एबीएन डेस्क, रांची। वर्तमान कोरोना के संकट को पार करने के लिए भारत सरकार ने भारी मात्रा में ऋण लेने की नीति अपनाई है। ऋण के उपयोग दो प्रकार से होते हैं। यदि ऋण लेकर निवेश किया जाए तो उस निवेश से अतिरिक्त आय होती है और उस आय से ऋण का ब्याज एवं मूल का पुनर्भुगतान किया जा सकता है। जिस प्रकार उद्यमी ऋण लेकर उद्योग स्थापित करता है, अधिक लाभ कमाता है, और उस अतिरिक्त लाभ से ऋण का भुगतान करता है। ऐसे में ऋण का सदुपयोग उत्पादक कार्यों के लिए होता है। लेकिन यदि ऋण का उपयोग घाटे की भरपाई के लिए किया जाए तो उसका प्रभाव बिल्कुल अलग होता है। खपत के लिए उपयोग किये गये ऋण से अतिरिक्त आय उत्पन्न नहीं होती बल्कि संकट के दौरान लिए गये ऋण पर अदा किए जाने वाले ब्याज का अतिरिक्त भार आ पड़ता है। जैसे किसी कर्मी की नौकरी छूट जाए और वह ऋण लेकर अपनी खपत को पूर्ववत बनाए रखे तो भी दुबारा नौकरी पर जाने के बाद लिए गये ऋण पर ब्याज का भुगतान करना पड़ेगा। इस प्रकार उसकी शुद्ध आय में गिरावट आएगी। पूर्व में ब्याज नहीं देना पड़ता था जो कि अब देना पड़ेगा। इस परिप्रेक्ष्य में भारत सरकार समेत विश्व के तमाम विकासशील देशों द्वारा संकट पार करने के लिए ऋण लेने पर विचार करना होगा। ये ऋण नौकरी छूटने पर लिए गए ऋण के सामान है। चूंकि इनसे अतिरिक्त आय उत्पन्न नहीं हो रही है। इसलिए विश्व बैंक ने चेताया है कि ऋण लेकर संकट पार करने की नीति भविष्य में कष्टप्रद होगी। उन्होंने वेनेजुएला का उदाहरण दिया है, जिसने भारी मात्रा में ऋण लिए। आज उस देश को खाद्य सामग्री प्राप्त करना भी दुश्वार हो गया है। चूंकि ब्याज का भारी बोझ आ पड़ा है। इसी क्रम में छह विकासशील देश जाम्बिया, एक्वाडोर, लेबनान, बेलीज, सूरीनाम और अर्जेंटीना ने अपने ऋण की अदायगी से वर्ष 2020 में ही डिफाल्ट कर दिया है। वे लिए गए ऋण का भुगतान नहीं कर सके हैं। साथ-साथ 90 विकासशील देशों ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष से आपात ऋण की सुविधा की मांग की है। जिससे पता लगता है कि विकासशील देशों द्वारा लिये जाने वाले ऋण का प्रचलन फैल भी रहा है और उन्हें संकट में भी डाल भी रहा है। तुलना में अमेरिका और चीन द्वारा लिए गये ऋण का चरित्र कुछ भिन्न है। अमेरिकी सरकार ने भारी मात्रा में ऋण लेकर अपने नागरिकों को नगद ट्रांसफर किए हैं। लेकिन साथ-साथ उन्होंने नयी तकनीकों में भारी निवेश भी किया है। जैसे अमेरिकी सरकार ने बैक्टीरिया रोगों की रोकथाम के लिए प्रकृति में उपलब्ध फाज से उपचार के लिए सब्सिडी दी है। इसी प्रकार चीन ने अमेरिका और रूस के साथ अंतरिक्ष यान बनाने के स्थान पर स्वयं अपने बल पर अंतरिक्ष यान बनाना शुरू कर दिया है और उसका पहला हिस्सा अंतरिक्ष में भेज दिया है; चीन ने सूर्य के बराबर तापमान पैदा किया है; अपने ही लड़ाकू विमान बनाये हैं; और मंगल ग्रह पर अपने सेटेलाइट को उतारा है। ऐसे में अमेरिका और चीन द्वारा लिए गये ऋण का चरित्र भिन्न हो जाता है। ये उसी प्रकार हैं जैसे कि उद्यमी ऋण लेकर उद्योग स्थापित करता है और उससे अतरिक्त लाभ कमाता है। अत: भारत द्वारा ऋण लेकर संकट को पार करने की नीति उचित नहीं दिखती जबकि अमेरिका और चीन की ऋण लेकर निवेश करने की नीति सही दिशा में प्रतीत होती है। भारत सरकार द्वारा लिये जाना वाला ऋण एक और दृष्टि से संकट पैदा कर सकता है। पिछले महीने अप्रैल, 2021 में जीएसटी से प्राप्त राजस्व में भारी वृद्धि हुई है। पिछले दो वर्ष में लगभग 1.0 लाख करोड़ रुपये प्रति माह से बढ़कर मार्च, 2021 में 1.23 लाख करोड़ और अप्रैल, 2021 में 1.41 लाख करोड़ का राजस्व जीएसटी से मिला है। इस आधार पर सरकार द्वारा लिया गया ऋण स्वीकार हो सकता है। लेकिन तमाम आंकड़े इतनी उत्साहवर्धक तस्वीर नहीं पेश करते । मैकेंजी द्वारा किए गये एक सर्वेक्षण में जनवरी, 2021 में देश के 86 प्रतिशत लोग देश की अर्थव्यवस्था के प्रति सकारात्मक थे जो कि अप्रैल, 2021 में घटकर 64 प्रतिशत हो गये थे। डिप्लोमेट पत्रिका में प्रकाशित एक लेख के अनुसार फैक्टरियों द्वारा बाजार से खरीद करने वाले मैनेजरों में मार्च 2021 में 54.6 प्रतिशत सकारात्मक थे जो अप्रैल में घटकर 54.0 प्रतिशत रह गये थे। मार्च और अप्रैल के बीच पेट्रोल की खपत में 6.3 प्रतिशत की गिरावट आई है, डीजल की खपत में 1.7 प्रतिशत की गिरावट आई है, कारों की बिक्री में 7 प्रतिशत की गिरावट आई है और अंतर्राज्यीय ईवे बिलों में 17 प्रतिशत की गिरावट आई है। अत: अर्थव्यवस्था के मूल आंकड़े मार्च की तुलना में अप्रैल में नकारात्मक हैं। इसके बावजूद जीएसटी की वसूली में भारी वृद्धि हुई है। इसका कारण संभवत: यह है कि बीती तिमाही में जो जीएसटी अदा किया जाना था वह अप्रैल में अदा किया गया है; अथवा सरकार ने जीएसटी के रिफंड रोक लिए हैं। और भी कारण हो सकते हैं जिनका गहन अन्वेषण करना जरूरी है। बहरहाल इतना स्पष्ट है कि जीएसटी की वसूली में वृद्धि के बावजूद मूल अर्थव्यवस्था की तस्वीर विपरीत दिशा में चल रही है। भारत सरकार ने दिसम्बर, 2019 में अपनी जीडीपी का 74 प्रतिशत ऋण ले रखा था जो दिसम्बर, 2020 में बढ़कर 90 प्रतिशत हो गया है। इस वर्ष के बजट में वित्त मंत्री ने भारी मात्रा में ऋण लेने की घोषणा की थी जो कि कोविड की दूसरी और तीसरी लहर के कारण हुई क्षति के कारण और अधिक होगा। इस कठिन परिस्थिति में सरकार को कुछ कठोर कदम उठाने चाहिये ताकि ऋण का बोझ न बढ़े। पहला यह कि ईंधन तेल के ऊपर आयात कर बढ़ाकर राजस्व वसूल करना चाहिए और इसकी खपत कम करनी चाहिए। दूसरा, सरकार को अपनी खपत में जैसे सरकारी कर्मियों के वेतन में समय की नाजुकता को देखते हुए भारी मात्रा में कटौती कर देनी चाहिए और अन्य अनुत्पादक खर्चों को समेटना चाहिए। तीसरा सरकार को नयी तकनीकों में भारी निवेश करना चाहिए। हमारे लिए यह शर्म की बात है कि दवाओं के क्षेत्र में अग्रणी होने के बावजूद आज हम अपने देश की भारत बायोटेक के टीके से आत्मनिर्भर नहीं हो सके हैं और तमाम देशों से टीके आयात कर रहे हैं। इसलिए इस कठिन परिस्थिति में अपने बल पर नयी तकनीकों में भारी निवेश करने की पहल करनी चाहिए अन्यथा यह ऋण देश की अर्थव्यवस्था को ले डूबेगा। जैसे वेनेजुएला जैसे देशों को यह संकट में डाल रहा है।
एबीएन डेस्क, रांची। जिस प्रकार समाज में कोरोना के वैक्सीन और जांच को लेकर भ्रम और असमंजस फैल रहा है यह कोई नयी बात नहीं है। हमारी शिक्षा की कमजोरी कहें या स्तरहीनता की समस्या आज भी लोग आधुनिक अविष्कारों पर विश्वास नहीं कर रहें हैं। यही कारण है कि सरकार की योजनाओं का भी सही प्रति फल नहीं निकलता है। सवाल यह उठता है कि शिक्षा को धर्म से जोड़ा जाए कि वैज्ञानिक चिंतन और सोच से लबरेज किया जाये। क्या यह सच नहीं है कि भारत में कुछ खास धर्मों के मानने वाले शिक्षण संस्थानों में अपने-अपने धर्मों के प्रचार के लिए कोशिशें करते रहते हैं। कभी कभी सच में लगता है इस मसले पर देश में एक बार खुली बहस हो जाए कि क्या भारत में धर्म प्रचार की स्वतंत्रता जारी रहे अथवा नहीं ? देखा जाए तो केवल अपने धर्म पालन की सबको स्वतंत्रता होनी चाहिये। लेकिन, शिक्षण संस्थानों में अबोध बच्चों को अपने धर्म की अच्छाई और बाकी सभी धर्मों की बुराई बताना बच्चों को अबोध उम्र में कट्टर बनाना और दूसरे धर्मावलम्बियों के प्रति घृणा फैलाना कहाँ तक उचित है? यही तो देश में धार्मिक उन्माद फैला रहा है ? यही तो आपसी असहिष्णुता की मूल धर्म के प्रचार- प्रसार की छूट की कोई आवश्यकता नहीं। धर्म कोई दुकान या व्यापार तो है नहीं जिसका प्रचार प्रसार करना जरूरी हो। भारतीय संविधान धर्म की आजादी का अधिकार प्रदान करता है। अनुच्छेद 25 (1) में कहा गया है कि सभी व्यक्ति समान रूप से धर्म का प्रचार करने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन अनुच्छेद 26 कहता है कि धार्मिक आजादी और धार्मिक संप्रदायों के क्रियाकलाप में शांति और नैतिकता की शर्तें भी हैं। अनुच्छेद 28 में कहा गया है कि सरकारी शैक्षिक संस्थानों में कोई धार्मिक निर्देश नहीं दिया जायेगा। अगर हम इतिहास के पन्नों को खंगाले तो देखते हैं कि भारत के संविधान निर्माताओं ने सभी धार्मिक समुदायों को अपने धर्म के प्रचार की छूट दी थी। क्या इसकी कोई आवश्यकता थी? यह मानना होगा कि दो धर्म क्रमश: इस्लाम और ईसाई धर्म के मानने वालों की तरफ से लगातार यह प्रयास होते रहते हैं कि अन्य धर्मों के लोग भी येन-केन-प्रकारेण किसी भी लालच में उनके धर्म का हिस्सा बन जाएं। यह कठोर सत्य है। इससे कोई इंकार नहीं कर सकता है। इस मसले पर देश में बार-बार बहस भी होती रही है और आरोप भी लगते रहे हैं कि इन धर्मों के ठेकेदार लालच या प्रलोभन देकर गरीब आदिवासियों, दलितों वगैरह को अपना अंग बनाने की फिराक में लगे ही रहते हैं। बेशक, भारत में ईसाई धर्म की तरफ से शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में ठोस और ईमानदारी से काम भी किया गया है। पर उस सेवा की आड़ में धर्मांतरण ही मुख्य लक्ष्य रहा है। मदर टेरेसा पर भी धर्मांतरण करवाने के अकाट्य आरोप लगे हैं। उधर, इस्लाम का प्रचार करने वाले बिना कुछ कहे ही धर्मांतरण करवाने के मौके लगातार खोजते हैं। हालांकि मुसलमानों के अंजुमन इस्लाम ने भी शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया है। यह मुंबई में सक्रिय है। अब आप देखें कि आर्य समाज, सनातन धर्म सभी और सिखों की तरफ से देश में सैकड़ों स्कूल, कॉलेज, अस्पताल वगैरह चल रहे हैं। पर इन्होंने किसी ईसाई या मुसलमान को कभी धर्मातरण करवाने का कभी प्रयास नहीं किया। एक छोटा सा उदाहरण और देना चाहूंगा। एमडीएच नाम की मसाले बनाने वाली कंपनी के संस्थापक महाशय धर्मपाल गुलाटी को सारा देश जानता है। वे पक्के आर्य समाजी हैं। महाशय जी पूरी दुनिया में किंग आॅफ स्पाइस माने जाते है। वे देश की राजधानी में एक अस्पताल और अनेक स्कूल चलाते है। कोई बता दें कि उन्होंने कभी किसी गैर-हिंदू को हिंदू धर्म से जोड़ने की कोशिश भी की हो। खैर, धर्म परिवर्तन केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनियाभर में एक जटिल मसला रहा है। इस पर लगातार बहस होती रही है। यह समझने की जरूरत है कि मोटा-मोटी संविधान कहता है कि कोई भी अपनी मर्जी से अपना धर्म बदल सकता है, यह उसका निजी अधिकार है। पर किसी को डरा-धमका या लालच देकर जबरदस्ती या लब जिहाद करके धर्म परिवर्तन नहीं करा सकते। संविधान संशोधन के द्वारा धर्मप्रचार को रोकना सम्भव तो है। पर यह देखना चाहिए कि धर्म के नाम पर बवाल किस वजह से हुआ? यदि धर्म प्रचार की वजह से हुआ है तो किन लोगों की वजह से हुआ है? एक राय यह भी है कि भारत में उन धर्मों के प्रचार की स्वतंत्रता होनी ही चाहिए जिनका उदय भारत भूमि पर हुआ है। जैसे हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध। अगर यह धर्म अपनी जन्म भूमि पर भी अधिकार खो देंगे तो यह तो उनके साथ बड़ा अन्याय होगा। समस्या का मूल कारण इस्लाम और ईसाई हैं। इस्लाम और ईसाइयत को छोड़ दें तो बाकी धर्मो के बीच कोई आपसी विवाद नहीं है। यदि सभी धर्म प्रतिबंधित हों जिनमे हिन्दू धर्म और उससे निकले दूसरे धर्म भी शामिल होंगे तो यह गेंहूं के साथ घुन पिसने जैसी बात हो जायेगी। हां केवल इस्लाम और ईसाइयत का धर्म प्रचार प्रतिबन्धित हों तो युक्ति सांगत लगता है। आगे बढ़ने से पहले पारसी धर्म की भी बात करना सही रहेगा। यह भी भारत की भूमि का धर्म नहीं है। यह भारत में इस्लाम और ईसाइयत की तरह से ही आया है। लेकिन, पारसियों ने भारत में अपने धर्म के प्रसार-प्रचार की कभी चेष्टा तक नहीं की। भारत में टाटा,गोदरेज,वाडिया जैसे बड़े उद्योगपति हैं। इन समूहो में लाखों लोग काम करते हैं। ये देश के निर्माण में लगे हुए हैं। सारा देश इनका आदर करता है। इनसे तो किसी को कोई मसला नहीं रहा। इस बीच, धर्म की अवधारणा से भिन्न है मजहब का ख्याल। धर्म का तात्पर्य मुख़्यत: कर्तव्य से है जबकि मजहब की अवधारणा किसी विशिष्ट मत को मानने से है। इसमें किसी किताब में दर्ज शब्दों के अक्षरश: पालन की अपेक्षा की जाती है। किताबिया मजहब जो मानते हैं उन्हें वैसा ही मानते रहने की आजादी बेशक बनी रहे कोई हर्ज नहीं, जैसे कोई सोते रहने की आजादी का तलबगार है, जागना नहीं चाहता, उसे सुख से सोने दीजिए। मगर दूसरों से यह कहने का अधिकार कि सत्य का ठेकेदार वही है, असंवैधानिक घोषित होना ही चाहिए। मतलब मजहबी प्रचार पर रोक लगाने पर बहस हो जाए और इस पर एक कानून बन जाये तो क्या बुराई है। एक बार इस तरह की व्यवस्था हो जाए तो यह भी पता चल जाएगा कि शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में कितने लोग निस्वार्थ भाव से काम कर रहे हैं और कितने सवा के नाम पर धर्म परिवर्तन में लगे हैं।
एबीएन डेस्क, रांची। यह सही है कि बीते एक दो सप्ताह में देश के शहरी इलाकों में हालात कुछ सुधरे हैं लेकिन ज्यादातर हिस्सों में अभी भी चिकित्सा की दृष्टि से बहुत खराब स्थितियां बनी हुई हैं। ऐसे में हम क्या कर सकते हैं? समस्या के हल का एक तरीका यह है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पास मौजूद भारी भरकम मुद्रा भंडार का इस्तेमाल किया जाए। इस भंडार की सहायता से न केवल सूक्ष्म-वित्त संकट से निपटा जा सकता है बल्कि चिकित्सकीय संकट समेट किसी भी संकट में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन कैसे? देश में अभी भी कोविड-19 से निपटने के लिए विभिन्न प्रकार की वस्तुओं की आपूर्ति आवश्यक है। इन वस्तुओं में आॅक्सीजन, आॅक्सीजन सिलिंडर, आॅक्सीजन कंसन्ट्रेटर, कामचलाऊ अस्पताल और नर्सिंग होम तथा खासतौर पर गहन चिकित्सा इकाई, विभिन्न दवाएं, तरह-तरह के चिकित्सकीय उपकरण और टीकों की आवश्यकता है ताकि देश में इस महामारी के प्रसार और गंभीरता पर लगाम लगाई जा सके। हमारी समस्या है तत्काल जरूरी चीजों की घरेलू उपलब्धता न हो पाना। एक देश के रूप में हमारी समस्या यह नहीं है कि हम जरूरी आयात के लिए भुगतान नहीं कर पा रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि आरबीआई के पास मुद्रा भंडार की कोई कमी नहीं है। और चूंकि आरबीआई का संबंध भारत सरकार से है इसलिए वह मामले को पूरी तरह राज्य सरकारों पर भी नहीं छोड़ सकती है। केंद्रीय बैंक की बैलेंस शीट के संदर्भ में भंडार शब्द का इस्तेमाल दो तरह से किया जा सकता है। पहला, इसके एक हिस्से को विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में बरता जा सकता है तो दूसरी ओर पूंजी भंडार होता है जो प्रभावी तौर पर बैलेंस शीट की देनदारियों की ओर इक्विटी पूंजी के अतिरिक्त होता है। ये भंडार बचे हुए मुनाफे को एकत्रित करने से बनते हैं। आरबीआई प्राय: फॉरेक्स रिजर्व और घरेलू सरकारी बॉन्ड में इनका पुनर्निवेश करता है। मौजूदा हालात में दोनों तरह के भंडारों का इस्तेमाल करने की आवश्यकता है। यह कैसे हो? इसके मॉडल बहुत साधारण हैं। इस वर्ष आरबीआई की ओर से भारत सरकार को असाधारण लाभांश चुकाने दीजिए। इससे आरबीआई का पूंजी भंडार कम होगा और उसके साथ सरकार का नकदी संतुलन बेहतर होगा। भारत सरकार इस फंड को आरबीआई से विदेशी मुद्रा हासिल करने में व्यय कर सकती है और इसे आयात पर खर्च कर सकती है ताकि घरेलू जरूरतों को तत्काल पूरा किया जा सके। अंतत: इससे आरबीआई की बैलेंसशीट में दो बदलाव आएंगे। पहला तो यह कि परिसंपत्ति के मोर्चे पर विदेशी मुद्रा भंडार कम होगा जबकि दूसरा यह कि देनदारी के मोर्चे पर पूंजी भंडार में कमी आएगी। ध्यान रहे कि यहां दिए गए नीतिगत सुझाव के परिणामस्वरूप आरबीआई और भारत सरकार के नकदी संतुलन में कोई परिवर्तन नहीं आएगा। शुरूआत में इसमें इजाफा होगा लेकिन आगे चलकर गिरावट भी देखने को मिलेगी। आरबीआई के साथ बैंकर्स जमा, मुद्रा, राजकोषीय घाटे या आरबीआई के पास मौजूद सरकारी बॉन्ड पर भी इसका कोई असर देखने को नहीं मिलेगा। इसी प्रकार अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों पर भी शायद ही कोई असर हो। विनिमय दर भी इससे अप्रभावित रहेगी क्योंकि विदेशी विनिमय की आपूर्ति और मांग दोनों में इजाफा होगा। आरबीआई का विदेशी मुद्रा भंडार 7 मई, 2021 को 589.465 अरब डॉलर के विशाल स्तर पर था। इस संदर्भ में देखें तो विदेशी मुद्रा भंडार की तुलना में अल्पावधि के बाहरी ऋण का अनुपात दिसंबर 2020 में पहले ही घटकर 17.7 फीसदी हो चुका है। विदेशी मुद्रा भंडार के भारी आकार में मौजूद होने के कारण भारत इसमेंं जब चाहे तब कमी कर सकता है। वैसे भी मौजूदा हालात में हमें संकट से निपटने के लिए बहुत अधिक विदेशी मुद्रा भंडार की जरूरत नहीं है। आरबीआई के भंडार के एक हिस्से का उपयोग करके ऐसा किया जा सकता है। अब बात करते हैं उस हिस्से की जिसे आरबीआई ने इस संदर्भ में अन्य देनदारियां एवं प्रावधान करार दिया है। नाम से ऐसा लगता है कि यह भंडार इसलिए सुरक्षित रखा गया है क्योंकि आरबीआई की परिसंपत्तियों की कीमत में उतार-चढ़ाव आ सकता है। बहरहाल ऐसा अंकेक्षण पूरी तरह सही नहीं होता है क्योंकि आरबीआई के पास संरक्षित विदेशी मुद्रा और सोने का मूल्यांकन न केवल कीमतों में अल्पकालिक उछाल का परिचायक है बल्कि यह लंबी अवधि के दौरान धारित विदेशी मुद्रा और सोने के मूल्य मेंं कम स्थायी बढ़ोतरी का भी द्योतक है। आरबीआई द्वारा उल्लिखित तथाकथित अन्य देनदारी और प्रावधान मेंं 30 जून 2020 को 15,61,621 करोड़ रुपये की राशि थी। यह राशि आरबीआई की कुल परिसंपत्तियों के 28.43 प्रतिशत के बराबर है। यह सेंट्रल विस्टा परियोजना के लिए आवंटित राशि का 78 गुना और एसीसी बैटरी स्टोरेज के विनिर्माण के लिए मंजूर पीएलआई योजना के लिए मंजूर राशि का 86 गुना है। इस बात की तत्काल आवश्यकता है कि आरबीआई की बैलेंस शीट में भारी भरकम प्रावधान को कम किया जाए। यदि हम किसी अन्य क्षेत्र में सार्वजनिक व्यय में कमी नहीं कर सकते तो हमें इस मोर्चे पर कटौती करनी होगी।
एबीएन डेस्क, रांची। यह सही है कि बीते एक दो सप्ताह में देश के शहरी इलाकों में हालात कुछ सुधरे हैं लेकिन ज्यादातर हिस्सों में अभी भी चिकित्सा की दृष्टि से बहुत खराब स्थितियां बनी हुई हैं। ऐसे में हम क्या कर सकते हैं? समस्या के हल का एक तरीका यह है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पास मौजूद भारी भरकम मुद्रा भंडार का इस्तेमाल किया जाए। इस भंडार की सहायता से न केवल सूक्ष्म-वित्त संकट से निपटा जा सकता है बल्कि चिकित्सकीय संकट समेट किसी भी संकट में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन कैसे? देश में अभी भी कोविड-19 से निपटने के लिए विभिन्न प्रकार की वस्तुओं की आपूर्ति आवश्यक है। इन वस्तुओं में आॅक्सीजन, आॅक्सीजन सिलिंडर, आॅक्सीजन कंसन्ट्रेटर, कामचलाऊ अस्पताल और नर्सिंग होम तथा खासतौर पर गहन चिकित्सा इकाई, विभिन्न दवाएं, तरह-तरह के चिकित्सकीय उपकरण और टीकों की आवश्यकता है ताकि देश में इस महामारी के प्रसार और गंभीरता पर लगाम लगाई जा सके। हमारी समस्या है तत्काल जरूरी चीजों की घरेलू उपलब्धता न हो पाना। एक देश के रूप में हमारी समस्या यह नहीं है कि हम जरूरी आयात के लिए भुगतान नहीं कर पा रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि आरबीआई के पास मुद्रा भंडार की कोई कमी नहीं है। और चूंकि आरबीआई का संबंध भारत सरकार से है इसलिए वह मामले को पूरी तरह राज्य सरकारों पर भी नहीं छोड़ सकती है। केंद्रीय बैंक की बैलेंस शीट के संदर्भ में भंडार शब्द का इस्तेमाल दो तरह से किया जा सकता है। पहला, इसके एक हिस्से को विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में बरता जा सकता है तो दूसरी ओर पूंजी भंडार होता है जो प्रभावी तौर पर बैलेंस शीट की देनदारियों की ओर इक्विटी पूंजी के अतिरिक्त होता है। ये भंडार बचे हुए मुनाफे को एकत्रित करने से बनते हैं। आरबीआई प्राय: फॉरेक्स रिजर्व और घरेलू सरकारी बॉन्ड में इनका पुनर्निवेश करता है। मौजूदा हालात में दोनों तरह के भंडारों का इस्तेमाल करने की आवश्यकता है। यह कैसे हो? इसके मॉडल बहुत साधारण हैं। इस वर्ष आरबीआई की ओर से भारत सरकार को असाधारण लाभांश चुकाने दीजिए। इससे आरबीआई का पूंजी भंडार कम होगा और उसके साथ सरकार का नकदी संतुलन बेहतर होगा। भारत सरकार इस फंड को आरबीआई से विदेशी मुद्रा हासिल करने में व्यय कर सकती है और इसे आयात पर खर्च कर सकती है ताकि घरेलू जरूरतों को तत्काल पूरा किया जा सके। अंतत: इससे आरबीआई की बैलेंसशीट में दो बदलाव आएंगे। पहला तो यह कि परिसंपत्ति के मोर्चे पर विदेशी मुद्रा भंडार कम होगा जबकि दूसरा यह कि देनदारी के मोर्चे पर पूंजी भंडार में कमी आएगी। ध्यान रहे कि यहां दिए गए नीतिगत सुझाव के परिणामस्वरूप आरबीआई और भारत सरकार के नकदी संतुलन में कोई परिवर्तन नहीं आएगा। शुरूआत में इसमें इजाफा होगा लेकिन आगे चलकर गिरावट भी देखने को मिलेगी। आरबीआई के साथ बैंकर्स जमा, मुद्रा, राजकोषीय घाटे या आरबीआई के पास मौजूद सरकारी बॉन्ड पर भी इसका कोई असर देखने को नहीं मिलेगा। इसी प्रकार अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों पर भी शायद ही कोई असर हो। विनिमय दर भी इससे अप्रभावित रहेगी क्योंकि विदेशी विनिमय की आपूर्ति और मांग दोनों में इजाफा होगा। आरबीआई का विदेशी मुद्रा भंडार 7 मई, 2021 को 589.465 अरब डॉलर के विशाल स्तर पर था। इस संदर्भ में देखें तो विदेशी मुद्रा भंडार की तुलना में अल्पावधि के बाहरी ऋण का अनुपात दिसंबर 2020 में पहले ही घटकर 17.7 फीसदी हो चुका है। विदेशी मुद्रा भंडार के भारी आकार में मौजूद होने के कारण भारत इसमेंं जब चाहे तब कमी कर सकता है। वैसे भी मौजूदा हालात में हमें संकट से निपटने के लिए बहुत अधिक विदेशी मुद्रा भंडार की जरूरत नहीं है। आरबीआई के भंडार के एक हिस्से का उपयोग करके ऐसा किया जा सकता है। अब बात करते हैं उस हिस्से की जिसे आरबीआई ने इस संदर्भ में अन्य देनदारियां एवं प्रावधान करार दिया है। नाम से ऐसा लगता है कि यह भंडार इसलिए सुरक्षित रखा गया है क्योंकि आरबीआई की परिसंपत्तियों की कीमत में उतार-चढ़ाव आ सकता है। बहरहाल ऐसा अंकेक्षण पूरी तरह सही नहीं होता है क्योंकि आरबीआई के पास संरक्षित विदेशी मुद्रा और सोने का मूल्यांकन न केवल कीमतों में अल्पकालिक उछाल का परिचायक है बल्कि यह लंबी अवधि के दौरान धारित विदेशी मुद्रा और सोने के मूल्य मेंं कम स्थायी बढ़ोतरी का भी द्योतक है। आरबीआई द्वारा उल्लिखित तथाकथित अन्य देनदारी और प्रावधान मेंं 30 जून 2020 को 15,61,621 करोड़ रुपये की राशि थी। यह राशि आरबीआई की कुल परिसंपत्तियों के 28.43 प्रतिशत के बराबर है। यह सेंट्रल विस्टा परियोजना के लिए आवंटित राशि का 78 गुना और एसीसी बैटरी स्टोरेज के विनिर्माण के लिए मंजूर पीएलआई योजना के लिए मंजूर राशि का 86 गुना है। इस बात की तत्काल आवश्यकता है कि आरबीआई की बैलेंस शीट में भारी भरकम प्रावधान को कम किया जाए। यदि हम किसी अन्य क्षेत्र में सार्वजनिक व्यय में कमी नहीं कर सकते तो हमें इस मोर्चे पर कटौती करनी होगी।
एबीएन डेस्क, रांची। पिछले पखवाड़े ईद का त्योहार बहुत बुरे समय में आया। देश महामारी से जूझ रहा है और हमारे चारों तरफ इतना दुख और कष्ट फैला हुआ है कि जश्न मनाने जैसा कोई भाव ही नहीं आता। सलमान खान अभिनीत फिल्म राधे ऐसे ही माहौल में रिलीज हुई। महामारी खत्म होने का इंतजार करने के बाद आखिरकार फिल्म को ओटीटी जी 5 पर रिलीज किया गया। आश्चर्य नहीं कि दर्शकों और आलोचकों ने इसकी जमकर आलोचना की। शायद फिल्म बुरी है लेकिन ओटीटी पर रिलीज करने से इसकी हालत और बिगड़ गई। राधे जैसी फिल्म ईद के सप्ताहांत पर रिलीज होकर खूब भीड़ बटोरती है। यह पुराने जमाने की सिंगल स्क्रीन फिल्मों जैसी है जहां दर्शक खूब शोरशराबा करते हैं। जब आप इसे 249 रुपये में ऐसे दर्शकों को बेचते हैं जिनकी पसंद नेटफ्लिक्स और एमेजॉन प्राइम वीडियो ने बदल दी है तो इसका नाकाम होना तय है। परंतु चूंकि यह सलमान खान की फिल्म है इसलिए इसे बड़ी तादाद में दर्शक मिलेंगे और विदेशों में रिलीज, टेलीविजन अधिकारों तथा जी के साथ हुए सौदे से यह न केवल लागत वसूल करेगी बल्कि पैसे भी कमाएगी। परंतु इसकी कमजोर रिलीज में न केवल देश का मिजाज बल्कि फिल्म उद्योग की कमजोरी भी रेखांकित होती है। गत वर्ष देश के सिनेमा राजस्व का दोतिहाई हिस्सा गंवाना पड़ा। महामारी के कारण सन 2019 के 19,100 करोड़ रुपये से घटकर यह 7,200 करोड़ रुपये रह गया। महामारी के कारण थिएटर सबसे पहले बंद हुए और सबसे बाद में खुले। टिकट बिक्री घटकर 40 करोड़ रुपये रह गई जो 2019 की तुलना में एक तिहाई से भी कम थी। इस आंकड़े में भी ज्यादातर पहली तिमाही से है जब लॉकडाउन नहीं लगा था। सात लाख लोगों को रोजगार देने वाले इस उद्योग के काम करने वाले लाखों दैनिक श्रमिकों का काम छूट गया। फिक्की-ईवाई की रिपोर्ट के अनुसार 1,000 से 1,500 सिंगल स्क्रीन थिएटर बंद हुए। मल्टीप्लेक्स भी अच्छी स्थिति में नहीं हैं। सिनेमाघर खुले ही थे कि दूसरी लहर ने तबाही मचा दी। अमेरिका के रीगल और एएमसी की तरह अगर भारत में भी कुछ मल्टीप्लेक्स शृंखला बंद होती हैं तो आश्चर्य नहीं। पूरे भारत का टीकाकरण होने में कम से कम एक वर्ष लगेगा। केवल तभी सिनेमाघर पूरी तरह खुल सकेंगे। इस पूरी प्रक्रिया में वे ही सबसे अहम हैं। बिना सिनेमा घरों के भारतीय सिनेमा दोबारा खड़ा नहीं हो सकता। सन 2019 में भारतीय फिल्मों की 19,100 करोड़ रुपये की आय में 60 फीसदी भारतीय थिएटरों से आई। किसी फिल्म को थिएटर में कैसी शुरुआत मिलती है, इससे ही तय होता है कि टीवी, ओटीटी और विदेशों में उसकी कैसी कमाई होगी। सन 2019 एक अच्छा वर्ष था और उस वर्ष प्रसारकों ने फिल्म अधिकारों के लिए 2,200 करोड़ रुपये खर्च किए जो कुल कारोबार का 12 फीसदी था। प्रसारक नेटवर्क को इससे 7,700 करोड़ रुपये का विज्ञापन राजस्व मिला। परंतु प्रसारक टीवी को यह कमाई तभी होती है जब फिल्म का प्रदर्शन थिएटर में अच्छा हो। ये दोनों माध्यम आम जनता से संबद्ध हैं। अगर थिएटर पूरी तरह नहीं खुले तो यह पूरी व्यवस्था काम नहीं करेगी। डिजिटल या ओटीटी माध्यम 60 फीसदी कारोबार की जगह नहीं ले सकते। ध्यान रहे गत वर्ष फिल्मों का डिजिटल राजस्व दोगुना हो गया लेकिन कारोबार फिर भी 60 फीसदी कम रहा। ऐसा लगता है कि लोग भी थिएटरों में वापस जाना चाहते हैं। मास्टर (तमिल), ड्रैकुला सर या चीनी (बांग्ला), जाठी रत्नालू (तेलुगू), कर्णन (तमिल), द प्रीस्ट (मलयालम) आदि फिल्मों ने सन 2020 में और 2021 के आरंभ में बॉक्स आॅफिस में अच्छा प्रदर्शन किया। सवाल यह है कि अगर तेलुगू, तमिल या मलयालम फिल्मों का प्रदर्शन अच्छा है तो राधे को पहले क्यों नहीं रिलीज किया गया? क्योंकि हिंदी रिलीज पूरे देश में होती है। यह जरूरी होता है कि कई राज्यों में फिल्म रिलीज हो। कुल राजस्व का 40-50 फीसदी हिस्सा केवल दिल्ली और मुंबई से आता है। विदेशों से भी बहुत राजस्व मिलता है। जबकि तमिल फिल्म केवल तमिलनाडु में और तेलुगू फिल्म तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में रिलीज होती है। प्रोड्यूसर्स गिल्ड आॅफ इंडिया के अध्यक्ष सिद्धार्थ राय कपूर कहते हैं कि ये फिल्में केवल राज्य विशेष में चलती हैं। ऐसे में हिंदी ही फिल्म राजस्व का सबसे बड़ा हिस्सा लाती है। जब तक महामारी समाप्त नहीं होती बड़े पैमाने पर हिंदी रिलीज मुश्किल है। दुनिया भर में अवेंजर्स, मिशन इंपॉसिबल या बॉन्ड शृंखला की फिल्मों में यह ताकत है कि वे दर्शकों को सिनेमाहॉल में खींच सकें। यह बात भारत के लिए भी सही है। बाहुबली (तेलुगू, तमिल), केजीएफ (कन्नड़), वार (हिंदी) या सोरारी पोत्रु (तमिल) जैसी फिल्मों के लिए दर्शक थिएटर जाएंगे जबकि सीयू सून अथवा जोजी (मलयालम) अथवा रामप्रसाद की तेरहवीं (हिंदी) जैसी फिल्में ओटीटी मंच के लिए हैं। यानी टीकाकरण के अलावा थिएटरों में बड़ी और शानदार फिल्मों की जरूरत होगी ताकि हालात सामान्य हो सकें। ऐसा होता नहीं दिखता। धर्मा प्रोडक्शन के सीईओ अपूर्व मेहता कहते हैं, फिल्म अनुबंध का कारोबार है। इसमें कई लोग लंबे समय तक एक साथ काम करते हैं और सावधानी बरतनी होती है। हम इस माहौल में 200-300 करोड़ रुपये की फिल्म की योजना नहीं बना सकते। यही कारण है कि हम ऐसी फिल्में बना रहे हैं जिनका बजट कम हो। यानी कारोबारी एक दुष्चक्र में फंस गया है जो तभी समाप्त होगा जब शूटिंग और बाहरी शेड्यूल शुरू हो। ऐसा शायद 2022 के अंत में या 2023 में हो। अभी कुछ कहना मुश्किल है कि तब हालात कैसे होंगे। बात केवल बड़े सितारों की नहीं है। यह हजारों लेखकों, तकनीशियनों, सहायक कलाकारों, स्टूडियो में काम करने वालों की भी बात है। हालांकि औद्योगिक संगठन और व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास जारी हैं लेकिन हिंदी, मलयालम, तमिल, बांग्ला आदि अनेक क्षेत्रों के सिनेमा से जुड़े लोग अपना पेशा बदल चुके हैं। कारोबार शायद समाप्त न हो लेकिन संभव है यह अपने पुराने दिनों की छाया भर रह जाए।
एबीएन डेस्क, रांची। औषधि एवं सुगंध वाले पौधों के साथ ही जड़ी-बूटियों की वाणिज्यिक उपज भी भारतीय कृषि की एक आकर्षक शाखा के तौर पर उभर रही है। पारंपरिक स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र को आपूर्ति के लिए अमूमन जड़ी-बूटियों को जंगलों से इकट्ठ किया जाता रहा है। फार्मा उद्योग एवं सौंदर्य प्रसाधन क्षेत्र को भी ये जड़ी-बूटियां जंगलों से ही इक_ा कर भेजी जाती रही हैं। लेकिन इन औषधीय पौधों का प्राकृतिक आवास काफी हद तक अतिक्रमण का शिकार हो चुका है। यानी परंपरागत तरीकों से इन जड़ी-बूटियों की आपूर्ति घरेलू एवं निर्यात बाजार की मांग के अनुरूप नहीं की जा सकती है। लिहाजा उनकी वाणिज्यिक खेती का ही तरीका बच जाता है। खास तरह की यह खेती काफी हद तक मांग पर आधारित है और खुद सरकार भी राष्ट्रीय आयुष मिशन जैसे अभियानों के जरिये इसे प्रोत्साहन दे रही है। आयुष मिशन के तहत आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध एवं होम्योपैथी चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखा गया है। इन चारों इलाज पद्धतियों को ही संक्षिप्त रूप से आयुष का कूटनाम दिया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का अनुमान है कि दुनिया की करीब दो-तिहाई आबादी अब भी आंशिक या पूर्ण रूप से इलाज की इन पारंपरिक पद्धतियों पर ही आश्रित है। पारंपरिक दवाओं के साथ आधुनिक दवाओं के लिए भी करीब 80 फीसदी कच्चा माल इन जड़ी-बूटियों से ही आता है। जड़ी-बूटी वाले औषधीय उत्पादों का सालाना कारोबार घरेलू बाजार में करीब 8,000-9,000 करोड़ रुपये और निर्यात बाजार में करीब 1,000 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। इस साल इन आंकड़ों में खासी उछाल आती हुई दिख रही है। इसका कारण यह है कि कोविड-19 महामारी के दौरान प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मददगार बताई जा रही इन औषधियों की मांग बहुत तेजी से बढ़ी है। देसी काढ़ा जैसे औषधीय मिश्रण में इस्तेमाल होने वाली तुलसी, दालचीनी, सूखी अदरक एवं काली मिर्च की इन दिनों पुरजोर मांग है। आयुष मंत्रालय ने कोविड से हल्के स्तर पर पीड़ित लोगों के इलाज में मददगार दवा आयुष-64 एवं सिद्ध उत्पाद कबासुर कुडिनीर के वितरण के लिए हाल ही में देशव्यापी अभियान हाल ही में शुरू किया है। मंत्रालय ने भारतीय चिकित्सा एवं अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के साथ मिलकर आयुष-64 दवा के क्लिनिकल परीक्षण कई जगहों पर करवाए हैं। इसी तरह कबासुर कुडिनीर का परीक्षण केंद्रीय सिद्ध अनुसंधान परिषद ने किया है। हरियाणा सरकार ने आयुर्वेदिक विशेषज्ञों से सलाह की 24 घंटे वाली टेली-कॉन्फ्रेंसिंग सेवा भी शुरू की है ताकि कोविड-19 संक्रमितों को अस्पताल ले जाने की नौबत न आए। कई स्वैच्छिक संगठन भी योग एवं स्वदेशी चिकित्सा पद्धतियों के बारे में ऐसी ही परामर्श सेवाएं मुहैया करा रहे हैं। इनका मकसद यही है कि कोविड-19 संक्रमण को शुरूआती दौर में ही संभाल लिया जाए। कई होम्योपैथी डॉक्टर भी इस जानलेवा बीमारी के लक्षणों के इलाज में सफलता मिलने का दावा कर रहे हैं। कोविड की निरोधक दवाओं के तौर पर आर्सेनिक एल्ब, इन्फ्लुएंजियम एवं कैम्फर जैसी कुछ होम्योपैथी दवाओं की मांग हाल में खूब बढ़ी है। भारत इस लिहाज से खुशकिस्मत है कि यहां चिकित्सकीय गुणों से युक्त एवं सुगंध वाले पौधों की काफी विविधता मौजूद है। इसके 15 कृषि-जलवायु क्षेत्रों में 17,000-18,000 पौधे पाए जाते हैं। इनमें से करीब 7,000 पौधों में बीमारियों का इलाज करने की क्षमता एवं अन्य वाणिज्यिक गुण पाए जाते हैं। लेकिन विडंबना ही है कि फिलहाल 960 से अधिक जड़ी-बूटियों का कारोबार नहीं हो पा रहा है। असल में, सिर्फ 178 पौधे ही साल भर में 100 टन से अधिक मात्रा में इस्तेमाल किए जाते हैं। इन औषधीय पौधों की मांग नहीं बल्कि कम उपलब्धता ही इनमें से कई पौधों के कम उपयोग के लिए आंशिक तौर पर जिम्मेदार है। इस बात को ध्यान में रखते हुए सरकार ने इन जड़ी-बूटियों की आपूर्ति बढ़ाने के लिए उन्हें प्रोत्साहन देना शुरू किया है। इसके लिए आयुष मिशन के तहत करीब 140 औषधीय पौधों को चिह्नित किया गया है। कच्चे माल के तौर पर इन जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करने वाले उद्योगों को इनकी खेती के प्रायोजन की अनुमति भी दे दी गई है। इसमें उद्योग कंपनियां उत्पादकों के साथ उपज खरीद का करार करती हैं। जड़ी-बूटियों की विशिष्ट खेती हमें राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, पंजाब, हरियाणा, छत्तीसगढ़, अरुणाचल प्रदेश और समूचे हिमालयी क्षेत्र में देखने को मिल रही है। कर्नाटक इस लिहाज से खास है कि इसकी व्यापक प्राकृतिक विरासत में 2,500 से भी अधिक चिकित्सकीय एवं सुगंधित पौधे पाए जाते हैं। अश्वगंधा, चंदन, लेमन ग्रास, चमेली, सिट्रोनेला एवं रजनीगंधा के अलावा कर्नाटक की जलवायु तुलसी, एलोवेरा, गुग्गल, श्रीफल (बेल) एवं स्टेविया (मीठी तुलसी) के लिए भी खासी अनुकूल है। भारत का हर्बल सौंदर्य उत्पाद उद्योग वर्ष 2017 से ही करीब 19 फीसदी की दर से वृद्धि कर रहा है और देश में औषधीय गुणों वाले पौधों की उपज बढ़ाने में इसकी भी अहम भूमिका रही है। भारत फूलों एवं दूसरे पादप स्रोतों की मदद से सुगंधित द्रव्य एवं इत्र बनाने में अग्रणी रहा है। सदियों पहले बनाए गए ये इत्र अब भी मांग में हैं और घरेलू एवं वैश्विक परफ्यूम ब्रांडों से मिलने वाली प्रतिस्पर्द्धा के बावजूद इनकी मांग कायम है। विज्ञापन एजेंसियां भी आॅर्गेनिक सौंदर्य एवं त्वचा देखभाल वाले उत्पादों के पक्ष में राय बनाने में मददगार साबित हो रही हैं। जड़ी-बूटियों की प्राथमिक मार्केटिंग काफी हद तक असंगठित ही होती है जिसमें न कोई नियमन है और न ही वह पारदर्शी होता है। स्थानीय स्तर पर लगने वाले हाट-बाजारों में उनकी खरीद-फरोख्त होती है और वहां बिचौलियों का दबदबा होता है। छोटे उत्पादकों एवं आदिवासी संग्राहकों का शोषण खूब होता है। इन गलत चीजों को दुरुस्त करने की जरूरत है ताकि जड़ी-बूटियों की खेती का तीव्र विकास हो सके। स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र एवं अन्य उद्योग भी एक हद तक इन पर आश्रित हैं।
एबीएन डेस्क। अगले सप्ताह नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद की शपथ लिए सात वर्ष पूरे हो जाएंगे। इस पूरी अवधि के बारे में काफी कुछ कहा जा सकता है लेकिन एक बात स्पष्ट है: तीन ऐसी चीजें जिन्होंने अतीत में अर्थव्यवस्था को बेपटरी किया है वे इस बार नदारद रही हैं। पहली, युद्ध। सन 1962-71 के बीच के तीन युद्धों के बाद कोई बड़ा युद्ध नहीं हुआ है। उन तीनों युद्धों की कीमत मुद्रास्फीति, मुद्रा संकट और मंदी के रूप में चुकानी पड़ी थी। मोदी के कार्यकाल में चीन के साथ हुए टकराव ने अर्थव्यवस्था पर असर नहीं डाला। सरकार हालात को लेकर आश्वस्त थी और उसने जीडीपी की तुलना में रक्षा आवंटन कम होने दिया। दूसरा जोखिम है सूखा, जो मोदी सरकार के शुरूआती दो वर्षों में पड़ा। कृषि क्षेत्र में मूल्यवर्द्धन के बावजूद 2014-16 में कमोबेश कोई वृद्धि नहीं हुई। बाद के वर्षों में से अधिकांश वर्षों में प्राय: 4 फीसदी से अधिक की वृद्धि दर दर्ज की गई। हालांकि यह वृद्धि ज्यादातर पशुपालन और मत्स्यपालन की बदौलत हासिल हुई, न कि फसली खेती से। तथ्य तो यह है कि कृषि और संबद्ध गतिविधियों में खेती की हिस्सेदारी और जीडीपी में भी कृषि की हिस्सेदारी कम हुई है। ऐसे में आर्थिक गतिविधियों पर सूखे का असर भी पहले जैसा नहीं रहा। सूखे वाले दो वर्षों में औसतन 7.5 फीसदी की आर्थिक वृद्धि दर्ज की गई जो मोदी के कार्यकाल के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनों में से है। अतीत में अर्थव्यवस्था को बेपटरी करने वाला तीसरा कारक था तेल। तेल की बढ़ती कीमतों के कारण सन 1981 और 1991 में दो बार (इससे पहले 1966 में युद्ध के बाद) देश को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से आपातकालीन ऋण लेना पड़ा। तेल कीमतों के कारण ही सन 2013 में देश को उन पांच अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया गया था जो अपने विकास के लिए विदेशी पूंजी पर कुछ ज्यादा ही निर्भर थे। मोदी पर तकदीर मेहरबान रही क्योंकि उनके पद संभालते ही तेल कीमतों में भारी कमी आई। उनके पद संभालने के पहले के दो वर्षों में यह दर जहां 110 डॉलर प्रति बैरल थी, वहीं तब से यह दर 60 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है। इससे कारोबारी संतुलन सुधरा, मुद्रास्फीति में कमी आई और सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर कर बढ़ाकर काफी नकदी बटोरी। दूसरे शब्दों में मोदी को किस्मत का साथ मिला। परंतु अब उनकी किस्मत का साथ छूट चुका है और प्रशासनिक चतुराई भी नदारद दिखती है। एक सदी में एक बार आने वाली महामारी ने एक वर्ष से अधिक समय में सरकार को एकदम भ्रमित कर दिया है। बड़े पैमाने पर लोगों की मौत हुई, बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ी है और अब एक वर्ष की भारी गिरावट के बाद सुधार की प्रक्रिया भी प्रभावित दिख रही है। अन्य देश भी नाकाम हुए लेकिन मोदी सरकार जिस प्रकार टीकों, जांच किट, आॅक्सीजन और अस्पताल में बिस्तरों के मामले में नाकाम रही है उसके कारण अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक में उसकी तीखी आलोचना हुई। प्रधानमंत्री की कामयाब छवि को नुकसान पहुंचा। जबकि 2016 में नोटबंदी के बाद ऐसी ही अफरातफरी के माहौल में आश्चर्यजनक रूप से वह इससे बचे रहे थे। परंतु अब उनकी छवि कमजोर पड़ चुकी है। आंकड़ों के मुताबिक महामारी की दूसरी लहर के चरम पर पहुंचने के बाद अब प्रशासन और अग्रिम पंक्ति में काम करने वालों को कुछ राहत मिली है। परंतु वैज्ञानिक तीसरी लहर की चेतावनी दे रहे हैं और वह लहर शायद आ चुकी है लेकिन दिख नहीं रही है। ग्रामीण इलाकों में आंकड़े सामने न आने के कारण तबाही का सही दृश्य सामने नहीं आ पा रहा। संक्रमण के मामले शायद जानबूझकर कम बताये जा रहे हैं। ऐसा चिकित्सा बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक क्षमता में कमी के कारण हो रहा है। यदि लोग दूरदराज इलाकों में बीमार पड़ें और उनकी मौत हो जाए। उन्हें बालू में दफन कर दिया जाए या नदी में बहा दिया जाए तो भला उनकी गिनती कौन रखेगा? कुछ आंकड़े बताते हैं कि सामान्य मृत्यु दर दोगुनी हो चुकी है। यानी मरने वालों की तादाद आधिकारिक आंकड़ों से कहीं अधिक हैं। मोदी की ताकत क्या है? यह है उनकी ईमानदार छवि। अब तक विपक्ष कोई भी भ्रष्टाचार मोदी या उनके मंत्रियों के उपर सिद्ध नहीं कर सका है। दूसरा खतरनाक मानसिकता भारतीय जनमानस का है जो ज्यादा इंतजार नहीं करता साथ ही विकास पर राजनीति सिर्फ कहने की बात है हर दल आज भी धर्म और जाति संप्रदाय की राजनीति ही कर रहा है ऐसे में मोदी का एजेंडा आज भी उतना ही मजबूत है। क्या मोदी इससे उबर सकते हैं? हां, अगर वे यह दिखाते हैं कि वे केबिन में छिपकर मशविरा देने के बजाय जहाज को तूफान से निकाल सकते हैं। मोदी और उनकी काम करने की शैली मजाक का विषय बन चुकी है। मुख्यमंत्री उन्हें मुंह पर जवाब दे रहे हैं, अदालतें और मीडिया मुखर हो गए हैं। इस समय देश का मिजाज भांपना मुश्किल है। देश क्रुद्ध है या हताश? जो भी हो, मोदी को प्रतिकूल हालात का सामना करना होगा। सात वर्ष बाद आपको बदलना होगा। निर्णय तेज लेने के साथ एक राजनीतिक चतुराई दिखानी होगी जिसमें सभी को साथ लेकर चलने की स्थिति दिखनी चाहिए। सत्ता को ऐन-केन प्रकारेन हासिल करने का उनका सपना पश्चिम बंगाल की चुनाव में टूट चुका है और इसके पहले भी जहां हमारे क्षेत्रप मजबूत हैं वहां मोदी को शिकस्त ही मिली है। केजरीवाल, जगनरेडडी, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक,स्टालिन से लेकर कांग्रेस के वधेल, अमरेन्दर सिंह और अशोक गहलौत ने भी क्योंकि मोदी समर्थन नहीं मानते की कांगे्रस में दम है तब उनके कुछ क्षेत्रिय नेताओं के दम को तो स्वीकारना ही होगा। ऐसा नहीं है कि मोदी की लोकप्रियता बनी ही रहेगी लेकिन जिन उम्मीदों को लेकर वे पीएम बने उसे पूरा करने का प्रयास ही उनके जीवन राजनीतिक सार्थकता की बेहतरीन पारी होगी। वैसे भारतीय राजनीति में मोदी से अधिक चर्चा और लोकप्रियता की उम्मीद भी नहीं की जानी चाहिए।
एबीएन डेस्क। सख्त दिशा-निर्देशों और नियमों को लागू कराने के सरकार और संतों के प्रयासों का नतीजा यह हुआ कि मेले में सामान्य उपस्थिति का अंश ही पहुंचा। सख्त दिशा-निदेर्शों और नियमों को लागू कराने के सरकार और संतों के प्रयासों का नतीजा यह हुआ कि मेले में सामान्य उपस्थिति का अंश ही पहुंचा। मेला अवधि के दौरान साइंटिफिक या डेटा आधारित दृष्टिकोण से अगर हम कोविड मामलों का आकलन करें तो यह साफ पता चलता है कि कुंभ ने दूसरी लहर को बढ़ाने में कोई भूमिका नहीं निभाई है। कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर काफी दुखद रही। पूरा राष्ट्र इस घातक वायरस के खिलाफ एक वीरतापूर्ण लड़ाई लड़ रहा है। यह भी सच है कि बड़ी संख्या में परिवारों को निजी नुकसान और भावनात्मक संकट का सामना करना पड़ा है। अब दुखों के कारणों का पता लगाना स्वभाविक है। ऐसे में हाल ही में हरिद्वार में संपन्न हुआ महाकुंभ मेला पूरे आरोप लगाने के लिए एक आसान लक्ष्य बन गया है, लेकिन क्या ऐसा करना सही है? आइए कुछ तथ्यों को जान लेते हैं। महा कुंभ मेला करोड़ों भक्तों के लिए हजारों साल पुराना एक धार्मिक और सांस्कृतिक समारोह है। यूं तो आमतौर पर मेला 12 साल के अंतराल में आयोजित होता है। फिर भी तिथि और समय पर अंतिम निर्णय ज्योतिष विज्ञान के आधार पर संत लेते हैं। इसी तरह यह तय किया गया कि हरिद्वार का महाकुंभ मेला 2021 में आयोजित होगा। लाखों लोगों की भक्ति का आह्वान करने वाले धार्मिक और सांस्कृतिक समारोहों का समाज में एक विशेष स्थान है। उदाहरण के तौर पर, जर्मनी में चांसलर एंजेला मार्केल ने ईस्टर के समारोह के लिए अपने लॉकडाउन के फैसले को वापस लिया था। वहीं, भारत में संतों ने अलग दृष्टिकोण रखा। पारंपरिक रूप से हरिद्वार कुंभ की अवधि चार महीने की होती है, जो जनवरी से अप्रैल तक चलती है। ऐसा ही पिछले महा कुंभ में भी रहा है। हालांकि, इस साल महामारी को देखते हुए खुद संतों ने अवधि को कम कर एक महीना करने का निर्णय लिया। इसके बाद मेला 1 से 30 अप्रैल तक चला। यह ऐसे समय में किया गया, जब पहली लहर लगभग कम हो चुकी थी। कुल मामले 10 हजार की रेंज में थे और जानकार अनुमान लगा रहे थे कि दूसरी लहर नहीं आएगी। इसके अलावा, जब अप्रैल में स्थिति इतनी जरूरी हो गई, तो माननीय प्रधानमंत्री की अपील पर मेले की अवधि को और कम कर दिया गया। मेले की अवधि के दौरान सरकार ने वायरस के प्रसार को रोकने और निगरानी के लिए कड़े नियम तय किए थे। सभी तीर्थयात्रियों का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया था। पिछले 72 घंटों में लिया गया एक नेगेटिव आरटी-पीसीआर टेस्ट भी प्रवेश के लिए अनिवार्य कर दिया गया था। 150 से ज्यादा स्थायी और मोबाइल सैनिटाइजेशन पॉइंट स्थापित किए गए। कुंभ में लगे सभी फ्रंटलाइन कर्मियों को टीका लगाया गया था और इसमें 2.18 लाख डोज का इस्तेमाल हुआ था। भीड़ ना हो, इस बात को सुनिश्चित करने के लिए कड़े यात्रा दिशानिर्देश जारी किए गए। मेला वाले क्षेत्र में अलग-अलग स्थानों पर रेंडम टेस्ट किए गए। इस दौरान करीब 10 लाख जांचें की गईं और पॉजिटिविटी रेशो केवल 1.49 फीसदी के आसपास था। सख्त दिशानिदेर्शों और नियमों को लागू कराने के सरकार और संतों के प्रयासों का नतीजा यह हुआ कि मेले में सामान्य उपस्थिति का अंश ही पहुंचा। एक उदाहरण के तौर पर इस साल 14 अप्रैल को महा संक्रांति पर हुए शाही स्नान में केवल 13.5 लाख श्रद्धालुओं ने पवित्र डुबकी लगाई। जबकि, 2010 में हुए शाही स्नान में यह संख्या 1.8 करोड़ थी। यह आंकड़ा 13 गुना से भी ज्यादा है। 2010 में हरिद्वार में हुए पिछले महाकुंभ में कुल उपस्थिति 4 करोड़ से ज्यादा की थी। 2019 में प्रयाग में हुए अर्ध कुंभ में 24 करोड़ श्रद्धालु पहुंचे थे। इसके विपरीत 2021 के हरिद्वार कुंभ में केवल 35 लाख लोग शामिल हुए। यह हिंदू समाज के इस पवित्र, समय प्राचीन अनुष्ठान को चुनौती के दौर में सीमित करने की प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है। मेला अवधि के दौरान साइंटिफिक या डेटा आधारित दृष्टिकोण से अगर हम कोविड मामलों का आकलन करें, तो यह साफ पता चलता है कि कुंभ ने दूसरी लहर को बढ़ाने में कोई भूमिका नहीं निभाई है। नीचे दिए गए नक्शे में उन जिलों का पता चलता है, जहां बीते 4 महीनों में रोज 100 से ज्यादा मामले सामने आ रहे थे। फरवरी और मार्च के नक्शे यह साफ तौर पर दिखाते हैं कि कैसे दूसरी लहर पश्चिमी भारत से उठी, जिसने पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया। कुंभ मेला अवधि के दौरान ही विशेष रूप से उडश्कऊ सकारात्मकता का विश्लेषण करते हैं। भारत के सभी क्षेत्रों के टियर-2 शहरों के साथ समान जिलों की हरिद्वार और देहरादून से तुलना की जाए, तो इससे यह पता चलता है कि कैसे दूसरी लहर कुंभ की शुरूआत से पहले ही देश के दूसरे हिस्सों में तबाही मचा रही थी। ठीक इसी समय दूरी पर मौजूद दक्षिण के जिलों में भी हरिद्वार और देहरादून की तरह ही पॉजिटिविटी ट्रेंड देखने को मिला। संत के तौर पर आमतौर पर हम नीति और वर्तमान की बातों पर सार्वजनिक तौर पर लिखने से बचते हैं, लेकिन बीते हफ्ते में हुई बातों ने मुझे यह लिखने के लिए मजबूर किया है। जिस तरह से कुंभ मेले को बदनाम किया गया है, उससे न सिर्फ मुझे बल्कि करोड़ों आम हिंदुओं को गहरा दुख पहुंचा है। हमारी सबसे प्रतिष्ठित परंपराएं राजनीतिक रस्साकशी का हिस्सा बन गई हैं, और वह भी कुछ पूर्व नियोजित टूल-किट के हिस्से के रूप में संतों और करोड़ों आम हिंदुओं ने ऐसा कौन सा अपराध किया है कि उन्हें अपने ही देश में इतना शमिंर्दा और अपमानित होना पड़ा है? भगवद् गीता प्रभु श्रीकृष्ण ने कहा है- तानहं द्विषत: क्रूरान्संसारेषु नराधमान।?? क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।। हम सामान्य नश्वर लोगों के रूप में ईश्वर से प्रार्थना करेंगे कि वह उन लोगों को क्षमा करें जो इस क्रूर कृत्य में शामिल थे। उनके पास आत्मनिरीक्षण करने और अपने आचरण पर चिंतन करने की बुद्धि भी हो।
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