एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सिंधु मिश्रा)। हम सब अपनी मयार्दाएं जानते हैं, हर रिश्ते की अपनी एक मर्यादा होती है और इन मयार्दाओं में रहते हुए रिश्ते निभाने के तरीके अलग अलग होते हैं, जो हमारे संस्कारों और तौर तरीकों पर निर्भर करता है। चंद रिश्तों की मिसाल यहां आपको देना चाहूंगी, सास-बहू, ससुर-दामाद, बेटा-बेटी, बेटी-बहू, ननद-भाभी, जेठानी-देवरानी, कुछ चुनिंदा रिश्तों की ही बात की है मैंने। क्या हम इन रिश्तों में आज नि:स्वार्थ प्रेम देख सकते हैं? शायद हां और ना। दोनों ही जवाब आपके पास होंगे। जरा देखें अपने आसपास, नि:स्वार्थ प्रेम पर टिके उन रिश्तों को। क्या सचमुच नि:स्वार्थ प्रेम दिखाई देता है? इनके बीच क्या ईर्ष्या, द्वेष, जैसी भावनाएं नहीं नजर आती हैं? अमूमन इन रिश्तों में छोटी-छोटी बातों पर भी गंभीर हालात बन जाते हैं। आरोप-प्रत्यारोप की कड़ियां तैयार होने लगती हैं और ऐसे रिश्ते सिर्फ नाम के रिश्ते रह जाते हैं। अक्सर उन रिश्तों में दरारें आ जाती हैं, जिसने रिश्तों की मर्यादाएं न समझी। न ही उस अनुसार आचरण किया, दोष हमेशा हम नए रिश्तों और हमारी आज की पीढ़ी को देते हैं, पर ऐसा नहीं है आज की पीढ़ी पर दोषारोपण करने के पूर्व हम अपने संस्कारों और अपने विचारों को भी सुसंस्कृत करें और देखें आखिर कहाँ हमसे चूक हो रही है? क्यों हमारा प्रेम नि:स्वार्थ होने की जगह स्वार्थीपन की ओर हमें लिए जा रहा है? आखिर क्यों बिखर जाते हैं ये रिश्ते?क्यों हम एकाकी जीवन जीने की ओर अग्रसर होते हैं? आत्ममंथन आज की जरूरत बनती जा रही है, मां-बाप, बड़े बुजुर्ग और तमाम वो रिश्ते जिनमें बिखराव आ रहे हैं। सभी अपने स्वार्थ की नहीं बल्कि रिश्तों के महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार करने की कृपा करें, आपसी तालमेल और नि:स्वार्थ प्रेम को जीवन में स्थान दें और मानसिकता को स्वस्थ रखें, तभी हम सफलता की उन मापदंडों को पूरा करते हुए खुशहाल जीवन जी सकेंगे। धन्यवाद! (लेखिका दहेजमुक्त झारखंड की राष्ट्रीय महासचिव हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (टीएन नाइनन)। एयर इंडिया के निजीकरण के चौतरफा स्वागत के बीच भी यह मानना होगा कि इसके साथ कुछ न कुछ गड़बड़ रही है। हमारे देश में अरुण शौरी आज भी उन शर्तों से जुड़े सवालों के जवाब दे रहे हैं जिन पर एयर इंडिया से कम महत्त्वपूर्ण सरकारी कंपनियों का निजीकरण किया गया था। यहां एक बात ध्यान देने लायक है कि कर्मचारियों के एक धड़े द्वारा चिंता जताने तथा वाम दलों के एक हिस्से की ओर से कुछ शोरशराबे के अलावा समूचे राजनीतिक वर्ग में से किसी ने इस विमानन सेवा की बिक्री की आलोचना नहीं की है। कर्मचारी भी मोटे तौर पर राहत महसूस कर रहे होंगे क्योंकि उनका वेतन निरंतर मिलता रहेगा। एयर इंडिया बीते करीब 15 वर्ष से लगातार घाटे में चल रही है। संभव है अन्य सरकारी कंपनियों का प्रदर्शन भी इतना खराब रहा हो लेकिन कोई सरकारी कंपनी इतनी बुरी स्थिति में नहीं पहुंची कि उसका घाटा लाख करोड़ रुपये के आसपास हो गया हो। एयर इंडिया का समग्र घाटा लगभग 80,000 करोड़ रुपये और उसका रोज का घाटा 20 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच चुका था। ऐसे में एक कट्टर वामपंथी के लिए भी यह जाहिर सी बात थी कि यह विमानन कंपनी अब उड़ान भरने की स्थिति में नहीं रह गई थी। कंपनी का कारोबारी निपटान तय था। इसके साथ तमाम कठिनाइयां भी जुड़ी हुई थीं। उदाहरण के लिए खाली एयरपोर्ट स्लॉट, 100 से अधिक खराब रखरखाव वाले विमानों से निजात, इससे पहले कि वे हवाई अड्डों पर खड़े-खड़े जंग खा जाएं तथा कर्मचारियों को जरूरी लाभ के साथ सेवा समाप्ति देना। संक्षेप में कहें तो अफरा-तफरी और बड़े पैमाने पर शर्मिंदगी। एक बार जब टाटा ने एयर इंडिया को उबारने की पहल की तो सरकार ने राहत महसूस की। इसकी एक झलक तब मिली जब विमानन कंपनी को टाटा को सौंपे जाने के दिन प्रधानमंत्री ने टाटा समूह के चेयरमैन से औपचारिक मुलाकात की। वित्त मंत्रालय के कर्मचारियों ने इस विषय पर काम किया कि करीब 61,000 करोड़ रुपये के बाकी रह गए कर्ज का निपटान कैसे होगा। इस बीच सरकार के पास 14,000 करोड़ रुपये मूल्य की गैर विमानन परिसंपत्तियां रह गई हैं तथा बिक्री का कुल नकद मूल्य 2,700 करोड़ रुपये (विमानन कंपनी का कुल मूल्य 18,000 करोड़ रुपये लगा जिसमें बकाया कर्ज घटाकर 2,700 करोड़ रुपये की राशि बची) रहा। बकाया 44,000 करोड़ रुपये की राशि को बट्टेखाते में डाले जाने को सबके लिए बेहतर स्थिति के रूप में पेश किया गया जो कि उपलब्ध विकल्पों के मुताबिक उचित भी है। ऐसा सौदा जिसे लेकर खरीदार और विक्रेता दोनों पक्ष खुश हों, वह हमें इस विमानन कंपनी और इसके हालिया इतिहास के बारे में भी काफी कुछ बताता है। टाटा समूह द्वारा इस सौदे में रुचि लेने के बाद सरकार की प्रसन्नता समझी जा सकती है लेकिन ऐसे मौके पर किसी को उस व्यक्ति से भी टिप्पणी लेनी चाहिए जो इस विमानन कंपनी को पतन के रास्ते पर डालने के बाद एकदम खामोश है। वह व्यक्ति हैं मनमोहन सिंह सरकार के पहले कार्यकाल के नागर विमानन मंत्री प्रफुल्ल पटेल। एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस का विलय कराने पर पटेल ने ही जोर दिया था। इसके नतीजे बहुत त्रासद हुए क्योंकि इससे अनुमानित लक्ष्य नहीं हासिल हुए। ढेर सारे विमान खरीदने के आॅर्डर देने के लिए भी उन पर सवाल उठे क्योंकि इससे कंपनी कर्ज में डूब गयी और फिर उबर नहीं सकी। एक निजी विमानन कंपनी के आगमन के बाद प्रमुख मार्गों के अहम स्लॉट को खाली कराए जाने को लेकर भी तमाम बातें हुईं। विजय माल्या जो एक समय अपनी (अब बंद हो चुकी) विमानन कंपनी को अंतरराष्ट्रीय मार्गों पर उड़ाना चाहते थे, उन्होंने सार्वजनिक रूप से मंत्री पर आरोप लगाया कि वह एक अन्य विमानन कंपनी के लिए काम कर रहे हैं। इस पर नाराज पटेल ने प्रतिक्रिया दी थी कि माल्या की किंगफिशर एयरलाइंस अर्हता नहीं हासिल कर सकी। अब एयर इंडिया टाटा समूह की घाटे वाली कंपनियों में नजर आएगी। एन चंद्रशेखरन के नेतृत्व में समूह के परिचालन में जबरदस्त सुधारों के बावजूद अगर टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) को छोड़ दिया जाए तो समूह गत तीन वर्ष से घाटे में है। इस वर्ष हालात बदल सकते हैं क्योंकि टाटा स्टील इस्पात की बढ़ती कीमतों की बदौलत टीसीएस से अधिक मुनाफा कमा रही है। अगर एयर इंडिया कुछ समय तक घाटे में भी रहती है तो भी घाटे का आकार कम हो जाएगा। ब्याज का बोझ कम होगा और बकाया कर्ज की लागत कम होगी। समूह की दूसरी विमानन कंपनी के साथ तालमेल करने से यात्रियों की तादाद बढ़ाई जा सकेगी। एक फायदा यह भी हो सकता है कि शायद सरकार के मंत्री अब टाटा पर सार्वजनिक हमले न करें। दरअसल, करीब 69 साल बाद आधिकारिक तौर पर टाटा समूह के हाथों में एयर इंडिया की कमान आ गई है। इस बात की पुष्टि टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन ने की है। एविएशन इंडस्ट्री में कितनी हिस्सेदारी: इस अधिग्रहण प्रक्रिया के बाद भारत की एविएशन इंडस्ट्री में टाटा समूह का दबदबा बढ़ गया है। टाटा समूह की अब तीन एयरलाइन- विस्तारा, एयर एशिया और एयर इंडिया हो गई है। -टाटा समूह को एयर इंडिया में शत प्रतिशत हिस्सेदारी मिली है। -विस्तारा एयरलाइन, टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड और सिंगापुर एयरलाइंस लिमिटेड (एसआईए) का एक ज्वाइंट वेंचर है। इसमें टाटा संस की 51 फीसदी हिस्सेदारी है तो सिंगापुर एयरलाइन का स्टेक 49 फीसदी है। -अगर एयर एशिया की बात करें तो इसमें टाटा संस की हिस्सेदारी 83.67 फीसदी है। एविएशन इंडस्ट्री में कहां है टाटा: नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) के आंकड़ों के मुताबिक, एयरएशिया, विस्तारा और एयर इंडिया की डोमेस्टिक एयरलाइन इंडस्ट्री में करीब 25 फीसदी हिस्सेदारी है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के आंकड़ों की मानें तो डोमेस्टिक एयरलाइन में एयर इंडिया 13.4 फीसदी, विस्तारा 8.1 फीसदी, एयरएशिया इंडिया 3.3 फीसदी की हिस्सेदार है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (देवाशीष)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगस्त 2020 में पारदर्शी कराधान के तहत तीन संरचनात्मक कर सुधारों की घोषणा की थी। इन घोषणाओं में फेसलेस असेसमेंट, फेसलेस अपील और करदाता संहिता शामिल थे। मगर वास्तविकता कुछ और है। पेचीदा आयकर नियमों, त्रुटिपूर्ण आॅनलाइन आयकर रिटर्न (आईटीआर) प्रक्रिया और दोषपूर्ण फेसलेस टैक्स असेसमेंट्स से प्रधानमंत्री के कर सुधार उपहास का विषय बन गए हैं। शुरूआत तब हुई जब आॅनलाइन आईटीआर दाखिल करने में करदाताओं को भारी परेशानी उठानी पड़ी। सनदी लेखाकारों (चार्टर्ड अकाउंटेंट्स) के अनुसार कर पोर्टल में लॉग इन करने से लेकर आईटीआर जमा करने तक लगभग सभी चरणों में परेशानी पेश आ रही थी और रिफंड के मद में रकम भी गलत दर्शायी जा रही थी। कर पोर्टल पर आईटीआर दाखिल होने और इनका सत्यापन होने के बाद भी कभी-कभी यह अपुष्ट बताया जाता है। कुछ मामलों में रिटर्न भरने के एक सप्ताह बाद भी आईटीआर, प्राप्ति सूचना या फॉर्म 10-आईई डाउनलोड करना संभव नहीं हो रहा था। कई फॉर्म भरने में बार-बार मशक्कत करनी पड़ रही थी। सनदी लेखाकारों के शब्दों में प्रक्रिया पूरी करने के लिए तकनीकी जुगाड़ का सहारा लेना पड़ता है। इसके बाद भी परेशाानियों का तांता लगा रहा। नए करदाता और उनके डिजिटल हस्ताक्षर स्वीकार नहीं हो रहे हैं और आधार क्रमांक से सत्यापन के लिए वन टाइम पासवर्ड (ओटीपी) भी काम नहीं करता है। जून के अंत से शुरू हुई यह दुरूह प्रक्रिया आईटीआर जमा करने की आखिरी तारीख 31 दिसंबर आते-आते और बढ़ गई। सनदी लेखाकारों ने टैक्स पोर्टल पर अपने खराब अनुभवों का जिक्र सोशल मीडिया पर करना शुरू कर दिया। मगर सरकार की तरफ से आई प्रतिक्रिया संतुष्ट करने वाली नहीं थी। राजस्व सचिव ने तो जोर देकर कहा कि कर पोर्टल बिल्कुल ठीक ढंग से काम कर रहा है। उन्होंने इसके लिए अब तक जमा आईटीआर की संख्या का हवाला दिया। पिछले वर्ष कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के बीच सरकार ने नया आॅनलाइन कर पोर्टल शुरू किया था। इसके लिए सरकार ने इन्फोसिस को करोड़ों रुपये दिए थे। सनदी लेखाकारों का कहना है कि नए पोर्टल की बिल्कुल जरूरत नहीं थी। पुराना पोर्टल कुछ त्रुटियों के साथ भी बेहतर ढंग से काम कर रहा था। ये त्रुटियां ऐसी थीं जो आसानी से दूर कर ली गईं या इनका कोई न कोई उपाय खोज लिया गया था। सनदी लेखाकार अमित पटेल ने कहा, नए पोर्टल पर कुछ भी जमा करना लगभग पत्थर पर घास उगाने जैसा लग रहा था। जब करदाताओं ने पेश आ रहीं परेशानियों का जिक्र किया तो सरकार ने शुरू में उन पर ध्यान नहीं दिया। प्रधानमंत्री ने स्वयं अपरोक्ष रूप से जता दिया कि सरकार की किसी पहल पर सवाल उठाने वाले लोग नकारात्मक सोच रखते हैं। जब शिकायतों का सिलसिला नहीं थमा तो प्रधानमंत्री ने सांकेतिक तौर पर सार्वजनिक रूप से इन्फोसिस को डांट लगा दी। अगस्त 2021 के अंत में इन्फोसिस ने वादा किया था कि कुछ दिनों में कर पोर्टल की खामियां दुरुस्त कर ली जाएंगी। इसके बाद भी 8 जनवरी को सनदी लेखाकारों ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को उन परेशानियों की एक फेहरिस्त भेजी जिनका सामना उन्हें हरेक दिन करना पड़ रहा था। किसी भी नए सॉफ्टवेयर के विकास के साथ कुछ महत्त्वपूर्ण बातें जुड़ी होती हैं। इनमें शुरूआत से पहले पूर्ण परीक्षण और शुरूआत के बाद प्रतिक्रियाओं के आधार पर त्रुटियों का निपटारा आदि शामिल हैं। मगर आश्चर्य की बात है कि तकनीक को अधिक महत्त्व देने वाली सरकार ने नया कर पोर्टल शुरू करने से पहले इन बातों पर ध्यान नहीं दिया। आधार और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) प्रणाली की शुरूआत भी इसी लचर रवैये के साथ की गई थी। किसी परियोजना के साथ फॉलबैक आॅप्शन भी उतना ही महत्त्वपूर्ण होता है। इसका आशय है कि अगर नई प्रणाली ठीक ढंग से काम नहीं कर रही है तो पुरानी प्रणाली दोबारा इस्तेमाल में लाई जाती है। मगर आश्चर्य की बात यह है कि पुराना आईटी पोर्टल समाप्त किया जा चुका है। अब अस्थायी रूप से भी पुरानी प्रणाली की तरफ लौटना संभव नहीं रह गया है। नियोजन एवं क्रियान्वयन पर अक्सर अपनी पीठ थपथपाने वाली सरकार ने नई प्रणाली में विसंगतियां आने की स्थिति में कोई दूसरा विकल्प तैयार नहीं रखा था। क्या इन्फोसिस ने निजी क्षेत्र के किसी ग्राहक को ऐसी त्रुटिपूर्ण प्रणाली दी होती? और क्या बिना समुचित जांच के ग्राहक ने ऐसी किसी प्रणाली के साथ आगे बढ़ने का निर्णय लिया होता? मगर कड़ाई से पेश आने के बजाय सरकार का रवैया इन्फोसिस के साथ पहले की तरह ही सामान्य है। हमें यह बात भी याद रखनी चाहिए कि इन्फोसिस ने कंपनियों द्वारा कर जमा करने के लिए एक अन्य बहु-उद्देश्यीय सरकारी पोर्टल-एमसीए21 शुरू किया है। वास्तव में यह एक रहस्य प्रतीत होता है कि लोगों में अपनी छवि को लेकर सतर्क और किसी तरह की चूक की स्थिति में जनता एवं संगठनों के खिलाफ कड़ाई से पेश आने वाली सरकार एक निजी कंपनी के साथ एक त्रुटिपूर्ण परियोजना देने पर भी ढिलाई से पेश आ रही है। ऐसा लगा था कि फेसलेस असेसमेंट से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा जाएगा। वास्तव में कई कर मामले तेजी से निपटाए गए और रिफंड भी कम से कम समय में पूरे कर दिए गए। मगर कुछ दूसरे मामलों में करदाताओं के लिए मुश्किलें बढ़ गईं। करदाताओं से कई अतिरिक्त जानकारियां मांगी गईं और इनका निपटारा करने के लिए उन्हें पर्याप्त समय भी नहीं दिया गया। यहां तक कि करदाताओं को उनका पक्ष रखने का अवसर तक नहीं दिया गया। नोटिस भी कई बार किसी दूसरे व्यक्ति के ई-मेल पर भेज दिए गए। फेसलेस असेसमेंट शुरू करने पहले व्यापक विचार नहीं किया गया। सनदी लेखाकार अमित के अनुसार अपील पर आवश्यक कदम उठाने जैसे कई काम रुक गए। कर पोर्टल से एक ही सूचनाएं बार-बार मांगी जा रही हैं। अगर कोई फाइनल टैब या पार्शियल टैब दबा कर अपना जवाब देता है तो भी अपील का निपटान नहीं होता है। कुछ महीनों बाद दूसरा नोटिस आ जाता है। सनदी लेखाकारों की शिकायत है कि अतिरिक्त कर की मांग में त्रुटि दूर नहीं की जा रही है बल्कि यह बकाया रिफंड से स्वत: ही काट लिया जाता है। अपील करदाताओं के पक्ष में जाने के बाद भी अतिरिक्त कर की मांग रिफंड से काट ली जाती है या समायोजित कर ली जाती है। त्रुटियां दूर करने के लिए करदाताओं के ज्यादातर आवेदनों पर कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि उनके आवेदनों पर विचार करने का अधिकार केंद्रीय निपटान केंद्र (सेंट्रल प्रोसेसिंग सेंटर) के पास है या किसी क्षेत्राधिकार अधिकारी के पास। सरकार ने पिछले साल कर पुनर्आकलन अंतिम तिथि के बाद शुरू किया था। न्यायालय ने अब ऐसा करने से आयकर विभाग को रोक दिया है। कर फॉर्म पेचीदा और लंबे होते जा रहे हैं, वहीं मामूली खामियों पर भी आयकर विभाग कड़ाई से पेश आ रहा है। वास्तविकता यह है कि कर प्रताड़ना और कर उगाही नई कर प्रणाली का हिस्सा बन गया है। इस वजह से कर विभाग नागरिकों के लिए स्थिति सहज बनाने के बजाय उन पर असहनीय बोझ डालता रहेगा और पारदर्शी कराधान एक खोखला नारा और उपहास का विषय बना रहेगा। (लेखक डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट मनीलाइफ डॉट इन के संपादक हैं)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ मोनिका शर्मा)। साथ और स्नेह की सुदृढ़ बुनियाद कहे जाने वाले परिवार में रिश्तों की रंजिशें और मन का अलगाव जानलेवा साबित हो रहा है। यह वाकई विचारणीय है कि अपनों का साथ हिम्मत देने के बजाय जिंदगी से हारने का कारण बन रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की ओर से जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक 2020 में देश में 1,53,052 लोगों ने आत्महत्या जैसा अतिवादी कदम उठाया है। यह आंकड़ा 2019 के के मुकाबले 10 प्रतिशत ज्यादा है, जिसका सीधा सा अर्थ है कि आत्महत्या की दर 8.7 प्रतिशत बढ़ गई है। इन दुखद आंकड़ों में गौर करने वाली बात यह है कि सबसे अधिक 33.6 प्रतिशत मामलों में पारिवारिक समस्याएं खुदकुशी की वजह बनी हैं। ऐसे सभी कारण पारिवारिक संबंधों की उलझनों, तलाक, अकेलापन सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से जुड़े हैं। चिंतनीय है कि जो रिश्ते-नाते जीने का आधार और पारिवारिक अपनापन हर हालत में आशाओं की नींव को मजबूती देने वाले रहे, अब मन जीवन को थका रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के हालिया आंकड़ों के मुताबिक आत्महत्या करने वालों में शादी से जुड़ी समस्याओं से 5 प्रतिशत और प्रेम संबंधों के चलते 4.4 प्रतिशत लोगों ने जीवन से मुंह मोड़ लिया है। इतना ही नहीं सामाजिक स्थिति से जुड़ी आत्महत्याओं में 66.1 फीसदी शादीशुदा थे और 24 प्रतिशत अविवाहित लोगों ने जीवन से हारने का रास्ता चुना। पारिवारिक जीवन से जुड़े हालात के तहत ही जीवनसाथी को खो चुके विधवा या विधुर लोगों में 1.6 प्रतिशत और तलाकशुदा लोगों में 0.5 फीसदी खुदखुशी के मामले सामने आए हैं। विचारणीय है कि पारिवारिक समस्याओं से जुड़े पहलू जीवन को हर मोर्चे पर प्रभावित करते हैं। साथ ही जीवन के हर क्षेत्र से जुड़ी तकलीफें भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पारिवारिक जीवन पर असर डालती हैं। ऐसे में भावनात्मक टूटन और व्यावहारिक उलझनों का जाल अनगिनत मुश्किलें खड़ी कर देता है। यही वजह है कि पारिवारिक समस्याओं से जीवन हारने वालों में गृहिणियां भी हैं और पेशेवर महिला-पुरुष भी। दिहाड़ी मजदूर भी हैं और युवा भी। हालांकि कारण अलग-अलग हैं पर समग्र रूप से ऐसी उलझनें घर-आंगन के परिवेश से ही जुड़ी हैं। जो कहीं न कहीं साथ, सहयोग और संबल के रीतते भाव की ओर भी इशारा करती हैं। गौरतलब है कि वर्ष 2020 में बीमारी से 18 फीसदी, ड्रग्स की लत 6 प्रतिशत, कर्ज के चलते 3.4 प्रतिशत, बेरोजगारी से 2.3 फीसदी और परीक्षाओं में असफलता के कारण 1.4 प्रतिशत खुदकुशी के मामले सामने आए हैं। साफ है कि जिंदगी से मुंह मोड़ने वालों में हर उम्र के लोग शामिल हैं। ऐसे में यह समझना मुश्किल नहीं कि पारिवारिक सहयोग और संबल का भाव विद्यार्थियों से लेकर बेरोजगारी की परिस्थितियों से जूझ रहे वयस्कों तक, सभी के लिए अहम है, जबकि ऐसी अधिकतर घटनाओं के पीछे घर परिवार से मिलने वाला मानसिक दबाव और अपेक्षाएं भी आत्महत्या जैसा कदम उठाने की वजह बन रही हैं। दरअसल, बीते कुछ बरसों में पारिवारिक अलगाव, अपनों अपेक्षाएं और यहां तक कि घरेलू रंजिशें भी आत्महत्या का कारण बन रही हैं। करीबी रिश्तों में भी असंतोष की भावना पनप रही है। अपनों के साथ होकर भी अकेलेपन को जीने के हालात बन गए हैं। इतना ही नहीं पारिवारिक कलह के कारण हिंसा और हत्या के मामले भी देखने में आ रहे हैं। कहीं उपेक्षा का भाव तो कहीं अपेक्षाओं का बोझ, जीवन पर भारी पड़ रहा है। कभी पारिवारिक ताने-बाने में सांसारिक मुश्किलों की अपनों से शिकायत कर मन को संतोष मिल जाता था। आज अधिकतर लोग अपने ही आंगन में असंतोष, आक्रोश और उलाहनों की उलझनों में घिर गए हैं। ऐसे में अपनों से जुड़ी होने के बातें मन को ज्यादा घेरती हैं। भावनात्मक टूटन लाती हैं। कोरोना काल की आपदा ने मुश्किलों को भी बढ़ा दिया है। इन्सान को और अकेला कर किया है। नतीजतन, खुदकुशी के आंकड़ों में इजाफा हुआ तो हुआ ही है, सामाजिक-पारिवारिक मोर्चे पर भी तकलीफें बढ़ी हैं। यह कटु सच है कि बदलती जीवनशैली और स्वार्थपरक सोच ने मन-जीवन से जुड़ी जटिलताएं बढ़ा दी हैं। व्यक्तिगत स्तर पर जरूरतों की जगह इच्छाओं ने और सामुदायिक जुड़ाव का स्थान एकाकीपन की सोच ने ले लिया है। साथ ही बड़ी आबादी वाले हमारे देश में सामाजिक असमानता, बेरोजगारी और लैंगिक भेदभाव ने भी मानवीय जीवन से जुड़ी मुसीबतें बढ़ाई हैं। तकलीफदेह यह है कि सामाजिक हो या परिवेशगत, हर समस्या से जूझने में परिवार भी मददगार नहीं बन पा रहा है। सच तो यह है कि पारिवारिक स्तर पर ही उलझनों में घर बना लिया है। चिंता की बात यह भी है कि हालिया बरसों में यह जीवन का साथ छोड़ने का अहम कारण बन गया है। साल 2019 में भी आत्महत्या के चार बड़े कारणों में दो घर परिवार से जुड़े कारण ही थे। इनमें समग्र रूप से 29.2 लोगों ने पारिवारिक समस्याओं के चलते खुदकुशी की। दुखद है कि हमारे यहां कर्ज और बीमारी जैसे कारणों के चलते पूरे परिवार सामूहिक आत्महत्या जैसा कदम तक उठा रहे हैं। ऐसे में पारिवारिक मामलों में बढ़ती मुश्किलों को लेकर चेतना जरूरी हो चली है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (मनोज शर्मा)। यूपी में बारी-बारी से सपा या बसपा की सरकारें भी दशकों से 2017 तक आती रही। उस दरम्यान यूपी की छवि में कोई बदलाव नहीं आया। पूरे देश का जनमानस यूपी को लेकर वही जड़ उदासीन रहता था। सपा सत्ता में आती थी और उसके गिने चुने वही माफिया, अतीक मुख्तार, आजम खान अपना वर्चस्व दिखाते थे। मुस्लिम तुष्टिकरण, बहुसंख्यकों का मानमर्दन, चिर प्रतिद्वंद्वी बसपा समर्थको को ठिकाने लगाने और विकास के नाम पर सैफई महोत्सव का काम चलता था। बसपा आती थी तो सिर्फ सत्ता का ब्रांड बदलता था। धंधा वही रहता। दलित शौर्य के नाम पर सरकारी खजाने से हाथी की मूर्ति और सरकारी वसूली, कमाई , रंगदारी और विरोधियों को ठिकाने लगाने और मायावती का बर्थडे का काम जारी रहता था। एक बार बसपा के उपद्रवियों ने रीता बहुगुणा जोशी के घर में आग लगा दी थी। तत्काल इसके बाद उपद्रवियों के नेतृत्वकर्ता इंतजार आब्दी को यूपी गन्ना बोर्ड का निदेशक बना कर मायावती ने पुरस्कृत किया था। इसमें कोई संशय नहीं कि सपा और बसपा सुप्रीमो ने अकूत दौलत भी कमाई। यूपी के विकास का कोई बड़ा काम नहीं हुआ। यूपी बीमारू राज्य ही रहा। झारखंड-बिहार की तरह यूपी भी मजदूर सप्लाई करने वाला राज्य बना रहा। 2017 में योगी के आने के बाद बदलाव तो हुआ। अपराध पर एक हद तक नियंत्रण भी दिख। एयरपोर्ट, सड़कें बनीं। निवेश और उद्योग का पुरजोर प्रयास हुआ। यूपी में तुष्टिकरण और वोट के कारण आपराधिक तत्वों को जो छूट मिली थी, उसे कुंद किया गया। सबसे बड़ी बात कि योगी ने यूपी की बहुसंख्यक जनता के हारे हुये मानस को फिर से चार्ज किया। वरना इसी यूपी में पाकिस्तान की जीत पर पाक की जर्सी में युवा सड़क पर जश्न मनाते थे। यूपी में रह रहे कश्मीरी छात्र पाक की हार पर तोड़-फोड़ करते थे और मुलायम अखिलेश इसका बचाव करते थे। योगी राज में बहुत कुछ एक झटके में बदला। यूपी एक तरह से खुद को बीमारू राज्य के चोले को उतार फेंकने की राह पर है। कोरोना के समय का एक आंकड़ा है कि सबसे बड़ी, घनी आबादी और अधूरी चिकित्सा सुविधा वाला यूपी अन्य सक्षम राज्यों से ज्यादा सफलतापूर्वक महामारी से निबटने में कामयाब रहा। योगी को धन दौलत नहीं चाहिये। वो अकूत धन का क्या करेंगे? योगी में अखिलेश और माया कुनबे की तरह कोई माया नहीं। आप खुद सोचिये तो 2017 के बाद के यूपी की एक अलग छवि बनती है । योगी इस बार फिर सत्तासीन होंगे या नहीं, ये मैं नहीं जानता। पर उनका विजयी होना यूपी के लिये अच्छा होगा। क्योंकि वो धन दौलत, पारिवारिक माया-मोह से निर्लिप्त है़। उनका लक्ष्य सिर्फ यूपी को विकास के रास्ते पर ले जाना है। बेशक वो हर हाल में अखिलेश, मायावती, मुलायम से बेहतर सीएम साबित हुये हैं। योगी किसी भी हाल में झुक नहीं सकते और न ही अपराधी, शत्रुओं को माफ करते हैं। आगे यूपी की जनता जानें...(लेखक पत्रकारिता विभाग, रांची विश्वविद्यालय, रांची से जुड़े हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (गुरबचन सिंह)। आर्थिक विकास सकल घरेलू उत्पाद तथा आर्थिक कल्याण में इजाफा करने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। सुधारों का उद्देश्य भी यही है। हमने बार-बार यह देखा है कि इनका असर शेयर कीमतों पर भी पड़ता है। परंतु क्या वे शेयरों के बुनियादी मूल्यों पर भी सकारात्मक प्रभाव डालते हैं? यदि ऐसा नहीं है तो कीमतों के वापस अपने वास्तविक मूल्य पर आने पर निवेशकों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। इस पूरे मसले को समग्रता से समझना आवश्यक है। आर्थिक सुधार दो प्रकार के हो सकते हैं। पहली तरह के सुधार की बात करें तो इन सुधारों की शुरूआत होती है और फिर उन्हें एक नियामकीय संस्था (उदाहरण के लिए भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड) के गठन जैसे सार्थक उपायों की मदद से मजबूत बनाया जाता है। ऐसे भी सुधार हैं जिनकी मदद से दीर्घावधि के वास्तविक प्रतिफल में इजाफा किया जा सकता है और जिसे कारोबारी जगत विश्वसनीय ढंग से अंशधारकों को देने की प्रतिज्ञा कर सकता है। इन सुधारों की बदौलत शेयर कीमतों में इजाफा हो सकता है। इन सुधारों को विश्वसनीय प्रतिफल कहकर पुकार सकते हैं। दूसरी तरह के सुधार कारोबार में प्रवेश की बाधाओं को दूर करते हैं, प्रतिस्पर्धा तथा रचनात्मक विध्वंस को बढ़ावा देते हैं और किसी न किसी मोड़ पर स्वाभाविक एकाधिकार के विरोध की बुनियाद तैयार करते हैं। ये सुधार नए कारोबारों के लिए मुनाफा तैयार कर सकते हैं। बहरहाल, ऐसे सुधारों से मौजूदा कारोबारों के शेयरों का बुनियादी मूल्य बढ?े के बजाय कम होता है। चूंकि अधिकांश शेयर पोर्टफोलियो में मौजूदा कंपनियों के शेयर शामिल होते हैं इसलिए यह शेयरधारक के लिए सुधारों का नकारात्मक प्रभाव साबित होता है। नए कारोबारों के शेयरों की बात करें तो निश्चित रूप से संस्थापक, एंजेल निवेशक आदि जो सफलता की कहानियों में शामिल होते हैं, उन्हें उल्लेखनीय लाभ हासिल होता है। परंतु वह औसत कीमत जिस पर वे स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध होते हैं, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि नए शेयरधारकों के लिए काफी लाभ नहीं रह जाता है। इसलिए एक बार फिर कहेंगे कि सुधार के बाद सामान्य शेयरधारकों के लिए ज्यादा कुछ नहीं रह जाता। एक उदाहरण पर विचार कीजिए। अगर लाइसेंस-परमिट-कोटा राज के अवशेष (किसी न किसी रूप में इनमें से कई मौजूद हैं) नष्ट किए जाते हैं तो नए कारोबारों के लिए रास्ता निकल सकता है। अर्थव्यवस्था को लाभ हो सकता है लेकिन मौजूदा कारोबारों का प्रदर्शन अपेक्षाकृत खराब रह सकता है। ऐसे में उनकी शेयरधारिता पर संभावित रूप से नकारात्मक प्रभाव हो सकता है। बेहतर शब्द की अनुपस्थिति में हम इन सुधारों को आर्थिक प्रगति का नाम देते हैं। ऐसे में विश्वसनीय प्रतिफल से जुड़े सुधार जहां शेयरों के मूल्य में इजाफा करते हैं वहीं आर्थिक प्रगति के लिए किए जाने वाले सुधार शेयरों के मूल्य में कमी की वजह भी बन सकते हैं। कुल मिलाकर यही कह सकते हैं कि शेयर मूल्यों पर सुधारों का सीमित सकारात्मक प्रभाव होता है। यह सामान्य विचार के विपरीत है जो एक गलत समझ पर आधारित है न कि रुझानों पर। शेयर बाजार में कई बार रुझानों को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। यह दिलचस्प है कि शेयर बाजार के निवेशक अक्सर विश्वसनीय प्रतिफल दिलाने वाले सुधारों को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंतित नहीं रहते। लेकिन कीमतों पर उस समय सकारात्मक असर होता है जब आर्थिक सुधार से संबंधित प्रगति होती है। कई अवसरों पर सुधार के संकेत मिलने पर ही कीमतों में इजाफा होने लगता है और फिर सुधार होने के बाद इसमें दोबारा तेजी आती है। हकीकत को देखते हुए यह विडंबनापूर्ण लगता है। इन सब बातों के बीच हालिया उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना कहां नजर आती है? यह कॉपोर्रेट क्षेत्र के लिए जरूर उपयोगी है। बहरहाल, एक व्यापक चिंता भी है। वह यह कि प्रोत्साहन बनाम सब्सिडी, प्रतिस्पर्धा बनाम अल्पाधिकार और नियम बनाम विवेकाधिकार जैसे मसलों से काम नहीं चलेगा। पीएलआई योजनाओं को योजना को करों की मदद से वित्तीय मदद मुहैया करने की आवश्यकता है। बीते दो वर्षों में तेल से उच्च कर राजस्व प्राप्ति तथा उच्च मुद्रास्फीति कर ध्यान में आते हैं। ये बातें अर्थव्यवस्था को क्षति पहुंचाती हैं। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि हमारे यहां सुधार एकदम स्पष्ट हैं या नहीं? यह सही है कि न केवल शेयर कीमतों बल्कि उनके मूल्यांकन पर भी सकारात्मक प्रभाव बड़ी मुश्किल से ही अस्पष्ट होता है। लेकिन इसका संबंध सुधार की भूमिका के बजाय सरकार के समर्थन से अधिक हो सकता है। पीएलआई योजनाओं की तुलना लाइसेंस राज के बचेखुचे अवशेषों को खत्म करने से करते हैं। पीएलआई योजनाओं में जहां अतिरिक्त कर शामिल होते हैं, वहीं लाइसेंस राज वाली व्यवस्था में बिना किसी तरह के अतिरिक्त कर बोझ के भी अर्थव्यवस्था में सुधार लाया जा सकता है, कोविड-19 के दौर में आम आदमी पर अतिरिक्त कर बोझ की बात तो छोड़ ही दें। कहने की आवश्यकता नहीं है कि सरकार अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त नियंत्रण और अतिशय नियमन से नहीं निपट रही है। इस स्थिति में ये सुधार अर्थव्यवस्था के लिए लाभदायक साबित हो सकते हैं। परंतु फिर भी हमारे यहां शेयरों की कीमत बहुत सीमित मात्रा में ही मजबूत होती दिखी है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि यहां बात शेयर बाजार में निवेश को हतोत्साहित करने की नहीं है बल्कि उसे सही परिदृश्य में प्रस्तुत करने की है। (लेखक भारतीय सांख्यिकी संस्थान, दिल्ली केंद्र के अतिथि प्राध्यापक हैं)।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (पवन)। भारत के गणतंत्र का, सारे जग में मान है, दशकों से खिल रही, उसकी अदभुत शान हैं। 26 जनवरी 1950 को, हमारा देश भारत संप्रभु, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, और लोकतांत्रिक, गणराज्य के रुप में घोषित हुआ। गणतंत्र दिवस मनाने का मुख्य कारण यह है कि इस दिन हमारे देश का संविधान प्रभाव में आया था।26 जनवरी 1950 के दिन भारत सरकार अधिनियम को हटाकर भारत के नवनिर्मित संविधान को लागू किया गया। इसलिए उस दिन से 26 जनवरी के इस दिन को भारत में गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। यह भारत के तीन राष्ट्रीय पर्वों में से एक है। इस दिन पहली बार 26 जनवरी 1930 में पूर्ण स्वराज का कार्यक्रम मनाया गया। जिसमें अंग्रेजी हुकूमत से पूर्ण आजादी के प्राप्ति का प्रण लिया गया था। इस दिन का सबसे विशेष कार्यक्रम परेड का होता है, जिसे देखने के लिए लोगों में काफी उत्साह होता है। यह वह कार्यक्रम होता है, जिसके द्वारा भारत अपने सामरिक तथा कूटनीतिक शक्ति का भी प्रदर्शन करता है और विश्व को यह संदेश देता है कि हम अपने रक्षा में सक्षम है। आज हमारा संविधान विभन्न बीमारियों से ग्रसित हो गया है। भ्रष्टाचार, बलात्कार, प्रदूषण, जनसंख्या नियंत्रण जैसे अनेक समस्याओं ने भारत मां को लहूलुहान कर दिया है। आज भी हमारा गणतंत्र कितनी ही कंटीली झाड़ियों में फंसा हुआ प्रतीत होता है। अनायास ही हमारा ध्यान गणतंत्र की स्थापना से लेकर क्या पाया, क्या खोया के लेखे-जोखे की तरफ खींचने लगता है। इस ऐतिहासिक अवसर को हमने मात्र आयोजनात्मक स्वरूप दिया है, अब इसे प्रयोजनात्मक स्वरूप दिये जाने की जरूरत है। इस दिन हर भारतीय को अपने देश में शांति, सौहार्द और विकास के लिये संकल्पित होना चाहिए। बीआर अंबेडकर ने भी समस्याओ के समाधान हेतु कानून लाने के बारे में कहा था- कानून व व्यवस्था राजनीतिक शरीर की दवा है और जब राजनीतिक शरीर बीमार पड़ने लगे तो दवा जरुर देनी चाहिए। अपनी ममता से देश का बचपन संवारने वाली महिलाओ के साथ हो रहे अनेक प्रकार की हिंसा से उन्हें घायल कर दिया जाता है। एक तरफ लड़किया भारत का नाम विश्व मंच पर रौशन कर रही है वहीं दूसरी ओर महिलाओं का बलात्कार किया जाता है, तेजाब फेंक उन्हें झुलसाया जाता है और दहेज के लिए मार दिया जाता है। क्या सच में संविधान में जो अधिकार महिलाओं को मिले है उनको अब तक मिल पाया है? सात दशक बाद भी सवालों का परचम लहराती हुई नारी पूरे भारत के सामने जबाब के लिए खड़ी है। प्रश्न यह है कि नारी के उदर से जन्म लेकर उसकी गोद मे मचल कर, माता की ममता, बहन की स्नेह, प्रेयसी का प्यार तथा पत्नी का समर्पण पा कर भी पुरूष नारी के प्रति पाषाण कैसे बन गया? आखिर विवशता की आग में कब तक जलती रहेगी महिलाएं! तमाम चीजें सवाल बनकर संविधान के समक्ष खड़ा है। कब तक महिलाओ को वो सामाजिक अधिकार मिलेगा जो संविधान ने दिए हैं? राजनीतिक व्यवस्था से समाज में चुस्त, ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ, अनुशासित कानून बनाया जाए और प्रत्येक नागरिक चाहे जो कोई हो बेरोजगार या अमीर, सेवादार या किसान सब अपनी प्रत्यक्ष संपत्ति जायदाद का खुलासा करें कि जो भी चल-अचल धन है वही है और अप्रत्यक्ष कहीं भी देश या विदेश में मिलने पर जब्त होगा तो सजा मिलेगी। हमारी ज्यादातर प्रतिबद्धताएं व्यापक न होकर संकीर्ण होती जा रही हैं जो कि राष्ट्रहित के खिलाफ हैं। राजनैतिक मतभेद भी नीतिगत न रह व्यक्तिगत होते जा रहे हैं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अंकित सिंह)। देश नेताजी का 125वां जन्मोत्सव मना रहा है। दुनिया के इतिहास में नेताजी जैसा कोई दूसरा व्यक्ति अब तक सामने नहीं आया जिसने ब्रितानी सरकार को बुरी तरह पराजित किया। आज देश उन्हें याद कर रहा है स्मरण कर रहा है। उनकी भव्य प्रतिमा दिल्ली में लगाने की तैयारी चल रही है। नेताजी की एक भव्य प्रतिमा का अनावरण दिल्ली में किया जाएगा, जो स्थान अंग्रेज वायसराय के मूर्ति हटाने के बाद खाली थी और महत्वपूर्ण स्थान पर थी। मोदी सरकार का फैसला, अब 23 जनवरी से शुरू होगा गणतंत्र दिवस समारोह, सुभाष चंद्र बोस की जयंती भी इसमें शामिल होगी। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसी को लेकर ममता बनर्जी को पत्र लिखा है। अपने पत्र में राजनाथ सिंह ने कहा कि देश की आजादी के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस का योगदान प्रत्येक भारतीय के लिए अविस्मरणीय है। गणतंत्र दिवस के अवसर पर होने वाली झांकी हर साल आकर्षण का केंद्र रहती हैं। इनमें विभिन्न राज्यों की झांकी शामिल होती हैं। इस बार पश्चिम बंगाल की झांकी को अवसर नहीं मिल पाया है। इसी को लेकर ममता बनर्जी लगातार केंद्र सरकार पर आरोप लगा रही हैं। ममता बनर्जी ने गणतंत्र दिवस परेड से नेताजी सुभाष चंद्र बोस के 125 वीं जयंती वर्ष पर उनके और आजाद हिंद फौज के योगदान से जुड़़ी पश्चिम बंगाल की झांकी को बाहर करने के केंद्र के फैसले पर हैरानी जता दी। ममता बनर्जी ने तो यह भी कह दिया कि झांकी को हटाया जाना स्वतंत्रता सेनानियों का कद घटाने और उनके महत्व को कमतर करने के समान है। दूसरी ओर कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने भी इस मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार पर हमला किया। अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि पश्चिम बंगाल के लोगो, इसके सांस्कृतिक विरासत और हमारे महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस का यह अपमान है। दूसरी ओर केंद्र सरकार का दावा इससे बिल्कुल अलग है। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसी को लेकर ममता बनर्जी को पत्र लिखा है। अपने पत्र में राजनाथ सिंह ने कहा कि देश की आजादी के लिए नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का योगदान प्रत्येक भारतीय के लिए अविस्मरणीय है। इसी भावना को सर्वोपरि रखते हुए माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेताजी के जन्मदिवस, 23 जनवरी के दिन को पराक्रम दिवस के रूप में घोषित किया है। इसके साथ ही राजनाथ सिंह ने कहा कि अब से हर बार गणतंत्र दिवस समारोह की शुरूआत नेताजी के जन्मदिवस 23 जनवरी से शुरू होकर 30 जनवरी को समापन किया जाएगा। वर्तमान सरकार नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और पश्चिम बंगाल के सभी स्वाधीनता सेनानियों के प्रति कृतज्ञ है। उन्होंने कहा कि हमारी सरकार ने 1943 में निर्वासन में बनी नेताजी की सरकार की 75वीं वर्षगांठ 2018 में बड़ी धूमधाम से मनाई थी। यह हमारी सरकार थी जिसने गणतंत्र दिवस परेड में आजाद हिंद फौज के जीवित सैनिकों को शामिल किया और उनका अभिनंदन किया। इस बीच, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की प्रदेश इकाई के प्रवक्ता समिक भट्टाचार्य ने इस बारे में पूछे जाने पर कहा कि उनकी पार्टी कभी भी देशभक्तों और प्रतीकों पर राजनीति नहीं करती। उन्होंने कहा, कुछ तकनीकी कारणों से अस्वीकार किया गया होगा। हमारी सरकार और भाजपा नेताजी के अपार योगदान के बारे में अवगत है और हम उन्हें अपने आदर्श और राष्ट्रीय नायक के रूप में देखते हैं। भाजपा कभी भी नेताजी जैसे देशभक्तों पर राजनीति नहीं करती। तृणमूल कांग्रेस इस मामले का राजनीतिकरण कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे एक पत्र में, बनर्जी ने बोस और उनकी आजाद हिंद फौज पर आधारित राज्य की झांकी को अस्वीकार करने पर आश्चर्य व्यक्त किया था। झांकी में रवींद्रनाथ टैगोर, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी विवेकानंद और श्री अरबिंदो जैसे अन्य बंगाली प्रतीक भी शामिल थे।
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