रांची। केंद्र सरकार द्वारा नई शिक्षा नीति 29 जुलाई 2020 को घोषित किया गया। वर्ष 1986 में जारी हुई नई शिक्षा नीति के बाद भारत की शिक्षा नीति में यह पहला नया परिवर्तन है। यह नीति अंतरिक्ष वैज्ञानिक के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षावाली समिति की रिपोर्ट पर आधारित है। नई शिक्षा नीति 2020 के तहत वर्ष 2030 तक सकल नामांकन अनुपात को शत प्रतिशत लाने का लक्ष्य रखा गया है। नई शिक्षा नीति के अंतर्गत शिक्षा क्षेत्र पर सकल घरेलू उत्पाद के 6 प्रतिशत हिस्से के सार्वजनिक व्यय का लक्ष्य रखा गया है। मानव संसाधन प्रबंधन मंत्रालय का नाम परिवर्तित कर शिक्षा मंत्रालय का दिया गया है। पांचवीं कक्षा तक की शिक्षा में मातृभाषा या स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा को कक्षा आठ और आगे की शिक्षा के लिये प्रथमिकता देने का सुझाव दिया गया है। देशभर के उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए भारतीय उच्च शिक्षा परिषद नामक एक एकल नियामक की परिकल्पना की गयी है। शिक्षा नीति में यह पहला परिवर्तन बहुत पहले लिया गया था। इस नई नीति में मानव संसाधन मंत्रालय का नाम पुन: शिक्षा मंत्रालय करने का फैसला लिया गया है। इसमें समस्त उच्च शिक्षा के लिए एकल निकाय के रूप में भारत उच्च शिक्षा आयोग का गठन करने का प्रावधान है। संगीत, खेल, योग आदि को सहायक पाठ्यक्रम या अतिरिक्त पाठ््यक्रम की बजाय मुख्य पाठ्यक्रम में ही जोड़ा जायेगा। एम फिल को समाप्त किया जायेगा। जब अनुसंधान में जाने के लिए तीन साल के स्नातक डिग्री के बाद एक साल स्नातकोत्तर करके पीएचडी में प्रवेश लिया जा सकता है। नीति में शिक्षकों के प्रशिक्षण पर बल दिया गया है। व्यापक सुधार के लिए प्रशिक्षण और सभी शिक्षा कार्यक्रमों को विश्वविद्यालयों या कॉलेजों के स्तर पर शामिल करने की सिफारिश की गयी है। प्राईवेट स्कूलों में मनमाने ढंग से फीस रखने और बढ़ाने को भी रोकने का प्रयास किया जायेगा। पहले समूह के अनुसार विषय चुने जाते थे किंतु अब उसमें भी बदलाव किया गया है। जो छात्र इंजीनियरिंग कर रहे हैं वह संगीत को भी अपने विषय के साथ पढ़ सकते हैं। नेशनल साइंस फाउंडेशन के तर्ज पर नेशनल रिसर्च फाउंडेशन लायी जायेगी जिससे पाठ्यक्र्रम में विज्ञान के साथ सामाजिक विज्ञान को भी शामिल किया जायेगा। नीति में पहले और दूसरे कक्षा में गणित और भाषा एवं चौथे और पांचवें कक्षा के बालकों के लेखन पर जोर देने की बात कही गयी है। स्कूलों में टेन प्लस टू फार्मेट के स्थान पर 5+3 +3 +4 फार्मेट में शामिल किया जायेगा। तीन साल के प्री-प्राइमरी के बाद कक्षा एक शुरू होगी। इसके बाद कक्षा 3-5 के तीन साल शामिल हैं। इसके बाद 3 साल का मिडिल स्टेज आयेगा यानी कक्षा छह से आठ तक की कक्षा। चौथा स्टेज कक्षा नौ से 12वीं तक का चार साल का होगा। पहले जहां 11वीं कक्षा से विषय चुनने की आजादी थी वही अब नौवीं कक्षा से रहेगी। शिक्षण के माध्यम से पहली से पांचवीं तक मातृभाषा का इस्तेमाल किया जायेगा। इसमें रटा विद्या को खत्म करने की भी कोशिश की गयी है। जिसकी मौजूदा व्यवस्था की बड़ी खामी माना जाता है। किसी कारणवश विद्यार्थी उच्च शिक्षा के बीच में ही कोर्स छोड़ कर चले जाते हैं। ऐसा करने पर उन्हें कुछ नहीं मिलता एवं उन्हें डिग्री के लिये दोबारा नई शुरूआत करनी पड़ती है। नई नीति में पहले वर्ष में कोर्स को छोड़ने पर प्रमाण पत्र, दूसरे वर्ष छोड़ने पर डिप्लोमा व अंतिम वर्ष छोड़ने पर डिग्री देन का प्रावधान है। भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्वों में कहा गया है कि वर्ष छह से 14 तक के बच्चों के लिए अनिवार्य एवं नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था की जाये। (लेखक केंद्रीय विद्यालय पलामू के प्राचार्य हैं।)
भारत में मजबूत लोकतंत्र है जिसकी दुनिया में साख है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने सौर ऊर्जा क्षेत्र में काफी उपलब्धियां हासिल की हैं। अनुमान है कि साल 2022 तक भारत 175 गीगावाट ऊर्जा हरित साधनों से पैदा करेगा और 2030 तक यह साढ़े चार सौ गीगावाट तक पहुंच जाएगी। भारत हरित विश्व व्यवस्था का मुखिया बन सकता है। भारत ने पेरिस सम्मलेन के उपरांत अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कूटनीति की जो शुरूआत की, उसमें उसे बड़ी सफलता हासिल हुई है। अमेरिका के उत्तरी कैलिफोर्निया के जंगलों में लगी आग ने एक बार फिर यह सोचने को मजबूर किया है कि आखिर कब तक इंसान प्रकृति का दोहन करते हुए उसके साथ खिलवाड़ करता रहेगा। सबसे ज्यादा तो यह दुनिया के उस देश में हो रहा है जो प्रकृति का दोहन कर पिछली एक सदी से दुनिया का मठाधीश बना हुआ है। जब पूरी दुनिया हरित उर्जा की बात कह रही थी, तब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने देश के एक प्रतिष्ठित उद्योग घराने को बंद कमरे में यह विश्वास दिला रहे थे कि कार्बन जनित इंधन पर कोई पाबंदी नहीं लगाई जाएगी। अपने देश में गैस के अकूत भंडार मिलने के बाद अमेरिका की नीयत बदल गई है। खाड़ी देशों में 1945 से चली आ रही अमेरिकी घुसपैठ थम गई है। अमेरिका तेल की जगह अपनी गैस के जरिए आर्थिक ढांचे को बढ़ाने की कोशिश करेगा, अर्थात हरित ऊर्जा को अभी भी वह खास अहमियत नहीं दे रहा। नई विश्व व्यवस्था की बात पिछले एक दशक से चल रही है। माना जा रहा है कि शक्ति का हस्तांतरण अब पश्चिम से पूर्व की ओर होगा। जाहिर है, एशिया ही नई वैश्विक व्यवस्था के केंद्र के रूप में उभरने की ओर है। चीन पूरी तरह से नेतृत्त्व की तैयारी में जुटा है। उसने साल 2035 तक का खाका तैयार भी कर लिया है। तब तक चीन दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य शक्ति बन जाएगा। लेकिन चीन की सोच के अनुसार दुनिया बदलती हुई दिखाई नहीं दे रही है। कोरोना महामारी फैलाने के आरोप को लेकर पिछले सात महीनों में चीन को लेकर जो संदेह गहराता जा रहा है, उससे उसका वैश्विक स्वरूप खंडित हुआ है। यूरोप के ज्यादातर देश जो उसके हिमायती हुआ करते थे, वही अब उससे सवाल पूछ रहे हैं। पूर्वी एशिया के पड़ोसी भी चीन के व्यापार और सैन्य विस्तार को बड़े खतरे के रूप में देख रहे हैं। भारत के साथ गलवान घाटी में संघर्ष को हवा देकर चीन अपनी आतंरिक करतूतों को ढकने में लगा है। इसलिए एक सामरिक विस्तार जो दुनिया में मठाधीश बनाने के लिए जरूरी था, वह अब दम तोड़ रहा है। दुनिया में महाशक्ति बनने के लिए कई गुणों की जरूरत पड़ती है। इनमें दो गुण विशेष हैं। पहला, ऐसा देश जो दुनिया के किसी भी हिस्से में सैन्य दखल की क्षमता रखता हो, और दूसरा यह कि जिसके पास दुनिया के किसी भी हिस्से में पमाणु मिसाइलें दागने की ताकत हो। अमेरिका इन दोनों ही क्षमताओं से युक्त है, लेकिन उसकी तुलना में चीन को अभी इतनी ताकत हासिल करने के लिए वक्त लगेगा। ऐसे में जिस नई वैश्विक व्यवस्था की संभावना बन रही है और जिसकी पूरी दुनिया को जरूरत है, वह हरित विश्व व्यवस्था की है। इसमें जो बाजी मार ले जाएगा, वही दुनिया का नया बादशाह बनेगा। लेकिन सवाल है कि यह क्षमता है किस देश के पास? अमेरिका इस श्रेणी से पहले ही से बाहर है। क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस संधि को नकारने के बाद अमेरिका कभी भी हरित विश्व व्यवस्था का नेतृत्व नहीं कर सकता, न ही दुनिया उसके नेतृत्व को स्वीकार करने वाली है। दूसरा देश चीन है। चीन ने पिछले कुछ वर्षों में हरित उर्जा में अद्भुत क्षमता विकसित कर ली है। 2018 में सौर ऊर्जा के जरिए चीन ने एक सौ अस्सी गीगा वाट ऊर्जा उत्पन्न कर बड़ी-बड़ी बसें और ट्रक भी सौर ऊर्जा से चलाने में कामयाबी हासिल कर ली। पवन ऊर्जा में भी वह आगे है। लेकिन इतना कुछ होने के बावजूद हरित विश्व के रिकॉर्ड में चीन काफी नीचे है। इसके कई कारण हैं। पहला तो यह कि देश के भीतर तो चीन हरित ऊर्जा की वकालत करता है, लेकिन बाहरी दुनिया में वह जम कर कार्बन जनित आर्थिक व्यवस्था को अहमियत दे रहा है। पिछले कई सालों से अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों में वह कोयले का जम कर इस्तेमाल कर रहा है, जिससे इन देशों में प्रदूषण की समस्या गंभीर बनती जा रही है। चीन दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कोयला उत्पादन क्षेत्रों को खरीद चुका है। सबसे बड़ा कोल उत्पादक देश होने के बावजूद कोयले का सबसे बड़ा आयातक देश भी चीन ही है। अर्थात अपने लिए स्वच्छ और हरित ऊर्जा और दूसरों के लिए कार्बन का ढेर। यह नीति तर्कसंगत नहीं है। आने वाले दो दशकों तक चीन के कार्बन उत्पादन में कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं आने वाला। यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि चीन भविष्य में हरित ऊर्जा वाली नई वैश्विक व्यवस्था की अगुआई करेगा और दुनिया के देश उसके नेतृत्व को स्वीकार करेंगे। थाईलैंड, मलेशिया जैसे देश तक अब उसके खिलाफ हैं। जहां तक सवाल है यूरोपीय देशों का तो हरित ऊर्जा के मामले में ग्रीनलैंड, आइसलैंड जैसे यूरोप के छोटे देश काफी आगे हैं। इसी तरह अफ्रीका के मोरक्को, घाना और एशिया में भूटान जैसे देश हैं। लेकिन ये देश इतने छोटे हैं कि ये हरित वैश्विक व्यवस्था का नेतृत्व नहीं कर सकते। फ्रांस के साथ तकरीबन सड़सठ देशों ने इसमें शिरकत की और साझेदार बन गए। सौर ऊर्जा क्षेत्र में अगुआई के लिहाज से यह बड़ा हासिल रहा। दूसरा यह कि भारत में हरित उर्जा के अन्य स्रोत भी उपलब्ध हैं। मसलन पवन ऊर्जा, बायोमास और छोटे-छोटे पनबिजली संयंत्र। ऊर्जा का जलवायु परिवर्तन से सीधा संबंध है। प्राकृतिक आपदाओं के पीछे बड़ा कारण धरती और वायुमंडल में कार्बन की बढ़ती मात्रा है। पिछले दो सौ सालों में कल-कारखानों से निकली जहरीली गैसों के कारण प्रकृति में कार्बन की मात्रा बढ़ी है। इसके लिए सबसे ज्यादा दोषी यूरोप के औपनिवेशिक देश और बाद में अमेरिका रहा है। भारत की प्राचीन आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह से प्रकृति जनित और उस पर आधारित थी। भारत में हमेशा से प्रकृति के साथ जिंदा रहने को महत्त्व दिया गया है। जल, जमीन और जंगल के सुनियोजित प्रयोग की सीख दी गई। यह अलग बात है कि आजाद भारत गांधी के भारत के हट कर पश्चिमी आर्थिक व्यवस्था का अभिन्न अंग बन चुका है। आज भारत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह है कि दुनिया को एक सूत्र में बांधने के लिए वह वैश्विक भूमिका में उतरे और अपनी स्वीकार्यता बनवाए। हरित वैश्विक व्यवस्था की अगुवाई के लिए भारत के पास क्षमता और संसाधन दोनों हैं। बस इनका उपयुक्त तरीके से उपयोग करना है।
विस्तारित कांग्रेस कार्यसमिति की मैराथन बैठक के बाद जो स्थिति बनी है उसे ढाक के तीन पात के संदर्भ में ही समझा जा सकता है। उम्मीद थी कि देश और कांग्रेस पार्टी की असाधारण स्थिति को देखते हुए अपनी इस महत्वपूर्ण बैठक में कांग्रेस का वृहत्तर नेतृत्व न केवल देश के संदर्भ में कुछ गंभीर चिंतन करेगा, बल्कि कुछ ठोस और ईमानदार आत्मचिंतन भी होगा ताकि कांग्रेस सामने खड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए कुछ तैयार हो सके। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। सारे क्रियाकलाप पर दो चिट्ठियां छाई रहीं और आरोप-प्रत्यारोप के बीच सुलह हो जाने का नाटक पूरा हो गया। कांग्रेस के लिए और देश के जनतंत्र के लिए यह स्थिति किसी भी दृष्टि से अच्छी नहीं है। पहले दो चिट्ठियों वाली बात। दो चिट्ठियां पढ़ी गईं सात घंटे चलने वाली बैठक में। पहली चिट्ठी पिछले एक साल से अंतरिम अध्यक्ष के रूप में काम कर रही सोनिया गांधी की थी। इस पत्र में उन्होंने स्पष्ट कहा था कि मुख्यत: स्वास्थ्य कारणों से वे यह भार अब और उठाने के लिए तैयार नहीं हैं। यह बात वे पहले भी कहती रही हैं। पिछले साल जब राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने यह भार संभाला था, तब भी इस बात को रेखांकित किया गया था कि उनका स्वास्थ्य अब उन्हें मजबूर कर रहा है। उम्मीद थी कि इस महत्वपूर्ण बैठक में इस विषय पर गंभीर चर्चा होगी, पर ऐसा नहीं हुआ। फिर से अंतरिम व्यवस्था करके एक जरूरी और महत्वपूर्ण निर्णय को टाल दिया गया। अब दूसरी चिट्ठी की बात। यह चिट्ठी कांग्रेस के तेईस वरिष्ठ नेताओं ने अध्यक्ष के नाम लिखी थी, जिसमें एक पूर्णकालिक अध्यक्ष की नियुक्ति की मांग की गई थी-एक ऐसा अध्यक्ष जो पूरा समय पार्टी को दे सके, सक्रिय दिखे और पार्टी की डूबती नाव को पार लगा सके। इस मांग में कहीं कुछ गलत नहीं था। सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष पद छोड़ने की बात लगातार कह रही थीं, पिछले चुनावों में कांग्रेस की शर्मनाक पराजय के बाद तत्कालीन अध्यक्ष नैतिक आधार पर इस्तीफा दे चुके थे और इस बीच बार-बार यह कहते रहे हैं कि वे फिर से अध्यक्ष बनने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने और उनकी बहन दोनों ने यह भी दोहराया कि वे नहीं चाहते कि गांधी-परिवार का कोई सदस्य पार्टी का अध्यक्ष बने। ऐसे में कांग्रेस पार्टी के पास क्या विकल्प बचता है? इसी प्रश्न के उत्तर में वह दूसरी चिट्ठी लिखी गई थी, जिसने दुर्भाग्य से कार्यसमिति का सारा एजेंडा ही अपहृत कर लिया। सारे समय में दो ही बातें हुईं कि गांधी-परिवार ही कांग्रेस पार्टी का तारणहार है और दूसरी चिट्ठी लिखने वाले कांग्रेस पार्टी के दुश्मन हैं। भाजपा के इशारे पर कांग्रेस में चिट्टीबाज का आरोप छोटा नहीं है। बहरहाल, यह कांग्रेस पार्टी को देखना है कि वह अपने को कैसे संभाले, पर कांग्रेस पार्टी का इतनी बुरी तरह से लड़खड़ाना पूरे देश की चिंता का विषय होना चाहिए। पिछले दो चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की शानदार जीत ही नहीं हुई, कांग्रेस की शर्मनाक पराजय भी हुई है। पर इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पराजय ने एक ताकतवर विपक्ष भी छीन लिया है जो जनतंत्र की सफलता और सार्थकता की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है। कांग्रेस का बिखरना अथवा कांग्रेस का अपने आप को संभालने-समेटने में विफल होना, हमारी समूची जनतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा है, और चुनौती भी। इंदिरा गांधी के जमाने में उनके विरोधी बार-बार यह बात दोहराया करते थे कि सत्ता भ्रष्ट बनाती है और अपार शक्ति वाली सत्ता अपार भ्रष्ट। भले ही यह बात आपातकाल के संदर्भ में कही जाती थी, पर सत्ता के भ्रष्टाचार के संदर्भ में यह किसी भी काल पर लागू हो सकती है। विपक्ष का इतना कमजोर होना, जितना कि भारत में यह अब है, सत्ता को निरंकुश बनाता है। यह निरंकुशता जनतंत्र को अर्थहीन बना देती है। जनतंत्र के स्वास्थ्य और सार्थकता दोनों के लिए जरूरी है कि सरकार भी मजबूत हो और विपक्ष भी। तभी दोनों अपना कर्तव्य पूरा कर सकते हैं। आज हमारी संसद में जो स्थिति है, वह सत्तारूढ़ दल के लिए भले ही कितनी भी अच्छी क्यों न हो, जनतंत्र के स्वास्थ्य के लिए निश्चित रूप से खतरनाक है। जो बात जनतंत्र के लिए सच है, वह जनतंत्र में राजनीतिक दलों पर भी लागू होती है। अंकुश दलों के भीतर भी चाहिए। एक अपार ताकत वाला नेता किस तरह निरंकुश हो सकता है, यह देश आपातकाल में देख चुका है। फिर कोई इस तरह निरंकुश न बने, इसके लिए जरूरी है कि राजनीतिक दलों के भीतर भी स्वस्थ आलोचना को स्वीकारा जाए। जैसे विपक्ष देश का दुश्मन नहीं होता, वैसे ही दलों के भीतर असहमति का स्वर उठाने वाले दलों के दुश्मन नहीं होते। इस असहमति को गद्दारी कहना गलत होगा। सच तो यह है कि इस असहमति का स्वागत होना चाहिए। कांग्रेस के भीतर इस दूसरी चिट्ठी का स्वागत होना चाहिए था। इसमें उठाए गए मुद्दों पर खुलकर ईमानदार बहस होनी चाहिए थी। यह बात कांग्रेस के हर छोटे-बड़े नेता को समझनी होगी कि दावे कुछ भी किए जाते रहें, आज कांग्रेस नेतृत्वहीनता की स्थिति में है। यह स्थिति कांग्रेस और जनतंत्र दोनों के लिए खतरनाक है। इतना ही खतरनाक होता है किसी पार्टी का किसी व्यक्ति या किसी परिवार पर निर्भर होना। कोई भी नेता किसी भी पार्टी के लिए अपरिहार्य नहीं होता। समय और स्थितियां नेताओं को सामने लाती हैं और अवसर उन्हें स्वयं को सिद्ध करने का मौका देते हैं। जनतांत्रिक मूल्यों, परंपराओं का तकाजा है कि इस अवसर के निर्माण की ईमानदार कोशिश हो। कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व को इस ईमानदारी का परिचय देना है। यह देश का दुर्भाग्य है कि आज देश में एक मजबूत विपक्ष नहीं है, पर कांग्रेस के लिए अच्छी बात है कि उसके पास अवसर है स्वयं को सिद्ध करने का। राजनीति में महत्वाकांक्षी होना कतई गलत नहीं है, पर राजनीतिक ईमानदारी जनतंत्र की सार्थकता और सफलता की शर्त है। कांग्रेस वालों को इस ईमानदारी का परिचय देना है।
भारतीय राजनीति दरअसल ऐसी ही है। लोगों से पूछिए कि क्या उन्हें परेशानी हो रही है तो वे कहेंगे हां। क्या वे इसके लिए मोदी को दोष देते हैं? याद कीजिए कुछ महीने पहले कठिन परिस्थितियों में पैदल अपने घरों को लौट रहे प्रवासी श्रमिकों में से अनेक का कहना था कि मोदी क्या कर सकते हैं? उन्होंने लोगों की जान बचाने के लिए जोखिम उठाया। चीन और अर्थव्यवस्था के बारे में भी ऐसी ही बातें सुनने को मिलती हैं। सत्तर साल की गड़बड़ियों को ठीक करने में वक्त तो लगता ही है। कांग्रेस ने हमें एक कमजोर सेना दी। सबसे पहले भ्रष्टाचार से निपटना था। उन्होंने जोखिम उठाते हुए और कीमत चुकाते हुए समय पर लॉकडाउन लगाया। मास्क और शारीरिक दूरी रखने की बात कही और बोरिस जॉनसन, डॉनल्ड ट्रंप या जायर बोलसोनारो की तरह महामारी को हल्के में नहीं लिया। अब यदि यह वायरस नियंत्रण में आ ही नहीं रहा तो वह क्या कर सकते हैं? यदि आप मोदी के आलोचक हैं तो मुझे पता है कि मैं आपको और परेशान कर रहा हूं। लेकिन यही असली बात है। राजनीति को समझने के लिए आपको हकीकत को स्वीकार करना होगा चाहे वह कितनी भी कड़वी क्यों न हो? इंडिया टुडे ने देश का मिजाज जानने के लिए हाल में जो सर्वेक्षण किया है उसमें आप लाख कमियां निकालें लेकिन उसका प्रदर्शन अब तक अच्छा ही रहा है। सर्वेक्षण का कहना है कि मोदी इस समय अपनी लोकप्रियता के शिखर पर हैं जबकि इस समय अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता है, राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न है, आंतरिक सद्भाव बिगड़ा हुआ है और महामारी सर पर सवार है। आखिर चल क्या रहा है? कहीं भी जाइए और किसी अजनबी से पूछिए। वे मानेंगे कि हालत खराब है लेकिन क्या वे मोदी को वोट देकर पछता रहे हैं? अगर दोबारा चुनाव हो तो वे किसे वोट देंगे? क्या कोई विकल्प दिख रहा है? माफ कीजिएगा उनका जवाब आपको और परेशान कर सकता है। क्या लोग इतने नादान हैं? इसे जरा अलग तरह से देखते हैं। आम आदमी जब किसी गंभीर बीमारी के बाद अस्पताल में भर्ती होता है तो वह क्या करता है? वह चिकित्सकों पर यकीन करता है। उसे लगता है वे अपनी ओर से हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं। अस्पताल बदलने की कोशिश कम ही होती है। भारतीय मतदाता भी ऐसे ही हैं। पिछले कुछ समय में ऐसे मशविरों की बाढ़ आ गई है कि मोदी को कैसे हराया जाए और क्या नहीं किया जाए। एक पुरानी रट तो यही है कि विपक्ष को एकजुट किया जाए। परंतु मजबूत नेताओं के समक्ष यह कारगर नहीं होता। याद कीजिए सन 1971 में इंदिरा गांधी के खिलाफ बने महागठजोड़ को। समस्त वाम और धर्मनिरपेक्ष दलों को साथ ले आने की बात करें तो वाम दल हमेशा से एक भुलावा रहे हैं। असली राजनीति यही रही है कि अगर कोई धर्म के बूते लोगों को जोड़ रहा है तो उन्हें जाति के आधार पर बांट दो। बात खत्म। अगर नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, राज्यपाल और आरएसएस प्रमुख के साथ अयोध्या में राम मंदिर के भूमिपूजन में शामिल हुए और असदुद्दीन ओवैसी के अलावा कोई इसके खिलाफ कुछ नहीं बोला तो आप समझ जाइए कि सन 1989 के बाद की मंदिर बनाम मंडल की कहानी खत्म हो गई है। देश के राजनीतिक मानचित्र पर राज्य दर राज्य नजर डालिए। आपको ऐसा कोई नेता नजर आता है जो मोदी को चुनौती दे सके? अमरिंदर सिंह, ममता बनर्जी, ठीक है लेकिन कोई तीसरा नेता? तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना इससे बाहर हैं। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में जो दल शासन कर रहे हैं वे बड़े मुद्दों पर भाजपा के ही अनुसरणकर्ता हैं। ओडिशा का भी यही हाल है। अन्य संभावनाएं? कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन हो। राहुल गांधी को जाने दें तो उनकी जगह कौन लेगा? कुछ लोग उनकी बहिन का नाम लेंगे तो कुछ और कहेंगे कि नया नेता गांधी परिवार से बाहर का हो। एक सुझाव तो यह भी है कांग्रेस का पुनर्गठन किया जाए और ममता बनर्जी, शरद पवार, वाई एस जगन मोहन रेड्डी तथा संगमा परिवार जैसे सभी लोगों को वापस लाया जाए। लेकिन क्या ये लोग भी ऐसा चाहते हैं? मान लिया वे सहमत भी हो जाएं तो नेतृत्व कौन करेगा? फिलहाल यह कपोल कल्पना है। इसके लिए बहुत सारी समझ और कई इच्छाएं पालनी होंगी। एक कारगर मशीन बनाने के लिए बहुत सारे कलपुर्जे जुटाने होंगे। यहां हम उस विचार पर पहुंचते हैं जिससे कई लोग पहले से परिचित होंगे। परंतु मुझे इसके बारे में हाल ही में पता चला। पांच महीने बाद इंडिया इंटरनैशनल सेंटर जाने का यह भी एक लाभ है। इसे आॅखम रेजर कहते हैं। सन 1285 में इंगलैंड में जन्मे विलियम आॅखम एक सुधारवादी चर्च में पादरी बने और वह कोई तर्कशास्त्री नहीं थे। बल्कि उन्होंने दैवीय चमत्कारों को उचित ठहराने के लिए एक सिद्धांत विकसित किया। उनका कहना था कि जब किसी घटना या उसके घटित होने की संभावना के बारे में तमाम बातें कही जा रही हों तो वह बात मान लो जो सबसे सरल हो। यानी किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए जितनी कम पूर्व धारणाएं रखी जाएं उतना बेहतर। इसके विपरीत अगर बहुत सारी कल्पनाएं लेकर चलेंगे तो गलत होने की संभावना अधिक रहेगी। उन्होंने इसका बार-बार सफल इस्तेमाल किया और आगे चलकर इसे आॅखम के रेजर का नाम दे दिया गया। शायद इसलिए क्योंकि उन्होंने इसका इस तरह इस्तेमाल किया जैसे लोग रेजर का करते हैं। मुझसे बातचीत करने वाले ने देश के राजनीतिक भविष्य पर इस सिद्धांत को लागू किया। हमने 2024 को लेकर कई संभावनाओं पर चर्चा की और उसने कहा कि देखिए इनमें से कौन सी सबसे कम पूवानुर्मानों पर आधारित है? वह संभावना थी मोदी का पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापस आना। बाकी सभी अनुमान आखम रेजर की परीक्षा में विफल रहे। इस बात ने मुझे मजबूर किया कि मैं गूगल की शरण में जाकर और जानकारी जुटाऊं। इसे सरल रखने के लिए सभी अनुमानों को परे रखिए और अपने राजनीतिक इतिहास पर नजर डालिए, शायद कुछ रोशनी नजर आए।
भारत शानदार परिदृश्यों और निवास का देश है। उनमें से एक है सवाना घास का मैदान जो राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक के शुष्क क्षेत्रों में वितरित है। हालांकि घास के मैदानों को बड़े पैमाने पर अन्य भूमि उपयोग प्रकारों में बदल दिया गया है, एक बड़ा भाग अभी भी राजस्थान के जैसलमेर, कच्छ के छोटे रण और दक्कन प्रायद्वीप के कुछ हिस्सों में है। जाहिर है ऐसे घास के मैदान यहां पाए जा सकते हैं। इन क्षेत्रों की यात्रा पर, भाग्य अच्छा होने पर, एक शाही पक्षी जिसे अंग्रेजी में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड कहते हैं, को देखने का मौका प्राप्त हो सकता है। यह एक बड़े आकार का, भारी एवं छोटी उड़ान भरने वाला, बस्टर्ड प्रजाति का पक्षी है, जो विश्वभर में, केवल भारतीय उपमहाद्वीप पर पाया जाता है। इसकी हूंक जैसी पुकार के वजह से इसे हिंदी में हुकना नाम से जाना जाता है। पक्षी एक नाम अलग अपनी धीमी चाल की वजह से, राजस्थान में इसे गोडावण नाम दिया गया है। गुजरात में इसे घोरड़ तथा महाराष्ट्र में मालढोक के नामों से जाना जाता है। हुकना का वजन 15-18 किलोग्राम के बीच होता है, तथा ऊंचाई 1 मीटर। इसका शरीर भूरे रंग का होता है, शीश एवं गर्दन सफेद, तथा सिर पर एक सुंदर काला मुकुट और कलगी होती है। सवाना के सघन घास के बीच में इसकी धीमी गति की चाल अति मनमोहक होती है, तथा राजस्थान के महाराजाओं के राजसी गौरव का एक सहज अनुस्मारक है। भारतीय उपमहाद्वीप पर उड़ान भर पाने वाला यह सबसे भरी पक्षी है। मादा हुकना को रिझाने के लिए, नर हुकना के गर्दन पर स्थित गूलर की थैली सावन के महीने में अति लंंबी और फूल जाती है। सामान्यतः, हुकना साल में केवल एक अंडा देता है, जिसे वह मैदानों में भूमि पर ही घोसंलों में रखता है। पाया गया है कि आमतौर पर 40-50% बार ही उसके अंडे में से नवजात, सफलता से निकलते हैं। यह प्राकृतिक विशेषता हुकना की आबादी को तेज़ी से बढ़ने नहीं देती। मुग़ल और अंंग्रेज हुकना का शिकार करना तथा उसका मास भक्षण करना अत्यधिक पसंद करते थे। हालांकि अब हुकना को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (1972) के तहत कानूनी संरक्षण प्राप्त है।
लाल बहादुर शास्त्री के दोनों दामादों क्रमश: कौशल कुमार और विजय नाथ सिंह की भी। ये हमेशा विवादों से परे रहे। कौशल कुमार बड़े दामाद थे। उनकी पत्नी कुसुम का बहुत पहले निधन हो गया था। कौशल कुमार आईएएस अफसर थे। उनका जीवन भी बेदाग रहा। विजय नाथ सिंह सरकारी उपक्रम में काम करते थे। लाल बहादुर शास्त्री ने कभी भी अपने बच्चों या दामादों को इस बात की इजाजत नहीं दी कि वे उनके नाम या पद का दुरुपयोग करें। क्या इस तरह का दावा वाड्रा या प्रियंका कर सकते हैं। चौधरी चरण सिंह की भी चार बेटियां थीं। उनके सभी दामाद भी कभी विवादों में नहीं रहे। एक दामाद डॉ जेपी सिंह राजधानी के राम मनोहर लोहिया अस्पताल के प्रमुख भी रहे। पीवी नरसिंह राव के तीन पुत्र और पांच पुत्रियां थीं। राजनीति में आने के बाद उनका अपने बेटों या बेटियों से किसी तरह का घनिष्ठ संबंध नहीं था। वे जब प्रधानमंत्री भी बने तब भी उनके पास उनका कोई बेटा या बेटी नहीं रहते थे। राव साहब की पत्नी के 70 के दशक में निधन के बाद उनका अपने परिवार से कोई खास संबंध नहीं रहा। जब उनका कोई पुत्र या पुत्री उनके पास आते भी थे तो वे उनसे मिलने के कुछ देर के बाद ही उन्हें विदा कर देते थे। एचडी देवागौड़ा की दोनों पुत्रियों डी अनुसूईया और एडी शैलेजा के पति डॉ सीएन मंजूनाथ और डा. एच.एस.जयदेव मेडिकल पेशे से जुड़े हैं। इन पर भी कभी अपने ससुर के नाम का बेजा इस्तेमाल का आरोप नहीं लगा। अगर बात डॉ मनमोहन सिंह के दामादों की करें तो ये भी विवादों से बहुत दूर ही रहे। उनकी सबसे बड़ी पुत्री डॉ उपिंदर सिंह के पति डॉ विजय तन्खा दिल्ली यूनिवर्सिटी में अध्यापक रहे। दूसरी बेटी दमन सिंह के पति अशोक पटनायक आईपीएस अफसर थे। तीसरी बेटी अमृत सिंह अमेरिका में अटार्नी हैं। उसके पति अध्यापक हैं। मतलब साफ है कि रॉबर्ट वाड्रा इन सबसे अलग हैं। उनमें कोई गरिमा नाम की चीज नहीं है। इसलिए ही उनके प्रति देश लेश मात्र भी सम्मान का भाव नहीं रखता है। वे इस देश के एक खास परिवार के दामाद है। वे अपने सम्मान को तार-तार कर चुके हैं।
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