विचार

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Published / 2022-12-07 20:58:20
यौन शिक्षा के बड़े सवालों पर चर्चा से असहजता

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अजय सानी)। हाल ही में बेंगलूरु के स्कूलों में सेलफोन का पता लगाने के लिए छात्रों के बस्तों की जांच की गई। दसवीं कक्षा के कई छात्रों के बस्तों से गर्भनिरोधक गोलियां और कंडोम मिले। इससे अंदाजा मिलता है कि इन छात्रों को इन चीजों की अच्छी समझ रही होगी। हालांकि कम उम्र में यौन संबंध बनाना गैरकानूनी है लेकिन अगर नाबालिगों में यौन संबंध बनाने का रुझान बढ़ रहा है तो बेहतर यही होगा कि ये संबंध सुरक्षित हों।  
 

दुनिया के अन्य हिस्सों के सामाजिक अध्ययन से संकेत मिलते हैं कि उन जगहों पर किशोरों में गर्भधारण और यौन संचारित रोग अधिक हैं जहां यौन शिक्षा, स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं है। भारत में यौन शिक्षा अनिवार्य नहीं है और अधिकांश स्कूल इसे पाठ्यक्रम में शामिल करने से बचते हैं। वहीं अधिकांश भारतीय माता-पिता अपने बच्चों को प्रजनन और यौन शिक्षा से जुड़ी बातों को समझाने के बजाय दूर जाना ही बेहतर समझते हैं।  


हालांकि ये बच्चे आजकल खुद ही कई चीजें सीख जाते हैं और शायद यह इंटरनेट के माध्यम से और भी आसान हो गया है। अच्छी बात यह भी है कि उनकी गर्भनिरोधक तक आसान पहुंच है। उदारीकरण के दौर तक अधिकांश भारतीयों की केवल निरोध तक पहुंच थी जो एक देसी कंडोम था और यह दिखने में भी अजीब था।  पश्चिम बंगाल और असम में उच्च मध्यम वर्ग इंडोनेशियाई रबर के इस्तेमाल से एक डच कंपनी द्वारा बनाए गए और तस्करी किए गए बांग्लादेशी कंडोम का उपयोग करता था। 1990 के दौर में मुंबई के यौनकर्मियों वाले एक इलाके और सामान्य जगहों के बीच एक ही अंतर था कि यहां विकसित देशों से आए हुए महंगे कंडोम उपलब्ध थे।  
बेंगलुरु के ये बच्चे भारत के तथाकथित कामकाजी वर्ग में शामिल होने वाली आबादी का हिस्सा हैं लेकिन दुखद बात यह है कि उन्हें यौन व्यवहार से जुड़ी जानकारियों से खुद को शिक्षित करना पड़ रहा है। देश के लगभग 25 प्रतिशत भारतीय 15 वर्ष से कम उम्र के हैं और लगभग 65 प्रतिशत 15 से 65 वर्ष की आयु के हैं। अगर आबादी का एक बड़ा हिस्सा कामकाजी उम्र का है, तब प्रति व्यक्ति उत्पादकता में बढ़त के बिना उच्च स्तर की वृद्धि संभव नहीं है।  
 

इससे अंदाजा लगता है कि यह मुनाफे वाला रोजगार है और यह भी कि कार्यबल को तैनात करने के लिए पर्याप्त रूप से शिक्षित किया गया है। वैश्विक स्तर पर कामकाजी आयुवर्ग वाली आबादी के एक बड़े वर्ग में आर्थिक विकास की क्षमता होती है जिसने निरंतर वृद्धि वाली अवधि में एक अहम भूमिका निभाई है। इसके उदाहरण में चीन, जापान, पश्चिम जर्मनी, दक्षिण कोरिया, ताइवान, वियतनाम, बांग्लादेश और इससे पहले19 वीं शताब्दी के अंत से अमेरिका भी शामिल हैं। इस तरह की अवधि प्रति व्यक्ति मुनाफे से जुड़ी हुई है क्योंकि स्मार्ट युवा आबादी नवाचारों पर काम करती है।  
 

हालांकि, आबादी में कामकाजी उम्र वाले लोगों का होना उच्च वृद्धि की गारंटी नहीं दे सकता है। इसके लिए रोजगार के पर्याप्त अवसर होने चाहिए और आबादी को पर्याप्त रूप से शिक्षा मिलनी चाहिए। दुर्भाग्य से भारतीय शिक्षा प्रणाली में केवल यौन शिक्षा ही अछूता रहने वाला एकमात्र क्षेत्र नहीं है। कई भारतीय कार्यात्मक रूप से अशिक्षित हैं और विशेष रूप से लड़कियां माध्यमिक स्तर की स्कूली शिक्षा के दौरान पढ़ाई छोड़ देती हैं।  भारत ने कामकाजी उम्र वाली आबादी को काम देने और उच्च स्तर की वृद्धि करने के लिए पर्याप्त रोजगार के अवसर कभी पैदा नहीं किए हैं जो संभव हो सकता था। भारत में व्यापक स्तर की बेरोजगारी, अल्प-रोजगार, और लोगों विशेष रूप से महिलाओं का नौकरी छोड़ना और कार्यबल से अलग होना कई दशकों से बेहद आम रहा है। 
 

बड़ी-बड़ी नीतियों जैसे कि नोटबंदी,  वस्तु एवं सेवा कर प्रणाली (जीएसटी) को अमलीजामा पहनाने की प्रक्रिया बेहद खराब रही और लॉकडाउन ने हालात को बदतर बना दिया। हालांकि जहां तक रोजगार सृजन का प्रश्न है उसकी स्थिति हमेशा खराब रही है।  
कामकाजी उम्र वाली आबादी से मिलने वाले फायदा का एक दूसरा पक्ष भी है। जैसे-जैसे आबादी आमदनी और शिक्षा की सीढ़ी पर आगे बढ़ती है तब जन्म दर में कमी आती है। जब कामकाजी आबादी कम होती है तब पेंशनभोगियों (जो बेहतर स्वास्थ्य देखभाल के कारण लंबे समय तक जीवित रहते हैं) में वृद्धि होती है। बदलाव का यह चरण और भी खराब होगा अगर स्त्री-पुरुषों के अनुपात में विषमता है। बच्चे पैदा करने की उम्र वाली कम महिलाओं के चलते बच्चे भी कम पैदा होते हैं। 
 

यूरोपीय संघ (ईयू) और जापान में पेंशनभोगियों की तादाद बढ़ रही है और इसकी वजह से दुनिया के कई विकसित देशों की वृद्धि में लगभग ठहराव सा आ गया है। चीन में स्त्री-पुरुषों के अनुपात की स्थिति बेहद खराब है और यहां एक बच्चे की नीति की वजह से देश में अगले 20 वर्षों में आबादी में 35 प्रतिशत की गिरावट देखी जा सकती है और यहां एक बड़ी पेंशनभोगी आबादी से जूझना होगा। 
अमेरिका अब तक इस गंभीर संकट से बचा है क्योंकि यहां से लोग दूसरे देश गए हैं। भारत की कुल प्रजनन दर (एक महिला के बच्चों की औसत संख्या) कई राज्यों में कम है, जिसका अर्थ घटती आबादी से जुड़ा है। ऐसे राज्य प्रति व्यक्ति, बेहतर शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सेवा वाले राज्य हैं। पूरे भारत में जनसंख्या वृद्धि दर में भी गिरावट आई है।  


उम्र बढ़ने के साथ ही अधिक लोगों के कार्यबल से बाहर होने पर कामकाजी वर्ग में शामिल होने वाली आबादी का लाभ मिलना बंद हो जाएगा। स्त्री-पुरुष का खराब अनुपात इसे और बदतर बना सकता है। दुर्भाग्य से पांच साल के चुनावी चक्र के बारे में सोचने वाले नेताओं की शिक्षा में दीर्घकालिक निवेश करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखती है जिससे इसमें अहम बदलाव आ सकता है। कामकाजी आबादी का लाभ लेने में हमारी विफलता हमें आगे भी परेशान करेगी जब यह दौर खत्म हो जाएगा।

Published / 2022-11-27 20:16:46
पंचकुला : सत्तासीन भाजपा सभी 10 सीटों पर साफ...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (नंद किशोर)। पंचकुला जिला परिषद चुनाव के नतीजों में राज्य में सत्तासीन भाजपा को झटका लगा है। पंचकुला जिले की सभी 10 सीटों पर भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया है। चुनाव में सभी निर्दलीय प्रत्याशी जीत गये हैं। निश्चित तौर पर यह एक जिला परिषद का चुनाव है लेकिन जिस प्रकार लोगों का भारतीय जनता पार्टी की नीतियों और वादाओं को लेकर मोहभंग हो रहा है उसका एक उदाहरण है।  
 

यह सच है कि भारतीय जनता पार्टी से पूरे देश को बड़ी उम्मीद थी लेकिन कोरोना काल की त्रासदी और महंगाई का जो असर हुआ है उससे आम लोगों के जीवन पर नकरात्मक असर हुआ है। यह असर विभिन्न चुनावों के परिणामों में दिखेगा। आखिर भारतीय जनता पार्टी को आम लोगों ने जिस कांग्रेस के विकल्प के तौर पर भेजा था उन आमलोगों की परेशानियों को लेकर भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र में सरकार ने गंभीर कदम नहीं उठाये हैं। क्रिकेट में हॉफ कोक शार्ट एक विख्यात शॉट है जिसमें बल्लेबाज अनमने ढंग से शॉट खेलता हुआ आउट हो जाता है। आज देश की गंभीर समस्या बेरोजगारी और महंगाई है। लेकिन इसको लेकर कोई ठोस नीति केन्द्र सरकार के पास नहीं दिखती है।  
 

भारतीय जनता पार्टी के सभी चुनाव में उसके कार्यकता अतंरराष्ट्रीय उपलब्यिों को बताकर लोगों की परेशानियों को नजर अंदाज कर रहें हैं। हिमाचल और गुजरात के परिणाम भले ही भाजपा के पक्ष में आये लेकिन उसके विरोध में पड़ने वाले वोट को नजरअंदाज करना ठीक उसी तरह होगा जैसा झारखंड में क्षेत्रिय पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा से हारकर भाजपा ने कहा था कि हमारा वोट बढ़ गया है। हिंदूत्व और मोदी के एजेंडा की एक सीमा है और लगता है इस सीमा पर भाजपा पहुंच चुकी है।  
 

कांग्रेस और आप की कमजोरियों से सत्ता में आना अगर भाजपा की मजबूरी है तो निश्चित ऐसा संकेत भाजपा के लिये अच्छा नहीं है। पार्टी विथ डिफरेंस ने जिस प्रकार गुजरात में कांग्रेसियों को शामिल किया है वह एक नकरात्मक पहल है। आखिर भाजपा का कैडर और चुनाव जिताउ उम्मीदवार  कम कैसे होत जा रहें हैं। राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ और उसकी सभी सहयोगी संगठन के लोग भी अब निराश हो रहें हैं। 
 

झारखंड की राजधानी रांची के हिंदू जागरण मंच के अध्यक्ष सुजीत कुमार सिंह कहते हैं कि पांच साल रघुवर सरकार में हम आम लोगों की समस्या को कम नहीं कर सके। शहर जाम से त्रस्त रहा। एक भी फ्लाई ओवर नहीं बना।विगत 30 साल से रातू रोड का पूरा ईलाका भाजपा को वोट देता रहा है और विधानसभा लोक सभा में जीत का कारण बनता है वहां के लोगों के लिये कुछ नहीं हुआ। हां अब फ्लाई ओवर बन रहा है जब चुनाव हार गये। आखिर भाजपा की सरकार से उसकी नीतियों से उसके संगठन के लोग ही नाराज है और अब सिर्फ मोदी के भरोसे केन्द्र जीत सकते हैं लेकिन हार की आशंका से नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। 

Published / 2022-11-26 20:57:44
राहुल का भोलापन अद्भुत, मन करता है उसपर हो जायें कुर्बान...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ वेदप्रताप वैदिक)। राहुल गांधी की मध्य प्रदेश यात्रा सर्वाधिक सफल रहने की उम्मीद है। पिछले तीन-चार दिनों में मुझे यहां के कई शहरों और गांवों से गुजरने का अवसर मिला है। जगह-जगह राहुल, कमलनाथ, दिग्विजयसिंह और स्थानीय नेताओं के पोस्टरों से रास्ते सजे हुए हैं। लेकिन राहुल के कुछ बयान इतने अटपटे होते हैं कि वे इस यात्रा पर पानी फेर देते हैं। जैसे जातीय जनगणना और सावरकर पर कुछ दिन पहले दिए गए बयानों ने यह सिद्ध कर दिया था कि वह अपनी दादी और माता की राय के भी विरुद्ध बोलने का साहस कर रहे हैं। ये कथन सचमुच साहसिक होते तो प्रशंसनीय भी शायद कहलाते। लेकिन वे साहसिक कम अज्ञानपूर्ण ज्यादा थे। इसके लिए असली दोष उनका है, जो राहुल को पर्दे के पीछे से पट्ठी पढ़ाते रहते हैं।

अब मध्य प्रदेश के महान स्वतंत्रता सेनानी टंट्या भील के जन्म स्थान पर पहुंचकर उन्होंने कह दिया कि टंट्या भील ने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़कर अपनी जान दे दी, जबकि आरएसएस अंग्रेजों की मदद करता रहा। उन्होंने संघ द्वारा आदिवासियों को वनवासी कहने पर भी आपत्ति की, क्योंकि आदिवासियों की सेवा करनेवाले संघ के संगठन इसी नाम का इस्तेमाल करते हैं।
राहुल से कोई पूछे कि क्या ये आदिवासी शहरों में रहते हैं? जो वनों में रहते हैं, उन्हें वनवासी कहना तो एकदम सही है। आदिवासी शब्द का इस्तेमाल कबाइली या ट्राइबल के लिए हुआ करता था लेकिन उस समय यह सवाल भी उठा था कि क्या सिर्फ आदिवासी लोग भारत के मूल निवासी हैं? बाकी सब 80-90 प्रतिशत लोग क्या बाहर से आकर भारत में बस गये हैं?
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को इस बात का श्रेय है कि उन्होंने टंट्या भील को एक महानायक का सम्मान दिया है। इसी प्रकार संघ को अंग्रेज का समर्थक बताना भी अपने इतिहास के अज्ञान को प्रदर्शित करना है। राहुल का भोलापन अद्भुत है। उस पर कुर्बान हो जाने का मन करता है।
देश की स्वाधीनता का ध्वज फहरानेवाली महान पार्टी कांग्रेस के पास आज कोई परिपक्व नेता नहीं है, यह देश का दुर्भाग्य है। यह ठीक है कि हमारे देश में कुछ नेता प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए लेकिन उनका ज्ञान राहुल जितना या उससे भी कम रहा होगा लेकिन उनकी खूबी यह थी कि वे अपने चारों तरफ ऐसे लोगों को सटाए रखते थे, जो उन्हें लुढ़कने से बचाए रखते थे। 

कांग्रेस के पास आज मोदी के विकल्प के तौर पर न तो कोई नेता है और न ही नीति है लेकिन इस अभाव के दौरान राहुल की यह भारत यात्रा बेचारे निराश कांग्रेसियों में कुछ आशा का संचार जरूर कर रही है लेकिन यदि अपने बयानों में राहुल थोड़ी रचनात्मकता बढ़ा दें और किसी के भी विरुद्ध निराधार अप्रिय टिप्पणियां न करें तो यह यात्रा उन्हें शायद जनता से कुछ हद तक जोड़ सकेगी। (लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं।)

Published / 2022-11-26 18:22:51
लोकतंत्र को स्वार्थ के लिए हथियार बनाकर इस्तेमाल करना बंद करे दुनिया

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (कुमार गौरव, कोडरमा)। दुनिया लोकतंत्र को स्वार्थ के लिए हथियार बनाकर इस्तेमाल करना बंद करे। क्योंकि इससे वैसे राष्ट्र अपनी तात्कालिक स्वार्थ को भले ही पूर्ण कर लेते है। लेकिन इसका खामियाजा पूरे विश्व को भुगतना पड़ता है। ‘संप्रभुता’ लोकतंत्र की न्याय की रक्षा के लिए ब्रह्मास्त्र है। लेकिन ताना शाह हियो ने लोकतंत्र को अपनी जागीर बना, वही ब्रह्मास्त्र से कुकर्म करते चले आ रहे हैं।  
जब भी विश्व में तृष्टीकरण की चाल चली जाती है। लोकतंत्र कमजोर हो जाती है। उस बकरी की बच्चे की तरह जो दो चार बूंद दूध की भूखी है मगर उसका मेमीयाना सुनकर ऐसा लगता है मानो उसकी सांसें अब छूट चली। और जब ऐसा होता है, तो वैसे राष्ट्र जो लोकतंत्र को अपनी आत्मा बना बैठे हंै वहां की शासन व्यवस्था वेंटिलेसन पर चली जाती है। अराजकता इतनी बढ़ जाती है कि वहां की सरकारें भले कुछ न कहे लेकिन गृह युद्ध एैसी स्थितियां बन जाती है। वैसे राष्ट्रों का आवाम जो लोकतंत्र की ईबादत लिखने में सकारात्मक कर्म पथ रहते हैं। उन्हेें लोकतंत्र से घिन्न आने लगती है। लोकतंत्र की धज्जियां कुछ राष्ट्र ही उड़ाते हैं, मगर इसकी कीमत लोकतांत्रिक हर राष्ट्र को चुकानी पड़ती है।  
ज्यादा पीछे जाने की जरूरत नहीं, द्वितीय विश्वयुद्ध पर गौर कर लीजिए। दुनिया के हुकुमों की हकीकत दूध का दूध, पानी का पानी की तरह साफ हो जायेगी। द्वितीय विश्वयुद्ध में दुनिया दो गुटों मे पूर्ण रुपेण बंट चुकी थी। अमेरिका इसमें तटस्थ थी। क्योंकि अमेरिका की फौज युद्ध में शामिल नही थी। यह एक पक्ष थी अमेरिका की। मगर यह तो सिर्फ तृष्टीकरण के तरीके थे। अगर न्याय की दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह अमेरिका की दादागिरी तथा धौंस थी। जिसे बिहार की एक लोकउक्ति चोरी भी सीना जोरी भी को चरितार्थ करती है। अमेरिकी फौज लड़ाई में उतरी नहीं। मगर अमेरिका की दुलरुआ राष्ट्र विश्व युद्ध मे टिके हुए थे। उसका कारण था अमेरिकी हथियार। अमेरिका शुरुआती युद्ध में न उतरकर भी युद्ध लड़ रही थी क्योंकि अमेरिका अपने राष्ट्रों को हथियार मुहैया करा रही थी, तो क्या ये नहीं हुई कि अमेरिका तो शुरू से ही चाहता था कि विश्व में एक ग्लोबल युद्ध हो, जिस युद्ध मे लोकतंत्र के पावर सेन्टर पूरा पश्चिमी राष्ट्र युद्ध में लिप्त हो जाए। जिससे विश्व में जो सबसे ज्यादा उपनिवेश पश्चिमी राष्ट्रों के अधीन है वहां उनकी साख टूटे।  
अराजकता तथा युद्ध की विभीषीका से ऊब कर उपनिवेश पश्चिमी राष्ट्रों के खिलाफ बगावत कर दे। उनसे अपनी सारी पिंड छुड़ा ले। ताकि पश्चिमी राष्ट्रों के प्रोडक्ट का उपनिवेशों पर एकाधिकार है वह समाप्त हो। ताकि उस बाजार की जरुरत अमेरिका पूरा कर अपनी अर्थव्यवस्था को दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनायी जा सके। अमेरिका की कूटनीति जानती थी कि जब तक ये राष्ट्र ग्लोबल युद्ध में फंसेंगे नहीं, तब तक इनका बाजार टूटेगा नहीं। क्योंकि उस समयावधि में पश्चिमी राष्ट्रों के बाजार जहां थे वहां उनका एकल साम्राज्य था। पश्चिमी राष्ट्र उस अवधि में अपने अपने बाजार में विकल्प के रूप में दूसरा कहीं रहने ही नहीं दिया।  
अमेरिका अच्छे से जानती था कि अगर उसे विश्व के सबसे बड़े बाजार पर अपना नियंत्रण करना है तो पश्चिमी राष्ट्रों को युद्ध में धकेल दो। स्वत: पश्चिम की हर राष्ट्र का बाजार उसके पास चला आयेगा। द्वितीय विश्वयुद्ध काल में पष्चिमी राष्ट्रो में भी आपस में फूट थी। वे अपनी ताकत तथा पैसे की घमण्ड में इतने मतवाले हो गए थे कि किसी भी राष्ट्री की सम्प्रभुता उनकी जूतों के नीचे तथा मानवता उनके गुलाम हुआ करती थी। अमेरिका इसका जबरजस्त फायदा उठाया। उन राष्ट्रो को खूब हथियार देकर खूब पैसा कमाया। नौबत यहां तक आ गई कि वह पष्चिम जो दुनिया की भगवान थी, सबसे ज्यादा ताकतवार थी उसे भी बैसाखी की जरुरत होने लगी। अमेरिका अपनी कूटनिति से पष्चिमी राष्ट्रो की सच्च हमदर्द बन उनके बाजारो पर कब्जा करता गया और मानव की नरसंहार करने वाली हथियार भी उन राष्ट्रों को बेचकर धन भी खूब कमाया। और पष्चिम उसे अपना मित्र मानने लगे जो आज भी जारी है मगर किसी वक्त दुनिया पर राज करने वाले पष्चिम अमेरिका की कूटनिति के समक्ष आत्म समर्पण कर दिया। दुनिया के वे मुल्क जो द्वितीय विश्वयुद्ध में दुसरे खेमे के थे। उन्होने युद्ध शुरू अपने विरुद्ध राष्ट्रो की सैन्य, आर्थिक क्षमता जान कर अपनी रणनिति बनायी थी उसकी वह नीतियां जीत से दूर हो रही थी। उसका खास कारण था अमेरिका के हथियार ,जो उस जमाने में दुनिया के सबसे आधुनिक हथियार थे। अच्छा चूंकि अमेरिका युद्ध से दूर थी इसलिए दूसरे खेमे की राष्ट्र अमेरिका पर सीधा हमला नही कर पा रहे थे। लेकिन इससे उन्हे भारी नुकसान हो रहा था। अमेरिकी हथियारें जापान को ज्यादा नुकसान दे रही थी। इसे जापान पचा नही पाया। हक्कीमत भी थी कि युद्ध मे हथियारों को मुहैया कराने वाला राष्ट्र भी युद्ध का हिस्सेदार होता है। जापान अमेरिका के पर्ल हर्बल मे वायु सेना पर कार्यवाही कर दी। 

जापान की इस हमले में 50-55 हजार फैजी तथा अमेरिका के नागरिक मारे गए। यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि अमेरिका इसे युद्ध के अन्दर होने वाली हवाई हमला ना कहकर इसे नरसंहार का नाम देकर विश्व की सहानभूतियाँ बटोरने की कोशिश की जिसमें अमेरिका सफल भी हुआ। अब तो द्वितीय विश्वयुद्ध जंग ना होकर क्रूरता की हर हद पार कर दी। और अमेरिका जापान की हिरोषिमा तथा नागासाकी पर परमानु बम गिराकर लोकतंत्र की तृष्टीकरण की बहुत बड़ी विसात बिछा दी। इससे जापान का ही नुकसान नही हुआ बल्कि समुचे विश्व में परमानेन्ट असुरक्षा, अराजकता की डर बैठ गई। हर राष्ट्रो में हथियरों की होड़ हो गई। और पृथ्वी जो ब्रँम्हाण्ड में एक ही है उसे हजारो बार मिटा देने की हथियारे बना ली गई। काश जितने पैसे मानव नाश पृथ्वी विनाश के लिए बहाई गई। उतने पैसे से तो यही हमारी पृथ्वी स्वर्ग सी सज जाती। मगर एैसा किसी ने नही किया। अमेरिका का परमाणु भले ही तत्कालिक विश्वयुद्ध बन्द करा दी, मगर दुनिया मे परमाणु होड़ बढ़ गई। हर राष्ट्र अपनी आजादी को सुरक्षा कवच परमाणु का देना चाहने लगी। जबकि परमाणु की विविषिका जापान ही बता सकती है। जब पर्ल हर्बल नरसंहार थी तो हीरोसीमा तथा नागासाकी क्या थी। जब हत्या का इंसाफ हत्या है और जब नरसंहार का बदला नरसंहार है तो इण्डिया एैसे इन्साफ करने वाले अमेरिका से अपना इन्साफ दिलाने की मांग करती है। 

अमेरिका जिसके गोद में लोकतंत्र है वह साकारात्मक सोच रख इण्डिया का हिसाब करे। क्योंकि विश्व की सबसे पहले तथा सबसे सबसे बड़ी नरसंहार तैमुरगल ने की तैमुरगल ने 12वी सदी में ही एक लाख आवाम की हत्या कराई थी। अच्छा चलो यह पूरानी बाते है नई बाते आधुनिक विश्व की करते है। आधुनिक विश्व में अंग्रेजो ने इण्डिया के जालियावाला बाग में आधुनिक विश्व की सबसे बड़ी नरसंहार कराई। आप हमारी ये इन्साफ दिला दे। यकीन मानिए इंडिया भगवान की तरह अमेरिका की पूजा करेगी। अगर आप दिला नही सकते तो आप इण्डिया को इंसाफ ले लेने के लिए आजाद छोड़ दे। आप लोकतंत्र के आइडियल है आपकी इन्साफ सर आँखों पर तो क्या मंगोल तथा ब्रिटेन पर इण्डिया को भी परमाणु बम पटक कर अपनी नरसंहार का बदला लेना चाहिए। लेकिन देखिए इण्डिया के संस्कार इण्डिया कभी भी परमाणु उपयोग की बात नही करती तथा उस नरसंहार को माफ कर मानव के लिए मानवता के लिए, आगे बढ़ गई है। और इस नरसंहार को उनकी नीयति तथा अपनी कुबार्नी मानकर अपना वतन सुन्दर वतन, सभ्य वतन, निष्ठावान वतन गढ़ने में लगी है। इण्डिया लोकतंत्र की रास्तो मे बहुत दूर निकल गई है। अगर लोकतंत्र के दिशा की ओर देखी जाए, तो इतना हो जाने के बाद भी इण्डिया ऊगता सूरज की तरह हर अधकार को रौशन दान कर रही है। जय हिन्द... 
 

Published / 2022-11-22 18:08:44
चीन का लुटेरा, सनकी और ताकत की तानाशाही रवैया...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (कुमार गौरव)। आधुनिक विश्व में चीन आज भी अपने पूर्वजों से सीख नहीं ली है। आज की ग्लोबल व्यवस्था में भी चीन अपने पूर्वजों की तरह लुटेरा, सनकी तथा ताकत की तानाशाही की प्रवृति से उबर नहीं पायी है। उन्हें आज भी दुनिया बहसी, दरिंदे तथा चीन की तानाशाही मिटाने के लिए एकजुट है जैसा लगता है। जबकि चीन को याद होना चाहिए कि सिर्फ वह ही अकेला राष्ट्र नहीं जो अपनी आजादी में रक्त बहाया हैं। अगर देखा जाए तो विश्व में आजादी के लिए कोई राष्ट्र सबसे ज्यादा कुर्बानियां दी है। वह अकेला राष्ट्र है इंडिया।  
अगर चीन के अंदर सचमुच बर्बरता तथा तानाशाही के अलावा राष्ट्रभक्ति भी जीवित है तो वह इंडिया की इतिहास पढ़े। पता चल जायेगा कि आजादी के लिए किसने सबसे ज्यादा लहू का महासागर बहाया था। आप इसे नहीं समझ सकते, क्योंकि आपकी राष्ट्रभक्ति के दायरे ऐसे हैं। वहां से सिर्फ अपना राष्ट्र ही दिखता है। बाकी के मुल्कों की संप्रभुता सिर्फ लकीरें और मातृभूमि दूसरों की मामूली जमीन के टुकड़े। अरे! जिसे जमीन समझ रहे हैं। उसे मिट्टी के टुकड़े समझते। शायद मिट्टी की अहमियत समझ आती। संप्रभुता से पहचान होती। मगर आप अपनी ताकत, का विकास का,  ऐसा चर्बी आंखों में भर रखा है कि मित्र क्या, दुश्मन क्या, अपना कौन। पराया कौन, कुछ भी नहीं दिखती। बस कभी हमें शोषण की गई थी, तो फिर हम भी उन्हीं की तरह आज ताकतवर है सीमा विस्तार क्यों नहीं कर सकते। अरे, भाई यह 19 वीं सदी नहीं 21 वीं सदी है। ग्लोबल विश्व में हर कोई सब जानता है। हंसी आती है बात भले पुरानी हो। मगर सत्य तो सत्य है। तुम तो साम्राज्यवादियों से भी चार कदम आगे निकले। साम्राज्यवादियों के उपनिवेश संबोधन शब्द हटा दिया और जोड़ दिया ‘गुलामी’ यह कहां का और कैसा तुम्हारे सोच ही तरीके हैं तथा संप्रभुता तोड़ने के अपने निर्मम पाप को छुपाने हेतु  दूसरों की इतिहासों से भी खेल जाते हो।  
साम्राज्यवादी विचारधारा की ग्लोबल सेंटर अमेरिका भी मानवता की एक सीमा को समझती तथा मानती भी है। मगर आप तो साम्राज्यवादी लकीरों को भी  बौना कर चुके हो। जहां मानव मानवता की कोई जगह नहीं बस दुनिया में लोग मरते हैं, तो मरे। कटते हैं तो कट जाये। कोई फर्क नहीं। हम तो खुश हैं। अजी जरा ठहरिए यही आप मात खा गये।  क्योंकि आप जब दूसरों की इतिहासों के साथ खिलवाड़ कर रहे थे। तब यह भूल गये कि ताकत के दम पर लक्ष्मी को गुलाम बनाया जा सकता है। परंतु इतिहासों पर नहीं। सत्यमेव जयते के तहत सरस्वती चलती है। इतिहासों की सच्चाई को भले ही ताकत तथा धन के दम पर कुछ समयावधि तक छुपाई जा सकती है। लेकिन इतिहासों की सच्चाई को हमेशा-हमेशा के लिए दफनाई नहीं जा सकती। क्योंकि इतिहासकारों की मानें तो जब समय का पहिया घूमता है तो इतिहासों की सच्चाई कब्र से निकलकर जिंदा हो ही जाती है। जिस दिन ऐसा होता है। जिस दिन ऐसा हो जाता है। इतिहासें सच को अपने मरी होने के बावजूद सम्मानित, शानदार, जानदार, दमदार, ताकतवर जगह दे देती है।  
कई उदाहरण पड़े हैं विश्व में ऐसें कि जब न्याय की बात विश्व में आयी, इतिहासों के अनगिनत सच्चाई जमीन फाड़कर अपना स्थान पाया।  ताकत तो पीढ़ियों का खेल है जो एक सा हर  पीढ़ी के पास नहीं रहती। उदाहरण के तौर पर सन 1962 ईस्वी की इतिहासों को आपने अपनी सुविधानुसार तोड़-मरोड़ कर पेश किया, जो सरकार गलत है। कहा जाता है कि 19वीं सदी की आधुनिक युग में कुछ भी छिपा पाना संभव नहीं। अगर यह सही है तो सन 1962 ईस्वी की चाइना द्वारा सुनियोजित साजिश के तहत इंडिया पर की गयी। हमले की इतिहासों के साथ छेड़ - छाड़ तथा अधूरी क्यों लिखी गयी।  
ताज्जुब की बात यह कि विश्व बिरादरी बिना सत्यापन किये, चाइना द्वारा लिखित इतिहास को सही मान लिया। क्या  कूरूर चाइना की महिमा मंडल के लिए सत्य को नजरअंदाज की गयी या इंडिया की सादगी तथा संप्रभुता की सत्यता को पचा नहीं पाई दुनिया। चलो कोई बात नहीं। हर राष्ट्रों की अपनी अपनी विवशता है। अपनी अपनी समस्या है। वाह रे! लोकतंत्र जरूरत पड़ने पर हर राष्ट्र तेरी दुहाई देती है और जरूरत पड़ने पर तेरी कफन की भी सौदा कर देती हैं। 1962 ईसवी में जहां पूरी दुनिया शीत युद्ध के कारण दो फाड़ में बटी थी।  
कोई भी छोटी घटना कभी भी दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी विश्व युद्ध में बदल जा सकती थी। ऐसा नहीं कि इस भयावह स्थिति में भी शांति के प्रयास नहीं किया जाता था। मगर ताकतवर मुल्कों ने इतिहासों को ऐसा तोड़ - मरोड़ किया, कि हर शांति प्रयास हंसी के पात्र बन जाया करती थी। इस समयकाल में चीन अपनी साम्राज्यवादी नीतियों का विस्तार भी किया और उस घटनाक्रम के इतिहास के साथ छेड़छाड़ भी की। ताज्जुब की बात चाइना को कोई ऐसा करने से रोकना तो दूर टोकना को भी अपनी दायित्व नहीं समझा। 1962 ईस्वी में चाइना की करतूत देखिए उसने सर्वप्रथम इंडिया को अपना भाई कहा। भाई के लिए हर त्याग हर लड़ाई में साथ-साथ रहने का वादा किया।  
हिंद के एक ही पिता के दो भाई की बखान की। इंडिया के साथ लड़ाई लड़ने से हाय तौबा की और जैसे ही इंडिया भाई की प्रेम के रास्ते पर बढ़ी। वहीं कल तक एक थाली के दो भाई की गुणगान करने वाला चीन कमबख्त पीठ पर छुरा (चाकू) घोंप दी। खुद मारी इंडिया के पीठ पर चाकू और इतिहास में इंडिया को ही साम्राज्यवादी होने का आरोप लगा दिया। जिससे दुनिया की सहानुभूति इंडिया को ना मिल पाये। इसलिए इतिहासों के पन्नों को भी बदल दी गयी। उस समय इंडिया के धांव ऐसे थे कि तन से मिट जाने के बावजूद मन में कैसर की पीड़ा जैसी दर्द मिट ही नहीं रही थी। वेंटिलेशन पर पड़ी हमारी इंडिया जब इस घाव के दर्द से ही नहीं उबर पायी थी। तब इतिहास किसके द्वारा लिखी जा रही थी। उसे देखने की औकात कहां। उसमें शब्द क्या भरे जा रहे हो। इतनी इल्म कहां। जिसका नाजायज फायदा चीन ने उठा ली।  
इस विवाद की  विषाद बिछाकर कि वह जमीन जिन्हें उसने इंडिया से छीनी है। वह चीन की ही थी। इंडिया उसे कब्जा किए हुए था। जबकि यह सच्चाई नहीं, इतिहास की। यह तो साम्राज्यवादी तथा लुटेरा शब्द चाइना के माथे न लगे, इसलिए यह चाइना की एकतरफा पक्ष है। जबकि सच्चाई यह है कि चाइना की नीतियां इन्हीं दो कमरों में बैठकर बनाई गई है। 1962 ईस्वी समय काल में भारत तुरंत तुरंत ही आजादी पाई थी। गुलामी का ऐसी दौड़ से इंडिया गुजरी थी कि आजादी मिलते ही पार्टीशन हो गया। रक्त न बहे इसके लिए पार्टीशन हुई, फिर भी चारों तरफ रक्त बहते रहने के माहौल में आजादी का सूरज देखा और परंतु चीन ने भी इंडिया की इस लाचारी का फायदा उठा ली। जमीन भी हड़पी इंडिया की। शमशान बनाया इंडिया को। साथ ही साथ इतिहास के पन्नों में इंडिया को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। 1962 कि चीन ने जब देखा कि इंडिया अपने विकास रथ में राष्ट्रवाद का फ्यूल भर रही है। पचा नहीं पाया। झोंक दी इंडिया को एक युद्ध में। ताकि इंडिया टूटे। कमजोर हो। इंडिया के नेतृत्व करता चाइना की दोगली नीति समझ नहीं पाये। जिसकी कीमत इंडिया को अपनी जमीन होकर चुकानी पड़ी।  
इंडिया 1947 ईस्वी की आजादी उपरांत सैन्य ताकत से मुंह मोड़ कर विकास के रास्ते पर चल पड़ी। चीन यह जान चुका था कि इंडिया की फौज कमजोर है।  बस क्या था। 20 अक्टूबर 1962 को हमला कर दी। चूंकि इंडिया इसके लिए न मानसिक न ही सैन्य रूप से तैयार थी। फिर भी 25-50 गोलियां लेकर इंडिया के सपूतों ने उनका डटकर मुकाबला किया। जहां चीन के सैनिक 25-50 गोलियों चलाकर अपने हथियारों की छमता नाप कर चली थी। इंडिया के बेटे 25-50 गोलियां तथा 56 इंच का सीना गोलियों को झेल लेने को, फूलाकर युद्ध किया। जो सब जानते थे कि यह युद्ध तो एक शेर तथा बकरी के बच्चे मेमनों की तरह ही है। जहां बेचारी इंडिया के साथ जगधन पाप की जा रही है। फिर भी इंडिया के सपूतों ने चीन के गोलियों का जवाब अपने अपने सीने को आगे कर की। उनके साथ युद्ध की सप्लाई लाइन भी इंडिया विकसित नहीं कर पाई थी। युद्ध लड़ने के लिए हथियार तथा भोजन सैनिकों को मुहैया करना पहली प्राथमिकता होती है, जो इंडिया की नहीं थी।  
चीन  हमें मार दे। मगर हम मां के सपूत तुम्हारे हवाले छोड़ कर अपनी धरती को पीछे नहीं जायेंगे। इस सोच को जिंदा रखने हेतु कई कई दिनों तक, हमारी भूखी फौज, अपने चमड़े की बेल्ट, अपने ही शहीदों के कच्चे मांस तक को खाना मंजूर की ताकि वह उस समय तक जीवित रहे। जब तक निर्दयी चाइना कि हमलावर गोली न  मार दे। भारतीय फौज हमेशा अजय रही है। हमारे पास हथियार नहीं तो क्या हम पर कर्ज तो जरूर है मातृभूमि का वीरगति हो जायेंगे। मगर पीठ नहीं दिखायेंगे कायरता की कलंक को माथे पर नहीं लगने देंगे। ऐसा पापी राष्ट्र चाइना जिसके पास मानवता नाम की कोई चीज नहीं है। वह इस बर्बर नरसंहार को अपने युद्ध जीतने की गाथा गढ़ कर सुनाती है। जरूरत पड़ने पर दुनिया को 1962 ईस्वी की अपनी जीत का धौंस देती है। ऐसा कब तक चलेगा। इतिहास के साथ छेड़ छाड़ ऐसा अपराध को बंद करनी होगी। वरना हर युग में संप्रभुता के कारण युद्ध के काले बादल मंडराते रहेंगे। जय हिंद..(लेखक कोडरमा, झारखंड निवासी और स्वतंत्र लेखक हैं।) 

Published / 2022-11-19 17:28:41
अब दुनिया पर चढ़ेगा फुटबॉल विश्व कप का नशा

सत्यनारायण गुप्ता 
 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क।10 नवंबर को एडिलेड आस्ट्रेलिया में इंग्लैंड से हारने के बाद भारत में क्रिकेट का नशा उतर चुका है। लेकिन अब फुटबॉल का बुखार दुनिया भर के खेल प्रेमियों पर चढ़ने  लगा है। भारत भी उससे अछूता नहीं है। कतर में 20 नवंबर से 18 दिसंबर 2022 तक 22 वां फीफा विश्वकप का आयोजित किया जा रहा है। मध्यपूर्व में पहली बार और एशिया में दूसरी बार फुटबॉल विश्व कप का आयोजन हो रहा है। फुटबॉल विश्व कप की शुरुआत 1930 में हुई थी। उरूग्वे में आयोजित इस टूर्नामेंट में कुल 13 देशों ने भाग लिया था। मेजबान उरूग्वे ने फाइनल में अर्जेंटीना को 4-2 से हराकर जीता था। 1930  से ही हर चार साल में विश्वकप आयोजित होता रहा है। 1942 और 1946 को छोड़कर जब द्वितीय विश्व युद्ध के कारण खेल नहीं हो पाए थे। अब तक हुए 21 विश्वकप में 900 मैच खेले जा चुके हैं, जिनमें 2538 गोल हुए हैं। 

विश्वकप का पहला गोल 1930  में आयोजित पहले विश्वकप में फ्रांस के लूसियन लारेंट द्वारा किया गया। अब तक सर्वाधिक गोल करने वाले खिलाड़ी हैं- ब्राजील के रोनाल्डो 15 गोल, जर्मनी के जर्ड मूलर- 14 गोल और फ्रांस के जस्ट फोंटेन- 13 गोल। एक ही टूर्नामेंट में सर्वाधिक गोल करने का रिकॉर्ड भी जस्ट फोंटेन के नाम है। इन्होंने 1958 विश्वकप में कुल 13 गोल किये थे। सबसे अधिक उम्र में गोल करने का रिकॉर्ड रोजर मिला के नाम है। इन्होने 42 वर्ष की उम्र में गोल किया था।  अब तक सर्वाधिक 5 बार ब्राजील ने विश्वकप का खिताब जीता है। इसके अलावा जर्मनी और इटली ने चार चार बार उरूग्वे, अर्जेंटीना और फ्रांस दो दो बार तथा इंग्लैंड और स्पेन एक एक बार खिताब जीत चुके हैं। 
2022 के फीफा विश्वकप में जिन खिलाड़ियों से ज्यादा उम्मीदें हैं और जिन पर नजर रहेगी,वे हैं फीफा रैंकिंग में शीर्ष स्थान पर रहने वाले अर्जेंटीना के लियोनेल मेसी, नंबर दो पोलैंड के रोबर्ट लेवानडोवस्की, नंबर तीन पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो। इनके अलावा बेलान डी ओर अवार्ड जीतने वाले फ्रांस के करीन बेंजेमा, इंग्लैंड के हैरीकेन,मिश्र के मोहम्मद सालेह, ब्राजील के नेमार, उरूग्वे के लुईस सुआरेज व   बेल्जियम के केविन डी ब्रुइन भी अपने जलवे बिखेरने के लिए तैयार हैं। जहां तक टीमों/देशों का प्रश्न है, ब्राजील, जर्मनी, इटली, फ्रांस, अर्जेंटीना, स्पेन, इंग्लैंड, पुर्तगाल और उरूग्वे खिताब के प्रबल दावेदार हैं। 
अब तक फीफा विश्वकप में दक्षिण अमेरिकी और यूरोपीय देशों का वर्चस्व अधिक रहा है। लेकिन यह खेल दुनिया भर में लोकप्रिय है, भारत में भी। जबकि फीफा विश्व रैंकिंग में भारतीय टीम 104 वें स्थान पर है। विश्व भर के फुटबॉलप्रेमी जो कतर आना चाहते हैं, उनके लिए कतर सरकार ने हय्या कार्ड जारी किया है। हय्या कार्ड एक प्रकार का आईडी कार्ड होगा। कार्ड धारकों को वीजा नहीं लेना पड़ेगा, स्टेडियम तक जाने के लिए बस और मैट्रो का उपयोग कर सकेंगे और स्टेडियमों में प्रवेश मिल सकेगा। फाइनल मैच लुसेल के नेशनल स्टेडियम में होगा, जिसमें 88000 दर्शकों के बैठने की क्षमता है। 
मानवाधिकार उल्लंघन तथा फीफा विश्वकप आयोजन स्थलों के निर्माण कार्यों में लगे मजदूरों के शोषण का आरोप झेल रहा देश कतर के लिए फीफा विश्वकप का सफल आयोजन कर अपनी छवि सुधारने का अच्छा अवसर है। 

Published / 2022-11-19 07:13:18
यह पल रानी लक्ष्मीबाई से प्रेरणा लेने का है...

जयंती (19 नवंबर) पर विशेष

डॉ वंदना सेन

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत भूमि पर अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए अनेक वीर अग्रणी भूमिका में रहे हैं। लेकिन देश को स्वतंत्र कराने में मातृशक्ति के योगदान को किसी प्रकार से कम नहीं कहा जा सकता। जिन नारियों ने भारत को स्वतंत्र कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई आज पूरा देश उन्हें वीरांगना के नाम से स्वीकार करता है। 

वीरांगना नाम सुनते ही हमारे मन मस्तिष्क में स्वाभाविक रूप से रानी लक्ष्मीबाई की छवि उभरती है। भारतीय वसुंधरा को अपने वीरोचित भाव से गौरवान्वित करने वाली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई सच्चे अर्थों में वीरांगना हैं। वे भारतीय महिलाओं के समक्ष अपने जीवनकाल में ही ऐसा आदर्श स्थापित कर विदा हुईं, जिससे हर कोई प्रेरणा ले सकता है। वर्तमान युग में जहां हर कोई अपने आप तक केन्द्रित होता जा रहा है, उनके लिए वीरांगना लक्ष्मीबाई का जीवन एक ऐसा उदाहरण है, जो राष्ट्रीय भावना को संचारित करने में एक आदर्श है। भारतीय नारी शक्ति को इस बात का अवश्य ही विचार करना चाहिए कि हमारे नायक कौन होने चाहिए? क्योंकि श्रेष्ठ नायक और नायिकाओं के माध्यम से ही श्रेष्ठ जीवन बनता है। 

आज हम जिस चमक-दमक में नायकत्व को देखने का प्रयास करते हैं, वे वास्तव में भारत के नायक हैं ही नहीं। इसे सुनियोजित तरीके से भारत में इस रूप में प्रचारित किया गया है और इसी कारण समाज का बहुत बड़ा वर्ग भ्रम में जी रहा है।

यह वास्तविकता ही है कि जो भी देश से प्यार करता है, उसे कोई भी प्रलोभन अपने कर्तव्य से डिगा नहीं सकता। ऐसे ही महान व्यक्ति भविष्य में समाज के नायक के रूप में स्थापित होते हैं। वास्तव में नायक वही होता है, जो अपने कर्मों से सही राह पर चलने की प्रेरणा दे सके। ऐसा ही रानी लक्ष्मीबाई का जीवन था, यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है। उन्हें अपने राज्य और राष्ट्र से एकात्म भाव को प्रदर्शित करने वाला प्यार था। वीरांगना के मन में हमेशा यह बात कचोटती रही कि देश के दुश्मन अंग्रेजों को सबक सिखाया जाए। इसी कारण उन्होंने यह घोषणा की थी कि मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। इतिहास बताता है कि इस घोषणा के बाद रानी ने अंग्रेजों से युद्ध किया। वीरांगना लक्ष्मीबाई के मन में अंग्रेजों के प्रति किस कदर घृणा थी, वह इस बात से पता चल जाता है कि जब रानी का अंतिम समय आया, तब ग्वालियर की भूमि पर स्थित गंगादास की बड़ी शाला में रानी ने संतों से कहा कि कुछ ऐसा करो कि मेरा शरीर अंग्रेज न छू पाएं। इसके बाद रानी स्वर्ग सिधार गईं और बड़ी शाला में स्थित एक झोपड़ी को चिता का रूप देकर रानी का अंतिम संस्कार कर दिया और अंग्रेज देखते ही रह गए। हालांकि इससे पूर्व रानी के समर्थन में बड़ी शाला के संतों ने अंग्रेजों से भीषण युद्ध किया, जिसमें 745 संतों का बलिदान भी हुआ, पूरी तरह सैनिकों की भांति अंग्रेजों से युद्ध करने वाले संतों ने रानी के शरीर की मरते दम तक रक्षा की।

जिन महापुरुषों और महान नायिकाओं का हृदय वीरोचित भाव से भरा होता है, उसका लक्ष्य सामाजिक और राष्ट्रीय उत्थान ही होता है। वह एक ऐसे आदर्श चरित्र को जीता है, जो समाज के लिए प्रेरणा बनता है। इसके साथ ही वह अपने पवित्र उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सदैव आत्मविश्वासी, कर्तव्य परायण, स्वाभिमानी और धर्मनिष्ठ होता है। ऐसी ही थीं महारानी लक्ष्मीबाई। उनका जन्म काशी में 19 नवंबर 1835 को हुआ। लक्ष्मीबाई अपने बाल्यकाल में मनु व मणिकर्णिका के नाम से जानी जाती थीं। सन् 1850 में मात्र 15 वर्ष की आयु में झांसी के महाराजा गंगाधर राव से मणिकर्णिका का विवाह हुआ। एक वर्ष बाद ही उनको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, लेकिन चार माह पश्चात ही उस बालक का निधन हो गया। राजा गंगाधर राव को तो इतना गहरा धक्का पहुंचा कि वे फिर स्वस्थ न हो सके और 21 नवंबर 1853 को चल बसे। यद्यपि महाराजा का निधन महारानी के लिए असहनीय था, लेकिन फिर भी वे घबराई नहीं, उन्होंने विवेक नहीं खोया। राजा गंगाधर राव ने अपने जीवनकाल में ही अपने परिवार के बालक दामोदर राव को दत्तक पुत्र मानकर अंग्रेज सरकार को सूचना दे दी थी। परंतु ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार ने दत्तक पुत्र को अस्वीकार कर दिया। 27 फरवरी, 1854 को लार्ड डलहौजी ने गोद की नीति के अंतर्गत दत्तक पुत्र दामोदर राव की गोद अस्वीकृत कर दी और झांसी को अंग्रेजी राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी। यह सूचना पाते ही रानी के मुख से यह वाक्य प्रस्फुटित हो गया, मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। यहीं से भारत की प्रथम स्वाधीनता क्रांति का बीज प्रस्फुटित हुआ। रानी लक्ष्मीबाई ने सात दिन तक वीरतापूर्वक झांसी की सुरक्षा की और अंग्रेजों का बड़ी बहादुरी से मुकाबला किया। बहुत दिन तक युद्ध का क्रम इस प्रकार चलना असंभव था। सरदारों का आग्रह मानकर रानी ने कालपी प्रस्थान किया। 

वहां जाकर वे शांत नहीं बैठीं। उन्होंने नाना साहब और उनके योग्य सेनापति तात्या टोपे से संपर्क स्थापित किया और विचार-विमर्श किया। रानी की वीरता और साहस का लोहा अंग्रेज मान गए, लेकिन उन्होंने रानी का पीछा किया। कालपी में महारानी और तात्या टोपे ने योजना बनाई और अंत में नाना साहब, शाहगढ़ के राजा, बानपुर के राजा मर्दन सिंह आदि सभी ने रानी का साथ दिया। रानी ने ग्वालियर पर आक्रमण किया और वहां के किले पर अधिकार कर लिया। विजयोल्लास का उत्सव कई दिनों तक चलता रहा, लेकिन रानी इसके विरुद्ध थीं। यह समय विजय के उल्लास का नहीं था, अपनी शक्ति को संगठित कर अगला कदम बढ़ाने का था। इधर जनरल स्मिथ और मेजर रूल्स अपनी सेना के साथ संपूर्ण शक्ति से रानी का पीछा करते रहे और आखिरकार वह दिन भी आ गया जब उसने घमासान युद्ध करके ग्वालियर का किला अपने कब्जे में ले लिया। रानी लक्ष्मीबाई इस युद्ध में भी अपनी कुशलता का परिचय देती रहीं। 18 जून, 1858 को ग्वालियर का अंतिम युद्ध हुआ और रानी ने अपनी सेना का कुशल नेतृत्व किया। वे घायल हो गईं और अंतत: उन्होंने वीरगति प्राप्त की। रानी लक्ष्मीबाई ने स्वातंत्र्य युद्ध में अपने जीवन की आहुति देकर जनता जनार्दन को चेतना प्रदान की और राष्ट्रीय रक्षा के लिए बलिदान का संदेश दिया। रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान उस समाज के लिए भी एक प्रेरणा है जो देश के विरोध में नए नए षड्यंत्र करते हैं। क्योंकि विचार करने वाली यह है कि देश को स्वतंत्र कराने के लिए जिन योद्धाओं ने अंग्रेजों से मुकाबला किया, वह उनके स्वयं के लिए नहीं था, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय समाज के लिए ही था। आज हम स्वतंत्र भारत में जी रहे हैं तो इसमें इन क्रांतिकारियों का अविस्मरणीय योगदान है। भारत की भावी पीढ़ी को ऐसे नायकों से प्रेरणा लेकर जितना भी बन सके, राष्ट्र के लिए योगदान देना ही चाहिए। (लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Published / 2022-11-16 21:11:44
लाला लाजपत राय का बलिदान कभी भूला नहीं जा सकता

शिवकुमार शर्मा 
 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। किसी भी व्यक्ति के कार्यों का समापन भी उसके संसार से विदा लेने के साथ ही हो जाता है, परंतु उसके द्वारा समाज के लिए किए गए त्याग, समर्पण, बलिदान और सामाजिक योगदान उसे अमर बनाते हैं। भारत की आजादी की जंग में अंग्रेज सरकार से जूझने वाले सेनानियों में लाल, बाल, पाल का नाम अग्रगण्य है। यह बताना प्रासंगिक होगा कि लाला लाजपत राय का जन्म अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत में हुआ जो अब पाकिस्तान में है। बाल गंगाधर तिलक का जन्म महाराष्ट्र के रत्नागिरि एवं बिपिन चंद्र पाल का जन्म अविभाजित भारत के हबीबगंज सदर उप जिला अंतर्गत हुआ जो अब बांग्लादेश में है। इस प्रकार लाल, बाल, पाल तीनों नाम एक साथ होने पर किन्हीं तीन व्यक्तियों के एक साथ होने मात्र की जानकारी ही नहीं देते अपितु तत्कालीन अखंड भारत का बोध कराते हैं। 
इन तीन विभूतियों में से एक लाला लाजपत राय ने 18 जनवरी 1865 में पंजाब में (अविभाजित भारत) उर्दू फारसी के सरकारी शिक्षक मुंशी राधाकृष्ण अग्रवाल और गुलाबदेवी अग्रवाल के यहां जन्म लिया। प्रारंभिक शिक्षा राजकीय उच्च मध्य विद्यालय रेवाड़ी में हुई। पिता उन्हें वकील बनाना चाहते थे। इसलिए कानून की पढ़ाई के लिए 1880 में लाहौर के कॉलेज में प्रवेश लिया। वहां उनकी भेंट राष्ट्रवादी लाला हंसराज और पं. गुरुदत्त से हुई। कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद 1884 में अपने पिता के पास रोहतक आ गए और वकालत करने लगे। हिसार के अलावा लाहौर उच्च न्यायालय में भी वकालत की। 1914 में वकालत छोड़कर दयाल सिंह के साथ मिलकर पंजाब नेशनल बैंक तथा लक्ष्मी बीमा कंपनी भी स्थापित की। इस बीमा कंपनी का 1956 में भारतीय जीवन बीमा निगम में विलय कर दिया गया। सर्वेंट्स आॅफ द पीपल सोसाइटी (लोक सेवा मंडल) जैसे सामाजिक संगठन को स्थापित किया। 
बचपन से ही देशसेवा की ललक थी। वो इटली के महान क्रांतिकारी जोसेफ मेजिनी को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे तथा स्वामी दयानंद से अत्यधिक प्रभावित थे। उन्होंने पंजाब में आर्य समाज को लोकप्रिय बनाया एंग्लो वैदिक विद्यालयों का प्रसार किया। यह विद्यालय वर्तमान में डीएवी स्कूल व कालेज के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने यंग इंडिया, दुखी भारत, भारत पर इंग्लैंड का कर्ज, आर्य समाज, भारत का राजनीतिक भविष्य, भगवत गीता का संदेश, भारत की राष्ट्रीय शिक्षा की समस्या और संयुक्त राज्य अमेरिका एक हिंदू प्रभाव आदि पुस्तकों के साथ मैजिनी, गैरीबाल्डी, शिवाजी और श्रीकृष्ण की जीवनी लिखीं। इसके बाद आर्य समाज के समाचार पत्र आर्य गजट के संस्थापक संपादक बने। वे हिंदू समाज में जाति व्यवस्था और छुआछूत को समाप्त करने के हिमायती थे। पिछड़ी जातियों के लोगों को वेद और मंत्र पढ़ने का अधिकार देने के पक्षधर थे। मां क्षय रोग से पीड़ित थीं। इसलिए आम जनता के मुफ्त इलाज की व्यवस्था हेतु गुलाब देवी चेस्ट हॉस्पिटल खोला।  
वर्तमान में गुलाब देवी मेमोरियल अस्पताल पाकिस्तान के सबसे बड़े अस्पतालों में से एक है। वे भारत की पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करने वाले नेताओं में से एक थे। उनकी क्रांतिकारी लेखनी और ओजस्वी वाणी दोनों ने उनके प्रभाव का विस्तार किया। किसान आंदोलन का समर्थन करने के कारण फिरंगी सरकार ने 1907 में बर्मा की मांडले जेल में भेज दिया। लॉर्ड मिंटो सबूत पेश नहीं कर पाया तो उसी वर्ष वापस स्वदेश आ गए। वे अमेरिका गए। वहां उन्होंने इंडियन होम रूल लीग, मासिक पत्रिका यंग इंडिया तथा हिंदुस्तान सूचना सेवा संघ की स्थापना की। भारत आकर सक्रिय राजनीति में भाग लिया। उन्हें पंजाब केसरी का संबोधन मिला। उनका मानना था कि जीत की ओर बढ़ने के लिए हार और असफलता कभी-कभी आवश्यक घटक होते हैं। 
जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद अंग्रेजों के विरुद्ध प्रदर्शन किया। असहयोग आंदोलन का पंजाब में नेतृत्व किया। इसके फलस्वरूप 1921 से 1923 के बीच लाला जी को जेल में डाल दिया गया। साइमन कमीशन का विरोध किया तो अंग्रेजों ने आंदोलनकारियों पर क्रूरतापूर्वक लाठियां बरसाईं। लालाजी बुरी तरह घायल हो गए। उन्होंने कहा- मैं घोषणा करता हूं कि आज मुझ पर हुआ हमला भारत में ब्रिटिश शासन के ताबूत मेंआखिरी कील साबित होगा।" इसके बाद 17 नवंबर 1928 को भारत मां के इस वीर सपूत ने देश की स्वतंत्रता के लिए प्राणों की आहुति दे दी। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 

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