एबीएन एडिटोरियल डेस्क (संजय पासवान)। डॉ भीमराव आंबेडकर ने 1938 में मनमाड रेलवे वर्कर्स कॉन्फ्रेंस में कहा था, मुझे धर्म के प्रति युवाओं की बढ़ती उदासीनता को देख कर पीड़ा होती है। धर्म कोई अफीम नहीं है। जैसा कि कुछ लोग मानते हैं। मुझमें जो कुछ भी अच्छा है या मेरी शिक्षा से समाज का जो भी भला होता है, मैं उसका श्रेय अपने अंदर की धार्मिक भावनाओं को देता हूं। यह कथन उन लोगों को चौंकाने वाला लग सकता है जो कि आंबेडकर को पढ़े बिना आंबेडकरवाद का अनुसरण करते हैं। ये स्थिति इसलिए है क्योंकि भारत के वामपंथी आंबेडकरवादी कार्यकर्ताओं ने उन्हें धर्म के विरोधी के रूप में चित्रित कर रखा है। जबकि आंबेडकर कार्ल मार्क्स जैसे नहीं थे। इसलिए एक व्यक्ति बिना किसी विरोधाभास के एक ही साथ तीनों हो सकता है एक हिंदू, एक राष्ट्रवादी और एक आंबेडकरवादी। यह बात उस वैचारिक कथानक के बिल्कुल विपरीत है, जो कि एक झूठे विचार की वकालत करता है कि आंबेडकर के विचार और राष्ट्रवाद एक साथ नहीं रह सकते। आंबेडकर ने धर्म को बहुत महत्व दिया था और यह बात उनकी विरासत पर एकाधिकार की हसरत रखने वाले साम्यवादियों की आज की पीढ़ी को रास नहीं आएगी.शांतिपूर्ण विरोध के जरिए दलित वर्ग के मंदिर प्रवेश की हिमायत करना आंबेडकर की विशेषता थी। तमिलनाडु में पेरियार के अनुयायी बड़ी अस्पष्टता की स्थिति निर्मित करते हैं। जबकि एक तरफ तो वे हिंदू प्रतिष्ठानों के तर्कहीन उन्मूलन का समर्थन करते हैं, पर साथ ही वे आंबेडकरवादी होने का दावा भी करते हैं। अपने जीवन के निर्णायक चरण में आंबेडकर धर्मांतरण के सवाल से जूझ रहे थे। धर्मशास्त्र संबंधी गहन विद्वता के मद्देनजर, वह तमाम भारतीय धर्मों की ताकतों और कमजोरियों को लेकर आश्वस्त थे। कोई दृढ़ कारण जरूर रहा होगा कि बहुत सोच-विचार और विभिन्न धार्मिक नेताओं से चर्चा के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म को अपनाया, जिसे आमतौर पर हिंदू धर्म की ही एक शाखा के रूप में देखा जाता है। क्या वह इस्लाम या ईसाई जैसे गैर-भारतीय धर्म को अपनाने के संभावित परिणामों से बचना चाहते थे? सामाजिक इतिहासकारों को इस सवाल पर रोशनी डालनी चाहिए, इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। आंबेडकर के विचार जाति संघर्ष की उपज थे। उनका जीवन इस निरंतर संघर्ष का प्रमाण है। पर जाति के खिलाफ अपने वैचारिक रुख के कारण आंबेडकर को पूर्वाग्रहों का भी सामना करना पड़ा, यहां तक कि साम्यवादियों से भी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) की केंद्रीय कमेटी ने 1952 में आंबेडकर की अगुआई वाले संगठन अनुसूचित जाति महासंघ (एससीएफ) के खिलाफ एक विशेष प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें कहा गया था कि आर्थिक बेहतरी और सामाजिक बराबरी की आकांक्षा को उनके साम्राज्य-समर्थक और अवसरवादी नेता डॉ आंबेडकर ने एक विकृत और अवरोधकारी रूप दे दिया है, जिन्होंने कि उनको एससीएफ में सांप्रदायिक और जाति-विरोधी हिंदुओं के तौर पर संगठित किया है। चुनाव के साथ भयादोहन भी आता है आरक्षण, हिंदुत्व और सामाजिक न्याय के लिए संवैधानिक गारंटियों को लेकर। पर, ये कांग्रेस पार्टी ही है जिसने स्वतंत्रता सेनानी और दलितों के सबसे बड़े नेताओं में से एक बाबू जगजीवन राम को कभी भी पार्टी या सरकार में सम्मानजनक पद नहीं दिया। आखिरकार, जगजीवन राम को पार्टी से अलग होना पड़ा था। वे जनता पार्टी में शामिल हो गए और अंतत: जनसंघ समर्थित जनता पार्टी सरकार में उप-प्रधानमंत्री बने। एक दलित नेता के रूप में बाबू जगजीवन राम वामपंथियों के कथानक में फिट नहीं बैठते थे, क्योंकि वह एक समर्पित हिंदू थे। जिन्होंने हिंदू धर्म में रहते हुए इसकी बुराइयों का मुकाबला करने के विकल्प को चुना। कांशीराम और मायावती ने भी किसी अन्य धर्म को नहीं अपनाया। दलित आस्थावान हिंदू होते हैं। परंतु, भारतीय राजनीतिक इतिहास में किसी राष्ट्रीय दल की कमान संभालने वाला पहला दलित बंगारू लक्ष्मण बने, जो 2000 से 2001 तक भाजपा के अध्यक्ष रहे थे। भाजपा की ही अगुआई वाली एनडीए सरकार के कार्यकाल में जीएमसी बालायोगी, एक वकील, लोकसभा का पहला दलित स्पीकर बने थे। और एक बार फिर भाजपा ने ही रामनाथ कोविंद के रूप में भारत को पहला दलित राष्ट्रपति दिया। भारत के दसवें राष्ट्रपति केआर नारायणन एक दलित-ईसाई थे। इस समय सर्वाधिक दलित सांसद भाजपा से ही हैं। आंबेडकर ने लिखा था, जातीय रूप से हर व्यक्ति परस्पर भिन्न है। एकरूपता का आधार तो सांस्कृतिक एकता है। इस बात को मानते हुए, मैं यह कहना चाहूंगा कि सांस्कृतिक एकता में कोई भी देश भारतीय प्रायद्वीप की बराबरी नहीं कर सकता है। इस संदर्भ में संस्कृति की बारीकी से व्याख्या करने पर हमारी कालातीत सभ्यतामूलक अंत:चेतना सामने आती है जो कि युगों की कसौटी पर खरी उतरी है। आंबेडकर की बुनियाद भारतीय सभ्यता और संस्कृति में थी। ये भी कहा जाता है कि आंबेडकर संस्कृत को भारत की आधिकारिक भाषा बनाने के प्रस्ताव के पक्ष में थे। वह हमारी सांस्कृति समृद्धि का हवाला देते रहते थे। मौजूदा वक़्त आंबेडकर के व्यक्तित्व के विविध पहलुओं के ईमानदार विश्लेषण का है। और आंबेडकर जयंती (14 अप्रैल) उनकी विरासत को लेकर एक नया, निष्पक्ष और रचनात्मक सार्वजनिक संवाद शुरू करने का उचित अवसर है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर आंबेडकर की पकड़, चीन को लेकर उनकी चेतावनी, और अर्थशास्त्र में उनकी असाधारण विद्वता को मौजूदा पीढ़ी के सामने लाया जाना चाहिए। आंबेडकर को मात्र सामाजिक न्याय का योद्धा और एक विशिष्ट दलित नेता के रूप में देखना उनकी विरासत के साथ बड़ा अन्याय होगा। (लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (श्रेया नंदी और शैली सेठ मोहिले)। नेपाल सरकार ने विदेशी मुद्रा भंडार में कमी के मद्देनजर गैर-जरूरी वस्तुओं के आयात पर रोक लगा दी है, जिसका असर भारत से होने वाले निर्यात पर पड़ सकता है। निर्यातकों ने पिछले हफ्ते कहा था कि नेपाल के केंद्रीय बैंक (नेपाल राष्ट्र बैंक) ने वहां के वाणिज्यिक बैंकों को निर्देश दिया था कि देश के विदेशी मुद्रा भंडार में आ रही गिरावट थामने के लिए वे गैर-जरूरी वस्तुओं के आयात के लिए उधार सुविधा पत्र (क्रेडिट लैटर) जारी न करें। नेपाल की मीडिया रिपोर्ट के अनुसार साइकल, मोपेड, चावल, सोना-चांदी, बिजली के उपकरणों आदि के आयात के लिए उधार पत्र जारी नहीं किया जाएगा। हाल के महीनों में नेपाल में आयात बढ़ने से देश से काफी मात्रा में विदेशी मुद्रा बाहर जा रही थी, जिससे आर्थिक संकट पैदा होने की चिंता बढ़ गई है। नेपाल दूतावास के एक अधिकारी ने आयात पर लगाए गए प्रतिबंध की पुष्टि की। हालांकि यह प्रतिबंध कितने समय तक रहेगा इस पर कोई टिप्पणी करने से उन्होंने इनकार कर दिया। भारत सरकार के एक अधिकारी ने कहा कि नेपाल और भारत के बीच स्थानीय मुद्रा कारोबार की अनुमति दी गई है लेकिन नेपाल के पास आयात के लिए भुगतान करने के लिए पर्याप्त मात्रा में भारतीय रुपया नहीं है। भारतीय निर्यात संगठनों के संघ (फियो) के महानिदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अजय सहाय ने कहा कि निर्यातक चिंतित हैं और वे आयात प्रतिबंध पर नेपाल से आधिकारिक पुष्टि मिलने का इंतजार कर रहे हैं। उन्होंने कहा, अधिकांश निर्यातकों को इसके बारे में पता नहीं है। श्रीलंका में घटनाक्रम देखने के बाद नेपाल सतर्क हो रहा है और यही कारण है कि वहां आयात सीमित किए जा रहे हैं। अभी तक हमारे पास इस बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है कि आयात के लिए किन सामानों को अनुमति नहीं दी जाएगी। कई देशों (जैसे श्रीलंका) में जैसे हालात बन रहे हैं ऐसे में निश्चित रूप से वैश्विक कारोबार को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है और यही चिंता का एक बड़ा कारण है। वाहन उद्योग के अधिकारियों का कहना है कि नेपाल में आयात पर रोक से फिलहाल कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन भविष्य में नए अनुबंधों के मामले में चुनौती खड़ी हो सकती है। वाहन उद्योग के एक अधिकारी ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि वाहन और इसके कल-पुर्जों को भी प्रतिबंधित गैर-जरूरी वस्तुओं की सूची में शामिल किया गया है। हालांकि आयात के लिए मौजूदा उधार पत्र पहले की तरह ही नेपाल में मान्य होंगे। ऐसे में भारत से होने वाले निर्यात पर हाल-फिलहाल कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि अभी उधार पत्र उपलब्ध हैं। उधार पत्र वित्तीय अनुबंध या दस्तावेज होता है, जो विक्रेताओं को खरीदारों की ओर से भुगतान की गारंटी प्रदान करता है। समस्या नए अनुबंध की होगी, जिसके लिए नए उधार पत्र की जरूरत होगी। उक्त अधिकारी ने कहा कि इस निर्णय का मकसद नेपाल में जून में शुरू होने वाले बजट सत्र से पहले व्यापार संतुलन के घाटे को कम करना है। हमें लगता है कि यह अस्थायी उपाय है। भारत हर साल नेपाल को 60 से 70 करोड़ डॉलर मूल्य के वाहन और कल-पुर्जे निर्यात करता है। मूल्य के लिहाज से कुल निर्यात में इसकी हिस्सेदारी करीब 4 फीसदी है। भारतीय इंजीनियरिंग एवं निर्यात संवर्द्घन परिषद के सूत्रों ने कहा कि वह अभी इस प्रतिबंध के प्रभाव का आकलन कर रहा है। इस बारे में कोई टिप्पणी करना अभी जल्दबाजी होगा। पहले यह समझना होगा कि किन उत्पादों के आयात पर रोक लगाई गई है। निर्यात के मामले में नेपाल भारत का नौवां सबसे प्रमुख ठिकाना है। 2021 में भारत से 9.6 अरब डॉलर मूल्य की वस्तुओं का निर्यात किया गया था और कुल निर्यात में इसकी हिस्सेदारी 2 फीसदी से अधिक थी। नेपाल भारत का 29वां सबसे बड़ा व्यापरिक साझेदार है और नेपाल में भारत विदेशी निर्यात का सबसे बड़ा स्रोत और अग्रणी भागीदार है। 2021-22 के पहले 11 महीने में दोनों देशों के बीच 10 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ था। नेपाल में भारतीय दूतावास के अनुसार नेपाल में वस्तुओं के व्यापार में भारत की हिस्सेदारी दो-तिहाई और सेवाओं में करीब एक-तिहाई है। नेपाल के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में भारत की हिस्सेदारी एक-तिहाई है। करीब 100 फीसदी पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति भारत से ही होती है और भारत में रहने वाले पेंशनभोगी, पेशेवर तथा श्रमिक काफी मात्रा में पैसे वहां भेजते हैं। एशियाई विकास बैंक ने अपनी नई रिपोर्ट में कहा कि यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के कारण तेल की ऊंची कीमतें होने से आयात बिल और बढ़ेगा। साथ ही नेपाल का व्यापार संतुलन बिगड़ने की भी संभावना है। इसमें चेतावनी देते हुए कहा गया, इन घटनाओं की वजह से चालू खाते का घाटा वित्त वर्ष 2022 में जीडीपी के 9.7 फीसदी तक बढ़ने का अनुमान है जो वित्त वर्ष 2021 में 8.0 फीसदी तक था।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (देवाशीष बसु)। डीएचएफएल में भारी नुकसान उठाने वाले निवेशकों ने सोचा था कि इस दिवालिया वित्तीय कंपनी के प्रवर्तक कपिल और धीरज वधावन तलोजा जेल में बंद होंगे। लेकिन अब खुलासा हुआ है कि वे नींद में दिक्कत जैसी मामूली अस्वस्थता को लेकर पिछले 15 महीनों से कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में आराम से जमे हुए हैं। वधावन धन शोधन रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के तहत हिरासत में थे। उन पर हजारों फर्जी खाते खोलने और फर्जी ऋण देने (कुख्यात बांद्रा खाते) और 40,000 करोड़ रुपये के घाटे जैसे आपराधिक कार्य करने का आरोप है। उन्होंने ऐसा पहली बार नहीं किया है। दो साल पहले अप्रैल 2020 में महामारी के दौरान सख्त लॉकडाउन के दौरान वधावन परिवार के 23 सदस्यों को प्रतिबंधों के उल्लंघन और मौज-मस्ती के लिए मुंबई से महाबलेश्वर जाने की मंजूरी दी गई थी। उस समय सीबीआई ने कहा था कि वे भाग गए हैं। जब पूरा महाराष्ट्र बंद था तो वे कैसे अपनी गाड़ियां लेकर महाबलेश्वर पहुंच गए? गृह विभाग के प्रधान सचिव (विशेष) अमिताभ गुप्ता ने उन्हें मंजूरी के लिए अपने लेटरहेड पर एक पत्र जारी किया था। जब यह खबर बाहर आ गई तो राज्य के तत्कालीन गृह मंत्री अनिल देशमुख ने जांच के आदेश दिए और गुप्ता के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का वादा किया। गुप्ता ने मानवीय आधार पर मंजूरी देने का दावा किया था। यह सख्त कार्रवाई क्या थी? उन्हें जांच में बरी कर दिया गया और पांच महीने बाद पदोन्नत कर पुणे का पुलिस प्रमुख बना दिया गया। शायद वधावन मामले को देख रहे हर व्यक्ति को भी इनाम मिलना बाकी है, जिन्होंने उन्हें 15 महीने अस्पताल में रहने (एक निजी अस्पताल में नौ महीने) की मंजूरी दी है। एक अन्य और ज्यादा बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) के मामले में पूर्व चयरमैन रवि पार्थसारथी खुले घूम रहे हैं। आईएलऐंडएफएस करीब एक लाख करोड़ रुपये के कर्ज के साथ दिवालिया हो गई थी। पार्थसारथि को गिरफ्तार किया गया लेकिन केवल इसलिए क्योंकि तमिलनाडु पुलिस ने एक निजी कंपनी की शिकायत पर कार्रवाई की थी। हालांकि उन्हें जमानत मिल गई। लेकिन उनके कार्याधिकारियों के उस समूह के सदस्यों को नहीं मिली, जिन्होंने पार्थसारथि को आईएलऐंडएफएस को चलाने में 25 साल मदद दी थी। उनके सहयोगी कई साल से जेल में हैं, लेकिन वह खुले घूम रहे हैं। शायद इसलिए कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के जिन अधिकारियों ने आईएलऐंडएफएस के साथ जुड़ाव का लाभ उठाया था, वे अब उसके बदले में मदद दे रहे हैं। कुछ सप्ताह पहले ही केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) की पूर्व प्रबंध निदेशक और उनके सहकर्मी-पूर्व समूह परिचालन अधिकारी आनंद सुब्रमण्यन को गिरफ्तार किया है। अगर सीबीआई वास्तव में एनएसई में एल्गो घोटाले की जांच करना चाहती है तो वास्तविक लाभार्थियों, घोटाले में मदद देने वाले लोगों और एक उचित जांच को पटरी से उतारने वाले व्यक्तियों को जवाबदेह बनाया जाए। क्या डीएचएफएल और आईएलऐंडएफएस की तरह एनएसई घोटाले की बड़ी मछलियों को लेकर भी नरमी दिखाई जाएगी? लगातार अकुशलता और भ्रष्टाचार का चौथा उदाहरण सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (पीएसबी) हैं। समाधान के लिए स्वीकृत मामलों में से करीब एक तिहाई का परिसमापन हुआ है और इनमें वसूली की दर महज 5 फीसदी है। अगर शीर्ष 15 मामलों (समाधान मूल्य के लिहाज से) को छोड़ दें तो वसूली की दर महज 18 फीसदी है। पीएसबी को 90 फीसदी से ज्यादा बकाया छोड़ना पड़ा है। यह इस मुद्दे की तरफ संकेत है कि कोई भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में भ्रष्टाचार के खिलाफ काम नहीं करना चाहता है, जिसे बड़े सहज तरीके से जांच-पड़ताल में खामी करार दे दिया जाता है। एक आम आदमी बैंक के हित पूरे हुए बिना एक रुपया उधार नहीं ले सकता है। ऐसे में हजारों कंपनियां ऐसा करने में कैसे कामयाब रहीं? बैंक अधिकारियों को उधार देते समय नहीं पता होता कि कोई उद्यम सफल होगा या असफल और कर्ज लेने वाला ईमानदार है या जालसाज। इसलिए वे अपने ऋण को सुरक्षित करने के लिए पर्याप्त संपत्ति गिरवी और व्यक्तिगत गारंटी की मांग करते हैं। जब ब्याज और मूलधन को लौटाने में देरी होती है तो वे निर्धारित प्रक्रिया को अपना सकते हैं और गिरवी संपत्ति को बेच सकते हैं। वे कर्जदारों से भी व्यक्तिगत गारंटी के मुताबिक भुगतान करने की मांग कर सकते हैं। ऐसा छोटे कर्जदारों के साथ नियमित रूप से होता है। ऐसे में इतने अधिक मामलों में वसूली केवल 5 फीसदी और कुछ कुख्यात मामलों में महज 1-2 फीसदी ही क्यों हैं? फंसे ऋणों का एक सबसे बड़ा कारण-भ्रष्ट बैंक अधिकारियों और कारोबारियों का गठजोड़ है और कुछ मामलों में उनकी नकेल राजनेताओं के पास है। लेकिन मुश्किल से ही किसी बैंक अधिकारी को जेल में डाला गया है। भाजपा के सत्ता में आने से पहले 2014 में हर भाषण में नरेंद्र मोदी पिछली सरकार को भ्रष्ट बताते थे। उन्होंने भ्रष्टाचार कम करने और सुशासन लाने के लिए चौकीदार के रूप में काम करने का वादा किया था। क्या यह नारा काम कर रहा है? बहुत ज्यादा नहीं। यह अत्यधिक मुश्किल और लंबी अवधि की प्रक्रिया है। मुझे यकीन नहीं है कि अगर मोदी चाहें भी तो एक चौकीदार के रूप में काम कर सकते हैं। लेकिन वह भ्रष्टाचार के मामलों का खुलासा होने के बाद उनका त्वरित समाधान सुनिश्चित करके निश्चित रूप से थानेदार के रूप में काम कर सकते हैं। घोटाले, कदाचार आदि नियमित रूप से इसलिए घटित होते हैं क्योंकि पकड़े जाने की कीमत बहुत मामूली है। इसके बावजूद हम दंड, जुमार्नों, नौकरी से निकालने, मिसाल कायम करने वाले नुकसान और व्यक्तिगत जिम्मेदारी जैसे उपायों पर ध्यान नहीं देते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि पूरी दुनिया में यही स्थिति है। हालांकि आम तौर पर कहा जाता है कि अपराध से कुछ नहीं मिलता है और उनकी कीमत चुकानी पड़ती है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (आदिति फडणीस)। श्रीलंका लगातार एक के बाद दूसरे संकट से जूझ रहा है। अपनी कई समस्याओं के लिए वह स्वयं उत्तरदायी है। परंतु कोविड-19 के प्रभाव तथा रूस-यूक्रेन युद्ध जैसी बाहरी घटनाओं ने भी उसे प्रभावित किया है। एक बात एकदम स्पष्ट है कि जहां भी सत्ता के दो केंद्र रहे हैं, वहां अंत:स्फोट की स्थितियां बनी हैं। चाहे मामला राजनीति का हो या आर्थिक नीति निर्माण का। हाल के वर्षों में श्रीलंका की मुश्किलों की शुरूआत सन 2014-15 में हुई थी, जब प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों का एक गठजोड़ तैयार हुआ था। वाम झुकाव वाली श्रीलंका फ्रीडम पार्टी (एसएलएफपी) और मुक्त बाजार समर्थक यूनाइटेड नैशनल पार्टी (यूएनपी) का यह गठजोड़ तैयार करने में पूर्व राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरीसेना और प्रधानमंत्री राणिल विक्रमसिंघे की अहम भूमिका थी। नैशनल यूनिटी फ्रंट (एनयूजी) की पहली सरकार ने महिंदा राजपक्षे की श्रीलंका पीपुल्स पार्टी (एसएलपीपी) की सरकार को पराजित किया था। लेकिन अगले दो ही वर्षों में हालात बदल गए। विवाद और सत्ता को लेकर संघर्ष उस समय चरम पर पहुंच गया जब सिरीसेना ने एक संवैधानिक तख्तापलट के जरिये विक्रमसिंघे को हटा दिया और 2018 में महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री बना दिया। इस बीच देश के सर्वोच्च न्यायालय ने दखल दिया और दिसंबर 2018 में विक्रमसिंघे को बहाल करने का आदेश दिया। अब तक सरकार में सत्ता के दो प्रतिद्वंद्वी केंद्र सामने आ चुके थे। अफसरशाही को भी दो में से किसी एक को चुनने में मुश्किल हो रही थी। श्रीलंका का यह दावा कि वहां सन 2009 से कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ है, 21 अप्रैल, 2019 को गलत साबित हो गया जब ईस्टर के दिन वहां बम विस्फोट हुए। इसके बावजूद सत्ता के शीर्ष पर आपसी लड़ाई ने खत्म होने का नाम नहीं लिया। सिरीसेना ने अपने रक्षा सचिव से कहा कि वह प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (एनएससी) की बैठक में आमंत्रित न करें। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने बम विस्फोट की घटनाओं को लेकर दो समांतर जांचों के आदेश जारी कर दिए। श्रीलंका इस समय अर्थव्यवस्था पर कोविड-19 के असर तथा रूस-यूक्रेन युद्ध के प्रभाव के रूप में दोहरे संकट का सामना कर रहा है। विदेशों से कम धन आने तथा पर्यटकों के न आने के कारण विदेशी मुद्रा भंडार न्यूनतम स्तर पर पहुंच चुका है। ये दोनों श्रीलंका के राजस्व के दो प्रमुख स्रोत हैं। उस पर बकाया कर्ज भी बहुत बड़ी मात्रा में है। ऐसी स्थिति में केवल दो ही विकल्प नजर आते हैं: मित्र देशों से मदद की प्रार्थना की जाए या अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के पास जाकर कर्ज चुकाने तथा अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए कर्ज की मांग की जाए। केंद्रीय बैंक के गवर्नर अजित निवार्ड कबराल ने बार-बार आईएमएफ के पास जाने से इनकार किया है। उन्होंने कैबिनेट की ऐसी सलाह भी ठुकरा दी। वित्त मंत्री बेसिल राजपक्षे ने 2021 का सालाना बजट पेश करते समय भी यह स्वीकार किया कि उनके देश को आईएमएफ के पास जाना पड़ सकता है। कबराल ने जोर देकर कहा कि विदेशी मुद्रा की समस्या अस्थायी हैऔर देश की अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में है। श्रीलंका के कुलीनों (श्रीलंका एक लोकतांत्रिक समाजवादी गणराज्य है) ने कबराल के पूर्वग्रह को स्पष्ट किया : आईएमएफ के पास जाने का अर्थ होता मुद्रा का अवमूल्यन, ब्याज दरों में इजाफा, सरकारी वाणिज्यिक उपक्रमों का निजीकरण और कर्ज में और डूब जाना। राष्ट्रपति के छोटे भाई बेसिल राजपक्षे को इस बात का श्रेय दिया जाता है कि उनकी बनायी रणनीतियों पर चलकर ही राजपक्षे सत्ता में वापस लौटे। परंतु वह देश के केंद्रीय बैंक के गवर्नर से सार्वजनिक रूप से असहमत दिखे। जब चीन ने श्रीलंका के लिए दरवाजे बंद कर लिए और वित्त मंत्री को भारत से एक नहीं बल्कि अनेक बार मदद मांगनी पड़ी तब राष्ट्रपति ने दखल दिया। राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे ने व्यक्तिगत रूप से दखल दिया और स्पष्ट किया कि मुद्रा का अवमूल्यन करने तथा मदद के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास जाने के बाद कबराल से पद छोड़ने को नहीं कहा गया था। यदि आर्थिक नीति को लेकर व्यवस्थित ढंग से विचार किया गया होता तो शायद श्रीलंका की आम जनता को इतनी मुश्किलों का सामना न करना पड़ता। कई विपक्षी नेता मानते हैं कि अगर पहले आईएमएफ की मदद ली जाती तो श्रीलंका को 12-12 घंटे की बिजली कटौती और खाने की कमी से बचाया जा सकता था। तब खुद पर गर्व करने वाला यह देश इस कदर शक्तिहीन नहीं महसूस करता। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि श्रीलंका आईएमएफ से कितनी मदद चाहता है। कबराल भी इस वार्ता में शामिल हैं। वह कड़ा मोलतोल करना चाह रहे हैं। उनकी दलील है कि श्रीलंका ने आईएमएफ के पास जाने के पहले अपनी मुद्रा का अवमूल्यन किया और उसने कभी किसी ऋण को चुकाने में चूक नहीं की। उनके मुताबिक यह वित्तीय हालत बेहतर रखने की उनकी देश की प्रतिबद्धता का प्रतीक है। हकीकत यह है कि श्रीलंका आईएमएफ के पास तब गया है जब वह डिफॉल्ट के कगार पर है। इन हालात में एक भारतीय के रूप में देखा जाए तो भारत के ताजा कदमों से राहत मिलती है। श्रीलंका ने अपने अस्पताल संचालित रखने के लिए भारत से मदद नहीं मांगी। भारत ने मदद की पेशकश की। भारत सैकड़ों अन्य छोटे-मोटे हस्तक्षेप भी कर सकता है जिनका भारत पर कोई खास बोझ नहीं पड़ेगा। ऐसा करके वह श्रीलंकाई कुलीनों के मन की वह आशंका दूर कर सकता है जिसके तहत वे अपनी सरकार से पूछ रहे हैं कि इसके बदले में क्या दिया जाएगा? भारत इतना अच्छा व्यवहार क्यों कर रहा है? भारत के पास अवसर है कि वह एक मददगार पड़ोसी की भूमिका निभाकर तथा ऐसी समस्याएं सुधारकर उपमहाद्वीप में अपनी छवि सुधार सके जिन्हें पैदा करने में उसकी कोई भूमिका नहीं रही। उसे इस अवसर का पूरा लाभ लेना चाहिए।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सुनीता नारायण)। विश्व जल दिवस इस लिहाज से भी अलग था कि जलवायु परिवर्तन अपने शबाब पर है। यानी हमें हर वह काम करना होगा जो करने की जरूरत है। वर्षा जल की हरेक बूंद को जमा कर पानी की उपलब्धता बढ़ानी है, इसका इस्तेमाल इतने कारगर ढंग से करना है कि वर्षा जल की हरेक बूंद का इस्तेमाल हमारे भोजन या फ्लश होने वाले पानी में हो। हमें यह भी सुनिश्चित करना है कि इस्तेमाल पानी की हरेक बूंद का पुनर्चक्रण हो और प्रदूषण से वह खराब न हो। हम यह बात पहले से जानते हैं और अमल में भी लाते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के दौर में इतना ही काफी नहीं होगा। हमें ये सारे काम कहीं अधिक तेजी से और व्यापक स्तर पर अलग ढंग से करने होंगे। हमें मालूम है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का ताल्लुक गर्मी और कम-ज्यादा बारिश से है। इन दोनों का जल चक्र से सीधा सह-संबंध है। इस तरह जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए पानी एवं उसके प्रबंधन पर ध्यान देना होगा। हमें पता है कि हर नया साल इतिहास का सर्वाधिक गरम साल बनता जा रहा है और पिछले रिकॉर्ड को तोड़ता जा रहा है। भारत में ओडिशा के कुछ हिस्सों में तापमान फरवरी की शुरूआत में ही 40 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया था। उत्तर भारतीय राज्य बढ़ती गर्मी एवं सामान्य से अधिक तापमान के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं। खास बात यह है कि यह सब "ला नीना" के साल में हो रहा है। ला नीना प्रशांत महासागर की वे जल धाराएं हैं जो दुनिया का तापमान कम करने के लिए जिम्मेदार मानी जाती हैं। लेकिन भारत के मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि वैश्विक ताप वृद्धि ने ला नीना के इस शीतकारी प्रभाव को कम कर दिया है। बढ़ती हुई गर्मी का जल सुरक्षा के लिहाज से कई मायने हैं। पहला, इसका मतलब है कि जल इकाइयों से अधिक वाष्पीकरण होगा। यानी हमें न सिर्फ लाखों जल निकायों में पानी जमा करने पर ध्यान देने की जरूरत है बल्कि वाष्पन के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए भी योजना बनानी होगी। एक विकल्प भूमिगत जल भंडारण यानी कुओं पर काम करने का है। भारत लंबे वक्त से भूमिगत जल प्रणालियों के प्रबंधन को कम तवज्जो देता रहा है क्योंकि सिंचाई विभाग की समूची अफसरशाही ही नहरों एवं अन्य सतही जल प्रणालियों पर आधारित है। लेकिन जलवायु परिवर्तन एवं पानी की भारी किल्लत के इस दौर में इसे बदलने की जरूरत होगी। हमें तालाबों, पोखरों एवं नहरों से होने वाले नुकसान की भरपाई के तरीके तलाशने होंगे। ऐसा नहीं है कि वाष्पीकरण से पहले नुकसान नहीं होता था लेकिन तापमान बढ़ने के साथ इसकी दर बहुत ज्यादा हो गई है। हमें योजना बनाने और अधिक काम करने की जरूरत है। दूसरा, बढ़ती गर्मी का मतलब है कि मिट्टी में नमी कम होती जाएगी जिससे जमीन में धूल की मात्रा बढ़ जाएगी और सिंचाई की जरूरत बढ़ती जाएगी। भारत जैसे देश में जहां भोजन का बड़ा हिस्सा अब भी वर्षा-सिंचित इलाकों में ही पैदा होता है, वहां पर मिट्टी की नमी कम होने से भूमि अपरदन तेज होगा और धूल का बनना भी बढ़ जाएगा। जल प्रबंधन को वनस्पति नियोजन के साथ तालमेल बिठाकर चलना होगा ताकि मिट्टी में पानी को रोके रखने की क्षमता बेहतर हो, अधिक देर तक चलने वाली तीव्र गर्मी के दौर में भी। तीसरा, साफ है कि गर्मी बढ़ने से पानी का इस्तेमाल बढ़ जाएगा क्योंकि पीने एवं सिंचाई के साथ ही जंगलों या इमारतों में लगी आग बुझाने के लिए भी ज्यादा पानी की दरकार होगी। हम दुनिया के कई हिस्सों एवं भारत में भी जंगलों में भीषण आग लगने के डरावने दृश्य देख चुके हैं। तापमान जैसे-जैसे बढ़ता जाएगा, यह सिलसिला भी तेज होता जाएगा। जलवायु परिवर्तन से पानी की मांग बढ़ेगी लिहाजा यह और भी जरूरी हो जाता है कि हम पानी के साथ अपशिष्ट जल को भी बरबाद न करें। सच यह है कि अत्यधिक बारिश होने की बढ़ती घटनाओं के संदर्भ में भी जलवायु परिवर्तन का असर दिख रहा है। हम बारिश के एक बाढ़ के तौर पर आने की भी अपेक्षा करें। इस तरह बाढ़ों का एक चक्र पूरा होने के बाद सूखे की स्थिति और भी गंभीर हो। भारत में पहले से ही साल में बारिश कम दिन होती है। साल भर में औसतन सिर्फ 100 घंटे की ही बारिश होती है। लेकिन जलवायु परिवर्तन बारिश वाले दिनों की संख्या और कम करेगा। वैसे भारी बारिश वाले दिनों की संख्या बढ़ जाएगी। इसका जल प्रबंधन की हमारी योजनाओं पर बड़ा असर होगा। हमें बाढ़ प्रबंधन पर अधिक शिद्दत से गौर करने की जरूरत है, नदियों के तटबंध बनाने के साथ ही बाढ़ के पानी को भूमिगत एवं सतहीय जलभंडार निकायों-कुओं एवं तालाबों में जमा किया जा सके। लेकिन हमें वर्षा जल को इकट्ठा करने के बारे में अलग तरह से योजना बनाने की जरूरत है। फिलहाल मनरेगा के तहत लाखों की संख्या में बन रहे तालाब एवं पोखर सामान्य बारिश के हिसाब से डिजाइन हैं। लेकिन अब भारी बारिश की बात आम होने के साथ ही ये जल भंडार संरचनाओं को भी नए सिरे से डिजाइन करने की जरूरत है ताकि वे लंबे समय तक लबालब रहें। मूल बात यह है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में हमें पानी की हर बूंद बचानी होगी, चाहे बारिश का पानी हो या बाढ़ का पानी। हमें पानी एवं उसके प्रबंधन को लेकर पहले जुनूनी होना था लेकिन अब तो सेहत एवं दौलत के आधार पानी को लेकर हमें संकल्पित एवं सुविचारित रवैया अपनाना होगा। यह अपने भविष्य को बनाने- बिगाड़ने की बात है। अगर हम आज गंभीर न हुए तो पानी सबसे बड़ा संकट बन सामने आयेगा। (लेखिका सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट से संबद्ध हैं)।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (जैमनी भगवती)। आजादी के बाद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4) के तहत सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े तबकों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। आरंभ में आरक्षण की व्यवस्था 10 वर्ष के लिए होनी थी लेकिन हर 10 वर्ष के बाद उसे आगे बढ़ाने का सिलसिला चलता रहा। फिलहाल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग को सरकारी रोजगार, सरकारी कंपनियों और शैक्षणिक संस्थानों में नौकरी तथा सीटों के मामले में 49.5 फीसदी आरक्षण प्राप्त है। जनवरी 2019 में यानी अप्रैल-मई 2019 के लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले संसद ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 10 फीसदी अतिरिक्त आरक्षण को मंजूरी दे दी। इसके अलावा राज्य विधानसभाओं और लोकसभा में भी अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए सीटें आरक्षित हैं। यह संभव है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए घोषित 10 फीसदी का आरक्षण शायद कुल आरक्षण को बढ़ाकर 59.5 फीसदी नहीं करे क्योंकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और अनुसूचित जाति-जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण उसका अतिव्यापन कर सकता है। बहरहाल यदि आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण लागू होता है तो संभव है कि वह सन 1993 में सर्वोच्च न्यायालय के नौ न्यायाधीशों वाले पीठ के उस निर्णय का उल्लंघन कर दे जिसमें उन्होंने सभी प्रकार के आरक्षण के लिए कुल मिलाकर 50 फीसदी की सीमा तय की थी। फिलहाल 10 फीसदी अतिरिक्त आरक्षण के खिलाफ कई याचिकाएं लंबित हैं। आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण के पहले भी तमिलनाडु विधानसभा ने कुल मिलाकर 69 फीसदी आरक्षण को मंजूरी दे दी थी। अप्रैल 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले तमिलनाडु की द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) ने राज्य के निवासियों के लिए 75 फीसदी आरक्षण का वादा किया है। मध्य प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और हरियाणा पहले ही रोजगार में स्थानीय लोगों के आरक्षण की नीतियां बना चुके हैं। देशभर में कई याचिकाएं दायर कर 50 फीसदी के ऊपर के आरक्षण को समाप्त करने की मांग की गई है। खासतौर पर 8 फरवरी को खबर आई कि सर्वोच्च न्यायालय एक ऐसी याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया है जो तमिलनाडु में 50 फीसदी से अधिक आरक्षण को चुनौती देती है। परिणामस्वरूप अब तक राज्यों में मौजूदा आरक्षण के अतिरिक्त स्थानीय लोगों के लिए आरक्षण के क्रियान्वयन का कानूनी दर्जा अस्पष्ट है। ऐसे आरक्षण के स्तर के पक्ष में दलील यह है कि देश में अभी भी सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से वंचितों की तादाद बहुत अधिक है। शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का पारदर्शी और निष्पक्ष क्रियान्वयन जटिल है जिसके चलते कई कानूनी विवाद पैदा हुए। यदि आरक्षण कोटा विश्वविद्यालय स्तर पर होता है तो व्यक्तिगत विभागों में यह 50 फीसदी का स्तर पार कर सकता है। एक अन्य मुद्दा यह है कि किसे क्रीमी लेयर का हिस्सा होने के कारण अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के लायक नहीं माना जाए। फिलहाल क्रीमी लेयर में वे लोग आते हैं जिनकी सालाना पारिवारिक आय 8 लाख रुपये से अधिक है। गैर पिछड़ा वर्ग के लोगों को लगता है कि यदि पिछड़ा वर्ग के लोग स्वरोजगार में हैं तो उनकी आय का आकलन आसान नहीं है। उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासी श्रमिक दशकों से मुंबई, दिल्ली या बेंगलूरु में किराये के मकानों में रहते हैं। उनके लिए खुद को वहां का निवासी साबित करना मुश्किल है। परिणामस्वरूप राज्यस्तरीय आरक्षण भारतीय श्रम बाजार को आर्थिक रूप से अक्षम बना सकता है। खबरों के मुताबिक सर्वोच्च न्यायालय को 15 मार्च, 2021 से 50 फीसदी सीमा के मामले पर सुनवाई करनी थी। शीर्ष न्यायालय को स्पष्ट करना चाहिए कि देश में आरक्षण के अलग-अलग स्तर नहीं हो सकते और अलग-अलग राज्य ऐसे कानून नहीं बना सकते कि रोजगार वहां के निवासियों के लिए आरक्षित होंगे। समाचार पत्रों में 19 मार्च, 2021 को प्रकाशित खबरों के मुताबिक महाराष्ट्र में राज्य के विशिष्ट आरक्षण से संबंधित याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने चुटीले अंदाज में यह तक पूछ डाला कि क्या आजादी के बाद से कोई सामाजिक-आर्थिक प्रगति हासिल नहीं हुई? यह बात शायद सबसे जानकार भारतीयों पर भी लागू होती है। केंद्र सरकार को संसद में श्वेत पत्र पेश करना चाहिए ताकि आरक्षण के क्रियान्वयन को लेकर स्पष्टता आ सके। हालांकि ऐसा होने की संभावना बहुत कम है क्योंकि आरक्षण मतदाताओं और ज्यादातर राजनीतिक दलों के लिए बहुत संवेदनशील मसला है। आरक्षण में इजाफे के खिलाफ या मौजूदा स्तर का आरक्षण जारी रखने के विरोध में कुछ कहा जाए तो यह भावनात्मक दलील दी जाती है कि अनुसूचित जाति-जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ हजारों साल के भेदभाव को कुछ दशकों में पूरा नहीं किया जा सकता। हालिया अतीत का एक उदाहरण है करीब दो सौ वर्ष के ब्रिटिश शासन के कारण भारतीय उपमहाद्वीप की गरीबी। लब्बोलुआब यह कि अतिरिक्त आरक्षण शासन मानकों को शिथिल करेगा तथा केंद्र, राज्यों और नगर निकाय स्तर के प्रदर्शन पर असर पड़ेगा। शैक्षणिक संस्थान भी अप्रभावित नहीं रह सकेंगे। मिसाल के तौर पर नैशनल एसोसिएशन आॅफ सॉफ्टवेयर ऐंड सर्विस कंपनीज ने संकेत दिया है कि उससे संबद्ध कंपनियों में से 80 प्रतिशत को लगता है कि हरियाणा के नागरिकों की पक्षधर आरक्षण नीतियां उनके कारोबार और भविष्य की निवेश योजनाओं को प्रभावित करेंगी। देश की राष्ट्रीय और राज्य सरकारें न केवल आरक्षण की मदद करती हैं बल्कि अतिरिक्त आरक्षण की मांग को प्रोत्साहन देती हैं। देश में हर प्रकार के आरक्षण को खत्म करने की जरूरत है और इस दौरान उन लोगों को उचित वित्तीय सहायता मुहैया कराई जानी चाहिए जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए हैं। (लेखक पूर्व भारतीय राजदूत एवं विश्व बैंक के ट्रेजरी प्रोफेशनल हैं)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (शिवशंकर उरांव)। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) कल अपना 41वां स्थापना दिवस मनायेगी। 6 अप्रैल, 1980 को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता में जनसंघ से निकले लोगों ने भारतीय जनता पार्टी बनाई। वाजपेयी और लंबे अरसे तक पार्टी में उनकी परछाई बनकर रहे पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने मिलकर पार्टी को 1984 में दो सीट से 1998 में 182 सीटों तक ला खड़ा कर दिया था। हिंदुत्व और राम जन्मभूमि के एजेंडे पर आगे बढ़ी बीजेपी ने 2014 में अपने दम पर पूर्ण बहुमत का स्वाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चखा। 2014 में बीजेपी ने 282 सीटों पर जीत दर्ज की थी तो वहीं 2019 में उसकी सीटों का आंकड़ा 300 पार चला गया था। भारत को एक समर्थ राष्ट्र बनाने के लक्ष्य के साथ भाजपा का गठन 6 अप्रैल, 1980 को नई दिल्ली के कोटला मैदान में आयोजित एक कार्यकर्ता अधिवेशन में किया गया, जिसके प्रथम अध्यक्ष श्री अटल बिहारी वाजपेयी निर्वाचित हुए। आज तीन दशक बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में किसी एक पार्टी को देश की जनता ने पूर्ण बहुमत दिया है तथा भारी बहुमत से भाजपा नीत राजग सरकार केन्द्र में विद्यमान है। गांधीजी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाकर देश में एक नया राजनीतिक षड्यंत्र रचा जाने लगा। सरदार पटेल के देहावसान के पश्चात कांग्रेस में नेहरू का अधिनायकवाद प्रबल होने लगा। गांधी और पटेल दोनों के ही नहीं रहने के कारण कांग्रेस नेहरूवाद की चपेट में आ गई तथा अल्पसंख्यक तुष्टिकरण, लाइसेंस-परमिट-कोटा राज, राष्ट्रीय सुरक्षा पर लापरवाही, राष्ट्रीय मसलों जैसे कश्मीर आदि पर घुटनाटेक नीति, अंतर्राष्ट्रीय मामलों में भारतीय हितों की अनदेखी आदि अनेक विषय देश में राष्ट्रवादी नागरिकों को उद्विग्न करने लगे। नेहरूवाद तथा पाकिस्तान एवं बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार पर भारत के चुप रहने से क्षुब्ध होकर डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नेहरु मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। इधर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ स्वयंसेवकों ने भी प्रतिबंध के दंश को झेलते हुए महसूस किया कि संघ के राजनीतिक क्षेत्र से सिद्धांतत: दूरी बनाये रखने के कारण वे अलग-थलग तो पड़े ही, साथ ही संघ को राजनीतिक तौर पर निशाना बनाया जा रहा था। ऐसी परिस्थिति में एक राष्ट्रवादी राजनीतिक दल की आवश्यकता देश में महसूस की जाने लगी। फलत: भारतीय जनसंघ की स्थापना 21 अक्टूबर, 1951 को डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में दिल्ली के राघोमल आर्य कन्या उच्च विद्यालय में हुई। नेहरू के अधिनायकवादी रवैये के फलस्वरूप डॉ श्यामा प्रसाद मुकर्जी को कश्मीर की जेल में डाल दिया गया, जहां उनकी रहस्यपूर्ण स्थिति में मृत्यु हो गई। एक नई पार्टी को सशक्त बनाने का कार्य पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के कंधों पर आ गया। भारत-चीन युद्ध में भी भारतीय जनसंघ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा राष्ट्रीय सुरक्षा पर नेहरू की नीतियों का डटकर विरोध किया। 1967 में पहली बार भारतीय जनसंघ एवं पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नेतृत्व में भारतीय राजनीति पर लम्बे समय से बरकरार कांग्रेस का एकाधिकार टूटा, जिससे कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की पराजय हुई। सत्तर के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में निरंकुश होती जा रही कांग्रेस सरकार के विरूद्ध देश में जन-असंतोष उभरने लगा। गुजरात के नवनिर्माण आन्दोलन के साथ बिहार में छात्र आंदोलन शुरू हो गया। कांग्रेस ने इन आंदोलनों के दमन का रास्ता अपनाया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया तथा देशभर में कांग्रेस शासन के विरूद्ध जन-असंतोष मुखर हो उठा। 1971 में देश पर भारत-पाक युद्ध तथा बांग्लादेश में विद्रोह के परिप्रेक्ष्य में बाह्य आपातकाल लगाया गया था जो युद्ध समाप्ति के बाद भी लागू था। उसे हटाने की भी मांग तीव्र होने लगी। जनान्दोलनों से घबराकर इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने जनता की आवाज को दमनचक्र से कुचलने का प्रयास किया। परिणामत: 25 जून, 1975 को देश पर दूसरी बार आपातकाल भारतीय संविधान की धारा 352 के अंतर्गत आंतरिक आपातकाल के रूप में थोप दिया गया। देश के सभी बड़े नेता या तो नजरबंद कर दिये गए अथवा जेलों में डाल दिए गये। समाचार पत्रों पर सेंसर लगा दिया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित अनेक राष्ट्रवादी संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर एक नये राष्ट्रीय दल जनता पार्टी का गठन किया गया। विपक्षी दल एक मंच से चुनाव लड़े तथा चुनाव में कम समय होने के कारण जनता पार्टी का गठन पूरी तरह से राजनीतिक दल के रूप में नहीं हो पाया। आम चुनावों में कांग्रेस की करारी हार हुई तथा जनता पार्टी एवं अन्य विपक्षी पार्टियां भारी बहुमत के साथ सत्ता में आई। पूर्व घोषणा के अनुसार 1 मई, 1977 को भारतीय जनसंघ ने करीब 5000 प्रतिनिधियों के एक अधिवेशन में अपना विलय जनता पार्टी में कर दिया। जनता पार्टी का प्रयोग अधिक दिनों तक नहीं चल पाया। दो-ढाई वर्षों में ही अंतर्विरोध सतह पर आने लगा। भारतीय जनसंघ से जनता पार्टी में आये सदस्यों को अलग-थलग करने के लिए दोहरी-सदस्यता का मामला उठाया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंध रखने पर आपत्तियां उठायी जानी लगीं। यह कहा गया कि जनता पार्टी के सदस्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य नहीं बन सकते। 4 अप्रैल, 1980 को जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति ने अपने सदस्यों के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य होने पर प्रतिबंध लगा दिया। पूर्व के भारतीय जनसंघ से संबद्ध सदस्यों ने इसका विरोध किया और जनता पार्टी से अलग होकर 6 अप्रैल, 1980 को एक नये संगठन भारतीय जनता पार्टी की घोषणा की। इस प्रकार भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई। आज भारतीय जनता पार्टी विश्व की सबसे बड़ी पार्टी है। विश्व में भारत को सम्मान दिला हम सब के दिलों पर राज कर रही है। भारतीय जनता पार्टी एक सुदृढ़, सशक्त, समृद्ध, समर्थ एवं स्वावलम्बी भारत के निर्माण हेतु निरंतर सक्रिय है। पार्टी की कल्पना एक ऐसे राष्ट्र की है जो आधुनिक दृष्टिकोण से युक्त एक प्रगतिशील एवं प्रबुद्ध समाज का प्रतिनिधित्व करता हो तथा प्राचीन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति तथा उसके मूल्यों से प्रेरणा लेते हुए महान ह्यविश्वशक्तिह्ण एवं ह्यविश्व गुरूह्ण के रूप में विश्व पटल पर स्थापित हो। इसके साथ ही विश्व शांति तथा न्याययुक्त अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को स्थापित करने के लिए विश्व के राष्ट्रों को प्रभावित करने की क्षमता रखे। भाजपा भारतीय संविधान में निहित मूल्यों तथा सिद्धांतों के प्रति निष्ठापूर्वक कार्य करते हुए लोकतांत्रिक व्यवस्था पर आधारित राज्य को अपना आधार मानती है। पार्टी का लक्ष्य एक ऐसे लोकतान्त्रिक राज्य की स्थापना करना है जिसमें जाति, सम्प्रदाय अथवा लिंगभेद के बिना सभी नागरिकों को राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक न्याय, समान अवसर तथा धार्मिक विश्वास एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित हो। भाजपा ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित एकात्म-मानवदर्शन को अपने वैचारिक दर्शन के रूप में अपनाया है। साथ ही पार्टी का अंत्योदय, सुशासन, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, विकास एवं सुरक्षा पर भी विशेष जोर है। पार्टी ने पांच प्रमुख सिद्धांतों के प्रति भी अपनी निष्ठा व्यक्त की, जिन्हें पंचनिष्ठा कहते हैं। ये पांच सिद्धांत (पंच निष्ठा) हैं-राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय अखंडता, लोकतंत्र, सकारात्मक पंथ-निरपेक्षता (सर्वधर्मसमभाव), गांधीवादी समाजवाद (सामाजिक-आर्थिक विषयों पर गांधीवादी दृष्टिकोण द्वारा शोषण मुक्त समरस समाज की स्थापना) तथा मूल्य आधारित राजनीति। उपलब्धियां : श्री अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के प्रथम अध्यक्ष निर्वाचित हुए। अपनी स्थापना के साथ ही भाजपा राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हो गई। बोफोर्स एवं भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पुन: गैर-कांग्रेसी दल एक मंच पर आये तथा 1989 के आम चुनावों में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को भारी पराजय का सामना करना पड़ा। वी.पी. सिंह के नेतृत्व में गठित राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार को भाजपा ने बाहर से समर्थन दिया। इसी बीच देश में राम मंदिर के लिए आंदोलन शुरू हुआ। तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष श्री लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक के लिए रथयात्रा शुरू की। राम मंदिर आंदोलन को मिले भारी जनसमर्थन एवं भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता से घबराकर आडवाणी जी की रथयात्रा को बीच में ही रोक दिया गया। फलत: भाजपा ने राष्ट्रीय मोर्चा सरकार से समर्थन वापस ले लिया। और वीपी सिंह सरकार गिर गई तथा कांग्रेस के समर्थन से चन्द्रशेखर देश के अगले प्रधानमंत्री बने। आने वाले आम चुनावों में भाजपा का जनसमर्थन लगातार बढ़ता गया। इसी बीच नरसिम्हाराव के नेतृत्व में कांग्रेस तथा कांग्रेस के समर्थन से संयुक्त मोर्चे की सरकारों का शासन देशपर रहा, जिस दौरान भ्रष्टाचार, अराजकता एवं कुशासन के कईं कीर्तिमान स्थापित हुए। 1996 के आम चुनावों में भाजपा को लोकसभा में 161 सीटें प्राप्त हुईं। भाजपा ने लोकसभा में 1989 में 85, 1991 में 120 तथा 1996 में 161 सीटें प्राप्त कीं। भाजपा का जनसमर्थन लगातार बढ़ रहा था। श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पहली बार भाजपा सरकार ने 1996 में शपथ ली, परन्तु पर्याप्त समर्थन के अभाव में यह सरकार मात्र 13 दिन ही चल पाई। इसके बाद 1998 के आम चुनावों में भाजपा ने 182 सीटों पर जीत दर्ज की और श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने शपथ ली। परन्तु जयललिता के नेतृत्व में अन्नाद्रमुक द्वारा समर्थन वापस लिए जाने के कारण सरकार लोकसभा में विश्वासमत के दौरान एक वोट से गिर गई, जिसके पीछे वह अनैतिक आचरण था, जिसमें उड़ीसा के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री गिररिधर गोमांग ने पद पर रहते हुए भी लोक सभा की सदस्यता नहीं छोड़ी तथा विश्वासमत के दौरान सरकार के विरूद्ध मतदान किया। कांग्रेस के इस अवैध और अनैतिक आचरण के कारण ही देश को पुन: आम चुनावों का सामना करना पड़ा। 1999 में भाजपा 182 सीटों पर पुन: विजय मिली तथा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को 306 सीटें प्राप्त हुईं। एक बार पुन: श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा-नीत राजग की सरकार बनी। भाजपानीत राजग सरकार ने श्री अटल बिहारी के नेतृत्व में विकास के अनेक नये प्रतिमान स्थापित किये। पोखरण परमाणु विस्फोट, अग्नि मिसाइल का सफल प्रक्षेपण, कारगिल विजय जैसी सफलताओं से भारत का कद अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर ऊंचा हुआ। राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण, सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार, शिक्षा एवं स्वास्थ्य में नयी पहल एवं प्रयोग, कृषि, विज्ञान एवं उद्योग के क्षेत्रों में तीव्र विकास के साथ-साथ महंगाई न बढ़ने देने जैसी अनेकों उपलब्धियां इस सरकार के खाते में दर्ज हैं। भारत-पाक संबंधों को सुधारने, देश की आंतरिक समस्याओं जैसे नक्सलवाद, आतंकवाद, जम्मू एवं कश्मीर तथा उत्तर पूर्व के राज्यों में अलगाववाद पर कईं प्रभावी कदम उठाए गये। राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता को सुदृढ़ कर सुशासन एवं सुरक्षा को केन्द्र में रखकर देश को समृद्ध एवं समर्थ बनाने की दिशा में अनेक निर्णायक कदम उठाये गए। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी एवं उपप्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में राजग शासन ने देश में विकास की एक नई राजनीति का सूत्रपात किया। 10 साल पार्टी ने विपक्ष की सक्रिय और शानदार भूमिका निभाई। 2014 में श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश में पहली बार भाजपा की पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनी, जो आज ह्यसबका साथ, सबका विकासह्ण की उद्घोषणा के साथ गौरव सम्पन्न भारत का पुनर्निर्माण कर रही है। राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा लगभग 11 करोड़ सदस्यों वाली विश्व की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी बन गयी है। 26 मई, 2014 को श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण की। मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने कम समय में ही अभूतपूर्व उपलब्धियां हासिल की हैं। उन्होंने विश्व में भारत की गरिमा को पुन:स्थापित किया, राजनीति पर लोगों के विश्वास को फिर से स्थापित किया। अनेक अभिनव योजनाओं के माध्यम से नए युग की शुरूआत की। अन्त्योदय, सुशासन, विकास एवं समृद्धि के रास्ते पर देश बढ़ चला है। आर्थिक और सामाजिक सुधार सुरक्षित जीवन जीने का मार्ग उपलब्ध करा रहे हैं। किसानों के लिये ऋण से लेकर खाद तक की नयी नीतियां जैसे प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, सॉयल हेल्थ कार्ड, आदि ने कृषि के तीव्र विकास की अलख जगायी है। ये नया युग है सुशासन का। चाहे आदर्श ग्राम योजना हो, स्वच्छता अभियान या फिर योग के सहारे भारत को स्वथ्य बनाने का अभियान, इन सभी कदमों से देश को एक नयी ऊर्जा मिली है। भाजपा की मोदी सरकार ने ह्यमेक इन इंडियाह्ण, ह्यस्किल इंडियाह्ण, अमृत मिशन, दीनदयाल ग्राम ज्योति योजना, डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं से भारत को आधुनिक और सशक्त बनाने की दिशा में मजबूत कदम उठाया है। जनधन योजना, बेटी बचाओ-बेटी पढाओ, सुकन्या समृद्धि योजना जैसी अनेक योजनाएं देश में एक नयी क्रांति का सूत्रपात कर रही हैं। भाजपा सरकार ने देशवासियों को विश्व की सबसे बड़ी सामाजिक सुरक्षा योजना का उपहार दिया है। (लेखक अनुसूचित जन जाति मोर्चा झारखंड भाजपा के अध्यक्ष हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अशोक लाहिड़ी)। पश्चिम बंगाल की वित्त मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने 2022-23 का आम बजट पेश कर दिया है और यह उपयुक्त समय है जब हम राज्य की अर्थव्यवस्था की स्थिति, वित्तीय सेहत तथा सरकार के नीतिगत रुझान पर नजर डालें। प्रति व्यक्ति आय की रैंकिंग के हिसाब से देखें तो पश्चिम बंगाल सन 1980 में 25 राज्यों के बीच सातवें स्थान से फिसलकर 2018-19 में 29 राज्यों में 21वें स्थान पर आ गया था। सन 1950 और 1960 के दशक में पश्चिम बंगाल की तुलना महाराष्ट्र और तमिलनाडु से होती थी, अब आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्य उसके समतुल्य हैं। पश्चिम बंगाल की तट रेखा लंबी है और उसकी अंतरराष्ट्रीय सीमा भूटान और बांग्लादेश से मिलती है।औद्योगिक और कारोबारी केंद्र के रूप में भी उसका समृद्ध इतिहास रहा है। ऐसा लगता है कि पश्चिम बंगाल की सरकार तात्कालिक खपत की वस्तुओं के लिए खरीद और व्यय की नीति को जारी रखे हुए है। मार्च के अंत में उसका बकाया कर्ज 2021 के 4.82 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2022 में 5.29 लाख करोड़ रुपये हो जाने का अनुमान है। 2023 में यह और अधिक बढ़कर 5.86 लाख करोड़ रुपये हो सकता है। राज्य का कर्ज-सकल घरेलू उत्पाद अनुपात भी राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन अधिनियम में उल्लिखित 25 फीसदी की सीमा से काफी अधिक है। पंजाब के साथ-साथ राजस्व व्यय में उसकी ब्याज भुगतान की हिस्सेदारी भी उच्चतम में है। सन 2022-23 के बजट अनुमान में अपनी 48 फीसदी प्राप्तियों के लिए पश्चिम बंगाल केंद्र सरकार से मिलने वाली कर अंतरण राशि तथा अनुदान पर निर्भर रहेगा। शेष 33 फीसदी हिस्सा उधारी से आएगा। यह अनुपात बहुत ज्यादा है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में कर अंतरण तथा अनुदान पर निर्भरता केवल 21 फीसदी है जबकि उधारी 27 फीसदी है। व्यय के मोर्चे पर महामारी के साथ राज्य सरकार ने पूंजीगत आवंटन पर सब्सिडी और हस्तांतरण को तरजीह दी। सरकार ने इस सब्सिडी और हस्तांतरण को यह कहते हुए उचित ठहराया कि इससे मांग बढ़ी और जरूरतमंदों और वंचितों की मदद की गई। 2022-23 (बजट अनुमान) में महामारी के धीमा पड?े के साथ व्यय के हिस्से के रूप में सब्सिडी के गति वर्ष के 2021-22 (संशोधित अनुमान) के सात फीसदी से घटकर चार फीसदी रह जाने का अनुमान है। जबकि पूंजीगत व्यय में ऐसा ही इजाफा होगा। सब्सिडी 2021-22 में 10,955 करोड़ रुपये (बजट अनुमान) से बढ़कर 2021-22 में 18,720 करोड़ रुपये (संशोधित अनुमान) तक पहुंच गई थी। उसके भी 2022-23 में घटकर 10,935 करोड़ रुपये (बजट अनुमान) रहने का अनुमान है। सरकार ने रूपश्री, शिल्पसाथी और आनंदधारा आदि नामों से करीब 50 सब्सिडी और हस्तांतरण योजनाएं शुरू की हैं। यह जानना उपयोगी होगा कि सरकार कौन सी योजनाओं को बंद करना या संक्षिप्त करना चाहती है ताकि 2021-22 का अनुभव दोहराने से बचा जा सके। उस वक्त सब्सिडी आवंटन में बजट अनुमान और संशोधित अनुमान में 70 फीसदी से अधिक इजाफा हुआ था। सरकार के पूंजीगत व्यय में अर्थव्यवस्था की उत्पादक क्षमता बढ़ाने वाले आवंटन तथा कर्ज को दोबारा चुकाना शामिल है। आर्थिक नजरिये से देखें तो पूंजीगत आवंटन एक अहम चर है। 2021-22 में बजट अनुमान तथाा संशोधित अनुमान के बीच के चरण में सब्सिडी में इजाफे के बीच पूंजीगत आवंटन में कमी आई और यह 32,774 करोड़ रुपये के बजट अनुमान से घटकर संशोधित अनुमान मेंं 19,355 करोड़ रुपये रह गया। पूंजीगत आवंटन के बजट अनुमान और संशोधित अनुमान में कटौती की बात करें तो इसमें भारी कमी आई और सामाजिक सेवाओं के लिए यह 12,818 करोड़ रुपये से कम होकर 8,245 करोड़ रुपये रह गया। जबकि कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों तथा ग्रामीण विकास एवं विशेष क्षेत्रों के कार्यक्रम में यह 6,183 करोड़ रुपये से कम होकर 1,744 करोड़ रुपये रह गया। इतने कम पूंजीगत आवंटन के साथ इस बात में संदेह ही है कि सरकार के पास भौतिक और सामाजिक अधोसंरचना के लिए जरूरी पूंजी है भी या नहीं। सन 2012-13 और 2018-19 के बीच 2013-14 और 2015-16 को छोड़ दिया जाए तो हर वर्ष प्रदेश का जीएसडीपी देश की तुलना मेंं धीमी गति से बढ़ा। जीएसडीपी 12.8 फीसदी बढ़ने की आशा है जबकि शेष देश का जीडीपी केवल 9.2 फीसदी बढ़ रहा है। यहां तीन बुनियादी प्रश्न हैं। पहला, विकसित देशों के उलट क्या पश्चिम बंगाल मांग की बाधा या आपूर्ति की दिक्कतों से जूझ रहा है? दूसरा, मांग में इजाफे का कितना हिस्सा देश के अन्य राज्यों को जाता है और कितना राज्य के लिए लाभदायक होता है? तीसरा, राज्य में आबादी के उच्च घनत्त्व को देखते हुए जीएसडीपी तेजी से कैसे बढ़ रहा है जबकि औद्योगिक गतिविधियों में कोई बढ़ोतरी नहीं दिख रही? समस्या तब पैदा होती है जब ऐसी राहत राजनीतिक लाभ और वोट खरीदने के लिए गैर जरूरतमंद लोगों को दी जाती है। यह काम दीर्घावधि के विकास की लागत पर तथा राज्य के सामाजिक और भौतिक ढांचे की अनदेखी करके किया जाता है। सब्सिडी और हस्तांतरण के नाकाबिल लोगों के पास जाने की समस्या पर नियंत्रण केवल तभी आ सकता है जब लाभार्थी चयन में पारदर्शिता बरती जाए। सामाजिक और भौतिक बुनियादी ढांचे में अहम निवेश किया जाना चाहिए ताकि औद्योगीकरण की गति बढ़ाई जा सके। केवल उसके माध्यम से ही राज्य में लोगों को सार्थक रोजगार दिलाया जा सकेगा। ध्यान रहे देश के प्रति वर्ग किलोमीटर 382 के जनसंख्या घनत्व की तुलना में पश्चिम बंगाल में प्रति वर्ग किलोमीटर 1,082 लोग रहते हैं। औद्योगीकरण के लिए किफायती बुनियादी ढांचे की जरूरत है और सन 1990 के दशक में प्रदेश की वाम मोर्चा सरकार के नई आर्थिक नीति पेश करने के बाद एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मशविरा कंपनी ने इस विषय में संकेत किया था। परंतु हस्तांतरण और सब्सिडी की नीतियों के साथ और तेज औद्योगीकरण की बुनियाद के बिना स्थायित्व नहीं हासिल होगा और अनचुकता बिलों और अधूरे वादों के साथ राजकोषीय संकट ही सामने आएगा।
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