एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सत्यनारायण गुप्ता)। संकेत सरगर द्वारा असाधारण प्रयास! उनका प्रतिष्ठित रजत जीतना राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के लिए एक शानदार शुरुआत है। इनको बधाई और भविष्य के सभी प्रयासों के लिए शुभकामनाएं। 73 वर्षों में पहली बार भारत ने थामस कप बैडमिंटन का खिताब जीता, पीवी सिंधु ने सिंगापुर ओपन में जीत का परचम लहराया, विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में श्रीशंकर(लंबी कूद) अन्नु रानी और रोहित यादव (जेवलीन थ्रो) ने अच्छे प्रदर्शन से प्रशंसा बटोरी और नीरज चोपड़ा ने रजत पदक जीत कर अपनी श्रेष्ठता बरकरार रखी। लेकिन महिला हाकी विश्व कप में खिलाड़ियों का प्रदर्शन ओलंपिक जैसा शानदार नहीं रहा और भारतीय महिला टीम 9 वें स्थान में रही। भारतीय पुरुष हाकी टीम को भी एशिया कप में सिर्फ कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा। उधर इंग्लैंड से पांचवां और अंतिम टेस्ट हारने के कारण भारत विश्व टेस्ट चैंपियनशिप की रैंकिंग में चौथे स्थान पर खिसक गया है। इन उतार चढ़ावों के बीच अब खेल प्रेमियों का ध्यान इंग्लैंड के बर्मिंघम की ओर खींचा चला गया है, जहां 28 जुलाई से 8 अगस्त तक राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन होने जा रहा है। जहां 72 देशों के 4500 ज्यादा खिलाड़ी पदक के लिए संघर्ष करेंगे और 283 पदकों के लिए 19 तरह के खेलों में हिस्सा लेंगे। राष्ट्रमंडल खेलों में 215 खिलाड़ियों का भारतीय दल भी अपना दमखम दिखलाने के लिए तैयार है। जिसमें 108 पुरुष और 107 महिला हैं। एथलेटिक्स की स्पर्धाओं में 37 खिलाड़ी भाग लेंगे। राष्ट्रमंडल खेल जिसे पहले ब्रिटिश एम्पायर गेम्स कहा जाता था की शुरुआत 1930 में हुई थी, कनाडा के हैमिल्टन शहर में। 1978 में इन खेलों का नाम राष्ट्रमंडल खेल अर्थात कामनवेल्थ गेम्स पड़ा। इसका आयोजन प्रत्येक 4 वर्ष में होता है। ब्रिटेन और उसके द्वारा पूर्व में शासित देश राष्ट्रमंडल देश कहलाते हैं। ओलंपिक और एशियाई खेलों के बाद सबसे बड़ा खेल उत्सव राष्ट्रमंडल खेल ही माने जाते हैं। 1934 के बाद भारत लगातार (1950,1962एवं 1986 को छोड़कर) राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेता रहा है।1934 में भारत ने केवल दो खेलों कूश्ती और एथलेटिक्स में हिस्सा लिया और एक कांस्य पदक जीता। कुश्ती में कांस्य पदक जीतकर राशिद अनवर ब्रिटिश एम्पायर गेम्स में पदक जीतने वाले पहले भारतीय बने। 1934 से लेकर 2018 तक भारत ने राष्ट्रमंडल खेलों में कुल 503 पदक जीते हैं। जिनमें 181 स्वर्ण,173 रजत तथा 149 कांस्य पदक हैं। सबसे अधिक पदक (135) निशानेबाजी में मिले हैं और राष्ट्रमंडल खेलों में सबसे सफल भारतीय खिलाड़ी 9 स्वर्ण सहित कुल 15 पदक जीतने वाले जशपाल राणा रहे हैं। वैसे भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक धावक मिल्खा सिंह ने कार्डिफ राष्ट्रमंडल खेलों में 440 यार्ड इवेंट में प्राप्त किया था। भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2010 में नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में रहा था , जहां भारत ने 101पदक जीतकर दूसरा स्थान प्राप्त किया था। बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेल शुरू होने से पहले ही भारत के दो खिलाड़ी फरार्टा धाविका धनलक्ष्मी और ट्रिपल जंपर ऐश्वर्य बाब डोप टेस्ट में पॉजिटिव पाए गए हैं। लेकिन विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में रजत पदक जीत कर नीरज चोपड़ा ने राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेने वाले खिलाड़ियों में उत्साह का संचार कर दिया है। आगामी राष्ट्रमंडल खेलों में भारत को अपने 37 एथलीटों से पदक की उम्मीद तो है ही, पुरुष और महिला हाकी टीम से भी कम उम्मीद नहीं है। इस बार ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय पुरुष हाकी टीम आस्ट्रेलिया को पछाड़ कर स्वर्ण जीत ले तो कोई आश्चर्य नहीं। इसके अलावा जैवलीन थ्रो में नीरज चोपड़ा, रोहित यादव और अन्नु रानी से, बैडमिंटन में पीवी सिंधु, लक्ष्य सेन, के श्रीकांत, चिराग शेट्टी और सात्विक साईराज से, लंबी कूद में श्री शंकर और मो अनीश याहिया से,3000 मीटर स्टीपल चेज में अविनाश साबले से, त्रिकूद में प्रवीण चित्राबेल, अब्दुल्ला अबुबाकर से, चक्का फेंक में सीमा पुनिया और नवजीत कौर से, मैराथन रेस में नितेंद्र रावत से, कूश्ती में सागर अहलावत, दीपक पुनिया, बजरंग पुनिया, रवि दाहिया, विनेश फोगाट, साक्षी मलिकऔर अंशु मलिक से, मुक्केबाजी में अमित पंघाल और निकहत जरीन से, भारोत्तोलन में मीराबाई चानू से और टेबल टेनिस में अचंता शरत कमल और मोनिका बत्रा से पदक की उम्मीद है। इस बार भारतीय महिला क्रिकेट टीम भी राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा ले रही है और इनसे भी खेलप्रेमियों को काफी उम्मीदें हैं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सत्यनारायण गुप्ता)। पिछले दिनों खेल के मैदान से कुछ अच्छी तो कुछ निराश करने वाली खबरें आईं। 73 वर्षों में पहली बार भारत ने थामस कप बैडमिंटन का खिताब जीता, पीवी सिंधु ने सिंगापुर ओपन में जीत का परचम लहराया, विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में श्रीशंकर (लंबी कूद) अन्नु रानी और रोहित यादव (जेवलीन थ्रो) ने अच्छे प्रदर्शन से प्रशंसा बटोरी और नीरज चोपड़ा ने रजत पदक जीत कर अपनी श्रेष्ठता बरकरार रखी। लेकिन महिला हाकी विश्व कप में खिलाड़ियों का प्रदर्शन ओलंपिक जैसा शानदार नहीं रहा और भारतीय महिला टीम 9 वें स्थान में रही। भारतीय पुरुष हाकी टीम को भी एशिया कप में सिर्फ कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा। उधर इंग्लैंड से पांचवां और अंतिम टेस्ट हारने के कारण भारत विश्व टेस्ट चैंपियनशिप की रैंकिंग में चौथे स्थान पर खिसक गया है। इन उतार चढ़ावों के बीच अब खेल प्रेमियों का ध्यान इंग्लैंड के बर्मिंघम की ओर खींचा चला गया है, जहां 28 जुलाई से 8 अगस्त तक राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन होने जा रहा है। जहां 72 देशों के 4500 ज्यादा खिलाड़ी पदक के लिए संघर्ष करेंगे और 283 पदकों के लिए 19 तरह के खेलों में हिस्सा लेंगे। राष्ट्रमंडल खेलों में 215 खिलाड़ियों का भारतीय दल भी अपना दमखम दिखलाने के लिए तैयार है। जिसमें 108 पुरुष और 107 महिला हैं। एथलेटिक्स की स्पर्धाओं में 37 खिलाड़ी भाग लेंगे। राष्ट्रमंडल खेल जिसे पहले ब्रिटिश एम्पायर गेम्स कहा जाता था की शुरुआत 1930 में हुई थी, कनाडा के हैमिल्टन शहर में। 1978 में इन खेलों का नाम राष्ट्रमंडल खेल अर्थात कामनवेल्थ गेम्स पड़ा। इसका आयोजन प्रत्येक 4 वर्ष में होता है। ब्रिटेन और उसके द्वारा पूर्व में शासित देश राष्ट्रमंडल देश कहलाते हैं। ओलंपिक और एशियाई खेलों के बाद सबसे बड़ा खेल उत्सव राष्ट्रमंडल खेल ही माने जाते हैं। 1934 के बाद भारत लगातार (1950,1962 एवं 1986 को छोड़कर)-राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेता रहा है।1934 में भारत ने केवल दो खेलों कूश्ती और एथलेटिक्स में हिस्सा लिया और एक कांस्य पदक जीता। कूश्ती में कांस्य पदक जीतकर राशिद अनवर ब्रिटिश एम्पायर गेम्स में पदक जीतने वाले पहले भारतीय बने।1934 से लेकर 2018 तक भारत ने राष्ट्रमंडल खेलों में कुल 503 पदक जीते हैं। जिनमें 181 स्वर्ण,173 रजत तथा 149 कांस्य पदक हैं। सबसे अधिक पदक (135) निशानेबाजी में मिले हैं और राष्ट्रमंडल खेलों में सबसे सफल भारतीय खिलाड़ी 9 स्वर्ण सहित कुल 15 पदक जीतने वाले जशपाल राणा रहे हैं। वैसे भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक धावक मिल्खा सिंह ने कार्डिफ राष्ट्रमंडल खेलों में 440 यार्ड इवेंट में प्राप्त किया था। भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2010 में नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में रहा था , जहां भारत ने 101पदक जीतकर दूसरा स्थान प्राप्त किया था। बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेल शुरू होने से पहले ही भारत के दो खिलाड़ी फर्राटा धाविका धनलक्ष्मी और ट्रिपल जंपर ऐश्वर्य बाब डोप टेस्ट में पॉजिटिव पाए गए हैं। लेकिन विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में रजत पदक जीत कर नीरज चोपड़ा ने राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेने वाले खिलाड़ियों में उत्साह का संचार कर दिया है। आगामी राष्ट्रमंडल खेलों में भारत को अपने 37एथलिटों से पदक की उम्मीद तो है ही, पुरुष और महिला हाकी टीम से भी कम उम्मीद नहीं है। इस बार ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय पुरुष हाकी टीम आस्ट्रेलिया को पछाड़ कर स्वर्ण जीत ले तो कोई आश्चर्य नहीं। इसके अलावा जैवलीन थ्रो में नीरज चोपड़ा, रोहित यादव और अन्नु रानी से, बैडमिंटन में पीवी सिंधु, लक्ष्य सेन, के श्रीकांत, चिराग शेट्टी और सात्विक साईराज से, लंबी कूद में श्री शंकर और मो अनीश याहिया से,3000 मीटर स्टीपल चेज में अविनाश साबले से, त्रिकूद में प्रवीण चित्राबेल, अब्दुल्ला अबुबाकर से, चक्का फेंक में सीमा पुनिया और नवजीत कौर से, मैराथन रेस में नितेंद्र रावत से, कूश्ती में सागर अहलावत, दीपक पुनिया, बजऱंग पुनिया, रवि दाहिया, विनेश फोगाट, साक्षी मलिकऔर अंशु मलिक से, मुक्केबाजी में अमित पंघाल और निकहत ज़रीन से, भारोत्तोलन में मीराबाई चानू से और टेबल टेनिस में अचंता शरत कमल और मोनिका बत्रा से पदक की उम्मीद है।इस बार भारतीय महिला क्रिकेट टीम भी राष्ट्रमंडल खेलों में हिस्सा ले रही है और इनसे भी खेलप्रेमियों को काफी उम्मीदें हैं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। छत्तीसगढ़ के शहर कोरबा में बसे नेहरू नगर में एक आईएएस अफसर रहने के लिए आए जो हाल ही में सेवानिवृत्त हुए थे। ये बड़े वाले रिटायर्ड आईएएस अफसर हैरान-परेशान से रोज शाम को पास के पार्क में टहलते हुए अन्य लोगों को तिरस्कार भरी नजरों से देखते और किसी से भी बात नहीं करते थे। एक दिन एक बुजुर्ग के पास शाम को गुफ़्तगू के लिए बैठे और फिर लगातार उनके पास बैठने लगे लेकिन उनकी वार्ता का विषय एक ही होता था - मैं रायपुर में इतना बड़ा आईएएस अफसर था कि पूछो मत, यहां तो मैं मजबूरी में आ गया हूं। मुझे तो बिलासपुर में बसना चाहिए था- और वो बुजुर्ग प्रतिदिन शांतिपूर्वक उनकी बातें सुना करते थे। परेशान होकर एक दिन जब बुजुर्ग ने उनको समझाया- आपने कभी फ्यूज बल्ब देखे हैं? बल्ब के फ्यूज हो जाने के बाद क्या कोई देखता है कि बल्ब किस कम्पनी का बना? हुआ था या कितने वाट का था या उससे कितनी रोशनी या जगमगाहट होती थी? बल्ब के फ्यूज होने के बाद इनमें से कोई भी बात बिलकुल ही मायने नहीं रखती है। लोग ऐसे बल्ब को कबाड़ में डाल देते हैं कि नहीं! फिर जब उन रिटायर्ड आईएएस अधिकारी महोदय ने सहमति में सिर हिलाया तो बुजुर्ग फिर बोले - रिटायरमेंट के बाद हम सब की स्थिति भी फ्यूज बल्ब जैसी हो जाती है। हम कहां काम करते थे?, कितने बड़े/छोटे पद पर थे, हमारा क्या रुतबा था, यह सब कुछ भी कोई मायने नहीं रखता। मैं सोसाइटी में पिछले कई वर्षों से रहता हूं और आज तक किसी को यह नहीं बताया कि मैं दो बार संसद सदस्य रह चुका हूं। वो जो सामने ठाकुर जी बैठे हैं, एस .सी .सी.एल .के महाप्रबंधक थे। वे सामने से आ रहे मरकाम साहब सेना में ब्रिगेडियर थे। वो देवांगन.. जी इसरो में चीफ थे। ये बात भी उन्होंने किसी को नहीं बताई है, मुझे भी नहीं पर मैं जानता हूं सारे फ्यूज बल्ब करीब - करीब एक जैसे ही हो जाते हैं, चाहे जीरो वाट का हो या 50 या 100 वाट हो। कोई रोशनी नहीं तो कोई उपयोगिता नहीं। उगते सूर्य को जल चढ़ा कर सभी पूजा करते हैं। पर डूबते सूरज की कोई पूजा नहीं करता। कुछ लोग अपने पद को लेकर इतने वहम में होते हैं कि रिटायरमेंट के बाद भी उनसे अपने अच्छे दिन भुलाए नहीं भूलते। वे अपने घर के आगे नेम प्लेट लगाते हैं - रिटायर्ड आइएएस/रिटायर्ड आईपीएस/रिटायर्ड पीसीएस/ रिटायर्ड जज आदि - आदि। अब ये रिटायर्ड आइएएस/ आइपीएस/ पीसीएस/ तहसीलदार/ पटवारी/ बाबू/ प्रोफेसर/ प्रिंसिपल/डाक्टर / अध्यापक.. कौन.. कौन-सी पोस्ट होती है भाई माना कि आप बहुत बड़े आफिसर थे, बहुत काबिल भी थे, पूरे महकमे में आपकी तूती बोलती थी पर अब क्या अब यह बात मायने नहीं रखती है बल्कि मायने रखती है कि पद पर रहते समय आप इंसान कैसे थे... आपने कितनी जिन्दगी को छुआ... आपने आम लोगों को कितनी तवज्जो दी... समाज को क्या दिया, जाति बंधुओं के कितने काम आएं लोगों की मदद की..या सिर्फ घमंड मे ही सूजे हुए रहे... पद पर रहते हुए कभी घमंड आये तो बस याद कर लीजिए कि एक दिन सबको फ्यूज होना है। यह खबर उन लोगों के लिए आईना है जो पद और सत्ता होते हुए कभी अपनी कलम से समाज का हित नहीं कर सकते। और रिटायरमेंट होने के बाद समाज के लिए बड़ी चिंता होने लगती है। अभी भी वक्त है इस पोस्ट को पढ़िए और चिंतन करिए तथा समाज का जो भी संभव हो हित करिए... और अपने पद रूपी बल्ब से समाज देश को रोशन करिए।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (विनायक चटर्जी)। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने हाल ही में अपने देश के ध्वस्त हो रहे रेलवे नेटवर्क की व्यापक जांच और मरम्मत की घोषणा करते हुए कहा, ब्रिटेन के विफल होते ट्रेन नेटवर्क को सरकार के नियंत्रण में लाया जाएगा। उनका यह कदम सन 1980 और 1990 के दशक में कंजरवेटिव पार्टी की सरकारों द्वारा शुरू की गई निजीकरण की विवादास्पद नीति को पलट देगा। ग्रेट ब्रिटिश रेलवेज (जीबीआर) नामक एक नई सार्वजनिक संस्था गठित की जाएगी। जीबीआर में समूचा रेलवे तंत्र शामिल होगा। यानी बुनियादी ढांचे से लेकर समय सारणी बनाने और टिकट से होने वाली आय संग्रहित करने तक का सारा काम। यह नई संस्था रेलवे नेटवर्क के पूंजीगत कार्य की योजना बनाने और उसका क्रियान्वयन करने के लिए भी उत्तरदायी होगी। फिलहाल बुनियादी ढांचे यानी ट्रैक, सिग्नल और बड़े स्टेशनों का प्रबंधन कर रही नेटवर्क रेल को इसमें समाहित कर लिया जाएगा। नई कंपनी निजी ट्रेन संचालकों को अनुबंधित करने का काम भी करेगी। ज्यादातर ट्रेनों के संचालन का काम उनके हवाले ही होगा। गत 20 मई को घोषित इन प्रस्तावों को बीते 25 वर्ष में ब्रिटेन के रेलवे उद्योग के इतिहास की सबसे बड़ी घटना माना जा रहा है। रेलवे एक बार फिर सरकार के हाथ में आ रही है। हालांकि इस दौरान निजी क्षेत्र का सहयोग लिया जाएगा। 30 वर्षीय योजना का मसौदा परिवहन मंत्री ग्रांट शैप्स और ब्रिटिश एयरवेज के पूर्व मुख्य कार्याधिकारी कीथ विलियम्स ने तैयार किया है। इस योजना को 2023 तक पूरी तरह क्रियान्वित करना है। सन 1979 में जब तत्कालीन थैचर प्रशासन ने ब्रिटिश रेलवे का निजीकरण करने का निर्णय लिया था तब मिजाज बिल्कुल अलग था। उस वक्त कहा गया था कि प्रबंधन कौशल, उद्यमिता की भावना हासिल करने और जनता को बेहतर सेवा प्रदान करने के लिए रेलवे का निजीकरण किया जाएगा। चार वर्ष बाद 1993 में रेलवे अधिनियम लागू हो गया। ट्रैक अथॉरिटी मॉडल अपनाया गया जबकि यात्री रेल सेवाओं को निजी कंपनियों को सौंप दिया गया। स्थायी परिसंपत्तियों मसलन रेलवे ट्रैक, स्टेशन, सुरंगें, पुल, सिग्नल और डिपो आदि जो पुरानी सरकारी कंपनी ब्रिटिश रेल के आधिपत्य में थे उन्हें एक स्वतंत्र कंपनी रेलट्रैक के हवाले कर दिया गया। सन 1995 में रेलटै्रक ने यात्री रेल सेवाओं की फ्रैंचाइज निजी यात्री रेल परिचालन कंपनियों को देनी शुरू की। अब इस फ्रेंचाइजी मॉडल में दिक्कतें देखी जा रही हैं क्योंकि इससे पूरा नेटवर्क बहुत हद तक विखंडित हो गया है। ऐसे में फ्रेंचाइज का संचालन कर रही कंपनी के पास परिचालन को लेकर बहुत सीमित अधिकार रह जाते हैं और ट्रैक और ट्रेन परिचालकों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो जाता है। ऐसा भी प्रतीत होता है कि ब्रिटेन में हर दो में से एक यात्री ट्रेन का संचालन फ्रांस और इटली की विदेशी कंपनियों द्वारा किए जाने के कारण ब्रिटेन के राष्ट्रीय गौरव को भी ठेस पहुंची। वर्ष 2016 से ही यह बहस शुरू हो गई थी कि रेलवे को एक बार फिर राष्ट्रीयकृत किया जाए या नहीं। दोबारा राष्ट्रीयकरण करने की इस पहल का सतर्कतापूर्वक स्वागत किया गया है। कुछ धड़े, खासकर श्रम संगठन इस बात पर यकीन करने को तैयार नहीं हैं कि दक्षिणपंथी झुकाव रखने वाली कंजरवेटिव सरकार मौजूदा ढांचे को ध्वस्त करके दोबारा राष्ट्रीयकरण की व्यवस्था करेगी। भारत के लिए इसमें क्या सबक हैं? नेटवर्क वाले बुनियादी ढांचे में तयशुदा बुनियादी ढांचे पर राज्य का स्वामित्व ही सही तरीका है। निजीकृत रेल नेटवर्क के विभाजित ढंग से काम करने को ही ब्रिटिश रेल के निजीकरण की नाकामी की वजह माना जाता है। भारत को रेल, तेल एवं गैस पाइपलाइन तथा बिजली पारेषण लाइनों का मुद्रीकरण करते हुए इस बात को ध्यान में रखना चाहिए। यदि भारत इस बात को ध्यान में रखे तो बेहतर होगा कि कुछ ही विकसित देशों ने उपयोगी नेटवर्क्स को निजी क्षेत्र को बेचने के तरीके का अनुसरण किया है। यूरोप में आमतौर पर ऐसा मॉडल अपनाया गया है जहां परिसंपत्ति स्वामित्व को सेवा प्रावधानों से अलग रखा गया और निजी नेटवर्क्स को परिचालन रियायत प्रदान की गईं। उस तरह देखें तो नियमित जरूरत का पूंजीगत व्यय संप्रभु संस्थान ने किया जबकि निजी क्षेत्र को परिचालन क्षमता से भरपाई की गई। भारत में निजी-सार्वजनिक भागीदारी (पीपीपी) के प्रबंधन की संस्थागत क्षमता की कमी है। दस से अधिक केंद्रीय मंत्रालय और 28 राज्य तथा आठ केंद्रशासित प्रदेश अपने-अपने तरीके से पीपीपी का संचालन कर रहे हैं और इस बीच औपचारिक रूप से ज्ञान की साझेदारी नहीं की जा रही। ब्रिटेन सन 1990 के दशक में पीपीपी की अवधारणा आने के बाद से ही उसके बेहतरीन व्यवहार का अगुआ रहा है और उसने कई समर्थक संस्थान विकसित किए जिनका दुनिया भर में अनुकरण किया गया। निजी फाइनैंस इनीशिएटिव, निजी फाइनैंस पैनल, इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस यूनिट और पाटर्नरशिप्स यूके आदि इसके उदाहरण हैं। भारत को पीपीपी के संस्थानीकरण को गंभीरता से लेना होगा और 3पी इंडिया के रूप में उस पीपीपी थिंकटैंक की स्थापना करनी होगी जिसकी घोषणा अरुण जेटली ने जुलाई 2014 के बजट में की थी। देश के पीपीपी कार्यक्रम में जो तनाव व्याप्त है उसके लिए नियामकीय आजादी की कमी भी एक वजह है। साहसी निर्णयों के लिए ऐसी आजादी आवश्यक है। पीपीपी को नियामकीय सहारे की आवश्यकता है। भारत की खुद की जरूरतें नवंबर 2019 की केलकर समिति की पीपीपी रिपोर्ट में शामिल की गई हैं। शायद भारत के नीति निमार्ताओं के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि दुनिया के सर्वाधिक परिपक्व बाजारों में भी निजी पूंजी को शामिल करने का प्रारूप अभी भी उभर रहा है और अनुभवों के आधार पर नया आकार ग्रहण कर रहा है। इसके लिए जरूरी है कि उच्च गुणवत्ता वाली संस्थागत क्षमता विकसित की जाए।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (श्री निवास राघवन)। क्या भारत में बहुत अधिक बैंक हैं? क्या भारत में बैंकों की संख्या बहुत कम है? आखिर एक देश में कितने बैंक होने चाहिए? भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को असल में इन सवालों पर गौर करना चाहिए, न कि किसी बैंक के स्वामित्व को लेकर फिक्रमंद होना चाहिए। लेकिन हम सब तो भारतीय हैं, लिहाजा आसानी से ध्यान भटकने की गुंजाइश बनी रहती है। शुरूआत दो महत्त्वपूर्ण आंकड़ों से करते हैं। उम्मीद है कि इन्हें देखने के बाद दिमाग को केंद्रित करने में मदद मिलेगी। पहला, भारत में ऋण एवं सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का अनुपात 50 फीसदी के दयनीय स्तर पर है। भारत की समतुल्य अर्थव्यवस्थाओं में यह अनुपात 200 फीसदी से भी अधिक है। दूसरा, इस अनुपात का सीधा संबंध किसी भी देश में मौजूद बैंको की संख्या से है। इस तरह आखिरी बार गिनती के समय अमेरिका एवं चीन दोनों ही देशों में कार्यरत बैंकों की संख्या 4,000 से भी अधिक थी। लिहाजा न केवल ग्रामीण भारत में बैंकों की उपलब्धता कम है बल्कि समूची भारतीय अर्थव्यवस्था ही बैंकों की कमी का सामना कर रही है। वित्तीय क्षेत्र की हालत पर विचार के लिए गठित रघुराम राजन समिति ने वर्ष 2008 में ही कहा था कि हमें सैकड़ों नए बैंकों की जरूरत है। लेकिन यह राय 12 साल पहले की है। आज मेरी यही राय है कि भारत को कम-से-कम 1,000 नए बैंकों की जरूरत है। यह सुनकर गश खाने की जरूरत नहीं है। आज अर्थव्यवस्था का जो आकार है उसका दसवां हिस्सा रहते समय भी भारत में करीब 400 बैंक सक्रिय थे लिहाजा 1,000 बैंकों का आंकड़ा सुनकर अचरज करने की जरूरत नहीं है। इतने बैंक नहीं हुए तो अर्थव्यवस्था कभी भी उस तरलता स्तर को नहीं हासिल कर पाएगी जो हमारी सरकारों के स्वप्निल जीडीपी वृद्धि आंकड़ों को हासिल करने के लिए जरूरी होगा। इसी के साथ अर्थव्यवस्था सही तरह से औपचारिक ढांचा भी नहीं हासिल कर पाएगी। इसमें पैसे का प्रवाह तो होगा लेकिन वह अनौपचारिक क्षेत्र से होगा। इस वजह से अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़ी तमाम अंतर्निहित समस्याएं एवं कारण भी बने रहेंगे। दो बड़े सवाल : यह मुद्दा दो सवाल भी खड़े करता है। पहला सवाल यह है कि इन नए बैंकों का आकार कितना बड़ा होना चाहिए और दूसरा सवाल है कि इनका स्वामित्व किनके पास होना चाहिए? रघुराम राजन समिति ने इन दोनों ही सवालों के जवाब अपनी रिपोर्ट में दिए थे। समिति ने कहा था कि हमारे पास कुछ सौ छोटे बैंक होने चाहिए और उनमें से किसी भी बैंक का स्वामित्व किसी औद्योगिक घराने के पास तब तक नहीं होना चाहिए जब तक संबद्ध पक्ष (यानी उस औद्योगिक घराने से जुड़ी किसी संस्था) के साथ लेनदेन रोकने के सख्त सुरक्षा उपाय नहीं किए गए हों। दो वजहों से ऐसी अनुशंसा करना एकदम सही था। पहला, वर्ष 1969 में राष्ट्रीयकरण के पहले देश में 600 से अधिक बैंक मौजूद थे और उनमें से तमाम बैंक छोटे आकार के थे और वे मुख्यत: जिंसों के बदले स्थानीय स्तर पर उधारी बांटते थे। उस समय तमाम बैंकों का स्वामित्व बड़े औद्योगिक घरानों के पास हुआ करता था और वे अपने इस्तेमाल के लिए जमाकतार्ओं की रकम आसानी से इस्तेमाल कर सकते थे। इस तरह जमाकतार्ओं के लिए बहुत अधिक जोखिम होता था लेकिन इंदिरा गांधी ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण का फैसला इन वजहों से नहीं किया था। राजन समिति ने यह नहीं बताया कि नए बैंकों का स्वामित्व औद्योगिक घरानों और सरकार के पास नहीं तो किसके पास होना चाहिए? सच तो यह है कि हमें अब भी इसका जवाब नहीं मालूम है। जब कोई समाज एवं सरकार वाणिज्यिक गतिविधि में किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती है तो यह सवाल बहुत मुश्किल हो जाता है। बेमानी शून्य-जोखिम : इससे एक सियासी सवाल भी खड़ा होता है जो आर्थिक क्रियाकलाप से भी जुड़ा है। हम जोखिम से बचने की राजनीतिक फितरत से कैसे छुटकारा पा सकते हैं? इसका संक्षिप्त उत्तर है कि वोटों के बेहद प्रतिस्पर्द्धी चुनावी बाजार में हमें इस छुटकारा मिला तो धीरे-धीरे ही मिलेगा। मसलन, एफडीआईएल विधेयक में जोखिम को करदाताओं से हटाकर जमाकतार्ओं पर लादने की कोशिश की गई लेकिन इसका पुरजोर ढंग से विरोध हुआ। अब उसका कोई नामलेवा नहीं है। वास्तव में यह एकदम वैसा ही है जैसा मुखर विरोध इन दिनों कृषि कानूनों का हो रहा है। किसान एक ऐसी आर्थिक गतिविधि में न्यूनतम मूल्य का आश्वासन चाहते हैं जो कि बैंकिंग की ही तरह मूल रूप से जोखिम भरी है। सार्वजनिक क्षेत्र अलग नहीं : हमें सबसे पहले यह बात याद रखनी होगी कि कांग्रेस शैली वाली फोन बैंकिंग यानी मंत्री जी का फोन आने पर बिना जांच-पड़ताल मोटा कर्ज देना बेहद जोखिम वाला काम था। बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) का पुलिंदा बढ़ने से यह नजर भी आता है। इनमें से लगभग सारे कर्ज सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने बांटे हैं। यह बताता है कि स्वामित्व भी जमाकर्ताओं की लूट रोकने की गारंटी नहीं देता है। सार्वजनिक बैंकों को चलाने के नेताओं के तौर-तरीके और राष्ट्रीयकरण के पहले औद्योगिक घरानों के स्वामित्व वाले कुछ निजी बैंकों को चलाने के तरीके के बीच इकलौता फर्क यह है कि निजी बैंक के डूबने पर उसे बचाने के लिए करदाता नहीं थे। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (नंदकिशोर)। योगियों की दुनिया विचित्र है। अद्भुत रहस्यों से भरी हुई। जिसे बिना समझे विचारे आँकना वैसा ही है जैसे काले गौगल्स पहन कर प्रकाश की न्यूनता पर टिप्पणी करना। और याद रहे, श्री कृष्ण योगेश्वर हैं—समस्त योग व योगियों के ईश्वर। श्री कृष्ण के परे क्या : जब श्री कृष्ण को योगेश्वर कहते हैं तो हमें उन्हें योग व योगियों का ईश्वर मानना ही होगा। उनसे बड़ा कोई नहीं, वे स्वयं कहते हैं मत्त: परतरं नास्ति कीन्चित अस्ति धनन्जय— मुझसे परे व बड़ा कोई नहीं, कोई नहीं, धनन्जय। तो अपने को विशिष्ट क्यों समझते हो? जब तक यह आत्म विशिष्टता रहेगी, तब तक आप आध्यात्म से कोसों दूर हो, भलेही सारा दिन राम-राम रटते हो। मैं और मेरा के वन में तुम्हारा राम भटक रहा है। ये मैं और मेरा जब भगवान के लिये हो जाता है तो आप अथाह समुद्र में कूप की भाँति हो जाते हो—यह समुद्र मैं हूँ या कहो मैं समुद्र में हूँ अब एक ही बात हो जाती है। यह ईश्वर मैं हूँ या मैं ईश्वर में हूँ में कहां अनंतर है। हाँ, एक को अद्वैत कहते हैं और दूसरे को भक्ति भाव और मेरे स्पष्टता के इस प्रयास को ज्ञान कहेंगे व इसके क्रीयान्वयन को योग। बात एक ही है, इसलिये भाषा के भेद जाल में ना फँसकर, सहजता से आत्मभाव में स्थिर रहो। जैसे गाड़ीवान के बैल को मारने पर रामकृष्ण परमहंस करहा कर गिर गये और उनकी पींठ पर डण्डे के निशान उभर आये। यह है आत्मभाव, जो शृष्टि के कण-कण के साथ आपकी सहज एकात्मता को अभिव्यक्त करता है। यही है श्री कृष्ण के कथन—सर्वभूतस्थत्मात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन: का सही अर्थ। मात्र कहने के लिये समदर्शन नहीं, उसे प्रत्यक्ष जीना है समदर्शन। यह तभी सम्भव है जब आप सकल ब्रह्माण्ड के साथ एकात्मा हौं, कहने के लिये नहीं, वास्तव में, प्रत्यक्ष रूप से। परन्तु अपने परिवार में ही तुम्हारा छोटा-मोटा समभाव है, उसके परे नहीं। कुछ एक का जीवों के साथ है पर समस्त जीवों के साथ नहीं। कोई कुत्ता देख बिदकता है, कोई साँप देख, कोई कौकरोच देख, और कोई छिपकली देख। वाह रे, तुम्हारा समभाव! अपने बच्चे और पत्नि से परे जा ही नहीं पाता है, और करुणावश चला भी जाए तो, वह दो पल से अधिक नहीं ठहरता, और भगवान को भजते हो, जिसका सबमें समभाव है। ये द्वन्द्व ही तुम्हें ईश्वर के सही स्वरूप से दूर रखे है। ईश्वर बस हमारे परिवार को आगे बढ़ाये, उसकी रक्षा करे और दूसरे का परिवार जाये भाड़ में । वाह रे आपका आध्यात्मिक ज्ञान। बोध व बुधत्त्व : जितना तुम्हारा बोध है उतने बुद्ध तुम हो। अपने बुद्धत्व को जाने बिना आप बुद्ध को नहीं समझ सकते। अपने बुद्धत्व को नकार कर किसी बाहरी बुद्ध की खोज तुम्हें अपने तक लाती रहेगी जब तक कि तुम स्वयं अपने बुद्धत्व को नहीं समझ लेते। अपनी बुराइयों को जानकर उनसे मुक्त होने का भाव बोध है।उनसे मुक्त हो जाना बुद्धत्व है। इसे जो शत प्रतिशत करता है, वह महावीर है, और जो हृदय से करने का प्रयास कर रहा है, वह संघ गामी है। संघ गामी का आशय, बुद्ध के भौतिक संघ की ओर गमन करने वाला नहीं, वरन प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष बुद्ध के सत्संग में जाने वाला है। सत्संग की सही व्यख्या श्री कृष्ण ने मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्त: परस्परं सूत्र द्वारा की है। संघ सत्संग है, जो मुझमें चित्त व अपनी ऊर्जा को लगाते हुये परस्पर मेरी ही बात करते हैं वे मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च —मुझमें, मेरे साथ ही सन्तुष्ट रहते हुये रमण करते हैं। यह है बुद्ध शरणं गच्छामि का सही अर्थ। शंखप्रक्षालन की एक क्रिया है। सभी प्रकार के उदर रोग तथा कब्ज मंदागिनी, गैस, अम्ल पित्त, खट्टी-खट्टी डकारों का आना एवं बवासीर आदि निश्चित रूप से दूर होते हैं। आंत, गुर्दे, अग्नाशय तथा तिल्ली सम्बन्धी सभी रोगों में लाभप्रद है। सर्वांगासन सर्वांगासन स्थिति:- दरी या कम्बल बिछाकर पीठ के बल लेट जाइए। विधि : दोनों पैरों को धीरे -धीरे उठाकर 90 अंश तक लाएं. बाहों और कोहनियों की सहायता से शरीर के निचले भाग को इतना ऊपर ले जाएँ की वह कन्धों पर सीधा खड़ा हो जाए। पीठ को हाथों का सहारा दें ... हाथों के सहारे से पीठ को दबाएं . कंठ से ठुड्ठी लगाकर यथाशक्ति करें फिर धीरे-धीरे पूर्व अवस्था में पहले पीठ को जमीन से टिकाएं फिर पैरों को भी धीरे-धीरे सीधा करें। लाभ:- थायराइड को सक्रिय एवं स्वस्थ बनाता है। मोटापा, दुर्बलता, कद वृद्धि की कमी एवं थकान आदि विकार दूर होते हैं। लाभ: मोटापा कम करने के आयुर्वेदिक उपाय एड्रिनल, शुक्र ग्रंथि एवं डिम्ब ग्रंथियों को सबल बनाता है। स्वस्तिकासन स्थिति:- स्वच्छ कंबल या कपड़े पर पैर फैलाकर बैठें। विधि : बाएं पैर को घुटने से मोड़कर दाहिने जंघा और ंिपडली (घुटने के नीचे का हिस्सा) और के बीच इस प्रकार स्थापित करें की बाएं पैर का तल छिप जाये उसके बाद दाहिने पैर के पंजे और तल को बाएं पैर के नीचे से जांघ और ंिपडली के मध्य स्थापित करने से स्वस्तिकासन बन जाता है। ध्यान मुद्रा में बैठें तथा रीढ़ सीधी कर श्वास खींचकर यथाशक्ति रोकें। इसी प्रक्रिया को पैर बदलकर भी करें। लाभ : पैरों का दर्द, पसीना आना दूर होता है। पैरों का गर्म या ठंडापन दूर होता है.. ध्यान हेतु बढ़िया आसन है। गोमुखासन गोमुखासनविधि:- दोनों पैर सामने फैलाकर बैठें। बाएं पैर को मोड़कर एड़ी को दाएं नितम्ब के पास रखें। दायें पैर को मोड़कर बाएं पैर के ऊपर इस प्रकार रखें की दोनों घुटने एक दूसरे के ऊपर हो जाएं। दायें हाथ को ऊपर उठाकर पीठ की ओर मुड़िए तथा बाएं हाथ को पीठ के पीछे नीचे से लाकर दायें हाथ को पकडेÞें.. गर्दन और कमर सीधी रहे। एक ओ़र से लगभग एक मिनट तक करने के पश्चात दूसरी ओर से इसी प्रकार करें। जिस ओ़र का पैर ऊपर रखा जाए उसी ओ़र का (दाए/बाएं) हाथ ऊपर रखें। लाभ : अंडकोष वृद्धि एवं आंत्र वृद्धि में विशेष लाभप्रद है। धातुरोग, बहुमूत्र एवं स्त्री रोगों में लाभकारी है। यकृत, गुर्दे एवं वक्ष स्थल को बल देता है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (संजय कुमार सिंह)। टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस ने हाल ही में क्रिटि-मेडिकेयर नाम की बीमा योजना शुरू की है, जिसमें 100 गंभीर बीमारियां शामिल की गई हैं। उसके बाद से ही गंभीर बीमारियों के लिए बीमा यानी क्रिटिकल इलनेस प्लान चर्चा में हैं। गंभीर बीमारियों के इलाज में बहुत अधिक खर्च आता है। ज्यादातर लोगों की स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी में अस्पताल में भर्ती होने की सूरत में जो राशि दी गई होती है, उससे कहीं अधिक रकम इन बीमारियों के इलाज में स्वाहा हो जाती है। इतना ही नहीं, ऐसी बीमारियों के इलाज के समय कई दूसरे खर्च भी आपके सामने आ जाते हैं, जिन्हें चुकाने में यह पॉलिसी आपकी मदद कर सकती है। बीमारी पता लगने पर एकमुश्त भुगतान : जिस व्यक्ति का बीमा है, उसे रकम हासिल करने के लिए अस्पताल के बिल नहीं दिखाने होते। स्टार हेल्थ ऐंड अलाइड इंश्योरेंस के प्रबंध निदेशक एस प्रकाश कहते हैं, जांच रिपोर्ट में अगर वही बीमारी आती है, जो बताई गई है तो रकम का भुगतान कर दिया जाता है। इन पॉलिसियों में अस्पताल में भर्ती होने के दौरान होने वाले खर्च और भुगतान की गई राशि में कोई संबंध नहीं होता। टाटा एआईजी हेल्थ इंश्योरेंस में कार्यकारी उपाध्यक्ष और उत्पाद प्रमुख (दुर्घटना एवं स्वास्थ्य) विवेक गंभीर कहते हैं, मान लीजिए किसी ने 1 करोड़ रुपये बीमा राशि वाला क्रिटिकल इलनेस प्लान लिया है। चाहे अस्पताल में उसके केवल 10 लाख रुपये खर्च हुए हों, उसे पूरे 1 करोड़ रुपये दिए जाएंगे। बीमा कंपनी उससे यह भी नहीं पूछेगी कि इस रकम का वह व्यक्ति क्या करेगा। क्रिटिकल इलनेस प्लान का कवरेज आम तौर पर पूरी दुनिया में मिलता है। गंभीर कहते हैं, बीमा कराने वाले व्यक्ति को गंभीर बीमारी होने का पता भारत के बाहर ही क्यों न लगे, इस योजना के तहत उसे भुगतान किया जाएगा। इन पॉलिसियों के लिए दिए गए प्रीमियम पर आयकर अधिनियम की धारा 80डी के तहत कर छूट का फायदा भी मिलता है। कवरेज का दायरा जांच लीजिए : किसी भी बीमा योजना के अंतर्गत आने वाली गंभीर बीमारियों की संख्या 6 से 100 तक हो सकती है। ज्यादातर लोगों के लिए यह तय करना मुश्किल होगा कि इस योजना के तहत कितनी या कौन सी बीमारियों को शामिल किया जाना चाहिए। प्रकाश सलाह देते हैं, भारत में जो गंभीर बीमारियां सबसे अधिक होती हैं, उन्हें शामिल किया जाना चाहिए। इनमें कैंसर (इसके विभिन्न तरीके के उपचार), दिल की प्रमुख सर्जरी, ब्रेन ट्यूमर, लिवर या गुर्दे बेकार होना, दुर्घटना में रीढ़ की हड्डी को क्षति पहुंचना आदि शामिल होने चाहिए। पॉलिसी बाजार डॉट कॉम में स्वास्थ्य कारोबार प्रमुख अमित छाबड़ा कहते हैं, पॉलिसी में जितनी अधिक बीमारियां शामिल होंगी उतना ही ज्यादा सुकून मिलेगा। पॉलिसी खरीदने वाले को गंभीर बीमारी की परिभाषा भी देखनी पड़ेगी। गंभीर कहते हैं, बीमा उद्योग 22 गंभीर बीमारियों के लिए मानक परिभाषाएं इस्तेमाल करता है। यदि प्लान 22 बीमारियों से अधिक शामिल की गई हैं तो ग्राहक को जान लेना चाहिए कि वह क्या खरीद रहा और उन गंभीर बीमारियों की क्या परिभाषा दी गई है। जरूरत पड़े तो वह डॉक्टर या सलाहकार जैसे किसी विशेषज्ञ की राय ले सकता है। इनमें से ज्यादातर बीमा योजनाओं में सर्वाइवल पीरियड होता है, जो शून्य से लेकर 60 दिन तक हो सकता है। बीमा कराने वाले व्यक्ति को बीमारी का पता लगने के बाद सर्वाइवल अवधि तक जीवित रहना ही होता है तभी उसे बीमा राशि का भुगतान किया जाता है। छाबड़ा कहते हैं, सर्वाइवल पीरियड जितना कम हो उतना बेहतर है। हाल में पेश की गई टाटा एआईजी की योजना में तीन सर्वाइवल पीरियड दिए गए हैं – 0, 7 या 15 दिन। इनमें से कोई एक चुनना होता है। बीमा खरीदने से पहले देख लीजिए कि इसमें भुगतान एकमुश्त किया जाएगा या टुकड़ों में दिया जाएगा। सना इंश्योरेंस ब्रोकर्स में ग्रुप बिजनेस और सेल्स एवं सर्विस के प्रमुख नयन गोस्वामी बताते हैं, जिस पॉलिसी में एकमुश्त भुगतान किया जाता है, उसमें लिखा हो सकता है कि कैंसर या किसी बीमारी के गंभीर चरण में पहुंचने पर ही एकमुश्त भुगतान किया जाएगा। दूसरी ओर चरणबद्ध भुगतान वाली पॉलिसी में बीमारी के आरंभिक चरणों में भी रकम दे दी जाती है। बीमा राशि सावधानी से चुनें : बीमा राशि चुनते समय देख लीजिए कि इलाज के साथ दूसरे कौन से खर्च हो सकते हैं। गोस्वामी कहते हैं, बीमा में रोगी या उसके तीमारदार को आय में होने वाला नुकसान भी शामिल होना चाहिए। कम से कम 25 लाख रुपये का बीमा करा लीजिए। ये प्लान हॉस्पिटलाइजेशन कवर की तुलना में सस्ते होते हैं। ध्यान रहें ये बातें : क्रिटिकल इलनेस प्लान स्टैंड-अलोन बीमा पॉलिसियों की तरह होते हैं और स्वास्थ्य या जीवन बीमा पॉलिसी के साथ राइडर के तौर पर भी आते हैं। स्टैंड-अलोन पॉलिसी खरीदना ही बेहतर होता है। गंभीर समझाते हैं कि अगर आप राइडर के तौर पर यह पॉलिसी खरीदते हैं तो एक बीमा कंपनी छोड़कर दूसरी कंपनी की पॉलिसी लेने पर आपको क्रिटिकल इलनेस राइडर देने से इनकार भी किया जा सकता है। स्टैंड-अलोन पॉलिसी में आप अपने स्वास्थ्य बीमा में किसी भी तरह का बदलाव कर सकते हैं और आपके क्रिटिकल इलनेस प्लान पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आम तौर पर भुगतान होते ही क्रिटिकल इलनेस प्लान खत्म हो जाता है। लेकिन हाल में आए कई प्लान में ऐसा नहीं होता। उदाहरण के लिए स्टार क्रिटिकल इलनेस मल्टीप्लाई इंश्योरेंस पॉलिसी में चार बार भुगतान किया जाता है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (नौशाद फोर्ब्स)। आम मान्यता कहती है कि वैज्ञानिक शोध से अविष्कार होते हैं। इन आविष्कारों से नयी तकनीकों का विकास होता है और ये नयी तकनीक उत्पाद एवं बाजार की मदद करती हैं। नवाचार का यह रेखीय मॉडल एकदम साधारण है लेकिन उसका यह साधारणपन खतरनाक भी है। वैज्ञानिक शोध वास्तव में औद्योगिक नवाचार में बहुत सीमित भूमिका निभाता है। तकनीक का लक्ष्य मनुष्य की व्यावहारिक संभावनाओं का विस्तार करना होता है। विज्ञान का लक्ष्य है प्रकृति के बारे में समझ बढ़ाना। तकनीक या इंजीनियरिंग के मूल में उपयोगिता है। एक नये तरह के विकास से ज्ञान मिल सकता है लेकिन वह तकनीक का उद्देश्य नहीं है। इसी प्रकार शोध का लक्ष्य है नया ज्ञान हासिल करना। विकास का लक्ष्य है एक नया उत्पाद या सेवा तैयार करना। इन अवधारणाओं को सही ढंग से समझा जाए तो कंपनियों तथा सार्वजनिक शोध को कई बेकार कामों से बचाया जा सकता है। औद्योगिक नवाचार में शोध की भूमिका: स्टैनफर्ड में मैकेनिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर स्टीव क्लाइन ने नवाचार के एक शृंखला संबद्ध मॉडल की मदद से साधारण रेखीय मॉडल को प्रतिस्थापित करने का प्रयास किया। यहां कुछ बातें ध्यान देने लायक हैं। नवाचार की शुरूआत और उसका अंत दोनों बाजार के साथ होते हैं। डिजाइनिंग और परीक्षण इसकी मूल गतिविधियां हैं। तकनीकी और वैज्ञानिक ज्ञान नवाचार में अहम भूमिका निभाते हैं। जब मौजूद ज्ञान समस्या निवारण के लिए पर्याप्त नहीं होता है तब शोध किया जाता है। समस्या समाधान के लिए केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है। उसके लिए नया ज्ञान आवश्यक है। जैव प्रौद्योगिकी तथा सेमीकंडक्टर जैसे कुछ क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए वैज्ञानिक शोध आवश्यक हैं। तकनीकी उन्नति में वैज्ञानिक शोध की अहम भूमिका है। विज्ञान आधारित उद्योगों की तकनीकी प्रगति तथा नये तकनीकी क्षेत्रो में नवाचर में भी ऐसे शोध की अहम भूमिका है। दुनिया भर की हजारों शोध एवं विकास संस्थाएं अन्य संस्थाओं से सीखते हुए शुरूआत करती हैं तथा अपने उत्पादों को सुधारती हैं। इसके बाद ही शोध का इस्तेमाल नया ज्ञान तैयार करने में होता है। संस्थान के भीतर होने वाला शोध सार्वजनिक शोध प्रणाली के उत्पादन के इस्तेमाल की पूर्व शर्त होता है। यानी अगर कंपनियां शोध एवं विकास में निवेश करने में पर्याप्त सक्षम हों तो सार्वजनिक वैज्ञानिक शोध उचित है। इसके अलावा सार्वजनिक वैज्ञानिक शोध औद्योगिक नवाचार के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है। केनेथ एरो तथा रिचर्ड नेल्सन ने छह दशक पहले वैज्ञानिक शोध में सार्वजनिक सब्सिडी को लेकर दलील तैयार की थी। उन्होंने कहा था कि समाज शोध में कम निवेश करता है क्योंकि उसके लाभ स्पष्ट नहीं होते। ऐसा इसलिए कि शोध के नतीजे अनिश्चित होते हैं। यही नहीं नयी खोज के लाभ निवेशक के साथ-साथ अन्य लोगों तक भी जाने की पूरी संभावना रहती है। शोध के नतीजों की अनिश्चितता के कारण सरकारी फंडिंग को उचित ठहराना जारी रहता है। मेरे पास अंतिम आधिकारिक आंकड़े 2019 के हैं और उस वर्ष भारत सरकार ने 18 अरब डॉलर के राष्ट्रीय शोध एवं विकास के करीब 63 फीसदी हिस्से की फंडिंग की। इसमें करीब 7 फीसदी हिस्सेदारी विश्वविद्यालयों की है। 56 प्रतिशत हिस्सेदारी स्वायत्त सरकारी शोध एवं विकास प्रयोगशालाओं में होता है। मैंने हाल ही में उस सरकारी तकनीकी शोध के बारे में भी लिखा है जो रक्षा क्षेत्र के लिए हो रहा है। इसमें से करीब 10 प्रतिशत सार्वजनिक फंडिंग वाला वैज्ञानिक शोध है जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की वैज्ञानिक एवं औद्योगिक शोध परिषद की ओर लक्षित है। उद्योग एवं उच्च शिक्षा व्यवस्था के बजाय स्वायत्त प्रयोगशालाओं में सरकारी फंडिंग वाले शोध की तलाश करने के क्रम में हम एक बड़ा अवसर गंवा देते हैं। संदेश एकदम साफ है: सार्वजनिक फंडिंग वाले वैज्ञानिक शोध की राह मजबूत है लेकिन ऐसा शोध उच्च शिक्षा व्यवस्था के तहत होनी चाहिए न कि स्वायत्त प्रयोगशालाओं में। सार्वजनिक शोध में प्रतिभा महत्त्वपूर्ण: कई लोग सोचते हैं कि शोध विश्वविद्यालय नयी वैज्ञानिक समझ का प्रमुख स्रोत हैं। यह सच भी है। स्टैनफर्ड को सिलिकन वैली तथा उसकी तकनीकी कंपनियों की सफलता में अहम योगदान करने वाला माना जाता है। यह विश्वविद्यालय इस प्रतिष्ठा का पात्र है लेकिन मेरी दृष्टि में स्टैनफर्ड के शोध निष्कर्षों भर को श्रेय नहीं मिलना चाहिए। अगर दुनिया ने 125 वर्षों में स्टैनफर्ड के शोध नतीजों का कोई लाभ नहीं देखा होता तो शायद ज्यादा बुरी बात होती लेकिन यहां अहम शोध नतीजे नहीं बल्कि छात्र हैं। स्टैनफर्ड ने दुनिया की कई दिग्गज कंपनियों की स्थापना की हैं जिनमें प्रमुख हैं: ह्यूलिट पैकर्ड, वैरियन, गूगल, याहू, उबर, ट्विटर, ऐपल वगैरह। इन कंपनियों ने अर्थव्यवस्था में इतना अधिक योगदान किया है कि उसके आगे स्टैनफर्ड के शोध से मिला योगदान पीछे रह जाएगा। वहीं हजारों स्नातकों ने अर्थव्यवस्था, विज्ञान, साहित्य तथा अन्य विषयों में जो योगदान किया है उसका मूल्य इन बड़ी कंपनियों के योगदान से भी आगे है। हर महान विश्वविद्यालय के बारे में यही बात कही जा सकती है। हमारे पास विश्वस्तरीय शोध को शिक्षण से जोड़ने के कुछ उदाहरण मौजूद हैं। बेंगलूरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान खासतौर पर अलग है। परंतु मुंबई स्थित इंस्टीट्यूट आॅफ केमिकल टेक्नॉलजी जिसे उसके पुराने नाम यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट आॅफ केमिकल टेक्नॉलजी अर्थात यूडीसीटी से अधिक जाना जाता है, वह सबसे उल्लेखनीय उदाहरण है। यूडीसीटी की स्थापना सन 1933 में की गई थी। संस्थान को अपने शोध पर गर्व है लेकिन इसके साथ ही जरा इस बात पर भी विचार कीजिए कि उसने अपने पुराने विद्यार्थियों की मदद से क्या योगदान किया। पुराने विद्यार्थियों की सूची पर एक नजर डालते हैं: मुकेश अंबानी (रिलायंस), अंजी रेड्डी (डॉ रेड्डीज लैबोरेटरीज), मधुकर पारेख (पिडिलाइट इंडस्ट्रीज), के के घार्दा (घार्दा केमिकल्स), अश्विन दानी (एशियन पेंट्स), नीलेश गुप्ता (ल्युपिन), रमेश माशेलकर (एनसीएल के निदेशक और सीएसआईआर के डीजी), एन सेकसरिया (अंबुजा सीमेंट्स) और एमएम शर्मा (जिन्होंने बाद में खुद यूडीसीटी का नेतृत्व किया और उसकी वैश्विक प्रतिष्ठा स्थापित की)। सन 1800 के आरंभ में जब विल्हेम वॉन हंबॉल्ड ने दुनिया के पहले शोध विश्वविद्यालय यूनिवर्सिटी आॅफ बर्लिन के स्थापना सिद्धांत दिए तब से शोध विश्वविद्यालयों का लक्ष्य ज्ञान की तलाश करना रहा है। हमें यह बात इसमें शामिल करनी होगी कि ज्ञान खासतौर पर मानवता के काम तब आता है जब वह विश्वविद्यालय से बाहर छात्रों के मस्तिष्क में विराजमान होता है। यही कारण है कि उच्च शिक्षा में शोध किया जाना चाहिए। स्वायत्त प्रयोगशालाओं में शोध समाज को उसके प्राथमिक लाभ से वंचित करता है। जैसा कि स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय के मानद प्रेसिडेंट गेरहार्ड कैस्पर ने दिल्ली में अपने एक भाषण में कहा भी था, ह्यएक विश्वविद्यालय के नेतृत्व वाला शोध ज्ञान के हस्तांतरण के लिए आज भी सबसे अच्छा योगदान बेहतरीन शिक्षा पाने वाले छात्रों के रूप में कर सकता है। (लेखक फोर्ब्स मार्शल के सह-चेयरमैन, सीआईआई के पूर्व अध्यक्ष और सेंटर फॉर टेक्नोलॉजी इनोवेशन ऐंड इकनॉमिक रिसर्च के चेयरमैन हैं)।
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