गिरीश्वर मिश्र एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कहा जाता है धरती पर ज्ञान जैसी कोई दूसरी पवित्र वस्तु नहीं है। भारत में प्राचीनकाल से ही न केवल ज्ञान की महिमा गाई जाती रही है बल्कि उसकी साधना भी होती आ रही है। इस बात का असंदिग्ध प्रमाण देती है काल के क्रूर थपेड़ों के बावजूद अभी भी शेष बची विशाल ज्ञान राशि। अनेकानेक ग्रंथों तथा पांडुलिपियों में उपस्थित यह विपुल सामग्री भारत की वाचिक परम्परा की अनूठी उपलब्धि के रूप में वैश्विक स्तर पर अतुलनीय और आश्चर्यकारी है। यह हमारे लिए सचमुच गौरव का विषय है कि आज जैसी उन्नत संचार तकनीकी के अभाव में भी मानव स्मृति में भाषा के कोड में संरक्षित होकर यह सब जीवित रह सका। इस परंपरा में मनुष्य के जीवन में होने वाले आरम्भ में विकास और उत्तर काल में ह्रास की अकाट्य सच्चाई को स्वीकार करते हुए मनुष्य को जीने के लिए तैयार करने की व्यवस्था की गई थी। ज्ञान केंद्रित भारतीय संस्कृति के अंतर्गत अभ्यास और गुरु के संरक्षण में मिलने वाली शिक्षा का परिणाम व्यास, पाणिनि, पतंजलि, वाल्मीकि, कणाद, गौतम, जैमिनि, भरत, कालिदास, भर्तृहरि, बाणभट्ट, भवभूति, चाणक्य, आर्यभट्ट, वराहमिहिर, चरक, सुश्रुत, शंकराचार्य आदि जैसी महान विभूतियों और उनकी अमूल्य कृतियों के रूप में प्रतिफलित हुआ। गुणवत्ता और शिक्षा की उत्कृष्टता की दृष्टि से नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे विद्या केंद्रों की वास्तविकता विश्व विदित है। बर्तानवी उपनिवेश के दौर में भारत की अपनी शिक्षा व्यवस्था को समूल उखाड़ कर अंग्रेजी शिक्षा का जो बिरवा रोपा गया था वह स्वतंत्र भारत में विशाल वृक्ष बन कर किस प्रकार छाता गया और हम किस स्थिति में पहुंचे हैं यह बताने की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार की शिक्षा की प्रक्रिया और उसके सामाजिक स्तर पर होने वाले परिणाम सबके सामने हैं। देश की आवश्यकता और वर्तमान वैश्विक संदर्भ में शिक्षा का ढांचा और प्रक्रिया में बदलाव लाने की दृष्टि से पांच वर्ष लम्बे विचार विमर्श के बाद 2020 में नई शिक्षा नीति का मसौदा लाया गया। दुर्भाग्यवश कोरोना की लंबी महामारी के दौरान लड़खड़ाती पुरानी व्यवस्था भी बेपटरी हो गयी और नयी नीति भी शिक्षा का स्वभाव बदलने के लिए आगे बढ़ी। इन सबके बीच अस्त-व्यस्त शिक्षा व्यवस्था नई चुनौतियों से जूझ रही है। इस बीच जनसंख्या की दृष्टि से अब जब भारत विश्व में प्रथम स्थान पर पहुंच चुका है इसकी युवा पीढ़ी संख्या की दृष्टि से अब अधिक अपेक्षा करती है। वर्ष 2020 में आयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने भारत की औपचारिक शिक्षा की चुनौतियों और संभावनाओं को पहचान कर उसका आकलन करते हुए समर्थ भारत के निर्माण के लिए शिक्षा के आयोजन के लिए एक खाका प्रस्तुत किया था। इस नीति के आने के साथ ही औपचारिक शिक्षा से जुड़े हितधारकों में चर्चाएं शुरू हो गयीं। नीति की संस्तुतियों को शिक्षा में सुधार की सकारात्मक पहल मानते हुए सबके द्वारा इसका स्वागत किया गया। जुलाई 2020 में प्रस्तुत की गयी इस नीति से जुड़ी कार्य योजनाएं दिसंबर 2020 तक आने लगीं। पिछले तीन वर्षों में प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा एवं शोध के लिए सरकार ने जो कुछ भी कहा, सुना और किया, उसे नीति के क्रियान्वयन का हिस्सा बनाया गया। समग्र शिक्षा अभियान की अवधि को 2025-26 तक बढ़ा दिया गया। इसे नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन का माध्यम बनाया गया। 8 अपै्रल 2021 को सार्थक (स्टूडेंट्स एंड टीचर्स होलिस्टिक एडवांसमेंट थ्रो क्वालिटी एजुकेशन) नाम से एक वृहद् कार्ययोजना प्रस्तुत की गयी। यह कार्ययोजना वर्तमान में एक मार्गदर्शिका की भूमिका में कार्य कर रही है। किसी भी राज्य की विद्यालयी शिक्षा से जुड़ी आधिकारिक वेबसाइट पर इसके आलोक में बनायी जा रही योजनाओं का ब्योरा देखा जा सकता है। इसका उपयोग नीति के अंतर्गत किये जा रहे कार्यों की उपलब्धि को मापने के लिए भी किया जा रहा है। ध्यातव्य है कि नीति की एक प्रमुख संस्तुति आधारभूत साक्षरता और गणितीय योग्यता का संवर्धन करना था। इस दिशा में पहल करते हुए 5 जुलाई 2021 को निुपण भारत अभियान शुरू किया गया। इस अभियान का लक्ष्य रखा गया कि वर्ष 2026-27 में कक्षा तीन तक के बच्चे पढ़ने और गिनने की आधारभूत क्षमता से युक्त हो जाये। नीति के क्रियान्वयन की एक मुख्य एजेंसी एनसीईआरटी है। इसने इस दिशा में पहल करते हुए 29 जुलाई 2021 को विद्या प्रवेश नाम के खेल आधारित माड्यूल प्रस्तुत किया। इस संस्था के द्वारा आधारभूत स्तर (फाउंडेशनल स्तर) के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा प्रस्तुत की जा चुकी है। प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की विद्यालयी शिक्षा के लिए भी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा का एक मसौदा चर्चा और फीडबैक के लिए आ चुका है। एनसीईआरटी ने सेवारत अध्यापकों के पेशेवर विकास के लिए संचालित निष्ठा कार्यक्रम को भी नीति के अनुसार सुधार कर संयोजित किया है। यह भी गौरतलब है कि लगभग हर तीन महीने पर किसी न किसी योजना का शुभारम्भ किया जा रहा है। इसके अंतर्गत विद्याजंलि और पीएम श्री योजना प्रमुख रूप से उल्लेखनीय है। भारत सरकार का शिक्षा मंत्रालय 2020 के बाद जिस किसी भी कार्यक्रम और योजना को आरंभ कर रहा है कि उसे शिक्षा नीति के क्रियान्वयन की शक्ल में प्रस्तुत कर रहा है। यह राहत की बात है कि केंद्र सरकार ने विगत वर्षों की तुलना में अपने शिक्षा बजट में लगभग 11.86 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। उच्च शिक्षा के स्तर पर किसी केंद्रीकृत सुधार की जगह विश्वविद्यालय और राज्य सरकारों के स्तर पर सुधार के कुछ प्रयास हो रहे हैं। अधिकांश विश्वविद्यालयों की वेबसाइटों पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की कार्ययोजना का ब्योरा देखा जा सकता है। ये कार्य योजनाएं शिक्षा नीति से सूत्र को पहचानती हैं और इसके क्रियान्वयन का चरणबद्ध प्रस्ताव प्रस्तुत करती हैं। इनमें पाठ्यचर्या और शिक्षण प्रक्रिया में सुधार और आकलन की लचीली पद्धति का उल्लेख किया जाता है। एकेडमिक बैंक आफ क्रेडिट के विकास को जरूर बड़े पैमाने पर लागू किया गया है। हर विश्वविद्यालय राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के नाम पर नए तरह के अध्ययन कार्यक्रमों को आरंभ करने की योजना बनाने में अग्रसर हो रहा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा उत्साह पोर्टल आरंभ कर नीति क्रियान्वयन की निगरानी की कोशिश भी की जा रही है। इसके लिए बहुअनुशासनात्मकता, डिजिटल संसाधनों का अधिकाधिक प्रयोग, कौशल विकास, शोध, नवाचार, उद्यमिता और भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा के अवसरों को को लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों की कार्ययोजना की निगरानी और उन्हें सहयोग देने का प्रयास जारी है। इस नीति के क्रियान्वयन का सकारात्मक परिणाम यह भी है कि उच्च शिक्षा के परिसरों में भारतीय ज्ञान परंपरा और भारतीय भाषाएं अब एक महत्वपूर्ण घटक की तरह पहचानी जा रही हैं किंतु अभी यह रस्मी तौर पर हड़बड़ी में ही हो रहा है और शिक्षा की मुख्य धारा से इसका कोई आर्गेनिक रिश्ता नहीं बन पा रहा है। नेशनल रिसर्च फाउंडेशन खड़ा कर शोध में सुधार हेतु 2023-28 के लिए पचास हजार करोड़ रुपये आवंटित करने की खबर आयी है। विद्यालय स्तर पर नीति के प्रभाव में आवंटित वित का प्रस्तुतीकरण और समायोजन नए वर्गों में हो रहा है लेकिन आधारभूत समस्याएं पूर्ववत ही ज्यों की त्यों बनी हुई हैं। विद्यालयों में सीखने के कुछ संसाधन जरूर उपलब्ध हो रहे हैं परंतु सीखने-सिखाने की संस्कृति में कोई बदलाव नहीं हो रहा है। आज भी मास्टर साहब प्रशिक्षण लेने और देने में व्यस्त हैं। सरकार की अन्य योजनाओं के क्रियान्वयन का हिसाब-किताब का बोझ उनके ही कंधों पर अभी भी जारी है। केंद्रीकृत योजनाओं का विभिन्न माध्यमों से प्रचार का काम विधिवत किया जा रहा है लेकिन विद्यालय स्तर पर इन्हें लेकर उदासीनता ही छायी हुई है। नई पाठ्यपुस्तकों के आने की सुगबुगाहट के बीच उनकी सामग्री की गलत सही आलोचना के दौर शुरू हो चुके हैं। यदि सरकारी तंत्र को छोड़ दिया जाए तो यह नीति सरकारी विद्यालयों पर जनता में भरोसा विकसित करने की दिशा में कोई खास प्रभाव छोड़ती नजर नहीं आ रही है। उच्च शिक्षा के स्तर पर कोविड के बाद से सत्र की नियमितता की समस्या का समाधान नहीं हो पाया है। राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा के आधार पर स्नातक और परास्नातक में प्रवेश विलंब से हो रहा है। उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं के परीक्षा परिणामों की घोषणा और स्नातक में प्रवेश की अवधि में लगभग तीन माह का अंतराल हो रहा है। उच्च शिक्षा के स्तर पर बहुअनुशासनात्मकता और सुनम्य व्यवस्था के बीच शिक्षण-अधिगम सुदृढ़ होने के बजाय शॉर्टकट अपनाता नजर आ रहा है। आम तौर पर देखें तो आज की सोच में शिक्षा के तीन मुख्य उद्देश्य ध्यान आकृष्ट करते हैं। वह अच्छी तरह से जीने के लिए जरूरी क्षमताओं को विकसित करती है जैसे पढ़ना, लिखना, डिजिटल साक्षरता, अपनी और समाज की देख-रेख करना, तथा लोगों के साथ मिल कर समूह में काम करना इत्यादि। इस आधारभूत जरूरत के साथ जुड़ी दूसरी आवश्यकता है मूल्यों और चरित्र या स्वभाव का निर्माण। सामाजिक दायित्व और नैतिकता पर मंडराते खतरों और लोभ लाभ के तीव्र आकर्षण के बीच सहानुभूति, आदर, सच्चाई, ईमानदारी, सहयोग और सदाचार के महत्व को कम नहीं आंका जा सकता। तीसरी बात है ज्ञान विशेष का निर्माण जो विभिन्न अध्ययन-अनुशासनों से जुड़ा होता है, उसका विकास। हालाँकि ये तीनों जुड़े हैं और साथ-साथ ही जीवन में चलते हैं। गौर तलब है कि इनके लिए वास्तविक सामाजिक परिस्थिति में सीखना अनिवार्य है। आन लाइन की तकनीकी इनके लिए किसी भी तरह से मुनासिब नहीं है और उससे बात नहीं बन सकती। इनके लिए सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों ही स्तरों पर सहज सहभागिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। शिक्षा केंद्रों की बदहाली के अनेक आयाम हैं जिन पर गौर करना जरूरी है। आज विद्यार्थियों के लिए वे विकर्षण का केंद्र बन रहे हैं और साधन जुटा कर वे विदेश की ओर रुख कर रहे हैं। बहुत सी सामान्य या उससे नीचे की संस्थाएं भी नैक से उच्च और उच्चतर ग्रेड का प्रमाणपत्र पा कर आगे बढ़ रही हैं। आम आदमी निरुपाय और भ्रमित हो रहा है। उच्च शिक्षा के अध्यापक नई शब्दावली और प्रस्तुति के बीच ऐसे उलझे हैं कि वे क्या और कैसे पढ़ाये में नवाचार करने के बजाय पुरानी पाठ्यचर्या पर नये कवर चढ़ाकर आगे बढ़ ले रहे हैं। उद्यमिता विकास के नाम पर उच्च शिक्षा संस्थानों और उद्यम आधारित अधिगम स्थलों के बीच न के बराबर तालमेल है। विद्या के परिसर में ज्ञान की संस्कृति की जगह जोड़ तोड़ की राजनीति और गैर अकादमिक आकांक्षाओं को साकार करने पर अधिक जोर दिया जाने लगा है। कुछ खास शैक्षिक संस्थाओं को छोड़ दें जिन्हें स्वायत्तता मिली है और जहां गुणवत्ता की स्वीकृति है अन्य संस्थाएं उदासीनता, दखलंदाजी और अव्यवस्था से ग्रस्त हो कर हर तरह के समझौतों के साथ बीमार हो रही हैं। सरकारी व्यवस्था जहां अनेक कमियों से जकड़ कर अनुत्पादक बनी हुई है वहीं निजी शिक्षा व्यवस्थाएं अनियंत्रित हो कर बेहद मंहगी हुई जा रही हैं। गुणवत्ता और मानक के स्तर की चिंता आकड़ों में फंस रही है। नयी शिक्षा नीति को जमीन पर उतारने के लिए शैक्षिक व्यवस्था में बदलाव लाने पर ही उसकी साख बचेगी। (लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत आज विकास की ऊंची उड़ान भरने को तैयार है। वैश्विक स्तर पर सभी प्रतिस्पर्धियों की तुलना में भारत की लॉजिस्टिक्स संबंधी रेटिंग बेहतर होते जाने के साथ-साथ लॉजिस्टिक्स से जुड़ी इसकी बाधाएं दूर होती जा रही हैं।
मैन्यूफैक्चरिंग और व्यापार के क्षेत्र में भारत की वैश्विक स्थिति बुनियादी ढांचे और निर्यात-आयात (एक्जिम) संबंधी लॉजिस्टिक्स को बेहतर बनाने से संबंधित सुधारों के साथ गहराई से जुड़ी हुई है। बुनियादी ढांचे को अर्थव्यवस्था के एक महत्वपूर्ण विकास इंजन के रूप में पहचानते हुए, प्रधानमंत्री की गतिशक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान (एनएमपी) और राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति जैसे सुधारों ने सामानों एवं यात्रियों की आवाजाही के लिए लॉजिस्टिक्स से जुड़े बुनियादी ढांचे और लॉजिस्टिक्स संबंधी सेवाओं में सुधार पर ध्यान केन्द्रित किया है। बहुत ही कम समय में, इन सुधारों के परिणाम दिखाई देने लगे हैं।
विश्व बैंक ने लॉजिस्टिक्स परफॉर्मेंस इंडेक्स (एलपीआई) से संबंधित 2023 की अपनी रिपोर्ट में लॉजिस्टिक्स से जुड़ी उन्नत दक्षता की दिशा में भारत द्वारा की गई प्रगति को स्वीकार किया है। विश्व बैंक की यह रिपोर्ट 139 देशों के एलपीआई के बारे में जानकारी साझा करती है और भारत को इस सूचकांक में 38वें स्थान पर रखती है, जोकि 2018 में हमारी रैंक की तुलना में छह स्थान ऊपर है। एलपीआई छह व्यापक मापदंडों पर आधारित गुणात्मक धारणाओं का एक सर्वेक्षण-आधारित प्रमाणीकरण है, जो सीमा शुल्क, बुनियादी ढांचे, अंतरराष्ट्रीय लदान (शिपमेंट), लॉजिस्टिक्स संबंधी क्षमता एवं लॉजिस्टिक्स से जुड़ी सेवाओं की गुणवत्ता, समयबद्धता, निगरानी एवं जानकारी जैसे पहलुओं पर विचार करता है।
विश्व बैंक एक ऐसी उभरती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में भारत का उदाहरण देता है, जिसने 2015 से देश के पूर्वी एवं पश्चिमी दोनों तटों पर स्थित बंदरगाहों को सुदूर इलाकों में स्थित आर्थिक केंद्रों से जोड़ते हुए बुनियादी ढांचे एवं विभिन्न प्रौद्योगिकियों में निवेश किया है। अन्य कारकों के अलावा, इस तरह के निवेश के कारण ही बंदरगाहों पर कंटेनरों के ठहराव के समय के मामले में भारत का प्रदर्शन कई विकसित देशों की तुलना में कहीं बेहतर है।
मई से लेकर अक्टूबर 2022 के बीच, भारत में कंटेनरों के ठहराव का समय न्यूनतम 3 दिन था, जबकि संयुक्त अरब अमीरात एवं दक्षिण अफ्रीका के मामले में यह समय चार दिन, अमेरिका के मामले में सात दिन और जर्मनी के मामले में 10 दिन था।
विश्व बैंक की यह रिपोर्ट भारत को एक ऐसे देश के रूप में प्रस्तुत करती है, जिसने नेशनल लॉजिस्टिक्स डेटा बैंक सर्विसेज लिमिटेड (एनएलडीबीएसएल) जैसे डिजिटलीकृत प्लेटफॉर्म के उपयोग के जरिए आपूर्ति शृंखला में दृश्यता ला दी है।
यह रिपोर्ट बताती है कि लॉजिस्टिक्स डेटा बैंक (एलडीबी) कैसे आरएफआईडी (रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन) टैग के उपयोग के जरिए भारत में एक्जिम कंटेनरों की आवाजाही की निगरानी करता है और उसके बारे में सटीक जानकारी रखता है, जिससे माल पाने वाले (कान्साइनी) के लिए अपनी आपूर्ति शृंखला की एक छोर से दूसरे छोर तक निगरानी (ऐंड-टू-एंड ट्रैकिंग) करना संभव हो जाता है।
शुरू में माल की स्थिति का पता लगाने वाले (कार्गो ट्रेसिंग) इस प्रकार के तंत्र का शुभारंभ 2016 में देश के पश्चिमी तट पर किया गया था और आज इस तंत्र के दायरे में सभी प्रमुख बंदरगाह और निजी बंदरगाह आते हैं। भारतीय बंदरगाहों पर कंटेनरों के बेहतर ठहराव समय के लिए इसे श्रेय दिया जाता है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के संदर्भ में कहें तो माल की निगरानी (कार्गो ट्रैकिंग) व्यवस्था की शुरुआत के साथ, देश के पूर्वी तट पर स्थित विशाखापत्तनम बंदरगाह पर कंटेनरों के ठहराव का समय 2015 में 32.4 दिन से घटकर 2019 में 5.3 दिन रह गया।
देश के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में लॉजिस्टिक्स क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका को पहचानते हुए, भारत सरकार ने आपूर्ति शृंखला पर निगरानी रखने के लिए एक डिजिटल प्रणाली के रूप में लॉजिस्टिक्स डेटा बैंक प्रोजेक्ट (एलडीबी) का शुभारंभ किया था। एनएलडीबीएसएल को राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास निगम (एनआईसीडीसी) और निप्पॉन इलेक्ट्रिक कंपनी (एनईसी) लिमिटेड नाम की जापानी कंपनी के बीच एक एसपीवी (विशेष प्रयोजन वाहन) के रूप में संचालित किया जाता है।
एलडीबी, एक्जिम कंटेनर की आवाजाही के बारे में वास्तविक समय में विस्तृत जानकारी प्रदान करने हेतु आपूर्ति शृंखला में कार्यरत विभिन्न एजेंसियों के पास उपलब्ध डिजिटल जानकारी को एकत्रित व व्यवस्थित करता है। यह प्लेटफॉर्म भारत के एक्जिम कंटेनर की शत-प्रतिशत मात्रा को संभालता है।
इस पर एक मोबाइल ऐप के साथ-साथ एक पोर्टल के जरिए माल पाने वालों (कान्साइनी) के लिए जानकारी पाने की सुविधा उपलब्ध है। इस तरह, एलडीबी दृश्यता प्रदान करता है और भारत के कंटेनरीकृत एक्जिम लॉजिस्टिक्स से संबंधित बिग डेटा एनालिटिक्स को सक्षम बनाता है।
जुलाई 2016 में अपना कामकाज शुरू करने बाद से, एलडीबी ने 60 मिलियन एक्जिम कंटेनरों की निगरानी की है। भारत के शत-प्रतिशत कंटेनरीकृत एक्जिम कार्गो की निगरानी करने और उनका पता लगाने के लिए आरएफआईडी, आईओटी (इंटरनेट आॅफ थिंग्स) और बिग डेटा एनालिटिक्स से संबंधित प्रौद्योगिकियों के संयोजन के साथ, एलडीबी ने प्रमुख भारतीय बंदरगाहों, सबसे व्यस्त टोल प्लाजा, लगभग 400 कंटेनर फ्रेट स्टेशनों (सीएफएस)/अंतदेर्शीय कंटेनर डिपो (आईसीडी) और बंदरगाहों पर खाली यार्ड, विशेष आर्थिक क्षेत्रों और यहां तक कि नेपाल एवं बांग्लादेश की सीमाओं पर स्थित एकीकृत चेक पोस्ट के साथ भी तालमेल बिठाया है।
आरएफआईडी से संबंधित आंकड़ों को हासिल करने के उद्देश्य से एसपीवी द्वारा माल ढुलाई के लिए सर्पित गलियारों (डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर) सहित सभी प्रमुख सड़क एवं रेल मार्गों पर लगभग 3000 आरएफआईडी रीडर स्थापित किये गये हैं।
एलडीबी हासिल एवं व्यवस्थित किए गए आंकड़ों का विभिन्न प्रकार से विश्लेषण करता है। इन विश्लेषणों में बंदरगाह पर कंटेनरों के ठहराव के समय की गणना, माल की आवाजाही के क्रम में होने वाले भीड़भाड़ का विश्लेषण, कंटेनर की आवाजाही की गति का विश्लेषण, प्रदर्शन संबंधी मानदंड, आवागमन में लगने वाले समय का विश्लेषण (बंदरगाह से सीएफएस या इसके उलट) आदि शामिल है। ये विश्लेषण मासिक, त्रैमासिक और वार्षिक आधार पर किये जाते हैं और सभी संबंधित मंत्रालयों, बंदरगाह के प्राधिकारियों, टर्मिनल के संचालकों, सीमा झ्र शुल्क से जुड़ी एजेंसियों और अन्य हितधारकों के साथ साझा किये जाते हैं।
दूसरी ओर, संबंधित एजेंसियों द्वारा कठिनाई पैदा करने वाले बिंदुओं और सुधार की जरूरत वाले क्षेत्रों की पहचान करने हेतु नियमित विश्लेषणों का उपयोग किया जाता है। पिछले कुछ वर्षों के एलडीबी के आंकड़ों के विश्लेषण से यह पता चलता है कि कंटेनरों की निकासी मामले में आईसीडी और सीएफएस के प्रदर्शन में सुधार के अलावा कंटेनर को संभालने से जुड़े प्रदर्शन, सड़क मार्ग से गुजरने वाले कंटेनरों की निकासी, प्रमुख राजमार्गों पर कंटेनर की गति के मामले में भी सुधार हुआ है।
दिल्ली-मुंबई मार्ग और मुंद्रा बंदरगाह को जोड़ने वाले मार्ग जैसे प्रमुख राजमार्गों पर कंटेनर की गति भी 2018 की तुलना में बेहतर हुई है। आज, एलडीबी ने दक्षता के साथ सीमा पार व्यापार को सुनिश्चित करने के लिए न केवल नेपाल एवं बांग्लादेश की सीमाओं तक अपनी सेवाओं का विस्तार किया है, बल्कि वह भारत के एक्जिम कंटेनरों की आवागमन के दौरान ठहराव वाले पहले अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह तक निगरानी रखने के लिए समुद्री ट्रैकिंग प्रणाली का भी उपयोग करता है। इसके अलावा, हमारे एफटीए को समान अंतरराष्ट्रीय प्रणालियों के साथ एकीकृत करके लाभ उठाने की संभावना तलाशना हमारे आगे के कदमों का हिस्सा है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि निर्यात कंटेनर पूरी दक्षता के साथ अंतिम गंतव्य तक पहुंचें और इससे हमारे व्यापार को बढ़ावा मिले।
यह तेज गति से चलने वाले लेन में एक लंबी यात्रा की शुरुआत मात्र है। लॉजिस्टिक्स इको सिस्टम में सुधार के लिए भारत में नवीन डिजिटल प्रौद्योगिकियों का उपयोग गति में और तेजी लायेगा तथा सोने पर सुहागा की स्थिति बनाते हुए अगले कुछ वर्षों में वैश्विक स्तर पर हमारी लॉजिस्टिक्स रैंकिंग को भी बेहतर करेगा। यह गति निश्चित रूप से 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने के हमारे महत्वाकांक्षी लक्ष्य को साकार करने में मदद करेगी। (लेखिका, भारत सरकार के लॉजिस्टिक्स, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय में विशेष सचिव हैं।)
रमेश सर्राफ धमोरा
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। न्याय शब्द आशा और उम्मीद का प्रतीक है। जब किसी को लगता है कि उसकी बात अच्छी तरह सुनी जायेगी तथा उसे अपनी बात कहने का पूरा अवसर मिलेगा, तो वह न्याय है। न्याय शब्द एक नई रोशनी लेकर आता है। व्यक्ति के मन में एक उम्मीद जगाता है कि उसकी बात को पूरी तरह सुनकर ही निर्णय किया जाएगा।
न्याय एक बहुत ही सम्मानित वह संतुष्टि प्रदान करने वाला शब्द है। आज भी जब दो व्यक्तियों के बीच में झगड़ा होता है तो दोनों एक दूसरे से कहते हैं कोर्ट में आ जाना फैसला हो जाएगा। यह लोगों की न्याय के प्रति आस्था का एक जीता जागता उदाहरण है। न्याय पाना हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है।
कोई भी सरकार या व्यवस्था तभी सफल मानी जाती है, जिसमें हर व्यक्ति को निष्पक्ष रूप से न्याय मिल सकें। हमारे देश में तो सदियों से न्यायिक प्रणाली बहुत मजबूत रही है। रजवाड़ों के जमाने की न्याय प्रक्रिया के उदाहरण हम आज भी देते हैं। भारत के महान सम्राट राजा विक्रमादित्य की न्याय प्रणाली की आज भी हर जगह चर्चा और सराहना होती है।
हमारा देश जब स्वतंत्र हुआ तो संविधान के निर्माताओं ने न्यायपालिका को कार्यपालिका और विधायिका से अलग रखा। न्याय के लिए सशक्त कानून बनाए गए। देश के लोगों को सही व निष्पक्ष न्याय मिल सके इसके लिए लोअर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक की स्थापना की गयी।
देश में न्यायपालिका की स्वतंत्रता का उदाहरण इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते आया फैसला है। उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पद के अयोग्य ठहरा दिया था। इससे अधिक न्यायपालिका की स्वतंत्रता और मजबूती कहां देखने को मिल सकती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून के शासन के तहत अदालतों को न्याय एवं अन्याय में फर्क करने का अधिकार हासिल है। सही क्या है तथा गलत क्या है यह अदालत विधान की पुस्तकों के आधार पर तय करती हैं।
आज लंबित मामलों की संख्या को देखकर कहा जा सकता है, इंसाफ चाहने वाले पीड़ित लोगों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही हैं। देश की विधायी व्यवस्था में न्याय की शीर्षस्थ संस्था न्यायालय हैं। हर साल दुनिया भर के लोग 17 जुलाई को इस दिवस को मनाते हैं। यह दुनिया में आधुनिक न्यायालय प्रणालियों की स्थापना का भी स्मरण कराता है। यह दिन मौलिक मानवाधिकारों की वकालत और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्याय को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।
17 जुलाई 1998 को 120 से अधिक देश अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के लिए रोम संविधि नामक एक संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए एक साथ आए थे। यह न्यायालय सबसे गंभीर अंतरराष्ट्रीय अपराधों वाले व्यक्तियों का विश्लेषण करता है और उन पर आरोप लगाता है। इनमें नस्लीय हत्या, युद्ध अपराध, मानवता के अपराध और आक्रामकता के अपराध शामिल हो सकते हैं।
बहुत से लोगों से अक्सर यह सवाल सुनने को मिलता है कि न्याय कहां मिलता हैं। इस प्रश्न का होना भी यह बताता है कि आज भी आम आदमी को आसानी से न्याय नहीं मिल पा रहा हैं। न्याय के बारे में एक पुरानी अंग्रेजी कहावत है कि न्याय में देरी करना न्याय को नकारना है और न्याय में जल्दबाजी करना न्याय को दफनाना है।
यदि इस कहावत को हम भारतीय न्याय व्यवस्था के परिपेक्ष्य में देखें तो पाएंगे कि इसका पहला भाग पूर्णत: सत्य प्रतीत होता है। सीमित संख्या में हमारे जज और मजिस्ट्रेट मुकदमों के बोझ तले दबे प्रतीत होते हैं। एक मामूली विवाद कई सालों तक चलता है तथा पीड़ित को दशकों तक न्याय का इंतजार करना पड़ता है। यही वजह है कि लोगों में न्याय के प्रति गहरे असंतोष के भाव हैं।
बावजूद इसके आज भी न्यायपालिका परेशान लोगों के लिए सांत्वना का माध्यम है। निराश लोगों के लिए आशा की किरण है। गलत काम करने वाले लोगों के लिए भय का कारण है। यह बुद्धिमान और संवेदनशील लोगों के लिए मंदिर समान है। एक ऐसी शरण स्थली है जहां गरीब और अमीर दोनों को ही आसानी से न्याय मिलता है।
न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठने वाले लोगों के लिए यह एक सम्मान और गर्व का स्थान होता है। परंतु आज के समय में गरीब लोगों की न्यायालय में पहुंच बहुत कम हो गयी है। धूर्त लोग न्यायालयों का दुरुपयोग समाज के सम्मानित लोगों के विरुद्ध हथियार के रूप में करने लगे हैं। संविधान ने न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी अदालतोंं पर डाल दी है।
वे ही न्याय के एकमात्र एवं सर्वोपरि स्रोत माने जाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक भारत के उच्च न्यायालय एक मुकदमे का निर्णय सुनाने में लगभग चार वर्ष से अधिक का समय लेते हैं। निचली अदालतोंं का हाल तो और खराब हैं। जिला कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक चलने वाले एक मुकदमे का अंतिम फैसला 7 से 10 साल में आता है।
लोगों का मानना है कि भारत की न्याय प्रणाली में अधिक समय खर्च होने का मूल कारण मामलों की अधिकता है। लेकिन असल समस्या है मामलों का शीघ्र निपटान न हो पाना। केवल यह कहकर कि हमारे न्यायिक तंत्र में खामियां बताकर उसे कोसते रहना उचित नहीं हैं। देश दे सभी सभी नागरिकों, जजों, वकीलों तथा हमारी सरकारों का यह दायित्व है कि न्याय व्यवस्था को दुरुस्त किया जाये। (लेखक, वरिष्ठ स्तंभकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। यह बात पूरी तरह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया मौसम की अतियों की मार झेल रही है। यह बात भी स्पष्ट है कि इस तबाही का असर भी असमान है। यह दुनिया के सबसे गरीब देशों में गरीब लोगों को सबसे बुरी तरह प्रभावित करती है।
क्लाइमेट फाइनैंस या जलवायु वित्त केवल वह भुगतान या हजार्ना नहीं है जो जलवायु परिवर्तन के इन विपरीत और असंगत प्रभावों को कम करने के काम आये। बल्कि इसका संबंध उस बदलाव के लिए धन मुहैया कराना भी है जिसकी इन देशों को विकास की प्रक्रिया में जरूरत है।
उन्हें अलग तरह के विकास की आवश्यकता है ताकि वे बिना अधिक उत्सर्जन के आगे बढ़ सकें। यही वजह है कि जलवायु न्याय इतना अधिक मायने रखता है। जलवायु न्याय शब्द का सबसे पहली बार इस्तेमाल सन 1992 में यूएन फ्रेमवर्क कन्वेंशन आन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) में किया गया था।
वहां इस बात पर सहमति बनी थी कि ऐतिहासिक रूप से वातावरण को प्रदूषित करने वाले देशों को उत्सर्जन कम करने की आवश्यकता है। इस बात पर भी सहमति बनी थी कि शेष विश्व जिसे विकास का अधिकार था उन्हें वित्तीय मदद और तकनीकी मदद मुहैया कराई जाएगी ताकि वे टिकाऊ वृद्धि हासिल कर सकें।
बहरहाल, बीते 30 वर्षों से अधिक समय में दुनिया में अनगिनत जलवायु सम्मेलन हुए हैं और इनका इरादा प्राय: इस सिद्धांत को शिथिल करने या समाप्त करने का रहा है। परंतु बदलती जलवायु की तरह ही समता का मुद्दा भी खत्म होने वाला नहीं है। आज, दुनिया की आबादी का 70 फीसदी हिस्सा अपनी बेहतरी के लिए ऊर्जा या अन्य अनिवार्य आवश्यकताओं के मामले में सुरक्षित विकास नहीं हासिल कर सका है।
इस बीच दुनिया का वह कार्बन बजट लगभग समाप्त हो गया है जो दुनिया की तापवृद्धि को औद्योगिक युग के पूर्व के स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे सीमित रखने के लिए आवश्यक था। अब यह भी स्पष्ट है कि 2009 में सालाना जिस 100 अरब डॉलर राशि का वादा किया गया था और जो अब तक भ्रामक बनी हुई है, वह राशि भी शायद अपर्याप्त साबित होगी।
वैसे भी उसे हासिल करने में काफी देर हो चुकी है। हकीकत में एक अलग तरह का सुरक्षित भविष्य हासिल करने के लिए बहुत बड़ी धनराशि की आवश्यकता है। ऐसे में हमें तेजी से पैसे जुटाने की आवश्यकता है। परंतु केवल इतना ही पर्याप्त नहीं है।
हमें ढांचागत मुद्दों पर भी विमर्श करना होगा जिनमें वैश्विक असमानता शामिल है। इस असमानता के कारण यह लगभग तय है कि दुनिया के गरीब देश उत्सर्जन में कमी की कीमत नहीं चुका पाएंगे। मेरे सहयोगियों ने एक रिपोर्ट तैयार की है जिसका शीर्षक है- बियॉन्ड क्लाइमेट फाइनैंस। यह रिपोर्ट इस मसले को सुलझाने में मदद करती है।
हम जानते हैं कि जलवायु वित्त के नाम पर एकत्रित की गई धनराशि अपर्याप्त है। हमें पता है कि जलवायु वित्त से दुनिया का क्या तात्पर्य है इसकी कोई ऐसी परिभाषा नहीं है जिस पर सभी सहमत हों। परंतु हम यह नहीं जानते हैं या इस बात पर चर्चा नहीं करते हैं कि जलवायु वित्त के नाम पर जो भी राशि दी जा रही है वह किसी किस्म की रियायत नहीं है।
इस राशि में बमुश्किल 5 फीसदी अनुदान है जबकि शेष ऋण या इक्विटी के रूप में है। ऐसे में आश्चर्य की बात नहीं है कि जिसे जलवायु वित्त का नाम दिया जा रहा है वह उन देशों को नहीं मिलने वाला है जिन्हें उसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।
आश्चर्य की बात नहीं है कि ये फंड वहां जाते हैं जहां पैसे बनाने की संभावना अधिक हो, जहां वित्तीय बाजार स्थिरता को खतरा कम हो और जहां वित्त की लागत कम हो। एक सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने पर यूरोप में उसकी ब्याज लागत 2-5 फीसदी होती है, ब्राजील में यह 12-14 फीसदी और कुछ अफ्रीकी देशों में यह 20 फीसदी तक होती है।
ऐसे में जाहिर है ब्राजील और अफ्रीका में संयंत्र लगाना व्यावहारिक नहीं होगा। परंतु ज्यादा बुरी बात यह है कि अगर यह पैसा ऊंची ब्याज दर वाले ऋण के रूप में अफ्रीका जाता है, जो कि अनिवार्य तौर पर होता है तो बस उन देशों की ऋण चुकाने की समस्या में ही इजाफा होगा।
विभिन्न देश कर्ज चुकाने में डिफॉल्ट नहीं कर सकते हैं क्योंकि वैसा करने से उनकी क्रेडिट रेटिंग खराब हो सकती है। परंतु जलवायु परिवर्तन उनकी स्थिति को और खराब कर देगा क्योंकि सर्वाधिक संवेदनशील देश वे हैं जिन पर कर्ज का बोझ अधिक है।
जलवायु परिवर्तन की हर आपदा इन देशों को और अधिक कर्ज के बोझ में डुबा देती है क्योंकि वे अपने आप को बचाने के लिए हर बार नया कर्ज लेते हैं। इस बीच इन देशों की क्रेडिट रेटिंग खराब कर दी जाती है और उनकी ऋण की लागत और बढ़ जाती है।
यहां मैं वैश्विक रेटिंग प्रणाली में निहित पूर्वग्रहों की बात नहीं कर रहे हैं लेकिन इन्हें इसी तरह तैयार किया गया है कि तमाम देश नाकाम हो जायें। आज मुश्किल से गुजर रहे अधिकांश देश जिन्हें उत्सर्जन कम करने के लिए भी धन चाहिए। उनका कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है।
वे वार्षिक ब्याज के रूप में जो राशि चुकाते हैं वह 2023 में उनके सरकारी राजस्व के 16 फीसदी तक थी। जाहिर है अब हम छोटे बदलावों की बात नहीं कर सकते हैं। ऐसे भी प्रस्ताव हैं जिनके मुताबिक रियायती वित्त व्यवस्था के लिए नई धनराशि तलाश की जा सकती है।
इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय है ब्रिजटाउन एजेंडा। बारबाडोस की प्रधानमंत्री मिया मोट्टली ने इस बारे में स्पष्ट आह्वान किया है। हमें जल्दी जवाब चाहिए। लब्बोलुआब यह है कि जलवायु वित्त की यह प्रवृत्ति बदलनी होगी जहां अब तक वह केवल विभिन्न देशों का कर्ज बढ़ाने का काम कर रहा था और उन्हें अगली त्रासदी के लिए और मुश्किल में डाल रहा था। ऐसे में अब जरूरत इस बात की है कि जलवायु परिवर्तन जैसे इस बड़े संकट के लिए वाकई धन जुटाया जाये।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पिछले दिनों खेल जगत से आई दो खबरों ने हरेक भारतीय का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। पहली खबर थी कि ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता नीरज चोपड़ा ने इस साल का दूसरा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए लुसाने डायमंड लीग भी जीत लिया। नीरज चोपड़ा ने 87.66 मीटर भाला फेंककर पहला स्थान हासिल किया।
चोट के बाद भी वापसी करते हुए नीरज चोपड़ा ने दूसरा डायमंड लीग जीता। इससे पहले दोहा डायमंड लीग में उसने 88.67 मीटर भाला फेंका था। दूसरी खुशी दी भारत की फुटबॉल टीम ने। भारत ने कुवैत को हराते हुए नौवीं बार सैफ फुटबॉल चैंपियनशिप का खिताब अपने नाम पर कर लिया ।
दोनों ही टीमें 90 मिनट के बाद भी एक्स्ट्रा टाइम तक 1-1 के स्कोर पर बराबर थीं । ऐसे में मैच का नतीजा पेनल्टी शूटआउट से निकला, जहां भारत ने अपने घरेलू दर्शकों के बीच कुवैत को 5-4 से हराया। इससे पहले सेमीफाइनल में भी भारत ने लेबनान को पेनल्टी शूटआउट में 4-2 से हराया था।
भारत को खेल के मैदान में चौतरफा मिल रही सफलताएं साबित करती हैं कि भारत में खेलों पर सरकार और निजी क्षेत्र पर्याप्त ध्यान दे रहा है। ये दोनों खेलों के विकास पर इनवेस्ट भी कर रहे हैं। ये कोई बहुत पुरानी बातें नहीं हैं जब अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेल आयोजनों में भारत की लगभग सांकेतिक उपस्थिति ही रहा करती थी।
हम हॉकी में तो बेहतर प्रदर्शन कर लिया करते थे, पर शेष खेलों में हमारा प्रदर्शन प्राय: औसत ही रहता था। हमारे खिलाड़ियों-अधिकरियों की टोलियां बड़े खेल आयोजनों में जाकर खाली हाथ वापस आ जाया करती थी। हिन्दुस्तानी खेल प्रेमियों की निगाहें तरस जाती थीं, एक अदद पदक को देखने के लिए।
पर गुजरे एक दशक से स्थितियां तेजी से बदल रही हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि हम बैडमिंटन जैसे खेल में विश्व चैंपियन बनने लगे हैं, हमारा धावक ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतता है और क्रिकेट में तो हम विश्व की सबसे बड़ी शक्ति हैं ही। हमारी बेटियां वेट लिफ्टिंग तथा कुश्ती जैसी स्पधार्ओं में देश की झोली पदकों से भर देती हैं।
हम बड़े खेल आयोजन भी कर रहे हैं। हमने पिछले साल चेन्नई में 44वें शतरंज ओलंपियाड का आयोजन किया। जो पहली बार भारत में हुई। शतरंज ओलंपियाड चेन्नई से 50 किलोमीटर दूर मामल्लापुरम में हुआ और इसमें रिकॉर्ड खिलाड़ियों ने भाग लिया। नीरज चोपड़ा ने टोक्यो ओलंपिक खेलों में भारत को गोल्ड मेडल दिलवाया।
उनकी उपलब्धि पर सारा देश गर्व कर रहा है। हमने 2022 में थॉमस कप जीता था। लक्ष्य सेन, किदांबी श्रीकांत, एच एस प्रणय और सात्विक साईराज, रंकी रेड्डी-चिराग शेट्टी ने जो धैर्य और दृढ़ संकल्प दिखाया उसने उस धारणा को धराशायी कर दिया कि भारतीय खेलों के लिए नहीं बने हैं।
लंबे समय से हम भारतीयों ने अपने मन में इन भ्रांतियों को पनपने भी दिया। कहा जाता रहा है कि भारतीयों में वह जीतने वाला दम-खम नहीं होता। हम सिर्फ देश में ही अच्छा खेलते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेकार साबित होते हैं। अफसोस कि हमने खुद दूसरों को अपने ऊपर हंसने का पूरा मौका दिया है।
हमने इस साल ओडिशा में विश्व हॉकी चैंपियनशिप को भी आयोजित किया। अब हम विश्व कप क्रिकेट चैंपियनशिप की भी मेजबानी करने जा रहे हैं। 2023 क्रिकेट विश्व कप आईसीसी क्रिकेट विश्व कप का 13वां संस्करण होगा, जिसे अक्टूबर और नवंबर 2023 के दौरान आयोजित किया जाना है।यह पहली बार होगा जब प्रतियोगिता पूरी तरह से भारत में आयोजित की जानी है।
पिछले तीन संस्करणों 1987, 1996 और 2011 में भारत आंशिक रूप से मेजबान था। मूल रूप से, टूर्नामेंट 9 फरवरी से 26 मार्च 2023 तक खेला जाना था। लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण जुलाई 2020 में, तिथियों को अक्टूबर और नवंबर में स्थानांतरित कर दिया गया। याद कीजिये कि हमने कुछ साल पहले फीफा अंडर 17 विश्व कप का भी आयोजन किया था।
बहरहाल, ये कहना पड़ेगा कि भारत खेलों में चौतरफा स्तर पर आगे बढ़ रहा है। हमारे खिलाड़ी महत्वपूर्ण उपलब्धियां दर्ज कर रहे हैं। हम अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेल आयोजन भी सफलतापूर्वक तरीके से आयोजित कर रहे हैं। पर मुझे एक बात कहने दें कि हमें अपने बड़े-विशाल स्टेडियमों का सही से इस्तेमाल करने पर फोकस करना होगा।
मतलब ये कि इनमें युवा उदीयमान खिलाड़ी आराम से आकर अभ्यास कर सकें। देश की राजधानी दिल्ली में 1951 के पहले एशियाई खेलों के बाद 1982 में एशियाई खेल हुए और फिर 2010 में कॉमनवेल्थ खेल आयोजित किए गए। इनके आयोजन पर हजारों करोड़ रुपया खर्च हुआ ताकि विभिन्न स्टेडियम आदि बन सकें।
1982 के एशियाई खेलों के सफल आयोजन के लिए जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, इंदिरा गांधी स्टेडियम, करणी सिंह शूटिंग रेंज वगैरह का निर्माण हुआ था। कॉमनवेल्थ खेलों के समय पहले से बने स्टेडियमों को नये सिरे से विकसित किया गया। पर इतने भव्य आयोजनों के बाद भी दिल्ली से विभिन्न खेलों में श्रेष्ठ खिलाड़ी नहीं निकल पाये। दिल्ली को लघु भारत भी कहा जा सकता है।
यहां देशभर के भारतीय नागरिक रहते हैं। यह स्थिति अफसोसजनक है कि दिल्ली से भारत को नामवर खिलाड़ी नहीं मिल रहे हैं। इसके साथ ही एक राय ये भी है कि राजधानी में जो बड़े-बड़े स्टेडियम बने उनमें खिलाड़ियों को आराम से प्रैक्टिस की सुविधा नहीं मिल पाती।
यह स्थिति फौरन खत्म होनी चाहिए। देश के बाकी सभी शहरों-महानगरों में बने स्टेडियमों को खिलाड़ियों से दूर रखने का क्या मतलब है। मुझे एक बार राजधानी के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में कुछ अफ्रीकी नौजवान मिले। वे सब भारत में पढ़ रहे थे। वे अफ्रीकी नौजवान स्टेडियम के बाहर व्यायाम कर रहे थे।
मैंने उनसे कहा कि हम बेहतर खिलाड़ी इसलिए नहीं निकाल पाते क्योंकि हमारे यहां विश्व स्तरीय स्टेडियम नहीं है। मेरी बात को सुनकर वे दो-तीन अफ्रीकी मुस्कराते हुए जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम की तरफ इशारा करते हुए कहने लगे- इस तरह का शानदार स्टेडियम आपको सारे अफ्रीका में कहीं भी नहीं मिलेगा।
हमारे खिलाड़ी जीतते हैं तो सिर्फ इसलिए क्योंकि वे मैदान में जीत के जज्बे के साथ उतरते हैं। संयोग से अब हमारे खिलाड़ियों के पास जीत का जज्बा और सुविधाएं दोनों हैं। उन्हें अब बस शिखर को छूना है। (लेखक, वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)
योगेश कुमार गोयल
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। दुनियाभर में डॉक्टर्स कोरोना महामारी के भयावह दौर में अपनी जान की परवाह किए बिना करोड़ों लोगों के जीवन की रक्षा करते नजर आ चुके हैं।विकट दौर में देश में ड्यूटी के दौरान सैकड़ों चिकित्सकों की मौत हुई। फिर भी चिकित्सक जी-जान से लोगों की जान बचाने में जुटे नजर आये।
कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान तो बहुत से चिकित्सकों और चिकित्सा स्टाफ को अपनी छुट्टियां रद्द कर प्रतिदिन कार्य करना पड़ा। बहुत से चिकित्साकर्मी महीनों-महीनों तक अपने परिवार और छोटे बच्चों से भी दूर रहे। समाज के प्रति चिकित्सकों के ऐसे ही समर्पण एवं प्रतिबद्धता के लिए कृतज्ञता और आभार व्यक्त करने तथा मेडिकल छात्रों को प्रेरित करने के लिए ही प्रतिवर्ष देश में पहली जुलाई को राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस मनाया जाता है।
गंभीर बीमारियों से जूझते मरीजों की जान बचाने का हरसंभव प्रयास करने वाले चिकित्सक वाकई सम्मान के सबसे बड़े हकदार हैं। चिकित्सक दिवस मनाने का मूल उद्देश्य चिकित्सकों की बहुमूल्य सेवा, भूमिका और महत्व के संबंध में आमजन को जागरूक करना, चिकित्सकों का सम्मान करना और साथ ही चिकित्सकों को भी उनके पेशे के प्रति जागरूक करना है।
दरअसल कुछ चिकित्सक ऐसे भी देखे जाते हैं, जो अपने इस सम्मानित पेशे के प्रति ईमानदार नहीं होते लेकिन ऐसे चिकित्सकों की भी कमी नहीं, जिनमें अपने पेशे के प्रति समर्पण की कोई कमी नहीं होती। बिना चिकित्सा व्यवस्था और बिना योग्य चिकित्सकों के इंसान की जिंदगी कैसी होती, इसकी कल्पना मात्र से ही रोम-रोम सिहर जाता है। यही कारण है कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में चिकित्सकों का महत्व सदा से रहा है और हमेशा रहेगा।
चिकित्सक दिवस की शुरुआत भारत में वर्ष 1991 में हुई थी। पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री और जाने-माने चिकित्सक डॉ बिधान चंद्र रॉय के सम्मान में चिकित्सकों की उपलब्धियों तथा चिकित्सा क्षेत्र में नये आयाम हासिल करने वाले डॉक्टरों के सम्मान के लिए इसका आयोजन होता है।
वे एक जाने-माने चिकित्सक, प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और वर्ष 1948 से 1962 में जीवन के अंतिम क्षणों तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने पश्चिम बंगाल में दुर्गापुर, बिधाननगर, अशोकनगर, कल्याणी तथा हबरा नामक पांच शहरों की स्थापना की थी। संभवतः इसीलिए उन्हें पश्चिम बंगाल का महान वास्तुकार भी कहा जाता है। कलकत्ता विश्वविद्यालय से मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वर्ष 1911 में एमआरसीपी और एफआरसीएस की डिग्री लंदन से ली।
उन्होंने एक साथ फिजिशयन और सर्जन की रॉयल कॉलेज की सदस्यता हासिल कर हर किसी को अपनी प्रतिभा से हतप्रभ कर दिया था। वर्ष 1911 में भारत में ही एक चिकित्सक के रूप में उन्होंने अपने चिकित्सा करियर की शुरुआत की। वे कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में शिक्षक नियुक्त हुए। वर्ष 1922 में वे कलकत्ता मेडिकल जनरल के सम्पादक और बोर्ड के सदस्य बने। 1926 में उन्होंने अपना पहला राजनीतिक भाषण दिया और 1928 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य भी चुने गये।
डॉ बिधान चंद्र रॉय ने 1928 में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के गठन और भारत की मेडिकल काउंसिल (एमसीआई) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई बड़े-बड़े पदों पर रहने के बाद भी वे प्रतिदिन गरीब मरीजों का मुफ्त इलाज किया करते थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात उन्होंने अपना समस्त जीवन चिकित्सा सेवा को समर्पित कर दिया।
बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाओं को आम जनता की पहुंच के भीतर लाने के लिए वे जीवन पर्यन्त प्रयासरत रहे। 04 फरवरी, 1961 को उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 1967 में दिल्ली में उनके सम्मान में डॉ बीसी रॉय स्मारक पुस्तकालय की स्थापना हुई और 1976 में उनकी स्मृति में केन्द्र सरकार द्वारा डॉ बीसी रॉय राष्ट्रीय पुरस्कार की स्थापना की गयी।
यह संयोग है कि डॉ रॉय का जन्म और मृत्यु पहली जुलाई को ही हुई। उनका जन्म 01 जुलाई 1882 को पटना में हुआ था और मृत्यु 01 जुलाई 1962 को हृदयाघात से कोलकाता में हुई।
बहरहाल, चिकित्सकों को पृथ्वी पर भगवान का रूप माना गया है, इसलिए समाज की भी उनसे यही अपेक्षा रहती है कि वे अपना कर्तव्य ईमानदारी और पूरी निष्ठा के साथ निभायें। हालांकि निजी अस्पतालों के कुछ चिकित्सकों पर मरीजों और उनके परिजनों के साथ लापरवाही और लूट के गंभीर आरोप लगते रहे हैं।
दरअसल, निजी चिकित्सा तंत्र मुनाफाखोरी के व्यवसाय में परिवर्तित हो चुका है।फिर भी इस दीगर सच को भी नकारा नहीं जा सकता कि कोरोना हो या कैंसर, हृदय रोग, एड्स, मधुमेह इत्यादि कोई भी बीमारी, छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बीमारियों से चिकित्सक ही करोड़ों लोगों को उबारते हैं। चूंकि चिकित्सक प्रायः मरीज को मौत के मुंह से भी बचाकर ले आते हैं, इसीलिए चिकित्सकों को भगवान का रूप माना जाता रहा है।
चिकित्सा केवल पैसा कमाने के लिए एक पेशा मात्र नहीं है बल्कि समाज के कल्याण और उत्थान का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। इसीलिए चिकित्सक को सदैव सम्मान की नजर से देखने वाले समाज के प्रति उनसे भी समर्पण की उम्मीद की जाती है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार अब भारत देशहित में लिया गया अपना एक और संकल्प पूरा करने की ओर अग्रसर है और यह संकल्प है समान नागरिक संहिता का। देश लंबे समय से समान नागरिक संहिता कानून की मांग कर रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि समान नागरिक संहिता संविधान सम्मत है।
भोपाल में भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात के संकेत दे दिये हैं कि अब सरकार समान नागरिक संहिता पर तीव्र गति से आगे बढ़ रही है और 2024 लोकसभा चुनाव से पूर्व ही संसद के आगामी सत्रों में सदन से पारित करवाया जा सकता है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एकदम साफ कहा कि कुछ विरोधी दल जो तुष्टिकरण करते हैं तथा मुस्लिम समाज को केवल अपना वोट बैंक समझते हैं, वहीं यूनिफार्म सिविल कोड के नाम पर मुसलमानों को भड़का रहे हैं।
उन्होंने कहा कि एक घर में एक सदस्य के लिए एक कानून हो और दूसरे के लिए दूसरा हो, तो घर चल पायेगा क्या? तो ऐसी दोहरी व्यवस्था से देश कैसे चल पायेगा? प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि कॉमन सिविल कोड लाओ लेकिन वोटबैंक की राजनीति करने वालों ने हमेशा इसका विरोध किया है।
उधर, देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी पिछले दिनों एक कार्यक्रम में कहा था कि एक बड़ी व विदेशी साजिश के तहत समान नागरिक संहिता का विरोध किया जा रहा है। रक्षा मंत्री ने जो कड़े तेवर दिखाये हैं, उससे भी यह संदेश जा रहा है कि अब समान नागरिक संहिता बहुत ही जल्द भारत का कानून बन जायेगा।
सरकार समान नागरिक संहिता पर बहुत ही सतर्कता व तर्कों के साथ आगे बढ़ रही है ताकि उसका विरोध ठंडा हो जाये। यही कारण है कि सबसे पहले केंद्रीय विधि आयोग की ओर से समान नागरिक संहिता पर आम नागरिकों व धार्मिक संस्थाओं से संहिता के संदर्भ में उनके सुझाव व विचार मांगे गये हैं ताकि भारत के सभी नागरिकों, समाजों, पंथों और मजहबों, पर समान कानून लागू हो सके।
आम जनता अपने मोबाइल, लैपटाप आदि के माध्यम से विधि आयोग की वेबसाइट पर जाकर आने विचार साझा कर सकती है। विधि आयोग की यह पहल सार्वजनिक होते ही मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाली सभी संस्थाओं, नेताओं, सांसदों व विधायकों ने झूठ पर आधारित बयान देने की श्रृंखला प्रारम्भ कर दी है और यह अनवरत जारी है।
भाजपा की स्थापना के समय से ही समान नागरिक संहिता उसके तीन मूल ध्येयों में से एक रहा है। 2014 से 2019 तक केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद अब तक वह दो प्रमुख ध्येय प्राप्त कर चुकी है। पहला अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि मुक्त हो चुकी है और वहां भव्य राममंदिर का निर्माण प्रगति पर है और दूसरा जम्मू- कश्मीर से अनुच्छेद -370 की समाप्ति हो चुकी है।
अब सरकार समान नागरिक संहिता पर आगे बढ़ रही है। वर्तमान में समान नागरिक संहिता कानून भारत के गोवा राज्य में लागू है जबकि गुजरात व उत्तराखंड में प्रक्रिया चल रही है। उत्तराखंड में एक आयोग इस विषय पर आम जनता से मंत्रणा कर रहा है और उसकी रिपोर्ट 30 जून तक आ जायेगी।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का कहना है कि उत्तराखंड की जनता से किया गया हर वादा हर हाल में पूरा किया जायेगा और राज्य में जल्द ही समान नागरिक संहिता को लागू किया जायेगा। गुजरात और उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से ऐन पहले भाजपा ने समान नागरिक संहिता को लागू करने के लिए आयोग गठित करके जनता को एक संदेश दिया था जिसका लाभ भी भाजपा को चुनावों में मिला था।
मुख्यमंत्री धामी का कहना है कि इसी कानून में जनसंख्या नियंत्रण भी आ सकता है जो सभी को मानना अनिवार्य हो जायेगा। केंद्र सरकार ने इससे पूर्व भी 21वें विधि आयोग से समान नागरिक संहिता पर सुझाव मांगे थे तब विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि, अभी देश में समान नागरिक संहिता की जरूरत नहीं है। लेकिन अब 22वें विधि अयोग ने एक बार फिर समान नागरिक संहिता पर अपनी पहल प्रारंभ की है।
इससे पूर्व 1985 में शाहबानो प्रकरण और फिर 2015 में भी सुप्रीम कोर्ट समान नागरिक संहिता पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कानून बनाने की बात कह चुका है। संविधान के अनुच्छेद -44 में भी समान नागरिक संहिता लागू करने की बात कही गयी है। इस अनुच्छेद का उद्देश्य संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य के सिद्धांत का पालन करना है।
समान नागरिक संहिता का उल्लेख भारत के संविधान के भाग- 4 के अनुच्छेद 44 में है। इसमें नीति निर्देश भी दिया गया है कि समान नागरिक संहिता कानून लागू करना हमारा लक्ष्य होगा। संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर ने भी संविधान सभा की बैठकों में समान नागरिक संहिता के पक्ष में जोरदार बहस की थी किंतु नेहरू जी की वजह से उनका प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया था।
बाबा साहब ने कहा था, मैं व्यक्तिगत रूप से समझ नहीं पा रहा हूं कि क्यों धर्म को इस विशाल व्यापक क्षेत्राधिकार के रूप में महत्व दिया जाना चाहिए जो असमानता, भेदभाव और अन्य चीजों से भरा है जो हमारे मौलिक अधिकारों के साथ संघर्ष कर रहा है? हमारी सामाजिक व्यवस्था में सुधार करने के लिए हमें यह स्वतंत्रता प्राप्त हो रही है, हम क्या कर रहे हैं इस स्वतंत्रता के लिए?
समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद नागरिकों में समानता का भाव आएगा। इसका सबसे अधिक लाभ मुस्लिम महिलाओं को होगा पुरुषों को चार शादियों का अधिकार, हलाला, उत्तराधिकार जैसे विषयों में उन्हें अन्य महिलाओं के समान ही अधिकार मिलेंगे।
समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद मजहब आधारित पर्सनल ला बोर्ड समाप्त हो जायेंगे। हिजाब और फतवों की राजनीति मंदी पड़ेगी। यही कारण है कि धर्मनिरपेक्षता का पाखण्ड करने वाले सभी दल गोलबंद होकर मुस्लिम समाज को भड़काने के लिए निकल चुके हैं।
भारत में समान नागरिक संहिता का विरोध केवल मजहबी आधार पर व मजहबी राजनीति को चमकाने के लिए किया जा रहा है जबकि यह अमेरिका, आयरलैंड, बांग्लादेश, मलेशिया, तुर्की, इंडोनेशिया, सूडान, मिस्र आदि जो धर्मनिरपेक्ष देश है जहां पर भी समान नागरिक संहिता लागू है। भारत में ही क्यों विरोध हो रहा है, यह समझने व समझाने की आवश्यकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। वर्तमान समय में स्वास्थ्यमय जीवन जीने की पद्धति का नाम योग है। बदलती दैनिक दिनचर्या, भोजन में आए बदलाव एवं लगातार कंप्यूटर, सेल फोन, सोशल मीडिया आदि के उपयोग के कारण दिन-प्रतिदिन हमारे अंदर विभिन्न प्रकार के रोग जन्म ले रहे हैं। जिनके कारण बच्चे चिड़चिड़ेपन का शिकार होते जा रहे हैं।
युवा नसे के साथ-साथ मानसिक तनाव, अवसाद मोटापा, हृदय रोग, अनियंत्रित शारीरिक विकास जैसी समस्याओं से ग्रस्त होते जा रहे हैं। वही महिलाओं में मोटापा, थायराइड, पीसीओडी, डायबिटीज, बीपी जैसे गंभीर रोगों से ग्रस्त होती जा रही है।
ऐसी स्थिति में योग हमारे जीवन में लगभग सभी प्रकार के रोगों से बचाव करता ओर हमे पूर्ण रुप से शारीरिक और मानसिक रूप से फिट रखता है और अध्यात्म की ओर आगे बढ़ने में मदद करता है हठ यौगिक ग्रंथ घेरंड संहिता के अनुसार हमारे शरीर में षट्कर्म शोधन का कार्य करता है।
आसन से दृढ़ता (मजबूती) आती हैं। मुद्रा से स्थिरता, प्रत्याहार से धैर्यता, प्राणायाम से लघुता / हल्कापन प्राण ऊर्जा को बढ़ाया जाता है। ध्यान परमात्मा से प्रत्यक्षीकरण/ साक्षात्कार कराने का साधन है समाधि से निर्लिप्तता/अनासक्त अवस्था प्राप्त हो जाती है और योगमय जीवन जीने से जीवन का सम्पूर्ण उद्देश्य पूरा हो जाता हैं।
जैसा की हम सब जानते हैं इस वार 21 जून को भारत ही नहीं वल्कि संपूर्ण विश्व 9वा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने जा रहा है। प्रतिवर्ष 21 जून का यह दिन वर्ष का सबसे लंबा दिन होता है और योग भी मनुष्य को दीघार्यु प्रदान करता है।
पहली बार यह दिवस 21 जून 2015 को मनाया गया, जिसकी पहल भारत के प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने 27 सितम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण से की थी। जिसमें उन्होंने कहा था कि यह दिमाग और शरीर की एकता का प्रतीक है; मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य है।
विचार, संयम और पूर्ति प्रदान करने वाला है तथा स्वास्थ्य और भलाई के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को भी प्रदान करने वाला है। यह व्यायाम के बारे में नहीं है, लेकिन अपने भीतर एकता की भावना, दुनिया और प्रकृति की खोज के विषय में है।
हमारी बदलती जीवन- शैली में यह चेतना बनकर, हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकता है। तो आयें एक अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस को गोद लेने की दिशा में काम करते हैं। जिसके बाद 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया गया।
11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र के 177 सदस्यों द्वारा 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को मनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली। प्रधानमन्त्री मोदी जी के इस प्रस्ताव को 90 दिन के अन्दर पूर्ण बहुमत से पारित किया गया, जो संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी दिवस प्रस्ताव के लिए सबसे कम समय का रहा।
इस वार 9वे अंतराष्ट्रीय योग दिवस 2023 की थीम वसुधैव कुटुंबकम के लिए योग वसुधैव कुटुंबकम का अर्थ है- धरती ही परिवार है। इस थीम से तात्पर्य धरती पर सभी लोगों के स्वास्थ्य के लिए योग की उपयोगिता से है में बस इतना ही कहना चाहुंगा की योग को दैनिक दिनचर्या मैं सामिल करें और स्वयं को स्वस्थ बनाए अपने परिवार को स्वस्थ रखे और राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभायें। (योगाचार्य महेश पाल पतंजलि जिला युवा प्रभारी और विमुक्त घुमंतू अर्ध घुमंतू महासंघ इंदौर संभाग के प्रभारी भी हैं।)
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