विचार

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Published / 2021-11-13 14:44:06
मैं झारखंड हूं, आज मेरा जन्म दिन है...

एबीएन डेस्क (एनके मुरलीधर)। मैं झारखंड हूं। 15 नवंबर 2000 को मेरा जन्म हुआ। मेरा जन्म दिन उल्लास और खुशी के साथ विरोध के शब्दों के बीच हुआ। मैं आंदोलन से जन्म लेने वाला राज्य हूं। आज जब मैं युवा हो चुका हूं और मैं यह नहीं कह सकता कि मेरी योग्यता नहीं थी कि मैं विकसित राज्य न बन सकूं। मेरे अंदर पूरे देश को ऊर्जा देने के लायक कोयला है, मैंने निजी क्षेत्र की दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में एक टाटा उद्योग समूह को पनपने और बढ़ने का धरातल तैयार किया है। एशिया का सबसे बड़ा लोहा उद्योग बोकारो प्लांट विकसित किया है। मदर इंडस्ट्रीज के नाम से विश्व विख्यात हैवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन, सिंदरी का खाद कारखाना, जादूगोड़ा के यूरेनियम सहित पूरे देश का सबसे अधिक खनिज वाला राज्य हूं। वर्ष 2000 के पहले मेरे पास एक राजनैतिक कारण था, जब मैं कहता था कि बिहार राज्य का हिस्सा होने के कारण मेरे साथ अन्याय हो रहा है। राजनीति की क्षुद्र धारा में प्रवाहित होना मेरी मजबूरी थी, हर सुविधा से मोहताज था। ऐसा पूरी तरह से नहीं था, लेकिन आंशिक तौर पर सही भी था। राजनीतिक कारणों से मेरा जन्म हुआ और मैंने उम्मीद कि की अब मेरी सभी समस्याएं दूर हो जाएगी। मैं जंगलों से भरा, प्राकृतिक जल धाराओं की ध्वनि से प्रफुल्लित होता, वन्य जीवों के साथ उद्योग का सामंजस्य बैठाये आर्थिक रूप से एक संपन्न राज्य था। मेरा बजट लाभकारी था। पूरे देश ही नहीं विश्व का ध्यान मेरी संसाधनों पर था और मैं भी सीना ताने देश के अन्य राज्यों के तरह विकसित राज्य कहलाना चाहता था। आखिर हमारे बच्चे भी उच्च स्तरीय शिक्षा और स्वास्थ्य के साथ राष्टÑीय अतंरराष्टÑीय पटल पर छाने की योग्यता रखते हैं। चाहे वह हॉकी की टीम हो या तीरदांजी की, चाहे क्रिकेट हो या फुटबॉल खेल भावना और मेघा हमारे रक्त में भरा है। हमारा चरित्र सरलता और सहजता के साथ अद्भुत संतोषभाव से जुड़ा है जिसकी आज दुनिया को आवश्यकता है। मैं कभी पलायन कभी नक्सली हिंसा से प्रभावित था लेकिन अब सहज हो रहा हूं। मेरा स्वभाव ही नहीं है कि किसी अतिरेक क्रिया के प्रति प्रतिक्रिया से जबाव दूं। हमारे शहरों और कस्बों को ध्यान से देखिये हर शहर देश ही नहीं दुनिया को आकर्षित करने की खासियत रखता है। रांची, धनबाद, जमशेदपुर, बोकारो, हजारीबाग, देवघर, मेदिनीनगर, दुमका, सरायकेला-खरसावां, सिमडेगा, गुमला सहित हर छोटे-बड़े स्थानों से राष्टÑीय और अंतरराष्टÑीय हस्ताक्षर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। बेतला के दुनिया के पहले टाइगर प्रोजेक्ट से चैतन्य महाप्रभु और आदि शंकराचार्य के मलूटी और छिन्नमस्तिका तक हमारा हर कोना अपनी खासियत से आपको खींचता है। नेतरहाट और लोध जल प्रपात जैसे सुरम्य स्थल हमारी संपूर्णता पर चार चांद लगाते हैं। मैं अपने साढ़े तीन करोड़ कर्मठ जनों के साथ बढ़ रहा हूं। मेरा स्वभाव है निर्मल इसलिए कभी किसी से शिकायत नहीं करता। मैं अपनी संस्कृति और विरासतों के साथ संपन्न नहीं होना चाहता। मैं समृद्ध होना चाहता हूं अपने उन मानवीय मूल्यों के साथ, जिसे बिरसा मुंडा सहित हमारे महान आदि पूर्वजों से संवारा है। मेरी आलोचना का जवाब मैं नहीं देता, आज मैं सभी शुभेच्छुओं को माफ कर रहा हूं और आलोचकों को भी। हर कण-कण के योगदान से बढ़ा हूं और आगे बढ़ता ही रहूंगा।

Published / 2021-11-12 14:30:50
आदि शंकराचार्य ने हिंदू धर्म की पुनर्स्थापना की

एबीएन डेस्क। पीएम मोदी ने दिवाली के अगले दिन केदारनाथ धाम पहुंचकर आदि गुरु शंकराचार्य की समाधि का लोकार्पण किया। हिंदू धर्म एवं उसके संस्कृतिमूलक साहित्य यथा, वेद, उपनिषद, दर्शन, ब्राह्मण एवं सूत्र ग्रंथ की रचना उत्तर भारत में ही हुई। उतर भारत में ही धर्म एवं समाज के नेता हुए तथा सहस्त्रों वर्षों शताब्दियों तक हिंदू धर्म और संस्कृति का प्रवाह उत्तर भारत से दक्षिण की ओर निरन्तर होता रहा परंतु आठवीं शताब्दी में दक्षिण से नूतन हिंदू धर्म का सर्वप्रथम प्रवाह उत्तर भारत की ओर प्रवाहित होने की नवीनतम घटना घटती दृष्टिगोचर होती है। शंकराचार्य सर्वप्रथम दक्षिण से नवीन धर्मत्व को लेकर उत्तर भारत में आये तथा अपने असाधारण सामर्थ्य से उत्तर भारत में उन्होंने अपने नवीन धर्म का आरोपण किया। शंकराचार्य मसीह के आठवीं शताब्दी में केरल के कालडी ग्राम में एक नम्बूदरि ब्राह्मण के यहाँ पैदा हुए थे। द्रविड़ देशोत्पन्न ब्राह्मण शंकराचार्य ने चारों वेदों सहित समस्त शास्त्रों, व्याकरणादि शास्त्रों का अध्ययन एवं शुद्ध ज्ञान आठ वर्ष की अल्पायु में ही प्राप्त कर लिया था तथा सोलह वर्ष की किशोर अवस्था तक में ही गीता, उपनिषद् और ब्रह्मसूत्रों की भाष्यादि की रचना कर डाली थी। उसके पश्चात उन्होंने चौबीस वर्ष तक में समस्त भारत के वेदविरुद्ध मत वालों को शास्त्रार्थ में परास्त कर भारत में सनातन धर्म को पुनर्स्थापित किया। वैदिक धर्म के इतर आधुनिक हिंदू धर्म का प्रारंभ 1000 वर्ष पूर्व से पुराना श्रीशंकराचार्य के समय से माना जा सकता है। महान हिंदू धर्म सुधारक शंकराचार्य की बतीस वर्ष की अल्पायु में ही शरीर त्याग दिया। हो गई परंतु मृत्यु से पूर्व तीन बार उन्होंने समस्त भारत का भ्रमण किया तथा प्रसिद्ध विद्वानों से वाद- विवाद करके अद्वैतवाद के सिद्धांत की रचना की। वह महान विचारक ही नहीं वरन उच्च कोटि के संगठनकर्ता भी थे। उनके संगठनात्मक उत्साह के सर्वाधिक टिकाऊ स्मारकों में उनके द्वारा स्थापित विख्यात मठ हैं : कर्णाटक की श्रृंगेरी में, गुजरात की द्वारका में, उड़ीसा की पूरी में एवं हिमालय की बफीर्ली चोटियों पर बदरीनाथ में। शंकराचार्य ने हिन्दू धर्म को अनेक कुरीतियों से निजात दिलाया। प्राचीनकालीन शाक्त संप्रदाय देवी पूजा से जुडी हुई थी। शाक्त संप्रदाय पांच मकारों अर्थात मत्स्य, मांस, मद्य, मुद्रा (नृत्य) और मैथुन में विश्वास करता था। शंकराचार्य ने इस संप्रदाय को सुधारकर इसकी मूल प्रतिष्ठा पुनर्स्थापित की। शंकराचार्य ने कापालिकों को भी सुधारा। तत्कालीन कापालिक भैरव देवता को प्रसन्न करने के लिए मानवों की बलि दिया करते थे। इस प्रकार शंकराचार्य ने हिंदू धर्म को पुन: उर्जस्वित किया तथा उसे नवीन दर्शन एवं नया स्वरुप प्रदान किया। शंकराचार्य के प्रादुर्भाव का युग उत्तर भारत में धार्मिक और राजनैतिक क्रांति का था। आठवीं शताब्दी के लगभग सम्पूर्ण उत्तर भारत में बौद्धों के ह्रास के चिह्न प्रकट होने लगे थे। बौद्धों के मठों एवं विहारों की संख्या तो छोटे-बड़े प्राय: सभी नगरों में प्रयाप्त थी तथा उनमे बड़ी संख्या में भिक्षु-भिक्षुनियां रहती थीं लेकिन वे अधिकतर अनाचार एवं अनैतिक पाखंड के केंद्रबिंदु बने हुए थे। गांधार जनपद उजाड़ चुका था और वहां बौद्धों के विहार उजड़ रहे थे तथा हिंदुओं के मंदिरों का निर्माण होने लगा था। अफगानिस्तान, गांधार, बलूचिस्तान पर हिंदू राज्य कायम हो गया था। कश्मीर में भी बौद्धों की बहुतायत थी। यही दहस मथुरा, पाटलिपुत्र और कान्यकुब्ज की थी। नालंदा विश्वविद्यालय वज्रयान संप्रदाय का केन्द्रस्थल था। पश्चिमी देशों के अपेक्षा भारत के पूर्वीय देशों में बौद्ध धर्म अभी संपन्न था। केवल प्रयग और काशी में बौद्धों का अत्यधिक तिरस्कार होता था तथा शिवलिंग की पूजा नगरों -ग्रामों के प्रत्येक घरों में होने लगी थी। वैसे इस समय में सम्पूर्ण उत्तर भारत में प्राचीन वैदिक धर्म के स्थान पर नवीन हिंदू धर्म स्थापित हो रहा था। प्राचीन वैदिक धर्म से इस नवीन हिंदू धर्म में दो बड़े अंतर (भेद) थे- एक सिद्धांत संबंधी तथा दूसरा आचार- विचार संबंधी। प्राचीन धर्म से नवीन धर्म का सिद्धांत संबंधी भेद यह था कि प्राचीन वैदिक धर्म में तत्वों के देवता माने जाते थे और सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान ईश्वर की कल्पना की गई थी उसके स्थान पर नवीन हिंदू धर्म में ये देवता मूर्तिमान थे तथा इन पर परमेश्वर का एक मूर्त त्रिदेव समूह का था। यही त्रैकत्व नवीन हिन्दू धर्म की एक नई वस्तु थी। आचार सम्बन्धी नई बात मूर्तिपूजा थी। वैदिक धर्म में जो यज्ञ का महत्व था वही स्थान नये धर्म में देव मन्दिरों को प्राप्त हो गया तथा प्रतिमा पूजन का प्रारंभ एक नई वस्तु थी। इस काल में सर्वत्र राजनीतिक अन्धकार व्याप्त था। कोई प्रबल स्वराज्य सत्ता देश में नहीं थी। यहअन्धरात्रि की स्थिति विशेषकर नवीं एवं दशवीं शताब्दी में थी। तत्पश्चात ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी में दिल्ली और अजमेर में राजपूत राज्य स्थापित हुआ। उनकी चाल, व्यवहार, पद्धति सब विक्रम और शिलादित्य से निराली व अनूठी थी। इस प्रकार इस अन्धरात्रि ने प्राचीन को अवार्चीन से पृथक कर दिया था। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि प्राचीन हिन्दूओं ने विदेशी आक्रामकों को अपने धर्म और जाति में मलिया लिया था। वैदिक आर्यों ने जब द्रविड़, असुरों आदि से युद्ध किये तो कालान्तर में ये दोनों जातियां भी आर्यों में सम्मिलित हो गईं। इसी प्रकार शक, तुर्क, आभीर, सीरियन, गुर्जर, हूण आदि जातियों को भी आर्यों ने अपने भीतर सम्मिलित कर लिया था। विभिन्न जातियों को अपने में सम्मिलित कर लेने का यह कार्य आर्यों ने राजनैतिक उन्नति और सामाजिक संगठन के विचार से किया था, परन्तु इन जातियों के मिश्रण से आर्यों का प्राचीन वैदिक धर्म बिलकुल विकृत हो गया। इन विदेशी जातियों में अनेक समृद्ध विचार वाली तथा उन्नत आचार वाली भी थीं तथा वे जातियां अपने साथ अपने धर्म के संस्कार, अपने कुल, आचार और परम्परागत विचारों को लेकर हिंदू धर्म में सम्मिलित होकर एक हुए। ये पश्चिमी एशिया से आई हुई जातियां, जो अनेक आचार साथ लाई, उनमें एक मूर्ति पूजा भी थी। प्राचीन आर्यों की दो वैदिक शाखाएं थीं- एक ज्ञानकांडी जो उपनिषद्पंथी थे, दूसरे कर्मकांडी जो ब्राह्मणपंथी थे। बौधों ने जब वैदिक धर्म को छिन्न- भिन्न कर दिया तो नई संक्षिप्त भाषा में दर्शनादि का निर्माण हुआ। दर्शनों में प्राचीन वैदिक दोनों पंथों पर दो नये दर्शन लिखे गये। उपनिषद के ब्रह्म तत्व पर उत्तर मीमांसा अथवा वेदांत और ब्राह्मणों के कर्मकाण्ड पर पूर्वमीमांसा। ये पूर्व मीमांसाकार जैमिनी उपनिषद पंथ के परम शत्रु थे। एक बात और भी थी कि उपनिषद का ब्रह्म तत्व क्षत्रियों ने और ब्राह्मणों का कर्मकाण्ड ब्राह्मणों ने अपना लिया था तथा दोनों ही वेदों को अपना समर्थक बतलाती थीं। उपनिषद पंथी राजा लोग जनक विदेह जैसे यद्यपि ब्राह्मण की कर्मकाण्ड विधि पर यज्ञ करते थे, परन्तु वे अपने ही ब्रह्मज्ञान की बातें ब्राह्मणों से छिपाते रहते थे, सरलतापूर्वक बतलाते नहीं थे। ऐसी परिस्थिति में भारत के केरल राज्य के कालडी ग्राम में शंकराचार्य का जन्म एक वेदाचार संपन्न तपोनिष्ठ नंबूदरि ब्राह्मण के घर में हुआ। उनकी मातृभाषा मलयालम थी लेकिन अलौकिक प्रतिभा के बल पर बहुत कम समय में ही उन्होंने महाभाष्य पर्यंत संस्कृत का अध्ययन कर लिया। तत्पश्चात वे अद्वैत वेदान्त के महान आचार्य गौड़पाद के शिष्य गोविन्द भगवत्पाद की तलाश में लम्बी यात्रा करते करते हिमालय के दुर्गम भाग उत्तराखण्ड आ पहुंचे। गोविंद भगवत्पाद इस कुशाग्र अल्पव्यस्क विद्यार्थी की अद्भुत प्रतिभा को देखकर चमत्कृत रह गये तथा उन्होंने इस बालक को अद्वैत सिद्धांत का गूढ़ रहस्य बतलाया। गुरु के चरणों में तीन वर्षों तक शंकर ने अद्वैत साधना की और अद्वैत तत्व में पारंगत हो गये। वहाँ से वे काशी आये और मणिकर्णिका घाट पर आसन जमाकर अपने अद्वैत सिद्धांत का प्रवचन करने लगे। एक अल्पव्यस्क यति की ऐसी बड़ी ही रहस्य एवं प्रगल्भ वाणी को सुनकर विद्वत्मण्डली आनद से गदगद हो उठी वहीँ काशी के पंडितों में खलबली मच गई। काशी में ही शंकर के प्रथम शिष्य सनन्दन ने दीक्षा ली थी।काशी में अपने विद्वत्बल का संतुलन कर लेने के पश्चात् शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्र पर भाष्य बनाने का मन बनाकर व्यासाश्रम की ओर प्रस्थान किया। अपनी शिष्यमण्डली के साथ उत्तराखण्ड की ओर जाते हुए इन्हें पता चला किहृषिकेश तक समूचा उत्तराखण्ड चीनी डाकूओं के भय से आक्रान्त है तथा इन चीनी डाकूओं के आतंक से भगवान यज्ञेश्वर विष्णु की मूर्ति गंगा में डाल दी गई थी। शंकर ने यज्ञेश्वर विष्णु की मूर्ति का उद्धार किया फिर वे बद्रीनाथ की ओर चले। इस समय यह उत्तराखण्ड उत्तर भारत से विच्छिन्न था तथा चीन और तिब्बत की सीमाओं से प्रभावित था। सर्वत्र चीनी डाकूओं के झुण्ड के झुण्ड घूमते थे और यात्रियों तथा गांवों को लूटते रहते थे।शंकर जब बद्रीनाथ क्षेत्र पहुंचे तो इन्हें ज्ञात हुआ कि डाकूओं ने मन्दिर को नष्ट कर दिया है और पुजारियों ने मूर्ति को नारद कुण्ड में छुपा रखा है तो मूर्ति को नारदकुण्ड से निकालकर शंकर ने मूल मन्दिर में प्रतिष्ठा की और स्वजातीय एक नम्बूदरि ब्राह्मण को उसकी पूजा- अर्चना के लिए नियुक्त किया। उसी ब्राह्मण के वंशधर आज तक बद्रीनाथ भगवान के पुजारी होते चले आये हैं तथा वे रावल कहलाते हैं। इसके पश्चात् शंकर बद्रीनाथ के उत्तर में आगामी व्यास गुहा में जाकर रहने लगे। अगम्य व्यास गुहा में ही चार वर्ष तक रहकर ब्रह्मसूत्र, गीता, उपनिषद् तथा सनत्सजातीय पर अपने भाष्य रचे तथा शिष्यों को उन्हें पढ़ाया। उनका शिष्य सनन्दन बड़ा ही प्रतिभाशाली था। शंकर ने अपना भाष्य उसे तीन बार पढ़ाया और उसकी सेवा से प्रसन्न होकर उसका नाम पादपद्म रखा। आगे चलकर सनंदन का वही नाम प्रसिद्द हो गया। चार वर्षों के दौरान वहीं पर व्यासगुहा में ही रहकर प्रस्थानत्रयी पर भाष्य रचा और शिष्यों को पढ़ाकर वे केदारक्षेत्र आये। केदारक्षेत्र में शंकर ने तप्तकुण्ड का आविष्कार किया। फिर वे कुछ दिन गंगोत्री में रहे। तत्पश्चात वे उत्तरकाशी चले गए। इस समय तक शंकर का नाम तथा यश सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में फैल चुका था तथा बड़े- बड़े पंडित दूर- दूर देशस्थ जो वहाँ पहुंचते थे, उनसे वाद- विवाद और शास्त्रार्थ किया करते थे। इस समय उत्तर भारत में दो कथित महान पंडित वेदोद्धारक कुमारिल भट्ट और खण्डन मिश्र उपस्थित थे। शंकर ने उन दोनों की बहुत नाम और कीर्ति सुनी थी। अत: शास्त्रार्थ में पराजित कर उन दोनों को अपना अनुगत शिष्य बनाने की कामना से शंकर उत्तराखंड से यमुना के किनारे- किनारे प्रयाग आ पहुंचे। कुमारिल भट्ट महान पंडित एवं संपन्न गृहस्थ थे। उनके पास अनेक धान के खेत थे। पाँच सौ दासियाँ थीं। बड़े- बड़े राजाओं नयून्हें जागीर और जायदाद प्रदान की थी। कहा जाता है कि कुमारिल भट्ट ने नालन्दा के पीठस्थविर महाप्रज्ञ धर्मपाल, जो कि प्रसिद्द विज्ञानवादी, योगाचार और शून्यवाद के दिग्गज आचार्य थे, जिन्होंने बसुबन्ध के योगाचार पर विज्ञप्तिमात्रता सिद्धिव्याख्या और आर्यदेव के शून्यवाद पर शत्शास्त्र वैषुल्य भाष्य लिखा था, से छद्मवेष में बौद्धागम पढ़ा था।पीछे कुमारिल ने इन्हीं धर्मपाल को शास्त्रार्थ में पराजित किया था। कुमारिल ने शबर स्वामी के मीमांसा भाष्य पर टिका लिखी थी, जो वार्तिक के नाम से प्रसिद्ध है। इस मीमांसा में कुमारिल ने धर्म प्रामाण्य की सूक्ष्म छान- बीनकर वेदों का स्वत: प्रामाण्य भारी परिष्कार से सिद्ध किया था। कुमारिल ने धर्म शास्त्र निर्णय की ऐसी पद्धति निकाली थी कि जिससे बारह सौ वर्षों तक पंडितगण उसी पद्धति से धर्म व्यवस्था करते रहे। सम्प्पूर्ण उत्तराखण्ड में कुमारिल की तूती बोल रही थी और वे वैदिक यज्ञ मार्ग और स्मार्त गृहस्थ धर्म को पुनर्जीवित करने में भागीरथ प्रयत्न कर रहे थे।इसी कारण शंकर ने कुमारिल को अपने प्रभाव में लाने की इच्छा की थी। ब्रह्मसूत्र पर भाष्य उन्होंने रचा ही था उनका विचार था कि कोई असाधारण दिग्गज विद्वान उस पर वार्तिक लिखे। इस समय कुमारिल से बढ़कर महापंडित उनके दिमाघ में तथा सत्य में ही कोई दूसरा भारत में नहीं था। उतरकाशी से चलकर जब शंकर प्रयाग पहुंचे तो उन्होंने देखा कि कुमारिल तुषाग्नि में जलकर अपने शरीर को भष्म कर प्रायश्चित कर रहे थे। इतने बड़े मीमांसक को इस प्रकार शरीरान्त करते देख शंकर को बड़ा ही दु:ख हुआ। शंकराचार्य की कुमारिल से बहुत कम ही बात हुई। कुमारिल ने शंकराचार्य को मंडन मिश्र को अपना अनुयायी बनाने की सलाह दी। शंकर जब उत्तरकाशी में आये तब उनकी मुठभेड़ काशी के धुरंधर पंडित मंडन मिश्र से हुई जो पूर्वमीमांसा वादी थे। मण्डन मिश्र और उनकी पत्नी उभय भारती दोनों बड़े ही वाग्मी थे, परन्तु शंकर ने उन्हें शास्त्रार्थ में हराकर सन्यासी बना लिया। उनका नाम सुरेश्वर रखा और उन्हें साथ ले वे श्रृंगेरी पहुंचे तथा वहाँ मठ की स्थापना की और उसे अद्वैत प्रचार का प्रधान अड्डा बनाया। श्रृंगेरी मठ में शंकर ने अपने शिष्यों से अपने भाष्य पर वार्तिक लिखवाया। अब शंकर की मण्डली में बड़े- बड़े दिग्गज विद्वान पंडित थे उनके चौदह प्रमुख शिष्यों में से पांच सन्यासी थे। चार पटशिष्य थे- सुरेश्वराचार्य (मंडन मिश्र), पद्मपादचारी (सनंदन), हस्तामलकाचार्य और तोरकचार्य। अपने चारों शिष्यों को शंकर ने चारों दिशाओं में पीठ स्थापित काके उन्हें पीठाधीश्वर बनाया। इनमें ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) बद्रिकाश्रम में, गोवर्द्धन मत जग्गनाथ पुरी में, शतदा मत द्वारकापुरी में तथा श्रृंगेरी मत रामेश्वरम दक्षिण में स्थित हैं। इन मठों का अधिकार क्षेत्र भी आचार्य ने निश्चित कर दिया। भारत का उतरी और मध्य भू-भाग ज्योतिर्मठ के शासनाधीन, पश्चिमी भाग द्वारका स्थित शारदा मत के शासन में, दक्षिणी भाग श्रृंगेरी मत तथा पूर्वी भाग गोवर्द्धन मत के अंतर्गत किये। इन मठों में जो चार शिष्य पीठाधिप नियुक्त किये गये वे भी नियम से बनाये गये। वैदिक सम्प्रदाय में वेदों का सम्बन्ध भिन्न-भिन्न दिशाओं से माना गया है। ऋग्वेद का सम्बन्ध पूर्व दिशा से, यजुर्वेद का सम्बन्ध दक्षिण से, सामवेद का पश्चिम तथा अथर्व का उत्तर से । यज्ञ पात्रों में भी इसी नियम से पुरोहित उर्ध्वयु बैठते हैं। जिस शिष्य का जो वेद था, उसकी नियुक्ति उसी दिशा में की गई। पद्मनाभ ऋग्वेदी काश्यप गोत्री ब्राह्मण था, उसकी नियुक्ति पूर्व दिशा में गोवर्द्धन मठ की, सुरेश्वराचार्य शुक्ल यजुर्वेद की कण्व शाखा के ब्राह्मण थे उन्हें दक्षिण की श्रृंगेरी मत की हस्तामलक को सामवेदी को पश्चिम के शारदा मठ की तथा तोरक अथर्ववेदी को उतराखण्ड के ज्योतिर्मठ की गद्दी सौंपी।

Published / 2021-10-30 14:08:11
बढ़ती महंगाई और राजनीतिक प्रहसन

एबीएन डेस्क। आज जब मैंने उन्हें सुना तो स्वयं की बुद्धि और शिक्षा पर बड़ा गुस्सा आया, यूं तो हर दिन ही नेता बिरादरी के लोग कुछ न कुछ बोलते ही रहते हैं, लेकिन इनका बोलना बाकियों के बोलने से भिन्न था। इनकी माने तो हमें आजादी 99 बरस की लीज पर मिली है। यह कितनी नई बात बताई गई, जिससे इतिहासकार भी अनजान थे। हमने कभी ऐसा नहीं सुना, पढ़ने का तो सवाल ही नहीं उठता। हम यहां आजादी का अमृत महोत्सव मनाने में लगे हुए हैं और अब जाकर पता चल रहा है कि 25 बरस बाद आजादी की वैलिडिटी उनके कहें अनुसार खत्म होने वाली है! उन्हें सुन यह सिद्ध हो गया कि इतिहास से जुड़े झूठ को इतने आत्मविश्वास के साथ बोला जाए तो वह सच लगने लगता है। अब इस देश में स्टैण्डप कॉमेडियन क्यों अप्रासंगिक हो रहे हैं, इस बात का जवाब भी मिल गया है। उनके इस बयान के बाद हास्य कलाकार ने अपना बोरिया-बिस्तर यह कहते हुए समेट लिया कि अब भला मेरा यहां काम ही क्या रह गया है? लोगों को हंसाने का सारा दारोमदार राजनीति ने अपने ऊपर ले लिया है। नतीजतन कॉमेडियन को स्टार्टअप की तलाश में भटकना पड़ रहा है। अब तो बच्चे भी टीवी पर नेताओं को देख हसने लगे हैं। शायद उन्हें उनमें टॉम एंड जैरी, मोटू-पतलू या डोरेमॉन का कोई किरदार नजर आ जाता हो। पिछले छह-सात बरस में पार्टी प्रवक्ताओं ने जो मुकाम हासिल किया है वह अतुलनीय है। उन्हें सुनने पर उनके तर्क और तथ्य के आगे वाह किए बिना नहीं रहा जा सकता, यह बात अलग है कि आह निकल रही होती है। क्या सच, क्या झूठ, इसका अंतर ही समाप्त करके रख दिया है। बेचारी अभागी जनता एक दफे तो न्यूज एंकर और पार्टी प्रवक्ता में कन्फ्यूज हो रही होती है कि दोनों में असली प्रवक्ता कौन है। इस दौर में जब इतिहास के किसी ऐसे सच से पर्दा उठता है तो महंगाई के उत्सव में हंसी के फव्वारे छूट पड़ते हैं। महंगाई का तनाव कम करने के लिए ऐसे बयान बहुत जरूरी हैं। वैसे उन्होंने यह तो बताया कि आजादी 99 साल की लीज पर मिली है, लेकिन यह बताना तो भूल ही गई कि इसे आगे बढ़वाने के लिए हमें क्या करना होगा? इधर पेट्रोल पम्प पर पेट्रोल भरवाते समय हर दिन मशीन में जीरो के बजाय मूल्य को पहले देखने वाला आम आदमी इस दुविधा में है कि महंगाई से लड़ने में ही उसके प्राण निकले जा रहे हैं, ऐसे में 25 बरस बाद आजादी की लड़ाई के लिए भी तैयार होना होगा, यह उसे अभी से चिंता में डाले देता है। अब तक तो सिर्फ यही कहा जाता था कि गलत इतिहास पढ़ाया गया है, किसे पढ़ाया गया है, अब यह भी समझ आ रहा है। यदि एनसीबी वाकई अपना काम ठीक से करती तो कम से कम इस तरह के बयान तो नहीं आते। महंगाई को आप वैसे क्रांति से जोड़ सकते हैं जिसमें शासकों ने कहा था देश तुम्हें देता है सबकुछ तुम भी तो कुछ देना सीखों। हम ठहरे गुलाम ले-ले कर इतने आदी हो गये कि हम समझ ही नहीं पाते कि देना हमारे स्वभाव में है नहीं। कई दर्जन लोग कहते हैं यह महंगाई विकास के लिये है अगर आप इसके शिकंजे से जिंदा बच गये तो आपके लिये एक शानदार भारत होगा, सभी सुविधा से युक्त धनपतियों से भरा खुश होने के लिये। जय हो इन राजनेताओं की।

Published / 2021-10-29 12:59:03
नफरती मंच में बदलती सोशल मीडिया

एबीएन डेस्क। सोशल मीडिया को नफरती मंच में बदलने की साजिश को विफल करना होगा। फेसबुक के संस्थापक-सीईओ मार्क जकरबर्ग ने कहा था कि फेसबुक के इतिहास में भारत का बहुत महत्व है। कंपनी जब बुरे दौर से गुजर रही थी और बंद होने की कगार पर थी तब मेरे गुरु स्टीव जॉब्ज (एपल के संस्थापक) ने मुझे भारत के एक मंदिर जाने की सलाह दी। आजकल फेसबुक, ट्विटर, यू-ट्यूब जैसे सोशल मंचों पर ऐसी सामग्री परोसी जा रही है, जो अशिष्ट, अभद्र, हिंसक, भ्रामक एवं राष्ट्र-विरोधी होती है, जिसका उद्देश्य राष्ट्र को जोड़ना नहीं, तोड़ना है। इन सोशल मंचों पर ऐसे लोग सक्रिय हैं, जो तोड़-फोड़ की नीति में विश्वास करते हैं, वे चरित्र-हनन और गाली-गलौच जैसी ओछी हरकतें करने के लिये तत्पर रहते हैं तथा उच्छृंखल एवं विध्वंसात्मक नीति अपनाते हुए अराजक माहौल बनाते हैं। एक प्रगतिशील, सभ्य एवं शालीन समाज में इस तरह की हिंसा, नफरत और भ्रामक सूचनाओं की कोई जगह नहीं होनी चाहिए, लेकिन विडम्बना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कानून के चलते सरकार इन अराजक स्थितियों पर काबू नहीं कर पा रही है। फेसबुक, ट्विटर, यू-ट्यूब पर पांव पसार रही हैं देश को तोड़ने की साजिशें एवं जनता के दिलों में दरारें डालने की उच्छृंखलताएं। इन राष्ट्र-विरोधी विध्वंसात्मक उपक्रमों, नफरत फैलाने वाले भाषणों, तोड़मोड़ कर प्रस्तुत करते घटनाक्रमों, हिंसा एवं साम्प्रदायिकता पर जश्न मनाने और भ्रामक सूचनाएं परोसने की जैसे होड़-सी लग गई है। यह तथ्य खुद फेसबुक और कुछ अमेरिकी मीडिया संस्थानों ने अपने अध्ययन के बाद प्रकट किए हैं। अध्ययनकर्ताओं ने दो साल पहले फेसबुक पर खाते खोले और लगातार नजर बनाए रखी कि इस मंच पर भारत में कैसी सामग्री परोसी जा रही है। वे देख कर हैरान हो गए कि उनमें भ्रामक सूचनाओं और नफरत फैलाने वाले विचारों का अंबार लगा हुआ है। हालांकि फेसबुक का दावा है कि वह किसी आपत्तिजनक सामग्री को प्रकाशित नहीं करता, ऐसा करने वालों को तुरंत चेतावनी भेजता और सामग्री को रोक देता है। प्रश्न है कि फेसबुक की यह व्यवस्था यहां क्यों फेल हो गयी? कहीं खुद फेसबुक ऐसी नफरत की आंधी को सर्वव्यापी बनाने के लिये जिम्मेदार तो नहीं है? कहने को ट्विटर, यू-ट्यूब, फेसबुक सामाजिक मेल-जोल के मंच कहे जाते हैं, लेकिन इन मंचों पर जितनी राजनीतिक, धार्मिक एवं सामाजिक नफरत एवं द्वेष फैलाया जा रहा है, वह चिन्ताजनक हैं। फेसबुक के आंतरिक दस्तावेजों के मुताबिक फेसबुक भारत में भ्रामक सूचना, नफरत वाले भाषण और हिंसा को लेकर जश्न मनाने वाले कंटेंट को रोक नहीं पा रहा है, पर बड़ा सवाल है कि वह क्यों नहीं रोक पा रहा है? क्या यह भारत के खिलाफ एक षड्यंत्र का संकेत है? प्रश्न यह भी है कि इस प्रकार की भ्रामक, उच्छृंखल, विध्वंसात्मक एवं नफरत-द्वेष फैलाने की नीति से किसका हित सध रहा है? विचित्र है कि भारत में ऐसी प्रवृत्तियां तेजी से बढ़ी हैं। सच्चाई यह है कि भारत की कुल 22 भाषाओं में से केवल पांच में फेसबुक ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जरिए ऐसी सामग्री की जांच एवं विश्लेषण किया जाता है। यहां तक कि हिंदी और बांग्ला जैसी बड़ी भाषाओं में भी परोसी जाने वाली सामग्री का विश्लेषण करने का कोई उपाय उसके पास नहीं है। जाहिर है, इससे उपद्रवी और संकीर्ण मानसिकता के लोगों को एक खुला मैदान मिल गया है। इन भ्रामक सूचनाओं के माध्यम से चुनाव को प्रभावित करने की साजिश भी होती रही है। फेसबुक के संस्थापक-सीईओ मार्क जकरबर्ग ने कहा था कि फेसबुक के इतिहास में भारत का बहुत महत्व है। कंपनी जब बुरे दौर से गुजर रही थी और बंद होने की कगार पर थी तब मेरे गुरु स्टीव जॉब्ज (एपल के संस्थापक) ने मुझे भारत के एक मंदिर जाने की सलाह दी। वहां से लौटकर मुझे आत्मबल मिला और कंपनी सफल होती गई। इसलिये भारत उनकी लिस्ट में ऊपर है। अभी ठीक एक साल पहले फिर जकरबर्ग ने अपनी भारत यात्रा के दौरान इशारा किया था कि उनका इरादा गरीब लोगों तक इंटरनेट पहुंचाने का है। फेसबुक ने भारत में लोकप्रियता की एक नई मिसाल कायम की थी। लेकिन जिस भारत ने फेसबुक को नया जीवन दिया, क्या वह उस देश की अखण्डता को तोड़ने का जिम्मेदार होना चाहेगा? ट्विटर, यू-ट्यूब, फेसबुक जैसे सोशल मंचों का विकास इस उद्देश्य से किया गया था कि उनके जरिए लोग आपस में संपर्क बनाएं, स्वस्थ और स्वतंत्र विचार प्रकट कर सकें और आपसी सौहार्द स्थापित कर सकें। भारत की प्रगति से ईर्ष्या करने वाली शक्तियों एवं राजनीतिक दलों ने इसे अपने प्रचार एवं तथाकथित संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति का माध्यम बना डाला। भारत में शायद ही कोई राजनीतिक दल हो, जिसके फेसबुक पर आधिकारिक खाते न हों। अधिकारिक खाते होने में कोई त्रुटि नहीं है, पर जब उनके समर्थकों, कार्यकतार्ओं ने फर्जी नामों से खाते बना कर अपने दलगत आक्रामक विचार प्रकट करने शुरू किए, तो वातावरण दूषित एवं हिंसक होता गया। फिर तो न सिर्फ वहां दलगत मतभेद उभरने शुरू हो गए, राजनीतिक स्वार्थ सामने आने लगे। एक दल द्वारा दूसरे दल का विरोध करना, उसे नीचा दिखाना, उसकी प्रगति में बाधा उपस्थित करना एवं सफलता के नये कीर्तिमान गढ़ने वाले दलों का मनोबल गिराना आम बात हो गयी। उनकी इन बनावटी, भ्रामक एवं झूठी सूचनाओं का पदार्फाश होता है तो एक भी मुद्दा ऐसा नहीं मिलता जो तथ्यपरक, सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक पहलू का स्पर्श करता हो। यह तो जानबूझकर अराजकता फैलाने का जरिया बनता जा रहा है और इनमें विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता आपस में उलझते देखे जाने लगे, बल्कि भ्रामक सूचनाएं तथा नफरती विचार परोस कर उत्तेजना फैलाने में अपनी शान समझने लगे। कई बार इसके बुरे परिणाम भी देखने को मिले हैं, जब लोग ऐसे विचारों के प्रभाव में आकर भीड़ के रूप में हिंसा करते पाए गए। केवल चरित्र-हनन एवं अराजकता फैलाने के उद्देश्य से किया जाने वाला ऐसा प्रयत्न कितना जघन्य एवं राष्ट्र-विरोधी है, समझने वाले व्यक्ति अच्छी तरह समझते हैं। फेसबुक जैसे मंच निर्बाध हैं, वहां बिना कोई शुल्क अदा किए किसी को भी अपना खाता खोलने की आजादी है। आजकल हर हाथ में स्मार्टफोन आ गया है, उससे बहुत सारे लोगों को इस मंच का बेलगाम इस्तेमाल करने की लत-सी लग गई है। लेकिन इस लत से नुकसान राष्ट्र का होता है। केंद्र सरकार ने पिछले दिनों इन सामाजिक मंचों को अनुशासित बनाने का प्रयास किया था, पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की संवैधानिक व्यवस्था इसमें बड़ी बाधा है। हालांकि सोशल मीडिया के ये मंच स्वस्थ लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक भूमिका भी निभाते देखे जाते रहे हैं। उन पर कड़ाई से बहुत सारे ऐसे लोगों के अधिकार भी बाधित होने का खतरा है, जो स्वस्थ तरीके से अपने विचार रखते और कई विचारणीय मुद्दों की तरफ ध्यान दिलाते हैं। मगर जिस तरह बड़ी संख्या में वहां उपद्रवी, हिंसक, राष्ट्रीय और सामाजिक समरसता को छिन्न-भिन्न करने वाले तत्त्व सक्रिय हो गए हैं, उससे चिंता होना स्वाभाविक है। उन पर अंकुश लगाने एवं उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान करना जरूरी है।

Published / 2021-10-03 14:30:50
पहचान की राजनीति से ही भविष्य के मुद्दे साधने की जुगत में सोरेन

एबीएन डेस्क, रांची। वर्ष 2019 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) से करारी हार का सामना करना पड़ा। झामुमो ने राष्ट्रीय जनता दल (राजद), कांग्रेस और अन्य छोटे दलों के साथ गठबंधन किया था। भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुबर दास अपनी सीट भी नहीं जीत सके। राज्य की 81 सदस्यीय विधानसभा में अकेले झामुमो के पास 30 सीट हैं। अगर भाजपा अपनी 25 सीट के साथ सरकार बनाने की जुगत भी लगाए तो इसके लिए पर्याप्त दलबदल संभव नहीं है। राज्य में ऐसा दूसरी बार होगा जब कोई सरकार अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करेगी। राज्य के मुख्यमंत्री और झामुमो नेता हेमंत सोरेन ने हाल ही में कुछ ऐसे कदम उठाए हैं जो भ्रमित करने वाले हैं। पिछले चुनाव प्रचार के दौरान सोरेन ने सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण देने का वादा किया था। यह वादा अभी तक लंबित है। इसके बजाय सरकार ने पिछले महीने एक कानून पारित किया जिसमें यह सुनिश्चित किया गया है कि सरकारी और निजी क्षेत्रों की नौकरियों में 75 प्रतिशत आरक्षण स्थानीय लोगों के लिए होगा। इन नौकरियों की वेतन सीमा 30,000 रुपये प्रतिमाह है। इस आय सीमा और इससे कम वेतन पर राज्य से बाहर के उम्मीदवारों के लिए केवल 25 प्रतिशत रिक्तियां ही होंगी। इस पर कोई भी एतराज नहीं जता रहा है क्योंकि निजी क्षेत्र का भी कहना है कि वे इन रिक्तियों को स्थानीय लोगों के माध्यम से भर रहे हैं।झारखंड में पहचान की एक मजबूत भावना है। पहले सबको एकजुट करने वाला कारक, विदेशी (दिकु), गैर-आदिवासी ही था। प्रारंभ में झारखंड के आदिवासियों ने मुगल वंश और अंग्रेजों द्वारा अपनी समृद्ध भूमि और जंगलों पर कब्जा करने के प्रयासों का पुरजोर तरीके से विरोध किया। लेकिन आदिवासी उस वक्त हाशिये पर थे जब हिंदू व्यापारी और मुस्लिम किसान यहां आए। इसके बाद ही यहां कानून-व्यवस्था और आधुनिक प्रशासन की स्थापना हुई। ब्रितानी हुकूमत और उससे जुड़े तंत्र ने इन आदिवासियों को कंगाल बनाने की प्रक्रिया आसान कर दी। प्रशासन का कामकाज दिकुओं द्वारा देखा जाता था और आदिवासी कागजी मुद्रा से वाकिफ ही नहीं थे। उनके गांव, मुख्य रूप से मुस्लिम जमींदारों के हाथों में चले गए जो जंगल में अपनी पहुंच बनाने के साथ ही वहां रहने वाले समुदायों का इस्तेमाल सस्ते श्रमिकों के रूप में करना चाहते थे। स्वतंत्र भारत ने इन समुदायों के लिए जो भी पेशकश की वह उनकी बेहतरी के लिए बहुत कम था। हालांकि मिशनरी यहां रह गए और आदिवासियों ने हिंदू धर्म और देवताओं के अपने संस्करण को नष्ट करने के प्रयासों का विरोध करना जारी रखा जो जीवित आदिवासी नेताओं के आदर्श पर आधारित थे। इनके अंदर यह अहसास बढ़ता गया कि जब तक उनकी पहचान को विशिष्ट तौर पर मान्यता नहीं दी जाती तब तक उनकी स्थिति में सुधार नहीं होगा और इसके लिए उन्हें स्वशासन और अपने प्रांत की आवश्यकता थी। झामुमो की शुरुआत 1973 में एक युवा शिबू सोरेन ने की थी। राज्य में बाहरी लोगों यानी दिकु की मौजूदगी केे साथ ही आदिवासी पहचान को भी जोड़कर रखा गया। लेकिन धीरे-धीरे, युवा आदिवासियों ने महसूस किया कि दिकु का विरोध करने की तुलना में उनका साथ देना अधिक लाभदायक था। इस तरह के सहयोग का एक नतीजा मधु कोड़ा और खदान पट्टा घोटाला था। लेकिन अब एक और खतरा मंडरा रहा है और यह झारखंड में भाजपा का बढ़ता दावा है। पार्टी के पास मैदान में उतारने के लिए नेता के तौर पर राज्य में एक विश्वसनीय चेहरा भले ही न हो लेकिन यह विचार अपने आप में ही अहम है कि आप हिंदू और आदिवासी दोनों हो सकते हैं और यह जोर पकड़ रहा है। आदिवासियों के बीच विभाजन के साथ, झामुमो को एक व्यापक पहचान की अधिक आवश्यकता है जो एक ऐसे व्यक्ति के प्रति उपयुक्त है जो न तो हिंदू है, न ही मुस्लिम बल्कि झारखंडी है। झारखंड विधानसभा में नमाज कक्ष बनाने का विवाद उसी कवायद का हिस्सा है। सरकार ने पिछले महीने घोषणा की थी कि मुस्लिम विधायकों को एक अलग कमरा आवंटित किया जाएगा ताकि वे उस आवंटित जगह में नमाज पढ़ सकें। यह कदम इस तथ्य को मान्यता देने से भी जुड़ा था कि झारखंड में मुसलमान राज्य की व्यापक पहचान का हिस्सा बन गए हैं और उनके साथ झारखंडी के तौर पर और मुस्लिम होने के नाते भी वैसा ही बरताव होना चाहिए और अकेले झामुमो ही उनके हितों की रक्षा सुनिश्चित कर सकती है। इस कदम का भाजपा ने जमकर विरोध किया और उनकी पार्टी के विधायकों ने मांग की थी कि उन्हें हनुमान चालीसा पढऩे के लिए एक अलग कमरा दिया जाए। इसका मुसलमानों पर गहरा असर हो सकता है। फिलहाल झारखंड विधानसभा के चार मुस्लिम विधायकों में से दो कांग्रेस और दो झामुमो के हैं। राजमहल विधानसभा सीट पर जहां मुस्लिम आबादी अच्छी है वहां दो मुस्लिम उम्मीदवारों को हार का मुंह देखना पड़ा और भाजपा को जीत मिल गई क्योंकि मुस्लिम समुदाय के मतों में विभाजन हो गया। सोरेन और झामुमो को स्पष्ट रूप से इसी बात की चिंता है क्योंकि ऐसा ही कुछ अन्य जगहों पर भी हो सकता है।अकेले मुस्लिम पहचान को बढ़ावा देने में अपने खतरे हैं। हालांकि झामुमो ऐसा नहीं करने जा रही है। हाल ही में, जब मुस्लिम समुदाय ने पैगंबर की तस्वीर को पाठ्यपुस्तक में शामिल किए जाने का विरोध किया तब सरकार ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगी। पुस्तक के इस अध्याय को तुरंत हटा दिया गया। आने वाले दिनों में हिंदू, मुस्लिम या आदिवासी से एक नई राजनीतिक दूरी बरतने की उम्मीद की जा सकती है और उसकी जगह रांची से मुझे झारखंडी होने पर गर्व है जैसे संदेश को बढ़ावा दिया जा सकता है। यही हेमंत सोरेन की भविष्य की राजनीति का नुस्खा होने जा रहा है।

Published / 2021-09-30 12:48:24
टाना भगत के रूप में आज भी गांधी जिंदा हैं...

एबीएन डेस्क। दक्षिण अफ्रीका में सत्य और अहिंसा के सफल परीक्षण के पश्चात महात्मा गांधी 1915 में भारत लौटे। इसी समय झारखंड (तब बिहार का हिस्सा) के चिंगरी गांव में एक चिंगारी फैली जो टाना भगत आंदोलन के नाम से देश के इतिहास में दर्ज है। नियति ने इस आंदोलन का बापू के सत्य और अहिंसा से ऐसा संगम प्रस्तुत कर दिया कि टाना भगत स्वाधीनता संग्राम के अमिट हस्ताक्षर बन गये। टाना भगत आंदोलन के प्रणेता जतरा उरांव का जन्म 1888 ई में गुमला जिले के बिष्णुपुर थाने के चिंगरी नवाटोली गांव में हुआ। तंत्र-मंत्र के प्रशिक्षण के बीच उन्हें आत्म बोध हुआ। 14 अप्रैल 1914 को उन्हों ने घोषणा की कि उरांव जनजाति के देवता, धर्मेश ने उनको संदेश दिया है कि वे (जतरा) राजा बनेंगे, उनके राज्य में उनके अनुयायी ही रह पाएंगे। उनको न माननेवाले गुंगे हो जाएंगे। उनकी मुख्य शिक्षा थी; भूत-प्रेत, झाड़-फूंक आदि अंध विश्वासों का परित्याग, बलि प्रथा निषेध, मांस मदिरा का त्याग, दूसरी जाति और सरकार की नौकरी की मनाही, घरेलू तथा कृषि उपकरणों एवं आभूषणों का नदी में प्रवाह तथा उरांव देवता धर्मेश की उपासना। 1915 तक इस आंदोलन का प्रसार हजारीबाग और पलामू जिलों में हो गया और 1916 में इसकी आंच जलपाईगुड़ी के चायबागानों में पहुंच गयी जहां बड़ी संख्या में उरांव मजदूर रहते थे। तब इन्हें दबाया गया। जतरा भगत के निधन के बाद देवमनिया, शीबू, माया, बलराम, भीखू नामक शिष्यों ने अपने अपने क्षेत्रों मंय उनके आंदोलन का नेतृत्व किया। फलस्वरूप रांची, लोहरदगा गुमला पलामू और हजारीबाग के करीब ढाई लाख उरांव इस आंदोलन से जुड़ गए। मार्च 1919 में शीबू, माया, सुकरा, सिंघा और देविया को गिरफ्तार कर सजा दी गयी फिर भी आंदोलन का अंत नहीं हुआ। असहयोग आंदोलन के समय से टाना भगत आंदोलन गांधीजी के प्रभाव में आने लगा। कांग्रेस के विशेष अधिवेशन (सितंबर 1920) में अनेक टाना भगत पलामू जिले से गांधीजी को सुनने के लिए पैदल ही कलकत्ता पहुंच गए। 1921 के प्रारंभ में जब असहयोग आंदोलनकारी रांची, सेन्हा, मधुकम, इटकी ओरमाझी, कोकर, गुमला, कुरु, तमाड़, बुंडू आदि ग्रामों में सभा करने लगे तो ब्रिटिश अधिकारियों के कान खड़े हुए। रांची एसपी ने उपायुक्त को लिखा, पंद्रह दिनों की अवधि में 15 सभाएं हो चुकी हैं और तीन होने वाली हैं। मेरा अनुमान है कि इससे तीव्र गति से आक्रोश फैलेगा। इसे रोकने के लिए धरा 144 पर्याप्त नहीं। मांडर, कुरु और लोहरदगा की सभाओं पर प्रतिबंध लगा। पुन: 9 मार्च 1921 को रांची के उपायुक्त ने छोटानागपुर के कमिश्नर को लिखा कि असहयोग आंदोलन से जुड़कर टाना भगतों ने अपने आंदोलन को नया जीवन प्रदान किया है। 12 अप्रैल 1921 को टाना भगतों के गढ़, कुरु में करीब तीन हजार लोगों की सभा को रामटहल ब्रह्मचारी और मुस्लिम नेताओं ने संबोधित किया। लोगों को चरखा चलाने, शराब न पीने और हिंसा से दूर रहने का संदेश दिया गया। गांधी के वशीभूत ये टाना भगत अब झारखंड में कांग्रेस की ताकत बन गए। खादी पहनना, कांग्रेस के झंडे के साथ मीलों पैदल चलकर कांग्रेस की सभा में भाग लेना, गांधीजी और कांग्रेस के संदेशों को जन जन तक पहुंचाना इनकी दिन चर्या में शामिल हो गया। 1922 की गया कांग्रेस में कुल 800 प्रतिनिधि गया पहुंचे जिनमें भरी संख्या में टाना भगत और मुंडा शामिल थे। करीब 400 भगत और अन्य आदिवासी तो बहंगियों में हांडी और जलावन लेकर पैदल ही चले गए। 1922 में बापू की गिरफ्तारी के बाद जब असहयोग कार्यकताओं के खिलाफ दमन का दौर शुरू हुआ तो बेरो थाना और कुछ अन्य स्थानों पर टाना भगत भी उसके शिकार हुए। 1925 में गांधीजी बिहार प्रांतीय कांग्रेस के पुरुलिया सम्मलेन में पधारे वहां से उनकी छोटानागपुर यात्रा शुरू हुई। चक्रधरपुर और चाईबासा में जनसभाओं को संबोधित कर वह रांची के लिए रवाना हुए होगए। रास्ते में वह थोड़ी देर के लिए खूँटी में रुके जहाँ उनकी भेंट मुंडा और टाना भगतों से हुई जिनकी सादगी और निर्दोषता देख कर वे मंत्रमुग्ध हो गए। बापू के शब्दों में, वे खादी में विश्वास करते हैं। स्त्री और पुरुष दोनों चरखा चलाते हैं और स्वनिर्मित खादी पहनते हैं। कई लोग कंधों पर चरखा लिए मीलों पैदल चलकर आए थे। मैं ने सभास्थल पर करीब 400 भगतों को देखा जो लगन से चरखा चला रहे थे। 1926 में कांग्रेस का राष्टीय सप्ताह समारोह (6-13अप्रैल) हो या खादी प्रदर्शनी (5अक्टूबर,आर्य समाज हॉल, रांची) टाना भगत हर जगह होठों पे गांधी और हाथों में तिरंगा लेकर मौजूद रहते थे। 1927 में साइमन कमीशन के खिलाफ प्रदर्शन में (रांची, दिसंबर) टाना भगतों ने भाग लिया तो 1928 की कलकत्ता कांग्रेस में करीब 150 टाना भगत उपस्थित हुए। राजनीतिक घटनाओं से परिपूर्ण वर्ष 1930 में 26 जनवरी को रांची में सदर हॉस्पिटल के समीप पी सी मित्र के नेतृत्व में टाना भगतों ने स्वतंत्रता दिवस समारोह का आयोजन किया। रांची में इसी वर्ष जून में 40 भगतों ने बिना अनुमति के जुलूस निकालकर सविनय अवज्ञा आन्दोलन में शिरकत की और आठ भगतों ने गिरफ्तारी दी। 1940 की रामगढ़ कांग्रेस में टाना भगतों ने गांधीजी को 400 रु की थैली समर्पित कर राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया तो भारत छोडो आंदोलन का इतिहास भी इनकी की चर्चा के बिना अधूरा है। 18 और 22 अगस्त 1942 को टाना भगतों की टोली ने क्रमश: विष्णुपुर थाने को जलाया और इटकी के समीप रेल की पटरियां उखाड़ दीं। 23 अगस्त को चमरा भगत और गोवा भगत भाषण देते हुए गिरफ्तार हुए तो 24 और 28 अगस्त को क्रमश: डाक सामग्री छीनने और बेरमो थाने पर कब्जा करने के आरोप में कुछ टाना भगतों की गिरफ्तारी हुई। इन टाना भगतों के दो ही आदर्श थे जतरा भगत और महात्मा गांधी। जतरा आश्विन शुक्ल अष्टमी को धरती पर आए पर उनके भगतों को उनकी अंगरेजी जन्म तिथि ज्ञात नहीं थी तो उन्होंने 2 अक्टूबर को ही गांधीजी और जतरा भगत का जन्म दिवस मानना शुरू किया। राष्ट्रपिता के जन्म दिवस पर टाना भगतों के दोनों आदर्शों को श्रद्धांजलि...

Published / 2021-09-16 13:57:28
भारत के सपनों को पूरा करने के लिए जरूरी हैं नरेन्द्र मोदी : रघुवर दास

एबीएन डेस्क। 26 मई 2014 की शाम राष्ट्रपति भवन में दूधिया रंग के सफेद कुरते-पायजामे पर घी के रंग की सदरी पहने जिस व्यक्ति ने नए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली उसने कभी रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने का काम किया था। यह तथ्य भारत के लोकतंत्र की मजबूती को बयान करने के साथ-साथ इस शख्सियत के कठोर परिश्रम, राजनीतिक कौशल और जन प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है। श्री नरेंद्र मोदी उस नेता को बेदखल करके आए थे, जो अपनी शानदार शैक्षणिक और अकादमिक उपलब्धियों के लिए जाने जाते थे। मगर ऐसा क्या था, जो लोगों ने उन्हें हटा कर एक ऐसे नेता को बड़ा बहुमत देकर चुना जो शैक्षणिक-अकादमिक उपलब्धियों के लिए नहीं जाना जाता था। दरअसल इस नेता का सेवाभाव और जवाबदेही लेने के लिए आगे खड़ा होना उसे खास बनाता था। 2014 की उस शाम से लेकर अब तक यह यात्रा लगातार जारी है और एक के बाद एक फैसले लेकर मोदी ने अपने मतदाताओं को आश्वस्त किया है कि उन्हें जिस कार्य के लिए चुना गया है वे उसे तत्परता से कर रहे हैं। हालांकि इसके बहुत पहले श्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा शुरू हो चुकी थी। 2001 में जब गुजरात में एक बड़ा भूकंप आया था और पूरा गुजरात पस्त हुआ पड़ा था, तब वे गुजरात के मुख्यमंत्री बनाए गए। लेकिन उन्होंने अपनी प्रशासनिक कुशलता दिखाते हुए विश्वकर्मा की तरह बेहद कम समय में गुजरात को दोबारा से खड़ा किया। मुख्यमंत्री बने कुछ ही महीने हुए थे कि गुजरात दंगों की आग में बुरी तरह से झुलस गया। यह कोई पहली बार नहीं था अपितु गुजरात में सांप्रदायिक झड़पों का लंबा इतिहास रहा था। यह उसी की एक कड़ी थी। लेकिन उनके कड़े प्रशासन ने इसके बाद किसी दंगे की पुनरावृत्ति नहीं होने दी। दंगों के दौर से निकाल कर उन्होंने गुजरात को शानदार बिजनेस समिट दिए। वे पहले भारतीय मुख्यमंत्री बने, जिन्होंने विदेशों में बसे भारतवंशियों की ताकत को पहचाना और राज्य के विकास में उनकी एक सक्रिय भूमिका तय की। वाइब्रेंट गुजरात समिट से वे प्रवासी भारतीयों को आकर्षित करते रहे। आज जबकि वे प्रधानमंत्री हैं उनकी यह ताकत बनी हुई है और विदेशों में बसे भारतीय वहां नए भारत के दूत बने हुए हैं। यही नहीं, जिन मुद्दों पर भारत का राजनीतिक वर्ग में डर कर बात भी नहीं करता था, उन पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने निर्भय होकर काम किया और उनके हर साहसिक काम के लिए जनता से पुरस्कार भी मिला। उन्होंने धारा 370 जैसे देश विरोधी अनुच्छेद को समाप्त किया। तो सदियों से अटके पड़े राम-मंदिर के मुद्दे के भी समाधान में बड़ी भूमिका निभाई। सबसे बड़ी बात है कि बिना किसी हिंसा के यह दोनों कार्य संपन्न हुए। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने विकास सबका, तुष्टिकरण किसी का नहीं की नीति का अनुसरण किया था। प्रधानमंत्री बनने के बाद तीन तलाक पर कानून इसी की एक कड़ी थी, जिसके कारण मुस्लिमों के एक बड़े तबके का विशेषकर महिलाओं का विश्वास और वोट उन्हें मिला। इस प्रकार उन्होंने भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में एक समावेशी सरकार दी और सबका साथ सबका विकास का नारा बुलंद किया, जो अब सबका विश्वास और सबका प्रयास से आगे बढ़ेगा। मोदी की दृष्टि ऐसी रही है जिसमें हर वर्ग के लिए कुछ न कुछ है। वे जहां पूंजी का सृजन कर रहे हैं, तो वहीं समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों को सीधे आर्थिक लाभ, जनकल्याणकारी योजनाएं और सुविधाएं देकर उन्हें भी मजबूत कर रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे श्री नरेंद्र मोदी एक देश के रूप में भारत के उन अधूरे सपनों को पूरा कर रहे हैं जो हमारे स्वाधीनता सेनानियों ने कभी देखे थे। स्वच्छता राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का सपना था। डॉ राममनोहर लोहिया देश की महिलाओं को धुआं रहित जीवन देना चाहते थे। स्वच्छ भारत, उज्ज्वला योजना, मुद्रा लोन देश की किस्मत संवर रही है। कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के दौरान जिस तरह से उन्होंने गरीब वर्ग की रोजी-रोटी का ध्यान रखा है वह आपदा को अवसर में बदलने की तरह था। जब श्रमिक शहर छोड़ कर गांवों की ओर पलायन कर रहे थे, तब उनके श्रम का रचनात्मक प्रयोग करते हुए रिकॉर्ड संख्या में प्रधानमंत्री आवास योजना के घर बनाए गए। महामारी आई और कई देशों की समृद्धि लेकर चली गई, लेकिन मोदी के नेतृत्व में भारत ने न केवल कम समय में टीका बनाया बल्कि इसे सबके लिए मुफ्त और सुलभ भी किया। सबको अहसास हुआ कि इस मुश्किल घड़ी में सरकार उनके साथ मजबूती से खड़ी है। पिछड़ा वर्ग आयोग को संविधानिक दर्जा, राज्यों को ओबीसी पहचान का अधिकार, मेडिकल-नीट के अखिल भारतीय कोटे में ओबीसी आरक्षण और केंद्रीय मंत्रिमंडल में ओबीसी के मंत्रियों की अभूतपूर्व सर्वाधिक संख्या देकर प्रधानमंत्री मोदी ने इनकी भागीदारी सुनिश्चित की। उधर, इक्कसवीं सदी के भारत को अपने सपनों और जरूरतों को पूरा करने के लिए जिस तरह के शिक्षा नीति की आवश्यकता थी, उसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लाकर पूरा कर दिया है। कौशल विकास पर जोर, भारतीय भाषाओं के विकास पर ध्यान देकर भारत की शिक्षा व्यवस्था पर लगे मैकाले के शाप का शमन भी कर दिया है। माननीय प्रधानमंत्री जी का झारखंड से गहरा लगाव रहा है। श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी द्वारा झारखंड को अलग राज्य का दर्जा दिया गया, तो आज मोदी जी उस झारखंड को संवारने का काम कर रहे हैं। उनके शासनकाल से पहले शायद ही झारखंड को इतना महत्व मिला हो। वे प्रधानमंत्री बनने के बाद 12 बार (चुनावी सभाओं को छोड़कर) झारखंड के दौरे पर आयें हैं। झारखंड से उन्होंने देश को कई बड़ी योजनाओं की सौगात दी। इसमें सबसे प्रमुख है आयुष्मान भारत। स्वस्थ भारत के निर्माण के लिए मील का पत्थर साबित हो रही इस योजना का शुभारंभ उन्होंने भगवान बिरसा मुंडा की पावन धरा से ही किया। इसके अलावा प्रधानमंत्री मानधन योजना, खुदरा व्यापारिक एवं स्वरोजगार पेंशन योजना की शुरुआत भी झारखंड से की गयी। ग्राम स्वराज योजना के तहत ग्राम उदय से भारत उदय अभियान का समापन जमशेदपुर से किया। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के लिए भी उन्होंने रांची को चुनकर विश्व पटल पर पहचान दिलायी। उन्होंने झारखंड को दोनों हाथों से सौगातें दी। झारखंड के हर गांव-घर में शौचालय हो या 70 सालों से सुदूर गांवों में बिजली पहुंचानी हो। मोदी जी ने हमेशा झारखंड को प्राथमिकता दी। इसके अलावा स्वास्थ्य क्षेत्र में उपेक्षित झारखंड को पांच मेडिकल कॉलेज, देवघर में एम्स समेत अन्य सौगातें दीं। वहीं आइआइटी, सिपेट, इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट, केंद्रीय विद्यालय, एकलव्य विद्यालय, केंद्रीय विश्वविद्यालय, खेल यूनिवर्सिटी, रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय आदि से शैक्षणिक व्यवस्था मजबूत की। संथाल के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए साहेबगंज में गंगा नदी पर मल्टीमॉडल टर्मिनल शुरू कर झारखंड को दुनिया से सीधा जोड़ दिया। अब झारखंड से बंग्लादेश व अन्य पड़ोसी देशों के लिए जलमार्ग से यातायात शुरू हो गया है। पवित्र नगरी देवघर में जल्द ही हवाई अड्डा, मलूटी के मंदिरों का कायाकल्प, सिंदरी खाद कारखाने का पुनरुद्धार, राज्य में वर्षों से अटकी पड़ी रेल परियोजनाओं को गति भी मोदी जी के कारण ही मिली है। 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रद्धेय अटल जी के द्वारा शिलान्यास किये गये एनटीपीसी के उत्तरी कर्णपुरा पावर प्लांट 16 वर्षों के बाद लोकार्पण हो या वर्ष 1970 से फाइलों में बन रहे मंडल डैम का 2019 में शिलान्यास का काम यह साबित करता है कि वे कितना रम कर काम करते हैं। उनके झारखंड के प्रति स्नेह की सूची काफी लंबी है। मोदी के नेतृत्व में सरकार ने मीलों का सफर तय किया है। अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने देश में मूलभूत सुविधाओं पर जोर दिया, तो दूसरे कार्यकाल में देश व देशवासियों को आर्थिक रूप से समृद्ध करने का काम कर रहे हैं। लेकिन देश हित और जनहित में कई लक्ष्य छूना बाकी है। इस नरेंद्र का आदर्श एक अन्य नरेंद्र (स्वामी विवेकानंद जी) का यह प्रेरक वचन है, उठो, जागो और तब तक नहीं रुको, जब तक कि लक्ष्य न प्राप्त हो जाए। ये लक्ष्य है भारत को विश्व गुरु बनाना। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि भारत की जनता इस महान विजन वाले मजबूत प्रधानमंत्री को अपना समर्थन जारी रखे। (लेखक झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री सह भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)

Published / 2021-09-14 13:36:03
हिंदी की अपनी ताकत है, वह आगे बढ़ रही है...

एबीएन डेस्क। राष्ट्रभाषा के विकास के मूल्यांकन का दिन है। हिंदी बेचारी न हो वैचारिक विमर्श में बनी रहे यह आवश्यक है। वैश्विक स्तर पर अंग्रेजी के कठोर प्रहार से अंग्रेजी को बचाने का सार्थक प्रयास का भी दिन है। 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर वर्ष 1953 से पूरे भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है। एक तथ्य यह भी है कि 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी के पुरोधा व्यौहार राजेन्द्र सिंह का 50-वां जन्मदिन था, जिन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए बहुत लंबा संघर्ष किया । स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करवाने के लिए काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, हजारीप्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविन्ददास आदि साहित्यकारों को साथ लेकर व्यौहार राजेन्द्र सिंह ने अथक प्रयास किए। बोलने वालों की संख्या के अनुसार अंग्रेजी और चीनी भाषा के बाद पूरे दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी भाषा है। लेकिन उसे अच्छी तरह से समझने, पढ़ने और लिखने वालों में यह संख्या बहुत ही कम है। यह और भी कम होती जा रही। इसके साथ ही हिन्दी भाषा पर अंग्रेजी के शब्दों का भी बहुत अधिक प्रभाव हुआ है और कई शब्द प्रचलन से हट गए और अंग्रेजी के शब्द ने उसकी जगह ले ली है। जिससे भविष्य में भाषा के विलुप्त होने की भी संभावना अधिक बढ़ गई है। इस कारण ऐसे लोग जो हिन्दी का ज्ञान रखते हैं या हिन्दी भाषा जानते हैं, उन्हें हिन्दी के प्रति अपने कर्तव्य का बोध करवाने के लिए इस दिन को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है जिससे वे सभी अपने कर्तव्य का पालन कर हिन्दी भाषा को भविष्य में विलुप्त होने से बचा सकें। लेकिन लोग और सरकार दोनों ही इसके लिए उदासीन दिखती है। हिन्दी तो अपने घर में ही दासी के रूप में रहती है। हिन्दी को आज तक संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा नहीं बनाया जा सका है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि योग को 177 देशों का समर्थन मिला, लेकिन हिन्दी के लिए 129 देशों का समर्थन क्या नहीं जुटाया जा सकता? इसके ऐसे हालात आ गए हैं कि हिन्दी दिवस के दिन भी कई लोगों को ट्विटर पर हिन्दी में बोलो जैसे शब्दों का उपयोग करना पड़ रहा है। मैं हिंदी माध्यम से पढ़ी। अंग्रेजी सहित भाषाओं के महत्व को समझती हूं। क्षेत्रिय भाषाओं का भी सम्मान मेरे दिल में है। इसके अलावा जो वर्ष भर हिन्दी में अच्छे विकास कार्य करता है और अपने कार्य में हिन्दी का अच्छी तरह से उपयोग करता है, उसे पुरस्कार द्वारा सम्मानित किया जाता है। कई लोग अपने सामान्य बोलचाल में भी अंग्रेजी भाषा के शब्दों का या अंग्रेजी का उपयोग करते हैं, जिससे धीरे धीरे हिन्दी के अस्तित्व को खतरा पहुंच रहा है। यहां तक कि वाराणसी में स्थित दुनिया में सबसे बड़ी हिन्दी संस्था आज बहुत ही खस्ता हाल में है। इस कारण इस दिन उन सभी से निवेदन किया जाता है कि वे अपने बोलचाल की भाषा में भी हिन्दी का ही उपयोग करें। इसके अलावा लोगों को अपने विचार आदि को हिन्दी में लिखने भी कहा जाता है। चूंकि हिन्दी भाषा में लिखने हेतु बहुत कम उपकरण के बारे में ही लोगों को पता है, इस कारण इस दिन हिन्दी भाषा में लिखने, जाँच करने और शब्दकोश के बारे में जानकारी दी जाती है। हिन्दी भाषा के विकास के लिए कुछ लोगों के द्वारा कार्य करने से कोई खास लाभ नहीं होगा। इसके लिए सभी को एक जुट होकर हिन्दी के विकास को नए आयाम तक पहुँचाना होगा। हिन्दी भाषा के विकास और विलुप्त होने से बचाने के लिए यह अनिवार्य है। राष्ट्रभाषा सप्ताह या हिन्दी सप्ताह 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस से एक सप्ताह के लिए मनाया जाता है। इस पूरे सप्ताह अलग अलग प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। यह आयोजन विद्यालय और कार्यालय दोनों में किया जाता है। इसका मूल उद्देश्य हिन्दी भाषा के लिए विकास की भावना को लोगों में केवल हिन्दी दिवस तक ही सीमित न कर उसे और अधिक बढ़ाना है। इन सात दिनों में लोगों को निबंध लेखन, आदि के द्वारा हिन्दी भाषा के विकास और उसके उपयोग के लाभ और न उपयोग करने पर हानि के बारे में समझाया जाता है। हिन्दी दिवस पर हिन्दी के प्रति लोगों को उत्साहित करने हेतु पुरस्कार समारोह भी आयोजित किया जाता है। जिसमें कार्य के दौरान अच्छी हिन्दी का उपयोग करने वाले को यह पुरस्कार दिया जाता है। यह पहले राजनेताओं के नाम पर था, जिसे बाद में बदल कर राष्ट्रभाषा कीर्ति पुरस्कार और राष्ट्रभाषा गौरव पुरस्कार कर दिया गया। राष्ट्रभाषा गौरव पुरस्कार लोगों को दिया जाता है जबकि राष्ट्रभाषा कीर्ति पुरस्कार किसी विभाग, समिति आदि को दिया जाता है। यह पुरस्कार तकनीकी या विज्ञान के विषय पर लिखने वाले किसी भी भारतीय नागरिक को दिया जाता है। इसमें दस हजार से लेकर दो लाख रुपये के 13 पुरस्कार होते हैं। इसमें प्रथम पुरस्कार प्राप्त करने वाले को 2 लाख रुपये द्वितीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले को डेढ़ लाख रुपये और तृतीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले को पचहत्तर हजार रुपये मिलता है। साथ ही दस लोगों को प्रोत्साहन पुरस्कार के रूप में दस-दस हजार रुपये प्रदान किए जाते हैं। पुरस्कार प्राप्त सभी लोगों को स्मृति चिह्न भी दिया जाता है। इसका मूल उद्देश्य तकनीकी और विज्ञान के क्षेत्र में हिन्दी भाषा को आगे बढ़ाना है। इस पुरस्कार योजना के तहत कुल 39 पुरस्कार दिये जाते हैं। यह पुरस्कार किसी समिति, विभाग, मण्डल आदि को उसके द्वारा हिन्दी में किए गए श्रेष्ठ कार्यों के लिए दिया जाता है। इसका मूल उद्देश्य सरकारी कार्यों में हिन्दी भाषा का उपयोग करने से है। हिंदी कई माध्यमों से विश्व में फैल भी रही है और समझी भी जा रही है। सात सुरों की महक और धमक का प्रवाह जारी ही रहेगा। कम से कम हम हिन्दुस्तानी हिंदी में हस्ताक्षर करने का कष्ट तो उठा ही सकते हैं एक निष्ठा के साथ। (लेखिका डॉ मेरी ग्रेस उर्सूलाइन इंटर कॉलेज, रांची की प्राचार्या हैं।)

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