एबीएन एडिटोरियल डेस्क। यह इंदिराजी की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष मानिकशॉ की सैन्य रणनीति और आमलोगों की दृढ़ इच्छाशक्ति और संकल्पशक्ति से संभव हुआ था। 16 दिसंबर, 1971! शाम के साढ़े चार बजे थे। भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा हेलिकॉप्टर से ढाका हवाई अड्डे पर उतरे।अरोडा़ और पाकिस्तान सेना के जेनरल एएके नियाजी एक मेज के सामने बैठे और दोनों ने पाकिस्तानी सेना द्वारा भारतीय सेना के समक्ष आत्म-समर्पण के दस्तवेज पर हस्ताक्षर किए। नियाजी ने अपने बिल्ले उतारे और अपना रिवॉल्वर जनरल अरोड़ा के हवाले कर दिया। नियाजी की आंखों में आंसू थे। इसके साथ ही, आधुनिक हथियारों और सैन्य साजोसामान से लैस पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों ने भारतीय सेना के अदम्य साहस और वीरता के आगे घुटने टेक दिए थे। इंदिरा गांधी संसद भवन के अपने दफ्तर में एक टीवी इंटरव्यू दे रही थीं। तभी जनरल मानिकशॉ ने उन्हें बांग्लादेश में मिली शानदार जीत की खबर दी।इंदिरा गांधी ने लोकसभा में शोर-शराबे के बीच घोषणा की कि युद्ध में भारत को विजय मिली है। इंदिरा गांधी के बयान के बाद पूरा सदन जश्न में डूब गया। भीड़ नियाजी को मार डालना चाहती थी, लेकिन भारतीय सेना ने उन्हें जीप पर बैठाया और सुरक्षित जगह पर ले गई।इसके बाद 17 दिसंबर को 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को युद्धबंदी बनाया गया। 17 दिसंबर, 1971 को भारत और भूटान द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में बांग्लादेश को राजनयिक मान्यता दिए जाने से दुनिया के मानचित्र में नए राष्ट्र बांग्लादेश का अभ्युदय हुआ। इसकी पटकथा पिछले एक वर्ष से लिखी जा रही थी। 7 दिसंबर, 1970 को पहली बार पाकिस्तान में संसद-(मजलिस-ए-शूरा)-के लिए आम चुनाव हुए थे। तब पाकिस्तान दो हिस्सों में बंटा था-पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) और पश्चिमी पाकिस्तान। मुख्य मुकाबला था-जुल्फिकार अली भुट्टो की नेतृत्व वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व वाली अवामी लीग में। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जेनरल याह्या खान और भुट्टो की उम्मीदों के खिलाफ अवामी लीग ने बहुमत हासिल कर लिया। स्वाभाविक है, अवामी लीग के नेता शेख मुजीबुर्रहमान ने सरकार बनाने का दावा पेश किया। जिसे खान ने स्वीकार नहीं किया। नतीजा, तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में गृहयुद्ध की स्थिति पैदा हो गई। पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह याहिया खां ने 25 मार्च,1971 को शेख मुजीब को गिरफ़्तार कर पूर्वी पाकिस्तान की जन भावनाओं को सैनिक ताकत से कुचलने का आदेश दे दिया। अगले ही दिन, तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने मुजीबुर्रहमान की ओर से बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। आज भी बांग्लादेश अपना स्वतंत्रता दिवस समारोह प्रति वर्ष 26 मार्च को ही मनाता है। बांग्लादेशियों ने मुक्ति बाहिनी का गठन किया और पश्चिमी पाकिस्तान की सेना का मुकाबला किया।पूर्वी पाकिस्तान में मुक्तिबाहिनी गुरिल्लाओं ने पाकिस्तानी सैनिकों के खिलाफ लड़ने के लिए भारतीय बलों के साथ हाथ मिलाया। उन्होंने भारतीय सेना से हथियार और प्रशिक्षण प्राप्त किया।सैन्य कार्यवाही में बेतहाशा कत्लेआम हुआ। पाक सेना द्वारा किए जा रहे जुल्मों के चलते लाखों शरणार्थियों ने भारत की ओर रुख किया। तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के दुर्व्यवहार की खबरें भारत आने लगीं तो जनभावना के दबाव में भारत ने बंगाली शरणार्थियों के लिए अपनी सीमाएं खोल दी। अप्रैल, 1971 में बांग्लादेश से भारत आने वाले शरणार्थियों की तादाद इतनी बढ़ गई कि सीमावर्ती राज्यों ने अपने हाथ खड़े कर दिए। तब भारत सरकार पर यह दबाव पड़ने लगा कि वह वहां पर सैन्य हस्तक्षेप करे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अप्रैल में आक्रमण करने का मन बना लिया था। उन्होंने थल सेनाध्यक्ष जनरल मानेकशॉ की राय ली। 3दिसंबर, 1971 को इंदिरा गांधी तत्कालीन कलकत्ता में एक जनसभा को संबोधित कर रही थीं। इसी दिन शाम के वक्त पाकिस्तानी वायुसेना के विमानों ने भारतीय वायुसीमा को पार कर पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर, आगरा आदि सैनिक हवाईअड्डों पर बम गिराना शुरू कर दिया। इंदिरा गांधी ने उसी वक्त दिल्ली लौटकर मंत्रिमंडल की आपात बैठक की।भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई की और कई हजार वर्गकिलोमीटर पाकिस्तानी क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। भारतीय नौसेना के पश्चिमी नौसेना कमान ने 4-5 दिसंबर की रात कोडनाम ट्राइडेंट के तहत कराची बंदरगाह पर एक आश्चर्यजनक हमला किया, जिसे आॅपरेशन त्रिशूल नाम दिया गया। भारत की ओर से पाकिस्तान की इतनी भारी-भरकम फौज का आत्मसमर्पण कराना इतना सहज भी नहीं था। पाकिस्तानी फौज के कमांडर जनरल नियाजी को मनाने की तैयारी भारतीय सेना के पूर्वी कमान के स्टाफ आॅफिसर मेजर जनरल जेएफआर जैकब को दी गई थी।जैकब के नेतृत्व में भारतीय सेना ढाका की तरफ आगे बढ़ी।13दिसंबर को सेना प्रमुख जनरल मानेकशॉ के आदेश के बाद तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के सभी शहरों पर भारतीय सेना ने कब्जा कर लिया था। 14 दिसंबर को भारतीय सेना ने एक गुप्त संदेश को पकड़ा कि दोपहर ग्यारह बजे ढाका के गवर्नमेंट हाउस में एक महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है, जिसमें पाकिस्तानी प्रशासन बड़े अधिकारी भाग लेने वाले हैं। भारतीय सेना ने तय किया कि इसी समय उस भवन पर बम गिराए जाएं।बैठक के दौरान ही मिग 21 विमानों ने भवन पर बम गिरा कर मुख्य हॉल की छत उड़ा दी। गवर्नर मलिक ने लगभग कांपते हाथों से अपना इस्तीफा लिखा। जैकब ढाका पहुंचे तो उनकी कार पर मुक्तिवाहिनी के सैनिकों ने हमला बोल दिया क्योंकि वह पाकिस्तानी सेना के अधिकारी की कार में सवार थे। लेकिन जब उन्होंने उतरकर अपना परिचय दिया,तब वे चले गए।ढाका में मौजूद पाकिस्तानी सेना के जनरल नियाजी ने पहले तो आत्मसमर्पण करने से मना कर दिया। पाकिस्तानी जेनरल नियाजी आत्मसमर्पण को तैयार हो गए थे। वर्ष 1971के युद्ध में करीब 3,900 भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए थे,जबकि 9,851 घायल हुए थे। इस युद्ध की सफलता का श्रेय पूरी तरह इंदिरा गांधी, भारतीय सेना और बांग्लादेश की मुक्तिबाहिनी को जाता है। सोवियत संघ ने युद्ध में भारत के साथ पूर्वी पाकिस्तानियों का पक्ष लिया। दूसरी ओर, रिचर्ड निक्सन की अध्यक्षता में संयुक्त राज्य अमेरिका ने आर्थिक और भौतिक रूप से पाकिस्तान का समर्थन किया। अमेरिका और चीन द्वारा भारी दबाव में भी इंदिरा गांधी जरा भी नहीं डरी और पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए। इस अदम्य संकल्प और साहस को देख दुनियाभर ने इंदिरा गांधी को आयरन लेडी का खिताब दिया था। तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा को दुर्गा की संज्ञा देते हुए उनका सम्मान भी किया था।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। वर्ष 2021 समाप्त होने जा रहा है, इसलिए कई मुद्दों पर चर्चा हो रही है। इनमें सबसे प्रमुख कोविड है। लेकिन एक अन्य मुद्दा जो बीते एक साल में भारत की अवचेतना में प्रमुख रहा, वह चीन है। चीन बहुत से तरीकों से अपनी धौंस दिखा रहा है। निस्संदेह सीमा का घटनाक्रम पूरी तरह बाहर नहीं आया है, जिस पर अभी भारतीय संसद ने भी चर्चा नहीं की है। सरकार ने इस मुद्दे पर बजट सत्र में चर्चा का वादा किया था। साल खत्म होने को है, लेकिन देश को अभी सरकार की तरफ से यह नहीं बताया गया है कि चीन ने कितने क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है। क्या भारत के कुछ ऐप पर रोक लगाने की जवाबी कार्रवाई चीन सरकार को अपने आक्रामक सैन्य रुख से रोक पाई है और भारत को आरसेप से बाहर रहने से कितना फायदा हुआ है। लेकिन एक चीज साफ है। श्रीलंका, मालदीव या नेपाल के मामले में भारत धीरे-धीरे ही सही मगर लगातार वह जमीन हासिल कर रहा है, जो उसने चीन को गंवा दी थी। यह दो रणनीतियां अपना रहा है- टेलीविजन एंकरों की अनुचित सलाह की अनदेखी कर रहा है और न केवल भारत के निकट पड़ोसी देशों की सरकारों बल्कि वहां के लोगों का भी दिलो-दिमाग जीतने के लिए ईमानदारी से कोशिश कर रहा है। वर्ष 2015 हाल के वर्षों में भारत-नेपाल संबंधों में सबसे खराब वर्ष रहा है। उस समय प्रधानमंत्री ने पदभार संभाला ही था और उनकी काठमांडू की पहली यात्रा के दौरान जन प्रतिनिधियों को उनके संबोधन ने नेपाली जनता को मंत्रमुग्ध कर दिया था। हालांकि उसके बाद सब कुछ ठीक नहीं रहा। वर्ष 2015 में आर्थिक नाकेबंदी और भारत के 2015 के संविधान को स्वीकार करने में दृढ़ निश्चय के अभाव ने वहां के जनमत को भारत के खिलाफ बना दिया। यह चीन के लिए फायदेमंद था। लेकिन उसके बाद चीन ने भी नेपाली राजनीति में ज्यादा दखल देकर ठीक वही गलती की, जो भारत ने की थी। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने 2019 में नेपाल की अपनी पहली यात्रा में नेपाल को बताया कि उसके बारे में उनका देश क्या सोचता है। वह भी उस देश (नेपाल) को, जिसे कोई अपना उपनिवेश नहीं बना पाया। खबरों के मुताबिक शी ने कहा कि जो कोई चीन को विभाजित करने की कोशिश करेगा, उसे कुचल दिया जाएगा और जो कोई चीन विरोधी गतिविधियों की कोशिश करेगा, उसकी हड्डियां चकनाचूर कर दी जाएंगी। कहने का मतलब यह है कि एक समय था, जब चीन के लोग नेपाल के बहुत से स्कूलों में देखे जा सकते थे। वे स्थानीय लोगों के साथ रहते थे और बच्चों को मंदारिन सिखाते थे। वे लोग अब नेपाल से चले गए हैं। पूरे नेपाल में भोटे (तिब्बती मूल के बौद्धों को कहा जाता है) चुपके-चुपके जमीन खरीद रहे हैं और गुंबा (पूजा स्थल) बना रहे हैं। बाद में वे देश में मधेशियों की तरह एक शक्तिशाली चीन विरोधी ताकत बन जाएंगे। वर्ष 2017 में नेपाल में 18 घंटे बिजली कटौती होती थी। लेकिन अब वह भारत को बिजली का निर्यात (केवल 39 मेगावॉट लेकिन यह शुरूआत है) करने और पारेषण लाइनों के विकास से अपनी बिजली क्षमता को बढ़ाने की स्थिति में है। यह सही है कि भारत के कालापानी क्षेत्र को नेपाल के नक्शे में शामिल करने को लेकर तनाव है, जिसे पूरे सदन ने मंजूरी दी थी। नेपाल उस क्षेत्र में अपनी 12वीं राष्ट्रीय जनगणना करने के तरीके के बारे में विचार कर रहा है, लेकिन अपने क्षेत्राधिकार का उल्लंघन किए बिना। अच्छी बात यह है कि भारतीय न्यूज एंकरों को अभी इसकी जानकारी नहीं है। कारोबारी-योगी बाबा रामदेव पिछले महीने काठमांडू में थे और प्रधानमंत्री शेर बहादुर देऊबा ने योग के लिए समर्पित पतंजलि टीवी स्टेशन का उद्घाटन किया। अगर नेपाल के हिंदू राष्ट्र बनने की चर्चा हो रही है तो ऐसा केवल कुछ नेपाली कह रहे हैं। इस सप्ताह सत्तारूढ़ नेपाली कांग्रेस के सम्मेलन में शरीक होने का आमंत्रण न केवल रामदेव बल्कि हिंदू राष्ट्र के विचार की कटु आलोचक ममता बनर्जी को भी मिला है, जो इसमें शामिल होने के लिए यह आलेख लिखे जाने तक सरकार की मंजूरी का इंतजार कर रही थीं। श्रीलंका में चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी नहीं बल्कि अदाणी समूह वेस्ट कंटेनर टर्मिनल बनाएगा और पवन एवं नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में अहम निवेश करेगा। कोलंबो में भारत के राजदूत हर उस बैठक में मौजूद रहे, जो गौतम अदाणी ने श्रीलंका के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के साथ की। इसके बाद कुशीनगर हवाई अड्डे के उद्घाटन हुआ, जिसमें सांसद और प्रधानमंत्री के बेटे नमल राजपक्षे मुख्य अतिथि थे। इसके बाद लंका के वित्त मंत्री बासिल राजपक्षे ने चुपके से दिल्ली की यात्रा की। जब श्रीलंका के पास महज तीन सप्ताह के आयात की विदेशी मुद्रा थी तो उसने चीन या आईएमएफ के बजाय भारत का रुख किया। इतिहास में पहली बार भारतीय सेना की एक यूनिट ने श्रीलंकाई सेना की गजाबा रेजिमेंट की एक यूनिट की सह-बटालियन बनने के लिए करार किया है। संयोग से गजाबा रेजिमेंट राष्ट्रपति की रेजिमेंट है। मालदीव की एक अदालत द्वारा विपक्षी नेता अब्दुल्ला यामीन (जो चीन का पथ प्रदर्शक थे) को भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त किए जाने के बाद भारत इस पड़ोसी देश के घटनाक्रम पर नजर रखेगा। भाजपा में बहुत से ऐसे लोग हैं, जिनका मानना है कि वे विदेश मंत्री एस जयशंकर का काम ज्यादा बेहतर तरीके से कर सकते थे। जयशंंकर भाजपा में आने वाले नए व्यक्ति हैं। विदेश मंत्री ने अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान प्रचलित विनम्रता को छोड़कर भारत की मानवाधिकार नीति के डेमोक्रेटिक आलोचकों को आड़े हाथ लेते समय शायद महसूस किया होगा कि इसका ज्यादा हजार्ना चुकाना पड़ रहा है। लेकिन कम से कम उपमहाद्वीप में शांति और संतुलन है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। चेन्नई और मुंबई का नियतकालीन जल-प्लावन और दिल्ली की जहरीली हवा सरकारों के समक्ष ऐसी चुनौती है, जिसका समाधान कर पाने की लगन न तो राजनेताओं के पास है और न ही क्रियान्वयन के उत्तरदायी नौकरशाहों ने अपेक्षित क्षमता अभी तक दिखाई है। लेकिन समाधान तो निकालना ही पड़ेगा, उत्तरदायित्व स्पष्ट रूप से निर्धारित करने होंगे और अपनी जिम्मेवारी अन्य पर टालने को अस्वीकार्य अक्षमता मानना होगा। सांस लेने का कोई विकल्प किसी के पास उपलब्ध नहीं है। मीडिया में लगभग प्रतिदिन दोहराया जाता है कि दिल्ली की हवा खतरनाक स्तर तक प्रदूषित है, जहरीली है। यह कुछ इस प्रकार से प्रस्तुत होता है कि जैसे अन्य शहरों में ऐसी कोई समस्या हो ही नहीं। विश्व के सबसे अधिक प्रदूषित पहले दस शहरों में दिल्ली सबसे ऊपर है, कोलकता चौथे और मुंबई छठे स्थान पर है। अभी कुछ दिन पहले ही गाजियाबाद की हवा दिल्ली से अधिक जहरीली आंकी गई थी। सर्वोच्च न्यायालय डांट-फटकार के अतिरिक्त ऐसा कुछ नहीं कर पा रहा, जिससे सरकारें और नौकरशाह अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्व को गंभीरता से स्वीकार करें और उनका निष्पादन करें। सर्वोच्च न्यायालय तक को यह कहना पड़ा है कि नौकरशाही चाहती है कि अदालत निर्णय करे, और वही उसे क्रियान्वित करे! माननीय न्यायाधीशों की पीठ ने यह भी कहा कि टेलीविजन की बहसें अधिक प्रदूषण फैला रही हैं, हर किसी का अपना एजेंडा होता है। और इसी कारण विभिन्न सरकारें और पर्यावरण संरक्षण के विभिन्न पक्षों से जुड़ी संस्थाएं आपस में एक जीवंत कार्यकारी संवाद स्थापित नहीं कर पाती हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि दिल्ली के वायु प्रदूषण के लिए कोई जिम्मेवार नहीं है। इससे बड़ी आवश्यकता यह होगी कि इसमें उत्तरदायित्व निर्वहन को चुनावों से जोड़ कर न देखा जाए, जो आज के वातावरण में अत्यंत कठिन है, किन यह असंभव नहीं है, क्योंकि इन प्रयासों में शिथिलता कोई कैसे कर सकता है, जब वह स्वयं और उसका परिवार भी इससे पीड़ित है। इस समय उस सिविल सोसाइटी- सभ्य समाज- की आवश्यकता है, जो बिना किसी वैचारिक/ राजनीतिक प्रतिबद्धता के सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिक आचरण को बड़े पैमाने पर प्रेरित कर सके। दुर्भाग्य से ऐसा कोई वर्ग उपस्थित नहीं है। अगर प्रबुद्ध वर्ग इस प्रकार के विकल्प पर विमर्श नहीं करेगा, तो निश्चिंत रहें, अगले वर्ष फिर से पूरी प्रक्रिया का पुनर्मंचन होगा। जहरीली हवा में दिल्लीवासियों तथा अनेक अन्य शहरों के रहवासियों को साल-दर-साल रहने को मजबूर होना व्यवस्था की शिथिल कार्य संस्कृति, सामजिक उत्तरदायित्व अवहेलना और मानवीय मूल्यों को आत्मसात न कर पाने को ही मानना होगा। इक्कीसवीं सदी में परिवर्तन की तेजी से सभी नागरिक तथा जनहित में सक्रिय सरकारें भली भांति परिचित हैं। जिनके पास दूरदृष्टि है, वही अपनी गतिशीलता बनाए रख पाते हैं और समय के साथ चल सकते हैं। यह भी स्पष्ट है कि सच्चे प्रजातंत्र में राष्ट्रहित के ऐसे अनेक कार्य होंगे, जिन पर राजनीति को अलग रख कर केवल जनहित को प्राथमिकता देनी होगी। जहरीली हवा के प्रकरण में यह सभी को पिछले साल से ही ज्ञात था कि 2021 के अक्तूबर-नवम्बर में विकट स्थिति पुन: एक बार बनेगी, मगर सितंबर-अक्तूबर तक भी कोई सक्रियता दिखाई नहीं दी। पराली के स्वीकृत उपयोग के लिए मशीनों पर अस्सी प्रतिशत सबसिडी केंद्र सरकार देती है तथा बीस प्रतिशत पंचायत से अपेक्षित है। राज्य सरकारें अगर ईमानदारी से चाहतीं, तो उचित संख्या में किसानों पर अतिरिक्त खर्च का बोझ न डालते हुए अपेक्षित संख्या में ये मशीनें उपलब्ध करा सकती थीं। लेकिन निष्क्रियता, उदासीनता और चलता है की संस्कृति में यह नहीं हो सका। ऐसे कोई आसार दिखाई नहीं देते हैं कि अगले साल तक इस समस्या का समाधान हो जाएगा। चेन्नई और मुंबई का नियतकालीन जल-प्लावन और दिल्ली की जहरीली हवा सरकारों के समक्ष ऐसी चुनौती है, जिसका समाधान कर पाने की लगन न तो राजनेताओं के पास है और न ही क्रियान्वयन के उत्तरदायी नौकरशाहों ने अपेक्षित क्षमता अभी तक दिखाई है। लेकिन समाधान तो निकालना ही पड़ेगा, उत्तरदायित्व स्पष्ट रूप से निर्धारित करने होंगे और अपनी जिम्मेवारी अन्य पर टालने को अस्वीकार्य अक्षमता मानना होगा। वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन वैश्विक समस्याएं बन चुके हैं। विश्व भर में सरकारों और स्वयंसेवी संस्थाओं ने इन दोनों क्षेत्रों में समग्र रूप से अनेक कार्य किए, कदम उठाए, उपलब्धियां अनेक हैं, लेकिन संमस्याओं के परिमाण अब भी चिंता बढ़ा रहे हैं। आज से पचास साल पहले पर्यावरण को लेकर 5-16 जून, 1972 में स्टाकहोम में पहला अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन हुआ था। जलवायु परिवर्तन पर पहला विश्व सम्मलेन 12-23 फरवरी, 1979 को जिनेवा में आयोजित हुआ था। भारत इनमें महत्त्वपूर्ण भागीदार रहा है। देश के पास अपेक्षित बौद्धिक संपदा, विशेषज्ञता और संसाधन उपलब्ध हैं। दुर्भाग्य से तिबद्धता, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के प्रति पूर्ण समर्पण की कार्य संस्कृति की कमी है। इसके लिए सेवाकालीन प्रशिक्षण का सहारा लेना होगा। दीर्घकालीन दृष्टि विकसित करने के लिए शिक्षा का सहारा लेना होगा, क्योंकि व्यक्ति निर्माण और चरित्र निर्माण का आधार वहीं पर पनपता और स्वरूप लेता है। 13 जुलाई, 2004 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक निर्णय दिया था कि कक्षा एक से बारह तक पर्यावरण शिक्षा को अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाए। इसके लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर एनसीइआरटी ने पाठ्यक्रम की रूपरेखा मार्च, 2004 को न्यायालय को प्रस्तुत की थी। यह सभी राज्यों को भेजी गई तथा प्रत्येक राज्य सरकार ने उसे स्वीकृति प्रदान की, लेकिन मई, 2004 में केंद्र में सरकार बदलने के बाद इसे लागू नहीं किया गया। अगर किया गया होता तो आज युवाओं की एक ऐसी पीढ़ी शासन-प्रशासन चला रही होती, जो पर्यावरण प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के सभी पक्षों की समझ के साथ कार्य कर रही होती। नई शिक्षा नीति-2020 के आधार पर जो नया पाठ्यक्रम बनने वाला है, उसके निर्माण के समय इस तथ्य पर ध्यान देना उपयोगी रहेगा।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आंध्र प्रदेश में अब केवल एक ही राजधानी अमरावती होगी। कई न्यायिक चुनौतियों का सामना करते हुए बहादुरी दिखाने के बजाय विवेक का इस्तेमाल करते हुए मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी ने पिछले सप्ताह विधानसभा में घोषणा की कि सरकार, राज्य में तीन राजधानियां बनाने वाले कानून वापस ले रही है जो विशाखापत्तनम (कार्यकारी), कुरनूल (न्यायिक) और अमरावती (विधायी) में बननी थी। रेड्डी ने संकेत दिया कि तीन राजधानियों की योजना पूरी तरह से रद्द नहीं की गई है बल्कि फिलहाल टाली जा रही है। उन्होंने कहा, राज्य के विकेंद्रीकृत विकास की हमारी मंशा, गलत तरीके से पेश की गई है। इसके अलावा कानूनी अड़चनें पैदा हुईं और अदालती मामले दर्ज कराए गए। मुख्यमंत्री की घोषणा के साथ ही सपनों, महत्त्वाकांक्षा, लोभ और कड़वी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से जुड़े नाटकीय पहलुओ पर से आधा पर्दा उठ गया है। जिन लोगों ने आंध्र प्रदेश की अचल संपत्ति में निवेश किया था और उन्हें उम्मीद थी कि जमीन का मूल्य दोगुना और शायद अगले दशक में तिगुना भी हो जाएगा। राज्य सरकार लगभग दिवालिया होने के कगार पर पहुंच चुकी है और अगर बुनियादी ढांचे के निर्माण पर होने वाले खर्च के भुगतान को एकतरफ भी रख दिया जाए तब भी सरकार जमीन गंवाने वाले लोगों को पूरा मुआवजा देने में सक्षम नहीं है। प्रशासकों, शहरी योजनाकारों और आम नागरिकों के बीच अनिश्चितता बढ़ी है। इस कहानी के केंद्र में ताकत और पैसा है और यह अभी खत्म नहीं हुई है। यह सब आंध्र प्रदेश के विभाजन और तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के बनने के साथ शुरू हुआ। चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) ने एक मौका देखा। पूर्व मुख्यमंत्री ने नए कारखानों के निर्माण के साथ-साथ भविष्य के लिहाज से उम्मीदें जगाने वाली और विश्वस्तरीय राजधानी अमरावती के निर्माण की कल्पना की। यह सिंगापुर पर आधारित मॉडल होना था और इसके मास्टर प्लान में सिंगापुर सरकार द्वारा नियुक्त दो सलाहकारों की मदद ली गई थी। इस शहर के तहत 217 वर्ग किमी के भौगोलिक क्षेत्र को कवर करना था और लगभग 8 अरब डॉलर के निवेश के साथ इसे तैयार किया जाना था। इसमें इन बातों का जिक्र कहीं नहीं था कि अमरावती के आसपास की जमीन अमीर कम्मा समुदाय के किसानों की थीं जो तेदेपा के समर्थक रहे हैं। इस योजना में सबसे ज्यादा नुकसान रेड्डी समुदाय का होना था जो आंध्र प्रदेश में राजनीतिक रूप से दूसरी ताकतवर जाति है और इसके पास काफी जमीन है। जब अमरावती को राजधानी बनाए जाने की घोषणा हुई तब इस क्षेत्र के आसपास की जमीन की कीमत कई सौ गुना बढ़ गई और बड़ी तेजी से जमीन के मालिकाना हक और इसके इस्तेमाल के तरीके में बदलाव किए गए। हालांकि नायडू की योजनाएं फलीभूत हो पातीं उससे पहले विधानसभा चुनाव का दौर आ गया। शहर के लिए चिह्नित लगभग 54,000 एकड़ में से 42,000 एकड़ खेती वाली जमीन थी जिसमें से 40,000 एकड़ सिंचित जमीन थी। किसान अपनी जमीन गंवाने के लिए तैयार थे लेकिन वे इसके लिए अच्छे-खासे मुआवजे की उम्मीद कर रहे थे। इनमें से जो लोग सबसे ज्यादा चिंतित थे वे खेतिहर श्रमिक और पट्टाधारक थे। इसके अलावा, पूरे क्षेत्र में समृद्ध काली कपास वाली मिट्टी थी जो खेती के लिए बेशकीमती मानी जाती है लेकिन निर्माण स्थल के लिए यह उपयुक्त नहीं थी। नायडू की सरकार मई 2019 में सत्ता से बाहर हो गई और रेड्डी सत्ता के शिखर पर पहुंचे और राज्य के मुख्यमंत्री बने। रायलसीमा में मौजूद रेड्डी के दल में दबदबा रखने वालों ने इसे शक्ति असंतुलन में सुधार करने के एक अवसर के रूप में देखा जो कम्मा/तेदेपा शासन के पिछले दो कार्यकाल के दौरान बना था। एक अफसरशाह ने व्यंग्यपूर्ण ढंग से टिप्पणी करते हुए कहा कि पिछली कई समितियों की सिफारिशों के बावजूद रेड्डी ने कुछ समितियों का गठन किया जिन्होंने वही कहा जो वह उनसे कहलवाना चाहते थे। एक अफसरशाह ने कहा, मुझे उन दिनों की याद है। तीन राजधानियों का विचार जादुई तरीके से एक सुबह आया और फिर मुख्यमंत्री ने वह सनसनीखेज घोषणा कर दी। लेकिन इसके बाद समस्या आती ही गई। पहले के विचार अस्वीकृत हो गए। उच्च न्यायालय की जगह पर कानून बनाने का अधिकार राज्य सरकार के पास नहीं था। इसीलिए उच्च न्यायालय को अमरावती से बाहर ले जाने का विचार पेचीदा था। लागत भी एक प्रमुख कारक था। रेड्डी प्रशासन की राजनीतिक खूबी, एक परवाह करने और ध्यान रखने वाली सरकार की थी। आंध्र प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव के रूप में सेवानिवृत्त हुए पी वी रमेश ने कहा, अगर आंध्र प्रदेश कोविड-19 महामारी के दौरान उबर पाने में कामयाब रहा है तो इसकी प्रमुख वजह कल्याणकारी योजनाएं हैं जिसमें सरकार ने नकद हस्तांतरण की प्रक्रिया लागू की है। सिर्फ अमरावती के लिए ही नहीं बल्कि कुरनूल और विशाखापत्तनम के लिए भी मुआवजा कैसे दिया गया, अगर राज्य के पास पैसा नहीं था? सीमित अनुमानों के साथ भी आकलन करने पर अधिग्रहीत जमीन की कीमत आज लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये है। इस कीमत के 150 प्रतिशत मूल्य पर मुआवजा देना होगा। राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का 75 फीसदी हिस्सा राज्य का कर्ज है। इनमें से अधिकांश राजधानी बनाने के मकसद से स्थापित की गई शेल कंपनियों पर आधारित हैं। राज्य सरकार का मुख्य राजस्व बैंकों में चला जाता है। सरकारी हलकों में सोच यह है कि अब आगे के लिए सबसे अच्छा तरीका यह है कि अमरावती के लिए अधिग्रहीत की गई जमीन की नीलामी कर पैसे जुटाए जाएं। एक बार राज्य की वित्त व्यवस्था स्थिर हो जाए तब पैसे का इस्तेमाल आंशिक रूप से या यूं कहें कि राजधानी की अधूरी तीन (या दो) राजधानी परियोजनाओं के वित्त पोषण के लिए किया जा सकता है। इसीलिए फिलहाल अमरावती की बात हो रही है। लेकिन कुछ साल बाद कौन जानता है कि आंध्र प्रदेश की राजधानी कहां हो सकती है?
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद 1948 में 48 देशों के समूह ने समूची मानव-जाति के मूलभूत अधिकारों की व्याख्या करते हुए एक चार्टर पर हस्ताक्षर किये थे। इसमें माना गया था कि व्यक्ति के मानवाधिकारों की हर कीमत पर रक्षा की जानी चाहिये। भारत ने भी इस पर सहमति जताते हुए संयुक्त राष्ट्र के इस चार्टर पर हस्ताक्षर किये। हालांकि देश में मानवाधिकारों से जुड़ी एक स्वतंत्र संस्था बनाने में 45 वर्ष लग गए और तब कहीं जाकर 1993 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग अस्तित्व में आया जो समय-समय पर मानवाधिकारों के हनन के संदर्भ में केंद्र तथा राज्यों को अपनी अनुशंसाएं भेजता है। वर्तमान समय में देश में जिस तरह का माहौल आए दिन देखने को मिलता है ऐसे में मानवाधिकार और इससे जुड़े आयामों पर चर्चा महत्त्वपूर्ण हो जाती है। देश भर में मॉब लिंचिंग की घटनाएं, बिहार के मुजफ्फरपुर और उसके तुरंत बाद उत्तर प्रदेश के देवरिया में शेल्टर होम की बच्चियों के साथ हुए वीभत्स कृत्य देश में मानवाधिकारों की धज्जियाँ उड़ाते दिखते हैं। कई विवादास्पद घटनाओं जैसे- आॅपरेशन ब्लू स्टार के बाद उत्पन्न दंगे, शाहबानो मामले के बाद मौलानाओं में भड़की विरोध की चिंगारी, बाबरी मस्जिद ध्वस्त होने के बाद देश भर में हुए दंगे, गुजरात में हुए हिन्दू-मुस्लिम दंगे, कश्मीर में आए दिन हो रहे दंगे इत्यादि के समय भी देश के नागरिकों के मानवाधिकारों का हनन किसी से छिपा नहीं है। हालांकि ऐसे कई मसले हमें देखने को मिल जाते हैं जब मानवाधिकारों के उल्लंघन का गंभीर मुद्दा उठाते हुए ठऌफउ अपने कर्त्तव्यों का बखूबी पालन करता है लेकिन फिर भी आयोग अन्य कई मामलों पर अपनी अनुशंसाएं देने में खुद को लाचार पा रहा है। तो क्या इसे एक निष्प्रभावी संस्था मान लिया जाए? लिहाजा सवाल उठता है कि इस लाचारी के क्या कारण हैं और क्या इस लाचारी का कोई समाधान है? इस लेख के माध्यम से हम इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे। एक वाक्य में कहें तो मानवाधिकार हर व्यक्ति का नैसर्गिक या प्राकृतिक अधिकार है। इसके दायरे में जीवन, आजादी, बराबरी और सम्मान का अधिकार आता है। इसके अलावा गरिमामय जीवन जीने का अधिकार, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकार भी इसमें शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा अपनाए गए मानवाधिकार संबंधी घोषणापत्र में भी कहा गया था कि मानव के बुनियादी अधिकार किसी भी जाति, धर्म, लिंग, समुदाय, भाषा, समाज आदि से इतर होते हैं। रही बात मौलिक अधिकारों की तो ये देश के संविधान में उल्लिखित अधिकार है। ये अधिकार देश के नागरिकों को और किन्हीं परिस्थितियों में देश में निवास कर रहे सभी लोगों को प्राप्त होते हैं। यहाँ पर एक बात और स्पष्ट कर देना उचित है कि मौलिक अधिकार के कुछ तत्त्व मानवाधिकार के अंतर्गत भी आते हैं जैसे- जीवन और वैयक्तिक स्वतंत्रता का अधिकार। भारत ने मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन और राज्य मानवाधिकार आयोगों के गठन की व्यवस्था करके मानवाधिकारों के उल्लंघनों से निपटने हेतु एक मंच प्रदान किया है। भारत में मानवाधिकारों की रक्षा के संदर्भ में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग देश की सर्वोच्च संस्था के साथ-साथ मानवाधिकारों का लोकपाल भी है। उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश इसके अध्यक्ष होते हैं। यह राष्ट्रीय मानवाधिकारों के वैश्विक गठबंधन का हिस्सा है। साथ ही यह राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थानों के एशिया पेसिफिक फोरम का संस्थापक सदस्य भी है। मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम,1993 की धारा 12(ज) में यह परिकल्पना भी की गई है कि विकसित समाज के विभिन्न वर्गों के बीच मानवाधिकार साक्षरता का प्रसार करेगा और प्रकाशनों, मीडिया, सेमिनारों तथा अन्य उपलब्ध साधनों के जरिये इन अधिकारों का संरक्षण करने के लिये उपलब्ध सुरक्षोपायों के बारे में जागरूकता बढ़ाएगा। इस आयोग ने देश में आम नागरिकों, बच्चों, महिलाओं, वृद्धजनों के मानवाधिकारों, अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिये समय-समय पर अपनी सिफारिशें सरकार तक पहुंचाई हैं और सरकार ने कई सिफारिशों पर अमल करते हुए संविधान में उपयुक्त संशोधन भी किये हैं। शिकायतें प्राप्त करना तथा लोकसेवकों द्वारा हुई भूल-चूक अथवा लापरवाही से किये गए मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच-पड़ताल शुरू करना इसमें शामिल हैं ताकि मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोका जा सके। एक आंकड़े के अनुसार, अप्रैल 2017 से लेकर दिसंबर 2017 की अवधि के दौरान लगभग 61,532 मामले विचार हेतु दर्ज किये गए और आयोग ने लगभग 66,532 मामलों का निपटारा किया। इस अवधि के दौरान आयोग द्वारा नागरिक और राजनीतिक अधिकारों, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के कथित उल्लंघन के 49 मामलों की मौके पर जांच की गई। कैदियों की जीवन-दशाओं का अध्ययन करना, न्यायिक हिरासत तथा पुलिस हिरासत में हुई मृत्यु की जांच-पड़ताल करना भी आयोग के कार्य-क्षेत्र में शामिल है। भारत में मानवाधिकार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मानवाधिकार के क्षेत्र में शोध-कार्य करना भी मानवाधिकार के कार्यों के अंतर्गत आता है। इसके अलावा भी यह आयोग कई और कार्य करता है जैसे- समाज के विभिन्न वर्गों में मानवाधिकार से संबंधित जागरूकता बढ़ाना। किसी लंबित वाद के मामले में न्यायालय की सहमति से उस वाद का निपटारा करवाना। लोकसेवकों द्वारा किसी भी पीड़ित व्यक्ति या उसके सहायतार्थ किसी अन्य व्यक्ति के मानवाधिकारों के हनन के मामलों की शिकायत की सुनवाई करना। मानसिक अस्पताल अथवा किसी अन्य संस्थान में कैदी के रूप में रह रहे व्यक्ति के जीवन की स्थिति की जांच की व्यवस्था करना। संविधान तथा अन्य कानूनों के संदर्भ में मानवाधिकारों के संरक्षण के प्रावधानों की समीक्षा करना तथा ऐसे प्रावधानों को प्रभावपूर्ण ढंग से लागू करने के लिये सिफारिश करना। आतंकवाद या अन्य विध्वंसक कार्य के संदर्भ में मानवाधिकार को सीमित करने की जांच करना। गैर-सरकारी संगठनों तथा अन्य ऐसे संगठनों को बढ़ावा देना जो मानवाधिकार को प्रोत्साहित करने तथा संरक्षण देने के कार्य में शामिल हों इत्यादि। इस तरह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग हरसंभव भारत में मानवाधिकार की सुरक्षा के लिये आगे बढ़कर पहल करता है। इसके बावजूद कई दफा देखने को मिलता है कि जिस हिसाब से व्यक्ति के मानवाधिकार की रक्षा होनी चाहिये वह नहीं हो पाती। तो क्या इसके लिये मानवाधिकार आयोग को दोषी माना जाए या फिर हमारे यहां की व्यवस्था में ही खोट है? (लेखक प्लस टू स्कूल सागरपुर, बिहार के प्रभारी प्राचार्य और विचारक हैं।)
एबीएन डेस्क। अपना सारा जीवन गरीबो एवम जनता के सेवा में लगा देने वाले हेमेंद्र प्रताप देहाती जीका जन्म आजादी के ठीक 15 वर्ष पहले 1932 में सोनपुरा राजपरिवार भवनाथपुर के परसोडीह पलामू में हुआ था। जब ये सात साल के थे उसी वक्त उनको यह एहसास हो गया था कि जो ब्यक्ति परिवार के साथ घनिष्ट सम्बंध रखता है जीवन के अंतिम समय पर प्राण त्यागने के समय उसे बहुत कष्ट होता है। हेमेंद्र प्रताप देहाती जी का जन्म सोनपुरा राजपरिवार में हुआ था। पिता का नाम थानेंद्र नाथ शाही माता का नाम उटीम राजकुंवर थी। बचपन मे उन्हें किसी प्रकार की कोई असुविधा नहीं हुई। श्री देहाती की शिक्षा दीक्षा घर पर हुई थी। वे कभी स्कूल नही गए थे बल्कि उनको काशी लाल श्रीवास्तव, बच्चा सिंह, खैरवा चंद्रिका सिंह, जैसे गुरु उनको घर पर ही पढ़ाने आते थे। देहाती जी की राजनीतिक सफर तो 1949 में शुरू हो चुकी थी। वे 1958 से लेकर 1969 तक परसोडीह पंचायत के मुखिया रहे थे। ये 1962 के विधानसभा चुनाव में भाग लेते है। उंस समय ये मोटरसाइकिल से ही ये चुनाव प्रचार करते थे। इनके पास चार पहिया वाहन नही थी। इनके समर्थक कंधे पर बैटरी और लाउडस्पीकर को ढो कर ले जाया करते थे। फिर 1967 में पलामू में भीषण आकाल एवं सूखा पडा था। पूरे पलामू में त्राहिमाम त्राहिमाम होने लगा। लोगों की भूख और प्यास से जान जाने लगी। लोग रेहड़ से ही सिंचाई का काम किया करते थे। जब पलामू में अकाल पड़ा था उसी समय झारखंड़ में चापाकल एवम सिंचाई के लिए पंप का प्रयोग शुरू हुआ। वे बताते हैं कि अकाल के समय गिधौर, मुंगेर राजपरिवार के सदस्य कुमार सुरेश सिंह जी रांची के कमिश्नर थे एवम जी पी मल्लिक एसडीओ थे उन दोनों ने ही आकाल में काफी मदद की। उनके योगदान को वे आज भी नहीं भूलते है। 1969 का विधानसभा का जब उपचुनाव हुआ तो भवनाथपुर से फिर से उम्मीदवार बनाया। ये चुनाव जीत गए। श्री देहाती जी को भारी मतों से अपना विधायक के रूप में जनप्रतिनिधि चुना और पलामू की आवाज बनाकर लोकतंत्र के मंदिर बिहार विधानसभा में भेजा गया था और इन्होंने पलामू की जनता को निराश भी नही किया। सयुंक्त सोशलिस्ट पार्टी साधन विहीन पार्टी थी। पलामू में उतरी कोयल, कनहर, सोन, अमानत सहित कई छोटी बड़ी नदियां बहती है। लेकिन ये नदियां गर्मियों में सुख जाती है। यहां के किसानों को सालों भर अपने खेतों की सिंचाई के लिए पानी नही मिल पाता है। यहां यदा कदा सूखा या अकाल देखने को मिल जाता है। इस समस्या से समाधान पाने हेतु छोटी छोटी नदियों पर चेक डैम बनाया गया है। उतरी कोयल नदी जो पलामू की सबसे बड़ी नदी है और यह आगे चलकर सोन नदी से मिल जाती है। इस पर बांध बनाने की योजना बनाई गई थी। लेकिन तत्कालीन बिहार सरकार ने इस पर रोक लगा देती है और बनाई गयी योजना अधर में लटक गई। श्री देहाती जी सरकार की इस रवैया से नाराज हो कर विधानसभा के अंदर ही भूख हड़ताल पर चले गये थे। यह बात है गर्मी के 30 जून 1970 की। विधानसभा की कार्यवाही समाप्त होने के पश्चात सभी विधायक,कर्मचारी अपने अपने घर चले जाते है। श्री देहाती जी अनशन पर बैठे ही रहते है। मुख्यमंत्री श्री देहाती जी को अपने चेम्बर में बुलाते है और अनशन तोड़ने का आग्रह करते है। यह उनके संघर्षशील होने का उदाहरण मात्र है। बांध निर्माण को लेकर एक कुडुक डैम समिति का गठन कर देते है। समिति को 6 महीने में रिपोर्ट सौपना था। लेकिन सौपा नहीं जा सका। हर बार करोडों रुपये खर्च करके प्रोजेक्ट बनाया जाता था। लेकिन काम नही हो पा रहा था। इन चीजों से आजिज होकर श्री देहाती जी इस मुद्दे को लेकर 2009 में हाई कोर्ट चले गए। 2013 में अवकाश प्राप्त जज की अध्यक्षता में एक कमिटी बना दी गयी और यह कमिटी अपना काम कर रही है। केंद्र सरकार से अनुमति मिल गयी है लेकिन राज्य सरकार से अभी तक कोई अनुमति नही मिली है। लेकिन उन्हें पूरा विश्वास है कि उनका 1970 से लागातर किये गए आंदोलन इस डैम को लेकर बेकार नही जाएगी। वह अवश्य ही पूरा होगा। जब झारखंड अलग राज्य नही बना था उस समय उन्होंने बिहार के पूर्व विधायकों के सहयोग से एक यूनियन बनाये थे एवम पूर्व विधायकों की हक की लड़ाई लड़ते रहे।उनको उनका हक दिलवाया। जब झारखंड़ अलग राज्य बना। तो वे झारखंड़ के सभी एक्स एमएलए का एक यूनियन पूर्व विधायक परिषद बनाये उसे निबंधित कराया और यहां के पूर्व विधायको की समस्यओं को लेकर मुखर होकर आवाज उठाते रहे। पूर्व विधायको को पेंशन,चिकित्सा सहित अन्य मांग को लेकर लागातर सरकार से मिलते रहे और मांग करते रहे। आज उनको बड़ी खुशी का अनुभव होता है कि झारखंड के पूर्व विधायकों को जो सुविधा झारखंड़ में मिलता है वो सुविधा भारत की अन्य किसी राज्यों के पूर्व विधायकों को नही मिलता है। जब भवनाथपुर के विधायक एवम उनके दूसरे पुत्र भानुप्रताप शाही जी जेल चले गए थे तो उनके स्थान में मधु कोड़ा की सरकार में उनके पिता श्री हेमेंद्र प्रताप देहाती को सितंबर 2005 में झारखंड सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बनाये गए थे। मंत्री रहते हुए वे अपने कार्यकाल में 6 नए अस्पताल का निर्माण करवाया था। पलामू में 3, देवघर में 2 एवम दुमका में 1 अस्पताल का निर्माण करवाया था। वे बताते हैं कि उनके मंत्री रहते एक बिल आया था कि केंद्र प्रशासनिक अधिकारी (आइएएस) के खिलाफ सरकार तब तक कोई कार्रवाई नहीं कर सकती है जबतक आइएएस कमेटी से एक्शन लेने की स्वीकृति नहीं मिल जाती है। उस बिल का श्री देहाती ने विरोध किया था और बदल दिया था। उस समय उनको सभी मंत्रियों का साथ मिला था और उस बिल को निरस्त करने में सफलता मिली थी। (लेखक महासचिव, बड़कागढ़ रैयत जनमंच से जुडे हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। देश के युवाओं के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मंत्र-खेलेगा इंडिया तो खिलेगा इंडिया, देश में पिछले कुछ सालों में खेल के प्रति समझ में बदलाव लाने का मुख्य कारक रहा है। खेलों को एक समय में ज्यादातर लोग पढ़ाई से अलग सिर्फ एक मनोरंजक गतिविधि मानते थे, लेकिन अब यह केंद्र में आ गया है। युवा मामलों और खेल मंत्रालय द्वारा अपनाई गई योजनाओं, चाहे वो खेलो इंडिया हो, टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम हो या फिट इंडिया मूवमेंट हो, ने खेलों में गंभीरतापूर्वक अपना करियर बनाने के लिए युवा मानस को प्रेरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। अब इस दिशा में बढ़ने वालों की संख्या में दिनों-दिन निरंतर वृद्ध हो रही है। खासतौर से बालिका एथलीटों के लिए समानुभूति और समावेश परिवर्तनकारी एवं महत्वहपूर्ण साबित हुआ है। अब जब हम राष्ट्रीय बालिका दिवस मना रहे हैं तो यह देखना जरूरी है कि हमारी सरकार ने सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास के लक्ष्य को लेकर क्या, कार्यनीति अपनाई है जिसके परिणामस्व रूप बालिकाओं और महिलाओं से संबंधित मामलों, खासतौर से खेलों में किस तरह का परिवर्तन आया है। पिछले कई वर्षों से भारतीय खेल मंच पर हमारी महिला एथलीटों ने जबर्दस्त प्रदर्शन किया है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने विश्वभर को दिखा दिया है कि भारत की महिला चुनौतियों का सामना करने और विश्वभर में ख्याति प्राप्ति करने के लिए तैयार है। महिला खिलाड़ियों के इन शानदार प्रदर्शनों और युवा मामले एवं खेल मंत्रालय द्वारा हाल में किए गए सुधारों के फलस्वरूप खेलों में महिलाओं की समावेशिता और उनकी शिरकत के प्रति जागरूकता पैदा हुई है। इससे युवतियों की एक पूरी पीढ़ी को खेलों में सक्रिय तौर पर भाग लेने की प्रेरणा मिली है। गर्व से कहा जा सकता है कि आने वाले टोक्यो ओलंपिक खेलों के लिए योग्य घोषित कुल भारतीय एथलीट्स में से 43 प्रतिशत महिला एथलीट हैं। भारत को खेलों के मामले में महाशक्ति का दर्जा दिलाने के लिए महत्वपूर्ण है कि बिल्कुल शुरूआती स्तर से ही बच्चों की खेलों में प्रतिभागिता बढ़ाई जाए। एक विस्तृत प्रतिभागिता आधार बनाकर यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि बड़ी संख्या में बच्चे खेल को अपने करियर के तौर पर अपनाएं। यह महत्वपूर्ण है कि इस प्रतिभागिता आधार का 50 प्रतिशत हिस्सा युवतियों के नाम हो और किसी भी कीमत पर उन्हें पीछे नहीं छोड़ा जाए। खेलो इंडिया योजना के तहत उन बाधाओं पर ध्यान केंद्रित किया जाता है जो खेल-कूद में भाग लेने वाली बच्चियों और महिलाओं के सामने पेश आती हैं और इन बाधाओं को दूर करने का तंत्र बनाने और महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। 2018 से 2020 के दौरान खेलो इंडिया कार्यक्रमों में महिलाओं की भागीदारी में 161 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। खेलो इंडिया योजना के तहत 2018 में जहां 657 महिला एथलीटों की पहचान कर उन्हें समर्थन उपलब्ध कराया गया वहीं अब यह संख्या बढ़कर 1471 (223 प्रतिशत की वृद्धि) हो गई है। टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (टीओपीएस) के तहत हम उच्च प्रतिस्पर्धा वाले खेलों में अपने उन एथलीटों को अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण, विश्व स्तरीय शारीरिक और मानसिक अनुकूलन, वैज्ञानिक शोध, दिन-प्रतिदिन निगरानी और कांउसलिंग तथा पर्याप्त वित्तीय सहायता उपलब्ध कराते हैं जो ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतने की क्षमता रखते हैं। सितंबर 2018 में टीओपीएस योजना के तहत 86 महिला एथलीटों को शामिल किया गया और यह बताने में बहुत प्रसन्नता होती है कि आज यह संख्या बढ़कर 190 (220 प्रतिशत की वृद्धि) हो गई है। खेलों में महिलाओं को शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए हमें बड़े पैमाने पर सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव लाना जरूरी है। युवतियों को घरों से बाहर लाना, उन्हें सुरक्षित माहौल देना और शारीरिक गतिविधियों में शामिल होने की अनुमति देना और इसके लिए उच्च स्तररीय कोचिंग और अवसंरचना उपलब्ध कराना- यह सरकार और समाज दोनों के सामूहिक प्रयास से ही संभव हो पाया है। यह देखकर भी प्रसन्नमता होती है कि बहुत सी महिला चैंपियन एथलीटों ने अपने खेल में उच्चतम कुशलता प्राप्त करने के बाद अपनी अकादमियां स्थापित करने में अग्रणी भूमिका निभाई है। ऐसी बहुत सी पहलों को युवा मामले एवं खेल मंत्रालय ने राष्ट्रीय खेल विकास निधि के तहत सहायता और सहयोग उपलब्ध करवाया है। ऊषा स्कूल आॅफ एथलेटिक्स, मैरीकॉम बॉक्सिंग फाउंडेशन, अश्विनी स्पोर्ट्स फाउंडेशन, सरिता बॉक्सिंग एकेडमी, कर्णम मल्ले श्वफरी फाउंडेशन, अंजू बॉबी जॉर्ज स्पोर्ट्स फाउंडेशन आदि सभी पहलें इसके उदाहरण हैं। युवा मामले एवं खेल मंत्रालय लैंगिक समानता को बेहद महत्वपूर्ण मानता है और इस दिशा में काम कर रहा है। खेलों में शिरकत करने से युवतियों और महिलाओं के न सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार और उनका चारित्रिक निर्माण होगा, बल्कि वे समाज में सुधार लाने और मानव मात्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकेंगी। भारत के विकास संबंधी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने के प्रयासों के तहत हमारा मंत्रालय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के साथ रणनीतिक सहयोग करने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। हर वर्ष 24 जनवरी को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय बालिका दिवस हमारे राष्ट्रीय लोकाचार के लिए बेहद प्रासंगिक है। आइये सब मिलकर यह शपथ लें कि हम यह सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगे कि हमारी युवतियां अधिक-से-अधिक खेलों में शिरकत करें और इतना अच्छा प्रदर्शन करें कि हम एक देश के तौर पर ओलंपिक खेलों के उद्देश्योंं-सिटीयस, अल्टीरयस, फोर्टियस यानी तीव्र, उच्चतर, अधिक मजबूत के अधिक-से-अधिक करीब पहुंच सकें। हमारी बेटियों के खेलों में उत्थान से ही समाज और देश की प्रगति होगी। (लेखक केंद्रीय युवा मामले एवं खेल राज्य मंत्री, स्वतंत्र प्रभार हैं, ये उनके अपने विचार हैं।)
एबीएन डेस्क। कॉप 26 के समाप्त हो गया है। ग्लासगो सौदे पर हस्ताक्षर भी हो चुके हैं। लेकिन इसके साथ निश्चित रूप से विकसित देशों द्वारा वित्तीय प्रतिबद्धताओं की अनिश्चितता और सौदे में कोयले के चरणबद्ध कमी पर अंतिम मिनट में बदलाव को लेकर अनिश्चितता का माहौल है। ब्रिटेन के ग्लासगो शहर में आयोजित कॉप 26 में जाने से पहले इस बात पर व्यापक सहमति थी कि यह विकसित देशों के बीच नेट जीरो के संशोधित लक्ष्यों और जलवायु वित्त पर बढ़ती प्रतिबद्धताओं की होड़ होगी। भारत ने शुरूआती दिन ही 2070 तक अपनी नेट जीरो प्रतिबद्धताओं की घोषणा कर दी। साथ ही 2030 तक अपनी अक्षय ऊर्जा हिस्सेदारी को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने की प्रतिबद्धता भी जताई। यह बहुत आशाजनक है। हालांकि, आगे एक लंबा रास्ता तय करना है। वैश्विक स्तर पर दक्षिण के देशों और अन्य विकासशील देशों के बीच भविष्य के लिए ऊर्जा संक्रमण प्रतिबद्धताओं के अभी भी दूर की कौड़ी बने रहने की संभावना है। दुनिया भर में अभी भी 759 मिलियन लोग ऐसे हैं जिनके पास बिजली नहीं है। महामारी के वित्तीय प्रभाव ने बुनियादी बिजली सेवाओं को 30 मिलियन से अधिक लोगों के लिए अप्रभावी बना दिया है, जिनमें से अधिकांश अफ्रीका में स्थित हैं। बिजली की सबसे बड़ी कमी नाइजीरिया, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और इथियोपिया में थी, इस मामले में भारत का स्थान इन देशों के बाद है। सौभाग्य योजना के तहत बिजली की 98 प्रतिशत पहुंच के साथ, भारत ने पिछले दशक में तेजी से ग्रिड विस्तार करके सभी के लिए बिजली की पहुंच सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण प्रगति की है। आपूर्ति की गुणवत्ता अभी भी एक उभरता हुआ मुद्दा है, जिसे कर्ज में डूबी वितरण कंपनियों के विवेक पर छोड़ दिया गया है। रुक-रुक कर हो रही बिजली की आपूर्ति व्यवसायों को पंगु बना रही है। गांवों में उद्यमियों को उनके कामकाज को बढ़ाने में अवरोध पैदा कर रही है। ये व्यवसाई अपने व्यवसाय के विस्तार और स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान के लिए उत्पादन क्षमता को और उसके उपयोग को बढ़ाना चाहते हैं। आॅफ-ग्रिड सौर उपकरण जैसे विकेंद्रीकृत समाधान छोटे व्यवसायों के लिए केवल बिजली की रौशनी भर मुहैया नहीं करा रहे, बल्कि उनके व्यवसाय को भी बढ़ाने में काफी योगदान दे रहे हैं। उदाहरण के लिए, झारखंड के पेरका गांव में एक 5 वॉट सौर प्रणाली एक बाजरा प्रोसेसिंग प्लांट यूनिट को बिजली प्रदान करती है, जहां 35 से अधिक महिलाएं कार्यरत हैं। उनमें से प्रत्येक अब प्रति माह 7000 रुपए की अतिरिक्त आय अर्जित कर रही हैं। ये वर्तमान ग्रिड सिस्टम द्वारा मुहैया कराना बहुत हद तक संभव नहीं है। वितरित अक्षय ऊर्जा (डिस्ट्रीब्यूटेड रिन्यूएबल एनर्जी, डीआरई) से संचालित आजीविका के उपायों को भी गति प्रदान करती है। जैसे सौर ऊर्जा संचालित कृषि प्रसंस्करण इकाइयों, कोल्ड स्टोरेज आदि में डीजल पर निर्भरता को कम करने और अंतत: पूरी तरह से समाप्त करने और ग्रिड आपूर्ति को पूरक करने की क्षमता इसमें है। कृषि, कृषि-प्रसंस्करण, डेयरी, कुक्कुट पालन, मत्स्य पालन, सिलाई आदि में डीआरई आजीविका अनुप्रयोगों के सफल पायलट और व्यवसायिक मॉडल हैं। इसको आगे बढ़ाने की पृष्ठभूमि में निम्नलिखित उपायों की तत्काल आवश्यकता है: पहला- वर्तमान में उपलब्ध डीआरई आजीविका अनुप्रयोगों का विस्तार करें। दूसरा- वित्त तंत्र के माध्यम से नए डीआरई आजीविका प्रयोगों के विकास में सहायता करना। स्टेट आॅफ द सेक्टर रिपोर्ट के चौथे संस्करण में स्वच्छ ऊर्जा एक्सेस नेटवर्क 2019-20 में समग्र डीआरई क्षेत्र का सकारात्मक दृष्टिकोण देता है। हालांकि यह क्षेत्र व्यापक जागरूकता की कमी, बाजार से सीमित संबंधों से जूझने के अलावा, पर्याप्त वित्त जुटाने, नीतिगत ढांचे को तय करने के लिए लगातार संघर्ष कर रहा है। एक ऐसे देश के लिए, जिसने अपने ग्रिड में अक्षय ऊर्जा के 100 गीगावाट को जोड़ा है, डीआरई समाधानों की बात करते समय अपने स्थायित्व को खोजने की चुनौतियां इसकी अन्य सफलताओं के विपरीत हैं। इस क्षेत्र में निवेश किए गए हितधारक अभी भी राज्य स्तर पर अपने व्यावसायिक हितों का विस्तार करने के लिए एक ठोस नीतिगत ढांचे की प्रतीक्षा कर रहे हैं। शायद यही वजह है कि देरी और नीतिगत विफलताओं को इसके लिए दोष दिया जा सकता है। खासकर तब, जब हम मानते हैं कि नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) 2020 के अक्टूबर में ग्रामीण आजीविका में डीआरई अनुप्रयोगों के पहले मसौदे के साथ आया था, जिसे मार्च 2021 में संशोधित किया गया था। ऐसा ही एक और उदाहरण झारखंड राज्य में मिनी ग्रिड नीति है, जहां 2018 में तैयार किया गया पहला मसौदा 2020 के अंत में अपडेट किया गया था और फरवरी 2021 में संशोधित किया गया था. इसे अभी भी सरकार द्वारा अंतिम रूप दिए जाने का इंतजार है। पेरिस सीओपी में भारत की 2022 तक 100 गीगावॉट की प्रतिबद्धता के बाद सरकार का ध्यान अब तक जोड़ा गया गीगावाट बनाम बिजली की कमी से दूर कर लाखों लोगों के उत्थान पर है। और यह स्थिति ग्लासगो सौदे के बाद भी जारी रहने की संभावना है। आंतरिक समस्या ये है कि, देशभर में मौजूद बिजली के असमान वितरण जैसी समस्याओं को स्वीकार नहीं करना। इससे बिजली से संबंधित प्राथमिकताओं, उसके कार्यान्वयन पर फोकस करने में भी परेशानी पैदा होती है। डीआरई क्षेत्र को सही मात्रा में वित्त पोषण, नीति कार्यान्वयन और समर्थन सुनिश्चित करने के लिए देश के भीतर भी ऊर्जा इक्विटी को समझने करने की आवश्यकता है। यह बदले में भारत को बिजली की कमी से हमेशा के लिए दूर कर सकता है। डीआरई क्षेत्र में 2023 तक देश में 1,90,000 प्रत्यक्ष नौकरियां और 2,10,000 अप्रत्यक्ष नौकरियां होने का भी अनुमान है। यह ग्रीन जॉब्स भारत के हरित ऊर्जा संक्रमण के लिए महत्वपूर्ण है. इन आकांक्षाओं ने बिजली की कमी को समाप्त करने की जोरदार पहल तो की ही है, साथ ही वैश्विक स्तर पर दक्षिणी देशों के लिए लाइटहाउस बनने के लिए भारत की क्षमता को 100% विद्युतीकरण से आगे बढ़ने की क्षमता प्रदान की है।
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