विचार

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Published / 2023-02-04 23:04:26
शुरुआत से ही देशभर में हो रहा है जीएसटी का विरोध

अजय दीप वाधवा

एबीएन बिजनेस डेस्क। जब भारत में सरकार ने जीएसटी लागू करने का निर्णय लिया, तब कई राजनीतिक दलों ने कई कारणों से इसका विरोध किया। भारत सरकार के सामने एक बहुत बड़ा कार्य इन सबको जीएसटी के लिए राजी करवाना था, क्योंकि जीएसटी के लिए न सिर्फ संविधान संशोधन करवाना था बल्कि जीएसटी कानून को भी संसद से पास करवाना था। और उसके बाद सबसे बड़ा कार्य, उसे भारत के कम से कम आधे राज्यों की विधान सभाएं से भी पास करवाना था। इन सबके लिए आवश्यक था कि भारत सरकार विपक्षी दलों को भी साथ ले क्योंकि कई राज्यों में उनकी सरकारें थी। 

जीएसटी के पूर्व भारत में जो भी केंद्रीय कर प्रणाली होती थी उसमें उसके नियमों और दरों में परिवर्तन केंद्र सरकार समय समय पर किया करती थी। जैसा कि हम आज भी पाते हैं कि आय कर के नियमों और दरों में परिवर्तन केंद्रीय सरकार हर वर्ष अपने बजट के माध्यम से करती है और उसमें राज्य सरकारों कि कोई हस्तक्षेप नहीं होता। पर भारत सरकार, विपक्षी दलों वाली राज्य सरकारों के समर्थन लेने हेतु जीएसटी को एक विकेंद्रीकरण कर प्रणाली के रूप में लाना चाहती थी जिसके नियमों और दरों में परिवर्तन सिर्फ केंद्र सरकार के बजाए केंद्र और राज्य, दोनों सरकारों के सहयोग से, होता रहे। इसी कारण जीएसटी काउंसिल का गठन किया गया जो कि जीएसटी के दरों और नियमों में परिवर्तन करने की सबसे बड़ी नीतिगत संस्था है और भारत सरकार इसके निर्णयों को ही अधिनियम के माध्यम से देश में लागू करती है। 

जीएसटी काउंसिल भारत के प्रजातांत्रिक और केंद्र व राज्य सरकारों के नीतिगत मामलों में सहभागिता का ऐतिहासिक उदाहरण है। जीएसटी काउंसिल के सदस्य भारत के सभी राज्यों के वित मंत्री हैं और भारत सरकार के वित मंत्री इसकी बैठकों की अध्यक्षता करते हैं। जीएसटी के किसी भी नियम या जीएसटी की दरों में परिवर्तन जीएसटी काउंसिल करती है और भारत सरकार का कार्य महज उन निर्णयों को लागू करना होता है। जीएसटी काउंसिल का हर निर्णय दो तिहाई बहुमत से लिया जाता है। 

केंद्र सरकार का इसमें वोटिंग अधिकार एक तिहाई ही है, जिसका मतलब है कि एक तिहाई राज्यों के समर्थन के बिना केंद्रीय वित मंत्री भी कोई निर्णय लागू नहीं करवा सकते हैं। वे सिर्फ प्रस्ताव ला सकते हैं जिसे राज्य सरकारों के सहयोग के बाद ही दो तिहाई बहुमत से पारित किया जा सकता है।
सारांश में इतना कहा जा सकता है कि जब भी हमें जीएसटी के किसी नियम में परिवर्तन या इसके नियमों में परिवर्तन करवाने की आशा हो तो हमें व्यवसायिक संगठनों के मध्यम से जीएसटी काउंसिल में अनुरोध भेजना चाहिए, क्योंकि यह ही जीएसटी कर प्रणाली की हमारे देश में सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था है। (लेखक सीएमए, कॉस्ट एवम मैनेजमेंट अकाउंटेट और कर सलाहकार हैं।)

Published / 2023-02-01 23:39:30
बजट में सबके सपनों का सम्मान

विक्रम उपाध्याय

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उम्मीद से कहीं अधिक अच्छा बजट पेश किया है। जिनको भी यह आशंका थी कि देश अन्य बड़े देशों की तरह मंदी के दौर में प्रवेश कर रहा है और सरकार भी आर्थिक दुष्चक्र में फंस रही है, उन्हें घोर निराशा मिली है और जिनको यह भरोसा था कि वैश्विक स्तर पर भारत अकेला देश होने वाला है, जो न सिर्फ कोविड और युद्ध के प्रभाव से खुद को निकाल लेगा, बल्कि एक मजबूत अर्थव्यवस्था के रूप में खड़ा हो जाएगा, उसके लिए यह बजट सोने में सुहागा है। उद्योग जगत इतना गदगद है कि वह इस बजट को 10 में से 20 नंबर देने के लिए तैयार है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आर्थिक सर्वेक्षण के आने के बाद कहा था कि वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण पूरा प्रयास करेंगी कि यह बजट आंकाक्षाओं और अपेक्षाओं का बजट होने के साथ एक ग्लोबल सितारा के रूप में देश को आगे बढ़ाने वाला बजट पेश करें। और ऐसा ही हुआ। वित्त मंत्री ने इस बजट में भरपूर पैसा, लगभग सभी क्षेत्रों में नई टैक्नोलॉजी का रोड मैप और भविष्य को संवारने वाला मार्ग दर्शन भी प्रस्तुत किया। 10 लाख करोड़ रुपये का पूंजीगत व्यय का बजट, 22 लाख करोड़ रुपये का कृषि लोन, 7900 करोड़ रुपया की आवास योजना, दो लाख 40 हजार करोड़ रुपये रेलवे के लिए और हजारों करोड़ रुपये की सामाजिक क्षेत्र की योजनाएं एक मजबूत अर्थव्यवस्था के बजट की गारंटी हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारत के भविष्य को संवारने वाले कई प्रयोजनों की घोषणा की है, जिससे आने वाले साल में भारत की तस्वीर बदल सकती है।

आठ साल में भारत की तस्वीर वैसे काफी बदल गई है। जब से नरेन्द्र मोदी की सरकार सत्ता में आई है, भारत में प्रति व्यक्ति की आय बढ़कर दोगुनी हो गई है। वित्त मंत्री ने बजट भाषण में यह बताया कि इस समय भारत में प्रति व्यक्ति आय एक लाख 97 हजार रुपये है जो कि अब तक का सबसे अधिक है। आज भारत में कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं सोता। मुफ्त खाद्यान्न योजना कोविड के दौरान प्रारंभ की गई थी वह आगे एक साल के लिए और बढ़ा दी गई है और उसके लिए बजट में दो लाख करोड़ रुपये का प्रावधान कर दिया गया है। 

आम गरीब का जीवन सरल और सुविधायुक्त रहे, इसका प्रयास लगातार आठ साल से यह सरकार करती आ रही है और इस प्रयास का परिणाम भी सामने है। मोदी सरकार ने इस दौरान 11 करोड़ 70 लाख घरों में शौचालय का निर्माण किया है, नौ करोड़ घरों को मुफ्त एलपीजी सिलेंडर उपलब्ध कराया है, वैक्सीन की 220 करोड़ डोज मुफ्त उपलब्ध कराई गई है। पीएम जनधन स्कीम के तहत 47 करोड़ 80 लाख लोगों के खाते खुलवाए गए हैं और दो लाख 20 हजार करोड़ रुपये पीएम किसान निधि योजना के तहत देश के किसानों को सीधे लाभ पहुंचाया है।

यह देश किसानों का है, उनकी आय बढ़े बिना वास्तविक तरक्की नहीं हो सकती। इस बार के बजट में मोदी सरकार ने कृषि क्षेत्र के लिए भरपूर वित्त की व्यवस्था के साथ ही उसे टेक्नोलॉजी और अनुसंधान से सीधे जोड़ दिया है। 22 लाख रुपये के कृषि लोन के प्रावधान के साथ साथ छह हजार करोड़ रुपये का अलग प्रावधान मछुआरों के लिए भी किया गया है। खेती एक विरासत है और इस विरासत को बचाने के लिए इस बजट में गजब का प्रावधान किया गया है। सरकार इस साल एक करोड़ किसानों को रासायनिक खादों के बिना एवं पूरी तरह जैविक खेती के लिए चुनेगी और उन्हें विशेष प्रोत्साहन देगी ताकि हमारी परंपरागत खेती बची रहे और रासायनिक खादों व कीटनाशकों के आयात को भी कम किया जा सके।

स्टार्टअप्स के मामले में भारत विश्व में तीसरा सबसे अधिक स्टार्टअप्स वाला देश है। प्रधानमंत्री की अपेक्षा के अनुरूप इस बजट में कृषि क्षेत्र में लिए स्टार्टअप्स की भूमिका बड़ी कर दी गई है। ये स्टार्टअप्स किसानों को यह जानकारी देंगे कि किस क्षेत्र में कौन सी फसल लगाएं। देखभाल कैसे करें। इनकी उत्पादकता कैसे बढ़ाएं और इन्हें कहां और कैसे बेचे। इसी क्रम में सरकार ने सहकारी संस्थाओं को भी इस बजट के जरिए नई जिम्मेदारी है। सहकारी संस्थाएं कृषि उपजों के उचित भंडारण के लिए ढांचागत व्यवस्था का निर्माण करेंगी ताकि किसान उचित समय में अपनी उपज को बाजार में बेचकर अधिकतम मुनाफा कमा सके।

कृषि के साथ सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योग हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और कोरोना के बाद इन पर ही सबसे अधिक मार पड़ी है। सरकार ने आज इनके लिए कई बजटीय प्रावधानों की घोषणा की है। एक तो कोविड के दौरान परियोजनाओं को पूरा नहीं करने के कारण जिन एसएमई इकाइयों की धरोहर राशि या प्रोफारमेंस गारंटी के रूप में काटी गई राशि को जब्त कर ली गई थी, वे अब सब लौटाई जायेंगी। दूसरा दो लाख करोड़ रुपये का लोन फंड सृजित किया गया है और क्रेडिट गारंटी स्कीम के तहत बिना किसी कोलेटरल के लोन के लिए भी 9 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। एसएमई इकाइयों को सरकार केवल एक प्रतिशत ब्याज पर यह लोन जारी करेगी।

इस बजट की सबसे बड़ी घोषणा पूंजीगत खर्च की राशि में बढ़ोतरी करना है। सरकार ने पिछले साल की तुलना में इस साल 33 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 10 लाख करोड़ रुपये के कैपिटल एक्सपेंडिचर यानी पूंजीगत व्यय की घोषणा की है। पूंजीगत व्यय का आशय ऐसे खर्च से है, जिससे सराकर देश के लिए संपत्ति का निर्माण करती है। यह मुख्यतौर पर ढांचागत विकास, मशीनरी और कार्यशील पूंजी के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। इसका आशय है कि सरकार 10 लाख करोड़ रुपये सड़क, बंदरगाह, एयरपोर्ट, रेलवे और अन्य ट्रांसपोर्ट मोड पर खर्च करेगी। इससे देश में बड़े पैमाने पर रोजगार उत्पन्न होगा, क्योंकि ढांचागत क्षेत्र में व्यय का मतलब, सीमेंट, स्टील, ट्रांसपोर्ट और अन्य सहयोगी उद्योगों में भी विकास होना है।

रही बात कर और शुल्क के ढांचे में परिवर्तन की, तो इस बजट में जहां उद्योगों के लिए राहत दी गई है। वही आम और सैलरी क्लॉस के लोगों के लिए बड़े तोहफे का ऐलान किया गया है। भारत पूरी दुनिया के लिए एक मैन्यूफैक्चरिंग हब बने इसके लिए आयात शुल्कों में कुछ छूट के ऐलान किए गए हैं, खासकर मोबाइल, टीवी, इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए जरूरी कच्चे माल के आयात को आसान बना दिया गया है। बहुत दिनों से यह कहा जा रहा था कि मध्य आयवर्ग के लिए यह सरकार कुछ नहीं कर रही है, जबकि यह वर्ग ही देश के उपभोक्ता बाजार को संभालता है। इस बजट में सारी शिकायतें दूर कर दी गई हैं। टैक्स डिडक्शन की सीमा तीन लाख करने के साथ ही अब सात लाख की आय को कर मुक्त कर दिया गया है। टैक्स स्लैब भी ऐसा बना दिया गया है कि अधिकतर करदाताओं को इसका लाभ मिल सकता है। तीन लाख तक निल और तीन से छह लाख तक केवल पांच प्रतिशत कर की दर रखी गई है। अब 15 लाख से अधिक आय वालों को ही 30 प्रतिशत का कर देना है।

कुल मिलाकर इसे भविष्यपरक बजट कहा जा रहा है। यह माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में न सिर्फ भारत दुनिया का सबसे अधिक तेजी से बढ़ रही अर्थव्यस्था बना रहेगा, बल्कि पांच ट्रिलियन की इकोनोमी बनने की दिशा में तेजी से बढ़ेगा और जर्मनी एवं जापान को पीछे छोड़कर चीन और अमेरिका के बाद दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जायेगा। (लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2023-02-01 23:35:59
बजट शानदार और आवंटन ईमानदार

मुकुंद

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अमृतकाल के पहले केंद्रीय बजट की लगभग सभी ने तारीफ की है। आमतौर पर बजट पेश होने के बाद हाय-तौबा मचाने वाले शांत हैं। इस खामोशी के मायने हैं कि बजट शानदार है। इसमें हर क्षेत्र को ईमानदार आवंटन किया गया है। तभी तो केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के बजट भाषण के समापन पर मेजें थपथपाई गईं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रारंभिक प्रतिक्रिया में कहा है कि देश के विकास को इस बजट से नई ऊर्जा मिलेगी। प्रधानमंत्री ने साहसिक बजट के लिए वित्तमंत्री को बधाई दी है। 

उन्होंने कहा अमृत काल का पहला बजट विकसित भारत के विराट संकल्प को पूरा करने के लिए एक मजबूत नींव का निर्माण करेगा। ये बजट वंचितों को वरीयता देता है। ये बजट आज की आकांक्षी समाज, गांव, गरीब, किसान, मध्यम वर्ग सभी के सपनों को पूरा करेगा।

संभवत: यह पहला ऐसा बजट है जिस पर विपक्ष के घाघ नेता भी कटाक्ष करने से बच रहे हैं। इसका सीधा अर्थ है कि बजट में ऐसा बहुत कुछ है, जो देश के मध्यम वर्ग ही नहीं, हर वर्ग के लिए फायदेमंद है। वैसे भी बजट में सात लाख रुपये तक की आय में कर को शून्य किया गया है। अपनी तल्ख टिप्पणियों के लिए प्रख्यात कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने संभवत: इसीलिए कहा है कि बजट में कुछ चीजें अच्छी हैं। मैं इसे पूरी तरह नकारात्मक नहीं कहूंगा, लेकिन अभी कई सवाल उठेंगे। बजट में मनरेगा का जिक्र नहीं है। थरूर ने कहा सरकार मजदूरों के लिए क्या करने जा रही है? बेरोजगारी और महंगाई पर नियंत्रण के लिए क्या करने जा रही है इस पर जिक्र नहीं है।

इस बजट पर समाजवादी पार्टी डिंपल यादव ने जरूर असहज करने वाली टिप्पणी की है। वह इसे चुनावी बजट ठहराती हैं। उन्होंने कहा है इसमें किसानों के लिए कुछ नहीं है। रेलवे को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है। आधी से ज्यादा आबादी गांव में बसती है। उनके लिए कुछ नहीं किया गया है। आर्थिक मोर्चे पर डिंपल यादव की यह टिप्पणी समान विचारधारा वाले दलों के अन्य नेताओं की प्रतिक्रिया से मेल नहीं खाती।

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल मानते हैं कि अमृतकाल का पहला बजट क्रांतिकारी है। यह समाज के हर वर्ग को राहत देने वाला है। विशेषकर मध्यम वर्ग को आयकर में राहत दी गई है। नया टैक्स स्लैब राहत देने वाला है। युवा, महिला और वरिष्ठ नागरिक सभी को केंद्र ने राहत प्रदान की है। लालू यादव की पार्टी राजद के सांसद मनोझ झा इसमें रोजगार के लिए गोल-गोल बातें की गई हैं। इस खास लोगों ने खास लोगों के लिए तैयार किया है। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा है बजट से विपक्ष भले ही नाराज हो, पर समूचा भारत प्रफुल्लित है। डिजिटल लाइब्रेरी की स्थापना की घोषणा क्रांतिकारी कदम है। नारी शक्ति सशक्त राष्ट्र का निर्माण कैसे कर सकती है इसका प्रतिबिंब इस बजट में है।

 इसे आगे बढ़ाते हुए केंद्रीय मंत्री वीके सिंह का कहते हैं कि इस बजट में अगले 25 सालों के लिए भारत कैसे आगे बढ़े, उसकी नींव रखी गई है। दूसरे मंत्री प्रह्लाद पटेल का नजरिया विश्वास से लबरेज है। वह इसे अमृतकाल में सरकार का रोडमैप बताते हैं। बड़ी बात यह कहते हैं कि हम दुनिया में अपनी अर्थव्यवस्था को 10वें से पांचवें स्थान पर ले आए इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता।

कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने ना-नुकुर करते हुए खुलेदिल से इसकी तारीफ की है। उन्होंने कहा कि बजट का बड़ा हिस्सा राष्ट्रपति के अभिभाषण और आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट की पुनरावृत्ति है। टैक्स में किसी भी तरह की कटौती का स्वागत है। लोगों के हाथ में पैसा देना अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने का सबसे अच्छा तरीका है। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला भी खुश हैं। उन्होंने कहा है कि सुखद यह है कि बजट में मध्यम वर्ग को मदद दी गई है। सबको कुछ न कुछ दिया गया है। डेढ़ घंटे तक हमने बजट सुना है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ मनसुख मांडविया का मानना है कि यह प्रगति, उन्नति और नई गति का बजट है। 

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है केंद्रीय बजट किसानों, महिलाओं, हाशिये पर पड़े वर्गों एवं मध्यम वर्ग को सहायता प्रदान करने की प्राथमिकता के साथ विकास एवं कल्याण पर केंद्रित है। बजट के प्रस्तावों से देश को कुछ वर्षों के भीतर ही पांच ट्रिलियन (पांच हजार अरब) डॉलर की अर्थव्यवस्था और विश्व की शीर्ष तीन अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनने के लक्ष्य को पूरा करने में मदद मिलेगी। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)

Published / 2023-02-01 23:33:03
भारतीय विदेश नीति में आक्रामकता जरूरी!

डॉ अनिल कुमार निगम

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। विदेश में खालिस्तान समर्थित समूहों की बढ़ती गतिविधियां भारत की एकता, अखंडता और शांति व्यवस्था के लिए संकट बनती जा रही हैं। अमेरिका और ब्रिटेन के बाद कनाडा और आॅस्ट्रेलिया में पाकिस्तान समर्थित खालिस्तान समूहों द्वारा भारत के खिलाफ षड़यंत्र तेज हो गया है। आॅस्ट्रेलिया में जिस तरीके से खालिस्तान समर्थकों ने भारतीयों पर हमला किया और राष्ट्रीय ध्वज का अपमान किया, वह हर भारतीय की आन, बान और शान पर न केवल हमला है बल्कि यह भारत की अस्मिता पर आघात है।

दिल्ली में सिख फॉर जस्टिस रेफरेंडम 2020 और खालिस्तान के देश विरोधी स्लोगन लगाने के मामले में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने देश विरोधी गतिविधियों में शामिल कुछ संदिग्धों की पहचान भी की है। लेकिन सुरसा की मुंह की तरह बढ़ रही इस समस्या के प्रति केंद्र सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक गंभीर और आक्रामक होने की आवश्यकता है। विदित है कि ऑस्ट्रेलिया में खालिस्तान समर्थकों का उत्पात लगातार बढ़ता जा रहा है। खालिस्तान समर्थक समूहों द्वारा ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में राष्ट्रीय ध्वज लेकर जा रहे भारतीयों पर हमला करने का एक वीडियो सामने आया है। खालिस्तान समर्थक अपना खुद का झंडा हाथ में लिए हैं। वे राष्ट्रीय ध्वज लिए लोगों पर हमला कर देते हैं और भारत के राष्ट्रीय ध्वज का अपमान भी करते हैं। मौके पर ऑस्ट्रेलिया की पुलिस भी खड़ी है और वह उत्पात मचाते लोगों को शांत कराने की कोशिश कर रही है। इस हमले में पांच लोग घायल हुए। एक युवक को अस्पताल में भर्ती कराया गया।

ध्यातत्व है कि पहले भी ऑस्ट्रेलिया में खालिस्तानी समर्थकों का उत्पात देखने को मिला है। ऑस्ट्रेलिया में एक पखवाड़े के अंदर तीन बार हिंदू मंदिरों पर हमला हुआ। खालिस्तानियों ने तीन मंदिरों को निशाना बनाकर तोड़फोड़ की थी और उनकी दीवारों पर भारत विरोधी नारे लिखे थे। उन्होंने खालिस्तान के समर्थन में उत्तेजक बातें भी दीवारों पर लिखी थीं। यह घटना भारत के लिए तो चिंताजनक है ही, ऑस्ट्रेलिया की सरकार के लिए भी एक चुनौती है जिसने कुछ दिन पहले खालिस्तानी तत्वों को काबू करने को लेकर एक अहम सुरक्षा बैठक की थी।

ऑस्ट्रेलिया में काफी समय से खालिस्तान समर्थकों की गतिविधियों को समर्थन मिल रहा है। सोशल मीडिया पर उनकी असामाजिक गतिविधियां जोरों पर चल रही हैं। एएनआई की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि विवादित पोस्टर सोशल मीडिया पर धड़ल्ले से प्रसारित हो रहे हैं। इस तरह के पोस्टर पर सतवंत सिंह और केहर सिंह की तस्वीरें लगी हैं। सतवंत सिंह वही सुरक्षा कर्मी था जिसने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की थी। जबकि केहर सिंह को उनकी हत्या की साजिश के आरोप में फांसी की सजा दी गई थी।

कनाडा में भी भारत विरोधी गतिविधियां काफी बढ़ गई हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय और कनाडा में भारतीय उच्चायोग ने इन घटनाओं को कनाडा प्रशासन के सामने उठाया और उनसे इन अपराधों में उचित कार्रवाई की मांग की है। हालांकि भारत विरोधी गतिविधियों में संलिप्त अपराधियों को अब तक समुचित सजा नहीं मिली है। यही कारण है कि विदेश मंत्रालय ने भारतीयों के लिए एक एडवाइजरी भी जारी की। इसमें कनाडा में रहने वाले भारतीयों को वहां बढ़ रही सांप्रदायिक हिंसा और भारत विरोधी गतिविधियों के लिए चेताया गया। यही नहीं, अमेरिका में पाकिस्तान समर्थित खालिस्तानी अलगाववादी समूहों द्वारा भारत विरोधी गतिविधियां चल रही हैं जिस पर भारत ने भी चिंता व्यक्त की है।

भारत के हिंदू नेताओं और बड़े राजनेताओं की टारगेट किलिंग की साजिश की खबरें भी आई हैं। खुफिया एजेंसियों के अनुसार इस तरह की साजिश में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ है। ज्ञात हुआ है कि आईएसआई ने खालिस्तानी आतंकियों और पंजाब से फरार होकर विदेश में बैठे अपराधी तत्वों के जरिए पंजाब में हिंदू नेताओं को मारने की साजिश रची है। वास्तविकता तो यह है कि लगभग एक साल से खालिस्तान आंदोलन फिर से चर्चा में आ गया है।

पंजाब ने आतंकवाद का अत्यंत डरावना और काला दौर देखा है। वर्ष 1980 और 90 के दशक में पंजाब का प्रशासन और आम जनजीवन बुरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया था। सुबह घर से निकला व्यक्ति शाम को घर वापस आएगा भी, इसकी कोई गारंटी नहीं होती थी। पंजाब केसरी अखबार के संपादक लाला जगत नारायण और उनके पुत्र रमेश समेत हजारों लोगों की हत्या कर दी गई थी। सरकार बहुत ही मशक्कत के बाद पंजाब को आतंकवाद से मुक्त करा सकी थी।

दिल्ली में सिख फॉर जस्टिस रेफरेंडम 2020 और खालिस्तान के समर्थनमें नारे लगाने के मामले में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने देश विरोधी गतिविधियों में शामिल कुछ संदिग्धों की पहचान की है। सुरक्षा एजेंसियों को इस बात की आशंका है कि दिल्ली से जिन संदिग्धों की पहचान हुई है वे सभी स्लीपर सेल हो सकते हैं। इसी वर्ष जनवरी महीने में दिल्ली के जनकपुरी, तिलक नगर, पश्चिम विहार समेत 12 स्थानों पर खालिस्तान के समर्थन में दीवारों पर लगाए पोस्टर विदेशी साजिश का हिस्सा हैं। पोस्टर लगाने के ही मामले में दिल्ली पुलिस ने हाल में ही एफआईआर दर्ज की थी और कुछ लोगों को हिरासत में लिया। पुलिस की जांच में यह पता चला है कि विदेश में बैठे गुरपंत सिंह पन्नू के इशारे पर दिल्ली में खालिस्तान की एंट्री हुई थी। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक दोनों को देश की राजधानी दिल्ली में देश विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए फंडिंग की गई थी। वर्ष 2020-21 किसान आंदोलन के दौरान खालिस्तान समर्थक समूहों द्वारा विदेशी फंडिंग की बात पहले ही साबित हो चुकी है।

पिछले एक वर्ष में खालिस्तान को समर्थन देने के मामले में विदेश की धरती पर जिस तरीके से साजिश रची जा रही है, वह अत्यंत गंभीर मामला है। हालांकि भारत सरकार इसको लेकर आस्ट्रेलिया और कनाडा वार्ता कर रही है, पर सरकार को इस मुद्दे को लेकर अधिक आक्रामक होने की आवश्यकता है। जी-20 के माध्यम और अमेरिका सहित यूरोपीय देशों के समक्ष पाकिस्तान को और अधिक एक्पोज करने की आवश्यकता है। भारत, कनाडा और आस्ट्रेलिया सहित अन्य देशों के साथ ऐसे समझौता करे कि वे अपनी धरती का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए किसी भी कीमत पर न होने दें। इसके अलावा भारत सरकार पंजाब सहित देश के युवाओं को अधिक से अधिक जागरूक करे कि वे देश की मुख्यधारा के साथ चलें और दिग्भ्रमित होने से बचें। इसी में उनका और देश हित निहित है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Published / 2023-01-25 23:45:38
प्रधानमंत्री की परीक्षा पे चर्चा के मायने...

डॉ नितेश शर्मा

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की संसदीय राजनीति के मानक ही नहीं बदले हैं बल्कि वे नवाचारों के अधिष्ठाता भी हैं। लाल किले की प्राचीर से स्वच्छता की बात हो या फिर हर घर तिरंगा जैसा राष्ट्रव्यापी अभियान। कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि भला प्रधानमंत्री भी कभी बच्चों से उनकी पढ़ाई और फिर परीक्षा पर चर्चा भी कर सकते हैं। परीक्षा एक ऐसा शब्द है जिसका नाम सुनते ही मन में एक अदृश्य भय और तनाव प्रवेश कर जाता है। चाहे बालक हो या युवा, किसी भी आयु का कोई भी व्यक्ति क्यों न हो, परीक्षा का नाम सुनते ही एक भिन्न प्रकार का मानसिक दबाव महसूस करने लगता है। इसका परिणाम यह होता है कि परीक्षार्थी अपनी प्रतिभा का संपूर्ण प्रदर्शन नहीं कर पाता।

अनेक बार यह देखने में आया है कि बोर्ड परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थी परिणाम आने से पहले ही आत्मघाती कदम उठा लेते हैं। परीक्षा के तनाव को दूर करने के उद्देश्य से नरेन्द्र मोदी 2016 से हर वर्ष देश भर के बच्चों से परीक्षा पे चर्चा करते हैं। प्रधानमंत्री ने विद्यार्थियों को जरूरी टिप्स देने के लिए एग्जाम वॉरियर्स नामक पुस्तक भी लिखी है। इसमें 28 मंत्र दिए गए हैं । इतना ही नहीं पुस्तक में प्रधानमंत्री ने अभिभावकों के लिए भी आठ सुझाव भी दिये हैं।प्रधानमंत्री के इस नवाचार के प्रति बच्चों में उत्साह और भरोसे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस वर्ष 27 जनवरी को होने वाले कार्यक्रम के लिए देश के 38 लाख बच्चों ने अपना पंजीयन कराया है।

परीक्षा के समय केवल विद्यार्थी ही नहीं अपितु माता-पिता के ऊपर भी दबाव रहता है। विद्यार्थी का तनाव उसके अभिभावकों को भी परेशान करता है इसलिए विद्यार्थी और अभिभावक दोनों का ही जागरूक होना नितांत आवश्यक है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने पुराने ढर्रे पर चली आ रही शिक्षा व्यवस्था में अनेक संशोधन किए हैं किंतु फिर भी आज के प्रतियोगी युग में जहां विद्यार्थी के ऊपर परिवार, समाज का दबाव रहता ही है। प्रधानमंत्री द्वारा लिखित इस पुस्तक में बताया गया है कि बोर्ड परीक्षा पूरे जीवन की अंतिम परीक्षा नहीहै।यह जीवनारम्भ है। इसलिए परीक्षा, परीक्षा के लिए है परीक्षा जीवन पर हावी न हो जाए, परीक्षा जीवन के आनंद को नष्ट न कर दे इस बात की प्रेरणा विद्यार्थियों को सतत दी जानी चाहिए। परीक्षा को सजगता के साथ फेस करें न कि उसे जीवन मरण का प्रश्न बनायें।

प्रधानमंत्री का यह विचार बहुत ही प्रेरणादायक है कि विद्यार्थियों को जितना संभव हो दूसरों से प्रतिस्पर्धा करने से बचना चाहिए, हमें दूसरे से नहीं अपितु अपने आप से स्पर्धा करना सीखना चाहिए। जब हम स्वयं से स्पर्धा करेंगे तब हम निरंतर अपने आप को बेहतर बनाने का प्रयास करते रहेंगे। इसलिए प्रधानमंत्री ने इस बात पर विशेष बल दिया है कि विद्यार्थियों को स्वयं अपने आप से स्पर्धा करना सिखायें। उन्हें प्रतिस्पर्धा नहीं अपितु अनु स्पर्धा करना सिखाए। परीक्षाओं के समय विद्यार्थियों के ऊपर एक नकारात्मक प्रभाव हावी होने लगता है। कई बार या देखने को मिलता है कि विद्यार्थी पहले से याद किया हुआ भूलने लगते हैं। कुछ विद्यार्थी ऐसा कहते हैं कि अब उन्हें नया याद करने में कठिनाई हो रही है। इस सब के पीछे का कारण क्या है ? इस सब के पीछे का महत्वपूर्ण कारण है तनाव और मानसिक हम यह जानते हैं कि हमारा मन तनाव की स्थिति में चीजों को इतनी आसानी से ग्रहण नहीं कर पाते जितना कि उत्साह की स्थिति में ग्रहण करता है। विद्यार्थी को जब ऐसा लगे कि उसे परीक्षा के समय पहले से याद किया हुआ वह भूल रहा है तब हमें उसे शांत और निश्चिंत हो जाने के लिए कहना चाहिए, कुछ विद्यार्थियों में यह देखने में आता है कि परीक्षा के समय भी अपने सोने के समय में बड़ी कटौती कर देते हैं जबकि सोने से हम अपने मस्तिष्क को आराम देते हैं जिससे कि वह पुन: कार्य करने के लिए तैयार हो सके।

अत: हर स्थिति में विद्यार्थियों को परीक्षा के समय पर्याप्त नींद लेते रहना चाहिए। विद्यार्थी इस देश का भविष्य है और परीक्षा इस देश के भविष्य को बनाने के लिए है उन्हें तनाव देने के लिए नहीं। इसलिए समाज के सभी शिक्षकों को बुद्धिजीवियों को एवं जागरूक नागरिकों को एक साथ मिलकर अपने आसपास घर-परिवार के विद्यार्थियों को तनाव मुक्त परीक्षा देने के लिए प्रेरित करना चाहिए। विद्यार्थियों के साथ परीक्षाओं के समय में एक सकारात्मक ऊर्जा के साथ एक आत्मीय भाव के साथ व्यवहार करना चाहिए। एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हम सब का यह कर्तव्य है कि बच्चों को नंबरों की अंधी दौड़ की ओर धकेलने से बचें। 

प्रसन्नता की बात है कि हमारे प्रधानमंत्री स्वयं बच्चों से बात करके उनमें सकारात्मक भाव जागृत करने के लिए परीक्षा पे चर्चा के माध्यम से बच्चों से सीधे जुड़ते हैं। हमारा कर्तव्य है कि अपने बच्चों को इस आयोजन का सीधा प्रसारण सुनवाकर उन्हें लाभान्वित करें। (लेखक, भाजपा शिक्षक प्रकोष्ठ मध्य प्रदेश के संयोजक हैं।)

Published / 2023-01-22 18:00:41
पहाड़ पर पर्यावरणीय संकट...

सत्यनारायण गुप्ता

एबीएन सेंट्रल डेस्क। उत्तराखंड के चमोली में स्थित ज्योतिर्मठ या जोशीमठ को बद्रीनाथ भगवान की शीतकालीन गद्दी भी कहा जाता है। सर्दियों में बद्री विशाल की मूर्ति को जोशीमठ के वासुदेव मंदिर में ही रखा जाता है। आदि शंकराचार्य ने यहां पहला ज्योतिर्मठ स्थापित किया था। कहा जाता है कि प्रहलाद ने भगवान नरसिंह के गुस्से को शांत करने के लिए यहां महालक्ष्मी के कहने पर तप किया था। जोशीमठ वो स्वर्गद्वार भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि पांडव इसी रास्ते से स्वर्ग गये थे। इसके बाद फूलों की घाटी शुरू हो जाती है।

लगातार जमीन धंसने की घटनाओं के मद्देनजर जोशीमठ को सिंकिंग जॉन (धंसता क्षेत्र) घोषित किया गया है राष्ट्रीय भूभौतिक अनुसंधान संस्थान (एनजीआरआई) के विशेषज्ञों की टीम जोशीमठ पहुंच रही है।
जमीन धंसने की मुख्य वजह यह बताई जाती हैं :

  1. पहला, जोशीमठ पूरी तरह से लैंड स्लाइड के मलवे पर बसा हुआ है । ऐसे में यहां अत्यधिक निर्माण करना खतरे से खाली नहीं था लेकिन पर्यटकों को लुभाने के लिए और भूमाफियाओं द्वारा बेतरतीब निर्माण किये गये। 1939 में एक किताब सेंट्रल हिमालया जियो लॉजिकल ऑब्जरवेशन ऑफ द स्विस एकसपेडिशन में इसके लेखक प्रोफेसर अर्नोल्ड  हेम और प्रोफेसर आगस्टो गैंस ने चेतावनी दी थी कि यह पूरी तरह पहाड़ों के मलबे पर बसा हुआ है। 
  2. दूसरा, सूरंग खोदने वाली मशीन से प्राकृतिक जल भंडार को नुकसान हुआ ।इससे इलाके के कई झरने और पानी के सोते सुख चुके हैं। जिस पहाड़ पर जोशीमठ बसा है ,उसके अंदर की जमीन भी सुख चुकी है इसलिए पहाड़ का मालवा धंसने लगा है।
  3. तीसरा, 1976 में जोशीमठ में लैंडस्लाइड हुआ था तब इसकी जांच के लिए तत्कालीन गढ़वाल कमिश्नर महेश चंद्र मिश्रा के नेतृत्व में एक कमिटी गठित की गई थी ।कमिटि कि रिपोर्ट में कहा गया था कि जोशीमठ में हो रहे निर्माण कार्यो को यदि नहीं रोका गया तो वह विनाशकारी होगा ।इस पर ध्यान नहीं दिया गया और पहाड़ों पर पावर प्रोजेक्ट  के बनने का काम चलता रहा।
  4. चौथा, नदियों से घिरे रहने से कारण यहां जमीन के नीचे और ऊपर पानी का बहाव झरने की तरह लगातार होता रहता है। इससे तल पर नमी हमेशा बनी  रहती है ।जमीन के भीतर की चट्टानें कमजोर हैं जो नमी के प्रभाव से धंस रहीं हैं।
  5. पांचवां, जोशीमठ के ऊपर के इलाके में काफ़ी बर्फबारी होती बारिश होती है। मौसम बदलता है और बर्फ पिघलती है, तब जोशीमठ से चारों ओर नदियों में पानी का बहाव तेज हो जाता है।सतह के कमजोर होने और भूस्खलन का यह भी एक बड़ा कारण है।
  6. छठा, जोशीमठ के अधिकतर क्षेत्रों में नीस चट्टानें हैं, जो तापमान और हवा की वजह से तेजी से आकार बदलती हैं।यह भी क्षेत्र में धंसान की एक वजह है।
  7. सातवां, स्थानीय लोग इसके लिए मुख्य रूप से एनटीपीसी की तपोवन- विष्णु गढ़ परियोजना को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं ।लोगों के अनुसार दशकों  से एनटीपीसी के लिए खोदी जा रही सूरंग इस भयावह स्थिति के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है ।तपोवन -विष्णु गढ़ पनबिजली परियोजना की सूरंग जोशीमठ के ठीक नीचे स्थित है।

जोशीमठ ही नहीं प्राकृतिक आपदाओं से लगातार जूझ रहे उत्तराखंड में बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं के प्रभाव का आकलन किए बिना आगे बढ़ने की गलती बार-बार दोहराई जा रही है ।हिमालय की संवेदनशीलता, पर्यावरण मानकों और सुरक्षा उपायों को नजरअंदाज करते हुए जिस तरह ऑल वेदर रोड के लिए पहाड़ों को काटा गया, हजारों पेड़ों का कटान हुआ और मलबे को नदियों में डंप किया गया। यह प्रकृति के साथ खिलवाड़ का सटीक उदाहरण है।

सिर्फ टिहरी गढ़वाल जिले में चारधाम हाईवे के 150 किलोमीटर हिस्से में 60 डेंजर जोन चिन्हित किये गये हैं। करीब 12000 करोड़ रुपए लागत वाली 889 किलोमीटर की चार धाम परियोजना में मुख्य रूप से सड़कों के चौड़ीकरण का काम शामिल है। सड़कों को कितना चौड़ा किया जाना है इस पर विवाद है केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय वर्ष 2016 में परियोजना की शुरुआत से ही 10 से 12 मीटर चौड़ी ऑल वेदर रोड बनने पर जोर दे रहा है। मंत्रालय अपने ही नियमों की अनदेखी कर रहा है। 

पहाड़ी राजमार्गों के लिए निर्धारित 5.5 से 7 मीटर चौड़ाई के अपने ही मानक को बदल दिया गया है ।पर्यावरण प्रभाव आकलन किए से बचने के लिए 889 किलोमीटर की चार धाम प्रोजेक्ट को 53 टूकडों में बांटा गया है। क्योंकि 100 किलोमीटर से बड़ा प्रोजेक्ट होने पर पर्यावरण प्रभाव का आकलन कराना जरूरी होता है।

यह विवाद जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो पर्यावरणविद रवि चोपड़ा की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस परियोजना की अवैज्ञानिक व अनियोजित  क्रियान्वयन से हिमालय के इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा है और भूस्खलन जैसी आपदाओं को बुलावा दिया जा रहा है। खतरे का अनुमान लगाए बिना पहाड़ों के ढलानों को सीधा और लंबवत काटने से स्लोप फेलयर का खतरा बढ़ गया है।

रवि चोपड़ा सहित उच्च अधिकार समिति के 3 सदस्यों की राय सड़क की चौड़ाई 5.5 मीटर तक सीमित रखने की थी लेकिन समिति के 21 सदस्य जिनमें ज्यादातर अधिकारी थे ने सड़क की चौड़ाई की मूल डिजाइन (10- 12 मीटर) रखने की वकालत की और निर्माण कार्य चलते रहे।

जोशीमठ ही नहीं हिमालय की ऊंचाईयों में बसे अन्य शहरों और गांवों के पर्यावरणीय कारणों से उजड़ने का खतरा उत्पन्न हो गया है। लेकिन यह संकट प्रकृतिजनित न होकर मानवजनित है। बिना सोचे समझे विकास की चाहत ने हमें विनाश के कगार पर खड़ा कर दिया है।

Published / 2023-01-22 16:06:07
कौन निकालता है बुजुर्गों को अपने घरों से बाहर

आरके सिन्हा

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। राजधानी दिल्ली का पॉश ग्रेटर कैलाश इलाका। यहां समाज के सबसे सफल, असरदार और धनी समझे जाने वाले लोग ही रहते हैं। बड़ी-बड़ी कोठियों के उनके अंदर-बाहर लग्जरी कारें खड़ी होती हैं। लगता है, मानो इधर किसी को कोई कष्ट या परेशानी नहीं है। पर यह पूरा सच नहीं है। अभी हाल ही में यहां के एक बुजुर्गों के बसेरे, जिसे वृद्धाश्रम या एज ओल्ड होम भी कहते हैं, में आग लगने के कारण क्रमश: 86 और 92 वर्षों के दो वयोवद्ध नागरिकों की जान चली गयी। 

जरा सोचिये, कि इस कड़ाके की सर्दी में उन्होंने कितने कष्ट में प्राण त्यागे होंगे। इस वृद्धाश्रम में रहने वाले हरेक व्यक्ति को हर माह सवा लाख रुपये से अधिक देना होता है। यानी यहां पर सिर्फ धनी-सम्पन्न परिवारों के बुजुर्गों को ही रख सकते हैं। अफसोस कि इन बुजुर्गों को इनके घर वालों ने इनके जीवन के संध्याकाल में घर से बाहर निकाल दिया। यह कहानी देश के उन लाखों बुजुर्गों की है, जिन्हें उनके परिवारों में बोझ समझा जाने लगा है। अगर इनका आय का कोई स्रोत नहीं है तो इनका जीवन वास्तव में कष्टकारी है।

देखिये, भारत में तेजी से बढ़ती जा रही है बुजुर्गों की आबादी। एक अनुमान के मुताबिक, 14 बरस बाद, यानी 2036 में हर 100 लोगों में से केवल 23 ही युवा बचेंगे, जबकि 15 लोग बुजुर्ग होंगे। सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार, फिलहाल देश के हर 100 लोगों में से 27 युवा और 10 बुजुर्ग हैं। 2011 में भारत की आबादी 121.1 करोड़ थी। 2021 में 136.3 करोड़ पहुंच गयी। 

इसमें 27.3 फीसद आबादी युवाओं, यानी 15 से 29 साल की आयु वालों की है। यूथ इन इंडिया 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, 2036 तक युवाओं की संख्या ढाई करोड़ कम हो जायेगी। फिलहाल देश में युवाओं की आबादी वर्तमान में 37.14 करोड़ है। यह 2036 में घटकर 34.55 करोड़ हो जायेगी। देश में इन दिनों 10.1 फीसद बुजुर्ग हैं, जो 2036 तक बढ़कर 14.9 प्रतिशत हो जायेंगे। मतलब बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है।

जिस देश में बुजुर्गों की तादाद इतनी तेजी से बढ़ रही है, वहां पर सरकार को बुजुर्गों के लिए कोई ठोस योजना तो बनानी ही होगी, ताकि वे अपने जीवन का अंतिम समय आराम से वक्त गुजार सकें। उन्हें दवाई और दूसरी मेडिकल सुविधाएं मिलने में दिक्कत न हो। उनका बुढ़ापा खराब न हो।

राजधानी दिल्ली के राजपुर रोड में भी एक बुजुर्गों का बसेरा है। यहां पर करीब 35-40 बुजुर्गों के लिए रहने का स्पेस है। इसे सेंट स्टीफंस कॉलेज तथा सेंट स्टीफंस अस्पताल को स्थापित करने वाली संस्था दिल्ली बद्ररहुड सोसायटी चलाती है। इनके कुछ बसेरे अन्य स्थानों और शहरों में भी हैं। यहां पर भी बेबस और मजबूर वृद्ध ही रहते हैं। ये रोज सुबह से इंतजार करने लगते हैं कि शायद कोई उनके घर से उनका हाल-चाल जानने के लिए आये। पर उनका इंतजार कभी खत्म ही नहीं होता। 

कभी-कभार ही किसी बुजुर्ग का रिश्तेदार कुछ मिनटों के लिए आकर औपचारिकता पूरी कर निकल जाता है। यहां पर रहने वालों से कोई पैसा नहीं लिया जाता। उन्हें दो वक्त का भोजन, सुबह का नाश्ता और चाय भी मिल जाती है। कुछ दानवीरों की मदद से संचालित दिल्ली ब्रदरहुड सोसायटी की तरह से चलाए जा रहे बुजुर्गों के बसेरे देश में गिनती के ही होंगे। वर्ना तो सब पैसा मांगते है किसी बुजुर्ग को अपने यहां रखने के लिए। हालांकि यह बात भी है कि बसेरा चलाने के लिए पैसा तो चाहिए ही। पैसे के बिना काम कैसे होगा।

दरअसल, बुजुर्गों के लिए स्पेस घटने के कई कारण समझ आ रहे हैं। जब से संयुक्त परिवार खत्म होने लगे तब से बुजुर्गों के सामने संकट पैदा होने लगा है। संयुक्त परिवारों में तो उम्रदराज हो गये लोगों का ख्याल कर लिया जाता था। तब बच्चे और बुजुर्ग सबके- साझे हुआ करते थे। उन्हें परिवार के सभी सदस्य मिलजुल कर देख लिया करते थे। परिवार का बुजुर्ग सबका आदरणीय होता था। संयुक्त परिवारों के छिन्न-भिन्न होने के कारण स्थिति वास्तव में विकट हो रही है।

 एक दौर था जब बिहार और उत्तर प्रदेश के हरेक घर के आगे सुबह परिवार के बुजुर्ग सदस्य सुबह चाय पीते हुए अखबार पढ़ रहे होते थे। जिन परिवारों में बुजुर्ग नहीं होते थे उन्हें बड़ा ही अभागा समझा जाता था। पर अब इन राज्यों में भी बुजुर्ग अकेले रहने को अभिशप्त हैं। मुझे इन राज्यों के बैंगलुरू, मुंबई, दिल्ली, गुरुग्राम में रहने वाले अनेक नौकरीपेशा लोग मिलते हैं। वे अच्छा-खासा कमा रहे हैं। उनसे बातचीत करने में पता चलता है कि उनके साथ उनके माता-पिता नहीं रहते। वे अपने पुश्तैनी घरों में ही हैं। इसका मतलब साफ है कि अगर वे संयुक्त परिवारों में नहीं हैं तो वे राम भरोसे ही हैं। कारण बहुत साफ है। 

अब बिहार-उत्तर प्रदेश का समाज भी पहल की तरह नहीं रहा। वहां पर भी कई तरह के अभिशाप आ गये हैं। एक बात समझ ली जाए कि हमे अपने बुजुर्गों के ऊपर पर्याप्त ध्यान देना ही होगा। उनका अपने परिवारों को शिक्षित करने से लेकर राष्ट्र निर्माण में अमूल्य योगदान रहता है। गांधी जी और गुरुदेव रविन्द्रनाथ टेगौर के सहयोगी रहे दीनबंधु सीएफ एन्ड्रूज से संबंध रखने वाली दिल्ली ब्रदरहुड सोसायटी की तरफ से चलाए जाने वाले बसेरों में तो उन बुजुर्गों का अंतिम संस्कार भी करवाया जाता है जिनका निधन हो जाता है। 

कई बार सूचना देने पर भी दिवंगत बुजुर्गों के सगे-संबंधी पूछने तक नहीं आते। तब बसेरे में काम करने वाले ही दिवंगत इंसान का अंतिम संस्कार करवा देते हैं। जरा सोच लीजिये कि कितना कठोर और पत्थर दिल होता जा रहा है समाज।

केंद्र और राज्य सरकारों को मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों, गिरिजाघरों वगैरह में भी बुजुर्गों के बसेरे खोलने के बारे में विचार करना चाहिए। इनके पास पर्याप्त स्पेस भी होता है। इनमें कुछ बुजुर्ग रह ही सकते हैं। वैसे सबसे आदर्श स्थिति तो वह होगी जब परिवार ही अपने बुजुर्ग सदस्यों का ख्याल करेंगे। आखिर कौन चाहता है कि वह इतना अभागा हो कि घर से बाहर अपने बुढ़ापे के दिन गुजारे। (लेखक, वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

Published / 2023-01-21 10:55:28
मानस और मानसिकता

रविरंजन

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हमारे समाज में कुछ ऐसे बहस होते हैं जो राजनीतिक इच्छाओं और लाभ को ध्यान में रखकर होते हैं। इसे आप गुलामी का असर कहें या वर्तमान संदर्भ में ज्ञान और अध्ययनशीलता में कमी लेकिन चर्चा में रामचरितमानस की पंक्तियां ही है। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश होगा जो अपनी संस्कृति पर गर्व न करता हो। दुर्भाग्य से देश में दूसरे देशों से अंगीकार की गयी विचारधारा, परिवेश, जीवन शैली और चर्चित होने या चर्चा में रहने की मजबूरी से ग्रसित जन ऐसा कुछ करते रहते हैं। 

तुलसीदास ने विक्रम संवत 1631 (1574 ईस्वी) में अयोध्या में रामचरितमानस लिखना शुरू किया। रामचरितमानस की रचना अयोध्या, वाराणसी और चित्रकूट में हुई थी। भारत इस अवधि के दौरान मुगल सम्राट अकबर (1556-1605 सीई) शासक था। मानस तुलसीदास को विलियम शेक्सपियर का समकालीन भी बनाता है। रामचरित मानस एकमात्र रचना है जो दुनिया भर के हिंदुओं, कामिल बुल्के जेसे ईसाई का आस्थाग्रंथ है इसकी पूजा की जाती है। मानस पाठ के नियम है और उसे भी पूजा की तरह किया जाता है। इस पुस्तक को अगर गंभीरता से समझा जाए तो आज के संदर्भ में दुनिया में जितनी भी समस्या है चाहे वह मानव निर्मित हो या प्राकृतिक सभी का हल रामचरितमानस में मिल जाता है। इसके रचियता तुलसीदास संस्कृति के विद्धान होते हुए भी अवधी में इसकी रचना की। क्योंकि वे एक सामाजिक वैज्ञानिक थे।

भारतीयों के आत्मबल का एक बड़ा श्रोत रामचरितमानस है जिसे आज के संदर्भ में आर्ट आफ लिविंग की सबसे उत्कृष्ट साहित्य के रुप में देख सकते हैं। यह चरित्र की समग्र गाथा है जिसके कुछ पंक्तियों पर टिप्पणी कर चर्चा में आ सकते हैं लेकिन दुनिया के हर हिंदू के मन से मानस की श्रद्धा कम नहीं कर सकते। यह जननीति, राजनीति और त्याग से समृद्धि की उत्कृष्ट रचना है। 

एक रचना रची गयी हिंदी समाज के पथ भ्रष्टक तुलसीदास। यह रचना एक विद्धान पत्रकार विश्वनाथ ने रची। वे इस आलोचना में एक अंधे भक्त बने जो हाथी को जहां से पकड़ता है उसका उसी के अनुसार वर्णन कर देता है। उनकी रचना राम के विरोधियों को बहुत अच्छा लगा। लेकिन अक्षर से बनते हैं शब्द और शब्द से वाक्य। वाक्य से अपनी अनुभूति को दिया जाता है रुप। तब रुप राम का हो या कृष्ण का उसमें मिलता है भाव। तब बनते हैं भगवान राम, भगवान कृष्ण। भारतीय संस्कृति का यह भाव की राम के चरित को मन में स्थिर करना ही रामचरित मानस है। राजाराम ही नहीं उस काल के सभी राजा उत्कृष्टता के प्रतीक थे और वे गुरु सत्ता के अधीन हो राज्य चलाते थे जिस कारण राम राज्य आज भी सर्वोत्तम सत्ता का उदाहरण है। 

गुलामी और प्रताड़ना के सात सौ साल में कुछ विकलांग मानसिकता के लोग ही आलोचना के साधक हो गये और रामचरित मानस रुपी सागर के एक बूंद उठाकर जिसकी भी उनको समझ नहीं है आलोचना करने को उद्धत हुए। राम और मानस तर्कातित हैं। तर्क उन चीजों पर हो सकती है जो समझा जा सके। रामचरित समझा नहीं जिया जा सकता है और बिना जिये समझा नहीं जा सकता है। राम के चरित को मन में स्थापित करने को ही रामचरित मानस कहते हैं। एक अलौकिक विचार धारा अलौकिक मन से निकलती है और मन चिंतन से निर्मित होता है। चिंतन जन्म जन्मातर से प्रभावित होता है।

पूरी दुनिया भारत के इसी संस्कृति का सम्मान करती है। दुर्भाग्य से हमारे देश के कुछ गिने चुने लोग अपने निहित स्वार्थवश अज्ञानवश ऐसी करतूत करते हैं जिससे देश की संस्कृति पर सवाल उठता है। मन में स्थापित मानस की अलोचना की जितनी अलोचना की जाए वह कम है लेकिन क्षमाशीलता रामचरित मानस के मूल में हैं जिन्होंने हर रुप में आदर्श प्रस्तुत किया तब जब पूरा विश्व राक्षसवृति से प्रभावित था। राष्ट्र धरोहर मानस तो अकबर काल में सुरक्षित रहा लेकिन आज चंद लोग कुछ भी बोल कर मुद्दा बना देते हैं। साहित्य के तौर पर उत्कृष्ट, भाव के तौर पर भगवत सदृश्य इस कथा से जीवन बदलता है उसकी आलोचना मात्र ही कलियुग के माध्यम से विनाशकारी होता है।

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