एबीएन डेस्क, रांची। पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के प्रभारी रहे नेता जितिन प्रसाद के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने पर न तो कांग्रेस विचलित दिखी और न ही उसमें कोई बेचैनी देखने को मिली। तमिलनाडु के एक कांग्रेस सांसद कहते हैं, वह लगातार तीन चुनाव हारे। अंतिम चुनाव में तो उनकी जमानत तक जब्त हो गई। इसके बावजूद पार्टी ने उन्हें महत्त्वपूर्ण दायित्व सौंपा। उनका बाहर जाना बहुत बड़ी बात नहीं है। लेकिन उन्होंने कहा कि पार्टी के चिंतित होने की दूसरी बड़ी वजह है। वह पूछते हैं, मुकुल रॉय भाजपा से तृणमूल कांग्रेस में एक चुंबकीय शक्ति की वजह से लौटे। वह चुंबक हैं ममता बनर्जी। हमारा चुंबक कहां है? लगभग इसी समय पार्टी अध्यक्ष पद का चुनाव होना था (इसकी तय मियाद 30 जून तक थी)। कोविड-19 संकट के बीच यह कवायद अनियतकाल के लिए टाल दी गई और कांग्रेस कार्य समिति ने भी प्रक्रिया रोकने पर मुहर लगा दी। नेतृत्व परिवर्तन चाहने वाले कांग्रेस के 23 नेताओं के समूह की मुख्य मांग अब तक लंबित पड़ी है। समूह में शामिल एक पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा, हमें एक निर्वाचित कांग्रेस कार्य समिति की तत्काल जरूरत है, न कि मौजूदा की तरह नामित समिति की। हमने कभी अध्यक्ष को बदलने की बात नहीं की, हम केवल एक पूर्णकालिक नेतृत्व चाहते हैं जो दिखाई दे। यही कारण है कि पार्टी मनमाने निर्णयों की शिकार है और जवाबदेही पूरी तरह अनुपस्थित है। उदाहरण के लिए पार्टी सूत्रों का कहना है कि पश्चिम बंगाल में भारी हार के बावजूद किसी को जवाबदेह नहीं ठहराया गया। अधीर रंजन चौधरी अभी भी पीसीसी प्रमुख और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बने हुए हैं। एक साक्षात्कार में उन्होंने साफ कहा कि कांग्रेस की हार की एक वजह यह भी थी कि प्रचार अभियान में शीर्ष नेतृत्व अनुपस्थित था। उन्होंने कहा, दो रैलियों के बाद राहुल गांधीजी ने पश्चिम बंगाल आना बंद कर दिया क्योंकि कोविड के कारण हालात बिगड़ रहे थे। दूसरी ओर पार्टी नेता और केरल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रमेश चेन्निथला ने वीडी सतीशन को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने के बाद शिकायत की कि उन्हें पीठ पीछे पद से हटा दिया गया और शमिंर्दा किया गया। हालिया चुनाव के बाद विधानसभा में कांग्रेस के सदस्यों की तादाद कम हुई है। परंतु चेन्निथला पीसीसी प्रमुख नहीं थे, वह केवल नेता प्रतिपक्ष थे। उन्हें एक कद्दावर और प्रभावशाली कांग्रेस नेता माना जाता है जिसे कांग्रेस की राजनीति के मौजूदा दौर में अपने प्रतिद्वंद्वी उम्मेन चांडी का भी समर्थन हासिल है। चांडी ने नेता प्रतिपक्ष बने रहने के उनके दावे का समर्थन किया था। पार्टी पर्यवेक्षकों को इसमें राहुल गांधी के सहयोगी केसी वेणुगोपाल का हाथ नजर आता है जो स्वयं केरल से ताल्लुक रखते हैं। ठीक एक वर्ष पहले राजस्थान के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ बगावत का झंडा उठाया था और वह लगभग भाजपा में जाने ही वाले थे। यदि ऐसा होता तो गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार का गिरना तय था। हालात तब संभले जब उन्हें आश्वासन दिया गया कि उनकी चिंताओं को दूर किया जाएगा और उनके समर्थकों को मंत्रिपरिषद में जगह दी जाएगी। 10 महीने बाद अब पायलट दिल्ली में हैं और पार्टी से कह रहे हैं कि उनसे किए गए वादे निभाए जाएं। गहलोत मंत्रिमंडल में नौ जगह खाली हैं और पायलट उनमें से ज्यादातर मांग रहे हैं। जबकि खबरों के अनुसार गहलोत ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से कहा है कि वह स्वतंत्र विधायकों और उन अन्य लोगों की अनदेखी नहीं कर सकते जिन्होंने गत वर्ष पायलट की बगावत के समय उनका साथ दिया था। दूसरे शब्दों में कहें तो जुलाई 2020 का घटनाक्रम दोहराया जा सकता है। गहलोत को लगता है कि पार्टी के बाहर के लोग उनके प्रति पार्टी के लोगों से अधिक वफादार हैं। पायलट और उनके समर्थक इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे। कांग्रेस की राजस्थान इकाई के प्रमुख गोविंद सिंह डोटासरा ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा, पायलट कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं और पार्टी में कोई समस्या नहीं है। पार्टी के राजस्थान प्रभारी अजय माकन ने कहा है कि प्रदेश में जल्दी ही मंत्रिमंडल परिवर्तन होगा। परंतु हाल ही में एक सप्ताह से दिल्ली में डेरा डाले पायलट कहते हैं, 10 महीने बीत चुके हैं। मुझे यही कहा गया कि कदम उठाए जाएंगे लेकिन अब आधा कार्यकाल तो बीत चुका है और मुद्दे जस के तस हैं। बहुत खेद की बात है कि ढेर सारे पार्टी कार्यकर्ता जिन्होंने काम किया और जनादेश दिलाने में मदद की उनमें से अधिकांश की सुनवाई नहीं हो रही है। पंजाब का किस्सा भी ऐसा ही है। नेतृत्व परिवर्तन की मांग कर रहे नाराज नेता नवजोत सिंह सिद्धू के क्षेत्र अमृतसर में रातोरात ऐसे पोस्टर लग गए जिनमें उनकी मांग को खारिज करते हुए लिखा है: पंजाब दा इक ही कैप्टन यानी पंजाब का एक ही कैप्टन है। इन पोस्टर में मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह का जिक्र करते हुए लिखा है: हैशटैग कैप्टन फॉर 2022। इस बीच सिंह के प्रभाव वाले पटियाला में सिद्धू समर्थकों के पोस्टर नजर आए जिन पर लिखा है: सारा पंजाब सिद्धू दे नाल यानी सारा पंजाब सिद्धू के साथ और किसाना दी आवाज मांगदा है पंजाब गुरु दी बेअदबी दा हिसाब यानी किसानों की आवाज पंजाब गुरु की बेअदबी का हिसाब मांगता है। आलाकमान द्वारा नियुक्त राज्य सभा के नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खडगे के नेतृत्च वाली समिति जिसमें वरिष्ठ नेता जेपी अग्रवाल और पंजाब के प्रभारी महासचिव हरीश रावत शामिल हैं, वह अब तक दिक्कतों को दूर नहीं कर सकी है और न ही उसने रिपोर्ट सार्वजनिक की है। पंजाब में अगले वर्ष फरवरी/मार्च में चुनाव होने हैं। जी 23 के एक नेता कहते हैं, यह हालत उन राज्यों में है जहां हम सत्ता में हैं या मजबूत हैं। हमें सोचना होगा कि हम कहां जा रहे हैं।
एबीएन डेस्क, रांची। हमने जल को अमृत माना नदियों को भगवान का दर्जा दिया। पानी की महत्ता स्वीकार की। यानी हमें हर वह काम करना होगा जो करने की जरूरत है। वर्षा-जल की हरेक बूंद को जमा कर पानी की उपलब्धता बढ़ानी है, इसका इस्तेमाल इतने कारगर ढंग से करना है कि वर्षा-जल की हरेक बूंद का इस्तेमाल हमारे भोजन या फ्लश होने वाले पानी में हो। हमें यह भी सुनिश्चित करना है कि इस्तेमाल पानी की हरेक बूंद का पुनर्चक्रण हो और प्रदूषण से वह खराब न हो। हम यह बात पहले से जानते हैं और अमल में भी लाते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के दौर में इतना ही काफी नहीं होगा। हमें ये सारे काम कहीं अधिक तेजी से और व्यापक स्तर पर अलग ढंग से करने होंगे। हमें मालूम है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का ताल्लुक गर्मी और कम-ज्यादा बारिश से है। इन दोनों का जल चक्र से सीधा सह-संबंध है। इस तरह जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए पानी एवं उसके प्रबंधन पर ध्यान देना होगा। हमें पता है कि हर नया साल इतिहास का सर्वाधिक गरम साल बनता जा रहा है और पिछले रिकॉर्ड को तोड़ता जा रहा है। भारत में ओडिशा के कुछ हिस्सों में तापमान फरवरी की शुरूआत में ही 40 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया था। उत्तर भारतीय राज्य बढ़ती गर्मी एवं सामान्य से अधिक तापमान के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं। खास बात यह है कि यह सब ला नीना के साल में हो रहा है। ला नीना प्रशांत महासागर की वे जल धाराएं हैं जो दुनिया का तापमान कम करने के लिए जिम्मेदार मानी जाती हैं। लेकिन भारत के मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि वैश्विक ताप वृद्धि ने ला नीना के इस शीतकारी प्रभाव को कम कर दिया है। बढ़ती हुई गर्मी का जल सुरक्षा के लिहाज से कई मायने हैं। पहला, इसका मतलब है कि जल इकाइयों से अधिक वाष्पीकरण होगा। यानी हमें न सिर्फ लाखों जल निकायों में पानी जमा करने पर ध्यान देने की जरूरत है बल्कि वाष्पन के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए भी योजना बनानी होगी। एक विकल्प भूमिगत जल भंडारण यानी कुओं पर काम करने का है। भारत लंबे वक्त से भूमिगत जल प्रणालियों के प्रबंधन को कम तवज्जो देता रहा है क्योंकि सिंचाई विभाग की समूची अफसरशाही ही नहरों एवं अन्य सतही जल प्रणालियों पर आधारित है। लेकिन जलवायु परिवर्तन एवं पानी की भारी किल्लत के इस दौर में इसे बदलने की जरूरत होगी। हमें तालाबों, पोखरों एवं नहरों से होने वाले नुकसान की भरपाई के तरीके तलाशने होंगे। ऐसा नहीं है कि वाष्पीकरण से पहले नुकसान नहीं होता था लेकिन तापमान बढ?े के साथ इसकी दर बहुत ज्यादा हो गई है। हमें योजना बनाने और अधिक काम करने की जरूरत है। दूसरा, बढ़ती गर्मी का मतलब है कि मिट्टी में नमी कम होती जाएगी जिससे जमीन में धूल की मात्रा बढ़ जाएगी और सिंचाई की जरूरत बढ़ती जाएगी। भारत जैसे देश में जहां भोजन का बड़ा हिस्सा अब भी वर्षा-सिंचित इलाकों में ही पैदा होता है, वहां पर मिट्टी की नमी कम होने से भूमि अपरदन तेज होगा और धूल का बनना भी बढ़ जाएगा। जल प्रबंधन को वनस्पति नियोजन के साथ तालमेल बिठाकर चलना होगा ताकि मिट्टी में पानी को रोके रखने की क्षमता बेहतर हो, अधिक देर तक चलने वाली तीव्र गर्मी के दौर में भी। तीसरा, साफ है कि गर्मी बढ़ने से पानी का इस्तेमाल बढ़ जाएगा क्योंकि पीने एवं सिंचाई के साथ ही जंगलों या इमारतों में लगी आग बुझाने के लिए भी ज्यादा पानी की दरकार होगी। हम दुनिया के कई हिस्सों एवं भारत में भी जंगलों में भीषण आग लगने के डरावने दृश्य देख चुके हैं। तापमान जैसे-जैसे बढ़ता जाएगा, यह सिलसिला भी तेज होता जाएगा। जलवायु परिवर्तन से पानी की मांग बढ़ेगी लिहाजा यह और भी जरूरी हो जाता है कि हम पानी के साथ अपशिष्ट जल को भी बरबाद न करें। सच यह है कि अत्यधिक बारिश होने की बढ़ती घटनाओं के संदर्भ में भी जलवायु परिवर्तन का असर दिख रहा है। हम बारिश के एक बाढ़ के तौर पर आने की भी अपेक्षा करें। इस तरह बाढ़ों का एक चक्र पूरा होने के बाद सूखे की स्थिति और भी गंभीर हो। भारत में पहले से ही साल में बारिश कम दिन होती है। साल भर में औसतन सिर्फ 100 घंटे की ही बारिश होती है। लेकिन जलवायु परिवर्तन बारिश वाले दिनों की संख्या और कम करेगा। वैसे भारी बारिश वाले दिनों की संख्या बढ़ जाएगी। इसका जल प्रबंधन की हमारी योजनाओं पर बड़ा असर होगा। हमें बाढ़ प्रबंधन पर अधिक शिद्दत से गौर करने की जरूरत है, नदियों के तटबंध बनाने के साथ ही बाढ़ के पानी को भूमिगत एवं सतहीय जलभंडार निकायों-कुओं एवं तालाबों में जमा किया जा सके। लेकिन हमें वर्षाजल को इकट्ठा करने के बारे में अलग तरह से योजना बनाने की जरूरत है। फिलहाल मनरेगा के तहत लाखों की संख्या में बन रहे तालाब एवं पोखर सामान्य बारिश के हिसाब से डिजाइन हैं। लेकिन अब भारी बारिश की बात आम होने के साथ ही ये जल भंडार संरचनाओं को भी नए सिरे से डिजाइन करने की जरूरत है ताकि वे लंबे समय तक लबालब रहें। मूल बात यह है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में हमें पानी की हर बूंद बचानी होगी, चाहे बारिश का पानी हो या बाढ़ का पानी। हमें पानी एवं उसके प्रबंधन को लेकर पहले जुनूनी होना था लेकिन अब तो सेहत एवं दौलत के आधार पानी को लेकर हमें संकल्पित एवं सुविचारित रवैया अपनाना होगा। यह अपने भविष्य को बनाने- बिगाड़ने की बात है।
एबीएन डेस्क, रांची। संकट काल में ही सच्चे मित्र की पहचान होती है। जब कोरोना महामारी के दूसरे लहर से पूरा देश संकटग्रस्त है ऐेसे समय में चिकित्सकों से लेकर सारे मेडिकल स्टाफ के समर्पण और उनके दिन रात के प्रयास की सराहना हुयी। चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों के अलावा एक और तबके ने पिछले दो महिनों में इस त्रासदी में करोड़ो लोगों की मदद की और खुद अपनी जान देकर लोगों की जान बचायी। ये तबका उन पत्रकारों का था जो भयावह परिस्थिति में भी कमजोर ,वंचितों और लाचार लोगों की मदद किसी न किसी रूप में करते रहा। मीडिया पर यह आरोप तो लगते हैं कि इन्होंने चरम संक्रमण के वक्त इस तरह से कोरोना के भयावहता को परोसा कि लोगों में भय हताशा का संचार हुआ, पर इसके इतर एक दूसरा पक्ष भी है कि फिल्ड रिपोर्टरों के प्रयास उनके कवरेज के चलते त्वरित सरकारी मदद आवश्यक अस्पतालों तक पहुंचायी जा सकी। एक अनुभवी पत्रकार सिर्फ सतही खबरों का संदेशवाहक नहीं होता बल्कि खामियों के खिलाफ उसकी निर्भिकता और मुखरता बढ जाती है, उसकी बातें सुनी जाती है। बहुतों की नजर में यह रसूखदार होना लगता है, पर कोराना संकट में इस कथित रसूख का एक धवल पक्ष दिखा। मैने देखा कि कई कमजोर और लाचार लोगों के लिये अस्पताल में बेड, आॅक्सीजन, वेंटिलेटर, दवा तक की उपलब्धता पत्रकारों की मुखरता के कारण ही हुयी। पत्रकारों ने अपनी जान जोखिम में डाल कर हताश निराश लोगों को चिकित्सा सुविधायें उपलब्ध करवायी। यहां तक कि कुछ निजि अस्पतालों ने बीमार संक्रमित लोगों से लाखो रुपए इलाज के नाम पर ले लिये। पत्रकारों को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया और इन निजी अस्पतालों को पैसे वापस तक करने पड़े। जिन कुछेक अस्पतालों में आॅक्सीजन सिलिंडर से लेकर, दवाओं की कालाबाजारी और जमाखोरी हो रही थी उसे भी इन्होंने उजागर किया और प्रशासन को इस पर नकेल कसनी पड़ी। मैंने देखा कि रांची में परेशान कोरोना मरीजों के परिजन पत्रकारों को ही मदद की उम्मीद में फोन लगा रहे थे। एक नजर में यह पहुंच पैरवी सी हरकत लग सकती है। दूसरा पक्ष है कि पत्रकारों से इलाज में मदद के लिये आस लगाने वालों में ज्यादतर निरीह और आम हताश लोग ही थे और प्रेस लॉ पत्रकारों को अलग से कोई कानूनी शक्ति नहीं देता। यह सद्प्रयास पत्रकारों पत्रकारों की पेशागत मददगार फितरत का नतीजा रहा। इन सबके बीच सबसे भी दुखद कि सिर्फ झारखंड में ही तीस से ज्यादा पत्रकारों को कोरोना ने हमसे छीन लिया। सोंचिये ये पत्रकार चाहते तो हम आप की तरह घर में छुपे रह कर अपनी जान भी बचा सकते थे। लेकिन इन्होंने ऐसा नहीं किया। दिल्ली के टीवी चैनल के प्रसिद्ध पत्रकार रोहित सरदाना से लेकर रांची प्रेस क्लब के सुनील सिंह सहित झारखंड में ही दर्जनों युवा पत्रकारों का पत्रकारिता जगत से चला जाना बहुत पीड़ादायी है। इसकी भरपाई कहीं से भी संभव नहीं है, पर इससे भी दुखद है कि पत्रकारों के इस योगदान को अनदेखा किया गया। कुछेक राज्यों में पत्रकारों को कोरोना वॉरियर बता कर उनकी आर्थिक मदद की घोषणा की गयी, । मीडिया पर सैकड़ो आरोप भी लगते हैं, पर यह हकीकत है कि आज भी आम जन सच्चाई के लिये, दबाये जा रहे तथ्यों और वाकयों को जानने के लिये, घोर संकट में अपनी बात को उचित मंच पर पहुंचाने के लिये पत्रकारों पर ही भरोसा रहता है। मैने पत्रकारिता के छात्रों को अपने विभाग में देखा है कि जैसे-जैसे पुराने होते जाते हैं उनकी सोच व्यापक होने लगती है। अवश्य ही इस पेशे में कुछ ऐसा है जो फितरतन पत्रकारों को वंचितो और आम लोगों की आवाज बना देती है। अपने कार्य में खुद कई तरह के तनाव झेलने वाले, आरोपों से हलकान और अक्सर आर्थिक संकट के पीड़ा व्यथा को चुपचाप सहने वाले पत्रकार कोरोना संकट में भी वंचितों और जरूरतमंदों के मददगार बने, शहीद भी हुये, पर अफसोस उनके कार्यों को कमतर करके आंका गया। आलोचना का एक सिद्धांत है कि सदैव मुखर की ही आलोचना होती है। आज मीडिया में श्रेष्ठ का ही चयन किया जाएगा उसे ही सुना जाएगा और समझा जाएगा। आम लोगों के मंच पर पत्रकारों की सूचनाधर्मिता अन्य प्रोफेशन से अलग है। इस कोरोना काल में हर एक मौत के साथ बचें जीवन की पूरी धारदार और प्रमाणिक सूचना देकर जीवन बचाने का काम किया। चाहे आॅक्सीजन की कमी की बात हो या वैक्सीन की कठिनाई की आज शासन-प्रशासन को सजग करने का काम मीडिया ही करता है और उसके माध्यम होते हैं हमारे देश के सजग पत्रकार जो हर व्यक्ति को अब इन पर विश्वास करने को प्रेरित कर रहा है। अबतक सैकड़ों पत्रकारों की जान कोविड महामारी के कारण जा चुकी है? स्विट्जरलैंड की मीडिया अधिकार और सुरक्षा से जुड़ी संस्थाय प्रेस एम्बलम कैम्पेन (पीएसी) ने कोरोना वायरस के चलते पत्रकारों की हुई मौत पर दुख जताते हुए एक बयान जारी किया है और बताया है कि दुनिया भर में हजार से ज्यादा पत्रकार कोरोना वायरस का शिकार हो चुके हैं और कुल 75 देशों के बीच भारत इस मामले में दूसरे नंबर पर है। पीईसी के महासचिव ब्लेतस लेम्पेयन ने कहा, यह इस पेशे को हुआ अप्रत्याशित नुकसान है और कत्लेआम है। इसलिए प्रेस आजादी दिवस पर आह्वान करते हैं कि उन सभी प्रतिष्ठित पत्रकार साथियों को हम श्रद्धांजलि दें जो महामारी का शिकार हो गए। पीईसी के मुताबिक दुनिया में हर दिन चार पत्रकारों की मौत हुई। मौत से सबसे ज्यादा प्रभावित चार देश हैं- ब्राजील (189), भारत (151), पेरू (140) और मेक्सिको (109)अच्छी बात ये है कि इस बीच यूरोप और अमेरिका में पत्रकारों की मौत की दर कम हुई है, जिसका श्रेय वहां टीकाकरण और सुरक्षा उपायों को जाता है। लैटिन अमेरिका सबसे अधिक प्रभावित है। (लेखक पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग रांची विश्वविद्यालय रांची के उपनिदेशक हैं।)
एबीएन डेस्क, रांची। आजादी के बाद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4) के तहत सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े तबकों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। आरंभ में आरक्षण की व्यवस्था 10 वर्ष के लिए होनी थी लेकिन हर 10 वर्ष के बाद उसे आगे बढ़ाने का सिलसिला चलता रहा। फिलहाल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग को सरकारी रोजगार, सरकारी कंपनियों और शैक्षणिक संस्थानों में नौकरी तथा सीटों के मामले में 49.5 फीसदी आरक्षण प्राप्त है। जनवरी 2019 में यानी अप्रैल-मई 2019 के लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले संसद ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 10 फीसदी अतिरिक्त आरक्षण को मंजूरी दे दी। इसके अलावा राज्य विधानसभाओं और लोकसभा में भी अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए सीटें आरक्षित हैं। यह संभव है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए घोषित 10 फीसदी का आरक्षण शायद कुल आरक्षण को बढ़ाकर 59.5 फीसदी नहीं करे क्योंकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और अनुसूचित जाति-जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण उसका अतिव्यापन कर सकता है। बहरहाल यदि आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण लागू होता है तो संभव है कि वह सन 1993 में सर्वोच्च न्यायालय के नौ न्यायाधीशों वाले पीठ के उस निर्णय का उल्लंघन कर दे जिसमें उन्होंने सभी प्रकार के आरक्षण के लिए कुल मिलाकर 50 फीसदी की सीमा तय की थी। फिलहाल 10 फीसदी अतिरिक्त आरक्षण के खिलाफ कई याचिकाएं लंबित हैं। आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण के पहले भी तमिलनाडु विधानसभा ने कुल मिलाकर 69 फीसदी आरक्षण को मंजूरी दे दी थी। अप्रैल 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले तमिलनाडु की द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) ने राज्य के निवासियों के लिए 75 फीसदी आरक्षण का वादा किया है। मध्य प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और हरियाणा पहले ही रोजगार में स्थानीय लोगों के आरक्षण की नीतियां बना चुके हैं। देश भर में कई याचिकाएं दायर कर 50 फीसदी के ऊपर के आरक्षण को समाप्त करने की मांग की गई है। खासतौर पर 8 फरवरी को खबर आई कि सर्वोच्च न्यायालय एक ऐसी याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया है जो तमिलनाडु में 50 फीसदी से अधिक आरक्षण को चुनौती देती है। परिणामस्वरूप अब तक राज्यों में मौजूदा आरक्षण के अतिरिक्त स्थानीय लोगों के लिए आरक्षण के क्रियान्वयन का कानूनी दर्जा अस्पष्ट है। ऐसे आरक्षण के स्तर के पक्ष में दलील यह है कि देश में अभी भी सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से वंचितों की तादाद बहुत अधिक है। शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का पारदर्शी और निष्पक्ष क्रियान्वयन जटिल है जिसके चलते कई कानूनी विवाद पैदा हुए। यदि आरक्षण कोटा विश्वविद्यालय स्तर पर होता है तो व्यक्तिगत विभागों में यह 50 फीसदी का स्तर पार कर सकता है। एक अन्य मुद्दा यह है कि किसे क्रीमी लेयर का हिस्सा होने के कारण अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के लायक नहीं माना जाए। फिलहाल क्रीमी लेयर में वे लोग आते हैं जिनकी सालाना पारिवारिक आय 8 लाख रुपये से अधिक है। गैर पिछड़ा वर्ग के लोगों को लगता है कि यदि पिछड़ा वर्ग के लोग स्वरोजगार में हैं तो उनकी आय का आकलन आसान नहीं है। उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासी श्रमिक दशकों से मुंबई, दिल्ली या बेंगलूरु में किराये के मकानों में रहते हैं। उनके लिए खुद को वहां का निवासी साबित करना मुश्किल है। परिणामस्वरूप राज्यस्तरीय आरक्षण भारतीय श्रम बाजार को आर्थिक रूप से अक्षम बना सकता है। खबरों के मुताबिक सर्वोच्च न्यायालय को 15 मार्च, 2021 से 50 फीसदी सीमा के मामले पर सुनवाई करनी थी। शीर्ष न्यायालय को स्पष्ट करना चाहिए कि देश में आरक्षण के अलग-अलग स्तर नहीं हो सकते और अलग-अलग राज्य ऐसे कानून नहीं बना सकते कि रोजगार वहां के निवासियों के लिए आरक्षित होंगे। समाचार पत्रों में 19 मार्च, 2021 को प्रकाशित खबरों के मुताबिक महाराष्ट्र में राज्य के विशिष्ट आरक्षण से संबंधित याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने चुटीले अंदाज में यह तक पूछ डाला कि क्या आजादी के बाद से कोई सामाजिक-आर्थिक प्रगति हासिल नहीं हुई? यह बात शायद सबसे जानकार भारतीयों पर भी लागू होती है। केंद्र सरकार को संसद में श्वेत पत्र पेश करना चाहिए ताकि आरक्षण के क्रियान्वयन को लेकर स्पष्टता आ सके। हालांकि ऐसा होने की संभावना बहुत कम है क्योंकि आरक्षण मतदाताओं और ज्यादातर राजनीतिक दलों के लिए बहुत संवेदनशील मसला है। आरक्षण में इजाफे के खिलाफ या मौजूदा स्तर का आरक्षण जारी रखने के विरोध में कुछ कहा जाए तो यह भावनात्मक दलील दी जाती है कि अनुसूचित जाति-जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ हजारों साल के भेदभाव को कुछ दशकों में पूरा नहीं किया जा सकता। हालिया अतीत का एक उदाहरण है करीब दो सौ वर्ष के ब्रिटिश शासन के कारण भारतीय उपमहाद्वीप की गरीबी। लब्बोलुआब यह कि अतिरिक्त आरक्षण शासन मानकों को शिथिल करेगा तथा केंद्र, राज्यों और नगर निकाय स्तर के प्रदर्शन पर असर पड़ेगा। शैक्षणिक संस्थान भी अप्रभावित नहीं रह सकेंगे। मिसाल के तौर पर नैशनल एसोसिएशन आॅफ सॉफ्टवेयर ऐंड सर्विस कंपनीज ने संकेत दिया है कि उससे संबद्ध कंपनियों में से 80 प्रतिशत को लगता है कि हरियाणा के नागरिकों की पक्षधर आरक्षण नीतियां उनके कारोबार और भविष्य की निवेश योजनाओं को प्रभावित करेंगी। देश की राष्ट्रीय और राज्य सरकारें न केवल आरक्षण की मदद करती हैं बल्कि अतिरिक्त आरक्षण की मांग को प्रोत्साहन देती हैं। देश में हर प्रकार के आरक्षण को खत्म करने की जरूरत है और इस दौरान उन लोगों को उचित वित्तीय सहायता मुहैया कराई जानी चाहिए जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए हैं। (लेखक पूर्व भारतीय राजदूत एवं विश्व बैंक के ट्रेजरी प्रोफेशनल हैं)।
एबीएन डेस्क, रांची। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने शुक्रवार को नीतिगत दरों में कोई बदलाव नहीं किया और अपना उदार रवैया बरकरार रखा है। हालांकि इस बार केंद्रीय बैंक ने यथास्थिति कायम रखने के साथ ही कुछ बदलावों की ओर इशारा किया है। इस संदर्भ में यह जानना जरूरी है कि आरबीआई उदार नीति बरकरार रखने के साथ-साथ किन बदलावों की ओर संकेत दे रहा है। पहली बात तो यह कि आरबीआई की मौद्रिक नीति निर्धारिक समिति ने उदार मौद्रिक नीति आगे भी जारी रहने की बात कही है। एमपीसी ने एकमत होकर कहा है कि आवश्यकता महसूस होने तक बिना किसी रुकावट के उदार मौद्रिक नीति जारी रहेगी। समिति ने मुख्य नीतिगत दरों में कोई बदलाव नहीं करने का निर्णय लिया। समिति अब किसी समय सीमा में नहीं बंधकर आंकड़ों के आधार पर भविष्य के लिए अनुमान व्यक्त करने की बात कर रही है। हालांकि एक शब्द एक बड़े बदलाव का द्योतक बन गया है। इस बार आरबीआई ने कहा है कि आर्थिक वृद्धि दर टिकाऊ बनाए रखने और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए उदार नीति दीर्घ अवधि तक जारी रहेगी। केंद्रीय बैंक ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में महंगाई दर निर्धारित लक्ष्य के भीतर थामने की पूरी कोशिश की जाएगी। अप्रैल में एमपीसी ने कहा था कि वृद्धि दर में निरंतरता बनाए रखने के लिए उदार नीति जारी रहेगी और महंगाई भी नियंत्रण में रखी जाएगी। जून मौद्रिक नीति समीक्षा में आरबीआई ने न केवल वृद्धि दर को मजबूती देने की बात कही है, बल्कि इसे दोबारा पटरी पर लाने का भी जिक्र किया है। इस तरह, आरबीआई फरवरी में घोषित अपनी नीति पर दोबारा अमल करने में जुट गया है। कुल मिलाकर केंद्रीय बैंक मान चुका है कि अप्रैल तक अर्थव्यवस्था में सुधार के जो संकेत दिखने लगे थे वे अब लुप्त हो गए हैं। कोविड-19 की दूसरी लहर ने अर्थव्यवस्था पर घातक प्रहार किया है। मार्च तक ऐसा लग रहा था कि परिस्थितियां सामान्य हो गई हैं और अर्थव्यवस्था अब बिना किसी रुकावट के साथ रफ्तार से आगे बढ़ पाएगी लेकिन मध्य अप्रैल के बाद सूरत पूरी तरह बदल चुकी है। दूसरा महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि मौद्रिक नीति समिति में वृद्धि दर का अनुमान भी संशोधित किया गया है। फरवरी में एमपीसी की बैठक के बाद आरबीआई ने वित्त वर्ष 2021-22 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर का अनुमान 10.5 प्रतिशत रहने की बात कही थी। कोविड-19 की दूसरी लहर से आर्थिक गतिविधियां एक बार फिर थमने के बावजूद आरबीआई ने पिछले महीने जारी अपनी सालाना रिपोर्ट में भी 10.5 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान बरकरार रखा था। इसके उलट दूसरी एजेंसियों ने अपने अनुमानों में कमी करना शुरू कर दिया था। हालांकि अब आरबीआई ने भी आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 9.5 प्रतिशत कर दिया है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में वृद्धि दर शून्य से 18.5 प्रतिशत निचले स्तर पर रहने का अनुमान जताया गया है। अब सारा दारोमदार टीकाकरण की रफ्तार पर है, लेकिन आरबीआई ने राजकोषीय और मौद्रिक नीति दोनों स्तरों पर अर्थव्यवस्था को राहत देने की जरूरत बताई है। तीसरी अहम बात यह है कि वृद्धि के अनुमान में पूरे एक प्रतिशत अंक की कमी की गई है, लेकिन महंगाई दर का अनुमान मात्र 10 आधार अंक बढ?े का जिक्र किया गया है। अब यह 5 प्रतिशत के बजाय 5.10 प्रतिशत रहने का अनुमान है। अप्रैल में थोक महंगाई दर 11 प्रतिशत के उच्चतम स्तर 10.49 प्रतिशत पर पहुंच गई थी और इससे पहले मार्च में यह 7.39 प्रतिशत के साथ आठ महीने के उच्चतम स्तर पर थी। हालांकि खुदरा महंगाई दर अप्रैल में कम होकर 4.29 प्रतिशत रह गई। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में कमी से ऐसा हुआ। मार्च में खुदरा महंगाई दर 5.52 प्रतिशत थी। आरबीआई खुदरा महंगाई पर नजर रखता है और इसका दायरा 2 से 6 प्रतिशत के बीच रखने का प्रयास करता है। महंगाई दर बढ़ने की आशंका जरूर है और कच्चे तेल के दाम बढ़ने से थोड़ा जोखिम है लेकिन मांग कम होने से महंगाई दर ऊपर नहीं भागेगी। मौद्रिक नीति समीक्षा की एक और महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि आरबीआई सरकारी प्रतिभूति खरीद कार्यक्रम (जी-सैप) आगे भी जारी रखेगा। अप्रैल में केंद्रीय बैंक ने पहली तिमाही में 1 लाख करोड़ रुपये मूल्य की सरकारी प्रतिभूतियां खरीदने की बात कही थी। दूसरी तिमाही में भी यह प्रक्रिया जारी रहेगी। आरबीआई ने तो दूसरे चरण के जी-सैप में 1.2 लाख करोड़ रुपये मूल्य की प्रतिभूतियां खरीदने का लक्ष्य रखा है। हालांकि इसके बावजूद बॉन्ड बाजार में शुक्रवार को उत्साह नहीं दिखा। आखिर ऐसा क्यों हुआ? इसकी वजह यह है कि 17 जून को जी-सैप के 40,000 करोड़ रुपये मूल्य के बॉन्ड खरीदारी कार्यक्रम में 10,000 करोड़ रुपये मूल्य के राज्य विकास ऋणों के मद में जारी बॉन्ड शामिल होंगे। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि दूसरे जी-सैप में राज्य विकास ऋणों की हिस्सेदारी बढ़ेगी। इस तरह, केंद्र सरकार की प्रतिभूतियों की खरीदारी 1.2 लाख करोड़ रुपये से कम रहेगी। बॉन्ड खरीदारी कार्यक्रम में राज्यों के बॉन्ड भी शामिल करने होंगे नहीं तो केंद्र एवं राज्य सरकारों की प्रतिभूतियों के प्रतिफल के बीच अंतर और भी अधिक हो जाएगा। अंत में, प्रोत्साहन एवं लचीली मौद्रिक नीति वापस लेने की फिलहाल कोई योजना नहीं दिख रही है। निकट भविष्य में तो ऐसा होता नहीं दिख रहा है। मौजूदा वर्ष में आरबीआई ऐसा करने का जोखिम नहीं उठा सकता है जब दूसरी एजेंसियां नियमित अंतराल पर देश की वृद्धि दर का अनुमान कम कर रही हैं। (लेखक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड में वरिष्ठ सलाहकार हैं)।
एबीएन डेस्क, रांची। वर्तमान में भारत के लिए सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य संबंधी बात और सबसे अहम आर्थिक प्रोत्साहन क्या है? निस्संदेह यह है कोविड टीकाकरण। हमें यह याद रखना होगा कि यह पूरा मामला कोविड-19 के मौजूदा स्वरूपों के साथ समाप्त नहीं होने वाला। शायद हमें हर वर्ष इन टीकों की बूस्टर खुराक लेनी होगी। आधुनिक सार्वजनिक अर्थशास्त्र का एक बड़ा लेकिन सामान्य विचार यह है कि आजादी भलीभांति काम करती है और राज्य को केवल तभी हस्तक्षेप करना चाहिए जब बाजार विफल हो जाए। बाजार की विफलता की चार श्रेणियां हैं : बाजार शक्ति की उपस्थिति, बाह्य कारक, सूचनाओं की विसंगति और सार्वजनिक बेहतरी के प्रावधान। सरकार के हस्तक्षेप की स्थिति में दो बातों की जांच बहुत जरूरी होती है: बाजार की विफलता की मौजूदगी और राज्य के प्रस्तावित हस्तक्षेप का विश्वसनीय क्रियान्वयन। ये बातें हमें वे अवधारणाएं और सिद्धांत मुहैया कराती हैं जिनकी मदद से हम टीकाकरण पर विचार कर सकते हैं। देश में केवल दो बड़ी टीका विक्रेता कंपनियां हैं। ऐसे में बाजार की शक्ति को लेकर भी चिंता है। बहरहाल, एक बार बाजार विश्व बाजार के सामने आने के बाद महत्त्वपूर्ण प्रतिस्पर्धा सामने होगी। बाजार की शक्ति के संदर्भ में यह बात बार-बार सामने आती है: देश में किसी एकाधिकार वाले क्षेत्र में जटिल शासकीय हस्तक्षेप में पड़ने के बजाय बेहतर यही होगा कि व्यापार में खुलापन लाया जाए और देश में प्रतिस्पर्धी नीति के क्षेत्र में राज्य की क्षमता की समस्या से निजात पाई जाए। टीकाकरण उन व्यक्तियों को बचाव मुहैया कराएगा जो टीका लगवाएंगे। उनके यहां वहां जाने की संभावना बनने और महामारी फैलाने की आशंका कम होने से बाह्य मोर्चे पर सकारात्मक स्थिति निर्मित होगी। परंतु आमतौर पर इस बारे में कुछ नहीं कहा गया कि लोग टीकाकरण के लिए आखिर कितनी कीमत चुकाने को इच्छुक होंगे? अगर उसकी कीमत अच्छी खासी हुई तो? चाहे जो भी कीमत चुकाई जाए वह व्यक्ति और समाज को होने वाले लाभ की तुलना में कम ही होगी। सामाजिक लाभ और व्यक्तिगत लाभ का यह अंतर टीकों के बाजार में सरकार के हस्तक्षेप की अच्छी वजह है। कोरोना में एक अहम समस्या मूल सामाजिक चर्चा के स्तर पर सूचनाओं की विसंगति की भी है। चूंकि एक्स के पास यह जानने का कोई विश्वसनीय तरीका नहीं है कि वाई कोविड का प्रसार करने वाला हो सकता है, ऐसे में चर्चा केवल उन लोगों के बीच सिमट कर रह जाती है जो एक दूसरे में कोविड की स्थिति के बारे में जानते हों। तीसरे पक्ष से निकलने वाले विश्वसनीय संकेतक मसलन टीकाकरण पासपोर्ट या किसी व्यक्ति में संक्रमण के बारे में जानकारी आदि कोविड के कारण सूचना के स्तर पर उत्पन्न विसंगति को दूर करने वाले संभावित हल हो सकते हैं। अर्थशास्त्र में उपचारात्मक स्वास्थ्य और टीकाकरण को सार्वजनिक बेहतरी में श्रेणीबद्ध नहीं किया जाता। यदि क दंत चिकित्सक की कुर्सी पर बैठा है तो ख उसी समय उसका इस्तेमाल करने से वंचित है। इसी तरह दंत चिकित्सक किसी को भी सेवा देने से इनकार कर सकता है। यानी उपचारात्मक स्वास्थ्य सेवाएं राष्ट्रीय सुरक्षा की तरह सार्वजनिक बेहतरी में नहीं गिनी जा सकतीं। उपचारात्मक स्वास्थ्य की बेहतरी को न गिनने से राज्य का हस्तक्षेप गलत हो सकता है और नुकसानदेह भी। ऐसे ही पोलियो की खुराक या फ्लू के खिलाफ टीकाकरण भी सार्वजनिक बेहतरी में नहीं आता। हालांकि राज्य सरकार लोगों और समाज की बेहतरी को ध्यान में रखकर इसे नि:शुल्क या रियायती दरों पर दे सकती है। कोविड टीकाकरण में बाजार विफलता जैसी कोई कठिनाई नहीं है लेकिन क्या हमारे पास इतने बड़े पैमाने पर टीकाकरण की सरकारी क्षमता है? महामारी के बिना शांतिपूर्ण ढंग से भारत ने अधिकतम पांच करोड़ लोगों (माताओं और शिशुओं) का सालाना टीकाकरण किया है। कोविड के लिए 18 वर्ष से अधिक आयु के 95 करोड़ भारतीयों को टीके की दो खुराक देनी होंगी। इसके लिए 190 करोड़ खुराक चाहिए। सरकारी आपूर्ति इसके तीन फीसदी हिस्से की भरपाई कर सकती है। इसके अलावा वयस्कों का टीकाकरण सरकार के अब तक किए गए टीकाकरण से एकदम अलग है। फिलहाल विश्व बाजार मेंं टीका 10 डॉलर प्रति खुराक कीमत पर उपलब्ध है। कुछ तार्किक अनुमानों के आधार पर कह सकते हैं कि एक व्यक्ति के टीकाकरण पर 25 डॉलर का खर्च है। आयुष्मान भारत में 50 करोड़ लोगों को चिह्नित किया गया है जो सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ ले सकते हैं। इनमें से करीब 20 करोड़ 18 वर्ष से कम उम्र के हैं, यानी शेष 30 करोड़ लोगों को नि:शुल्क टीके लगाने होंगे। मौजूदा दर पर देखें तो इसमें 56,250 करोड़ रुपये की राशि व्यय होगी। यदि सरकार वैश्विक निविदा के जरिये 60 करोड़ टीके खरीदती है तो कीमत कुछ कम होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि कीमत 20 फीसदी कम हो सकती है और भविष्य में इसमें और कमी आ सकती है। यानी तब 45,250 करोड़ रुपये व्यय करने पड़ सकते हैं। टीकाकरण पर होने वाले व्यय की तुलना उस व्यय से होनी चाहिए जो अन्यथा लोगों के अस्पताल में दाखिल होने पर होता। कोई गरीब आदमी टीकाकरण से वंचित न रह जाए यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार विशेष अभियान चला सकती है। आयुष्मान भारत में 24,000 अस्पतालों को पैनल में शामिल किया गया है ताकि वे उपचार मुहैया करा सकें। अगले तीन महीनों में जब व्यापक टीकाकरण शुरू होने तक इन अस्पतालों से आपूर्ति शुरू की जा सकती है। हमारी अन्य स्वास्थ्य सेवाओं की तरह जो गरीब नहीं हैं वे यहां भी टीकाकरण का मूल्य चुका सकते हैं या फिर उन्हें कर्मचारी राज्य बीमा, केंद्र सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं या अन्य कर्मचारी बीमा योजनाओं के तहत टीका लगाया जा सकता है। बाजार और राज्य की संभावित विफलता को ध्यान में रखते हुए टीकाकरण को तेज करने का यह तरीका कई विशेषज्ञ अगस्त 2020 में ही सुझा चुके हैं। अभी भी बहुत देर नहीं हुई है।
एबीएन डेस्क, रांची। गोतिया और दाल जितना गले उतना ही स्वादिष्ट होता है। ये घटिया कहावत ही मनुष्यों की फितरत बताने को काफी है। मैं तो आम निर्यात में भारत से पाकिस्तान के आगे रहने और फुटबॉल विश्वकप में पाकिस्तान के बने गेंदों की धमक से भी दुखित हो जाता हूं। नब्बे के दशक में हुए एक एशियाड में भारत ने मात्र एक गोल्ड मेडल जीता था, वह भी कबड्डी में और पाकिस्तान ने दो। इस तरह वह एशियाड के मेडल लिस्ट में हमसे आगे था और यह तब के अखबारों की सुर्खियां थीं। भारतीय अपने घटिया खेल से कम मायूस थे, वो पाकिस्तान के आगे रहने से ज्यादा दुखित थे। सिर्फ बांग्लादेश के विकास दर को भारत से अच्छा जानकर भारतीयों में ईर्ष्या, द्वेष का संचार हो जाता है। बांग्लादेश तेजी से तरक्की कर सकता है। उसके पास समुद्र तट है, बंदरगाह है। पटसन की खेती के अलावा कृषि, कपड़ा उद्योग, मछलीपालन से संवरने की उसके पास भरपूर संभावना है। वहां युवा कामगार हाथ हैं, सिर्फ इस्लाम हैं। बौद्ध, हिंदू, चकमा वगैरह थे, वो ठिकाने लगा दिये गये हैं। वहां कोई सेकुलर नहीं, टंगखिंचवा नहीं। सबसे बड़ी बात कि बांग्लादेशी इस्लाम अरब या पाकिस्तानी इस्लाम से थोड़ा अलग है, वहां खुलापन भी है और आतंकवाद पर सरकार सख्त रूख अपना लेती है। कुछ सालों में बांग्लादेश तरक्की करके एक विकसित देश की राह पर चल निकले, तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। नेपाल, श्रीलंका भी अगर किसी अच्छे नेतृत्व में अपनी छोटी आबादी और उपलब्ध साधनों से तरक्की करने लगें तो वो महज पांच साल में हमें पीछे छोड़ देंगे। क्योंकि यहां भी भारत की तरह संकट पैदा करने वाले कम हैं। कल को पाकिस्तान में कोई नेता उभर आये जो उसे इस्लाम और आतंकवाद से आगे देखने लगे, कश्मीर से परे जाकर भारत से दुश्मनी त्याग देश पर ध्यान देने लगे तो वह भी हमसे आगे निकल जायेगा। (हालांकि इसकी उम्मीद अभी न के बराबर है) हकीकत में तो वह कुछ दशक पहले हमसे बेहतर स्थिति में था भी। अमेरिका, यूरोप भारत विरोधी थे उनके पैसे से वहां के हालात हमसे बेहतर थे, हम रूस के पालतू बने लुंज-पुंज से चल रहे थे। अब अगर बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, पाकिस्तान तेजी से विकास कर हमसे आगे निकल जायें तो सबसे ज्यादा तकलीफ, पेट दर्द किसे होगी? बेशक हम भारतीयों को होगी। हम इन मुल्कों को खुद से आगे जाते नहीं देखना चाहेंगे, पर वो किसी सफल नेतृत्व में ऐसा करते हैं तो हम सिर्फ तमाशाई बने देख सकते हैं और खुन्नस में उनकी छोटी कमियों को भी खूब बढ़ा चढ़ा कर यहां छापेंगे। ये फितरत यूरोपियन अमेरिकन में कूट कूट कर भरी हुयी है। भारत की उपलब्धि, किसी वैश्विक आविष्कार या सफल नेतृत्व से मामूली सुधार अंकल सैम, अंग्रेज या खुद को सर्वोपरि मानते आये यूरोपीय देश हमारा चिर शत्रु चीन कैसे जज्ब करेगा? वो अपने अखबारों में हमारे खिलाफ लिखेंगे, हमारी उपलब्धियों को नकार कर यहां की कमियों को बढ़ा चढ़ा कर बतायेंगे, नेतृत्व को अक्षम बतायेंगे, हमारे लोकतंत्र को अर्द्धतानाशाह कहेंगे, हमारी वैक्सीन उनके लिये खतरा बन जाती है। अमेरिका ने तो रूस को धमका कर दशकों पहले ही हमें क्रायोजेनिक इंजन देने से मना कर दिया था, कुछ साल पहले मंगल मिशन से वह हतप्रभ था। तो मत ज्यादा तूल दें, पश्चिमी देशों और अमेरिका के मीडिया को। वो हमारे खिलाफ सदैव नकारात्मक रहे हैं, इष्यार्लु रहे हैं। यहां जो गड़बड़, असफल है सो यहां भी तो छप दिख रहा है। जनता भी तो देख सुन रही है वह भी अब सब कुछ जानती है।
एबीएन डेस्क, रांची। आज पृथ्वी एवं प्रकृति विध्वंस के कगार पर आ गई है। आज मनुष्य की भौतिक शक्तियां एवं सुख भोग की भूख जैसे कुंभकरण के रूप में संसार में विचरण करने लगी है। पृथ्वी एवं प्रकृति इनके आहार बन गये हैं। ऐसा लगता है कि कुंभकरण रूपी इन दानवों से विश्व बेगि सब चौपट होई की घटना चरितार्थ हो रही है। विज्ञान के उत्सर्ग के चलते आज हम अन्य ग्रहों पर जाने लगे हैं। आज अग्रिम पंक्ति के वैज्ञानिक दिक् एवं काल (टाइम एवं स्पेस रहस्य-भेदन में लगे हैं। विज्ञान ने आज असंभव को संभव कर दिखाया है, लेकिन आज भी वह मनुष्य की पीड़ा, रोग एवं गरीबी नहीं दूर कर सका है। मात्र विज्ञान के सहारे किए जाने वाले विकास के चलते आज संसार का जल एवं वायु प्रदूषित होता जा रहा है। पृथ्वी की हरियाली खत्म होती जा रही है। बाढ़, तूफान, एवं भयंकर ताप से पृथ्वी तप्त होती जा रही है। यदि हमने इन भयंकर परिस्थितियों की तरफ ध्यान नहीं दिया तो संसार में मनुष्य जाति का जीवित रहना संभव नहीं हो पायेगा। विनाश हमारा दरवाजा खटखटा रहा है, पृथ्वी के पर्यावरण का संतुलन बिगड़ता जा रहा है। आज पर्यावरण की समस्याओं पर हमारे जीवन की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु संपादित हो रही विकास योजनाओं पर गंभीरता से विचार करने पर लगता है कि हम पर्यावरण संरक्षण एवं विकास का सामंजस्य स्थापित कर सकेत हैं। हम पर्यावरण संरक्षण के साथ देश का ठोस विकास भी कर सकते हैं। हम मजदूर, पर्यावरण, व्यापार एवं विकास का तारतम्य स्थापित करने की दिशा में कार्य करके भविष्य का सृजन कर सकते हैं। आज ज्ञान एक बहुत बड़ी संपदा (रिसोर्स) है। इस संपदा का भरपूर उपयोग कर हम पर्यावरण-संरक्षण एवं विकास का सामंजस्य स्थापित कर सकते हैं। सिंगापुर एक ऐसा देश है, जहां प्राकृतिक संसाधनों के पूर्ण अभाव में भी देश ज्ञान संपदा का भरपूर उपयोग कर समृद्ध है। विश्व-पर्यावरण की समस्या का केंद्र-बिंदु नगर है। पर्यावरण की प्राय: सारी समस्याएं आज नगरीय विकास से जुड़ी हैं। नगरों के बढ़ते कदम पूरी पृथ्वी पर दीख पड़ते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट (1999) के अनुसार सन 1960 में संसार की एक-तिहाई आबादी शहरों में रहती थी। 1999 में 47 प्रतिशत लोग शहरों में रहते थे। सन् 2030 में 61 प्रतिशत लोगों के शहरों में रहने की संभावना है। शहर एवं गांव दोनों से संबंध रखने वाले समुदाय की जनसंख्या बढ़ती जा रही है और यही कारण है कि गांवों पर शहर की छाप दिनोंदिन गहराती जा रही है। अत: शहरों पर ध्यान देना और इनकी समस्याओं का समाधान करना पर्यावरण संरक्षण का एक बहुत कारगर कार्यक्रम हो सकता है। नगरों का आकार-प्रकार बढ़ता जा रहा है। इन नगरों की समस्याएं मूलत: पर्यावरण की समस्याएं हैं। नगरों में स्वच्छ जल एवं स्वच्छ वायु सुलभ कराना, खुले स्थान सुलभ कराना औज पर्यावरण की दृष्टि से सुखद एवं सक्षम यातायात सुलभ कराना आज पर्यावरण की बड़ी चुनौतियां हैं। हमें इन चुनौतियों का सामना करने के लिए दीर्घकालीन प्रयास करने होंगे। हमारे देश की पर्यावरणीय समस्याएं मूल रूप से दो कारणों से हैं। प्रथम विकास की प्रक्रिया से ऋणात्मक प्रभाव के कारण और दूसरी जनसंख्या, गरीबी, अशिक्षा, एवं पिछड़ेपन के कारण। वर्तमान में जिन समस्याओं का सामना भारत को करना पड़ रहा है, उनमें निम्न हैं : जनसंख्या वृद्धि के चलते जीवनयापन के साधनों पर पड़ रहे अधिभार के कारण विकास के धनात्मक प्रभाव का निष्प्रभावी हो जाना। बढ़ती हुई पशु संख्या के कारण घास के मैदानों एवं चारागाहों के क्षेत्र का कम होना। 3290 लाख हेक्टेयर भूमि में से 1750 लाख हेक्टेयर भूमि को विशेष उपचार की आवश्यकता है, ताकि उससे होने वाले लाभ एवं आमदनी को बढ़ाया जा सके। बढ़ता बुआ भू-अवकरण : (क) वायु एवं जल द्वारा (1590 लाख हेक्टेयर), (ख) लवणता एवं क्षारता द्वारा (80 लाख हेक्टेयर), (ग) नदियों द्वारा (70 लाख हेक्टेयर), 5. वनक्षेत्र में कमी (47500 हेक्टेयर प्रतिवर्ष)। इसके मुख्य कारण-पशुओं का जंगलों में चरना, लकड़ी के लिए पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, वनों का अतिक्रमण एवं अन्य क्रियाकलाप आदि, 6. कृषि क्षेत्र में वृद्धि एवं उनका स्थानांतरण सड़कों, मकानों, नहरों एवं विद्युत संयंत्रों का निर्माण, 7. पशु, पौधों एवं जीवाणुओं की प्रजातियों की संख्या में कमी (15,000 पशुओं एवं पौधों की प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा विद्यामान है), 8. सजल क्षेत्रों का प्रदूषण एवं उनमें मिट्टी जमा होने की गति में वृद्धि। 9. रसायनों एवं समुद्रीय जल द्वारा भूगर्भीय जल का प्रदूषण, 10. समुद्रतटीय क्षेत्रों में निर्माण के चलते बढ़ता प्रदूषण। 11. समुद्रतटीय वनस्पतियों में कमी। 12. वन के परितंत्र का अवकरण। 13. द्वीपों के परितंत्र का विनाश। 14. नगरों में बढ़ता प्रदूषण एवं स्वास्थ्य सुविधाओं में कमी। 15. घातक अवशिष्टों एवं जैवीय प्रक्रिया से विघटित न हो सकने वाले अवशिष्टों का निस्तारण। 16. नदियों के प्रदूषण एवं उनमें मिट्टी जमा होने की गति में वृद्धि। 17. नगर क्षेत्रों में समीप उद्योगों एवं विकास योजनाओं की स्थापना द्वारा प्रदूषण एवं भीड़-भाड़ में वृद्धि। 18. ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधनों एवं नगरों की तरफ प्रवजन प्रमुख हैं। इनके निराकरण हेतु सुविचारित दीर्घकालीन नीति अपनाने की आवश्यकता है। आखिर, मिट्टी, हवा,जल तीनों को हम बुरी तरह से गंदा कर रहें हैं। इसके बाद पर्यावरण के बदलाव और उससे होने वाली आपदा का मार भी झेल रहें हैं लेकिन चंद देशों की उग्र प्रवृति को लेकर आज विश्व का अस्तित्व ही खतरे में हो गया है। (लेखक ग्रीन रिवोल्ट पर्यावरण समाचार पत्र के संपादक और पत्रकारिता विभाग रांची विवि के व्याख्याता हैं।)
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