एबीएन सोशल डेस्क। रामचरितमानस एक ओर राम का जीवन चरित्र व मनुष्य जाति के अनुभवों का उत्कट निचोड़ है तो दूसरी ओर यह नाना पुराण निगमागम सम्मतं यद् होकर सनातन धर्म के सभी मानक ग्रंथों के अर्क स्वरूप भी है, जिसे मानस के अंत में छहों शास्त्र सब ग्रंथन को रस कह कर दोबारा पुष्ट कर दिया गया है।
मनुष्य से पुरुषोत्तम बनकर यानी मृत्यु से अमरत्व की ओर बढ़ने की यात्रा के पथ प्रदर्शक श्रीराम हैं। अपने भीतर छुपी संभावना और सुख-शांति की अभीप्सा को पूरा कर सकने की आकांक्षा के बीच, रामचरितमानस में राम इस मार्ग का संकेत हैं कि मनुष्य के स्वरूप को चरितार्थ करने और उससे ऊपर उठने और अपने भीतर निहित संभावनाओं को साकार करने का कोई लघुमार्ग (शॉर्टकट) नहीं हैं।
पारिवारिक, सामाजिक और लौकिक जीवन के कर्तव्य परायणता में राम ने अपने आचरण और व्यवहार से जो मानक स्थापित किये, उन मानकों में यह संभावना हमेशा निहित रही कि व्यक्ति का व्यवहार, परिस्थिति के अनुसार भले बदलता रहे, लेकिन उसका अंतरंग स्थिर रहे। मानव उन्हीं मूल्यों का प्रतिनिधित्व करे जो शाश्वत हो, जो मनुष्य और समाज के लिए हमेशा उपयोगी और ऊंचा उठाने वाले हों।
उदाहरण के लिए परिवार को ही लें, राम में परिवार के अनुशासन, सबके प्रति विश्वास, एक-दूसरे के सुखों और इच्छाओं का निर्वाह और उनके लिए त्याग की भावना का महत्व रहा है। इन मूल्यों का निर्वाह रामचरित के हर प्रसंग में होता दिखाई देता है। क्षण भर में राजमुकुट धारण कर राजा राम बनने वाले वनवासी राम बनने हेतु बल्कल वस्त्र पहन लेते हैं और पिता के वचनों एवं माता कैकेयी के प्राप्त वरदान हेतु वन जाने हेतु निकल जाते हैं।
व्यक्तिगत जीवन में राम ने एक ओर मर्यादाओं की प्रतिष्ठा की तो दूसरी ओर उन्होंने जहां जरूरी समझा। वहां मान्यताओं में दखल भी दिया। शूर्पणखा का अंग-भंग, अहिल्या को पुनर्जीवन और प्रतिष्ठा, एक पत्नीव्रत, बाली उद्धार, शबरी उद्धार, विभीषण को लंका का राज दे देना आदि कई प्रसंग हैं, जिनमें वह परंपरा से हटकर काम करते हैं। यह सब करते हुए वह धर्म-मर्यादा की स्थापना ही कर रहे होते हैं क्योंकि मर्यादा की स्थापना ही धर्म की शाश्वतता को बनाये रखती है।
यदि यज्ञाग्नि भी मर्यादा का उल्लंघन करे तो उसे जल के द्वारा नियंत्रित करने का विधान धर्म का ही है। यदि इन कामों को पारिवारिक और सांस्थानिक रचनाओं के भरोसे छोड़ा जाता तो संभवत: पंचायतें, न्यायालय, दंडाधिकारी और समितियों को उन नतीजों पर पहुंचने में वर्षों लग जाते और न्याय की प्रक्रिया संपन्न होते- होते वह अर्थहीन व अनुपयोगी हो जाते।
इन दिनों परिवार का ढांचा बदल रहा है, संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। कई जगह तो नौकरी के कारण पति-पत्नी और बच्चों के लिए भी अलग तरह से सोचना और व्यवस्था बनानी पड़ रही है। ऐसे में जब कि ज्ञान परंपरा का एक पीढ़ी से दूसरी में प्रवाह बाधित हो गया है तो राम का चरित्र, मूल्य, व्यवहार और आदर्शों की यशोगाथा को समेटे श्री रामचरितमानस/ रामायण जीवन का संविधान बन सकता है।
आज के बड़े-बड़े फैमिली सलाहकार अपनी सलाह में परिवारों में यही अंतिम सत्य बताते हैं कि परिवार वह इकाई है जहां आप तर्कों और जय-पराजय से समाधान नहीं पा सकते अपितु त्याग के द्वारा कर्तव्य पालन करके ही सुख शांति प्राप्त करेंगे। यह मान्यता भारत में त्रेतायुग में ही प्रभु राम के जीवन से स्थापित हो चुकी थी।
राम परिवार के आदर्श-स्नेह, सहयोग, सद्भाव और विश्वास को आधार बनाकर आपसी संबंधों, कर्तव्यों और दायित्वों को समझा और निबाहा जा सकता है। जब राम, लक्ष्मण और सीता वनवास संपन्न कर अयोध्याजी वापस आते हैं तो माता कौशल्या ने मिलते ही सबसे पहले लक्ष्मण से आकुल होकर पूछा कि मुझे दिखाओ तुम्हें शक्ति कहां लगी थी, पुत्र तुम्हें कितनी वेदना से गुजरना पड़ा !
लक्ष्मण जी ने इसका उत्तर दिया, वेदना राघवेन्द्रस्य केवलं व्रणिनो वयम (वाल्मीकि रामायण) अर्थात हमें तो केवल घाव हुआ था, वेदना तो बड़े भाई राम को हुई थी। बस यही राम का सार है की सभी एक-दूसरे के भाव, प्रेम, हर्ष और विषाद में एकरस हो जायें।
राम जी के छोटे भाई भरत जी का चरित्र तो ऐसा है की कहीं-कहीं उनकी श्रद्धा, समर्पण और मर्यादा रूपी हिमालय के आगे रामजी लघु प्रतीत होते हैं। भाई की चरण पादुका से राज चलाना और स्वयं नंदीग्राम में भूमि पर सोना और पर्णकुटी में रहना। राम जी अपने भाई भरत को राजधर्म की सीख देते हुए कहते हैं की, मुखिआ मुखु सो चाहिए यानि मुखिया मुख के समान होना चाहिए, जो स्वयं के पोषण या सुख में अकेला है, परंतु विवेक पूर्वक सब अंगों का पालन-पोषण करता है।
राम और भरत का चरित्र भरत-मिलाप प्रसंग में एक दूसरे के सामने ऐसे अडिग हैं की गोस्वामी तुलसीदास को लिखना पड़ता है धीर धुरंधर धीरजु त्यागा यानि भरत जी के असीम त्याग और मर्यादा के समक्ष धैर्य की धुरी धारण करने वाले श्रीराम को भी अपना धीरज प्रेमाश्रुओं के सामने तोड़ देना पड़ता है।
अयोध्या के एक राजकुमार श्री राम द्वारा सुदूर वन में हनुमान को आभार व्यक्त करने के क्रम में कहा जाता है, मय्येव जीर्णतां यातु यत्त्वयोपकृतं हरे। नर: प्रत्युपकारार्थी विपत्तिमनुकाङ्क्षति॥ (हे कपिकुलनन्दन।) आपने जो मेरे साथ उपकार किया है वह मेरे में ही जीर्ण हो जाय (मुझमें पच जाय), बाहर अभिव्यक्ति का कोई अवसर ही न आवे, क्योंकि प्रत्युपकार करने वाला व्यक्ति अपने उपकारी के लिये विपत्ति की कामना करता है, जिससे उसे अपने प्रत्युपकार के लिए उचित अवसर मिले (वा. रामायण)।
भगवान राम के समय में सनातन संस्कृति के वैचारिक मानदंडों पर विचार करें और उस काल खंड में संसार की अन्य संस्कृतियों के विकास से तुलना करें तो सहज ही आपको यह अनुभव होगा कि राम और अयोध्या के समाज का उत्कृष्ट सामाजिक एवं पारिवारिक मूल्य कितना ऊंचा था और संसार भर में क्यों प्रासंगिक हुआ।
आज पश्चिमी मनोविज्ञान इस स्थिति में पहुंचा जहां दबे स्वर में स्वीकारा जा रहा कि सुख-दु:ख वास्तव में भौतिक संसाधनों पर निर्भर नहीं करते। सुख-दु:ख मनुष्य की अनुभूति के ही परिणाम हैं, उसकी मान्यता, कल्पना एवं अनुभूति विशेष के ही रूप में सुख-दुख का स्वरूप बनता है।
जैसा मनुष्य का भावना स्तर होगा उसी के रूप में सुख-दु:ख की अनुभूति होगी। एक ओर जहां पश्चिमी संसार सुख को परिभाषित करने में भौतिक संसाधनों के अंतहीन दौड़ में लगा है वहीं सनातन धर्म में सुख-दु:ख का विमर्श एक साथ त्रेतायुग से होता आया है। हम मानते हैं कि सुख और दु:ख दो भिन्न अवस्थाएं होते हुए भी एक-दूसरे के पूरक हैं। मृत्युशैय्या पर पड़े हुए दशरथ से मंत्री सुमंत्र कहते हैं;
अर्थात जन्म-मरण, सुख-दु:ख के भोग, हानि-लाभ, प्यारों का मिलना-बिछुड़ना, ये सब हे स्वामी, काल और कर्म के अधीन रात और दिन की तरह बरबस होते रहते हैं। मूर्ख लोग सुख में हर्षित होते और दु:ख में रोते हैं, पर धीर पुरुष अपने मन में दोनों को समान समझते हैं। (मानस)
श्रीराम, कुटुंब प्रबोधन की आवश्यकता:भगवान श्रीराम एवं उनके समाज का चिंतन केवल रावण को मारकर सीता माता की प्राप्ति तक सीमित कर देना उचित नहीं है, जैसा कि आज के डिजिटल विमर्श में चहुंओर दिखाई दे रहा है। आज जब की भारतीय समाज एकजुट होकर श्री अयोध्या जी में प्रभु राम का भव्य मंदिर बना रहा है तो ऐसे में हम सभी को समाज की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी यानी अपने परिवार के प्रबोधन पर विशेष बल देना चाहिए।
ऐसे में राम के सामाजिक, पारिवारिक एवं कर्तव्य आधारित चिंतन का परिवार के साथ प्रतिदिन 10 मिनट बैठकर विमर्श अवश्य करना चाहिए। बच्चों को अगले दिन राम के ऊपर बोलने का चिंतन बिंदु दें जिससे उनके भीतर भी संस्कार की ज्योति जल सके। घर में एक रामचरितमानस रखें और सप्ताह में एक बार पूरा परिवार एक साथ बैठकर उसका पाठ अवश्य करें। (लेखक, धर्म-संस्कृति के अध्येता और प्रभुराम के डिजिटल विश्वकोश रामचरित डॉट इन के फाउंडर हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जब स्त्री और पुरुष शादी के बंधन में बंधते हैं, तो उन्हें इस रिश्ते से कई सारी उम्मीदें होती हैं। शादी लव हो या अरेंज, शुरुआत में हर किसी को यह समझने में थोड़ा वक्त लग जाता है कि यह बंधन कैसा होना चाहिए। कई लोग सोचते हैं कि पति पत्नी रिलेशनशिप में विश्वास और प्यार ही काफी है। यह सच भी है, लेकिन इसके अलावा भी पति-पत्नी के रिश्ते में कई अन्य चीजें जरूरी हैं। पति पत्नी का रिश्ता कैसा होना चाहिए।
जब कोई महिला व पुरुष दोनों ही कानूनी व धार्मिक रूप से एक साथ रहने का वादा करने के बाद शादी के बंधन में बंधते हैं, तो उसे वैवाहिक जीवन का नाम दिया गया है। बता दें कि हिंदू धर्म में विवाह को सोलह संस्कारों में से एक माना गया है, जिसमें दो व्यक्ति जीवनभर साथ रहने का वादा करते हैं। हालांकि, विवाह के बंधन में बंधने के लिए लड़का और लड़की का बालिग होना भी जरूरी है।
प्रेम, त्याग, एक दूसरे की परवाह, विश्वास और एक दूसरे का जीवन भर साथ निभाने जैसी जिम्मेदारियां वैवाहिक जीवन का हिस्सा होती हैं। शोध की मानें तो वैवाहिक जीवन में अगर प्यार, आपसी समझदारी, एक दूसरे के प्रति परवाह, एक दूसरे और एक दूसरे के परिवार के प्रति मान-सम्मान, थोड़े-बहुत सुलह-समझौते, विश्वास हो, तो वैवाहिक जीवन सुखी हो सकता है।
पति-पत्नी का रिश्ता मजबूत होने के साथ नाजुक भी होता है। ऐसे में जीवनभर इस रिश्ते को निभाना आसान नहीं होता। इसलिए, पति पत्नी के रिश्ता कैसा होना चाहिए, नीचे हम इससे जुड़ी जानकारी दे रहे हैं :
टीम एबीएन, रांची। सोशल मीडिया आज की तारीख में दोधारी तलवार है। लेकिन इसके प्रभाव और दुष्प्रभाव पर विमर्श आवश्यक है। भूगर्भ शास्त्र के प्रो उदय कुमार ने कहा कि हम आज की तारीख में सोशल मीडिया को नकार भी नहीं सकते हैं।
स्टूडेंट सर्किल के 26 वें वर्षगाठ के अवसर पर रेडियम रोड रांची स्थित संस्थान के सभागार में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने इसके महत्व को रेखांकित किया। सोशल मीडिया पर मोती और कंकड़ दोनों हैं। अब आप पर निर्भर करता है कि आप क्या चुनते हैं।
उन्होंने बताया कि किस प्रकार सोशल मीडिया पर सूचना प्रकाशित होने से हजारीबाग जिले में स्थित हिमयुग का प्रतीक जो चैक डैम बनने से डूब रहा था, उसे डूबने से बचा लिया गया। सूचना के प्रसार में और सूचना के प्रसार को लेकर हमारे मन में होती जिजीविषा को मुकाम तक पहुंचाने का काम भी सोशल मीडिया बड़े ही बेहतर तरीके से कर रहा है।
उन्होंने स्टूडेंट सर्किल को भी सोशल मीडिया का प्रतीक बताते हुए कहा कि कई लोगों की जमात की बुद्धिमता ने मिलकर जिस प्रकार लोगों के बीच अपने ज्ञान का प्रसार किया उससे प्रसारित करने वाले और इससे लाभ उठाने वाले दोनों का कल्याण हुआ।
इस अवसर पर प्रशासनिक अधिकारी अरविंद लाल ने कहा कि आज संस्थान के हजारों युवा विभिन्न प्रशासनिक पदों पर हैं। ये एक सामाजिक और मानवीय सोच के साथ काम कर रहें है जहां युवाओं का कल्याण समाज में समरसता और समाज के एक बड़े वर्ग की उम्मीद पर खरे उतरे हैं।
आर्थिक लाभ के बजाए सामाजिक सेवा और समाज के उत्तरोतर विकास को ध्यान में रखकर पूरी टीम ने काम किया। मौके पर संस्थान की निदेशिका रश्मि सिन्हा, खान सर, मुरलीधर, आनंद सर सहित कई लोगों ने विचार रखे। संस्थान आने वाले दिनों में प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी के लिए युवाओं का मार्गदर्शन जारी रखेगा।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। दिवाली से दो दिन पूर्व धनतेरस मनाया जाता है, जो इस वर्ष 10 नवंबर को मनाया जा रहा है। धनतेरस का इतिहास बहुत पुराना माना जाता है। यह त्योहार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है तथा इस दिन आरोग्य के देवता भगवान धन्वन्तरि एवं धन व समृद्धि की देवी लक्ष्मी का पूजन किया जाता है।
धन्वंतरि को आयुर्वेद का देवता और देवताओं का चिकित्सक माना गया है, इसलिए धनतेरस चिकित्सकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय इसी दिन धन्वंतरि आयुर्वेद और अमृत लेकर प्रकट हुए थे।
धनतेरस मनाने के संबंध में जो प्रचलित कथा है, उसके अनुसार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन देवताओं और असुरों द्वारा मिलकर किये जा रहे समुद्र मंथन के दौरान समुद्र से निकले नवरत्नों में से एक धन्वंतरि ऋषि भी थे, जो जनकल्याण की भावना से अमृत कलश सहित अवतरित हुए थे।
धन्वंतरि ऋषि ने समुद्र से निकलकर देवताओं को अमृतपान कराया और उन्हें अमर कर दिया। यही वजह है कि धन्वंतरि को आरोग्य का देवता माना जाता है और आरोग्य तथा दीर्घायु प्राप्त करने के लिए ही लोग इस दिन उनकी पूजा करते हैं।
इस दिन मृत्यु के देवता यमराज के पूजन का भी विधान है और उनके लिए भी एक दीपक जलाया जाता है, जो यम दीपक कहलाता है। धार्मिक ग्रथों में यमराज के पूजन के संबंध में एक कथा प्रचलित है। एक बार यमराज ने अपने दूतों से प्रश्न किया कि क्या प्राणियों के प्राण हरते समय तुम्हें कभी किसी प्राणी पर दया भी आयी? यह प्रश्न सुनकर सभी यमदूतों ने कहा- महाराज, हम सब तो आपके सेवक हैं और आपकी आज्ञा का पालन करना ही हमारा धर्म है। अत: दया और मोह-माया से हमारा कुछ लेना-देना नहीं है।
यमराज ने उनसे जब निर्भय होकर सच-सच बताने को कहा, तब यमदूतों ने बताया कि उनके साथ एक बार वास्तव में ऐसी एक घटना घट चुकी है। यमराज ने विस्तार से उस घटना के बारे में बताने को कहा तो यमदूतों ने बताया कि एक दिन हंस नाम का एक राजा शिकार के लिए निकला और घने जंगलों में अपने साथियों से बिछुड़ कर दूसरे राज्य की सीमा में पहुंच गया।
उस राज्य के राजा हेमा ने राजा हंस का राजकीय सत्कार किया और उसी दिन हेमा की पत्नी ने एक अति सुंदर पुत्र को जन्म दिया, लेकिन ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि विवाह के मात्र चार दिन बाद ही इस बालक की मृत्यु हो जायेगी। यह दु:खद रहस्य जानकर हेमा ने अपने नवजात पुत्र को यमुना के तट पर एक गुफा में भिजवा दिया और वहीं पर उसके लालन-पालन की शाही व्यवस्था कर दी गयी और बालक पर किसी युवती की छाया भी नहीं पड़ने दी, लेकिन विधि का विधान तो अडिग था।
एक दिन राजा हंस की पुत्री घूमते-घूमते यमुना तट पर निकल आयी और राजकुमार की उस पर नजर पड़ गयी। उसे देखते ही राजकुमार उसपर मोहित हो गया। राजकुमारी की भी यही दशा थी। अत: दोनों ने उसी समय गंधर्व विवाह कर लिया, लेकिन विधि के विधान के अनुसार 4 दिन बाद राजकुमार की मृत्यु हो गयी।
यमदूतों ने यमराज को बताया कि उन्होंने ऐसी सुंदर जोड़ी अपने जीवन में इससे पहले कभी नहीं देखी थी। वे दोनों कामदेव और रति के समान सुंदर थे। इसीलिए राजकुमार के प्राण हरने के बाद नवविवाहिता राजकुमारी का करुण विलाप सुन उनका कलेजा कांप उठा। घटना का पूर्ण वृतांत सुनने के बाद यमराज ने यमदूतों से कहा कि कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन धन्वंतरि ऋषि का पूजन करने तथा यमराज के लिए दीप दान करने से इस प्रकार की अकाल मृत्यु से बचा जा सकता है।
ऐसी मान्यता है कि उसके बाद से ही इस दिन धन्वंतरि ऋषि और यमराज का पूजन किये जाने की प्रथा आरंभ हुई। धनतेरस के दिन घर के टूटे-फूटे बर्तनों के बदले तांबे, पीतल अथवा चांदी के नये बर्तन तथा आभूषण खरीदना शुभ माना जाता है। कुछ लोग नयी झाड़ू खरीदकर उसका पूजन करना भी इस दिन शुभ मानते हैं। (लेखक, स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। बाघ बकरी कंपनी के मालिक पराग देसाई (49) की स्ट्रीट डॉग्स (लावारिस कुत्तों) के हमले से हुई मौत से देश में नयी बहस शुरू हो गयी है। ऐसी घटनाओं से भारत ही नहीं अपितु दुनिया के अधिकांश देश दो-चार होते आ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय संस्था लैंसेट की हालिया रिपोर्ट की माने तो दुनिया के तमाम देशों में हर साल लावारिस कुत्तों के कारण 59 हजार लोग अपनी जान गंवाते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों को भी इस संदर्भ में देखा जाए तो केवल लावारिस कुत्तों के हमलों से जान गंवाने वालों में हमारे देश की भागीदारी लैसेंट के आंकड़ों में 36 फीसदी के लगभग है। कोरोना काल को अलग कर भी दिया जाये, तो 2021 की तुलना में 2022 में ऐसी घटनाओं में इजाफा हुआ है।
भारत सरकार के संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार 2019 से 2022 के बीच लावारिस कुत्तों के काटने के डेढ़ करोड़ से अधिक मामले सामने आये हैं। यह तो वह आंकड़े हैं जो पंजीकृत हुए हैं। असल आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा होगा। दरअसल, गली-कूचों में घूमने वाले कुत्तों के खिलाफ कोई भी कार्रवाई होती है तो उस पर धारा 428 व 429 के तहत सजा का प्रावधान है।
इसके साथ ही पशु प्रताड़ना का मामला बन जाता है। कुत्तों को प्रताड़ित करने, मारने, जहर देने या अन्य तरह से प्रताड़ित करने पर पांच साल तक की जेल तक हो सकती है। ऐसे में सवाल यह उठ जाता है कि लावारिस कुत्तों से बचाव का क्या रास्ता हो सकता है। देखा जाए तो स्थानीय प्रशासन यानी कि नगर निगम, नगर परिषद, नगर पालिका जैसी संस्थाओं के पास ऐसे कुत्तों को पकड़ने की जिम्मेदारी होती है।
कभी गलियों में घूमने वाली लावारिस गायों को पकड़ने की तरह ही स्ट्रीट डॉग्स को पकड़ने का अभियान भी चलता रहा है। पर अब ऐसे अभियान नहीं दिखते। सवाल लावारिस कुत्तों का ही नहीं अपितु पालतू कुत्तों को लेकर भी इसी तरह से गंभीर है। देश के कई कोनों में पालतू कुत्तों द्वारा लोगों पर आक्रमण करने और काट खाने की घटनाएं भी आए-दिन देखने को मिल रही हैं। समस्या केवल एक जगह की नहीं है।
दरअसल, कुत्तों को पालना आज फैशन भी बनता जा रहा है। लोग ऐसी नस्ल के कुत्ते पालने लगे हैं जिनको देखने मात्र से सिहरन होने लगती है। यह स्टेटस सिंबल बनता जा रहा है। कुत्तों को पालना या नहीं पालना निजी मामला है और इस पर किसी तरह के कमेंट करना भी गलत होगा पर पालतू कुत्तों को खुला छोड़ना और आते-जाते लोगों को काटना गंभीर हो जाता है।
यह भी सब जानते हैं कि कुत्तों के काटने पर समय पर इलाज नहीं कराने पर यह जानलेवा हो जाता है। इससे समस्या की गंभीरता को समझा जा सकता है। देश में हर पांचवें साल मवेशियों और लावारिस जानवरों की गणना होती है। 2019 की गणना के अनुसार देश में लावारिस कुत्तों की संख्या करीब एक करोड़ 53 लाख है।
पशुपालन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार कर्नाटक, ओडिशा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक लावारिस कुत्ते हैं। जहां तक काटने की घटनाओं की बात करें तो 2021 में देश में 17 लाख एक हजार 33 मामले सामने आये। 2022 में यह आंकड़ा 19 लाख 16 हजार 863 रहा। यह अपने आप में चेताने वाले आंकड़े हैं।
कुत्तों के हमलों से बचने के लिए डॉग्स के मनोविज्ञान को भी समझना होगा। होता यह है कि जब आते-जाते व्यक्ति पर कुत्ते आक्रमण करते हैं और आप दोपहिया वाहन चला रहे हैं तो आप वाहन की स्पीड तेज कर देते हैं और इस कारण से कुत्ता भी उसी गति से तेज भागने लगता है और ऐसे में या तो बैलेंस बिगड़ जाने से गिर जाते हैं या कुत्ता आपको पकड़ लेता है और काट खाता है।
ऐसे में मनोविज्ञान यह कहता है कि कुत्ता भौंकने लगे तो स्पीड कम करते हुए उसे डराने का प्रयास किया जाना चाहिए। इससे सामान्यत: कुत्ता शांत हो जाएगा और आपके पीछे भागना बंद कर देगा। यह एक सामान्य धारणा है।
एक बात यह भी साफ हो जानी चाहिए कि कुत्ता काट खाये तो तत्काल डॉक्टर के पास जाएं और जरूरी इलाज कराने में किसी तरह की लापरवाही नहीं बरते। क्योंकि छोटी सी लापरवाही जानलेवा हो सकती है। इस समस्या के समाधान के लिए स्थानीय प्रशासन को भी गंभीर होना होगा। समय-समय पर कुत्तों को पकड़ने का अभियान चलाना होगा।
दूसरी ओर कुत्तों को पालने वालों के प्रति भी सरकार को सख्ती बरतनी होगी। पालतू कुत्तों को सार्वजनिक स्थल या गली-मोहल्ले में घुमाने के दौरान सावधानी बरतना सुनिश्चित कराना होगा ताकि वह हिंसक होकर किसी पर आक्रमण न कर सकें। सावधानी ही बचाव का एकमात्र रास्ता है। इसके अलावा पालतू कुत्तों को भी समय-समय पर टीका लगे, इस पर भी नजर रखने की जरूरत है। स्थानीय प्रशासन को अवेयरनेस कार्यक्रम भी चलाना चाहिए। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। साल 2014 में नरेन्द्र मोदी के भारत के प्रधानमंत्री का पदभार संभालने के साथ राष्ट्र में परिवर्तनकारी विकास का हुआ है। मोदीवाद ने इतने विशाल स्तर पर विकास की संकल्पना को साकार किया, जिसके बारे में भारत ने कभी कल्पना नहीं की थी। उनका नेतृत्व अपने साथ इतने बड़े पैमाने पर विकास का वादा लेकर आया जो भारत ने पहले कभी नहीं देखा था।
मोदी युग का सबसे उल्लेखनीय और पहला पहलू है, बुनियादी ढांचे का विकास। मोदीवाद में स्पष्ट था कि जब तक बुनियादी ढांचे का विकास नहीं किया जाता है, तब तक समेकित विकास की कल्पना करना मुश्किल है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने राजमार्गों, रेलवे, हवाई अड्डों और बंदरगाहों के विकास व निर्माण में भारी वृद्धि देखी।
उदाहरण के लिए, भारतमाला परियोजना का लक्ष्य 6 लाख करोड़ रुपये से अधिक के नियोजित निवेश के साथ देश में सड़क कनेक्टिविटी में सुधार करना था। आज की तारीख में इस पहल से परिवहन की दक्षता में हुआ उल्लेखनीय सुधार देश का हर नागरिक महसूस कर रहा है। इससे लॉजिस्टिक लागत में भी भारी कमी आयी है और अर्थव्यवस्था को बल मिला है।
महत्वाकांक्षी सागरमाला परियोजना का उद्देश्य बंदरगाहों की कार्यशैली में आमूल-चूल बदलाव करना था। परियोजना के तहत वर्तमान बंदरगाहों को भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित किया गया व रणनीतिक दृष्टिकोण से अत्यधुनिक और नये बंदरगाहों का निर्माण किया गया। केरल का विझिंजम बंदरगाह इसका साक्षात उदाहरण है। सागरमाला परियोजना का उद्देश्य समुद्री व्यापार को प्रोत्साहन देने के साथ बंदरगाहों और भीतरी इलाकों के बीच कनेक्टिविटी में सुधार लाना है, जो समग्र विकास के लिए मोदी के दृष्टिकोण का प्रमाण है।
2015 में शुरू किया गया डिजिटल इंडिया अभियान गेम-चेंजर रहा है। इसका उद्देश्य नागरिकों को इलेक्ट्रॉनिक रूप से सरकारी सेवाएं और जानकारियां प्रदान करना है और दक्षता तथा पारदर्शिता सुनिश्चित करने के साथ भ्रष्टाचार पर लगाम कसना है। बायोमीट्रिक पहचान प्रणाली आधार और वित्तीय समावेशन कार्यक्रम जन धन योजना जैसी पहल ने लाखों लोगों को औपचारिक अर्थव्यवस्था में शामिल करने में मदद की है। ये मोदीवाद के दूरदर्शी दृष्टिकोण से ही संभव हो सका कि विमुद्रीकरण के माध्यम से कम नकदी वाली अर्थव्यवस्था की ओर कदम बढ़े और यूपीआई जैसे डिजिटल भुगतान प्लेटफार्मों की वृद्धि ने भारतीयों के लिए अपने वित्त को संभालने के तरीके बदल दिये।
विनिर्माण को बढ़ावा देने और भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए मेक इन इंडिया पहल शुरू की गयी। मेक इन इंडिया का दोहरा उद्देश्य था। पहला, घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहित करके लोगों की आमदनी बढ़ाना और दूसरा विदेशी निवेश को आकर्षित करना। दोनों उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए नियमों को सरल बनाया गया। परिणाम निकला कि उत्पादन और नौकरी के अवसर लगातार बढ़ रहे हैं तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में लगातार वृद्धि हो रही है, जिससे देश के आर्थिक विकास में योगदान हो रहा है। विनिर्माण क्षेत्र को इतना ध्यान, समर्थन और ब्रॉन्डिंग कभी नहीं दिया गया, जितना मोदी के नेतृत्व में दिया गया। कह सकते हैं कि मेक इन इंडिया पहल आत्मनिर्भरता की ओर तेज कदम के साथ-साथ भारत को विनिर्माण पावर हाउस में बदलने में भी सहायक रही है।
स्वच्छ भारत अभियान या स्वच्छ भारत मिशन, भारत के इतिहास में सबसे उल्लेखनीय सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों में से एक है। 2014 में लॉन्च किए गए स्वच्छ भारत अभियान का उद्देश्य बेहतर स्वच्छता सुनिश्चित करते हुए भारत को खुले में शौच से मुक्त बनाना था। इस पहल से शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों की स्वच्छता में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। स्वच्छ भारत अभियान ने स्वच्छता के प्रति प्रतिबद्धता के नए स्तर को चिह्नित किया है। स्वच्छता की प्रेरणा ने वैज्ञानिक रचनात्मकता को बायो-टॉयलेक्ट्स जैसे नवाचारों के लिए प्रेरित किया है। जागरुकता अभियानों के साथ-साथ लाखों शौचालयों के निर्माण ने भारतीय आबादी के जीवन व स्वास्थ्य पर अत्यंत सकारात्मक प्रभाव डाला है।
मोदीवाद का लक्ष्य हरित व नवीकरणीय ऊर्जा है। देश को इस दृष्टिकोण का संकेत मोदी काल के पहले ही मिल चुका था। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने कच्छ में 250 मेगावॉट के सोलर पार्क का निर्माण कराया था। उस समय किसी ने कल्पना नहीं की थी कि सौर ऊर्जा भारत ही नहीं पूरे विश्व को ऊर्जा समस्या के निदान की राह दिखाने में सक्षम है। मोदी सरकार के तहत राष्ट्रीय सौर मिशन ने 2022 तक 100 गीगावॉट सौर ऊर्जा उत्पन्न करने का लक्ष्य प्राप्त किया है।
भारत ने 2030 तक आवश्यकता की 50 प्रतिशत ऊर्जा गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य रखा है। लेकिन जिस रफ्तार से नवीकरणीय ऊर्जा का विकास हो रहा है, उससे समय-पूर्व लक्ष्य प्राप्त करने के पूरे आसार हैं। विद्युत वितरण में ऊर्जा ह्रास की समस्या गंभीर रही है। इस समस्या से निपटने और हरित विद्युत वितरण में सुधार के लिए उज्ज्वल डिस्कॉम इश्योरेंस योजना (उदय) योजना शुरू की गयी। इसी क्रम में विद्युत वाहनों को प्रोत्साहन देना मोदी वाद के विकास वाद का अगला चरण है।
देश में विद्युत वाहनों को प्रोत्साहन देने और वाहनों के लिए कम लागत पर बेहतर लीथियम आधारित बैटरी के उत्पादन के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव या पीएलआई को मंजूरी दी गयी है। जल्द इसका उत्पादन आरंभ हो जायेगा। दस वर्ष पूर्व से तुलना करें तो देश में नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन और ऊर्जा सुधारों के पैमाने और कार्यान्वयन में भारी परिवर्तन दिख रहा है।
मेक इन इंडिया अभियान की शुरुआत हुई महत्वपूर्ण आर्थिक सुधार, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करने के साथ। विभिन्न मदों में लगने वाले करों को एक ही मद में सन्निहित कर जनता की परेशानियों को दूर किया गया। इसे सिंगल विंडो कर भी कह सकते हैं। जीएसटी मोदी सरकार के लागू किये गये कई महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों में सबसे उल्लेखनीय है।
अन्य महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों में स्टार्टअप इंडिया का उल्लेख करना प्रासंगिक है, जिसका उद्देश्य देश में उद्यमिता और नवाचार को बढ़ावा देने के साथ स्वरोजगार के अवसर उत्पन्न करना है। इन आर्थिक सुधारों और प्रोत्साहनों ने भारत के अंदरुनी और बाहरी व्यापार को आसान बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आज की तारीख में भारत निवेशकों का आकर्षक गंतव्य बन चुका है। यह मोदी युग में आर्थिक सुधारों की व्यापकता और प्रमुखता का परिणाम है।
मोदीवाद के विकासवाद में एक बात बिल्कुल स्पष्ट है। राष्ट्र के विकास की धुरी व्यक्ति का विकास है। व्यक्ति का विकास होगा तो समाज का विकास होगा और समाज विकसित होगा तो राष्ट्र विकास के मार्ग पर अग्रसर होगा। इसे ध्यान में रखकर समय-समय पर समाज कल्याण की कई योजनाएं आरंभ की गयीं, जैसे प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (आयुष्मान भारत), एक स्वास्थ्य बीमा योजना, और प्रधानमंत्री आवास योजना, जिसका उद्देश्य गरीबों को किफायती आवास प्रदान करना है। मोदी सरकार के प्रयासों ने नवाचार और अंतिम मील तक पहुंचने के लिए बढ़ी हुई प्रतिबद्धता सुनिश्चित की है। यह सुनिश्चित हुआ है कि हर योजना का लाभ उन लोगों तक पहुंचे, जिन्हें उनकी सबसे अधिक आवश्यकता है।
मोदीवाद के विकासवाद का आधार विशाल पैमाना, तीव्र महत्वाकांक्षा और नवीन तथा दूरगामी दृष्टिकोण हैं। समग्र विकास का आयाम सिर्फ राष्ट्र की सीमाओं तक ही सीमित नहीं। मूलभूत अवधारणा संपूर्ण मानवता की सेवा है। विश्व के विभिन्न हिस्सों की भाषाएं भिन्न-भिन्न हैं। कोरोना काल में सम्पूर्ण मानवता की निस्स्वार्थ सेवा की अवधारणा, वसुधैव कुटुम्बकम दुनिया के हर देश को उनकी भाषा में समझ में आ गयी।
इसी अवधारणा का एक स्वरूप सक्रिय विदेश नीति है, जो वैश्विक परिप्रेक्ष्य में दिनों दिन भारत को महत्वपूर्ण स्थान दिलाने में सफलता प्राप्त कर रही है। जी-20 के अध्यक्षता काल ने विश्व पटल पर भारत की विविधता को उजागर किया है। दुनिया अब भारत को कंट्री ऑफ स्नेकचार्मर्स या डेवलपिंग कंट्री के रूप में नहीं देखती।
विश्वपटल पर भारत उस सम्मानजनक मंच पर विराजमान है, जहां भारत की पहल पर बेहतर वैश्विक स्वास्थ्य के लिए अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है और भारत की पहल पर वैश्विक खाद्य समस्या के समाधान के अंतरराष्ट्रीय बाजरा वर्ष मनाया जाता है। यह मोदीवाद की धुरी पर विकासवाद का अंतरराष्ट्रीय पैमाना है। निश्चित रूप से पैमाने की इस धुरी पर विकासवाद को उज्ज्वल भविष्य का आकार मिलने जा रहा है। (लेखक, पूर्व राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी भाजपा किसान मोर्चा हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मैंने कुछ दिन पहले एक विद्वान को संघर्ष पर बोलते सुना था और उसके बाद यह मैंने काफी विचार किया। तो पाया कि उस विद्वान ने कुछ ऐसी बातें कहीं थी, जो कुछ हद तक सही थी।
उस विद्वान ने कहा था कि प्रायः जब भी हम अपने से जूनियर को या बच्चों को मिलते हैं, तो हम उन्हें आशीर्वाद देते हैं कि वे जीवन में बहुत सफल हो और जीवन में उन्हें कोई कठिनाई न हो। सब कुछ उनके रास्ते में आसानी से हो जाये और जीवन में वे बहुत आसानी से आगे बढ़ें।
जीवन में एक बात तो पक्की है कि सफलता उसी को मिलती है जो जीवन में संघर्ष करता है। अगर हमने जीवन में संघर्ष नहीं किया है, तो हमें सफलता भी नहीं मिलेगी। जीवन में सुलझने के लिए उलझना जरूरी है; जो जीवन में उलझेगा नहीं, वह सुलझेगा भी नहीं।
कई वैज्ञानिकों ने कहा है कि जब तक वे फेल नहीं हुए, वे अच्छा प्रोडक्ट नहीं बना पाये। अभी भारत का चंद्रयान चांद पर लैंड कर गया। अब याद करिये, इसरो ने यह सफलता चौथी बार में प्राप्त की। बल्कि जो तीसरी बार इसरो फेल हुआ था, वह तो दो वर्ष पूर्व ही हुआ था। अगर इसरो वह दो-तीन बार फेल नहीं करता, तो वह उन छोटी-छोटी बातों का ध्यान नहीं रखता। जिसने इस बार चंद्रयान को चंद्रमा में उतरने के लिए पूरा सहयोग दिया।
याद रखें, कि जब हम जीवन में असफल होते हैं या जीवन में हम जब संघर्ष करते हैं, तो जीवन में आगे बढ़ने की हमारी क्षमता और मजबूत होती है। हमारे इरादे और मजबूत होते हैं और हम जीवन में आगे बढ़ते हैं।
कहा जाता है कि अब्राहम लिंकन के जीवन में बहुत बाधाएं आयीं। वे जीवन में हर संघर्ष में फेल होते थे, हर चुनाव में वे पहले हारते थे, पर वे बाद में जीत जाते थे।
वे फेल करते रहे, हारते रहे और अंत में जाकर अमेरिका के राष्ट्रपति बने। अमेरिका में तो कितने राष्ट्रपति आये और गये, जिनका हमें नाम भी याद नहीं है। पर अब्राहम लिंकन को हम याद आज भी याद रखते हैं। वैसे ही थॉमस एडिसन के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने जब बल्ब बनाया, तो उसके पूर्व 9999 बार फेल हो चुके थे और उन्होंने बाद में कहा कि अगर मैं इतनी बार फेल नहीं होता, तो मैं बल्ब नहीं बना सकता। मुझे इतनी बार फेल होने के बाद पता चला कि 9999 तरीकों से बल्ब नहीं बनता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि अगर अपने बच्चों को हम चाहते हैं कि वे सफल हों, तो हमें उन्हें आशीर्वाद देना चाहिए कि जीवन में सफल हों, पर सफलता आसानी से न आये। सफल तुम जरूर हो पर सफलता के लिए तुमको संघर्ष करना पड़े। हमें उन्हें बोलना चाहिए कि तुम वह सोना हो कि जब तक तुम गलोगे नहीं तुम किसी के गले का आभूषण नहीं बन पाओगे। हमें अब अपने बच्चों का आशीर्वाद देने का तरीका बदलना चाहिए। उन्हें सफलता के साथ-साथ संघर्ष करने का आशीर्वाद भी देना चाहिए। उन्हें जीवन में उलझने का आशीर्वाद देना चाहिए, तभी वे जीवन में सुलझ पायेंगे। (लेखक झारखंड की राजधानी रांची के प्रख्यात मोटिवेटर हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। शेयर बाजार में जिस तेजी से नए डीमैट अकाउंट खुल रहे हैं, वह स्पष्ट रूप से लोगों के विश्वास का ही परिणाम है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के प्रति लोगों के विश्वास को आमजन के वित्तीय निवेश को लेकर देखा जा सकता है। देश के शेयर बाजार में लगातार इस मायने में बूम देखा जा रहा है।
चालू कलैंडर वर्ष के हर महीने लाखों नये डीमैट खाते खुल रहे हैं। इसी कलैंडर वर्ष की बात की जाए तो जनवरी से अब तक दो करोड़ से अधिक नए डीमैट खाते खुले हैं। अकेले सितंबर में करीब 30 लाख 60 हजार नए डीमैट खाते अस्तित्व में आए हैं। इससे पहले अगस्त में इस साल के सर्वाधिक 31 लाख नए खाते खुले।
इसी तरह से गये महीने 10 आईपीओ बाजार में आए हैं और इनमें निवेशकों ने दिल खोलकर पैसा लगाया है। इन 14 आईपीओ के माध्यम से कंपनियों ने 11868 करोड़ रुपये जुटाये हैं। यदि देखा जाये तो दिसबंर 2010 के बाद सबसे अधिक आईपीओ बाजार में आये हैं।
समग्र रूप से देखा जाये तो इस साल जनवरी से सितंबर तक 34 आईपीओ के माध्यम से कंपनियों ने निवेशकों से 26913 करोड़ रुपये जुटाये हैं। सभी आईपीओ ओवर सब्सक्राइब रहे हैं।
यह सब तो तब है तब है जब आज दुनिया के देश आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं। पर यह साफ हो जाता है कि शेयर बाजार में लगातार नये खाते खुलना और आईपीओ को अच्छा समर्थन मिलना इस बात का संकेत है कि देश की अर्थ व्यवस्था को लेकर लोगों में किसी तरह का नकारात्मक विचार नहीं है।
बल्कि यह कहा जाना उचित होगा कि लोगों का देश की अर्थव्यवस्था व देश के आर्थिक हालातों के प्रति विश्वास कायम है। दरअसल, कोरोना के बाद जिस तरह के हालात हुए और देश-दुनिया की आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हुईं उससे लोगों में अर्थव्यवस्था को लेकर अनेक आशंकाएं हुईं और इसमें भी कोई दोराय नहीं कि दुनिया के अधिकांश देश आर्थिक संकट के दौर से गुजरे और आज भी गुजर रहे हैं।
कोढ़ में खाज का काम पिछले लंबे समय से चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध ने किया। अब इजराइल और हमास के ताजा हमलों से नया संकट सामने आ गया है। इससे सबके साथ ही दुनिया के अधिकांश देशों में हालात अच्छे नहीं चल रहे हैं।
चीन की नीतियों से दुनिया के देश त्रस्त है सो अलग। इसके अलावा आंतकवादी घटनाएं, जलवायु परिवर्तन के कारण आये दिन आने वाले तूफानों, अनावृष्टि, अतिवृष्टि, मौसम की बेरुखी आदि को किसी भी हालात में सब कुछ ठीक नहीं माना जा सकता है।
इन सब हालातों के बीच देश की अर्थव्यवस्था के प्रति लोगों के रुख को दो दृष्टि से समझना होगा। एक ओर बैंकों में बचत की भावना में गिरावट दर्ज हो रही है। एक समय था जब हमारी परंपरा में बचत को खास महत्व दिया जाता था आज हालात ठीक विपरीत है।
बचत की तुलना में वित्तदायी संस्थाओं से कर्ज लेने वालों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। दूसरी ओर शेयर बाजार जिसे हमेशा से अस्थिर समझा जाता रहा है और जो राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सर्वाधिक जोखिम भरा निवेश माना जाता रहा है, आज देश का मध्यम वर्ग खासतौर से युवा पीढ़ी जोखिम भरे शेयर बाजार में बेहिचक निवेश करने को आगे आ रही है।
हालांकि इसके पीछे शेयर बाजार में एक कारण आकर्षक रिटर्न को माना जा रहा है तो दूसरी और अन्य क्षेत्रों में अधिक अस्थिरता देख रहे हैं। हालांकि इसमें कोई दोराय नहीं होनी चाहिए कि शेयर बाजार सबसे जोखिम भरा है, पर जिस तरह से प्रति माह नित नए डीमैट अकाउंट खोले जा रहे हैं और जिस तरह से आईपीओ को रेस्पांस मिल रहा है।
उससे साफ हो जाता है कि आज की पीढ़ी लाख रिस्क होने के बावजूद जोखिम भरे रास्ते को चुन रही है। इससे यह तो माना जा सकता है कि निवेशकों खासतौर से मध्यम वर्ग का शेयर बाजार पर पूरा विश्वास जम रहा है।
हालांकि शेयर बाजार अंतरराष्ट्रीय हालातों से भी प्रभावित होता है। इसके साथ ही मिनट दर मिनट रिस्क भरा होता है। फिर भी लोगों द्वारा इस पर विश्वास व्यक्त करना कहीं आने वाले समय में संकट का कारण नही बन जाये।
सेबी, एनएसडीएल आदि संस्थाओं को इस पर लगातार पैनी नजर रखनी होगी। क्योंकि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को सबसे अधिक मध्यम वर्ग प्रभावित करता है और मध्यम वर्ग ही जोखिम में पड़ जाए तो हालात बिगड़ने में देर भी नहीं लगेगी, ऐसे में बाजार पर नजर रखने वाली संस्थाओं को अपनी मॉनेटरिंग व्यवस्था को और अधिक इफेक्टिव बनाना होगा ताकि हालात हाथ से बाहर न हो सकें।
इसलिए जहां नये डीमैट खाते खुलना, शेयर बाजार में देशवासियों की हिस्सेदारी बढ़ना, निवेश बढ़ना अच्छी बात है, वहीं कंपनियों की गतिविधियों और शेयर बाजार को प्रभावित करने वाली ताकतों व संस्थाओं व गतिविधियों पर पूरा ध्यान रखना होगा ताकि शेयर बाजार के निवेशकों के हितों को सुरक्षित रखा जा सके। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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