एबीएन एडिटोरियल डेस्क। केंद्रीय बजट में ऐसी नीतिगत घोषणाओं पर जोर बढ़ता जा रहा है जिनका लक्ष्य है वृद्धि को प्रोत्साहन देना। इस बीच बुनियादी ढांचा क्षेत्र की अपेक्षाएं भी इस रुझान के अनुरूप हो चुकी हैं। आइए बात करते हैं नौ ऐसी बातों की जो इस क्षेत्र को गति देने के लिए जरूरी हैं। आवंटन: सन 2021-22 के बजट में 5.54 लाख करोड़ रुपये की राशि की प्रतिबद्धता जताई गई थी। यह 2020-21 के 4.39 लाख करोड़ रुपये से 26 फीसदी अधिक थी। बुनियादी ढांचे पर सार्वजनिक व्यय अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने वाला प्रमुख कारक है। ऐसे में कुल आवंटन में 25 फीसदी इजाफे की आशा करना ठीक है यानी यह राशि करीब 7 लाख करोड़ रुपये हो जानी चाहिए। अन्य फंडिंग विकल्पों के साथ मिलाकर देखें तो वित्तीय क्षमता राष्ट्रीय अधोसंरचना पाइपलाइन के 22 लाख करोड़ रुपये प्रति वर्ष के निवेश लक्ष्य के करीब पहुंच सकती है। इसमें सार्वजनिक इकाइयों की ओर से निवेश, नैशनल बैंक फॉर फाइनैंसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐंड डेवलपमेंट (एनएबीएफआईडी) का वितरण, बुनियादी व्यय में राज्यों का योगदान, देसी और विदेशी पूंजी तथा राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन की प्रक्रियाएं आदि शामिल हैं। एनएबीएफआईडी का परिचालन: इसका घोषित इरादा अप्रैल 2022 से ऋण देने का है। इसके लिए बजट में बताना होगा कि शुरूआती इक्विटी पूंजी यानी 20,000 करोड़ रुपये तथा 5,000 करोड़ रुपये के एकबारगी अनुदान की क्या स्थिति है। वैश्विक फंडिंग बढ़ाने के लिए 0.1 फीसदी का सॉवरिन गारंटी शुल्क, दीर्घावधि के पूंजी प्रदाताओं के लिए 10 वर्ष की आयकर छूट, लागत के बचाव के लिए विशेष प्रावधान आदि शामिल हैं। म्युनिसिपल बॉन्ड : रिजर्व बैंक ने 30 नवंबर 2021 को एक रिपोर्ट में कहा कि देश के शहरों और कस्बों की वित्तीय स्थिति गहरे दबाव में है जिससे उन्हें व्यय में कटौती करनी पड़ रही है। ऐसे में म्युनिसिपल बॉन्ड को प्रोत्साहित करना अहम है। बजट में कई उपायों पर विचार किया जा सकता है। इनमें ब्याज अनुदान, कर रियायत, ऋण में इजाफा आदि शामिल हैं। दुनिया भर में म्युनिसिपल बॉन्ड बाजार फंडिंग का स्थापित जरिया हैं। अमेरिका में इस बाजार का आकार 4 लाख करोड़ डॉलर है। श्योरिटी बॉन्ड : विनिर्माण क्षेत्र में बैंक गारंटी पर बहुत जोर दिया जाता है। वहां मांगे जाने वाली नकदी के मार्जिन तथा बैंकों का गारंटी के लिए अन्य शर्तों पर बहुत जोर होता है। कई मामलों में मौजूदा बैंक गारंटी की सीमा का पूरा इस्तेमाल हुआ और बैंक अब उसे बढ़ाने से इनकार कर रहे हैं। भारतीय बीमा नियामक ने हाल में एक कार्य पत्र जारी किया है जिसमें कहा गया है कि बैंक गारंटी की जगह बीमा कंपनियां श्योरिटी बॉन्ड जारी करें। केंद्रीय बजट यह स्पष्ट संकेत दे सकता है कि 2022-23 में श्योरिटी बॉन्ड जारी किए जाएंगे। सार्वजनिक खरीद में सुधार : अब तक की सबसे अहम घोषणओं में से एक 29 अक्टूबर 2021 को जारी वित्त मंत्रालय की सरकारी खरीद और परियोजना प्रबंधन संबंधी अधिसूचना थी। इसने काम के ठेकों के लिए एल 1 राज (कम लागत वाली निविदा को बोली देने) समाप्त करने, समय पर भुगतान के निर्देश देने और सरकार द्वारा मध्यस्थता के मामलों में हार का मान रखने की प्रक्रिया शुरू की। इससे सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया का नया युग शुरू हुआ। केंद्रीय बजट को इन सुधारों का भी श्रेय लेना चाहिए और यह भरोसा दिलाना चाहिए कि नए मानकों को कड़ाई से लागू किया जाएगा तथा राज्यों को साथ लिया जाएगा। फिलहाल यह अधिसूचना केवल केंद्र की खरीद संस्थाओं तक सीमित है। हाइड्रोजन मिशन : सन 2021-22 के बजट में 800 करोड़ रुपये की राशि हाइड्रोजन मिशन के लिए अलग रखी गई है। 15 अगस्त को प्रधानमंत्री ने घोषणा की थी कि हरित हाइड्रोजन ही दुनिया का भविष्य है। उन्होंने राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन की घोषणा करते हुए कहा था कि देश को हरित हाइड्रोजन उत्पादन और निर्यात का केंद्र बनाना होगा। हाइड्रोजन का इस्तेमाल उद्योगों, परिवहन और बिजली के उपकरणों में किया जाएगा। बजट में इस प्रक्रिया को प्रोत्साहित करने के उपायों पर भी विचार करना चाहिए। ऐसे संयंत्रों की स्थापना में निवेश तथा इलेक्ट्रोलाइजर्स के निर्माण पर उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन दिए जाने चाहिए। रेलवे बजट : नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रेलवे के वित्त संबंधी हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि परिचालन अनुपात सही वित्तीय प्रदर्शन नहीं दशार्ता। इसके मुताबिक 2019-20 में इसके 98 रहने की बात कही गई लेकिन अगर पेंशन भुगतान पर वास्तविक व्यय देखें तो यह 114 था। अतीत में सुरक्षा, रखरखाव आदि विभिन्न मदों पर बुकिंग व्यय का मसला भी रहा है। यह सुखद है कि हालिया नीतिगत घोषणाओं में नए रेल मंत्री ने परिचालन अनुपात को पारदर्शी बनाने की प्रतिबद्धता जताई है। सीमेंट के लिए जीएसटी स्लैब : सीमेंट आम आदमी की आवश्यकता की वस्तु है। बड़े पैमाने पर बुनियादी निर्माण की जरूरत का सामान है। बजट में विचार होना चाहिए कि इस पर 28 फीसदी जीएसटी लगे या नहीं। देश में 65 फीसदी से अधिक सीमेंट आम लोग इस्तेमाल करते हैं। इनपुट टैक्स क्रेडिट नहीं मिलना इस क्षेत्र की परेशानी है। सार्वजनिक काम की लागत कम करने और छोटे निर्माण में राहत मिलने से आर्थिक विकास पर असर पड़ेगा भले ही अल्पावधि में राजस्व कुछ कम हो। एसईजेड और सीईजेड : विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) बीते वर्षों में अतार्किक हो चुके हैं। आशा है कि उन्हें प्रासांगिक बनाने के लिए नई नीतियां घोषित की जाएंगी। करीब चार तटीय आर्थिक क्षेत्र (सीईजेड) बनाने की अवधारणा भी राजनीतिक-नौकरशाही क्षेत्र में जोर पकड़ रही है। इनसे निर्यात को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी माहौल मिलेगा।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा यादव अब भाजपा में शामिल हो चुकी हैं। विधानसभा चुनाव से पहले यादव परिवार की बहू का भाजपा में शामिल होना अखिलेश यादव के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। अपर्णा के भाजपा में जाने का सियासी लिहाज से भले ही सपा पर कोई बड़ा असर ना हो, लेकिन परिवार में इस टूट ने छवि की लड़ाई में अखिलेश को पीछे धकेल दिया है। हालांकि, अखिलेश ने अपर्णा के भाजपा में शामिल होने पर उन्हें बधाई दी। कहा कि नेता जी ने उन्हें काफी समझाने की कोशिश की थी। कुछ दिनों पहले भाजपा सरकार के मंत्रियों और विधायकों को तोड़कर अखिलेश ने जो संदेश देने की कोशिश की थी, अब उससे बड़ा संदेश भाजपा ने यादव परिवार को तोड़ कर दे दिया है। अपर्णा के भाजपा में शामिल होने के बाद एक बार फिर परिवार की लड़ाई घर की दहलीज पार कर बाहर आ गई है। अखिलेश सरकार के कार्यकाल के अंतिम दिनों जिस तरह परिवार में कलह मची और परिवार बिखरा उसका असर चुनावी नतीजों में दिखाई दिया था। एक बार फिर 2022 विधानसभा चुनाव से पहले मुलायम परिवार में टूट के बाद उस समझौते की चर्चा हो रही है, जो परिवार को एक रखने के लिए करीब 16-17 साल पहले हुआ था। मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना यादव की परिवार में एंट्री के साथ ही परिवार में बगावत शुरू हो गई थी। वरिष्ठ पत्रकार मुकेश अलख बताते हैं कि तब अखिलेश यादव ने अपने पिता मुलायम से विद्रोह कर दिया था। बेहद नाराज अखिलेश मुलायम की हर बात अनसुनी करने लगे थे। पिता और पुत्र के बीच बढ़ती दूरियां कम कर परिवार को एक साथ लाने की जिम्मेदारी अमर सिंह ने उठाई थी। उन्होंने न सिर्फ साधना यादव को परिवार में एंट्री दिलाई, बल्कि अखिलेश यादव को भी मनाया। इस दौरान परिवार को साथ रखने को एक समझौता भी हुआ। उस समझौते के मुताबिक पिता की राजनीतिक विरासत के इकलौते वारिस अखिलेश यादव होंगे, जबकि साधना के बेटे प्रतीक यादव कभी भी राजनीति में नहीं आएंगे। इतना ही नहीं उस वक्त जो प्रॉपर्टी थी, उसे भी दोनों भाइयों में बराबर-बराबर बांटा गया। परिवार के बेहद करीब रहे लोगों का दावा है कि पार्टी में उस वक्त यह भी तय हुआ था कि साधना यादव के परिवार का खर्चा समाजवादी पार्टी उठाएगी। प्रतीक यादव लगातार कहते हैं कि वो कभी राजनीति में नही आएंगे। हालांकि,जब भी सवाल अपर्णा के राजनीतिक भविष्य को लेकर होता,वह कहते कि इसका फैसला नेता जी,यानी मुलायम सिंह यादव और खुद अपर्णा कर सकती हैं। एक पत्रकार की बेटी अपर्णा की राजनीतिक महत्वाकांक्षा हमेशा से रही है। वह परिवार की दूसरी बहू डिंपल यादव की तरह पार्टी में अधिकार चाहती थीं। अपर्णा की इसी जिद की वजह से मुलायम सिंह यादव ने 2017 में अपर्णा को पार्टी का टिकट दिलवाया था, लेकिन अपर्णा चुनाव हार गईं। हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव नहीं चाहते थे कि वो चुनाव जीतें। परिवार के करीबियों का मानना है कि इस बार अखिलेश ने फैसला कर लिया था कि ना तो अपर्णा को टिकट देंगे और ना ही कहीं जाने से रोकेंगे। खबर है कि अखिलेश यादव ने इस बार परिवार के किसी भी सदस्य को टिकट ना देने का फैसला किया है। राजनीति में करियर बनाने को अधीर अपर्णा के लिए यह फैसला बेहद परेशानी वाला था। माना जाता है कि इसके बाद ही अपर्णा भाजपा के संपर्क में आईं और अब पार्टी में शामिल हो गई हैं। 2014 के बाद से ही अपर्णा यादव प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ करने लगी थीं। 2017 में योगी सरकार बनने के बाद भी अपर्णा ने कई बार उट योगी से मुलाकात की। इतना ही नहीं,उन्होंने कई बार ऐसे बयान भी दिए जिनसे अखिलेश यादव की फजीहत हुई। राम मंदिर निर्माण के लिए चंदा जुटाने वालों को अखिलेश ने चंदाजीवी कहा था,जबकि अपर्णा ने राम मंदिर के लिए 11 लाख रुपए का दान दिया था। परिवार के करीबियों का मानना है कि इस बार अखिलेश ने फैसला कर लिया था कि ना तो अपर्णा को टिकट देंगे और ना ही कहीं जाने से रोकेंगे। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में एंट्री लेने के साथ ही अपर्णा यादव बीजेपी की पोस्टर गर्ल बन गईं हैं। बीजेपी ने मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू को पोस्टर पर जगह देते हुए कानून व्यवस्था पर विपक्ष को जवाब दिया है। इस पोस्टर में अपर्णा के अलावा हाल ही में बीजेपी छोड़कर समाजवादी पार्टी (सपा) में गए स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी और सांसद संघमित्रा मौर्य को भी शामिल किया गया है। बीजेपी नेता तेजिंदर पाल सिंह बग्गा ने पोस्टर ट्वीट करते हुए लिखा, योगी सरकार ने यूपी को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाया। सुरक्षा जहां बेटियां वहां। इससे पहले यूपी बीजेपी चीफ स्वतंत्र देव सिंह ने भी मुख्यमंत्री योगी और जेपी नड्डा के साथ अपर्णा की मुलाकात की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा, बेटियां वहां, सम्मान और सुरक्षा जहां। बीजेपी ने इस पोस्टर के सहारे कई निशाने साधे हैं। एक तरफ पार्टी ने अखिलेश यादव को जवाब दिया तो दूसरी तरफ हाल ही में सपा में शामिल हुए स्वामी प्रसाद मौर्य को भी घेरा है। स्वामी प्रसाद मौर्य खुद सपा में चले गए हैं,लेकिन बदायूं से बीजेपी के टिकट पर सांसद उनकी बेटी संघमित्रा मौर्य ने साफ कर दिया है कि वह बीजेपी में ही रहेंगी। बीजेपी ने इस पोस्टर से एक तरफ सपा को घेरा तो दूसरी तरफ चुनाव से पहले महिला सुरक्षा के मुद्दे पर आधी आबादी को साधने की कोशिश की है। समाजवादी पार्टी (सपा) अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण करने पर अपर्णा यादव को बधाई और शुभकामनायें देते हुये कहा,हमें इस बात की खुशी है कि समाजवादी विचारधारा का विस्तार हो रहा है। उम्मीद है कि हमारी विचारधारा वहां भी संविधान और लोकतंत्र को बचायेगी। गौरतलब है कि पिछले चुनाव में अपर्णा को सपा के टिकट पर लखनऊ कैंट सीट से लड़ाया गया था। वह भाजपा की रीता बहुगुणा जोशी से हार गयी थीं। चुनाव में भाजपा के टिकट पर इसी सीट से उनके चुनाव लड़ने की संभावना है। सपा से टिकट नहीं मिलने के कारण ही अपर्णा द्वारा भाजपा में शामिल होने के पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अखिलेश ने कहा, नेता जी (मुलायम सिंह यादव) ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की। टिकट किसे मिलना है, यह क्षेत्र, जनता और आंतरिक सर्वेक्षण पर निर्भर करता है। यह किसी एक व्यक्ति का फैसला नहीं होता है। उन्होंने मौजूदा दौर में चल रहे दल बदल के बारे में कहा कि सपा में जो लोग आये उनका व्यापक जनाधार है। चुनाव में सपा का कोई अन्य दल अब मुकाबला नहीं कर सकता है। अपर्णा के साथ हमेशा खड़े दिखने वाले शिवपाल सिंह यादव का अगला कदम क्या होगा? अब इसको लेकर भी चर्चा होने लगी है। कहा जा रहा है कि 2016 में चाचा-भतीजे में हुए विवाद में अपर्णा, चाचा शिवपाल के साथ थी। अपर्णा हमेशा कहती थीं कि वो वही करेंगी जो नेता जी और चाचा शिवपाल कहेंगे। खबर यह है कि अपर्णा अपनी महत्वाकांक्षा के चलते परिवार में अलग-थलग पड़ गई थीं। इस फैसले पर मुलायम और शिवपाल दोनों ने कुछ भी नहीं कहा।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (आरके सिन्हा)। बीते कुछ समय के दौरान दो महत्वपूर्ण और सकारात्मक घटनाएं देश की कूटनीति के मोर्चे पर सामने आईं। इनका संबंध भारत के चिर शत्रु पड़ोसियों क्रमश: चीन और पाकिस्तान से है। इन दोनों के साथ भारत के बेहद खराब रिश्ते पिछले साठ दशकों से चलते ही रहे हैं। बीते कुछेक महीनों के दौरान सीमा पर गोलीबारी से लेकर युद्ध जैसे हालात भी बने। जब सारी दुनिया कोरोना वायरस से लड़ रही थी तब भारत को चीन से अपनी हजारों किलोमीटर लंबी सीमा पर दो-दो हाथ करना पड़ रहा था। पहले डोकलाम और फिर लद्दाख में दोनों देशों के सैनिकों के बीच तेज झड़पें भी हुईं। दोनों ओर से अनेकों जाने भी गयी। बहरहाल, विगत बीस फरवरी को भारत-चीन कोर कमांडर स्तर की बैठक का 10वां दौर निर्णायक रहा। इसमें दोनों पक्षों की सीमा पर अग्रिम फौजों की वापसी पर आपसी सहमति बन गई। उसके बाद से स्थितियां अचानक से बेहतर होती दिखाई दे रही हैं। चीन ने भी कहीं न कहीं समझ लिया है कि भारत से पंगा लेना उचित नहीं होगा। भारत 2021 के स्वाभिमानी राष्ट्रवादी मोदी का भारत बन चुका है क चीन को जब यह लगा कि उसने कोई हरकत की तो उसे लेने के देने प़ड़ जाएंगे, इसलिए उसने अपनी फौजों को पीछे करना या हटाना चालू कर दिया है। चीन ने भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर के भारत-चीन संबंधों को सुधारने के सुझावों का संज्ञान भी लिया है। याद रखा जाना चाहिए कि द्विपक्षीय संबंधों में तनाव का कारण सीमा विवाद ही रहता है। अब यह उम्मीद बंधी हैं कि मतभेदों को दूर करने के लिए सकारात्मक प्रयासों का सिलसिला जारी रहेगा। भारत को आशा है कि चीन मतभेदों को दूर करके व्यवहारिक सहयोग को बढ़ावा देने का काम करेगा। बेशक, लद्दाख में पिछले वर्ष हुई घटनाओं ने दोनों देशों के संबंधों को गंभीर रूप से प्रभावित किया। भारत और चीन के संबंध ऐसे दोराहे पर पहुंच गए थे जहां आपसी टकराव ही एकमात्र रास्ता दिखता था। अब दोनों देशों को वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी का कड़ाई से पालन और सम्मान करना होगा। इसके साथ ही चीन को यह अच्छी तरह समझ लेना होगा कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत को यथास्थिति को बदलने का चीन का कोई भी एकतरफा प्रयास स्वीकार्य नहीं है। यदि अब बात होगी तो 1962 के पूर्व की स्थिति पर ही बात होगी क दोनों देशों का सीमा पर चल रहे विवाद के बहुत दूरगामी असर हो रहे थे। भारत सरकार ने चीन से आने वाले सभी निवेशों पर रोक लगा दी थी, साथ ही 200 से अधिक चीनी ऐप्स पर सुरक्षा का कारण बता कर पाबंदी लगा दी गई थी, जिनमे लोकप्रिय ऐप टिकटोक, वीचैट और वीबो आदि भी शामिल थे। हालांकि यह भी सच है कि दोनों पड़ोसियों के बीच द्विपक्षीय व्यापार आगे बढता ही रहा। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार पिछले साल भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार 77.7 अरब डॉलर का था। चीन ने 2013 से 2020 के बीच भारत में 2.174 अरब डॉलर निवेश किया था। हालांकि यह राशि भारत में विदेशी निवेश का एक छोटा हिस्सा है। भारत-चीन में तनाव बढ़ने से वे चीनी नागरिक भी खासे परेशान रहे जो भारत में रहकर कारोबार कर रहे थे। अगर भारत- चीन के बीच तनाव घटा तो दूसरी तरफ भारत का पाकिस्तान के साथ युद्ध विराम संबंधी समझौता भी हो गया। इससे तो निश्चित रूप से दक्षिण एशिया में शांति एवं स्थिरता की दिशा में एक बेहतर माहौल बनेगा। हालांकि एक राय यह भी है कि भारत-चीन के बीच समझौता होते ही पाकिस्तान कांपने लगा था। उसे लगने लगा था कि अगर उसका स्थायी मित्र चीन भी भारत से दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा है तो उसे भी अपनी रणनीति तत्काल बदल ही लेनी चाहिए। वर्ना पाकिस्तान तो लगातार भारत की आंख में उंगली देकर लड़ने की कोशिश कर रहा था। पाकिस्तान के कर्णधार भूल रहे थे कि वे भारत से तो पहले हुई सभी जंगों में घुटने पर आ गए थे। फिर भी कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो पिटते भी रहते हैं और दूर जाकर गली देने से बाज नहीं आते थे। बहहराल, भारत-पाकिस्तान के बीच हुए समझौते का स्वागत होना चाहिए। भारत और पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पर संघर्ष विराम का सख्ती से पालन करने पर सहमत हुए हैं और यह समझौता 25 फरवरी से प्रभावी भी हो गया है। दक्षिण एशिया में शांति एवं स्थिरता के लिए जरूरी है कि दोनों देश अपने मसले आपस में मिलकर हल करें। पाकिस्तान को अपनी जनता के हितों के बारे में भी सोचना होगा। वह भारत से स्थायी दुश्मनी नहीं रख सकता। इसमें उसे सिर्फ नुकसान ही होगा। अब एक उदाहरण लें। वह कोरोना संक्रमण के टीके चीन से ले रहा है। हालांकि उसे उन टीकों को भारत से लेना चाहिए था। सारे संसार को पता है कि कोरोना पर विजय पाने में भारत ने दुनिया को संजीवनी बूटी दी है। भारत से कोरोना के टीके संसार के अनेकों छोटे-बड़े देश ले रहे हैं। इनमें कनाडा और ब्राजील भी हैं। कोरोना का टीका ईजाद करके भारत ने सिद्ध कर दिया है वह मानव जाति की सेवा के लिए वचनबद्ध है। अगर पाकिस्तान भी भारत से कोरोना का टीका लेता तो वह एक बेहतर संदेश देता। भारत की तरफ से तो पाकिस्तान के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाए जाने की पहल हमेशा से होती ही रही है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को भारत ने उनकी हालिया श्रीलंका यात्रा के दौरान भारतीय सीमा से गुजरने की इजाजत देकर रिश्तों को एक नई दिशा देने की कोशिश की। पर इमरान खान बाज कहां आए। वे श्रीलंका में जाकर भी यही कहते रहे कि भारत-पाकिस्तान के बीच सिर्फ कश्मीर ही एकमात्र मसला है। अब भारत को उन्हें कायदे से बता देना चाहिए कि बेहतर यही होगा कि पाकिस्तान कश्मीर के उन इलाकों को भारत को तत्काल सौंप दे जो उसने बेशर्मी से कब्जा किया हुआ हैं। तभी तो भारत भी दोनों देशों के संबंधों को सौहार्दपूर्ण बनाने में अहम रोल अदा करेगा। इसके साथ ही पाकिस्तान बिना और किसी नुक्ताचीनी के मुंबई हमलों के गुनाहगारों को कठोर दंड भी दे। अगर वह इन दोनों कदमों को अविलंब उठा ले तो भारत-पाकिस्तान आदर्श पड़ोसी की तरह से रह सकते हैं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (नीरज दुबे)। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा यह न्यू इंडिया है तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा कि यह न्यू पाकिस्तान है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को आत्मनिर्भर बनाने का अभियान छेड़ा तो इमरान खान भी अब पाकिस्तान को आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं। दरअसल, पाकिस्तान अपनी पहली राष्ट्रीय सुरक्षा नीति लेकर सामने आया है जिसमें भारत सहित अन्य निकटतम पड़ोसियों के साथ शांति स्थापित करने और पाकिस्तान को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दिया गया है। वैसे बम धमाकों और गोलीबारी के लिए आतंकवादियों को प्रशिक्षित करते रहने वाले पाकिस्तान के मुंह से शांति की बात अजीब लगती है लेकिन यह वास्तविकता है कि पाकिस्तान ने राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में लिखित रूप में शांति पर बल दिया है। वैसे पाकिस्तान की किसी बात पर विश्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि पूरी दुनिया गवाह है कि संयुक्त राष्ट्र तक को आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई का आश्वासन देने के बावजूद कैसे पाकिस्तान आतंकवादियों का महिमामंडन करता है और उनको हर तरह की सुविधा प्रदान करता है। अब पाकिस्तान का मन शांति ढूंढ़ रहा है तो इसका कारण उसकी खराब आर्थिक हालत है। पौराणिक कथाओं के लिहाज से देखें तो आपने कई बार पढ़ा होगा कि कोई राक्षस या दैत्य किसी को अपना आहार बनाने के लिए अपना वेष बदल कर सामाजिक दिखने का प्रयास करता है लेकिन जैसे ही उसे मौका मिलता है वह अपना असली रूप दिखा देता है। यही बात पाकिस्तान के साथ भी लागू होती है। आज पाई-पाई को तरस रहा पाकिस्तान शांति की बात तो कर रहा है लेकिन जैसे ही उसका पेट भरेगा, वह अशांति मचाने पर उतारू हो जायेगा। अपनी करतूतों की सजा भुगत रहे पाकिस्तान को दुनिया के बड़े देशों ने आर्थिक मदद देना बंद कर दिया है और चीन तथा खाड़ी देशों से उसने इतना उधार ले रखा है कि वह चुकाये नहीं चुक रहा। एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट में शामिल पाकिस्तान चाहता है कि किसी तरह प्रतिबंध हट जायें और फिर से उस पर डॉलर बरसने लगें। इसलिए पाकिस्तान के नये पैंतरे से दुनिया को सावधान रहने की जरूरत है। जहां तक पाकिस्तान की ओर से की जा रही शांति की बात है तो आपको बता दें कि इससे पहले नवाज शरीफ ने भी प्रधानमंत्री रहते हुए भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी की ओर से बढ़ाये गये दोस्ती के हाथ को थामा था। अटलजी की लाहौर यात्रा के बाद उम्मीद जगी थी कि क्षेत्र में शांति आयेगी लेकिन पाकिस्तान का असल सच यह है कि भले वहां की सरकार भारत से दोस्ती की बात सोच भी ले लेकिन पाकिस्तान के असली हुक्मरान यानि वहां की सेना भारत विरोधी रवैया कभी त्याग नहीं सकती। इसीलिए यदि पाकिस्तान सरकार भारत के साथ अच्छे रिश्तों की बात कर रही है तो समझ जाइये कि दाल में जरूर कुछ काला है। पाकिस्तान एक ओर तो कह रहा है कि वह अगले सौ साल तक भारत के साथ कोई उठापटक नहीं चाहता लेकिन सीमा पार उसने 400 आतंकवादियों को भारत में घुसपैठ के लिए तैयार रखा है। पाकिस्तान एक ओर भारत के साथ शांति चाहने की बात कह रहा है वहीं भारत के आंतरिक मुद्दों पर अनावश्यक हस्तक्षेप करने से बाज नहीं आ रहा। पाकिस्तान एक ओर भारत से अच्छे रिश्ते चाहने की बात कह रहा है तो वहीं दूसरी ओर चीन के साथ मिलकर भारत विरोधी साजिशें रचने में लगा है। पाकिस्तान अगर सौ साल तक भारत से अच्छे रिश्ते की सोच भी रहा है तो उसका एक बड़ा कारण यह भी है कि पिछले 75 सालों के दौरान वह अपनी हर बुरी हरकत के लिए हिन्दुस्तान से बुरी तरह पिटता रहा है। जहां तक पाकस्तान की पहली राष्ट्रीय सुरक्षा नीति की बात है तो आपको बता दें कि 100 पन्नों की इस रिपोर्ट में पाकिस्तान को आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दिया गया है यानि आर्थिक सुरक्षा को मजबूत बनाने पर सबसे ज्यादा जोर है। आश्चर्यजनक रूप से इसमें सैन्य ताकत पर केंद्रित एक आयामी सुरक्षा नीति की बजाय आर्थिक सुरक्षा को केंद्र में रखा गया है। देखना होगा कि इस नीति पर पाकिस्तानी सेना की क्या प्रतिक्रिया रहती है। इमरान खान पाकिस्तान की सेना की मदद से ही प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे हैं इसलिए अगर वह सेना के पर कतरेंगे तो उनके खिलाफ बगावत भी हो सकती है। इस रिपोर्ट को जारी करते हुए इमरान खान ने कहा भी है कि पाकिस्तान के जन्म से ही एक आयामी सुरक्षा नीति रही जिसमें सैन्य ताकत पर फोकस था, लेकिन अब इसमें बदलाव कर पहली बार राष्ट्रीय सुरक्षा को परिभाषित किया गया है। बता दें कि पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का वास्तविक मसौदा गोपनीय श्रेणी में बना रहेगा। इस नीति के मुख्य बिंदुओं में राष्ट्रीय सामंजस्य, आर्थिक भविष्य को सुरक्षित करना, रक्षा एवं क्षेत्रीय अखंडता, आंतरिक सुरक्षा, बदलती दुनिया में विदेश नीति और मानव सुरक्षा शामिल हैं। इसके अलावा पाकिस्तान ने देखा कि जब उसके बुरे समय में किसी ने उसकी आर्थिक मदद नहीं की तो उसने अब आर्थिक रूप से मजबूत बनने का संकल्प लिया है और इसलिए उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में कहा गया है कि अर्थव्यवस्था मजबूत होगी तो अतिरिक्त संसाधन उत्पन्न होगे जिन्हें बाद में और सैन्य ताकत बढ़ाने और मानव सुरक्षा के लिए उपयोग में लाया जायेगा। जहां तक इस नीति में भारत से संबंधों की बात है तो मीडिया रिपोर्टों के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक, इसमें जम्मू-कश्मीर को द्विपक्षीय संबंध के केंद्र में रखा गया है और भारत के लिए कहा गया है कि वह सही से कार्य करें और लोगों की बेहतरी के लिए क्षेत्रीय संपर्क से जुड़ें। इस नीति में कहा गया है कि पाकिस्तान भारत सहित अपने सभी पड़ोसियों के साथ शांति चाहता है और कश्मीर मुद्दे के समाधान के बिना भी नयी दिल्ली से कारोबार के रास्ते को खुला रखना चाहता है। देखना होगा कि भारत की इस पर क्या प्रतिक्रिया रहती है। इसके अलावा भारत के संबंध में इस नीति में भ्रामक सूचना, हिंदुत्व और घरेलू राजनीतिक फायदे के लिए आक्रामकता के इस्तेमाल को हिन्दुस्तान से अहम खतरा बताया गया है। जहां तक पाकिस्तान को हिंदुत्व से डर लगने की बात है तो कमाल की बात यह है कि हिंदुओं पर अपने देश में जुल्म ढाने वाले, उनके मंदिरों को तोड़ने वाले, उनके अधिकारों को छीनने वाले और हिंदुत्व का मजाक बनाने वाले पाकिस्तान को असल में हिंदुत्व से डर लगता है। बहरहाल, जहां तक भारत और पाकिस्तान के वर्तमान संबंधों की स्थिति की बात है तो आपको याद दिला दें कि पठानकोट वायुसेना बेस पर पड़ोसी देश के आतंकवादियों द्वारा 2016 में किए गए हमले के बाद से भारत-पाकिस्तान के बीच संबंध बिगड़े थे। उसके बाद उरी में भारतीय सेना के शिविर सहित अन्य प्रतिष्ठानों पर हुए हमलों और भारत की ओर से दिये गये करारे जवाबों ने दोनों पड़ोसी देशों के बीच संबंधों को और बिगाड़ दिया।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ मेरी ग्रेस)। अब कोरोना का तीसरा लहर अप्रत्याशित है। इस लहर में भी परीक्षा कोरोना के नियमों का पालन करते हुए सही समय पर हो यह आवश्यक है। लेकिन यह तीसरा साल है जब छात्रों व शिक्षक का सीधा संवाद कम हो रहा है। ऐसे में छात्रों की शिक्षा और परीक्षा के साथ उनके करियर के अतिरिक्त बल, मनोबल की आवश्यकता है। आज छात्र शिक्षक, अभिभावक या काउंसलर से अपने भविष्य के बारे में बात करने लगते हैं। वह चुने हुए क्षेत्र में ही करियर बनाना चाहते हैं। यह अच्छी बात है लेकिन उनके जीवन में व्यावसायिक डिग्री लेने के लिए छह से दस वर्ष का समय महत्वपूर्ण होता है। इन वर्ष में ही उनका वास्तविक करियर बनता है। इसमें वे संबंधित संस्थान, करियर और डिग्री लेते हैं। इसके बाद वे जॉब्स में जाते हैं या अपना व्यापार करते हैं। आज एक से एक रोजगार और करियर की संभावना बन रही है। प्रचलित क्षेत्र जैसे मेडिकल, इंजीनियरिंग, सिविल सर्विस, सहित रिटेल, आईटी और अन्य कई परम्परागत और नए करियर की संभावनाए सामने हैं। करियर की भरमार है और बेहतर शिक्षण संस्थान भी है जो पढ़ाई के साथ प्लेसमेंट भी कराते हैं। आवश्यकता है कि दसवीं के बाद से ही उन संस्थानों और करियर की जानकारी लेना आंरभ करे दे। आज इंटरनेट पर सभी जानकारी उपलब्ध है। हर समाचार पत्र और मैग्जीन इसकी सूचना देते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि वे इस बात की जांच कर लें कि जिस संस्थान में काम कर रहे हैं उनकी मान्यता है या नहीं। जान बूझकर भी गलत जानकारी दी जाती है। विज्ञापन से भ्रमित होने से बचे और अपने स्रोतों से भी संस्थानों के बारे में जानकारी हासिल कर लें जिससे उनका करियर सुरक्षित रहे और बेहतर बने। इससे समय और धन दोनों का सदुपयोग हो पाता है और करियर बेहतर बनता है। मानसिक शक्ति कितना जरुरी : अंग्रेजी में एक शब्द है मेंटल कमिटमेंट। इसे हम हिंदी में मानसिक शक्ति भी कहते है। यह सफलता के लिए बेहद आवश्यक गुण है। अगर आपमें मानिकस शक्ति, या ठहराव नहीं है तो आप लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकते। आखिर यह मेंटल कमिटमेंट है क्या? मेरे कार्यालय में जब हम दोपहर में भोजन करते हैं तब हमारे मुस्लिम सहयोगी हमारे साथ होने के बाद भी एक बूंद पानी तक नहीं पीते हैं उनकी भोजन में कोई रूचि नहीं होती है। उनकी खाने के प्रति जो रोजा के दिनों में अरूचि होती है वह मेंटल कमिटमेंट का एक बड़ा उदाहरणहै। यह कमिटमेंट शतप्रतिशत होना चाहिए यानि 100 प्रतिशत। अगर हमारी दृढ़ता में दो प्रतिशत की कमी हो जाए और यह 98 प्रतिशत भी जो जाए तो परिणाम में भारी अंतर आ जाएगा। अगर आप अपनी दृढ़ता से समझौता करेंगे तो आप कभी भी सफल नहीं हो सकते हैं। अगर यही हाल रहा और बार-बार आप अपने कमिटमेंट से समझौता करते रहे तो परिणाम शून्य हो जाएगा। जिनकी मानसिक शक्ति उच्च शिखर पर होती है विपरीत स्थिति में यही मानसिक शक्ति उनके जीवन में बड़ा काम का साबित होता है। जिस प्रकार रोजदार अपने नियमों के प्रति दृढता के साथ होता है वैसे हम सभी को अपनी सफलता के लिए दृढ़ रहना चाहिए। यह दृढ़ता सौ प्रतिशत होना चाहिए। सौ फिसदी दृढ़ता और 99 प्रतिशत दृढ़ता में अंतर होता है। विशेषकर युवाओं को अपने जीवन में उंचें सपने पालते हैं उन्हें यह बात समझ लेना चाहिए कि आपने अगर एक बार भी समझौता किया तो संभव है कि आपको बार-बार समझौता करना होगा। (लेखक उर्सूलाइन इंटर कॉलेज की प्राचार्या हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय रिजर्व बैंक डिजिटल करेंसी जारी करने पर विचार कर रहा है। डिजिटल करेंसी हमारे नोट की तरह ही होती है। अंतर यह होता है कि यह कागज पर छपा नोट नहीं होता है बल्कि यह एक नंबर मात्र होता है जिसे आप अपने मोबाइल अथवा कम्प्यूटर पर संभाल कर रख सकते हैं। उस नंबर को किसी के साथ साझा करते ही उस नंबर में निहित रकम सहज ही दूसरे व्यक्ति के पास पहुंच जाती है। जैसे आप अपनी जेब से नोट निकाल कर दूसरे को देते हैं उसी प्रकार आप अपने मोबाइल से एक नंबर निकाल कर दूसरे को दे कर अपना पेमेंट कर सकते हैं। डिजिटल करेंसी के पीछे क्रिप्टो करेंसी का जोर है। क्रिप्टो करेंसी का इजाद बैंकों के नियंत्रण से बाहर एक मुद्रा बनाने की चाहत को लेकर हुआ था। कुछ कंप्यूटर इंजीनियरों ने मिलकर एक कठिन पहेली बनाई और उस पहेली को उनमें से जिसने पहले हल कर लिया उसे इनाम स्वरूप एक क्रिप्टो करेंसी अथवा बिटकॉइन या एथेरियम दे दिया। उस बिटकॉइन के निर्माण का खेलने वाले सभी ने अनुमोदन कर दिया कि यह नंबर फलां व्यक्ति को दिया जाएगा। इसी प्रकार नये बिटकॉइन बनते गए और इनका बाजार में प्रचलन होने लगा। क्रिप्टो करेंसी केंद्रीय बैंकों के नियंत्रण से पूर्णतया बाहर है। जैसे यदि गांव के लोग आपस में मिलकर एक अपनी करेंसी बना लें तो उस पर सरकार का नियंत्रण नहीं रहता है। वे आपस में पर्चे छाप कर एक-दूसरे से लेनदेन कर सकते हैं जैसे बच्चे आपस में कंचे के माध्यम से लेनदेन करते हैं। क्रिप्टो करेंसी का नाम इंक्रिप्टेड से बनता है। जिस कम्प्यूटर में यह करेंसी रखी हुई है अथवा जो उस कम्प्यूटर का मालिक है उसका नाम इंक्रिप्टेड या गुप्त है। किसी को पता नहीं लग सकता है कि वह करेंसी किसके पास है। इस करेंसी को बनाने का उद्देश्य था कि सरकारी बैंकों द्वारा कभी-कभी अधिक मात्रा में नोट छाप कर बाजार में डाल दिए जाते हैं जिससे महंगाई बहुत तेजी से बढ़ती है। लोगों की सालों की गाढ़ी कमाई कुछ ही समय में शून्यप्राय हो जाती है। जैसे यदि आप 100 रुपए के नोट से वर्तमान में 5 किलो गेहूं खरीद सकते हैं। महंगाई तेजी से बढ़ने के बाद उसी 100 रुपये के नोट से आप केवल 1 किलो गेहूं खरीद पायेंगे। ऐसी स्थिति वर्तमान में ईरान और वेनेजुएला जैसे देशों में है। इस प्रकार की स्थिति से बचने के लिए इन इंजीनियरों ने क्रिप्टो करेंसी का आविष्कार किया, जिससे कि बैंकों द्वारा नोट अधिक छापे जाने से उनकी क्रिप्टो करेंसी की कीमत पर कोई प्रभाव नहीं पड़े। केंद्रीय बैंकों द्वारा क्रिप्टो करेंसी का विरोध तीन कारणों से किया जा रहा है। पहला यह कि अर्थव्यवस्था केंद्रीय बैंक के नियंत्रण से बाहर निकलने को हो जाती है। जैसे यदि देश में महंगाई अधिक हो रही है और रिजर्व बैंक ने मुद्रा के प्रचलन को कम किया तो क्रिप्टो करेंसी का चलन बढ़ सकता है और सरकार की नीति फेल हो सकती है। दूसरा विरोध यह है कि क्रिप्टो करेंसी फेल हो सकती हैं। जैसे यदि कम्प्यूटर का नंबर हैक हो जाये अथवा क्रिप्टो करेंसी बहुत बड़ी संख्या में बनाई जाने लगे तो आज जिस बिटकॉइन को आप ने एक लाख रुपये में खरीदा है, वह कल पांच हजार रुपये का हो सकता है। तीसरा विरोध यह कि क्रिप्टो करेंसी का उपयोग आपराधिक गतिविधियों को सपोर्ट करने के लिए किया जा सकता है। बीते समय में अमेरिका की एक तेल कंपनी के कंप्यूटरों को अपराधियों ने हैक कर लिया। उन कम्प्यूटरों को वापस ठीक करने के लिए कंपनी से भारी मात्रा में रकम क्रिप्टो करेंसी के माध्यम से वसूल कर ली। यद्यपि उसमें से कुछ रकम को पुलिस वापस वसूल कर सकी लेकिन बड़ी रकम आज भी वसूल नहीं हो सकी है। इसलिए अपराधियों के लिए क्रिप्टो करेंसी सुलभ हो जाती है क्योंकि वह अपनी आपराधिक गतिविधियों से अर्जित गैर-कानूनी आय को सरकारी नजर की पहुंच के बाहर रख सकते हैं। इसलिए यदि केंद्रीय बैंक जिम्मेदार है और अर्थव्यवस्था सही चल रही है तो क्रिप्टो करेंसी उसे अस्थिर बना सकती है। आज आपने किसी व्यापारी से एक बोरी गेहूं का सौदा 1,000 रुपये में किया। कल उस 1,000 रुपये की कीमत आधी रह गयी। बेचने वाले ने सौदे से इनकार कर दिया। आप यह सौदा क्रिप्टो करेंसी में करते तो यह कठिनाई नहीं आती। अत: यदि केंद्रीय बैंक द्वारा बनाई गई मुद्रा अस्थिर हो तो क्रिप्टो करेंसी के माध्यम से व्यापार सुचारु रूप से चल सकता है। यदि वेनेजुएला की मुद्रा का मूल्य तेजी से गिर रहा है तो वहां के व्यापारी क्रिप्टो करेंसी के माध्यम से आपस में व्यापार कर सकते हैं और इस समस्या से बच सकते हैं। मूल बात यह है कि यदि केंद्रीय बैंक जिम्मेदार है तो क्रिप्टो करेंसी अस्थिरता पैदा करती है लेकिन यदि केंद्रीय बैंक गैर-जिम्मेदार है तो क्रिप्टो करेंसी लाभप्रद हो सकती है। इस स्थिति में कई केंद्रीय बैंकों ने डिजिटल करेंसी जारी करने का मन बनाया है। डिजिटल करेंसी और क्रिप्टो करेंसी में समानता यह है कि दोनों एक नंबर होते हैं जो आपके मोबाइल में रखे जा सकते हैं। लेकिन क्रिप्टो करेंसी की तरह डिजिटल करेंसी गुमनाम नहीं होती है। रिजर्व बैंक द्वारा इसे उसी तरह जारी किया जाएगा जैसे नोट छापे जाते हैं। रिजर्व बैंक जान सकती है कि वह रकम किस मोबाइल में रखी हुई है। इसलिए डिजिटल करेंसी केंद्रीय बैंक के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार से हमारी रक्षा नहीं करती है। नोट छापने की तरह केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी भी भारी मात्रा में जारी करके महंगाई पैदा कर सकती है। लेकिन फिरभी मुद्रा को सुरक्षित रखने में डिजिटल करेंसी मदद करती है क्योंकि आपको नोटों को आग, पानी और चोरों से बचाना नहीं है। यदि कभी आप अपनी करेंसी का नंबर भूल जायें अथवा आपका मोबाइल चोरी हो जाये तो आपकी पहचान करके उसे वापस प्राप्त करने की व्यवस्था की जा सकती है। डिजिटल करेंसी का हमें स्वागत करना चाहिए विपरीत इसके कि यह केंद्रीय बैंक के गैर-जिम्मेदाराना आचरण से हमारी रक्षा नहीं करती है। केंद्रीय बैंक के गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार को इस प्रकार के तकनीकी आविष्कारों से नहीं रोका जा सकता है। उसे ठीक करने का कार्य अंतत: राजनीति का है और उस व्यवस्था को सुदृढ़ करना चाहिए। लेकिन डिजिटल करेंसी के माध्यम से नोट को छापने और रखने का खर्च कम होता है और आपस में लेनदेन भी सुलभ हो सकता है इसलिए हमें डिजिटल करेंसी का स्वागत करना चाहिए।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (मनोज शर्मा)। महंगाई शब्द मानव जीवन से हमेशा जुड़ा रहा है। हमारे देश में इस शब्द का अर्थ हमेशा महत्वपूर्ण रहा है क्योंकि आज भी हमारे देश में मध्यम, निम्न मध्यम व गरीब वर्ग की जनसंख्या लगभग 100 करोड़ है। अब गुजरात के गरीब और झारखंड के गरीब का अंतर इतना समझ लें कि गुजरात का गरीब मासिक 20 हजार कमाता है झारखंड का पांच हजार यह उदाहरण समझने के लिये हैं। इसलिए यह वर्ग प्रभावित होने का अर्थ देश का प्रभावित होना माना जाता है। हाल में महंगाई की वजह से जनता परेशान हैं और इस बार लगातार बढ़ते दामों और गिरती आय का डबल डोज एक साथ लग रहा है। कोरोना के संकट से हमारे सिस्टम या सिस्टम संचालनकर्ताओं यानि नेताओं को शायद ही कोई फर्क पड़ा हो या न पड़ा हो लेकिन जनता की कमर टूट चुकी है। जैसा कि कोरोना के पहले कालखंड के बाद ही छोटी-बड़ी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों की तनख्वाह आधी या उससे भी कम कर दी थी जो अब तक भी पूरी नहीं हुई, चूंकि उसके बाद जैसे ही बाजार उठ रहा था, वैसे ही दूसरी लहर ने सब बर्बाद कर दिया था और अब हम तीसरी लहर में प्रवेश कर चुके हैं और स्थिति वैसी ही है। और यदि अब व्यापारी वर्ग की बात करें तो व्यापार की हालात भी पहले से बहुत नाजुक बनी हुई हैं। बाजार में काम इतने कम हो चुके हैं कि कंपनी के खर्च भी निकल नहीं पा रहे और कई व्यापारी ने अपने धंधे तक बंद कर दिए। वे अब बेरोजगारों की श्रेणी में आ चुके हैं। देश का गणित जो आज आप भी अंदाज लगा सकते हैं ऐसे समझिये। सवा करोड़ ड्राइवर परिवार समेत छह करोड़ पच्चीस लाख लोग सरकारी ड्राइवर छोड़ सब परेशान, एक करोड़ सिक्यूरिटी मैन पांच करोड़ परिवार के लोग, दस करोड़ किसान सरकार आकड़ा पचास करोड़ परेशान क्या मैंने सौ करोड़ भारतीय को परेशान बताया तो गलत कहां है? यह गणित मेरे जैसा सामान्य बुद्धि का व्यक्ति समझ सकता है तब देश के मंत्री, प्रशासनिक अमला फैला और नीति निर्धारकों ने क्या आख पर पट्टी बांध रखा है। हां, रखा है कैसे समझते हैं। इसके अलावा एक फील्ड ब्वॉय ने बताया मुझे तनख्वाह के अलावा कंपनी से दो रुपये लीटर प्रति किलोमीटर के हिसाब से पेट्रोल खर्च मिलता है, लेकिन जब से लेकर अब तक पेट्रोल का भाव तीस रुपये लीटर बढ़ चुका लेकिन कंपनी अधिक पैसे बढ़ाने को तैयार नही हैं और जो कंपनी के काम से बाहर जाता हूं उस वजह से मेरी तनख्वाह से पेट्रोल लग जाता है। अब बच्ची का एक किलो दूध जिसमें 16 सौ रुपये लगते थे उसे आधा किलो किया है। यह सौ करोड़ की पीड़ा है। ईंधन के दाम बढ़ने से सबसे ज्यादा महंगाई बढ़ती है यदि इसे सरल भाषा में एक उदाहरण के रूप में समझें तो हिमाचल से दिल्ली किसी सब्जी के ट्रक का किराया पच्चीस हजार हैं और डीजल के दाम बढ़ने से वह किराया तीस हजार रुपये हो जाता है तो जो सब्जी 50 रुपये किलो थी वह सीधा 60 रुपये किलो हो गई। एक चीज से ही बहुत सारी चीजें प्रभावित होती हैं। ईंधन का दो बढ़ने से खाने पीने की आपूर्ति का खर्च बढ़ता है जिससे अन्तत: महंगाई बढ़ती है। भारत हाल ही में बेंट क्रूड का भाव कम है जिसकी वजह से पेट्रोल-डीजल के मौजूदा रेटों में लगभग 8 से 10 रुपये तक का भाव कम हो सकता है लेकिन इस ओर सरकार न जाने किस वजह से ध्यान नही दे पा रही। बता दें कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें तय करने में अहम भूमिका इंटरनेशनल मार्केट में बेंट कू्रड के भाव के आधार पर तय होती है। यदि इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड के दाम कम हो जाते हैं तो पेट्रोल-डीजल के दाम पर भी गिर जाते हैं। हालांकि बेंट क्रूड की कीमतों कम होने का बाद उस देश की मर्जी पर भी तय होता है कि वह दाम कम करें या न करें। हमारे देश में केंद्र के बाद राज्य सरकारें भी अपना टैक्स लगाते हुए रेट में बदलाव कर सकती हैं। इस ही वजह से हमारे देश में हर राज्य में पेट्रोल व डीजल का रेट अलग-अलग होता है। सरकार को त्वरित प्रभाव से पेट्रोल व डीजल के दामों में कटौती करनी चाहिए। जिन देशों में पेट्रोल सबसे महंगा है, उन देशों की सूची में हमारा देश 58वें नंबर पर आता है हालांकि कभी-कभी एक-दो पायदान ऊपर नीचे होता रहता है। बीते वर्ष मई तक भारत में पेट्रोल की कीमत 1.31 डॉलर प्रति लीटर पहुंच गई थी जिससे कई शहरों में सौ रुपये प्रति लीटर तक रेट पहुंच गया था। यदि हम अपने पडोसी देशों पाकिस्तान,नेपाल और भूटान में पेट्रोल हमारे यहां से सस्ता बिकता है। भारत सरकार इस पर गौर करे। बीते दिनों वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने टेक्सटाइल पर जीएसटी 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 12 प्रतिशत करने की घोषणा की थी लेकिन बाद में कई राज्यों और इंडस्ट्री के आग्रह करने के बाद फैसला वापस लेना पड़ा। चूंकि क्लोदिंग आवश्यक वस्तु में शामिल है और इस पर होजरी मैन्युफैक्चरर एसोसिएशन ने जीएसटी बढ़ाने के फैसले पर चिंता जताई थी। होजरी मैन्युफैक्चरर अनुसार कपड़ों पर जीएसटी बढ़ने आम आदमी प्रभावित होता और एमएसएमई सेक्टर को भी इससे नुकसान होता चूंकि देश के कपड़ा उत्पादन में असंगठित क्षेत्र का 80 प्रतिशत से ज्यादा का योगदान है। इससे बुनकर सबसे ज्यादा प्रभावित होत सकते थे। पहले से ही कोरोना की वजह से बीते दो वर्षों में बहुत नुकसान हुआ है। पुलिस रिकार्ड के अनुसार अधिकतर छिनैत व चोर अच्छे परिवार और शिक्षित थे। एक राजा था उसकी प्रजा अकाल से पीड़ित थी और कर भी कसाई की तरह लेता। खूब मारता राजा क्रूर और राक्षस था। प्रजा त्रस्त थी। यह कहानी आज पुरानी है क्या? ज्यादा महंगाई के चलते बेरोजगारी बढ़ने पर कहीं गृह युद्ध जैसा माहौल न हो जाए। सरकार को आर्थिक विशेषज्ञों के पैनल के साथ इस बार गरीब व मध्यम वर्ग की सुध लेते हुए बजट बनाना होगा। मोदी सरकार को भ्रम है कि राष्ट्रवाद का मुददा काम करेगा लेकिन महंगाई की चोट उन्हें कई बार लग चुकी है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके अपने विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (वरुण गांधी)। आज युवा दिवस है। देश स्वामी विवेकानंद जी को याद कर रहा है। लेकिन देश की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की आकांक्षा वास्तव में कभी फलीभूत नहीं हुई। ऐसे में ऊंचे लक्ष्य तय करना जरूरी है। यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इनफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (यूडीआईएसई) रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने 2014 में प्रति छात्र सालाना 12,500 रुपये खर्च किए, जो कि जीडीपी का करीब तीन-चार फीसदी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 चाहती है कि केंद्र और राज्य सरकारें अपना खर्च बढ़ाकर जीडीपी के करीब छह फीसद तक लाएं। 1960 के दशक से यह वांक्षित लक्ष्य रहा है, लेकिन अब जाकर सरकार ने इसे वास्तविक लक्ष्य बनाया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में वर्ष 2035 तक उच्च शिक्षा में कुल पंजीकरण का अनुपात 50 फीसदी बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। इधर, शिक्षा के क्षेत्र में दूसरी समस्याएं भी हैं। संगीता कश्यप मध्य प्रदेश की 46 वर्षीय स्कूल शिक्षिका हैं, जो इंदौर और आसपास के इलाके के मशहूर सरकारी अहिल्या आश्रम स्कूल में पढ़ाती हैं। पीटीआई की अगस्त, 2014 की खबर के अनुसार, अपने 24 साल लंबे करियर में पिछले 23 वर्षों से वह ड्यूटी से अनुपस्थित हैं। हमारी शिक्षा प्रणाली की ऐसी दुसाध्य बीमारियों को भी नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति दुरुस्त करना चाहती है। ग्रामीण भारत में आमतौर पर शिक्षक किसी विषय के विशेषज्ञ नहीं होते हैं, उनके पास अक्सर सिर्फ स्नातक की डिग्री होती है, और कुछ के पास थोड़ा-बहुत शिक्षण-प्रशिक्षण का अनुभव भी। हमें शिक्षकों को आधुनिक शिक्षण विधा में प्रशिक्षित करने की जरूरत है, जिससे उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा परिणाम देने के काबिल बनाया जा सके, जबकि मौजूदा शिक्षकों को अपने कौशल को उन्नत बनाने का मौका दिया जाना चाहिए। उनके काम की निगरानी के लिए एक मूल्यांकन प्रणाली बनानी होगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में शिक्षकों के लिए महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं- इसमें प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में बदलाव पर ध्यान दिए जाने के साथ ढेरों संस्थागत सुधार शामिल हैं। नई शिक्षा नीति में अध्यापन के लिए जरूरी न्यूनतम डिग्री बी.एड. है। शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को अब विद्यालय पाठ्यक्रम को ध्यान में रखते हुए चार हिस्सों में बांट दिया गया है। जो शिक्षक जिन विषयों में पढ़ाना चाहते हैं, उन्हें टीईटी या एनटीए में उन विशिष्ट विषयों में अंकों के आधार पर काम पर रखा जाएगा। इसके साथ ही टीईटी पास करने वालों का साक्षात्कार में स्थानीय भाषा का ज्ञान भी परखा जाएगा। शिक्षकों से अब हर साल करीब 50 घंटे के नियमित प्रोफेशनल डेवलपमेंट कोर्स में शामिल होने की अपेक्षा होगी। इसके अलावा एनसीटीई द्वारा शिक्षकों के लिए गाइडलाइंस के रूप में राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक बनाए जाएंगे। और अंत में कार्यकाल, पदोन्नति तथा वेतन संरचना के लिए एक योग्यता-आधारित ढांचा विकसित किया जाएगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने विज्ञान व कला और शैक्षणिक व व्यावसायिक प्रशिक्षण के बीच कठोर बंटवारे को खत्म कर दिया है। विद्यार्थी अब दोनों तरह के पाठ्यक्रमों में से चुनाव कर सकते हैं- यह हमारे नागरिकों को हर तरह की जरूरत के लिए तैयार करने में मददगार होगा। कला संकाय (मानविकी) को लेकर हमारी लंबी उपेक्षा आखिरकार सुधर जाएगी। नई शिक्षा नीति में स्थानीय भाषाओं पर भी ध्यान दिया गया है। हमारे देश के संघीय ढांचे को ध्यान में रखते हुए स्कूल बोर्डों को तीन भाषाओं (राज्य और क्षेत्र के हिसाब से) के विकल्प का अधिकार दिया जाएगा, जबकि संस्कृत विश्वविद्यालयों को बहु-विषयक संस्थानों में बदल दिया जाएगा। (लेखक भाजपा के सांसद हैं।)
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