एबीएन एडिटोरियल डेस्क। देश में अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक दलों ने अपनी कमर कस ली है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन इस बार और बेहतर प्रदर्शन करने की दिशा में आगे बढ़ चुका है। विपक्ष भी आईएनडीआईए बनाकर हुंकार भर रहा है। वर्ष 2023 में हुए कुल नौ राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक व तेलंगाना में विजय प्राप्त हुई है। मगर इस गठबंधन में कई पेंच इतनी बुरी तरह से उलझ गये हैं कि सुलझना कठिन होता जा रहा है।
भाजपा राम मंदिर, सनातन संस्कृति के उत्थान और विकसित भारत संकल्प यात्रा के बल पर लगातार आगे बढ़ती जा रही है। मगर विपक्ष का गठबंधन अभी तक चार बैठकों के बावजूद संयोजक का नाम तक तय नहीं कर पाया है। 19 दिसंबर को बैठक में कांग्रेस ने गठबंधन में शामिल दलों से सीट साझा करने पर चर्चा करने के लिए एक पांच सदस्यीय कमेटी का गठन किया है।
जब दो राज्यों हिमाचल प्रदेश व कर्नाटक में कांग्रेस को सफलता मिली तब कुछ विश्लेषकों को ऐसा लगने लगा कि प्रधानमंत्री मोदी का जादू उतरने लगा है और कांग्रेस के नेतृत्व में संपूर्ण विपक्ष के मन में आशा का एक नया संचार हुआ है किंतु राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम का रिजल्ट आते ही इन विश्लेषकों को सांप सूंघ गया। मध्य प्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ में भाजपा की ऐतिहासिक विजय ने विपक्ष की बोलती बंद कर दी।
अगले साल 22 जनवरी को अयोध्या में बन रहे भव्य राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह की तैयारियां चल रही हैं। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट ने इसके लिए सोनिया गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, मल्लिकार्जुन खड़गे, वामपंथी नेता सीताराम येचुरी सहित कई विपक्षी नेताओं को निमंत्रण भेजा। अभी यह पक्का नहीं है कि सनातन विरोधी इस गठबंधन के नेता अयोध्या जाते हैं या नहीं।
माना तो यही जा रहा है कि इनमें से कई नहीं जायेंगे। सबसे ज्यादा फजीहत इस गठबंधन की साथी समाजवादी पार्टी की होनी है। कौन नहीं जानता रामभक्त कारसेवकों पर मुलायम सिंह यादव ने ही गोली चलवाई थी। मुस्लिम-यादव गठजोड़ से सत्ता पाने वाले उनके पुत्र और सपा नेता अखिलेश यादव समारोह में चले जाते हैं तो उनके एम-वाई समीकरण को गहरा आघात लगना तय है।
राम मंदिर निर्माण के समर्पण अभियान पर सपा नेताओं ने संघ व भाजपा को चंदाजीवी कहकर अपमानित किया है। आम आदमी पार्टी ने दो कदम आगे जाकर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के चंपत राय पर जमीन घोटाले के फर्जी आरोप लगा दिये। वास्तविकता यह है कि आज इस पार्टी के कई बड़े नेता मनीष सिसोदिया, संजय सिंह व सुरेंद जैन सलाखों के पीछे हैं।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कथित शराब घोटाले के मुख्य किरदार बताये जा रहे हैं। ईडी का सामना तक नहीं कर पा रहे। आईएनडीआईए गठबंधन में शामिल सभी दल व नेता हिंदू सनातन संस्कृति, भारतीय सभ्यता व संस्कृति, भाषा, रहन सहन व खानपान के घोर विरोधी हैं। सभी नेता मुस्लिम तुष्टिकरण, ईसाइयत और पश्चिमी सभ्यता के आकंठ डूबे हुए हैं।
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ व राजस्थान में पराजय के बाद विरोधी दलों के नेता संतुलन ही खो बैठे हैं। द्रमुक नेता तो सनातन धर्म का उन्मूलन करने का प्रण तक ले चुके हैं। गठबंधन के बड़े सरमायेदार मोहब्बत की दुकान खोलने वाले राहुल गांधी खामोश हैं।
आज राममला की प्राण- प्रतिष्ठा समारोह में जाना कांग्रेस के लिए सांप- छछूंदर की गति जैसा हो गया है। जायेंतो मुश्किल और न जाए तो भी मुश्किल। कांग्रेस के नेतृत्व में बने गठबंधन के सभी नेता हिंदू धर्म का जमकर मखौल उड़ा चुके हैं। कांग्रेस तो भगवान राम का अस्तित्व ही नकार चुकी है। ज्ञानवापी में मिले शिवलिंग को फव्वारा तक कहा जा चुका है।
संसद के दोनों सदनों में विपक्षी सदस्यों के सामूहिक निलंबन की ऐतिहासिक घटना के बाद ममता बनर्जी की टीएमसी के सांसद कल्याण बनर्जी संवैधानिक पद पर विराजमान उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड का मजाक बना चुके हैं। वह बार- बार कह रहे हैं कि उपराष्ट्रपति धनखड़ का हजार बार मजाक उड़ायेंगे। संसद के शीतकालीन सत्र में द्रमुक सदस्य ने गौमाता का अपमान करते हुए बयान दिया कि भाजपा केवल गोमूत्र वाले राज्यों में ही है।
अभी डीएमके नेता दयानिधि मारन ने बयान दिया है कि उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग सिर्फ हिंदी सीखते हैं और इसके बाद तमिलनाडु मजदूरी करने के लिए आते हैं। वो शौचालय और सड़कों की सफाई जैसे काम करते हैं। गठबंधन की पिछली बैठक में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हिंदी में भाषण दिया तो द्रमुक नेता टीआर बालू ने उनके भाषण का अंग्रेजी अनुवाद मांग लिया। इससे नीतीश कुमार नाराज हो गये।
अब यह साफ हो चुका है कि 26 दलों के इस गठबंधन के सभी नेताओं में घोर विरोधाभास है। यह सभी दल भ्रष्टाचार के दलदल में अथाह डूबे हुए हैं और गिरफ्तारी से बचने के लिए नये- नये पैंतरे चल रहे हैं । दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के मंत्रियों के यहां लगातार छापे पड़ रहे हैं।
यह सरकार गीता समारोह का मजाक उड़ा चुकी है । झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर भी गिरफ्तारी की तलवार लटकी है। इन लोगों ने गांधी परिवार को दरकिनार कर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को सुनियोजित साजिश के तहत प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। बेकारे में अभिसार, पुण्य प्रसून, रविश वगैरह को लोग प्रबुद्ध पत्रकार मान बैठे थे। हकीकत में सब के सब रंगा सियार निकले। जैसे ही नेशनल चैनलों से ये भगाये गये इनका ऊपरी मुलम्मा उतर गया।
एक जानकार पत्रकार काम नहीं रहने पर भी क्या नाच गाने भांड़ लबाड़ का प्रचार करने लगेगा? आज अभिसार को हमेंशा सिर्फ डंकी फिल्म का गुणगान करते देखते हैं तो लगता है, ये पत्रकार कैसे बना था?
पुण्य प्रसून अपने यूट्यूब चैनल पर बेसिर पैर का इतना फेंकते रहता है कि कुछ पल्ले नहीं पड़ता। आज भी किसी मुद्दे पर वही घीसा पिटा लगातार बकवास करता है। उसे सुनकर लगता है कि डिजिटल युग में ये कैसेट टेपरिकार्डर की तरह बज रहा है।
रविश कुमार अब उस डिब्बाबंद एक्सपायर खाने की तरह है जिसकी पैकिंग अच्छी है, पर अंदर सामग्री विष हो चुकी है। हर बार वही भारत-विरोधी, बहुसंख्यक विरोधी, सरकार विरोधी चपड़ चपड़। दुष्प्रचार और झूठ को अच्छे शब्दों में गंभीरता से पेश करना इसका पेशा है। याद कीजिये कोरोना काल में यह श्रीमान केरल माडल की तारीफ में कसीदे पढ़ रहे थे और जब केरल में कोरोना विस्फोट हुआ तो चुप्पी साध लिये।
दरअसल, इन पत्रकारों को टीवी मीडिया में औकात से ज्यादा वैल्यू मिल जाता है और अब हाशिये पर खदेड़ाने के बाद रेवेन्यू के लिये किसी भी हद तक जा रहे हैं, औसत सिनेमा और एक्टर एक्ट्रेस का कशीदा पढ़ रहे हैं।
वर्तमान में भी ढेर हैं जिन्हें आज टीवी मीडिया से हटा दिया जाये तो इनका असली रूप सामने आ जायेगा। मैं दावे से कहता हूं कि रविश, पुण्य प्रसून, अभिसार से बहुत ज्यादा हकीकत पसंद गुणी युवा पत्रकार झारखंड में ही हैं और बेशक उनमें रांची विश्वविद्यालय मास कौम विभाग से पढ़े हुए हमारे छात्र भी हैं, कोई शक? (लेखक पत्रकारिता विभाग से जुड़े हुए हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। यह घटना उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की जरूर है पर देश के लिए नयी नहीं है। मैं स्वयं कई जगह ऐसी घटनाओं पर संज्ञान लेकर पीड़ित एवं उनके परिवारजन से मिलने गयी हूं। देश में आये दिन ऐसी अनेकों वारदात हो रही हैं। इनमें जो समानता है- वह है, विकृत मानसिकता और किसी-किसी घटना में विपरीत लिंग के प्रति संबंध बनाने की जिज्ञासा।
कई जानबूझकर इसके शिकार बनाये जा रहे हैं और अनेक बिना जाने कौतूहलवश इसके चंगुल में फंस अपराध कर रहे हैं। प्रश्न है आखिर इसके लिए दोष किसे दिया जाये? क्या परिवार को दोषी माना जाये? जिसकी परवरिश में कमी है। क्या संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था को दोषी ठहराया जाये? जो यह नहीं सिखा पा रही कि अपने आयुवर्ग या अन्य भी किसी के साथ कैसे व्यवहार करना है। क्या इसका दोषी संपूर्ण समाज है? या फिर इस प्रकार के आ रहे मामलों के लिए राज्य एवं केंद्र की सरकार दोषी हैं? जिनका काम कानून व्यवस्था को बनाये रखना है।
बलिया में घटी घटना में किशोर ने जो कहानी बतायी, वह चौंकाने वाली है। उससे यह सहज पता चलता है कि आखिर हमारे बच्चे मोबाइल में गेम खेलने के साथ वह सब भी देख रहे हैं जो कि उन्हें अभी अवयस्क रहते हुए नहीं देखना चाहिए। मेरा मानना है कि वयस्क होने पर भी इन सब से दूर ही रहना चाहिए। इस 14 साल के किशोर ने बताया कि कैसे पिता के मोबाइल में उसने अश्लील वीडियो देखा। पश्चात उसके मन में गलत ख्याल आने लगे।
जब ये घटना घटी तब दोनों ही खेल रहे थे, फिर खेलते-खेलते किशोर उसे एक सुनसान जगह पर ले गया। जहां उसने बच्ची के साथ दुष्कर्म किया। इस दौरान बच्ची की हालत बिगड़ गयी, यह देख किशोर बच्ची को उसी हालत में छोड़ भाग गया। खून से लथपथ बच्ची घर पहुंची तो परिजनों के होश उड़ गये। फिर पुलिस की कार्रवाई और आगे किशोर के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 और पोक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया।
जिस बच्ची के साथ यह घटना घटी वह अभी भी सदमे में है। आगे जो होना है वह इस केस में भी होगा। कानून अपना काम करेगा और जिसे सजा मिलनी है वह भी दी जायेगी। किंतु फिर वही प्रश्न घूम फिरकर सामने आ जाता है कि आखिर भारतीय समाज में इस प्रकार की वारदातें घट क्यों रही हैं? नाबालिग इसके शिकार हो रहे हैं और हमारी तमाम संवैधानिक एवं सामाजिक संस्थाएं भी मिलकर इन्हें रोकने में नाकामयाब साबित हो रही हैं!
भला कौन है इसके पीछे दोषी? तो कहीं न कहीं दोषी तो हम सभी हैं। स्वभाविक तौर पर देखा जाए तो सुधार की यह प्रक्रिया आज परिवार से शुरू करते हुए समाज एवं कानून के स्तर पर सरकारों तक जाने की आवश्यकता है। यह हाल में आया आंकड़ा है जिसमें बताया गया कि भारत में 2018 के बाद से पॉर्न वीडियो देखने वालों की संख्या बड़ी तेजी के साथ बढ़ रही है। लगभग 75 फीसदी की इसमें वृद्धि हुई है। इसके साथ ही भारत में मानसिक रोगियों और यौन अपराध के ग्राफ में वृद्धि देखी गई है।
हां, केंद्र सरकार के इस दिशा में प्रयास जरूर बीच में कुछ समय के लिए प्रभावी दिखे, जिसमें कि भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई ) की सख्ती और पोर्न वेबसाइट्स को ब्लॉक करने के बाद भारत दुनिया में तीसरे स्थान से 12वें स्थान पर पहुंच गया था। किंतु तथ्य यह है कि आज देश की कुल आबादी में करीब 10 करोड़ की आबादी पॉर्न वेबसाइट के लत में है। 10 करोड़ की आबादी में करीब 3 करोड़ बच्चे और 7 करोड़ वयस्क पॉर्न वेबसाइट की चपेट में हैं।
यह सही है कि सरकार ने पोर्नोग्राफी पर प्रतिबंध लगाते हुए एक हजार से अधिक वेबसाइट्स पर प्रतिबन्धित लगाया, लेकिन वह भी कारगर नहीं रहा, क्योंकि कई वेबसाइट अन्य नाम से फिर से इंटरनेट पर आ गयी। सजा के सख्त नियम हैं, फिर भी यह अपराध भारतीय समाज में फलफूल रहा है। समाज एवं देश में व्याप्त होती यह गंदगी रुकने को तैयार नहीं और छोटे बच्चे लगातार इसके शिकार बन रहे हैं।
आज हम 2023 के आखिरी महीने में हैं। इस साल सबसे ज्यादा अश्लील फिल्में किसने देखीं? पोर्नहब के अध्ययन में सामने आया कि फिलीपींस ने। दूसरा स्थान पोलैंड का है। भारत इस सूची में तीसरा है। हालांकि कहने वाले बचाव में यह कह सकते हैं कि भारत, सबसे अधिक आबादी वाला देश होने के नाते, स्वाभाविक रूप से अन्य कम जनसंख्या वाले देशों की तुलना में उच्चतम अनुपात दिखाता है। लेकिन यहां सोचिये; क्या इस प्रकार बोलकर अपनी कमियों पर पर्दा डालना उचित होगा?
इस सूची में अगले स्थान पर वियतनाम, तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान हैं। मोरक्को, ईरान और जर्मनी क्रमश: 8वें, 9वें और 10वें स्थान पर हैं। पॉर्न हब की यह रिपोर्ट चेता रही है कि 11 से 16 साल के 53 फीसदी बच्चे पॉर्न वीडियो देख रहे हैं। इसमें भी चौंका देनेवाली बात यह है कि भारत में पोर्न देखने वाले कुल उपभोक्ताओं में महिलाओं की भागीदारी 30 फीसदी है, जो कि विश्व में सबसे ज्यादा है। यानी कि सिर्फ पुरुष समाज को ही इसके लिए पूरी तरह से दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। महिलाएं स्वयं भी इस अपराध के लिए उनके साथ बराबर की हिस्सेदार हैं।
वास्तव में यह डरावना सच हमें अपने वर्तमान और भविष्य के प्रति सावधान होने के लिए कह रहा है । बाल संरक्षण आयोग एवं अन्य संवैधानिक संस्थाएं अपराध होने पर उसे संज्ञान में लेकर उस पर कार्रवाई के लिए प्रयास कर सकती हैं, किंतु असली कार्य तो अपराध को रोकने का परिवार एवं समाज को ही करना है, जहां से अपराध की शुरूआत होती है।
कार्टून, फिल्म और ओटीटी पर वेबसीरीज बनाने वाले लोग इसी समाज से आते हैं जो द्विअर्थी संवाद एवं बहुत कुछ हिंसात्मक, भाषायी रूप से अश्लील एवं घटिया सामग्री नित-रोज परोस रहे हैं। कार्टून के बीच में कंडोम के विज्ञापन आना बता रहा है कि ट्राई या अन्य नियामक संस्था का किसी को कोई डर नहीं है।
मैं फिर कहूंगी कि बच्चे भोले मन के होते हैं, वह जो देखते और समझते हैं आगे वैसा ही व्यवहार करते हैं। ऐसे में सरकार इतना तो कर ही सकती है कि जितनी भी इस तरह की सामग्री इंटरनेट पर सर्च सांकेतिक भाषायी (की) से सर्च होती है, उन सभी पर रोक लगा दे। जो बाजार की जरूरत के नाम पर ओटीटी या इसी प्रकार के अन्य प्लेटफॉर्म पर अश्लीलता परोस रहे हैं, वह इसका निर्माण बंद कर दें और अभिभावक होने के नाते हम भले ही कितने ही व्यस्त हों, लेकिन यह जरूर देखें कि हमारे बच्चे मोबाइल और किसी भी स्क्रीन पर टाइम बिताते वक्त आखिर देख क्या रहे हैं।
समय रहते यदि उन्हें वहीं रोक दिया जाए और सही-गलत के संबंध में तत्काल समझाया जाये तो ही एक अच्छे भविष्य की उम्मीद है, अन्यथा तो बलिया जिले जैसी घटनाएं देश भर में आगे सर्वत्र घटती रहेंगी और हम सभी उन घटी घटनाओं के पीछे का सच जानने एवं उन पर कार्रवाई करने में व्यस्त बने रहेंगे। (लेखिका, मप्र बाल अधिकार संरक्षण आयोग की सदस्य हैं।)
एबीएन सोशल डेस्क। आगमन काल याद दिलाता है भले परमात्मा हमें दिखाई नहीं देता पर उनका अस्तित्व संसार के कण कण में हैं। एक बार एक व्यक्ति नाई की दुकान पर बाल कटवाने गया। नाई और उस व्यक्ति के बीच में ऐसे ही बातें शुरू हो गई और वे लोग बातें करते-करते भगवान के विषय पर बातें करने लगे। तभी नाई ने कहा कि मैं भगवान के अस्तित्व को नहीं मानता और इसीलिए तुम मुझे नास्तिक भी कह सकते हो।
तुम ऐसा क्यों कह रहे हो व्यक्ति ने पूछा। नाई ने कहा बाहर जब तुम सड़क पर जाओगे तो तुम समझ जाओगे कि भगवान का अस्तित्व नहीं है। अगर भगवान होते, तो क्या इतने सारे लोग भूखे मरते? क्या इतने सारे लोग बीमार होते? क्या दुनिया में इतनी हिंसा होती? व्यक्ति ने थोड़ा सोचा, लेकिन वह वाद-विवाद नहीं करना चाहता था इसलिए चुप रहा और नाई की बातें सुनता रहा।
नाई ने अपना काम खत्म किया और वह व्यक्ति नाई को पैसे देकर दुकान से बाहर आ गया। वह जैसे ही नाई की दुकान से निकला, उसने सड़क पर एक लम्बे-घने बालों वाले एक व्यक्ति को देखा जिसकी दाढ़ी भी बढ़ी हुई थी और ऐसा लगता था शायद उसने कई महीनों तक अपने बाल नहीं कटवाये थे।
वह व्यक्ति वापस मुड़कर नाई की दुकान में दुबारा घुसा और नाई से कहा- क्या तुम्हें पता है? नाइयों का अस्तित्व नहीं होता। नाई ने कहा- तुम कैसी बेकार बातें कर रहे हो? क्या तुम्हे मैं दिखाई नहीं दे रहा? मैं यहां हूं और मैं एक नाई हूं। और मैंने अभी अभी तुम्हारे बाल काटे है। व्यक्ति ने कहा- नहीं! नाई नहीं होते हैं।
अगर होते तो क्या बाहर उस व्यक्ति के जैसे कोई भी लंबे बाल व बढ़ी हुई दाढ़ी वाला होता? नाई ने कहा अगर वह व्यक्ति किसी नाई के पास बाल कटवाने जायेगा ही नहीं तो नाई कैसे उसके बाल काटेगा? व्यक्ति ने कहा कि तुम बिल्कुल सही कह रहे हो, यही बात है। भगवान भी होते हैं लेकिन कुछ लोग भगवान पर विश्वास ही नहीं करते तो भगवान उनकी सहायता करेगा कैसे?
कुछ लोगों की आम धारणा होती है जो हमें दिखाई नहीं देता, वो संसार में है ही नहीं। जबकि ऐसा नहीं है। भगवान का अस्तित्व हर जगह है। कोई माने या ना माने। यदि आप संकट के समय पूरी आस्था के साथ उसे पुकारोगे तो वह किसी ने किसी रूप में आपकी सहायता करने जरूर आयेगा।
आगमन काल में हम उसी प्रभु को अपने हृदय में ग्रहण करने के लिए अपने हृदय को साफ, शुद्ध और पवित्र करते हैं। (लेखक झारखंड क्रिश्चियन यूथ एसोसिएशन के केंद्रीय अध्यक्ष हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सांसद महुआ मोइत्रा पैसे के बदले प्रश्न पूछने के मामले में अनैतिक और अशोभनीय आचरण के कारण सत्रहवीं लोकसभा की सदस्यता खो बैठी हैं। उनके निष्कासन की सिफारिश संसद की आचार समिति ने जांच के बाद की।
कुछ समय से इस बात पर बहस हो रही थी कि मोइत्रा पर लगे आरोपों में कितनी सच्चाई है? दरअसल धन लेकर सवाल पूछने के आरोप भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने मोइत्रा पर लगाते हुए संसद में कहा था कि उन्होंने भारतीय उद्योगपति गौतम अडानी और उनकी कंपनियों को कठघरे में खड़ा करने के नजरिए से संसद में निरंतर 40 से ज्यादा प्रश्न पूछे। इसके बदले मोइत्रा ने घूस और कीमती उपहार लिए। यही नहीं उन्होंने लोकसभा पोर्टल की लॉग इन आईडी और पासवर्ड भी दुबई में रहने वाले भारतीय कारोबारी दर्शन हीरानंदानी से साझा किए। इस तथ्य को मोइत्रा ने भी स्वीकारा।
सांसदों के असंसदीय आचरण संसद और संविधान की संप्रभुता को कैसे खिलवाड़ कर रहे हैं? इनके कारनामे पहले भी देखने में आते रहे हैं। नोट के बदले वोट देने से लेकर संसद में पैसे लेकर सवाल पूछने के स्टिंग ऑपरेशन भी हुए हैं। 1991 के आम चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर आयी थी। कई क्षेत्रीय दलों के समर्थन से कांग्रेस ने पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व में सरकार बनाई थी। जुलाई 1993 में इस जोड़तोड़ की सरकार के विरुद्ध मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने सदन में अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। यह प्रस्ताव आखिर में 14 मतों के अंतर से खारिज हो गया।
इसके बाद 1996 में सीबीआई को एक शिकायत मिली, जिसमें आरोप लगाया गया कि राव की सरकार को जीवनदान देने के बदले में झारखंड मुक्ति मोर्चा के कुछ सांसदों और जनता दल के अजीत सिंह गुट को रिश्वत दी गयी थी। इस मामले में झामुमो प्रमुख शिबु सोरेन और उनकी पार्टी के चार सांसदों पर नोट लेकर वोट देने का आरोप लगा था। इन सांसदों के बैंक खातों में मिली धनराशि से भी यह पुष्टि हुई कि नोट के बदले वोट देने की कालावधि में ही यह राशि जमा हुई थी।
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार की नैतिक शुचिता पर आंच 22 जुलाई 2008 को तब आई थी, जब उसने लोकसभा में विश्वास मत हासिल किया। यह स्थिति अमेरिका के साथ गैर-सैन्य परमाणु सहयोग समझौते के विरोध में वामपंथी दलों द्वारा मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापसी के कारण निर्मित हुई थी। वामदलों के अलग हो जाने के बावजूद सरकार का वजूद कायम रहा, क्योंकि उसने बड़े पैमाने पर नोट के बदले सांसदों के वोट खरीदे। इस मामले में संजीव सक्सेना और सुहैल हिन्दुस्तानी को हिरासत में लिया गया। इनकी गिरफ्तारी के बाद आये बयानों से जाहिर हुआ कि सरकार बचाने के लिए वोटों को खरीदने का इशारा शीर्ष नेतृत्व की ओर से हुआ था।
सुहैल ने समाजवादी पार्टी के मौजूदा राज्यसभा के सदस्य अमर सिंह के साथ सोनिया के तत्कालीन राजनीतिक सचिव अहमद पटेल का भी नाम लिया था। वोट के बदले इस नोटकांड में अमर सिंह के खिलाफ चार्जशीट भी दाखिल हुई थी। इस मामले में अमर सिंह और सुधीर कुलकर्णी को प्रमुख षड्यंत्रकारी आरोपित किया गया था। संजीव सक्सेना और भाजपा कार्यकर्ता सुहैल हिन्दुस्तानी के साथ 22 जुलाई 2008 को लोकसभा में विश्वास मत के दौरान भाजपा सांसद अशोक अर्गगल, फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर सिंह भगोरा को वोट के बदले घूस दी थी। इसका लोकसभा में इन सांसदों ने नोटों की गड्डियां लहराकर पर्दाफाश किया था।
संसदीय परम्परा और नैतिकता की दुहाई देने वाले मनमोहन सिंह की सरकार बचाने के लिए यह षड्यंत्र अमर सिंह ने रचा था। मनमोहन सिंह पर कठपुतली प्रधानमंत्री आदि आरोप भले ही लगते रहे हों, किंतु उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर अंगुली कभी नहीं उठी पर 22 जुलाई 2008 को नेपथ्य में रहकर जिस तरह से उन्होंने राजनीति के अग्रिम मोर्चे पर शिखंडी और बृहन्नलाओं को खड़ा करके विश्वास मत पर विजय हासिल की उससे कांग्रेस की सत्ता में बने रहने की ऐसी विवशता सामने आयी, जिसने संविधान में स्थापित पवित्रता, मर्यादा और गरिमा की सभी चूलें हिलाकर रख दी थीं।
हमारे माननीयों में से अनेक ने घूस के लालच में नैतिकता की सभी सीमाएं लांघने का काम स्टिंग ऑपरेशन के जरिये की गयी बातचीत में भी किया है। 50 हजार की छोटी रिश्वत के लिए भी वे फर्जी विदेशी तेल कंपनी को बिना कोई सोच-विचार किये, भारत-भूमि पर उतारने के लिए तैयार हो गये थे। बिना यह शंका किए कि इस तथाकथित कंपनी का स्वदेशी कंपनियों पर क्या असर पड़ेगा ?
अलबत्ता, रोड़ा दूर करने की दृष्टि से पेट्रोलियम मंत्रालय को सिफारिशी पत्र भी लिख दिये थे। लालच और लापरवाही की यह बैखौफ स्थिति एक स्टिंग ऑपरेशन के जरिये सामने आयी थी। कई प्रमुख दलों के 11 सांसद रिश्वत का लेन-देन करते हुए गोपनीय कैमरे की आंख में कैद हो गये थे। यह स्टिंग ऑपरेशन कोबरा पोस्ट के प्रमुख अनिरुद्ध बहल ने किया था। इन सांसदों में कांग्रेस, भाजपा, बसपा और अन्नाद्रमुक के सांसद शामिल थे। साफ है, भृष्टाचार की कोई दलीय सीमा नहीं है। कोई वैचारिक विभाजन नहीं है। चोर-चोर मौसेरे भाई हैं।
इसके पहले भी कोबरा पोस्ट ने ही इसी प्रकृति के एक और स्टिंग ऑपरेशन को अंजाम दिया था। इसमें 11 सांसदों पर पैसा लेकर संसद में सवाल पूछने का आरोप लगा था। तब इन सभी को संसद से बर्खास्त कर दिया गया था। इस ऑपरेशन की गिरफ्त में भाजपा के दिलीप सिंह जूदेव, भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारु लक्ष्मण, जया जेटली और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी भी भ्रष्टाचार व अनैतिकता बरतने को तैयार होते हुए कैमरे में कैद कर लिये गये थे।
जब इन स्टिंग ऑपरेशन का खुलासा सामाचार चैनलों पर हुआ तो जूदेव छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गये। अजीत जोगी को कांग्रेस से निलंबित होना पड़ा। बंगारु लक्ष्मण से भाजपा ने अध्यक्षी छीन ली। जया जेटली को रक्षा सौदों के लिए घूस लेते हुए दिखाया गया था, जो तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नाडीस से जुड़ी थीं। लिहाजा जाॅर्ज को रक्षा मंत्री का पद छोड़ना पड़ा।
दरअसल, जब राजनीति का मकसद ऐन-केन-प्रकारेण सत्ता पर काबिज बने रहने और जायज-नाजायज तरीकों से धन कमाने का हो जाये, तब सवाल संसद में प्रश्न पूछने का हो अथवा विश्वास मत के दौरान मत हासिल करने का, राष्ट्र और जनहित गौण हो जाते हैं। प्रजातंत्र के मंदिरों में जो परिदृश्य दिखाई दे रहे हैं, उनसे तो यही जाहिर होता है कि राष्ट्रीय हित अनैतिक आचरण और बाजारवाद की महिमा बढ़ाने में समर्पित किए जा रहे हैं। महुआ मोइत्रा के ताजा मामले से साफ हुआ है कि सांसद संविधान और लोकतंत्र की गरिमा से खिलवाड़ करने से बाज नहीं आ रहे।
उस समय सर्वोच्च न्यायालय ने कथित आरोपित सांसदों को संविधान के अनुच्छेद 105 में दर्ज प्रावधान के अंतर्गत छूट दी थी। इसमें प्रावधान है कि किसी सांसद द्वारा संसद के भीतर की गई कायर्वाही को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। फिर चाहे वह कोई टिप्प्णी हो, दिया गया वोट हो या फिर संबंधों से संबंधित हो। ऐसे प्रावधान संविधान निर्माताओं ने शायद इसलिए रखे होंगे, जिससे जनप्रतिनिधि अपने काम को पूरी निर्भीकता से अंजाम दे सकें। उन्हें अपनी अवाम पर इतना भरोसा था कि जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि नैतिक दृष्टि से इतना मजबूत तो होगा ही कि वह रिश्वत लेकर न तो अपने मत का प्रयोग करेगा और न ही सवाल पूछेगा?
लेकिन यह देश और जनता का दुर्भाग्य ही है कि जब बच निकलने के ये कानूनी रास्ते सार्वजनिक होकर प्रचलन में आ गये तो सांसद अपने नैतिक और संवैधानिक दायित्व से भी विचलित होने लग गये। अब सीता सोरेन बनाम भारतीय संघ मामले में सुनवाई करते हुए सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की पांच सदस्यीय पीठ ने इस लेन-देन को गंभीरता से लिया है। पीठ ने कहा है कि सदन में वोट के लिए रिश्वत में शामिल सांसदों और विधायकों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया से बचने की छूट पर पुनर्विचार के लिए सात जजों की पीठ बनायी जायेगी। यह पीठ तय करेगी कि सांसद या विधायक सदन में मतदान के लिए घूस लेता है तो उस पर अदालत में मुकदमा चलेगा अथवा नहीं? यह आदेश चार अक्टूबर, 2023 को सीता सोरेन की याचिका पर सुनाया गया है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन सोशल डेस्क। एक सामाजिक मुद्दे पर लिखी गई किताब का छपने के चंद हफ्तों के भीतर इतना व्यापक असर और इसमें बतायी गयी रणनीतियों पर जमीनी स्तर से लेकर सरकारी गलियारों तक अमल एक दुर्लभ घटना है।
अक्टूबर के पूर्वार्ध में आई किताब व्हेन चिल्ड्रेन हैव चिल्ड्रेन : टिपिंग प्वाइंट टू इंड चाइल्ड मैरेज ने बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई में जुटे जमीनी कार्यकर्ताओं और अन्य हितधारकों में यह विश्वास जगाने में सफलता पायी है कि इस बुराई का अंत निकट है।
इस किताब में सुझायी गयी रणनीतियों से चंद हफ्तों में ही उनके अभियान को नयी धार मिली है। प्रख्यात बाल अधिकार कार्यकर्ता और सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता भुवन ऋभु द्वारा लिखी गयी यह किताब संयुक्त राष्ट्र के इन अनुमानों से असहमति जताती है कि देश 2050 तक कहीं जाकर बाल विवाह के खात्मे के महत्वाकांक्षी लक्ष्य के करीब पहुंचेगा।
इसके विपरीत यह किताब 2030 तक ही इस लक्ष्य को हासिल करने की बात करती है और इसके लिए ठोस रणनीतिक योजना और समग्र रूपरेखा पेश करती है। इस किताब का 11 अक्टूबर 2023 को पूरे देश में एक साथ 250 जिलों में लोकार्पण किया गया और अब यह जमीनी स्तर पर बाल विवाह के खात्मे के लिए काम रहे 160 से ज्यादा संगठनों के लिए इस लड़ाई में पथप्रदर्शक की भूमिका में है।
इतना ही नहीं, विभिन्न जिलों के जिलाधिकारियों, बाल विवाह निषेध अधिकारियों और कुछ राज्यों के मुख्य सचिवों ने पत्र जारी कर विभिन्न सरकारी विभागों को इस किताब की सिफारिशों और बाल विवाह की रोकथाम के लिए सुझाई गई रणनीति पर अमल की ताकीद की है।
व्हेन चिल्ड्रेन हैव चिल्ड्रेन सतत, समग्र, समन्वित और लक्ष्य केंद्रित उपायों से एक तय समयसीमा में लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए पिकेट रणनीति के जरिये बाल विवाह के खात्मे की रूपरेखा पेश करती है। हर साल लाखों ऐसी किशोरियां जिन्हें स्कूल में होना चाहिए था, भविष्य के सुनहरे सपने बुनने चाहिए थे, बाल विवाह के नर्क में धकेल दी जाती हैं जहां उनके हिस्से में आता है सिर्फ बलात्कार, उत्पीड़न और शोषण।
2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार देश में रोजाना 17 साल से कम उम्र की 4,442 लड़कियों को शादी का जोड़ा पहना दिया जाता है। उधर, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की हालिया रपट के अनुसार देश में रोजाना बाल विवाह के सिर्फ तीन मामले ही थाने पहुंच पाते हैं। जनगणना और एनसीआरबी के आंकड़ों में जमीन-आसमान का यह फर्क चिंता का विषय है।
लेकिन इस किताब में बताई गई व्यावहारिक रणनीतियां और ईकोसिस्टम यानी पारिस्थितिकी स्तरीय दृष्टिकोण की पैरोकारी यह भरोसा जगाती है कि भारत के लिए बाल विवाह की मौजूदा 23.5 फीसदी दर को 2030 तक 5.5 फीसदी तक लाना असंभव नहीं है। यह जादुई संख्या वो देहरी है जहां से लक्षित हस्तक्षेपों की आवश्यकता खत्म हो जायेगी और बाल विवाह का चलन अपने आप खत्म होने लगेगा।
पिकेट रणनीति सरकार, समुदायों, गैर सरकारी संगठनों से और बाल विवाह के लिहाज से संवेदनशील बच्चियों के लिए नीतियों, निवेश, संम्मिलन, ज्ञान-निर्माण और एक पारिस्थितिकी जहां बाल विवाह फल-फूल नहीं पाए और इसकी रोकथाम के लिए निरोधक और निगरानी तकनीकों पर एक साथ काम करने का आह्वान करती है।
पिकेट रणनीति बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई को एक रणनीतिक औजार मुहैया कराने के साथ-साथ तमाम हितधारकों के विराट लेकिन बिखरे हुए प्रयासों को एक ठोस आकार और दिशा देती है। व्हेन चिल्डेन हैव चिल्ड्रेन ने बाल विवाह मुक्त भारत अभियान में एक नयी उर्जा का संचार किया है।
बाल विवाह के अभिशाप को खत्म करने के लिए देश भर के 160 से ज्यादा गैरसरकारी और नागरिक संगठन बाल विवाह मुक्त भारत अभियान के तहत एक मंच पर आये हैं और बाल विवाह की सबसे ज्यादा दर वाले देश के 300 जिलों में इसके खिलाफ अभियान चला रहे हैं।
इन सभी संगठनों और तमाम अन्य हितधारकों ने किताब में पेश किये गये रोडमैप और व्यवहार्य रणनीतियों की उपयोगिता को रेखांकित करते हुए इसे बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई में एक ऐसे सशक्त हस्तक्षेप के रूप में स्वीकार किया है जो न सिर्फ बच्चों के साथ हो रहे अपराध को विमर्श के केंद्र में लाती है, बल्कि इसके समाधान की एक ठोस रूपरेखा भी पेश करती है।
इसलिए व्हेन चिल्डेन हैव चिल्ड्रेन को महज एक किताब के बजाय एक जीवंत और सामयिक दस्तावेज के तौर पर देखना उचित होगा, जो सामाजिक बदलाव के लिए एक पथप्रदर्शक का भी काम करती है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अभी कुछ दिन पहले की एक खबर ने लोकतांत्रिक मूल्यों में यकीन रखने वाले हरेक इंसान को उदास कर दिया होगा। खबर संभवत: आपने भी पढ़ी होगी। अगर किसी कारणवश नहीं पढ़ी तो बताना जरूरी है कि मध्य प्रदेश के जिला सीहोर में एक मुस्लिम महिला को उसके ससुराल वालों ने इसलिए बुरी तरह पीटा, क्योंकि, उसने भाजपा को हालिया विधानसभा चुनाव में वोट दिया था।
उस महिला को पीटने वालों में उसका अपना देवर भी शामिल था। उसे जब पता चला कि उसके भाई की पत्नी ने भाजपा के हक में वोट किया है तो उसने अपनी भाभी को बुरी तरह से डंडों से मारा। उसका कुछ संबंधियों और पड़ोसियों ने भी साथ दिया। इसके बाद पीड़ित महिला न्याय के लिए कलेक्ट्रेट पहुंची और वहां आवेदन सौंपकर न्याय की गुहार लगायी। अब जरा बताइये कि भाजपा के खिलाफ इतनी नफरत कुछ लोगों के मन में क्यों है?
देश का कोई भी नागरिक किसी भी दल के उम्मीदवार को वोट देने के लिए स्वतंत्र है। ये अधिकार देश का संविधान सभी को देता है। तब किसी को भी इस बात के लिए तकलीफ क्यों हो रही है कि उसके परिवार में किसने फलां-फला दल के पक्ष में मतदान क्यों किया।
दरअसल भाजपा सरकार से कुछ कठमुल्लों को इसलिए नाराजगी है क्योंकि उसने (भाजपा) ने मुसलमानों में ट्रिपल तलाक और हलाला जैसे अमानवीय परम्परा को खत्म करने के लिए बड़े कदम उठाये। इन कठमुल्लों की घोर महिला विरोधी सोच को जहां से भी ललकारा जाता है, तो ये पागलपन पर उतरने लगते हैं, बेवजह हिंसक हो उठते हैं।
मुझे याद आ रहा है जब कुछ समय पहले मुंबई में उन मुस्लिम महिलाओं के साथ भी इसी तरह मारपीट और धक्कामुक्की की गयी जो ट्रिपल तलाक के विरोध में हस्ताक्षर अभियान चला रही थीं। उन्हें भद्दी-भद्दी गालियां दी गईं कुछ सड़क छाप मुस्लिम नेताओं और उनके चेलों द्वारा। इन लफंगों ने हस्ताक्षर अभियान चलाने वाली महिलाओं पर इस्लाम विरोधी होने तक का आरोप भी लगा दिया था।
अब मध्य प्रदेश की ताजा घटना को देखिये। हैरानी की बात ये है कि कोई भी मुस्लिम संगठन या अपने को मुसलमानों का नेता कहने वाला उस महिला के साथ खड़ा नहीं हो रहा है जिसके साथ मारपीट की गई है। अपने को मुसलमानों का शुभचिंतक बताने वाली तीस्ता सीतलवाड़ ने उस दीन-हीन महिला के हक में कोई बयान तक नहीं दिया है।
वे तमाम लेखक और कैंडल मार्च निकालने वाले बुद्धिजीवी भी नदारद हैं जो बात-बात पर दीन-हीन मुसलमान औरतें का साथ देने के लिए तैयार रहते हैं। भाजपा को हर वक्त बुरा-भला कहने वाले यह तो अब जान लें कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने अपने अभी तक के शासनकाल में औरतों के हक में तमाम बड़ी योजनाएं लागू की हैं और करते ही चले जा रहे हैं।
उनका लाभ मुसलमान औरतों को भी हो रहा है, क्योंकि, मोदी जी के शासन में जाति धर्म के आधार पर कोई भेदभाव तो है ही नहीं। इसलिए मुसलमान औरतें की मोदी सरकार और भाजपा को लेकर राय बदली है। प्रधानमंत्री मोदी अपने अधिकांश संबोधनों में महिलाओं के सशक्तीकरण पर जोर देते हैं। मोदी सरकार युवाओं के साथ-साथ महिलाओं के विकास पर भी जोर दे रही है।
उसकी तीन योजनाओं के फलस्वरूप महिलाओं को आर्थिक तौर पर मजबूती मिली है। पहले बात की शुरुआत उज्जवला योजना 2023 से ही करते हैं। प्रदूषण को कम करने व महिलाओं के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार द्वारा विभिन्न प्रकार की योजनाओं को संचालन किया जा रहा है। इसी कड़ी में केंद्र सरकार द्वारा उज्जवला योजना लॉन्च की गयी।
इस योजना के माध्यम से देश की महिलाओं को निशुल्क गैस सिलेंडर उपलब्ध करवाये जाते हैं। इस योजना के अंतर्गत देश के 8.3 करोड़ परिवारों को लाभ पहुंचा है। जाहिर है, इस योजना से जिन औरतों को लाभ हो रहा है उनमें मुसलमान और ईसाई महिलाएं भी हैं। क्या जिन्हें उज्जवला योजना से लाभ होने लगा है वह मोदी सरकार का बिना वजह विरोध करेंगी?
अब बात करें फ्री सिलाई मशीन योजना की। इस योजना के अंतर्गत देश की तमाम महिलाओं को फ्री सिलाई मशीन प्रदान की जायेगी, जिसके जरिए महिलाएं आसानी से घर बैठे रोजगार प्राप्त कर सकती हैं और जीवन का गुजर-बसर कर सकती हैं। अब मोदी सरकार की सुरक्षित मातृत्व आश्वासन सुमन योजना की बात कर लें।
सुरक्षित मातृत्व आश्वासन सुमन योजना की शुरुआत 10 अक्टूबर 2019 को ही की गयी थी। इस योजना के तहत गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की जीवन सुरक्षा के लिए निशुल्क स्वास्थ्य सेवाएं सरकार देती है। इस योजना के जरिए सभी गर्भवती महिलाओं के प्रसव से पहले चार बार मुफ्त जांच का अधिकार है।
इसके अलावा प्रसव के समय होने वाला सारा खर्च सरकार द्वारा उठाया जायेगा और प्रसव के बाद 6 महीने तक मां और बच्चे को निशुल्क दवाइयां भी उपलब्ध करायी जायेगी। जाहिर है, इन तमाम युगांतकारी योजनाओं का लाभ मुसलमान औरतों को भी तो हो रहा है।
इसके साथ ही मोदी सरकार की पहल पर मुसलमान औरतों को तीन तलाक से मुक्ति मिली। इस बाबत सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला भी आया। इसने मुसलमान औरतों को तीन तलाक की बर्बर कुप्रथा से मुक्ति दिलवा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान तीन तलाक पर रोक लगा दी।
कहते हैं कि हैं कि न्याय अंधा होता है। वरना न्याय की देवी की दोनों आंख पर पट्टी नहीं बंधी होती। इसका पता चला गया। हालांकि, कई कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन ट्रिपल तलाक को जारी रखने की पुरजोर वकालत भी कर रहे थे पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मुसलमान औरतों को जीवनदान दे ही दिया।
इस फैसले के आने से पहले तक यह कहा जा रहा था कि ट्रिपल तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ही यह तय हो जायेगा कि मानवता जीतती है या मुस्लिम सांप्रदायिकता और अमानवीयता। एक बात समझ ली जाये कि अब मुस्लिम औरतें भी पढ़-लिख गयी हैं और जाग उठी हैं। वे भी अब गुलामी की जंजीर को तोड़ने का मन बना चुकी हैं।
अब इन्हें नामंजूर है कि इनके शौहर या परिवार के बाकी सदस्य इन्हें अपना गुलाम बनाकर रखें। मध्य प्रदेश की उस बहादुर महिला के जज्बे को सलाम, जिसने अपने विवेक से अपने मताधिकार का प्रयोग किया और उन सबकी शिकायत की जिन्होंने उसके साथ मारपीट की। देश को ऐसी महिलाओं के साथ खड़ा होना होगा। (लेखक, वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मैथिलीशरण गुप्त भारतीय संस्कृति और संस्कार के उन्नायक कवि हैं। 12 दिसंबर को उनकी 59वीं पुण्यतिथि है। पुण्य तिथि के अवसर पर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का पुनरावलोकन करने के साथ-ही उनके काव्यादर्शों को आत्मसात कर हिंदी साहित्य में फिर से स्थापित करने की आवश्यकता है।
उनकी कविताओं में राष्ट्रीय भावना, वैष्णवी आस्था और समन्वय की विराट चेष्टा है। समाज की उन्नति में पारिवारिक जीवन मूल्यों की बड़ी भूमिका होती है। गुप्त जी अपनी कविताओं में पारिवारिक मूल्यों के संरक्षण के प्रति अधिक तत्पर दिखते हैं।
उनकी यह तत्परता साकेत में सर्वत्र दिखाई पड़ती है, जिसके कारण उन्हें कौटुम्बिक कवि भी कहा गया है। वे सच्चे अर्थों में आस्था और विश्वास के कवि हैं। अपने काव्य गुरु आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के उपकार को स्वीकारते हुए साकेत की भूमिका में लिखते हैं :
गुप्त जी साहित्य में हो रहे उत्तरोत्तर परिवर्तनों को अभिव्यक्त करने में सफल कवि थे। उनकी इस कालानुसरण की क्षमता को देखते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ठीक ही लिखा है- गुप्त जी की प्रतिभा की सबसे बड़ी विशेषता है कालानुसरण की क्षमता अर्थात् उत्तरोत्तर बदलती हुई भावनाओं और काव्य प्रणालियों को ग्रहण करते चलने की शक्ति।
मैथिलीशरण गुप्त ने दो प्रबंध काव्य साकेत और जय भारत एवं उन्नीस खंड काव्यों की रचना की है। इसके पीछे द्विवेदी युगीन संस्कार और उनकी मयार्दावादी दृष्टिकोण रहा है। उनकी प्रसिद्धि का आधार ग्रंथ साकेत में उन्होंने रामकथा को दुहराया ही नहीं है बल्कि रामकथा का पुनर्मूल्यांकन किया है।
इसके साथ ही उर्मिला और कैकेयी के जैसे उपेक्षित पात्रों को अपनी सहानुभूति से अधिक संवेदनशील और युगानुकूल बनाया है। चित्रकूट की सभा में कैकेयी कहती हैं -
कैकेयी का यह चरित्र कवि की मौलिक प्रतिभा का परिचायक है। इतना ही नहीं गुप्त जी के राम वाल्मीकि और तुलसी के राम से भिन्न हैं। उनके राम इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आये हैं। राम स्वयं कहते हैं-
मैथिलीशरण गुप्त को उपेक्षितों के कवि कहा गया है। उन्हें ऐसा कहना उचित भी है। उन्होंने भारतीय साहित्य में उपेक्षित नारी पात्रों को देखने की एक नई दृष्टि दी है। उसी का परिणाम है कि उनके प्रसिद्ध काव्य साकेत में उर्मिला के चरित्र को विशेष प्रतिष्ठित मिली है।
वहीं यशोधरा काव्य में गौतम की पत्नी यशोधरा को। विष्णुप्रिया काव्य में चेतनदेव की पत्नी विष्णुप्रिया को और रत्नावली काव्य में तुलसीदास की पत्नी रत्ना आदि की वेदना को सशक्त सहानुभूति दी है। साथ -ही नारी स्वाभिमान की अभिव्यक्ति भी करायी है। यशोधरा अपनी सखियों से कहती हैं-
आगे फिर यशोधरा कहती हैं। हम क्षत्राणी हैं और क्षत्रिय धर्म की निर्वाह करना जानते हैं। हमें दुख इस बात की है कि मेरे पति ने मुझे पहचाना परंतु जाना नहीं। यशोधरा कहती हैं-
कविवर मैथिलीशरण गुप्त साहित्य को केवल मनोरंजन की वस्तु नहीं मानते हैं, बल्कि उसमें जीवन के लिए संदेश भी होना चाहिए। भारत-भारती में वे कहते हैं-
वे भारत की समृद्ध ज्ञान- विज्ञान की परम्परा का गौरव गान भी किया है। साथ-ही उन्होंने भारतीय ऋषि-मुनियों की उस सनातन परम्परा का उल्लेख किया है जो विश्व को बहुत कुछ दिया है। भारत-भारती के अतीत खंड मे वे लिखते हैं -
भारतीय का अतीत बहुत ही गौरवशाली रहा है, किन्तु वर्तमान हमारा ठीक नहीं है। इसीलिए गुप्त जी अगाह करते हैं-
आज हर क्षेत्र में मूल्यों का विघटन हो रहा है। ऐसे समय में मैथिलीशरण गुप्त जैसे कवियों की कविताओं का दायित्व बढ़ जाता है। समाज में पढ़े लिखे लोग आजकल ऐसे असामाजिक तत्वों से जुड़ जाते हैं जहां से निकल पाना उनके लिए मुश्किल हो जाता है।
मूल्यों का यह गिरावट अब साहित्यों में भी होने लगा है। साहित्य अब लोककल्याण की भावना से च्युत होकर स्वार्थ साधना व प्रतिष्ठा का विषय बन गया है। ऐसे समय में गुप्त जी का साहित्य सर्वाधिक प्रासंगिक और पठनीय हो जाता है। वे भारत की भारतीयता बनी रहे इसके लिए भी सचेत करते हैं-
गुप्त जी उदार हृदय के कवि थे। समन्वय के कवि थे। इसलिए राम,श्याम और बुद्ध में भेद नहीं करते हैं। उन्होंने सिखों पर लिखा, इस्लाम पर लिखा,ईसा मसीह पर लिखा। वे सभी धर्मों और संप्रदायों के प्रति सहिष्णु थे।
इसलिए वे हिंदी साहित्य जगत में राष्ट्र कवि, दद्दा, संस्कृति के व्याख्याता, मानवता के उदघोषक, आधुनिक तुलसी, उपेक्षितों के कवि, और युगद्रष्टा कवि आदि कहलाये। शांतिप्रिय द्विवेदी ने ठीक ही कहा है - किसी माला में प्रथम मणि उपवन में प्रथम पुष्प और गगन में प्रथम नक्षत्र का जो महत्वपूर्ण स्थान हो सकता है वही स्थान वर्तमान हिन्दी में मैथिलीशरण गुप्त का है। (लेखक गोस्सनर महाविद्यालय, रांची के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग के सहायक प्राध्यापक हैं।)
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