घोषणा की कि अपने स्थान पर अभी बैठे रहें और सीट बेल्ट भी बांध लें। पर वह यात्री नहीं माना। विमान में यह घोषणा बार-बार की गयी पर वह यात्री नहीं माना।
शायद वो अपनी सीट बदलना चाह रहा था। आखिरकार एयर होस्टेस को अपनी सीट से उठकर उसके पास जाकर उसे तेज शब्दों में समझाना पड़ा कि अभी आप ऐसा नहीं कर सकते हैं; सिर्फ़ कुछ मिनट और प्रतीक्षा कर लें। पर वह यात्री तुरंत फिर भी नहीं माना और बहुत देर तक एयर होस्टेस से बहस करता रहा। और इसी घटना से मुझे आज के इस लेख का विषय मिल गया कि हम भारतीय नियमों को पालन करने में इतनी कोताही क्यों करते हैं? क्यों हम किसी भी नियम को जल्दी स्वीकार नहीं करते हैं? क्यों नियम को तोड़ना हम अपनी शान समझते हैं?
आप उपरोक्त घटना को ही लें। एयर होस्टेस उस यात्री को नियम पालन करने को ही तो कह रही थी, जो कि यात्री की शारीरिक सुरक्षा के लिए ही था। पर इसके बावजूद वह यात्री एक साधारण से नियम को पालन करने में परेशानी महसूस कर रहा था। हम लोग सड़कों, कार्यालयों, सार्वजनिक स्थलों, स्कूल-कॉलेज आदि के नियम को पालन करने में हमेशा असहजता महसूस करते हैं और पहला अवसर मिलते ही नियम को तोड़ते हैं या तोड़ने की चेष्टा करते हैं।
अभी रांची में तीन फ्लाइओवर एक साथ बनने के कारण सड़क जाम की समस्या हो रही थी। और यह सड़क जाम की समस्या लोगों के अनुशासन हीनता के कारण ही आ रही थी । लोग सड़क पर जरा सा जाम पाते ही अपने बाएं तरफ से सड़क पर चलने के नियम को तोड़कर दायें तरफ वाली सड़क में घुस जाते थे जिस तरफ से ट्रैफिक को आना है। इसके कारण दोनों तरफ की सड़क जाम हो जाती व लोग घंटों जाम में फंसे रहते।
पुलिस वाले बाद में बल प्रयोग कर जाम हटाते। मैंने पाया कि लोग अगर नियम पालन कर अपने बायीं तरफ सड़क पर ही जाम हटने की प्रतीक्षा करते रहते तो कुछ मिनट में निकल जाते। पर उनको नियम तोड़ना ज्यादा सही लगता, भले उसके लिए वे घंटों सड़क पर फंसे रहें। आज हमारे समाज के पीछे रह जाने का कारण ही नियम की अवहेलना करना है। जिसे जहां अवसर मिलता है वहीं वो नियम की अवहेलना करना चाहता है।
इस नियम तोड़ने या नियम को पालन ना करने की प्रवति ने हमारे देश को इतने वर्षों तक विकास नहीं करने दिया । बल्कि कई विदेशी कंपनियों हमारे देश में इसी अनुशासनहीनता के कारण आना ही नहीं चाहती थीं। आज जब देश विकास के रास्ते पर अग्रसर हैं और एक विकसित राष्ट्र होने जा रहे हैं, हमें इस नियम पालन न करने की आदत से बचना ही होगा। (लेखक सीएमए कर सह वित्त सलाहकर हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जैसा कि घटना से संबंधित तथ्यों में बताया गया कि हत्या में शामिल युवक धनौरी गांव के ही थे और कुछ दिन पहले किशोरों को धमकाने उनके घर आये थे। मारे गये किशोरों पर हत्या आरोपियों ने आरोप लगाया था कि वे उनकी बहनों से छेड़खानी करते थे। निश्चय ही ऐसे छेड़खानी के कथित आरोप को नैतिक दृष्टि से अनुचित ही कहा जायेगा, लेकिन उसका बदला हत्या कदापि नहीं हो सकती। यह दुखद है कि एक मृतक किशोर अरमान पांच बहनों का अकेला भाई था। घटना से उपजी त्रासदी से अरमान के परिवार पर हुए वज्रपात को सहज महसूस किया जा सकता है। उनके लिये जीवनभर न भुलाया जा सकने वाला दुख एवं संत्रास पैदा हुआ है।
बड़ा सवाल है कि जिन वजहों से बच्चों के भीतर आक्रामकता एवं हिंसा पैदा हो रही है, उससे निपटने के लिए क्या किया जा रहा है? पाठ्यक्रमों का स्वरूप, पढ़ाई-लिखाई के तौर-तरीके, बच्चों के साथ घर से लेकर स्कूलों में हो रहा व्यवहार, उनकी रोजमर्रा की गतिविधियों का दायरा, संगति, सोशल मीडिया या टीवी से लेकर सिनेमा तक उसकी सोच-समझ को प्रभावित करने वाले अन्य कारकों से तैयार होने वाली उनकी मन:स्थितियों के बारे में सरकार, समाजकर्मी एवं अभिभावक क्या समाधान खोज रहे हैं। बच्चों के व्यवहार और उनके भीतर घर करती प्रवृत्तियों पर मनोवैज्ञानिक पहलू से विचार किए बिना समस्या को कैसे दूर किया जा सकेगा?
बहरहाल, इस हृदयविदारक एवं त्रासद घटना ने नयी बन रही समाज एवं परिवार व्यवस्था पर अनेक सवाल खड़े किये हैं। सवाल नये बन रहे समाज की नैतिकता एवं चरित्र से भी जुड़े हैं। निश्चित ही किसी परिवार की उम्मीदों का यूं कत्ल होना मर्मांतक एवं खौफनाक ही है। लेकिन सवाल ये है कि चौदह-पंद्रह साल के किशोरों पर यूं किन्हीं लड़कियों को छेड़ने के आरोप क्यों लग रहे हैं? पढ़ने-लिखने की उम्र में ये सोच कहां से आ रही है? क्यों हमारे अभिभावक बच्चों को ऐसे संस्कार नहीं दे पा रहे हैं ताकि वे किसी की बेटी व बहन को यूं परेशान न करें? क्यों लड़कियों से छेड़छाड़ की अश्लील एवं कामूक घटनाएं बढ़ रही है। क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था में नैतिक शिक्षा का वह पक्ष उपेक्षित हो चला है, जो उन्हें ऐसा करने से रोकता है?
क्या शिक्षक छात्रों को सदाचारी व नैतिक मूल्यों का जीवन जीने की प्रेरणा देने में विफल हो रहे हैं? हत्या की घटना हत्यारों की मानसिकता पर भी सवाल उठाती है कि उन्होंने क्यों सोच लिया कि छेड़खानी का बदला हिंसा एवं क्रूरता से गला काटना हो सकता है? धनौरी की घटना के पूरे मामले की पुलिस अपने तरीके से जांच करेगी, लेकिन किशोर अवस्था में ऐसी घटना को अंजाम देने के पीछे बच्चे की मानसिकता का पता लगाना भी ज्यादा जरूरी है। दरअसल, दशकों तक बॉलीवुड की हिंदी फिल्मों ने समाज एवं विशेषत: किशोर पीढ़ी में जिस अपसंस्कृति का प्रसार किया, आज हमारा समाज उसकी त्रासदी झेल रहा है। इसमें दो राय नहीं कि किशोरवय में राह भटकने का खतरा ज्यादा रहता है।
अब तक हिन्दी सिनेमा से समाज के किशोरवय और युवाओं में गलत संदेश गया कि निजी जीवन में छेड़खानी ही प्रेम कहानी में तब्दील हो सकती है। हमारे टीवी धारावाहिकों की संवेदनहीनता ने गुमराह किया है। बॉक्स आफिस की सफलता और टीआरपी के खेल ने मनोरंजक कार्यक्रमों में ऐसी नकारात्मकता एवं हिंसक प्रवृत्ति भर दी कि किशोरों में हिंसक एवं अराजक सोच पैदा हुई। इंटरनेट के विस्तार और सोशल मीडिया के प्रसार से स्वच्छंद यौन व्यवहार का ऐसा अराजक एवं अनियंत्रित रूप सामने आया कि जिसने किशोरों व युवकों को पथभ्रष्ट एवं दिग्भ्रमित करना शुरू कर दिया।
आज संकट ये है कि हर किशोर के हाथ में आया मोबाइल उसे समय से पहले वयस्क बना रहा है। जिस पर न परिवार का नियंत्रण है और न ही शिक्षकों का। मन जो चाहे वही करो की मानसिकता वहां पनपती है जहां इंसानी रिश्तों के मूल्य समाप्त हो चुके होते हैं, जहां व्यक्तिवादी व्यवस्था में बच्चे बड़े होते-होते स्वछंद हो जाते हैं। अर्थप्रधान दुनिया में माता-पिता के पास बच्चों के साथ बिताने के लिए समय ही नहीं बच पा रहा। आज किशोरों एवं युवाओं को प्रभावित करने वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म व नये-नये एप पश्चिमी अपसंस्कृति से संचालित हैं। इन पर अश्लीलता और यौन-विकृतियों वाले कार्यक्रमों का बोलबाला है। ऐसे कार्यक्रमों की बाढ़ हैं जिनमें हमारे पारिवारिक व सामाजिक रिश्तों में स्वच्छंद यौन व्यवहार को हकीकत बनाने का खेल चल रहा है।
पारिवारिक एवं सामाजिक उदासीनता एवं संवादहीनता से ऐसे बच्चों के पास सही जीने का शिष्ट एवं अहिंसक सलीका नहीं होता। वक्त की पहचान नहीं होती। ऐसे बच्चों में मान-मर्यादा, शिष्टाचार, संबंधों की आत्मीयता, शांतिपूर्ण सहजीवन आदि का कोई खास ख्याल नहीं रहता। भौतिक सुख-सुविधाएं एवं यौनाचार ही जीवन का अंतिम लक्ष्य बन जाता है। भारतीय बच्चों में इस तरह का एकाकीपन उनमें गहरी हताशा, तीव्र आक्रोश और विषैले प्रतिशोध का भाव भर रहा है। वे मानसिक तौर पर बीमार बन रहे हैं, वे आत्मघाती-हिंसक बन रहे हैं और अपने पास उपलब्ध खतरनाक एवं घातक हथियारों का इस्तेमाल कर हत्याकांड कर बैठते हैं।
आस्ट्रिया के क्लागेनफर्ट विश्वविद्यालय की ओर से किशोरों पर किये गये अध्ययन में पता चला है कि दुनिया भर में 35.8 प्रतिशत से ज्यादा किशोर मानसिक तनाव, अनिद्रा, अकारण भय, पारिवारिक अथवा सामाजिक हिंसा, चिड़चिड़ापन अथवा अन्य कारणों से जूझ रहे हैं। एकाकीपन बढ़ने से वे ज्यादा आक्रामक और विध्वंसक सोच की तरफ बढ़ने लगे हैं। मोबाइल व कथित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बह रहे नीले जहर से किशोर अराजक यौन व्यवहार एवं हिंसक प्रवृत्तियों की तरफ उन्मुख हुए हैं। किशोरों को समझाने वाला कोई नहीं है कि यह रास्ता आत्मघात का है। आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड व ब्रिटेन जैसे देश किशोरों को मोबाइल से दूर रखने हेतु कानून बना रहे हैं।
हमारे देश में भी शीर्ष अदालत ने समय-समय पर ऐसी घटनाओं पर तल्ख टिप्पणियां की हैं। क्या इन दर्दनाक घटनाओं से हमारे अभिभावकों, समाज-निमार्ताओं एवं हमारे सत्ताधीशों की आंख खुलेगी? बच्चों से जुड़ी हिंसा की इन वीभत्स एवं त्रासद घटनाओं से जिंदगी सहम गयी है। हमें मानवीय मूल्यों के लिहाज से भी विकास एवं नयी समाज-व्यवस्था की परख करनी होगी। बच्चों के भीतर हिंसा मनोरंजन की जगह ले रही है। इसी का नतीजा है कि छोटे-छोटे स्कूली बच्चे भी अपने किसी सहपाठी की हत्या तक कर रहे हैं। बच्चों के व्यवहार और उनके भीतर घर करती प्रवृत्तियों पर मनोवैज्ञानिक पहलू से विचार किये बिना समस्या को कैसे दूर किया जा सकेगा?
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जब हम अपने देश की संस्कृति की बात करते हैं, तो उसमें रंग, राग और ताल की झलक साफ दिखाई देती है। हमारी परंपराएं केवल किताबों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्होंने नृत्य के माध्यम से जीवन को छुआ है। भारतीय शास्त्रीय नृत्य केवल मंच की कला नहीं, बल्कि आत्मा की भाषा है। यह शरीर से ज्यादा मन और आत्मा का संवाद है। इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं और इसकी शाखाएं सात समंदर पार तक फैली हैं।
भारतीय शास्त्रीय नृत्य का आरंभ वैदिक युग को ही माना जाता है। नाट्य शास्त्र के रचयिता भरतमुनि ने इसका पहला व्यवस्थित स्वरूप दिया। वेद, पुराण और उपनिषदों में नृत्य को ईश्वर की आराधना का साधन बताया गया है। नटराज के रूप में भगवान शिव स्वयं नृत्य के देवता माने जाते हैं। शास्त्रीय नृत्य धीरे-धीरे देवालयों से राजदरबारों और फिर रंगमंच तक पहुंचा। यह कला हर युग में समाज का दर्पण रही है।
कभी भक्ति की भावनाओं को प्रकट करती है, तो कभी शौर्य और करुणा को। भरतनाट्यम को लोकप्रिय बनाने में ऋषि वल्लथोल नारायण मेनन, यामिनी कृष्णमूर्ति और रुक्मिणी देवी अरुंडेल का बड़ा योगदान रहा। कथक को कथाओं के माध्यम से प्रस्तुत करने वालीं सितारा देवी आज भी प्रेरणा हैं। ओडिसी नृत्य की पहचान बनीं संजुक्ता पाणिग्रही हों या कुचिपुड़ी को मंच तक लाने वाले राजा और राधा रेड्डी- इन सबने शास्त्रीय नृत्य को विश्वभर में पहचान दिलाई।
फिल्म अभिनेत्री और सांसद हेमा मालिनी जैसी कलाकार आज भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। नृत्य एक कला है, साधना है, व्यायाम है। तभी तो हमारे पूर्वजों ने बताया कि शास्त्रीय नृत्य केवल एक कला नहीं, बल्कि पूर्ण व्यायाम है। इसकी हर मुद्रा, हर हाव-भाव शरीर को लचीला बनाता है, संतुलन देता है और आत्मविश्वास भी बढ़ाता है। मानसिक रूप से यह ध्यान की तरह काम करता है। नृत्य करते समय कलाकार पूरी तरह वर्तमान में होता है, जिससे चिंता और तनाव से राहत मिलती है। बच्चों से लेकर बड़ों तक, सबके लिए यह एक बेहतरीन साधना है।
आज शास्त्रीय नृत्य की गूंज केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका, फ्रांस, जापान, रूस, इंग्लैंड और आस्ट्रेलिया जैसे देशों में इसके विद्यालय और मंच हैं। कई विदेशी कलाकार भी इसे सीख रहे हैं और मंचों पर प्रस्तुत कर रहे हैं। यह नृत्य विश्व को भारतीय संस्कृति से जोड़ने का माध्यम बन गया है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि शास्त्रीय नृत्य में अनुशासन, परिश्रम और समर्पण जैसे गुण स्वत: आते हैं।
यह केवल कलाकार का नहीं, बल्कि समाज का भी निर्माण करता है। इससे सांस्कृतिक चेतना बढ़ती है, हमारी जड़ों से जुड़ाव होता है और यह आने वाली पीढ़ियों को एक मूल्य आधारित जीवन का मार्ग दिखाता है। एक कलाकार जब मंच पर अपने भावों से कोई कथा सुनाता है तो वह केवल कला नहीं करता वह समाज को सच्चाई, प्रेम और सौंदर्य का अनुभव कराता है। भारतीय शास्त्रीय नृत्य केवल अतीत की बात नहीं है। यह आज भी जीवित है, गतिमान है और हमारे जीवन को संवेदनशीलता से जोड़ता है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देने के लिए जहां दुनिया के देशों में टुकड़ों-टुकड़ों में काम हो रहा है, वहीं आंध्र प्रदेश की नई राजधानी अमरावती को पूरी तरह से ग्रीन एनर्जी से संचालित शहर बनाने की दिशा में मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू ने काम भी शुरू कर दिया है। अमरावती को पूरी तरह से ग्रीन एनर्जी से संचालित शहर बनाने में करीब करीब 65 हजार करोड़ रुपये की लागत आएगी और सोलर, पवन और जल विद्युत पर आधारित इस परियोजना में अमरावती में उपयोग आने वाली सारी बिजली रिन्यूवल एनर्जी स्रोत से ही प्राप्त होगी।
सर्वाधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाली जीवाश्म ऊर्जा का अमरावती में नामोनिशान नहीं होगा। अपने आप में यह दुनिया के लिए ग्रीन एनर्जी के सपने को अमली जामा पहनाने की बड़ी, महत्वाकांक्षी और दुनिया के देशों के लिए प्रेरणीय पहल मानी जानी चाहिए। कोई इसे इतिहास रचने की बात करता है तो कोई ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में बड़ी और रचनात्मक पहल के रूप में देख रहा है।
कहा जाए तो दुनिया के देश जिस तरह से ग्रीन एनर्जी के लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ रहे हैं और जिस तरह से बड़े बड़े शिखर सम्मेलनों के साझा घोषणा पत्रों में घोषणाएं हो रही हैं उससे अलग हटकर आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री नायड़ू की इस पहल को माना जाना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं इस परियोजना पर नजर रख रहे हैं। कृष्णा नदी के तट पर आंध्र प्रदेश की नयी राजधानी में ग्रीन एनर्जी का यह प्रोजेक्ट 217 वर्गमीटर को समेटे है।
अमरावती को पूरी तरह ग्रीन एनर्जी युक्त दुनिया का पहला शहर बनाने के लिए 2050 तक की मांग का आकलन कर लिया गया है करीब 2700 मेगावाट विद्युत की आवश्यकता होगी। इसमें से 30 प्रतिशत सोलर और पवन आधारित उर्जा होगी तो 70 प्रतिशत बिजली का उत्पादन पनबिजली आधारित होगी। ग्रीन एनर्जी के चार प्रमुख स्रोत हैं। इसमें सूर्य की गर्मी आधारित सोलर ऊर्जा, हवा के झोकों पर आधारित पवन ऊर्जा, जल आधारित पन बिजली परियोजना और भूगर्भ के ताप आधारित भूतापीय ऊर्जा को रिन्यूवल एनर्जी के नाम से जाना जाता है।
इसमें प्रमुखता से सोलर, पवन और पन बिजली को लिया जाता है। दरअसल जीवाश्म आधारित उर्जा जिसमें प्रमुखत: कोयला व लिग्नाइट का प्रयोग होता है। उसके चलते जलवायु में तेजी से परिवर्तन हुआ है और आज दुनिया के देश तापमान वृद्धि को 1.5 प्रतिशत तक रखने के लिए जूझ रहे हैं। दो प्रतिशत वृद्धि दर को डेढ़ प्रतिशत लाना टेड़ी खीर बना हुआ है। पेरिस घोषणा के अनुसार दुनिया के देशों को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गयी है। जलवायु परिवर्तन परिणाम आए दिन दिखते हैं, जिसमें तापमान में बढ़ोतरी, ग्लेशियरों का सिकुड़ना, अनपेक्षित मौसम चक्र, कभी तेज गर्मी तो कभी तेज सर्दी और कभी तेज बरसात।
आंधी-तूफान, दावानल और चक्रवातों के नये-नये रूप और बार-बार आवृति हमारे सामने हैं। समुद्र का जल स्तर बढ़ने से समुद्र किनारे के शहरों के सामने अस्तित्व का संकट आ गया है तो जंगलों के दावानलों का असर आसपास के शहरों खासतौर से अमेरिकी शहरों में देखा जा चुका है। सूखा और बाढ़ की समस्या बढ़ी है। दवाओं के बेअसर होने और संक्रामक रोगों की बढ़ोतरी सामने हैं। हालांकि इसमें सरकारों की इच्छा शक्ति, संसाधन, आर्थिक सामाजिक हालात के साथ ही विकसित देशों द्वारा खुले दिल से सहयोग नहीं करना बड़ा कारण बनता जा रहा है।
ऐसा नहीं है कि जलवायु परिवर्तन के संकट से दुनिया के देश सचेत नहीं हैं। बल्कि इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों को लेकर रैंकिंग भी होन लगी है। जलवायु परिवर्तन प्रदर्शन रेकिंग में भारत 10वें स्थान पर है। रैंकिंग में डेनमार्क शीर्ष पर है। भारत में रिन्यूवल एनर्जी की दिशा में ठोस प्रयास हो रहे हैं। गुजरात के कांडला सेज को पूरी तरह से हरित औद्योगिक क्षेत्र बनाया गया है तो तमिलनाड़ु के महाबलीपुरम के शोर मंदिर को ग्रीन एनर्जी पुरातात्विक स्थल के रूप में पहचान मिल चुकी है। डेनमार्क का कोपेनहेगेन भी इसी श्रेणी में आता है।
आस्ट्रेलिया का एडिलेड, कोरिया का सियोल, आइवरकोस्ट का कोकोडी, स्वीडन का मालमो और दक्षिणी अफ्रिका का केपटाउन ग्रीन एनर्जी की दिशा में बढ़ते हुए शहरों में से हैं। गुजरात के कांडला सेज में 1000 एकड में साढ़े तीन लाख पौधे रोपित किए गए हैं। समुद्र के नमक के पानी से प्रभावित क्षेत्र को जलवायु की दृष्टि से करीब करीब बदल ही दिया गया है। अमरावती को पूरी तरह से ग्रीन सिटी बनाने की दिशा में जो कार्य आरंभ हो रहा है वह समूची दुनिया के लिए एक मिसाल है। वहां पर सरकारी भवनों के साथ ही अन्य स्थानों पर सोलर पेनल और पवन उर्जा के स्रोत लगाए जायेंगे।
भारत में केन्द्र व राज्य सरकारें अक्षय ऊर्जा के इस क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ रही हैं। राजस्थान रिन्यूवल एनर्जी उत्पादन के क्षेत्र में समूचे देश में आगे है और भड़ला पार्क जैसे सोलर पार्क यहां विकसित हो चुके हैं। सरकार अब घरों की छतों पर सोलर एनर्जी के उत्पादन को बढ़ावा दे रही है तो खेती में सोलर पंपों और अन्य कार्यों में उपयोग सकारात्मक प्रयास माने जा सकते हैं। पर अमरावती इन सबसे अलग इसलिए हो जाती है कि यहां समग्रता से प्रयास करते हुए समूचे शहर को ग्रीन एनर्जी युक्त बनाया जा रहा है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। डिजिटल युग ने जहां हमारी दुनिया को एक-दूसरे के बेहद करीब ला दिया है, वहीं इसके प्रभाव ने बच्चों के जीवन और पारिवारिक रिश्तों में गहरे बदलाव भी ला दिये हैं। आज के बच्चे आँगन की मिट्टी छोड़कर स्मार्टफोन, टैबलेट और गेमिंग की आभासी दुनिया में खोते जा रहे हैं। उनका बचपन अब स्क्रीन की चकाचौंध में डूबा है, जिससे न केवल पारिवारिक रिश्ते कमजोर हो रहे हैं, बल्कि उनकी मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक सेहत पर भी नकारात्मक असर पड़ रहा है। कुछ दशक पहले का बचपन आज से बिलकुल अलग था।
आंगन में कंचे खेलना, मिट्टी में खेलना, दौड़-भाग और गली-मोहल्ले में दोस्तों के साथ मस्ती करना, हर बच्चे की जिंदगी का अनिवार्य हिस्सा था। बच्चे पसीने से तरबतर होकर घर आते थे। माँ की ममता भरी थपकी और दादी की कहानियां उनके दिन की खुशी का आधार हुआ करती थीं। उस वक्त डिजिटल उपकरणों का नामोनिशान भी नहीं था। आज का बचपन बदले हुए दौर की पहचान है।
बच्चे मोबाइल फोन, टैबलेट और वीडियो गेम्स की दुनिया में उलझे रहते हैं। वे घंटों एक छोटी सी स्क्रीन के सामने बैठकर आभासी पात्रों के साथ लड़ते-झगड़ते हैं, लेकिन असली दुनिया से उनकी दूरी बढ़ती जा रही है। वे पारिवारिक संवाद और वास्तविक सामाजिक मेलजोल से दूर हो रहे हैं। मनोवैज्ञानिक और शोधकर्ता इस बात पर सहमत हैं कि बच्चों में स्क्रीन टाइम का अत्यधिक उपयोग उनके मानसिक और शारीरिक विकास के लिए नुकसानदायक है।
राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य सर्वेक्षण-2023 के अनुसार, 12-18 वर्ष के लगभग 75% बच्चे दिन में चार से छह घंटे तक मोबाइल या टैबलेट का उपयोग करते हैं, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक इस उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम दो घंटे से अधिक नहीं होना चाहिए। अधिक देर तक स्क्रीन देखने से बच्चों की नींद प्रभावित होती है, ध्यान केंद्रित करने की क्षमता घटती है और मानसिक तनाव बढ़ता है।
इससे अवसाद, चिड़चिड़ापन और अकेलेपन जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। साथ ही शारीरिक रूप से भी वे सक्रिय नहीं रहते, जिससे मोटापा, दृष्टि की कमजोरी और अन्य स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें बढ़ रही हैं।परिवार के सदस्य भी एक-दूसरे के साथ समय बिताने की बजाय अपने-अपने मोबाइल या डिजिटल उपकरणों में खोये रहते हैं। भोजन करते समय भी अधिकतर लोग फोन पर व्यस्त रहते हैं। बच्चों के साथ संवाद की कमी उनके और माता-पिता के बीच भावनात्मक दूरी बढ़ा रही है। बच्चे अपने मन की बात कहने में संकोच करते हैं, जिससे उनका मनोबल कमजोर होता है।
परिवार में संवाद की कमी से बच्चों की समझ और सहानुभूति विकसित नहीं हो पाती। वे अपनी भावनाओं को सही ढंग से अभिव्यक्त नहीं कर पाते, जो रिश्तों में दरार का कारण बनता है। इसका असर उनकी सामाजिक व्यवहार, दोस्ती और रिश्तों की गुणवत्ता पर भी पड़ता है। स्क्रीन के सामने बिताया गया अधिक समय बच्चों के सामाजिक कौशल को प्रभावित करता है। वे वास्तविक जीवन के संपर्क में कम आते हैं, जिससे उनकी संवाद क्षमता, सहनशीलता और टीम भावना कमजोर होती है। बच्चे जो जीवन के अनुभवों और अलग-अलग लोगों से मिलने-जुलने से सीखते हैं, वे अनुभव डिजिटल माध्यम से पूरी तरह से नहीं हो सकते।
भावनात्मक विकास के लिए भी पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक मेलजोल की जरूरत होती है। बच्चे अपनी खुशियों, दुखों और परेशानियों को परिवार या करीबी दोस्तों के साथ बांटकर मानसिक रूप से स्वस्थ रहते हैं। परंतु डिजिटल युग में इस आदत का टूटना, बच्चों को अकेला और असहाय महसूस कराता है।आज के बच्चे अपनी दोस्ती को फॉलोअर्स, लाइक्स और कमेंट्स तक सीमित कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर जो मित्रता होती है, वह अक्सर सतही और अस्थायी होती है।
आभासी मित्रों से मिलने वाली स्वीकार्यता अस्थायी संतुष्टि देती है, लेकिन असली जीवन के कठिन समय में वे समर्थन नहीं दे पाते। गेमिंग की दुनिया में बच्चे जीतने के लिए कई बार आपस में लड़ते हैं, झूठ बोलते हैं या अनैतिक रास्ते अपनाते हैं। यह उनकी नैतिकता और व्यवहार को प्रभावित करता है। खेलों की इस प्रतिस्पर्धा में बच्चों का आपसी प्रेम और सम्मान कम होता जा रहा है।बच्चों के इस डिजिटल मोह को समझना और नियंत्रित करना आज माता-पिता और शिक्षकों की जिम्मेदारी है।
माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों के साथ समय बिताएं, उनकी रुचियों को समझें और उन्हें रचनात्मक गतिविधियों की ओर प्रेरित करें। उन्हें चाहिए कि वे बच्चों के मोबाइल और इंटरनेट के उपयोग पर नजर रखें और उचित समय सीमा तय करें। स्कूलों में भी डिजिटल लत के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए कार्यक्रम होने चाहिए, जहां बच्चों को डिजिटल संतुलन का महत्व समझाया जाए। बच्चों को प्राकृतिक खेलों, कला, संगीत और सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए ताकि उनका मानसिक विकास स्वस्थ हो।
सांस्कृतिक और सामाजिक बदलाव की जरूरतयह समस्या केवल व्यक्तिगत स्तर की नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की भी मांग करती है। हमें समाज के रूप में यह स्वीकार करना होगा कि आभासी दुनिया कभी भी वास्तविक जीवन का विकल्प नहीं हो सकती। परिवारों को चाहिए कि वे पारिवारिक मुलाकातों और वातार्लाप को प्राथमिकता दें। समाज में सामाजिक मेलजोल को बढ़ावा देने के लिए सामूहिक खेल, त्योहार, मेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इससे बच्चे और परिवार आपस में जुड़ेंगे, भावनात्मक संबंध मजबूत होंगे और बच्चों का समग्र विकास होगा।
डिजिटल की दुनिया में खोया बचपन न केवल बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर डालता है, बल्कि पारिवारिक रिश्तों को भी कमजोर करता है। बच्चों की हंसी, खेल और रिश्तों की गहराई को बचाने के लिए हमें सजग और सक्रिय होना होगा।जरूरत इस बात की है कि माता-पिता, शिक्षक और समाज मिलकर यह सुनिश्चित करें कि डिजिटल तकनीक का उपयोग संतुलित और स्वस्थ तरीके से हो।
बच्चों को वह बचपन दें जिसमें वे न केवल डिजिटल दुनिया के माहिर हों, बल्कि असली जिंदगी के रंग भी गहराई से महसूस कर सकें। आखिरकार, आंगन की मिट्टी की खुशबू, मां-बाप की ममता और भाई-बहनों का साथ, जो भावनाओं से जुड़ी होती है, उसे कोई भी डिजिटल दुनिया कभी नहीं दे सकती। बचपन की यही मिठास, यही मासूमियत और यही रिश्तों की गूंज जीवन का सच्चा संगीत है, जिसे हमें सहेज कर रखना होगा।
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