एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पूरी दुनिया में 9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 1874 में इसी दिन यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का गठन करने के लिए स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में 22 देशों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किया था। 1969 में जापान के टाकियो शहर में आयोजित सम्मेलन में विश्व डाक दिवस के रूप में इसी दिन को चयन किये जाने की घोषणा की गयी थी। 01 जुलाई 1876 को भारत यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का सदस्य बनने वाला भारत पहला एशियाई देश था। जनसंख्या और अंतरराष्ट्रीय मेल ट्रैफिक के आधार पर भारत शुरू से ही प्रथम श्रेणी का सदस्य रहा है।
भारत में डाकघर का इतिहास ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के समय से शुरू होता है जब रॉबर्ट क्लाइव ने 1766 में पहली डाक व्यवस्था स्थापित की। वॉरेन हेस्टिंग्स ने 1774 में कोलकाता में पहला डाकघर खोला और 1854 में लॉर्ड डलहौजी ने भारत में एक राष्ट्रीय डाक सेवा की शुरूआत की। आज भारतीय डाक दुनिया के सबसे बड़े डाक नेटवर्क में से एक है जो बैंकिंग, बीमा और अन्य सेवाओं के साथ आम आदमी का भरोसेमंद साथी है। 01 अक्टूबर 1854 को भारतीय डाक विभाग की स्थापना के साथ भारत में पहली बार डाक टिकट भी जारी किया गया था।
विश्व डाक दिवस का मकसद देश के सामाजिक और आर्थिक विकास में डाक क्षेत्र के योगदान के बारे में जागरुकता पैदा करना है। दुनिया भर में प्रत्येक वर्ष 150 से ज्यादा देशों में विविध तरीकों से विश्व डाक दिवस आयोजित किया जाता है। भारतीय डाक प्रणाली का जो उन्नत और परिष्कृत स्वरूप आज हमारे सामने है, वह लंबे सफर की देन है। अंग्रेजों ने डेढ़ सौ साल पहले अलग-अलग हिस्सों में अपने तरीके से चल रही डाक व्यवस्था को एक सूत्र में पिरोने की पहल की थी। उन्होने भारतीय डाक को नया रूप-रंग दिया। पर अंग्रेजों की डाक प्रणाली उनके सामरिक और व्यापारिक हितों पर केंद्रित थी।
हमारे देश में पहले डाक विभाग का इतना अधिक महत्व था कि फिल्मों तक में डाकिये पर कई मशहूर गाने फिल्माये गये हैं। मगर अब नजारा पूरी तरह से बदल चुका है। इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव ने डाक विभाग के महत्व को बहुत कम कर दिया है। आज लोगों ने हाथों से चिट्ठियां लिखना छोड़ दिया है। अब ई-मेल, वाट्सएप व सोशल मीडिया, इंटरनेट के माध्यमों से मिनटो में लोगो में संदेशों का आदान प्रदान हो जाता है।
आज डाक में लोगों की चिट्ठियां तो गिनती की ही आती है। मनीआर्डर भी बन्द ही हो गये हैं। मगर डाक से अन्य सरकारी विभागों से संबंधित कागजात, बैंकों व अन्य संस्थानो के प्रपत्र काफी संख्या में आने से डाक विभाग का महत्व फिर से एक बार बढ़ गया है। डाक विभाग कई दशकों तक देश के अंदर ही नहीं बल्कि एक देश से दूसरे देश तक सूचना पहुंचाने का सर्वाधिक विश्वसनीय, सुगम और सस्ता साधन रहा है। लेकिन इस क्षेत्र में निजी कम्पनियों के बढ़ते दबदबे और फिर सूचना तकनीक के नये माध्यमों के प्रसार के कारण डाक विभाग की भूमिका लगातार कम होती गयी है। वैसे इसकी प्रासंगिकता पूरी दुनिया में आज भी बरकरार है।
भारत में डाक विभाग के महत्व को मशहूर शायर निदा फाजली के शेर-सीधा-साधा डाकिया जादू करे महान, एक ही थैले में भरे आंसू और मुस्कान से समझा जा सकता है। शायर निदा फाजली ने जब यह शेर लिखा था उस वक्त देश में संदेश पहुंचाने का डाक विभाग ही एकमात्र साधन था। डाकिये के थैले में से निकलने वाली चिट्ठी पढ़कर कोई खुश होता था तो कोई दुखी। कुछ वर्ष पूर्व तक डाक विभाग हमारे जनजीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा होता था। गांव में जब डाकिया आता था तो बच्चे-बूढ़े सभी उसके साथ डाक घर की तरफ इस उत्सुकता से चल पड़ते थे कि उनके भी किसी परिजन की चिट्ठी आयेगी।
डाकिया जब नाम लेकर एक-एक चिट्ठी बांटना शुरू करता तो लोग अपनी या अपने पड़ोसी की चिट्ठी ले लेते व उसके घर जाकर उस चिट्ठी को बड़े चाव से देते थे। उस वक्त शिक्षा का प्रसार ना होने से अक्सर महिलायें अनपढ़ होती थी। इसलिए चिट्ठी लाने वालों से ही चिट्ठियां पढ़वाती भी थी और लिखवाती भी थी। कई बार चिट्ठी पढ़ने-लिखने वाले बच्चों को ईनाम स्वरूप कुछ पैसा या खाने को गुड़, पताशे भी मिल जाया करते थे। इसी लालच में बच्चे ज्यादा से ज्यादा घरों में चिट्ठियां पहुंचाने का प्रयास करते थे।
उस वक्त गांवों में बैक शाखा नहीं होती थी। इस कारण बाहर कमाने गये लोग अपने घर पैसा भी डाक में मनीआर्डर से ही भेजते थे। मनीआर्डर देने डाकिया स्वयं प्राप्तकर्ता के घर जाता था व भुगतान के वक्त एक गवाह के भी हस्ताक्षर करवाता था। डाक विभाग अति आवश्यक संदेश को तार के माध्यम से भेजता था। तार की दर अधिक होने से उसमें संक्षिप्त व जरूरी बातें ही लिखी जाती थी। तार भी साधारण और जरूरी होते थे। जरूरी तार की दर सामान्य से दोगुनी होती थी। देश में पहली बार 11 फरवरी 1855 को शुरू हुई तार सेवा को सरकार ने 15 जुलाई 2013 से बन्द कर दिया है। इसके साथ ही डाक विभाग ने रजिस्टर्ड डाक सेवा को भी 01 अक्टूबर 2025 से स्पीड पोस्ट में विलय कर दिया है।
भारतीय डाक विभाग पिनकोड नंबर (पोस्टल इंडेक्स नंबर) के आधार पर देश में डाक वितरण का कार्य करता है। पिनकोड नंबर का प्रारम्भ 15 अगस्त 1972 को किया गया था। इसके अंतर्गत डाक विभाग द्वारा देश को नो भौगोलिक क्षेत्रों में बांटा गया है। संख्या 1 से 8 तक भौगोलिक क्षेत्र हैं व संख्या 9 सेना की डाक सेवा को आवंटित किया गया है। पिन कोड की पहली संख्या क्षेत्र दूसरी संख्या उपक्षेत्र, तीसरी संख्या जिले को दर्शाती है। अंतिम तीन संख्या उस जिले के विशिष्ट डाकघर को दर्शाती है।
डाक विभाग के अंतर्गत केंद्र सरकार ने इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक (आईपीपीबी) शुरू किया है। देश के हर व्यक्ति के पास बैंकिंग सुविधाएं पहुंचाने के क्रम में यह एक बड़ा विकल्प होगा। इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक ने देशभर में बैंकिंग सेवाएं शुरू कर दी है। आने वाले दिनों में इस के माध्यम से देश का सबसे बड़ा बैंकिंग नेटवर्क अस्तित्व में आयेगा, जिसकी हर गांव तक मौजूदगी होगी। इन सेवाओं के लिए पोस्ट विभाग के 11000 कर्मचारी घर-घर जाकर लोगों को बैंकिंग सेवाएं देंगे।
बदलते हुए तकनीकी दौर में दुनिया भर की डाक व्यवस्थाओं ने मौजूदा सेवाओं में सुधार करते हुए खुद को नयी तकनीकी सेवाओं के साथ जोड़ा है। डाक, पार्सल, पत्रों को गंतव्य तक पहुंचाने के लिए एक्सप्रेस सेवाएं शुरू की हैं। डाक घरों द्वारा मुहैया करायी जानेवाली वित्तीय सेवाओं को भी आधुनिक तकनीक से जोड़ा गया है। दुनियाभर में इस समय 55 से भी ज्यादा विभिन्न प्रकार की पोस्टल ई-सेवाएं उपलब्ध हैं। भविष्य में पोस्टल ई-सेवाओं की संख्या और अधिक बढ़ायी जायेगी। डाक विभाग से 82 फीसदी वैश्विक आबादी को होम डिलीवरी का फायदा मिलता है।
भारत की आजादी के बाद हमारी डाक प्रणाली को आम आदमी की जरूरतों को केंद्र में रख कर विकसित करने का नया दौर शुरू हुआ था। नियोजित विकास प्रक्रिया ने ही भारतीय डाक को दुनिया की सबसे बड़ी और बेहतरीन डाक प्रणाली बनाया है। राष्ट्र निर्माण में भी डाक विभाग ने ऐतिहासिक भूमिका निभायी है। जिससे इसकी उपयोगिता लगातार बनी हुई है। आज भी आम आदमी डाकघरों और डाकिये पर भरोसा करता है। तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद देश में आम जनता का इतना विश्वास कोई और संस्था नहीं अर्जित कर सकी है। यह स्थिति कुछ सालों में नहीं बनी है, इसके पीछे डाक विभाग के कार्मिकों का बरसों का श्रम और लगातार प्रदान की जा रही सेवा छिपी है। (लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हजारीबाग की धरती हमेशा से अपनी सादगी, अध्यात्म और आस्था के लिए जानी जाती रही है। इस धरती ने अनेक संत, विद्वान और कर्मयोगी जन्मे हैं जिन्होंने न केवल समाज का मार्गदर्शन किया बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी दिशा दी। इसी पावन धरती से एक स्वर उठा था जय माई, जो धीरे-धीरे श्रद्धा, विश्वास और साधना का प्रतीक बन गया। यह स्वर था पंडित अवधेश पाठक का, जिनका जीवन एक दीपक की तरह रहा जो ज्ञान, भक्ति और सेवा के प्रकाश से संसार को आलोकित करता रहा।
आज जब वह स्वर स्मृतियों में विलीन हो चुका है, तब ऐसा लगता है जैसे हजारीबाग की मिट्टी से उठी एक गूंज सन्नाटे में समा गयी हो। परंतु यह गूंज केवल ध्वनि नहीं थी, यह उस आत्मा की पुकार थी जिसने धर्म को मानवता के साथ जोड़ा और जीवन को साधना का पर्याय बना दिया। ज्योतिषाचार्य सह शिक्षाविद् डॉ. साकेत कुमार पाठक ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि अवधेश पाठक का जीवन केवल एक व्यक्ति की कथा नहीं, बल्कि एक ऐसी परंपरा का परिचय है, जो भारतीय संस्कृति की आत्मा में बसी हुई है।
उनका जन्म 12 मई 1957 को टाटीझरिया प्रखंड के खम्भवा गांव में हुआ, और यह दिन इस क्षेत्र के लिए केवल एक बालक के जन्म का नहीं, बल्कि एक युग की शुरूआत का प्रतीक बन गया। उनके पिता श्री मोहन पाठक स्वयं एक ज्योतिषाचार्य, तांत्रिक साधक और अद्वितीय विद्वान थे। उन्होंने अपने पुत्र के भीतर जो संस्कार रोपे, वही आगे चलकर समाज में एक ऐसी छवि के रूप में प्रकट हुए, जहां ज्ञान, आस्था और सेवा का अद्भुत संगम दिखाई देता था। डॉ. पाठक ने कहा कि अवधेश पाठक जी का व्यक्तित्व बहुआयामी था।
वे केवल एक ज्योतिषाचार्य नहीं, बल्कि एक दार्शनिक, कलाकार, समाजसेवी और मानवीय संवेदनाओं के मूर्त रूप थे। उनका जीवन कर्मकांड या पंडिताई के दायरे में सीमित नहीं था। वे जीवन को एक साधना मानते थे और हर कार्य को ईश्वर की सेवा का माध्यम समझते थे। उनके मुख से निकला जय माई केवल एक उद्घोष नहीं था, वह उनके अस्तित्व का प्रतीक था। उनके लिए माई शक्ति थी, आस्था थी, मातृत्व था और समर्पण का स्वरूप थी। जब वे किसी कठिन निर्णय के क्षण में जय माई कहते, तो वह केवल शब्द नहीं, बल्कि एक आत्मिक ऊर्जा का उद्गार होता था।
उन्होंने कहा कि अवधेश पाठक जी का प्रभाव केवल अपने गांव या राज्य तक सीमित नहीं था। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और मुंबई जैसे महानगरों तक उनका नाम श्रद्धा से लिया जाता था। फिल्म इंडस्ट्री में उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। वहाँ भी वे ज्योतिष के मार्गदर्शक के रूप में नहीं, बल्कि एक परामर्शदाता और सांस्कृतिक दूत के रूप में देखे जाते थे। उन्होंने अनेक फिल्मों और धारावाहिकों के नाम सुझाए, शुभ मुहूर्त तय किये और कई कलाकारों के जीवन में सही दिशा देने का कार्य किया। बड़े-बड़े निर्माता और अभिनेता उनके निर्णयों को अंतिम मानते थे।
कई बार फिल्म सेट पर जब विवाद या तनाव होता, तब उनका शांत, संयमित और मधुर व्यवहार वातावरण को शीतल बना देता था। उनके स्नेहपूर्ण शब्द सबके मन में विश्वास का संचार करते थे। यही कारण था कि इंडस्ट्री में लोग उन्हें केवल पंडित जी नहीं, बल्कि पथप्रदर्शक कहा करते थे। डॉ. पाठक ने भावुक होकर कहा कि अवधेश पाठक की सबसे बड़ी विशेषता थी— उनका सर्वधर्म समभाव। वे मंदिर में आरती करते थे, तो मजार पर इबादत में भी उतनी ही श्रद्धा से सिर झुकाते थे। वे गुरुद्वारे में गुरु वाणी सुनते थे, और चर्च में उपदेशों को आत्मसात करते थे।
उनके लिए धर्म का अर्थ सीमाएं खड़ी करना नहीं, बल्कि मनुष्यता के भीतर प्रेम, करुणा और शांति की अनुभूति कराना था। वे मानते थे कि धर्म यदि विभाजन करे तो वह धर्म नहीं, बल्कि अज्ञान है। उनके जीवन का यही दर्शन उन्हें समाज के हर वर्ग के बीच सम्मानित बनाता था। डॉ. पाठक ने कहा कि अवधेश पाठक की ज्योतिषीय प्रतिभा अतुलनीय थी। ग्रहों और नक्षत्रों की गणना उनके लिए केवल गणित नहीं, एक गूढ़ आध्यात्मिक संवाद था। वे कहा करते थे कि ग्रह जीवन का लेखा नहीं लिखते, वे केवल चेतावनी देते हैं। भाग्य नहीं, बुद्धि और श्रद्धा ही मनुष्य को दिशा देती है।
उनके इस दृष्टिकोण ने ज्योतिष को अंधविश्वास से मुक्त कर वैज्ञानिकता और मानवता के धरातल पर प्रतिष्ठित किया। कई बार जब लोग उनके पास समस्याएँ लेकर आते, तो वे समाधान के साथ जीवन का नया दृष्टिकोण भी दे जाते। वे कहते, समस्या कोई बाहरी शक्ति नहीं, वह हमारे भीतर के संतुलन की परीक्षा है। इसीलिए उनके पास जाकर लौटने वाला व्यक्ति केवल भविष्यवाणी नहीं, आत्मबल लेकर लौटता था। उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा, पर उन्होंने कभी हार नहीं मानी। बड़े बेटे की असमय मृत्यु ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया, लेकिन उन्होंने अपने दु:ख को भक्ति में रूपांतरित कर दिया।
प्रमेह और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों ने उन्हें घेरा, गैंगरिन के कारण पैर की अंगुली तक खोनी पड़ी, परंतु उनकी आस्था ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा। वे कहा करते थे कि शरीर कष्ट में हो सकता है, लेकिन आत्मा को कोई रोग नहीं छू सकता। हर पीड़ा में उनका संबल था जय माई । यही वह उद्घोष था जिसने उन्हें हर संकट से पार लगाया। अवधेश पाठक का जीवन आधुनिक समाज के लिए एक आदर्श है, जहां आस्था को विज्ञान से और धर्म को मानवता से जोड़ना आवश्यक हो गया है।
उन्होंने यह दिखाया कि ज्योतिष केवल भविष्य बताने की कला नहीं, बल्कि जीवन को अनुशासित और उद्देश्यपूर्ण बनाने की विद्या है। वे शिक्षा और संस्कार को सबसे बड़ा धर्म मानते थे। अपने बच्चों में उन्होंने वही संस्कार रोपे, जो उन्हें अपने पिता से मिले थे सत्य, संयम और सेवा। उन्होंने कहा कि अवधेश पाठक जी का जीवन यह भी सिखाता है कि महानता केवल प्रसिद्धि से नहीं आती, बल्कि विनम्रता और समर्पण से बनती है। वे चाहे किसी बड़े मंच पर हों या छोटे गाँव की चौपाल में, उनके व्यवहार में कभी भेद नहीं होता था। वे सभी से समान आत्मीयता से मिलते।
यही कारण था कि वे हर वर्ग, हर समुदाय और हर पीढ़ी के लिए समान रूप से प्रिय रहे। उनके जीवन में विरोध नहीं, संवाद था, आलोचना नहीं, स्वीकार था, और दूरी नहीं, अपनत्व था। कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी उनका योगदान अमूल्य रहा। उन्होंने कई हिंदी और भोजपुरी फिल्मों में अभिनय किया। उनके अभिनय में वही सरलता थी जो उनके जीवन में थी। उनके चेहरे पर भाव नहीं, दर्शन झलकता था। वे मंच पर नहीं, समाज में अभिनय करते थे सादगी, श्रद्धा और सेवा के अभिनय का। उनके लिए अभिनय एक कला नहीं, बल्कि जीवन की अभिव्यक्ति थी।
वे कहा करते थे कि कला तभी दिव्य है जब वह मनुष्य के भीतर की अच्छाई को जगाये। अवधेश पाठक जैसे व्यक्तित्व दुर्लभ होते हैं। उन्होंने समाज को यह सिखाया कि ज्ञान और आस्था, विज्ञान और भक्ति, तर्क और संवेदना ये सब विरोधी नहीं, एक ही वृक्ष की शाखाएं हैं। उन्होंने इन सबको अपने जीवन में पिरोया और एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जो आज की पीढ़ी के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है। आज जब हम उन्हें स्मरण करते हैं, तो यह केवल शोक का क्षण नहीं, आत्मचिंतन का भी अवसर है।
हम ऐसे युग में हैं जहां लोग धर्म के नाम पर विभाजित हो रहे हैं, जहां विश्वास पर संदेह और संवाद पर शोर का पहरा है। ऐसे समय में अवधेश पाठक जैसे लोग हमें याद दिलाते हैं कि सच्चा धर्म वह है जो जोड़ता है, न कि तोड़ता है। वे कहते थे कि मनुष्य की सबसे बड़ी पूजा है किसी के दु:ख को कम करना। यही उनका जीवन-मंत्र था। डॉ. पाठक ने कहा कि उन्होंने स्वयं अवधेश पाठक जी के सान्निध्य में जीवन के अनेक गूढ़ अर्थ सीखे। वे कहते हैं कि अवधेश जी से मैंने यह सीखा कि विद्वता तब तक अधूरी है जब तक उसमें करुणा का भाव न हो। उनके सान्निध्य में बैठना किसी ग्रंथ के अध्ययन से कम नहीं था।
उनके एक-एक शब्द में अनुभव की रोशनी होती थी, जो जीवन की दिशा दिखा जाती थी। उन्होंने कहा कि आज जब हम जय माई कहते हैं, तो वह केवल श्रद्धा का शब्द नहीं, बल्कि उस आस्था की ध्वनि है जो अवधेश पाठक के जीवन से निकलकर हमारे भीतर बस गयी है। उनका जाना हमारे लिए एक युगांत है, परंतु उनकी स्मृति, उनकी विचारधारा और उनकी वाणी अमर है। वे शरीर से चले गए, पर विचार बनकर इस समाज के हर आस्तिक, हर साधक और हर कर्मशील व्यक्ति के भीतर जीवित हैं। हजारीबाग की यह भूमि, जिसने उन्हें जन्म दिया, अब उनकी स्मृतियों की रक्षक बन गयी है।
जब भी इस मिट्टी पर कोई दीप जलेगा, कोई आरती गूंजेगी, तो उसमें जय माई? की वही अनुगूंज सुनाई देगी जो कभी अवधेश पाठक की वाणी से निकलती थी। वे केवल अपने परिवार या अनुयायियों के नहीं, बल्कि इस पूरे क्षेत्र की आत्मा थे। डॉ. पाठक ने अंत में कहा कि अवधेश पाठक जी का जाना एक रिक्तता है, पर उनकी शिक्षाएं हमारे भीतर ऊर्जा बनकर जीवित हैं। उन्होंने हमें यह सिखाया कि धर्म का अर्थ भय नहीं, प्रेम है, साधना का अर्थ पलायन नहीं, कर्म है और भक्ति का अर्थ केवल नमस्कार नहीं, सेवा है। वे कहते थे कि ईश्वर वही है जो तुम्हारे भीतर है, उसे खोजो और उसका आभार मानो।
यही उनका अंतिम संदेश था। आज जब लोग उन्हें याद करते हैं, तो आंसुओं में भी मुस्कान है, क्योंकि उनके जीवन की सार्थकता दु:ख से नहीं, प्रेरणा से मापी जाती है। वे चले गए, पर उनके विचार अब भी हवा में तैरते हैं, मंदिर की घंटियों में गूंजते हैं, आरती के दीपों में झिलमिलाते हैं और हर उस हृदय में बसते हैं जहां सच्ची भक्ति जीवित है। हजारीबाग की धरती साक्षी है उस युग की, जब एक व्यक्ति ने अपने जीवन से यह दिखाया कि आस्था और विज्ञान, पूजा और सेवा, संस्कार और आधुनिकता सब एक साथ चल सकते हैं।
अवधेश पाठक ने हमें यह सिखाया कि सच्ची महानता ज्ञान में नहीं, विनम्रता में है; पद में नहीं, सेवा में है और पूजा में नहीं, मानवता में है। आज जब यह संपादकीय शब्दों में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है, तो यह केवल स्मृति नहीं, एक प्रतिज्ञा भी है कि हम उनके दिखाए मार्ग पर चलेंगे, उनके विचारों को जीवित रखेंगे, और जय माई की उस गूंज को आने वाले समय तक संजोये रखेंगे। उनकी आत्मा को शांति मिले, और उनका आदर्श इस समाज में सदा प्रकाश बनकर चमकता रहे। हजारीबाग ने उन्हें जन्म दिया, पर अब पूरा भारत उन्हें स्मरण करेगा, क्योंकि ऐसे लोग शरीर से भले ही चले जायें, पर आत्मा से कभी नहीं मरते।
राष्ट्र साधना के 100 वर्ष
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। 100 वर्ष पूर्व विजयदशमी के महापर्व पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना हुई थी। ये हजारों वर्षों से चली आ रही उस परंपरा का पुनर्स्थापन था, जिसमें राष्ट्र चेतना समय-समय पर उस युग की चुनौतियों का सामना करने के लिए, नए-नए अवतारों में प्रकट होती है। इस युग में संघ उसी अनादि राष्ट्र चेतना का पुण्य अवतार है। ये हमारी पीढ़ी के स्वयंसेवकों का सौभाग्य है कि हमें संघ के शताब्दी वर्ष जैसा महान अवसर देखने मिल रहा है। मैं इस अवसर पर राष्ट्रसेवा के संकल्प को समर्पित कोटि-कोटि स्वयंसेवकों को शुभकामनाएं देता हूं।
मैं संघ के संस्थापक, हम सभी के आदर्श…परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी के चरणों में श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। संघ की 100 वर्षों की इस गौरवमयी यात्रा की स्मृति में भारत सरकार ने विशेष डाक टिकट और स्मृति सिक्के भी जारी किए हैं। जिस तरह विशाल नदियों के किनारे मानव सभ्यताएं पनपती हैं, उसी तरह संघ के किनारे भी सैकड़ों जीवन पुष्पित-पल्लवित हुए हैं।
जैसे एक नदी जिन रास्तों से बहती हैं, उन क्षेत्रों को अपने जल से समृद्ध करती हैं, वैसे ही संघ ने इस देश के हर क्षेत्र, समाज के हर आयाम को स्पर्श किया है। जिस तरह एक नदी कई धाराओं में ख़ुद को प्रकट करती है, संघ की यात्रा भी ऐसी ही है। संघ के अलग-अलग संगठन भी जीवन के हर पक्ष से जुड़कर राष्ट्र की सेवा करते हैं। शिक्षा, कृषि, समाज कल्याण, आदिवासी कल्याण,महिला सशक्तिकरण, समाज जीवन के ऐसे कई क्षेत्रों में संघ निरंतर कार्य करता रहा है। विविध क्षेत्र में काम करने वाले हर संगठन का उद्देश्य एक ही है, भाव एक ही है....राष्ट्र प्रथम
अपने गठन के बाद से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्र निर्माण का विराट उद्देश्य लेकर चला। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए संघ ने व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण रास्ता चुना और इस चलने के लिए जो कार्यपद्धति चुनी वो थी नित्य-नियमित चलने वाली शाखाएं। संघ शाखा का मैदान, एक ऐसी प्रेरणा भूमि है, जहां से स्वयंसेवक की अहम् से वयं की यात्रा शुरू होती है। संघ की शाखाएं…व्यक्ति निर्माण की यज्ञवेदी हैं।
राष्ट्र निर्माण का महान उद्देश्य, व्यक्ति निर्माण का स्पष्ट पथ और शाखा जैसी सरल, जीवंत कार्यपद्धति यही संघ की सौ वर्षों की यात्रा का आधार बने। इन्हीं स्तंभों पर खड़े होकर संघ ने लाखों स्वयंसेवकों को गढ़ा, जो विभिन्न क्षेत्रों में देश को आगे बढ़ा रहे हैं।
संघ जब से अस्तित्व में आया…संघ के लिए देश की प्राथमिकता ही उसकी अपनी प्राथमिकता रही।
आज़ादी की लड़ाई के समय परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी समेत अनेक कार्यकर्ताओं ने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया, डॉक्टर साहब कई बार जेल तक गए। आजादी की लड़ाई में कितने ही स्वतन्त्रता सेनानियों को संघ संरक्षण देता रहा…उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करता रहा। आजादी के बाद भी संघ निरंतर राष्ट्र साधना में लगा रहा। इस यात्रा में संघ के खिलाफ साजिशें भी हुईं, संघ को कुचलने का प्रयास भी हुआ।
ऋषितुल्य परम पूज्य गुरु जी को झूठे केस में फंसाया गया। लेकिन संघ के स्वयंसेवकों ने कभी कटुता को स्थान नहीं दिया। क्योंकि वो जानते है, हम समाज से अलग नहीं हैं, समाज हमसे ही तो बना है। समाज के साथ एकात्मता और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति आस्था ने संघ के स्वयंसेवकों को हर संकट में स्थित प्रज्ञ रखा है…समाज के प्रति संवेदनशील बनाए रखा है।
प्रारंभ से संघ… राष्ट्रभक्ति और सेवा का पर्याय रहा है। जब विभाजन की पीड़ा ने लाखों परिवारों को बेघर कर दिया, तब स्वयंसेवकों ने शरणार्थियों की सेवा की। हर आपदा में संघ के स्वयंसेवक अपने सीमित संसाधनों के साथ सबसे आगे खड़े रहते रहे। यह केवल राहत नहीं थी, यह राष्ट्र की आत्मा को संबल देने का कार्य था। खुद कष्ट उठाकर दूसरों के दुख हरना...ये हर स्वयंसेवक की पहचान है। आज भी प्राकृतिक आपदा में हर जगह स्वयंसेवक सबसे पहले पहुंचने वालों में से एक रहते हैं।
अपनी 100 वर्षों की इस यात्रा में, संघ ने समाज के अलग-अलग वर्गों में आत्मबोध जगाया…स्वाभिमान जगाया। संघ देश के उन क्षेत्रों में भी कार्य करता रहा है..जो दुर्गम हैं…जहाँ पहुँचना सबसे कठिन है। संघ...दशकों से आदिवासी परंपराओं, आदिवासी रीति-रिवाज, आदिवासी मूल्यों को सहेजने-संवारने में अपना सहयोग देता रहा है...अपना कर्तव्य निभा रहा है। आज सेवा भारती...विद्या भारती, एकल विद्यालय...वनवासी कल्याण आश्रम...आदिवासी समाज के सशक्तिकरण का स्तंभ बनकर उभरे हैं।
समाज में सदियों से घर कर चुकी जो बीमारियाँ हैं, जो ऊंच-नीच की भावना है, जो कुप्रथाएं हैं, ये हिन्दू समाज की बहुत बड़ी चुनौती रही हैं। ये एक ऐसी गंभीर चिंता है, जिस पर संघ लगातार काम करता रहा है। डॉक्टर साहब से लेकर आज तक, संघ की हर महान विभूति ने, हर सर-संघचालक ने भेदभाव और छुआछूत के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। परम पूज्य गुरु जी ने निरंतर न हिन्दू पतितो भवेत् की भावना को आगे बढ़ाया। पूज्य बाला साहब देवरस जी कहते थे- छुआछूत अगर पाप नहीं, तो दुनिया में कोई पाप नहीं! सरसंघचालक रहते हुए पूज्य रज्जू भैया जी और पूज्य सुदर्शन जी ने भी इसी भावना को आगे बढ़ाया। वर्तमान सरसंघचालक आदरणीय मोहन भागवत जी ने भी समरसता के लिए समाज के सामने एक कुआं, एक मंदिर और एक श्मशान का स्पष्ट लक्ष्य रखा है।
जब 100 साल पहले संघ अस्तित्व में आया था तो उस समय की आवश्यकताएं, उस समय के संघर्ष कुछ और थे। लेकिन आज 100 वर्षों बाद जब भारत विकसित होने की तरफ बढ़ रहा है तब आज के समय की चुनौतियां अलग हैं, संघर्ष अलग हैं। दूसरे देशों पर आर्थिक निर्भरता, हमारी एकता को तोड़ने की साजिशें, डेमोग्राफी में बदलाव के षड़यंत्र, हमारी सरकार इन चुनौतियों से तेजी से निपट रही है।
मुझे ये खुशी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी इन चुनौतियों से निपटने के लिए ठोस रोडमैप भी बनाया है। संघ के पंच परिवर्तन, स्व बोध, सामाजिक समरसता, कुटुम्ब प्रबोधन, नागरिक शिष्टाचार और पर्यावरण ये संकल्प हर स्वयंसेवक के लिए देश के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को परास्त करने की बहुत बड़ी प्रेरणा हैं। स्व बोध की भावना का उद्देश्य गुलामी की मानसिकता से मुक्त होकर अपनी विरासत पर गर्व और स्वदेशी के मूल संकल्प को आगे बढ़ाना है। सामाजिक समरसता के जरिए वंचित को वरीयता देकर सामाजिक न्याय की स्थापना का प्रण है। आज हमारी सामाजिक समरसता को घुसपैठियों के कारण डेमोग्राफी में आ रहे बदलाव से भी बड़ी चुनौती मिल रही है। देश ने भी इससे निपटने के लिए डेमोग्राफी मिशन की घोषणा की है। हमें कुटुम्ब प्रबोधन यानी परिवार संस्कृति और मूल्यों को भी मजबूत बनाना है।
नागरिक शिष्टाचार के जरिए नागरिक कर्तव्य का बोध हर देशवासी में भरना है। इन सबके साथ अपने पर्यावरण की रक्षा करते हुये आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करना है। अपने इन संकल्पों को लेकर संघ अब अगली शताब्दी की यात्रा शुरू कर रहा है। 2047 के विकसित भारत में संघ का हर योगदान, देश की ऊर्जा बढ़ाएगा, देश को प्रेरित करेगा। पुन: प्रत्येक स्वयंसेवक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय सिनेमा के इस सदी के महान अभिनय कलाकार अमिताभ बच्चन से पूछा गया कि आपकी सबसे बड़ी ताकत क्या है? उन्होंने जवाब दिया कि मुझे तीन स्रोतों से शक्ति प्राप्त होती है। पहला माता-पिता के द्वारा प्राप्त संस्कार से भावनाएं एवं संवेदनाएं उनकी व्यक्तिगत शक्ति है। दूसरी ताकत का स्रोत उनका परिवार है और तीसरा स्रोत उनका अपना समाज है।
शक्ति प्राप्त करने के अन्य स्रोत और भी हो सकते हैं। परंतु उन शक्तियों का उपयोग ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। शक्ति से ही परिश्रम किया जा सकता है और परिश्रम ही वह माध्यम है जिसके बल पर निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकती है। छत्रपति शिवाजी महाराज को भावनात्मक एवं संवेदनात्मक शक्ति (विचार शक्ति) अपने गुरुदेव समर्थ रामदास से प्राप्त होती थी।
उनका परिवार उनका संबल था तो तत्कालीन समाज का नैतिक समर्थन उनकी सबसे बड़ी शक्ति थी; और इन्हीं शक्तियों के आधार पर उन्होंने स्वराज की स्थापना की। हमारा व्यक्तिगत विचार शक्ति, परिवार की शक्ति और समाज की शक्ति कितना सबल एवं महत्वपूर्ण है इस बात को हमें समझनी चाहिए। सामने यदि कोई बड़ा लक्ष्य निर्धारित किया गया हो तो समाज के समर्थन, सहयोग एवं समर्पण के बिना नहीं प्राप्त किया जा सकता है। अपने-अपने कर्तव्यों का भार उठाना ही पड़ेगा क्योंकि इसके सिवा कोई अतिरिक्त मार्ग होता ही नहीं है।
आज के समय में संयुक्त परिवार की अवधारणा/ कॉन्सेप्ट थोड़ा कम व्यावहारिक रह गया है। परंतु परिवार के प्रति भावनात्मक जुड़ाव में कमी चिंता का विषय है। हम जहां भी रहे हमारा अपना परिवार का दायरा जो कुछ भी हो परंतु भावनात्मक स्वरूप में संयुक्त परिवार से जुड़े रहने में उतनी कठिनाई भी नहीं है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार और लेखक हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हजारीबाग जिले के जाने-माने युवा शल्य चिकित्सा डॉ अंकित कुमार जयपुरियार का चयन वर्ष 2025 के लिए अमेरिकन कॉलेज आफ सर्जंस की मानद फैलोशिप के लिए किया गया है। विश्व भर में चिकित्सा क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए अमेरिकन कॉलेज आॅफ सर्जंस की ओर से दिया जाने वाला यह सबसे बड़ा सम्मान है। वे झारखंड के पहले चिकित्सक हैं, जिनका इस मानद फेलोशिप के लिए चयन हुआ है। निश्चित तौर पर यह संपूर्ण झारखंड के लिए एक गौरव की बात है।
डॉ अंकित कुमार एक युवा चिकित्सा होने के साथ नरम दिल, सहज और सरल हैं। वे अपने पेशे के प्रति पूरी तरह और निष्ठावान और समर्पित है। कोई भी रोगी एक बार जब उनसे मिल लेता है, उनके कुशल व्यवहार और चेहरे पर मुस्कान देखकर ही उसकी बीमारी आधी दूर हो जाती है। डॉ अंकित अपने हर एक रोगियों से बहुत ही सत्कार के साथ मिलते हैं। वे रोगियों की जांच बहुत ही धैर्य और ध्यान के साथ करते हैं। वे कुछ ही मिनटों में रोगी से बातचीत कर उनकी बीमारी से संबंधित कई बातें पूछ कर रोग का पता लगा लेते हैं।
इसके बाद ही वे उचित जांच, परामर्श और दवा लिखते हैं। डॉ अंकित कुमार का परामर्श और दवा किसी भी रोगी के लिए वरदान साबित हो जाता है। रोगी जल्द ही ठीक हो जाता है। डॉ अंकित कुमार विश्व चिकित्सा क्षेत्र में क्या-क्या नये अनुसंधान हो रहे हैं? इस निमित्त समय निकालकर चिकित्सा अनुसंधान से संबंधित पुस्तकें पढ़ते रहते हैं। वे नियमित रूप से नई चिकित्सा से संबंधित पुस्तकें मंगा कर अपने ज्ञान का विस्तार करते रहते हैं।
उनका इस बात पर जोर होता है कि कम से कम खर्चे में नये से नये आधुनिक चिकित्सा उपकरण से रोगियों की शल्य चिकित्सा की जाये। खासकर गरीब मरीजों को और बेहतर चिकित्सा के लिए अन्य प्रदेशों में जाना न पड़े। वे गरीब मरीजों के लिए एक वरदान साबित हो रहे हैं। आज भागमभाग भरी जिंदगी में पैसे कमाने की होड़ में दुनिया बहुत तेजी के साथ आगे बढ़ती चली जा रही है। जहां मानवीयता के लिए बहुत कम जगह बच पा रही है। दूसरी शब्दों में कहें तो मानवीयता तार तार होकर रह जा रही है।
ऐसे विषम परिस्थिति में डॉ अंकित कुमार जयपुरियार जैसे नरम दिल चिकित्सक का होना चिकित्सा जगत के लिए एक बड़ी उपलब्धि के समान है। डॉक्टर अंकित कुमार पैसे कमाने की इस हौड़ से अपने को बहुत दूर रखा है। उनके लिए चिकित्सा एक सेवा के समान है। वे हर पल इस प्रयास में जुटे रहते हैं कि जैसे भी हो, रोगी के चेहरे पर फिर से मुस्कान आ जाए। यह लिखते हुए बेहद दु:ख होता है कि चिकित्सा सेवा एक व्यवसाय के रूप में परिवर्तित चुका है। जहां सिर्फ और सिर्फ पैसे का ही बोल बाला होता है।
यह रूपांतरण चिकित्सा जगत के लिए उचित नहीं है। दुनिया चिकित्सकों को दूसरे भगवान के रूप में दर्जा देते हैं। समाज में चिकित्सकों का बहुत ही मान और प्रतिष्ठा है। इस बात को अधिकांश चिकित्सक भूल चुके हैं। आज भी बहुत सारे लोग पुराने चिकित्सकों का नाम बहुत ही गर्व के साथ इसलिए लेते हैं कि उस जमाने के चिकित्सक पैसे के पीछे नहीं भागते थे बल्कि रोगी कैसे ठीक हो, इस पर जोर दिया करते थे। डॉ अंकित कुमार जयपुरियार ने चिकित्सा सेवा की उस परंपरा को फिर से जीवंत करने का प्रयास किया है। डॉ अंकित का यह कदम अन्य चिकित्सकों के लिए अनुकरणीय और प्रेरणादाई सिद्ध होगा।
डॉ अंकित कुमार का परिवार विगत तीन पीढियां से चिकित्सा सेवा जुड़े रहे हैं। यह किसी भी परिवार के लिए गर्व करने वाली बात होती है। डॉ अंकित कुमार के पिता डॉ नवेंदु शंकर जयपुरियार होम्योपैथ के एक सफल चिकित्सा के रूप में जाने जाते हैं। एक ओर जहां महंगी हो रही अंग्रेजी दवाओं और साईड दुष्प्रभावों से रोगी परेशान हो रहे हैं। डॉ नवेंदु शंकर जयपुरियार ऐसे रोगियों के लिए एक वरदान साबित हो रहे हैं।
वे हजारीबाग में होम्योपैथी की चिकित्सा के माध्यम से नित सैकड़ों रोगियों के चेहरे पर मुस्कान लौटा रहे हैं। यहां यह लिखते हुए गर्व होता है कि कई बड़े-बड़े एमबीबीएस चिकित्सक भी डॉ नवेंदु जयपुरिया के परामर्श पर होम्यो पैथ की दवा खाकर ठीक हो रहे हैं। डॉ नवेंदु शंकर जयपुरियार ने भी इस पेशे को सेवा के रूप में लेकर गौरवान्वित किया है। डॉ अंकित कुमार के दादा स्वर्गीय डॉ गिरजा शंकर प्रसाद भी होम्योपैथी के एक जाने माने डॉक्टर थे। वे प्रतिदिन सैकड़ो की संख्या में रोगियों को देखा करते थे।
वे कई रोगियों से कुछ भी नहीं लिया करते थे बल्कि उनकी सेवा नि:शुल्क दिया करते थे। उन्होंने भी इस पेशे को समाज सेवा से के रूप में लिया था। आज भी लोग उनका नाम बड़े ही गर्व के साथ लेते हैं। वे एक चिकित्सक के साथ वरिष्ठ समाजसेवी भी थे। डॉ अंकित का जन्म हजारीबाग में हुआ। उन्होंने हजारीबाग के संत जेवियर स्कूल से 10वीं की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। इसके बाद उन्होंने रांची डीपीएस से प्लस टू की पढ़ाई पूरी की थी। उनके माता-पिता चाहते थे कि अंकित भी एक डॉक्टर बने। अंकित की भी इच्छा थी कि वे अपने दादा और पिता की तरह ही एक डॉक्टर बनें। इसलिए उन्होंने कोयंबटूर गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज में दाखिला हेतु मेडिकल परीक्षा दी।
वे इस मेडिकल परीक्षा में सफल होकर कोयंबतूर मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस और एमएस की डिग्री हासिल की। अभी डॉ अंकित जयपुरियार अनुबंध पर हजारीबाग जिले के विष्णुगढ़ में मेडिकल आॅफिसर के पद पर कार्यरत हैं। यहां से पहले वे देश के प्रतिष्ठित अस्पताल सीएमसी, कोयंबटूर, ओएनसी हॉस्पिटल, चेन्नई और उसके बाद रायपुर में सीडीटीएच हॉस्पिटल में बतौर सर्जन काफी वक्त तक काम करने के बाद अपने शहर में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। डॉ अंकित कुमार जयपुरियार को लेप्रोस्कोपी और इंडोस्कोपी से आपरेशन में महारत हासिल है।
हजारीबाग जैसे छोटे शहर में जहां चिकित्सीय संसाधन भी कम हैं। डॉ अंकित इन चुनौतियों का सामना करते हुए ऐसे ऐसे आपरेशन करने में सफल हो रहे हैं, जिन आपरेशन करने में लाखों के खर्च आते हैं। डॉ अमित की इस विलक्षण चिकित्सीय प्रतिभा को देखते हुए अन्य शल्य चिकित्सक भी परामर्श के लिए उन्हें अपने अपने अपने क्लीनिक में बुलाते रहते हैं। यह लिखते हुए गर्व होता है कि डॉ अंकित झारखंड के एकलौते चिकित्सक हैं, जिनका चयन अमेरिकन कॉलेज आफ सर्जंस की मानद फेलोशिप के लिए हुआ हुआ है।
वर्ष 2024 में विभिन्न देशों के आठ चिकित्सकों में मात्र एक भारतीय चिकित्सा डॉ शैलेश विनायक श्रीखंडे का हुआ था। डॉ अंकित झारखंड के पहले चिकित्सक हैं, जिनका इस मानद फैलोशिप के लिए चयन हुआ है। यह मानद फेलोशिप प्राप्त करने के लिए डॉ अंकित को कई परीक्षाओं के दौर से गुजरना पड़ा। डॉ अंकित ने इस मानद फेलोशिप के लिये अपने चयन के बाबत बताया कि छोटे शहर में आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल के कारण उन्हें चुना गया। आगे उन्होंने कहा कि इस मानद फेलोशिप चयन की प्रक्रिया काफी कठिन रही। पहले तो छह- सात माह आॅनलाइन परीक्षा ली गयी। इसके बाद मार्च में दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसरों ने साक्षात्कार लिया।
उसके बाद अंतिम साक्षात्कार अमेरिका के चिकित्सक प्रोफेसर द्वारा साक्षात्कार लिया गया। इसके बाद ही उनका मानद फैलोशिप के लिए चयन हुआ। आगे उन्होंने बताया कि मानद फेलोशिप का सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस दौरान मिलनेवाली आधुनिक सर्जरी की ट्रेनिंग है। यह ट्रेनिंग पूरी करने के बाद शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में क्या-क्या नये-नये चिकित्सीय उपकरण इस्तेमाल हो रहे हैं? इसके साथ ही हाल के दिनों में चिकित्सा क्षेत्र में आये बदलावों को जान पाऊंगा। जिसका लाभ मैं झारखंड के रोगियों को दे पाऊंगा। इस नवीनतम चिकित्सीय शल्य ट्रेनिंग के लिए बहुत ही उत्साहित हूं। इसी साल 4 से 7 अक्टूबर तक शिकागो में यह ट्रेनिंग चलेगी। (लेखक वरिष्ठ कथाकार/स्तंभकार हैं। उनका निवास पंच मंदिर चौक, हजारीबाग - 825301 और संपर्क नंबर 92347 99550 है।)
एबीएन नॉलेज डेस्क। मां कहती हैं कि सतुआ तब तक सतुआ नहीं कहलाता जब तक वो सात अनाज से मिलकर न बना हो। मक्की, जौ, ज्वार, मटर, चना, बाजरा और चावल मां डालती थी। इन सभी अनाज को भिगो कर सुखाती थी और फिर भाड़ में भूनने के लिए भिजवा देती थीं।
भुजैइन काकी की पारिश्रमिक अलग से चावल बांध कर देती थीं। अगर उन्हें अलग से मेहनताना नहीं दिया जाता था तो काकी भूनने के लिए आए अनाज का कुछ हिस्सा भुजाई के मूल्य के रूप में रख लेती थीं।
भाड़ में पहले से ही भीड़ लगी रहती है।
कोई पसर भर मटर ले आया है तो कोई चना लाया है, किसी के पास एक सिकौहुली मकई के दाने हैं तो कोई भुजिया चाउर लाया है।
काकी जिसका भूजा भूजती थी उससे ही भाड़ झोकवाती थीं। बगिया के पेड़ो से गिरी पत्तियां बहार कर खांची में दबा दबा कर भर लाती थीं और यही उनके भाड़ का ईंधन होता था।
भाड़ जलते ही भाड़ से हवा के सर पर सवार हो कर उड़ती आती सोंधी सुगंध जब नाक में चढ़ती थी तो फिर मन गर्म गर्म भूजा चबाने के लिए बेताब हो उठता था। मां फिर कुछ न कुछ देकर भुजाने भेज देती थीं। जो आनंद गर्म गर्म भूजे भूजा का होता है उतना स्वाद रखे हुए में नहीं आता है। खैर सतुआ से चले थे भूजा पर आ अटके तो सतुआ की तरफ वापिस चलते हैं।
सतुआ जब भुजा कर आ जाता था तब जांता धोया जाता था आस पास चिकनी मिट्टी से लीप कर साफ किया जाता था और फिर मां, काकी मिलकर सतुआ पीसती थीं। दोपहर जब तीन बजे वाली भूख लगती थी तब भोजन के बजाय हमारे गांव का दो मिनट वाला चटपटा, स्वास्थ्य वर्धक, पौष्टिक आहार तैयार होता था।
फटाफट नमक डाल कर घोल लिया चटनी, प्याज, सिरका, हरी मिर्च संग खा कर आनंद लिया। हमारे सनातन धर्म में बेटी के घर का पानी पीना निषेध किया गया है सो हमारे बुजुर्ग जब कभी बिटिया के घर जाते थे तो संग में सतुआ बांध ले जाते थे। गांव में किसी के घर से पानी मंगवा कर घोलकर सतुआ खा लेते थे।
खाने से मेरा तात्पर्य खाना ही है अब आप लोग सोचेंगे कि सत्तू तो पिया जाता है और मैं खाना लिख रही हूं तो सत्तू अब पिया जाने लगा है पहले गाढ़ा सा घोलकर उंगली से चाट चाट कर खाया ही जाता था। जिसको मीठा पसंद होता था वो सत्तू में राब डालकर मुट्ठी बना कर खाता था।
घर का कोई सदस्य सुबह जल्दी कहीं जाने लगता था तो सत्तू सबसे उत्तम भोजन होता था। दूर जाना है तो सत्तू बांध कर साथ ले जाता था। हमारे यहां सतुआन नाम से बाकायदा एक लोकपर्व है उसमें उस दिन घर के सभी सदस्य एक समय सतुआ ही खाते हैं और उस दिन सतुआ खाना अनिवार्य माना जाता है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। रात का तीसरा पहर है। नींद नहीं आ रही। सोचा, जरा सोशल मीडिया टहल आया जाए। रात बारह बजे के बाद तारीख बदल चुकी है, 17 सितंबर हो गया है। विश्वकर्मा पूजा है। सुबह क्या होगा पता नहीं, मगर अभी सोशल मीडिया पर कहीं विश्वकर्मा पूजा की एक भी शुभकामना पोस्ट नहीं दिखी।
ऐसा नहीं है कि लोगों ने कोई नई पोस्ट नहीं डाली। पोस्ट तो जैसे तैर रहे हैं, और वह केवल एक बात की, मोदी जी के जन्मदिवस की बधाई पोस्ट।
मैं ऐसा नहीं कह रहा कि मोदी जी विश्वकर्मा के अवतार हो गए या भगवान से बड़े हो गये। भगवान तो भगवान हैं, इन्द्रियां वे ही चलाते हैं। बुद्धि के नियंत्रक भी भगवान ही हैं। श्रद्धा के सृजक भी वे ही हैं। हमारी आस्था के आधार भी भगवान ही हैं। सब कुछ उनकी महिमा के प्रभाव से ही तय होता है।
तो मैं सोचता हूँ कि एक से एक पढ़े लिखे, बुद्धिमान, हिन्दू आस्थावान, संस्कारी लोगों में यह प्राथमिकता किसने तय की कि बिना कुछ भूले, बिना देर किये, जितनी जल्दी हो, रात के बारह बजने की प्रतीक्षा करते हुए नववर्ष की पिछली रात की तरह तत्काल मोदी जी को उनके जन्मदिवस की बधाई दी जाए। आखिर बधाई पोस्ट की होड़ क्यों? किसे दिखाना है हमें? इस बधाई की भीड़ में हमारी पोस्ट कल कहाँ खो जाएगी, पता नहीं, फिर भी बधाई की जल्दी!!!
यह किसी को दिखाने का मामला नहीं, यह कोई पोस्ट स्पर्धा नहीं। एक आत्मतुष्टि है। समझिये, एक कर्तव्य का बोध है। जिसे हम दिमाग में रखते हैं, वह विस्मृत हो सकता है, जिसे औपचारिक और ट्रेंड के अनुसार करना जरूरी समझते हैं, उसका समय तय नहीं होता, कभी भी पूरी कर सकते हैं, मगर जब हृदय किसी को सम्मान, आस्था, अद्वितीयता या एक उत्सर्ग को आकुल प्राणी के रूप में ग्रहण करता है तो वह विश्वशिल्पी से पहले हमारा भावग्रहण करने का स्वयमेव अधिकारी हो जाता है।
मैं नहीं जानता, भारत की आज से पचास साठ साल बाद आने वाली पीढ़ी, मोदी युग का मूल्यांकन किस प्रकार करेगी। राष्ट्र को एक कुशल शिल्पकार की तरह गढ़ने का जो जिम्मा इन्होंने उठाया है, वे इसकी सूरत यथेष्ट बदल पायेंगे या नहीं।
विनाशकारी तत्वों की सफल सक्रियता देखते हुए बताना मुश्किल है, मगर इतना जानता हूँ, कि आज इनकी राह में आंशिक राजनीतिक लाभ के लिए जितने लोग बाधा बनकर खड़े हैं, इनकी निंदा कर रहे हैं, राजनीतिक ईर्ष्या से अपमान करने की सारी हदें पार कर जा रहे हैं, वह एक महापाप है। ऐसा पाप, जिसका दंश उन्हें भुगतना ही होगा।
बस और कुछ न कहूँगा।
हर व्यक्ति अपने हिसाब से, सोच से, आकलन करता है। मैंने भी किया है। करता ही आ रहा हूँ, सुनता भी आ रहा हूँ। अंधभक्त तो तकिया कलाम हो गया है, मोदी जी का प्रशंसक यह विशेषण अवश्य पाता है। विरोधी छोड़िये, स्वयं भाजपाई भी इन्हें भला- बुरा कहने से नहीं चूकते।
उनसे क्या कहूँ, वे ईमानदारी से पिछले पंद्रह वर्ष और उसके पहले के हालात को दो हिस्सों में बांटकर मूल्यांकन कर लें, तो उन्हें साफ दिखेगा कि एक मूर्तिकार मूर्ति के अंग- प्रत्यंग को सही रूप देने, गढ़ने, सँवारने के लिए उस पर चढ़कर अपना श्रम और कला समर्पित करता है, तब वह उस मूर्ति के कद से बड़ा प्रतीत होता है। मगर यह सत्य नहीं है, मूर्तिकार का कद विग्रह से बड़ा कभी नहीं हो सकता।
याद रहे, राष्ट्र विग्रह है और यह शिल्पकार हमारा भाग्य। हमें उसके श्रम, समर्पण, और नीयत के कद की माप कभी नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि यह भाग्य से होता है और भाग्य के कद की कोई माप नहीं होती। यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीजी पर विश्वशिल्पी भगवान की कृपा बनी रहे, वे दीर्घायु हों। (लेखक स्वतंत्र स्तम्भकर हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। एक बार एक पिता और उसका पुत्र जलमार्ग से कहीं यात्रा कर रहे थे और तभी अचानक दोनों रास्ता भटक गये। फिर उनकी नौका भी उन्हें ऐसी जगह ले गई, जहाँ दो टापू आस-पास थे और फिर वहाँ पहुंच कर उनकी नौका टूट गई।
पिता ने पुत्र से कहा, अब लगता है, हम दोनों का अंतिम समय आ गया है, दूर-दूर तक कोई सहारा नहीं दिख रहा है। अचानक पिता को एक उपाय सूझा, अपने पुत्र से कहा कि, "वैसे भी हमारा अंतिम समय नज़दीक है, तो क्यों न हम ईश्वर की प्रार्थना करें।
उन्होंने दोनों टापू आपस में बाँट लिए। एक पर पिता और एक पर पुत्र, और दोनों अलग-अलग टापू पर ईश्वर की प्रार्थना करने लगे। पुत्र ने ईश्वर से कहा, हे भगवन, इस टापू पर पेड़-पौधे उग जाए जिसके फल-फूल से हम अपनी भूख मिटा सकें।
ईश्वर द्वारा प्रार्थना सुनी गयी, तत्काल पेड़-पौधे उग गये और उसमें फल-फूल भी आ गये। उसने कहा ये तो चमत्कार हो गया। फिर उसने प्रार्थना कि, एक सुंदर स्त्री आ जाए जिससे हम यहाँ उसके साथ रहकर अपना परिवार बसाएँ।
तत्काल एक सुंदर स्त्री प्रकट हो गयी। अब उसने सोचा कि मेरी हर प्रार्थना सुनी जा रही है, तो क्यों न मैं ईश्वर से यहाँ से बाहर निकलने का रास्ता माँग लूँ ? उसने ऐसा ही किया। उसने प्रार्थना कि, एक नई नाव आ जाए जिसमें सवार होकर मैं यहाँ से बाहर निकल सकूँ। तत्काल नाव प्रकट हुई और पुत्र उसमें सवार होकर बाहर निकलने लगा।
तभी एक आकाशवाणी हुई, बेटा तुम अकेले जा रहे हो? अपने पिता को साथ नहीं लोगे। पुत्र ने कहा, उनको छोड़ो, प्रार्थना तो उन्होंने भी की, लेकिन आपने उनकी एक भी नहीं सुनी। शायद उनका मन पवित्र नहीं है, तो उन्हें इसका फल भोगने दो ना ? आकाशवाणी ने कहा, क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारे पिता ने क्या प्रार्थना की? पुत्र बोला, नहीं।
आकाशवाणी बोली तो सुनो, तुम्हारे पिता ने एक ही प्रार्थना की... हे भगवन! मेरा पुत्र आपसे जो भी माँगे, उसे दे देना क्योंकि मैं उसे दुःख में हरगिज़ नहीं देख सकता औऱ अगर मरने की बारी आए तो मेरी मौत पहले हो और जो कुछ तुम्हें मिल रहा है उन्हीं की प्रार्थना का परिणाम है। पुत्र बहुत शर्मिंदा हो गया।
सज्जनों! हमें जो भी सुख, प्रसिद्धि, मान, यश, धन, संपत्ति और सुविधाएं मिल रही है उसके पीछे किसी अपने की प्रार्थना और शक्ति जरूर होती है लेकिन हम नादान रहकर अपने अभिमान वश इस सबको अपनी उपलब्धि मानने की भूल करते रहते हैं और जब ज्ञान होता है तो असलियत का पता लगने पर सिर्फ़ पछताना पड़ता है।
हम चाह कर भी अपने माता-पिता का ऋण नहीं चुका सकते हैं। एक पिता ही ऐसा होता है जो अपने पुत्र को ऊच्चाईयों पर पहुँचाना चाहता है। पर पुत्र मां बाप को बोझ समझते हैं। इसलिए आप हमेशा जरुरतमंदों की सहायता करते रहिये। सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।
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