विचार

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Published / 2022-01-09 17:22:12
आज कितना सुरक्षित है समाज, भय के माहौल में कैसे होगा विकास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (बाबूलाल मरांडी)। किसी समाज या राज्य की समृद्धि का पैमाना केवल आर्थिक उन्नति या सुविधा संपन्न होने को ही नहीं माना जा सकता। बल्कि समाज के लिए भयमुक्त और सुरक्षायुक्त वातावरण एक आदर्श परिकल्पना है। असुरक्षा की भावना लोगों के आत्मविश्वास को कम करता है, जो समाज और राज्य के उन्नति में सबसे बड़ा बाधक है। 21 वर्ष पूर्व विश्व मानचित्र में आया एक नया राज्य झारखंड आज अपनी तरूणाई अवस्था को पार कर अपनी परिपक्वता की ओर अग्रसर है। अब इस परिपक्व अवस्था वाले राज्य से लोगों की अपेक्षाएं बढ़ना स्वभाविक है। आर्थिक शब्दावली और आंकड़ों के जाल को अगर दूर भी रखा जाए तो मोटे शब्दों में यहां के लोग कितने खुश है, कितने सुरक्षित और कितने समृद्ध हैं, इन सवालों पर तो पूर्वाग्रह की भावना त्याग कर वैचारिक विमर्श आवश्यक है।निश्चित रूप से कोरोना महामारी के बाद सरकार के सामने चुनौतियां है, इस महामारी ने काफी नुकसान पहुंचाया है। केन्द्र सरकार की टीकाकरण और सामाजिक सुरक्षा के तहत राशन और आर्थिक मदद कहीं न कहीं लोगों के मन में आत्मविश्वास बढ़ाने वाला ही है। अब हमें यह स्वीकार करना होगा कि आनेवाला कुछ वर्ष कोरोना के साथ ही बीतेगा। अब इन चुनौतियों के बीच ही अन्य सारे काम करने होंगे। इस महामारी के बाद अपने राज्य झारखंड की बात करें तो लोगों को सिवाय निराशा और असुरक्षा के कुछ नहीं मिला। कोरोना महामारी सरकार को अपनी अकर्मण्यता और नाकामियों को छिपाने के लिए एक दिव्य अस्त्र मिल गया। विगत 2 वर्षों में जिस प्रकार हत्या, लूट और बलात्कार के मामलों में बढ़ोत्तरी हुई, वो आज किसी से छिपी हुई नहीं है। विगत दो सालों में 3451 हत्याएं, 3154 बलात्कार और 654 नक्सली घटनाएं ये बताने के लिए काफी है कि आज राज्य की कानून व्यवस्था सबसे कमजोर अवस्था में है। अपराधी बेलगाम हो चुके हैं, प्रशासन राज्य सरकार के टूल के रूप में काम कर रही है। कई मामलों में अपराधियों को पकड़ने के बजाय पुलिस निर्दोषों को ही पकड़कर जेल भेजने की खबरें सामने आती रही है। अपराधों के इन आंकड़ों पर गौर करना इसलिए भी आवश्यक है कि अगर स्थितियां ऐसी ही बनी रहे तो हम लोगों के मन में सुरक्षा की भावना के विकास की कल्पना ही नहीं कर सकते। साहिबगंज की होनहार महिला दारोगा रूपा तिर्की हत्या का मामला हो, धनबाद के जज की हत्या या हालिया सिमडेगा में मॉब लिंचिंग का मामला। सारे प्रकरणों में राज्य सरकार की भूमिका और जांच के प्रति उदासीनता कहीं न कहीं संदेह पैदा करती है। वर्ष 2022 के शुरूआती दिनों में जिस प्रकार से मनोहरपुर के पूर्व विधायक गुरूचरण नायक के ऊपर नक्सली घटना हुई और उनके दो अंगरक्षकों को निर्ममतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया वो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण था, लेकिन उससे कहीं अधिक दुर्भाग्यपूर्ण इस घटना के बाद राज्य सरकार की नक्सलियों पर कार्रवाई करने के बजाय उल्टे पूर्व विधायक को दोषी ठहराना कहीं न कहीं नक्सलियों को ही संरक्षण देने के समान है। नक्सलियों की हिम्मत आज इतनी बढ़ी हुई है कि वो पुलिस के हथियार छिनकर ले जा रहे हैं और पूरा का पूरा प्रशासनिक तंत्र इसके सामने लाचार सा नज़र आता है। जब मैं गुरूचरण नायक जी से मिलकर वस्तुस्थिति का पता लगाने के लिए चक्रधरपुर से सोनुवा के रास्ते आगे बढ़ा तो पुलिस ने यह कहकर रोक दिया कि आगे जाना सुरक्षित नहीं है। अब कल्पना कीजिए कि स्थिति कितनी खराब है कि दिन के उजाले में मुख्य सड़क तक भी जाने में पुलिस डर रही है। मुझे रोकने के पीछे कारण राजनैतिक भी हो सकता है, लेकिन ये स्वीकारोक्ति अपने आप में प्रशासन का असहाय होने का बोध कराता है। ठीक उसी दिन सिमडेगा जिला मुख्यालय से महज 15 किलोमीटर की दूरी पर कोलेबिरा थानार्न्तगत बसराजारा गांव में एक दिल दहला देने वाली घटना घटी, संजू प्रधान नामक एक दलित युवक को 500 की उन्मादी भीड़ ने पीट पीटकर अधमरा कर दिया और फिर उसे आग के हवाले कर दिया। इस मॉब लिंचिंग के पहले गांव में ही लोगों ने बैठक की और हत्या की पूरी योजना बना ली थी। प्रत्यक्षदर्शियों और मृतक के परिजनों की माने तो पुलिस भी भीड़ के साथ आई थी और वो घटना को रोकने के बजाय मूकदर्शक बनी रही। लोग संजू को पीटते रहे, उसकी पत्नी और मां सबके सामने गिड़गिड़ाती रही, पुलिसवालों के पैर पकड़कर संजू को बचाने की गुहार लगाती रही, लेकिन पुलिसवालों ने कुछ नही किया उल्टे पूरे घटनाक्रम की वीडियो बनाती रही। शुक्रवार की रात गुमला के गुरदरी थानांतर्गत एनकेसीपीएल के बॉक्साइट माइंस के प्लांट में नक्सली धावा बोलकर 27 वाहनों को जला डाला और कर्मियों के साथ पिटाई भी की। हर बार की तरह पुलिस देर से आई और जांच के नाम पर खानापूर्ति कर दी जाएगी। अब सवाल उठता है कि आज राज्य में पुलिस इतनी लाचार क्यों है? क्यों अपराधियों और नक्सलियों के सामने नतमस्तक होकर उसके ही संरक्षक की भूमिका में क्यों है? पुलिसवाले अगर चाहते तो संजू की जान बच सकती थी, लेकिन उसके बाद पुलिस के द्वारा सादे कागजों में मृतक की पत्नी से हस्ताक्षर कराकर उनके ही परिजनों को मामले में फंसाकर जेल भेज देना कई सवाल पैदा करता है। ऐसी कौन सी ताकतें है, जो मुख्य आरोपियों को बचा रही है जबकि उसके परिजन खुलकर आरोपियों के बारे में बता रहे हैं। बात केवल संजू, गुरूचरण या रूपा तिर्की तक ही सीमित नहीं है। इन दो वर्षों में जिस प्रकार से अपराधियों की हिम्मत में बढ़ोत्तरी हुई है, जेल से अपराधियों के रंगदारी का तंत्र, अवैध उत्खनन माफिया का साम्राज्य, बलात्कारियों की हिम्मत और नक्सलियों की बढ़ती ताकत को रोकने में सरकार विफल ही रही है। जबतक राज्य इन सुरक्षा मानकों पर खरा नहीं उतरता तो हम लोगों के मन में सुरक्षा की भावना का विकास कैसे कर सकते हैं? (लेखक झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री सह नेता विधायक दल, भारतीय जनता पार्टी झारखण्ड प्रदेश हैं।)

Published / 2022-01-07 15:33:16
सूर्य नमस्कार का विरोध ठीक नहीं

प्रमोद भार्गव, एबीएन न्यूज। सूर्य नमस्कार का विरोध ठीक नहीं सूर्य नमस्कार योग की क्रियाएं हैं, इनका किसी धर्म से कोई वास्ता नहीं है। हम जिम जाते हैं, वहां अनेक शारीरिक क्रियाएं ऐसी होती हैं, जिनसे लगता है कि हम सिजदे में जा रहे हैं, लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है। सूर्य नमस्कार को भी इसी दृष्टि से देखने की जरूरत है। देशभर में हजारों शिक्षक योग और संस्कृत के अध्यापन कार्य से जुड़े हैं। इनके पाठों में सूर्य नमस्कार से लेकर प्रकृति की प्रार्थनाएं श्लोकों के उच्चारण के साथ पढ़ाई जाती हैं, तब क्या इस्लाम प्रभावित नहीं होता? समरसता विरोधी यह मानसिकता तो अलगाववाद का प्रतिनिधित्व करने वाली है। धर्म की आड़ में ऐसी आपत्तियां स्वंयभू झंडाबरदार मुस्लिम समाज की छवि कट्टर बनाने के अलावा कुछ नहीं कर रहे। सूर्य ब्रह्मांड का एक ग्रह है। यह दुनिया को प्रकाश देने के साथ जीवन भी देता है। इसके बावजूद सूर्य की ये देनें, उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने की बजाय, धर्म के आधार पर आपात्ति बन रही हैं। आल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी ने फतवा जारी किया है कि सूर्य की उपासना करना इस्लाम धर्म के अनुसार उचित नहीं है, इसलिए सरकार को इससे जुड़े विद्यालयों को दिए दिशा-निर्देश वापस ले लेने चाहिए, जिससे धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का आदर बना रहे। रहमानी ने कहा है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष, बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक देश है। इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर हमारा संविधान बना है। संविधान हमें इसकी अनुमति नहीं देता कि सरकार शिक्षण संस्थानों में किसी धर्म विशेष की शिक्षाएं देने का उपाय करे या किसी धर्म विशेष समूह की मान्यताओं के आधार पर उत्सव आयोजित किए जाएं। अतएव यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि वर्तमान सरकार देश के सभी वर्गों पर बहुसंख्यक समुदाय की सोच और परंपरा को थोपने का प्रयास कर रही है। दरअसल भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने 75वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर तीस राज्यों के सूर्य नमस्कार की परियोजना को जमीन पर उतारने का फैसला किया है। इसमें देश के तीस हजार विद्यालयों को पहले चरण में शामिल किया जाएगा। 1 से 7 जनवरी तक यह कार्यक्रम स्कूलों में होना है। तत्पश्चात 26 जनवरी को सूर्य नमस्कार प्रक्रिया के साथ बड़े पैमाने पर संगीत कार्यक्रम भी प्रस्तावित है। सूर्य की इस स्तुति के दौरान सूर्य के सम्मान में योग की कुछ आसनों का भी प्रयोग किया जाता है, जो मानव शरीर के लिए स्वास्थ्य की दृष्टि से विशेष रूप से लाभदायी हैं। मौलाना रहमानी इन्हीं आसनों को सनातन हिंदू धर्म और परंपराओं से जुड़ी होने के कारण आपत्ति जता रहे हैं। इस नाते सूर्य नमस्कार की विधि इतर संप्रदाय पर थोपने के अलावा कुछ नहीं है? हालांकि मौलाना की इस आपत्ति के विरोध में इस्लाम के अनुयायी ही मुखर होने लगे हैं। रांची के एक विद्यालय की योग शिक्षिका राफिया नाज ने बोर्ड को तर्कसंगत सीख देते हुए कहा है कि सूर्य नमस्कार का अर्थ यह नहीं होता कि हम सूर्य की पूजा करें, बल्कि ये बारह ऐसे आसन हैं, जो योग के माध्यम से शरीर को स्वस्थ रखने का काम करते हैं। यदि किसी को योग से जुड़े मंत्र नहीं पढ़ने हैं तो यह बाध्यकारी नहीं है कि आप मंत्रोच्चार के साथ ही योगासन और सूर्य नमस्कार करें। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (महिला प्रकोष्ठ) की संयोजिका शालिनी अली, शिया स्कॉलर रजा हुसैन रिजवी और उत्तराखंड मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष बिलाल रहमान ने भी मौलाना रहमानी के बयान को खारिज किया है। मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्व-विद्यालय, हैदराबाद के कुलाधिपति फिरोज बख्त अहमद ने तो दो टूक शब्दों में यहां तक कह दिया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, मुस्लिमों का ठेकेदार नहीं है। सूर्य नमस्कार योग की क्रियाएं हैं, इनका किसी धर्म से कोई वास्ता नहीं है। हम जिम जाते हैं, वहां अनेक शारीरिक क्रियाएं ऐसी होती हैं, जिनसे लगता है कि हम सिजदे में जा रहे हैं, लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है। सूर्य नमस्कार को भी इसी दृष्टि से देखने की जरूरत है। देशभर में हजारों शिक्षक योग और संस्कृत के अध्यापन कार्य से जुड़े हैं। इनके पाठों में सूर्य नमस्कार से लेकर प्रकृति की प्रार्थनाएं श्लोकों के उच्चारण के साथ पढ़ाई जाती हैं, तब क्या इस्लाम प्रभावित नहीं होता? यह नहीं भूलना चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र संघ के आह्वान पर 177 से भी ज्यादा देश प्रति वर्ष 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाते हैं। इनमें दर्जनों इस्लाम धर्मावलंबी देश भी हैं। सूर्य की मान्यता केवल भारत में हो ऐसा नहीं है। प्राचीन मिस्र में रे, रा या एमोन रे आदि रूपों में सूर्य की बड़ी प्रतिष्ठा थी। सुमेरिया की सभ्यता में वह उतु नाम से पूजा जाता है। बेबीलोन के धर्म में शम्स के रूप में सूर्य की मान्यता है। असीरियावासी अश्शुर नाम के सूर्यदेव के उपासक थे। ईरानी सूर्य को मित्रा के रूप में मानते थे। यूनान में हेलिओस और एपेलो नामक देवता सूर्य का प्रतिनिधत्व करते थे। पेरू और मैक्सिको में भारत की तरह ही सूर्य मंदिर बनाए जाने की परंपरा थी। पेरू में इंका जाति के लोग खुद को सूर्यवंशी मानते हैं। मध्य अमेरिकी की मय-सभ्यता सूर्य को अह-किंचिल के प्रतीक के रूप में देखती थी। मसलन सूर्य की मान्यता और महिमा विश्वव्यापी है। दरअसल योग को किसी धार्मिक नहीं स्वास्थ्य-लाभ के एजेंडे में शामिल करके योग दिवस के रूप में मान्यता दी गई है। इसकी प्रस्तावना में कहा है कि योग स्वास्थ्य लाभ की आवश्यकता पूर्ति के लिए सभी प्रकार की ऊर्जाओं की आपूर्ति करता है। इन ऊर्जाओं की शरीर में आपूर्ति तभी संभव है, जब सूर्य नमस्कार से जुड़ी योगासनों को अमल में लाया जाए। अतएव योग को किसी संप्रदाय को आहत करने की मंशा के रूप में नहीं देखना चाहिए। योगासन का विरोध केवल इस्लाम धर्मावलंबी करते हों, ऐसा भी नहीं है, एक समय अमेरिका, ब्रिटेन और कैलिफोर्निया के धर्मगुरुओं ने भी इसे अस्वीकार किया था। तब उन्हें योग ईसाइयत को प्रभावित करने वाला लगा था, किंतु अब इसे ईसाई धर्मावलंबी स्वीकार कर आत्मसात कर रहे हैं। आजकल उत्तर-प्रदेश के एहसान राव पुलिस सुरक्षा में इसलिए रह रहे हैं, क्योंकि उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और गृहमंत्री अमित शाह के जुलूस में जय श्रीराम और भारत माता के नारे लगाए थे। इस पर आपत्ति जताते हुए देवबंद के आलिम और मदरसा शेखुल हिंद के मुफ्ती कासमी ने राव की नारेबाजी पर कहा था कि इस्लाम में इसकी कतई गुजांइश नहीं है। कुछ समय पहले राष्ट्रगीत वंदे मातरम महाराष्ट्र व तमिलनाडु के विद्यालयों में अनिवार्य करने के कारण चर्चा में आए थे। तब वंदे मातरम को लेकर मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग और राजनीतिक दलों ने विरोध जताया था। राष्ट्रगीत का बहिष्कार संसद और विधानसभाओं में होना कोई नई बात नहीं है, जबकि संविधान के इस प्रावधान का अपमान अलगाववादी मानसिकता का प्रतीक है। यह मामला तब और गंभीर हो जाता है, जब निर्वाचित सांसद और विधायक राष्ट्रगान की जानबूझकर अवहेलना करते है, जबकि कोई भी निर्वाचित जनप्रतिनिधि न केवल बहुधर्मी और बहुजातीय मतदाताओं के बहुमत से संसद में पहुंचता है, बल्कि धर्म व जातीयता से ऊपर उठकर संविधान, देश व जनहित की शपथ लेकर अपने कर्तव्य का पालन शुरू करता है। सूर्य नमस्कार को लेकर मौलाना रहमानी संविधान व धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा के लिए आपत्ति जताते हैं, लेकिन जब इसी संविधान की शपथ लेकर भारतमाता और राष्ट्रगान की अवहेलना मुस्लिम सांसद व विधायकों द्वारा की जाती है तो होंठ सिल लेते हैं। तब यह कैसे बहु-धर्मिकता और बहु-सांस्कृतिकता का सम्मान हुआ? समरसता विरोधी यह मानसिकता तो अलगाववाद का प्रतिनिधित्व करने वाली है। धर्म की आड़ में ऐसी आपत्तियां मुस्लिम समाज के स्वंयभू झंडाबरदार मुस्लिम समाज की छवि कट्टर और रूढ़िवादी बनाने के अलावा कुछ नहीं कर रहे। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

Published / 2022-01-07 15:29:19
हरियाणा में हर घर नल का जल झारखंड में कितना?

अलका आर्या, एबीएन न्यूज। नव वर्ष में सबको नल से मिले जल जल जीवन मिशन अब जन आंदोलन के रूप में चलाया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के सबका साथ, सबका विकास, सब का विश्वास, सब का प्रयास विजन के सिंद्धांत का पालन करते हुए इस मिशन का आदर्श वाक्य है कि कोई भी छूटे नहीं और मुल्क में हर ग्रामीण परिवार को नल के पानी का कनेक्शन दिया जाए। सिर्फ पानी ही उपलब्ध नहीं कराया जाए बल्कि पानी की गुणवत्ता पर निगरानी रखने की भी व्यवस्था की गई है। फील्ड टेस्ट किट का इस्तेमाल करके पानी की गुणवत्ता का परीक्षण करने क लिए 8.5 लाख से अधिक महिला स्ंवयसेवकों को प्रशिक्षित किया गया है। जल जीवन मिशन का लक्ष्य 2024 तक मुल्क के हर ग्रामीण घर में नल से शुद्व पेय जल पहुंचाना है। अलका आर्य पानी की समस्या को अक्सर एक सामाजिक समस्या के तौर पर देखा जाता है, जिसके स्वास्थ्य पर तात्कालिक व दूरगामी प्रभाव की पुष्टि कई अध्ययन भी करते हैं। मुल्क में पानी की कमी की समस्या एक गंभीर संकट है और इसके समाधान के लिए भारत सरकार न केवल मुल्क के भीतर बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इस मुद्दे को उठाने के लिए पहल करती नजर आ रही है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2019 को जल जीवन मिशन (जेजेएम) की घोषणा की थी, इस मिशन के तहत मुल्क के सभी ग्रामीण घरों में यानी 19.22 करोड़ घरों में 2024 तक नल से जल पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है, मगर साथ ही साथ जल-स्त्रोतों की निरंतरता बनाए रखना भी इसका अनिवार्य हिस्सा है। इसके अंतगर्त वर्षाजल संचयन और जल संरक्षण के जरिए जल-स्त्रोतों के पुनर्भरण को सुनिश्चित किया जाता है तथा ग्रेवॉटर प्रबंधन के द्वारा गंदले पानी का पुनरुपयोग किया जाता है। नव वर्ष 2022 सरकार की प्राथमिकता है कि सबको नल से जल मिले। वर्ष 2019 में मिशन की शुरूआत में मुल्क के 19.22 करोड़ ग्रामीण परिवारों में से केवल 3.23 करोड़ (17 फीसदी) के पास नल जल की आपूर्ति थी। कोविड-19 महामारी और उसके कारण लगने वाले लॉकडाउन का असर तकरीबन हरेक गतिविधि पर पड़ा। जल जीवन मिशन का कार्य भी कुछ हद तक प्रभावित हुआ, लेकिन प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद इस मिशन के तहत बीते 28 महीनों में 5.44 करोड़ से अधिक ग्रामीण घरों में नल से जल आपूर्ति शुरू हो चुकी है। आंकड़े महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि आंकड़े सुधार करने के साथ-साथ कार्यक्रमों के प्रदर्शन को आंकने का एक मौका मुहैया कराते हैं। बहरहाल जे.जे.एम के आंकड़ों बावत अपर सचिव व जल जीवन मिशन के निदेशक भरत लाल के अनुसार-वर्तमान में 8.67 करोड़ ग्रामीण परिवारों को नल जल उपलब्ध कराया गया है। ध्यान देने वाली बात यह है कि मुल्क के तीन राज्य तेलंगाना, हरियाणा व गोवा और तीन केंद्र शसित प्रदेशों अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, दादरा और नगर हवेली और दमन दीव, पुडुचेरी के सभी ग्रामीण घरों में नल जल की आपूर्ति की गई है शेष राज्यों व केंद्रशसित प्रदेशों में भी कार्य प्रगति पर है। वैसे भारत के मानचित्र पर ग्रामीण इलाकों के घरों में नल जल आपूर्ति को लेकर निगाह डालें तो 15 अगस्त 2019 की स्थिति व 30 नवंबर 2021 की स्थिति के फर्क को रंगों के जरिए समझा जा सकता है। इस दिशा में हो रही प्रगति साफ पता चलती है, लेकिन फिर भी चिंता बनी हुई है। घरेलू नल कनेक्शन प्रदान करने के मामले में विभिन्न राज्यों की 30 नवंबर 2021 तक तुलनात्मक स्थिति बोलती है कि मुल्क का सबसे बड़ा राज्य जिसकी आबादी करीब 23 करोड़ है, वह जल जीवन मिशन में सबसे पीछे है। यहां ग्रामीण घरों में नल जल आपूर्ति का आंकड़ा दस प्रतिशत से थोड़ा ही ऊपर है। छत्तीसगढ़, प.बंगाल, झारखंड उत्तरप्रदेश से थोड़ा बेहतर प्रदर्शन करते दिखाए गए हैं। राजस्थान में यह आंकड़ा 30 प्रतिशत को छू गया है। उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, झारखंड और राजस्थान को लाल रंग में दशार्या गया है। बेशक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी 16 नवंबर को उत्तरप्रदेश में पूर्वांचल एक्सप्रेस वे के उद्घाटन के मौके पर कहा कि सिर्फ दो साल ही में यूपी सरकार ने करीब-करीब 30 लाख ग्रामीण परिवारों को नल से जल पहुंचा दिया है और इस वर्ष लाखों बहनों को अपने घर पर ही शुद्व पेयजल देने के लिए डबल इंजन की सरकार पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। 19 नवंबर को ही प्रधानमंत्री ने उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में महोबा में एक कार्यक्रम में राज्य के इस सूखे इलाके में पानी की कमी की चिंता पर वहां की जनता को यह आश्वासन दिया यहां की माताओं-बहनों की सबसे बड़ी मुश्किल को दूर करने के लिए, बुंदेलखंड में जल जीवन मिशन के तहत भी तेजी से काम हो रहा है। बुंदेलखंड और साथ-साथ विंध्यांचल में, पाइप से हर घर में पानी पहुंचे, इसके लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है। संभवत: इस अभियान के सकारात्मक नतीजे आने वाले कुछ महीनों में नजर आएं। गुजरात, बिहार और हिमाचल प्रदेश करीब 90 फीसदी लक्ष्य को छूने वाले राज्य हैं। पंजाब इनसे आगे खड़ा नजर आता है। पंजाब ने 90 फीसदी ग्रामीण घरों में नल जल आपूर्ति कर दी है। पंजाब का पड़ोसी हरियाणा 100 फीसदी नल जल आपूर्ति के साथ पंजाब से आगे निकल गया है। वैसे जल जीवन मिशन जैसे सामाजिक आंदोलन के तहत बच्चों के स्वास्थ्य और उनकी देखभाल पर ध्यान केंद्रित करते हुए स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों मे नल से शुद्व जल की आपूर्ति को प्राथमिकता के आधार पर लागू किया जा रहा है। इसके तहत अब तक 8.33 लाख यानी 81.33 प्रतिशत स्कूलों और 8.76 लाख यानी 78.48 प्रतिशत आंगनबाड़ी केंद्रों में नल से जल की व्यवस्था कर दी गई है, जिसमें शौचालयों में नल से जल की सुविधा भी शमिल है। यूनिसेफ इंडिया के वॉश के प्रमुख निकोलस ओस्बर्ट का मानना है कि जल जीवन मिशन विशेष तौर पर दूषित जल से होने वाली बाल मौतों को कम करने में अहम भूमिका निभा सकता है। इसमें बच्चों व महिलाओं की जिंदगी को बेहतर बनाने की संभावना है जल जीवन मिशन अब जन आंदोलन के रूप में चलाया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के सबका साथ, सब का विकास, सब का विश्वास, सब का प्रयास विजन के सिंद्धांत का पालन करते हुए इस मिशन का आदर्श वाक्य है कि कोई भी छूटे नहीं और मुल्क में हर ग्रामीण परिवार को नल के पानी का कनेक्शन दिया जाए। सिर्फ पानी ही उपलब्ध नहीं कराया जाए बल्कि पानी की गुणवत्ता पर निगरानी रखने की भी व्यवस्था की गई है। फील्ड टेस्ट किट का इस्तेमाल करके पानी की गुणवत्ता का परीक्षण करने क लिए 8.5 लाख से अधिक महिला स्ंवयसेवकों को प्रशिक्षित किया गया है। वे नमूने इकट्ठे कर पानी की गुणवत्ता का परीक्षण करते हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि आपूर्ति किया जा रहा जल निर्धारित मानकों के अनुसार है या नहीं। आज, मुल्क में 2,000 से अधिक जल परीक्षण प्रयोगशालाए हैं जो पानी की गुणवत्ता का परीक्षण करने के लिए मामूली कीमत पर जनता के लिए उपलब्ध हैं। जल जीवन मिशन के तहत सरकार का लक्ष्य 2024 तक मुल्क के हर ग्रामीण घर में नल से शुद्व पेय जल पहुंचाना है। मुल्क के सुदूर-दुर्गम गांवों तक नल पेय जल पहुंचाने के लिए नवीनतम प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। हाल ही में लेह के जिला प्रशासन ने जिले के ऊंचे पर्वतीय दुर्गम और सुदूर से सुदूर इलाकों में स्थित गांवों में जल जीवन मिशन के कार्यों के वास्ते इस्तेमाल होने वाले पानी के पाइपों और अन्य सामग्री को पहुंचाने के लिए हेलीकॉप्टर की मदद ली। जैसे-जैसे जल जीवन मिशन की रफ्तार और तेज होगी, वैसे-वैसे इस मिशन का आदर्श वाक्य कोई भी छूटे नहीं चरितार्थ होने के करीब पहुंचता नजर आएगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

Published / 2022-01-07 13:00:12
ब्रिटेन में फेल निजी रेल के प्रयोग की भारत में शुरुआत...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (विनायक चटर्जी)। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने हाल ही में अपने देश के ध्वस्त हो रहे रेलवे नेटवर्क की व्यापक जांच और मरम्मत की घोषणा करते हुए कहा, ब्रिटेन के विफल होते ट्रेन नेटवर्क को सरकार के नियंत्रण में लाया जाएगा। उनका यह कदम सन 1980 और 1990 के दशक में कंजरवेटिव पार्टी की सरकारों द्वारा शुरू की गई निजीकरण की विवादास्पद नीति को पलट देगा। ग्रेट ब्रिटिश रेलवेज (जीबीआर) नामक एक नई सार्वजनिक संस्था गठित की जाएगी। जीबीआर में समूचा रेलवे तंत्र शामिल होगा। यानी बुनियादी ढांचे से लेकर समय सारणी बनाने और टिकट से होने वाली आय संग्रहित करने तक का सारा काम। यह नई संस्था रेलवे नेटवर्क के पूंजीगत कार्य की योजना बनाने और उसका क्रियान्वयन करने के लिए भी उत्तरदायी होगी। फिलहाल बुनियादी ढांचे यानी ट्रैक, सिग्नल और बड़े स्टेशनों का प्रबंधन कर रही नेटवर्क रेल को इसमें समाहित कर लिया जाएगा। नई कंपनी निजी ट्रेन संचालकों को अनुबंधित करने का काम भी करेगी। ज्यादातर ट्रेनों के संचालन का काम उनके हवाले ही होगा। गत 20 मई को घोषित इन प्रस्तावों को बीते 25 वर्ष में ब्रिटेन के रेलवे उद्योग के इतिहास की सबसे बड़ी घटना माना जा रहा है। रेलवे एक बार फिर सरकार के हाथ में आ रही है। हालांकि इस दौरान निजी क्षेत्र का सहयोग लिया जाएगा। 30 वर्षीय योजना का मसौदा परिवहन मंत्री ग्रांट शैप्स और ब्रिटिश एयरवेज के पूर्व मुख्य कार्याधिकारी कीथ विलियम्स ने तैयार किया है। इस योजना को 2023 तक पूरी तरह क्रियान्वित करना है। सन 1979 में जब तत्कालीन थैचर प्रशासन ने ब्रिटिश रेलवे का निजीकरण करने का निर्णय लिया था तब मिजाज बिल्कुल अलग था। उस वक्त कहा गया था कि प्रबंधन कौशल, उद्यमिता की भावना हासिल करने और जनता को बेहतर सेवा प्रदान करने के लिए रेलवे का निजीकरण किया जाएगा। चार वर्ष बाद 1993 में रेलवे अधिनियम लागू हो गया। ट्रैक अथॉरिटी मॉडल अपनाया गया जबकि यात्री रेल सेवाओं को निजी कंपनियों को सौंप दिया गया। स्थायी परिसंपत्तियों मसलन रेलवे ट्रैक, स्टेशन, सुरंगें, पुल, सिग्नल और डिपो आदि जो पुरानी सरकारी कंपनी ब्रिटिश रेल के आधिपत्य में थे उन्हें एक स्वतंत्र कंपनी रेलट्रैक के हवाले कर दिया गया। सन 1995 में रेलटै्रक ने यात्री रेल सेवाओं की फ्रैंचाइज निजी यात्री रेल परिचालन कंपनियों को देनी शुरू की। अब इस फ्रेंचाइजी मॉडल में दिक्कतें देखी जा रही हैं क्योंकि इससे पूरा नेटवर्क बहुत हद तक विखंडित हो गया है। ऐसे में फ्रैंचाइज का संचालन कर रही कंपनी के पास परिचालन को लेकर बहुत सीमित अधिकार रह जाते हैं और ट्रैक और ट्रेन परिचालकों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो जाता है। ऐसा भी प्रतीत होता है कि ब्रिटेन में हर दो में से एक यात्री ट्रेन का संचालन फ्रांस और इटली की विदेशी कंपनियों द्वारा किए जाने के कारण ब्रिटेन के राष्ट्रीय गौरव को भी ठेस पहुंची। वर्ष 2016 से ही यह बहस शुरू हो गई थी कि रेलवे को एक बार फिर राष्ट्रीयकृत किया जाए या नहीं। दोबारा राष्ट्रीयकरण करने की इस पहल का सतर्कतापूर्वक स्वागत किया गया है। कुछ धड़े, खासकर श्रम संगठन इस बात पर यकीन करने को तैयार नहीं हैं कि दक्षिणपंथी झुकाव रखने वाली कंजरवेटिव सरकार मौजूदा ढांचे को ध्वस्त करके दोबारा राष्ट्रीयकरण की व्यवस्था करेगी। भारत के लिए इसमें क्या सबक हैं? नेटवर्क वाले बुनियादी ढांचे में तयशुदा बुनियादी ढांचे पर राज्य का स्वामित्व ही सही तरीका है। निजीकृत रेल नेटवर्क के विभाजित ढंग से काम करने को ही ब्रिटिश रेल के निजीकरण की नाकामी की वजह माना जाता है। भारत को रेल, तेल एवं गैस पाइपलाइन तथा बिजली पारेषण लाइनों का मुद्रीकरण करते हुए इस बात को ध्यान में रखना चाहिए। यदि भारत इस बात को ध्यान में रखे तो बेहतर होगा कि कुछ ही विकसित देशों ने उपयोगी नेटवर्क्स को निजी क्षेत्र को बेचने के तरीके का अनुसरण किया है। यूरोप में आमतौर पर ऐसा मॉडल अपनाया गया है जहां परिसंपत्ति स्वामित्व को सेवा प्रावधानों से अलग रखा गया और निजी नेटवर्क्स को परिचालन रियायत प्रदान की गईं। उस तरह देखें तो नियमित जरूरत का पूंजीगत व्यय संप्रभु संस्थान ने किया जबकि निजी क्षेत्र को परिचालन क्षमता से भरपाई की गई। भारत में निजी-सार्वजनिक भागीदारी (पीपीपी) के प्रबंधन की संस्थागत क्षमता की कमी है। दस से अधिक केंद्रीय मंत्रालय और 28 राज्य तथा आठ केंद्रशासित प्रदेश अपने-अपने तरीके से पीपीपी का संचालन कर रहे हैं और इस बीच औपचारिक रूप से ज्ञान की साझेदारी नहीं की जा रही। ब्रिटेन सन 1990 के दशक में पीपीपी की अवधारणा आने के बाद से ही उसके बेहतरीन व्यवहार का अगुआ रहा है और उसने कई समर्थक संस्थान विकसित किए जिनका दुनिया भर में अनुकरण किया गया। निजी फाइनैंस इनीशिएटिव, निजी फाइनैंस पैनल, इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस यूनिट और पाटर्नरशिप्स यूके आदि इसके उदाहरण हैं। भारत को पीपीपी के संस्थानीकरण को गंभीरता से लेना होगा और 3पी इंडिया के रूप में उस पीपीपी थिंकटैंक की स्थापना करनी होगी जिसकी घोषणा अरुण जेटली ने जुलाई 2014 के बजट में की थी। देश के पीपीपी कार्यक्रम में जो तनाव व्याप्त है उसके लिए नियामकीय आजादी की कमी भी एक वजह है। साहसी निर्णयों के लिए ऐसी आजादी आवश्यक है। पीपीपी को नियामकीय सहारे की आवश्यकता है। भारत की खुद की जरूरतें नवंबर 2019 की केलकर समिति की पीपीपी रिपोर्ट में शामिल की गई हैं। शायद भारत के नीति निमार्ताओं के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि दुनिया के सर्वाधिक परिपक्व बाजारों में भी निजी पूंजी को शामिल करने का प्रारूप अभी भी उभर रहा है और अनुभवों के आधार पर नया आकार ग्रहण कर रहा है। इसके लिए जरूरी है कि उच्च गुणवत्ता वाली संस्थागत क्षमता विकसित की जाए।

Published / 2022-01-07 06:50:34
"नरेन सर", जरा मेरी भी सुनिये... आप भाजपा की नहीं, देश की जरूरत हो

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (मनोहर रुद्र पाण्डेय)। नरेन सर, मैं अवाम को संबोधित करते हुए यह बात नहीं कह रहा, आपसे कह रहा हूं। आपके ऑफिसियल एड्रेस पर भेज भी रहा हूं। सर, बात ऐसी है कि पिछले दिनों पंजाब में आपकी सुरक्षा के साथ जो खिलवाड़ हुआ, इस पर आपसे स्नेह करने वाले हैरत में हैं। सब अपने-अपने तरीके से गुस्सा निकाल रहे हैं। इससे भी ज्यादा हैरान वे हैं, जो अपने षड्यंत्र में असफल हो गए। मैं कहता हूं। इसमें हैरान होने की क्या बात है? जो व्यक्ति सारे आतंकवादी संगठनों की हिट लिस्ट में हो, जो व्यक्ति सारे नक्सली संगठन की हिट लिस्ट में हो, जिस व्यक्ति ने सत्तर साल के खानदानी चोरों लूटमारों को कटोरा पकड़ा दिया हो, जिस व्यक्ति को किसी रूप में डिगाना सम्भव नहीं हो, उससे निजात पाने का और कोई उपाय बचता है क्या? क्या आप उस अर्बन नक्सली चिट्ठी से अनभिज्ञ हैं जिसका लिंक किसान आंदोलन से था और जिसमें कहा गया था कि मोदी को बीच सड़क पर रोककर भीड़ के नाम पर मार दिया जायेगा? सर, जो लोग लालकिला में हजारों पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में घुसकर खालिस्तान का झंडा फहरा सकते हैं, वही भीड़ आपको चोट पहुंचा दे तो इसमें हैरानी क्या? आपने कल पंजाब में जो प्रोग्राम बनाया और मौसम खराब रहने के कारण सड़क मार्ग से जाने का त्वरित फैसला लिया, वह अतिविश्वास में लिया और गलत लिया। ऐसे समय में जोश से नहीं, होश से काम लेना चाहिए। आदमी कितना भी बड़ा बुद्धिमान हो, नैतिकता की आस में और जोश में उससे निर्णय गलत हो ही जाते हैं। आप कह सकते हैं कि खतरा कदम- कदम पर है तो क्या सारे काम रोक दूं? हां, मैं कहता हूं रोक दीजिये। खास करके गैर भाजपा की सरकार वाले प्रदेशों में रोक दीजिये। आपके गये बिना काम होता हो तो हो, अन्यथा ऐसा विकास कूड़ा है जो आपको चोट पहुंचा कर मिले। क्या आपको नहीं पता, आप जैसे व्यक्तित्व को तैयार करने में राष्ट्र को सैकड़ों साल लगे हैं? अब आपके द्वारा खतरा मोल लेने का वक्त खत्म हो गया है, लाल चौक पर जो झंडा आपने फहराया था न, पटना गांधी मैदान में जो ब्लास्ट के बीच स्पीच दिया था न, उस वक्त में और अब में बहुत अंतर आ चुका है। अब आपके द्वारा शारीरिक मौजूदगी के साथ हर जगह जाना जरूरी नहीं है, आपकी सुरक्षा ज्यादा जरूरी है, आपका हमारे बीच रहना ज्यादा जरूरी है। आज इस एक देश के भीतर कई देश हो चुके हैं। एक समय था जब आप बेधड़क पाकिस्तान में उतर गए थे, मगर वह पाकिस्तान था सर। उनमें अभी भी नैतिकता बची हुई है। ये तो भारत को लगातार खोखला करते आ रहे राजनीतिक दल और संगठन रूपी दीमक हैं। किसी भी हद तक जा सकते हैं। इन्हें हर हाल में आपको हटाना है, आपके हटे बिना इनका वजूद बचेगा नहीं। आप सोशल मीडिया पर विपक्षियों की निर्लज्जता देखिये। आप उनके षड्यंत्र से बचकर आ गए तो सैकड़ों तरह की बातें की जा रही हैं। वे इसे आपका ड्रामा कह रहे हैं। खाली कुर्सियों की हास्यास्पद बात कह रहे हैं। इसे आपकी चुनावी चाल कह रहे हैं। हो न हो, कल को रावत सर भी बचकर आ गए होते तो ये उसे भी आपकी ही कारगुज़ारी कहते, सुरक्षा में खामी नहीं। मुझे तो आज भी शक है, रावत सर की दुर्घटना के पीछे कोई षड्यंत्र है। खैर, इस समय आपके द्वारा इन षड्यंत्रकारियों को धन्यवाद देने और तंज कसने की जरूरत नहीं है। जरूरत है उन्हें बर्खास्त करने की। क्या आपके गृह मंत्रालय के पास कोई रूल नहीं है कि कल की घटना के जिम्मेवार पुलिस अधिकारियों को बर्खास्त करके जेल भेजा जाय? क्या पंजाब सरकार की इस नीचता का कोई जवाब नहीं है आपके पास? अब तो वे सजग हो गए सर। कोई दूसरा षड्यंत्र करेंगे। ये तो लगातार आपके पीछे लगे हुए हैं। महाकाल का वरदान और हम सबका स्नेह आपकी रक्षा कवच बन रहा है, मगर सवाल है कि आप इनकी ताबूत में आखिरी कील कब ठोकेंगे? क्या इनके नैतिक परिवर्तन की आस में खुद को आहूत कर लेंगे? इनमें नैतिकता बची कहां है कि ऐसे प्रकरण में लज़्ज़ा आएगी। कभी नहीं। आप सजग, सतर्क और होशियार हो जायें क्योंकि चूका हुआ दुश्मन मसल देने योग्य होता है। आपका अहित चाहनेवालों को एक मेसेज देना चाहूंगा कि हमारा मोदी कोई बड़ा पेड़ नहीं है कि गिरा दोगे और धरती हिल जायेगी। मोदी बीज है बीज, राष्ट्रप्रेम का बीज। इसे खत्म करने की सोचो भी मत, क्योंकि जो अंकुरण हो गया है, वह फलेगा ही। अपने वजूद की सोचो, तुम्हारी उस धरती की सोचो जो बंजर हो रही है। "मृत्युंजय नरेन सर" के चिरायु होने की कामना के साथ वंदे मातरम...

Published / 2022-01-06 18:27:34
दम घुटे लोगों के लिए जीवन स्वास के रूप में था स्वामी विवेकानन्द का संदेश

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (संध्या चौधरी उर्वशी)। हम हनुमान के विचार के बिना श्री राम के बारे में नहीं सोच सकते या अर्जुन को याद किये बिना श्रीकृष्ण का स्मरण नहीं कर सकते। इसी प्रकार ईसा तथा संतपाल की तरह बुध तथा आनंद की बात है। यही संबंध श्री रामकृष्ण स्वामी विवेकानंद के बीच है। क्योंकि यदि एक जलस्रोत था तो दूसरा इस जल स्रोत का प्रवाह रूप झरना था। श्री राम कृष्ण के लिए ईश्वर एक तथ्य तथा एक वास्तविकता थी। उन्हें ईश्वर के बारे में वाद-विवाद करने की आवश्यकता नहीं थी। वे विश्वास पूर्वक ईश्वर की पुष्टि कर सकते थे। भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति के शिखर थे। उनका दृष्टिकोण वैश्विक उनकी अनुभूति सर्वस्पर्शी, सर्व समावेशक थी। उनके विचार आज भी भारतीय जनमानस पर विद्यमान हैं। एक अच्छा वक्ता होने के कारण लोगों के दिलों को बखूबी जीत लेते थे।आज भी इनके विचार अतुल्य और धरोहर के रूप में भारतीय युवाओं में विद्यमान हैं। सचमुच वे एक विद्वान पुरुष के रूप में ही नहीं, बल्कि एक अच्छे शिष्य के रूप में भी अपनी छवि भारतीय जनमानस में युवाओं में बहुत लोकप्रिय हैं। स्वामी विवेकानंद श्री रामकृष्ण परमहंस के प्रधान छात्र, उनके अत्यंत प्रिय शिष्य, उनके महानतम उत्तराधिकारी, उनके यथार्थ भाष्यकार तथा अत्यंत दक्ष कार्यवाहक भी थे। सन 1893 की मई में स्वामी जी शिकागो में सितंबर में होने वाली विश्व धर्म महासभा में भाग लेने के लिए भापचलित जलयान से रवाना हुए। उन्हें औपचारिक रूप से आमंत्रित किया गया। उनका नाम प्रतिनिधियों की सूची में शामिल नहीं किया गया था। कुछ कठिनाई के पश्चात उन्हें धर्म महासभा में सम्मिलित होने का अवसर मिल गया। सम्मिलित न होने देने की किसी भी कठिनाई की तुलना में वे कहीं अधिक प्रदीप्त प्रतिभा संपन्न थे। परंतु तब यह प्रथम वक्तव्य में ही दिग्विजय की बात थी, जब गरिमापूर्ण सभा को संबोधित करने की उनकी बारी आई। तब वे उषाकाल के सूर्य की भांति उठे तथा अमेरिका की बहनों और भाइयों यह शब्द कहे। उस हार्दिक पुकार ने विश्व धर्म महासभा तथा पश्चिमी जगत को मंत्र मुग्ध कर दिया। वे संकीर्णता में जकड़े धर्म पंथों तथा बौने मत वादों से ऊपर उठकर समन्वय तथा सार्वभौमिकता के बारे में बोले। उनका संदेश मानो दम घुटे लोगों के लिए जीवन स्वास था।व्याख्यान करते हुए पश्चिमी देशों के निवासियों को शिक्षित करते तथा उन्हें भारतीय दर्शन के अध्ययन में सहायता करते हुए कई मास तक अमेरिका में रहे। तत्पश्चात वे इंग्लैंड तथा यूरोप गए। दो संस्कृति के बीच आपसी समझ के लिए सेतु बने। सन 18 सो 97 में स्वामी स्वामी जी भारत लौटे। समूचा राष्ट्र एकीकृत होकर उनके स्वागत के लिए उठा।भारतीय जनता ने उन्हें आदि शंकराचार्य के नूतन अवतार के रूप में पाया, जो मातृभूमि को ओजपूर्ण तथा जीवन शक्ति से स्फूर्ति करने को उठ खड़ा हुआ था। स्वामी जी ने अपने देशवासियों को भारतीय राष्ट्रीय आदर्श त्याग के महान आदर्श का स्मरण कराया। उन्होंने भारतीयों के हृदयों में यह बात प्रविष्ट करा दी कि भारत में जन्म प्राप्ति परम सौभाग्य की बात है तथा उन्हें बताया कि किस प्रकार आध्यात्मिक संस्कृति ही भारत के अनश्वर अस्तित्व का रहस्य है। उन्होंने भारत को प्रबुद्ध भारत बना दिया। परंतु वे सलाह देने या उपदेश देने तक ही सीमित नहीं रहे। एक कुशल संगठनकर्ता थे।उन्होंने अपने गुरुदेव के लक्ष्य को निरंतरता को सुनिश्चित बनाए रखने के लिए एक संगठन की स्थापना करनी चाही। इसलिए उन्होंने रामकृष्ण मठ तथा मिशन की स्थापना की, जिसका मुख्यालय कोलकाता के निकट बेलूर मठ है। इस संस्था का उद्देश्य है "आत्मनो मोक्षार्थ जगद्विताय च" अर्थात अपनी मुक्ति एवं संसार का कल्याण भी। स्वामी विवेकानंद अभी 40 वर्ष के भी नहीं हुए थे कि वे महासमाधि में लीन हो गए। परंतु उनकी आयु की गणना सौर वर्षों के आधार पर नहीं होनी चाहिए ।लगभग एक दशक के लोकाप्रित कार्य से ही उन्होंने मानस चेतना में ऐसे विचार आरोपित कर दिए, जिनके संपूर्ण क्रियान्वयन के लिए डेढ़ हजार वर्ष लग सकते हैं। उनके जीवन कार्य का एक तो भारतीय पक्ष है तथा दूसरा अंतर्राष्ट्रीय पक्ष है। इन दोनों क्षेत्रों में उनका योगदान बेजोड़ है। (लेखिका संध्या चौधरी उर्वशी, कचहरी झारखंड रांची की निवासी हैं। वह एमए मनोविज्ञान तथा कत्थक नृत्यांगना शिक्षिका हैं। उनकी गायन में भी रूचि है। इसके अलावा वह समाजसेविका, अनेक सम्मान से सम्मानित, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन साझा संकलन इत्यादि से विभूषित हैं।)

Published / 2022-01-06 13:17:39
स्वास्थ्यवर्द्धक माने जाने वाले शहद में मिलावट

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सुनीता नारायण)। हम जिस शहद को गुणवत्तापूर्ण समझकर उसका सेवन करते हैं उसमें चीनी मिली हुई है। इस मिलावट का पता इसलिए नहीं लग पाता क्योंकि चीन की कंपनियों ने ऐसा शुगर सीरप बनाया है जो भारतीय प्रयोगशालाओं में शहद की शुद्धता की जांच में खरा उतरता है। कोविड-19 महामारी के कारण हम सब की सेहत पहले ही खतरे में है। इस बीच शहद की खपत भी बढ़ी है क्योंकि यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और इसे अपने एंटीआॅक्सीडेंट और ऐंटी-माइक्रोबॉयल गुणों के लिए भी जाना जाता है। परंतु हम शहद के स्थान पर चीनी का सेवन कर रहे हैं जो हमारे खिलाफ जाएगा क्योंकि चीनी वजन बढ़ाती है। इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि औसत से अधिक वजन वाले लोगों में कोविड-19 से जुड़ी दिक्कतों का खतरा अधिक है। इसका अर्थ यह भी है कि मधुमक्खीपालन करने वालों को आय का नुकसान हो रहा है। यदि वे कारोबार से बाहर हो जाते हैं तो मधुमक्खियां भी नदारद हो जाएंगी और साथ ही उनकी परागण सेवा भी। यदि मधुमक्खियां एक पौधे से दूसरे पौधे तक पराग ले जाना बंद कर देंगी तो खाद्य उत्पादकता में कमी आएगी। यह मिलावट आपराधिक है। मैं अनुमान लगा सकती हूं कि इस खुलासे पर उद्योग जगत की प्रतिक्रिया क्या होगी। वे कहेंगे कि उनके द्वारा तय मानकों का पालन किया जा रहा है। दलील आएगी कि कई बड़े ब्रांड प्रयोगशाला परीक्षण में पास हुए हैं तो उन्हें मिलावटी कैसे कहा जाएगा। परंतु हम कह सकते हैं और इसलिए कह सकते हैं क्योंकि इसके लिए व्यापक जांच हुई। इससे यही पता चलता है कि खाद्य बाजार अब आसान नहीं रहा। हर मोड़ पर मेरे सहयोगियों को लगा कि अब आगे कुछ नहीं हो पाएगा। जब हमने सुना कि मधुमक्खीपालक रोजगार गंवा रहे हैं तो सबको पता था कि ऐसा क्यों हो रहा है लेकिन कोई कहना नहीं चाह रहा था। कोई भी चीन की कंपनियों और शुगर सीरप का नाम नहीं लेना चाह रहा था। लेकिन इन कंपनियों या इस रहस्यमय सीरप की मिलावट का कोई सबूत नहीं था। मई में भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने शुगर सीरप के आयातकों को निर्देश जारी किए और कहा कि ऐसे प्रमाण मिले हैं कि शहद में ऐसे सीरप की मिलावट की जा रही है। उसने खाद्य आयुक्तों से कहा कि वे निगरानी बढ़ाएं। एफएसएसएआई ने जिन शुगर सीरप का जिक्र किया था उनका उद्योग एवं वाणिज्य मंत्रालय के आयात-निर्यात आंकड़ों में कोई उल्लेख नहीं मिलता। परंतु इस बारे में आवाज उठाई जाती रही। फरवरी में सरकार ने आयातित शहद के लिए अतिरिक्त प्रयोगशाला जांच अनिवार्य कर दी। इस जांच का नाम है- न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेजोनेंस स्पेक्ट्रोस्कोपी (एनएमआरएस)। हम जानते थे कि इस जांच का इस्तेमाल उस समय किया जाता है जब शहद में शुगर सीरप मिलाए जाने की आशंका हो। ऐसा इसलिए कि यह आसानी से पकड़ में नहीं आ सकता। यह हमारी सेहत से जुड़ा मामला है। हम इसे ऐसे ही जाने नहीं दे सकते। हमारी कोशिश तब कामयाब हुई जब हमें ऐसी चीनी कंपनियों की वेबसाइट मिलीं जो खुले आम ऐसा सीरप बेच रही थीं जो जांच को धता बता सकती थीं। तब हमें समझ में आया गया कि यह एक धंधा बन चुका है। पहली मिलावट में पौधों (मक्का और गन्ना) से हासिल होने वाले शुगर सीरप का इस्तेमाल किया गया जो सी 4 फोटोसिंथेसिस का इस्तेमाल करता था। जब यह पकड़ में आने लगा तो सी 3 पौधों यानी चावल तथा चुकंदर से हासिल नए तरह की मिठास का इस्तेमाल शुरू किया गया। परंतु विज्ञान की मदद से शहद में इसकी मिलावट भी पकड़ में आ गई। अब आॅनलाइन चीनी पोर्टल पर कंपनियों का दावा है कि उन्होंने ऐसे तरीके तलाश लिए हैं जो सी 3 और सी 4 शुगर टेस्ट को पास कर सकते हैं। ये वही कंपनियां थीं जो भारत में फ्रक्टोस सीरप निर्यात करतीं। लेकिन हम भारत में उनके अंतिम उपभोक्ता का पता नहीं लगा पाए। ये सीरप कई तरह के औद्योगिक इस्तेमाल के लिए आयात किए जाते हैं। यानी सरसरी तौर पर यह वैध कारोबार था। जब हमने इस सीरप का एक नमूना खरीदा तो देखा कि चीनी कंपनियां इसे बेचने के लिए बहुत उत्सुक हैं। उन्हे पता था कि भारतीय तंत्र, खासकर सीमाशुल्क विभाग कैसे काम करता है। एक कंपनी ने हमें नमूना पेंट पिगमेंट के नाम पर भेजा। हमने गत वर्ष ध्यान दिया था कि फ्रक्टोस सीरप का आयात कम हो रहा है। सूत्रों ने बताया कि भारतीयों ने चीन से उक्त तकनीक खरीद ली है। हमने पता लगाया कि और पता चला कि बाजार में यह आॅल पास सीरप के नाम से उपलब्ध है यानी ऐसा सीरप जो हर जांच में सफल साबित हो। हमने इसे प्रयोगशाला में जांचा और यह वाकई पास हो गया। अब यह घातक धंधा हमारे सामने खुल चुका था। हमने जिन 13 प्रसिद्ध ब्रांड की एनएमआरएस तकनीक से जांच की उनमें से अधिकांश विफल रहे। जबकि ये शहद ब्रांड 2020 में शुरू एफएसएसएआई के नए मानकों में पास हो गए थे। हमने जिस जर्मन प्रयोगशाला में नमूनों की जांच कराई, उसने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इन नमूनों में शुगर सीरप मिला हुआ है। शहद में मिलावट की हमारी रिपोर्ट सामने आने के बाद उद्योग जगत की ओर से हमें किताबी प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं। इनमें वही बातें कही जा रही हैं जो दुनिया भर के बिजनेस स्कूल में पढ़ाई जाती हैं। शब्दाडंबर रचकर उपभोक्ताओं को भ्रमित करना और अपने उत्पादों को साफ और सुरक्षित बताने का प्रयास करना। परंतु उपभोक्ता भी जागरूक हैं। शहद अन्य उत्पादों की तरह नहीं है। इसे अनुपूरक पोषक आहार के रूप में लिया जाता है। इसमें औषधीय गुण होते हैं और इसलिए चीनी मिलाने का अर्थ है स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाना। हमें पता है कि उद्योग जगत ताकतवर है लेकिन हम यह भी मानते हैं हमारा स्वास्थ्य और मधुमक्खियों का अस्तित्व दांव पर लगा है। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)

Published / 2022-01-05 12:36:44
कृषि निर्यात में रिकॉर्ड बनाते हमारे देश के किसान

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सत्यनारायण गुप्ता)। 2021 में देश में अनाज उत्पादन 30.86 करोड़ टन तक पहुंच गया, जो कि एक रिकॉर्ड है। पिछले कुछ वर्षों के खाद्यान्न उत्पादन के भारतीय ट्रैक रिकॉर्ड को देखें, तो भारत अपनी बढ़ती जनसंख्या को आराम से खिला सकता है और साथ ही साथ चावल और गेहूं का निर्यात भी कर सकता है। लेकिन इसके लिए भारत को कृषि क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं को बढ़ाना होगा। पिछले सात दशकों में भारतीय कृषि ने कई मील के पत्थर पार किये हैं। हरित क्रांति, पावर जेनरेशन, बुनियादी सुविधाओं और कृषि क्षेत्र में नवीन ज्ञान तकनीक अपनाकर भारत ने इस क्षेत्र में प्रगति की है। किंतु आज भी किसानों की औसत मासिक आय इस समय 10,218 है जो 2002 में 2115 की तुलना में अधिक है। पर संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में किसानों की औसत मासिक आय "10000 से भी कम है। देश के 50.2% किसान कर्ज में डूबे हुए हैं। भारत की पहचान एक कृषि प्रधान देश के रूप में रही है लेकिन देश के बहुत से किसान बेहाल है इसी के चलते पिछले कुछ समय में देश में कई बार किसान आंदोलनों ने जोर पकड़ा है। देश में कृषि भूमि का मालिकाना हक को लेकर विवाद सबसे बड़ा है ।असमान भूमि वितरण के खिलाफ किसान आवाज उठाते रहे हैं। जमीनों का एक बड़ा हिस्सा बड़े किसानों के पास है। किसानों की एक बड़ी समस्या यह भी है कि उन्हें फसल पर सही मूल्य नहीं मिलता, वहीं किसानों को अपना माल बेचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। कोई किसान सहकारी केंद्र पर किसी उत्पाद को बेचना चाहे तो उसे गांव के अधिकारी से कागज चाहिए होगा। ऐसे में कई बार कम पढ़े लिखे किसानों को औने- पौने दामों पर अपना माल बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं। अच्छी फसल के लिए अच्छे बीजों का होना बेहद जरूरी है। लेकिन सही वितरण तंत्र ना होने के चलते छोटे किसानों की पहुंच में यह महंगे और अच्छे बीज नहीं आ पाते हैं। इसके चलते उन्हें कोई लाभ नहीं मिलता और फसल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। भारत का अधिकांश किसान मानसून की अनिश्चितता से प्रभावित है। पंजाब हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में सिंचाई के अच्छे इंतजाम हैं। लेकिन देश का एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जहां कृषि मानसून पर निर्भर है। इसके इतर भूमिगत जल के गिरते स्तर ने भी लोगों की समस्याओं में इजाफा किया है। तमाम मानवीय कारणों से तथा कुछ प्राकृतिक कारण किसानों की परेशानी को बढ़ा देते हैं। वर्षा जल से होने वाला मिट्टी का क्षरण होता है। इसके चलते मिट्टी अपनी उर्वरता खो देती है। मशीनों और आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रयोग बड़े किसान करने में सक्षम हैं। लेकिन छोटे और सीमांत किसान पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि आधुनिक कृषि यंत्रों, खाद, कीटनाशक आदि का अधिक प्रयोग भी दीर्घ काल के लिए घातक है। भारत के ग्रामीण इलाकों में भंडारण की सुविधाओं की कमी है। ऐसे में किसानों पर जल्द फसल का सौदा करने का दबाव होता है और कई बार किसान औने-पौने दामों में फसल का सौदा कर लेते हैं। भारतीय कृषि की तरक्की में एक बड़ी बाधा अच्छी परिवहन व्यवस्था की कमी भी है। किसी भी व्यवसाय को पनपने के लिए पूंजी की आवश्यकता होती है। तकनीकी विस्तार ने इस आवश्यकता को और बढ़ा दिया है? लेकिन इस क्षेत्र में पूंजी की कमी बनी हुई है। छोटे किसान महाजनों व्यापारियों से ऊंची दरों पर कर लेते हैं। पिछले कुछ सालों में किसानों ने बैंकों से भी कर लेना शुरू किया है लेकिन हालात नहीं बदले हैं। किसानों की कर्ज माफी पर हाय-तौबा मचाने वाले अर्थशास्त्री उद्योगपतियों की कर्ज माफी और लाखों करोड़ रुपये के एनपीए पर क्यों मौन हो जाते हैं? कितना दुर्भाग्य है कि भारत में प्रतिवर्ष 10,000 से अधिक किसान आत्महत्या करते हैं। 1997 से 2006 के बीच 1,66,304 किसानों ने आत्महत्या की है। वर्ष 2019 में महाराष्ट्र में 2680, कर्नाटक में 1331, आंध्रप्रदेश में 1019, तेलंगाना में 628 और पंजाब में 239 किसानों ने आत्महत्या की थी। 2020 में किसानों की आत्महत्या के मामले 4 प्रतिशत बढ़े हैं। अनेक कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य एमएसपी को कानूनी मान्यता देकर विश्व को राह दिखाना चाहिए। क्योंकि अमेरिका, जर्मनी और फ्रांस जैसे आधुनिक देशों के साथ पूरे विश्व के किसानों की हालत वर्तमान में अच्छी नहीं है। उन्हें अपने फसलों का वाजिब मूल्य नहीं मिल रहा है। एमएसपी की अनिवार्यता को लेकर यह दावा करना कि इससे सरकार पर 12 से 17 लाख करोड़ का बोझ आएगा। तथ्यात्मक रूप से गलत है यह सोचने वाली बात है कि जब केंद्र सरकार वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर कर्मचारियों का वेतन बढ़ाती है और उस पर 2 से ढाई लाख करोड़ का बोझ हो जाता है तब इस तरह के तर्क अप्रासंगिक हैं। फिर इस बात को नजरंदाज क्यों किया जा रहा है कि एम एस पी पर खरीदे गए सारे अनाज का सरकार मुफ्त वितरण तो नहीं करती, उसकी कुछ मात्रा बेचती भी है। फिर जनवितरण प्रणाली और मनरेगा आदि में लोगों को अनुदानित मूल्य पर अनाज उपलब्ध कराकर सरकार स्वयं इसका श्रेय लेती है तो किसानों को उनकी ऊपज का लाभ दायक मूल्य देने में इसे क्या परेशानी है ।इसी तरह मंडियों की व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता है। किसानों को मंडी के पास जाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए, बल्कि मंडी को किसानों के नजदीक लाने की जरूरत है पूरे देश में महज 7000 मंडियां हैं जबकि 40000 मंडियों की जरूरत है। इसी तरह सहकारी व्यवस्था को भी आगे लाया जाना चाहिए। पंजाब व हरियाणा में किसानों की आय अधिक है क्योंकि यहां अधिकांश खरीद एमएसपी पर होती है, जबकि पंजाब में बिकने के लिए बिहार जैसे राज्यों से अनाज जाता है। इस बार हम किसानों की खुशहाली में अपने स्तर से भी योगदान देने का संकल्प लें। कृषि व्यवसाय तथा किसानों का सम्मान करें तथा प्याज और टमाटर के भाव बढ़ने पर नाक-भौंह न सिकौडें। सरकार,आम जनता तथा किसानों को मिलकर मुंशी प्रेमचंद के इस कथन को गलत सिद्ध करने के लिए प्रयास करना होगा। भारतीय किसान गरीबी में जन्म लेता है, गरीबी में जीता है और गरीबी मेंही इस दुनिया को छोड़ देता है।

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