एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय चिंतन, मनन एवं दर्शन शास्त्र में एक स्थापित सूत्र है कि मनुष्य का आंतरिक जगत जितनी सुलझी एवं व्यवस्थित होती है उसी के अनुपात में आदमी का बाहरी दुनिया सुलझी एवं व्यवस्थित रहती है।
मनुष्य के द्वारा अविष्कारित विज्ञान के माध्यम से निर्मित उपकरण ने जीवन से संबंधित संसाधन, तेज गति और अधिक से अधिक जानकारी के लिए सरल विधि दिया है; लेकिन आज का जीवनशैली अस्त-व्यस्त एवं भागमभाग की होकर रह गयी है।
अति व्यस्तता तथा सक्रियता ऊर्जा का मापदंड हो सकता है, परंतु असंतुलित और उद्देश्यहीन चंचलता कोई इक्षित परिणाम उत्पन्न नहीं कर पता है।आर्थिक समृद्धि जहां एक और जीवन के लिए आवश्यक है, वहां दूसरी ओर वह सामाजिक मान सम्मान और प्रतिष्ठा का मान्यता प्राप्त मानक हो गया है और यही आकर्षण ने व्यक्ति को एकाकी करते हुए पारिवारिक संवाद, सामाजिक संवाद एवं संबंध से दूर कर दिया है।
व्यक्ति की समस्या और तनाव आजीवन बना रहता है। हद तो यह हो गयी है कि व्यस्तता की दृष्टि रात और दिन में अंतर नहीं रह गया है। बेचैनी एक विकराल समस्या होकर रह गयी है।
सभी जानते हैं कि शांत व्यवस्थित, स्थिर एवं संतुलित मन मस्तिष्क उत्तम सक्रियता एवं परिणाम प्रस्तुत कर सकता है, परंतु इन सद्गुणों के प्रति उदासीनता संकट एवं दु:ख का मुख्य कारण बना हुआ है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पंद्रह नवंबर का दिन झारखंड की आत्मा को झकझोरता है। यह वह पवित्र दिन है जब हमारे महान जनजातीय नायक भगवान बिरसा मुंडा का जन्म हुआ था। यही वह दिन है जब सन 2000 में झारखंड का जन्म हुआ। किंतु आज पच्चीस वर्ष बाद हमारा राज्य खुद अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। यह संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं है। यह संघर्ष आर्थिक शोषण के विरुद्ध है। यह संघर्ष उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए है।
झारखंड का आज का दृश्य चिंताजनक है। नागरिक (ग्राहक) जो हर दिन बाजार जाते हैं, उन्हें पता नहीं कि वे क्या खरीद रहे हैं। एक दवाई जो जान बचानी चाहिए, वह जान ले रही है। खाद्य पदार्थों में मिलावट की महामारी ने हर घर को असुरक्षित बना दिया है। साइबर अपराधियों का तांडव सामान्य मनुष्य की जेब काट रहा है और इसी बीच भ्रष्टाचार जनता के विश्वास को निगलते जा रहा है। यह संकट उसी तरह का है जिसका सामना बिरसा मुंडा ने किया था, किंतु इस बार दुश्मन अंग्रेज नहीं है, बल्कि हमारे अपने संस्थान हैं।
झारखंड में नकली दवाओं का कारोबार पूरी तरह अनियंत्रित हो गया है। राज्य में मात्र बारह दवा निरीक्षक हैं, जबकि आवश्यकता बयालीस की है। इसका अर्थ यह है कि एक निरीक्षक के पास चार-चार जिले हैं। ऐसे में दवा की सप्लाई चेन में हर स्तर पर जांच नहीं हो पाती है। नतीजा यह है कि दवा निमार्ता से लेकर दुकानदार तक, नकली माल का व्यापार निर्बाध रूप से चलता है।
हाल ही में सुखदेव नगर थाने के क्षेत्र में स्थित एक सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में नकली एंटीबायोटिक टैबलेट पकड़ी गई। जांच में पता चला कि दवा निमार्ता, सप्लायर और दोनों के पते सब फर्जी थे। टैबलेट में संबंधित दवा के सक्रिय तत्व तक नहीं थे। रोगी को गलत दवा दे कर उसके संक्रमण को बढ़ाना एक राष्ट्रीय शर्म का विषय है।
ब्रांडेड दवाओं के नाम पर नकली और सब-स्टैंडर्ड दवाओं का धंधा तेजी से बढ़ रहा है। दर्द निवारक, बुखार की दवाएं, शुगर, हाई ब्लड प्रेशर, थायरॉयड, गर्भनिरोधक गोलियां, विटामिन सप्लिमेंट्स- ये सभी वस्तुएं अवैध कारोबारियों के कब्जे में चली गई हैं। मरीज दवा का कोर्स पूरा करते हैं, किंतु राहत नहीं मिलती, क्योंकि उन्हें नकली दवा दे दी गई है। चिकित्सकों को बार-बार दवाएं बदलनी पड़ती हैं। यह न केवल स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है, बल्कि गरीब परिवारों के सीमित संसाधनों पर सीधा हमला है।
सरकार ने क्यूआर कोड लागू करने की कोशिश की है, जिससे असली और नकली दवा की पहचान की जा सके। किंतु यह समाधान अधूरा है। समस्या यह है कि जांच सुविधाएं अपर्याप्त हैं। अन्य जिलों में मानक जांच भी संभव नहीं है। क्या हमारे नागरिकों के जान का मूल्य इतना कम है कि हम उन्हें पर्याप्त संसाधन भी नहीं दे सकते?
खाद्य सुरक्षा प्रणाली झारखंड में पूरी तरह ध्वस्त हो गई है। राज्य की इकलौती खाद्य परीक्षण प्रयोगशाला को राष्ट्रीय प्रत्यायन बोर्ड (एनएबीएल) ने मान्यता से वंचित कर दिया है, क्योंकि यह अपग्रेड नहीं की गई। नतीजा यह है कि अब राज्य में खाद्य पदार्थों में मिलावट की कानूनी जांच ही नहीं हो सकती। पहले यहां हर साल 1200 से अधिक सैंपलों की जांच होती थी, जिसमें से 40 प्रतिशत में मिलावट पायी जाती थी। अब तो यह जांच ही बंद हो गयी है।
इसका मतलब साफ है कि मिलावट करने वाले अब निर्बाध रूप से अपना काम करेंगे। अनाज में चूरा, मसालों में जहरीले रंग, दूध में मिलावट, सब्जियों में कीटनाशक - ये सब अब बिना किसी बाधा के बिकेंगे। गरीब परिवार जो सब्जी मंडी से सस्ते दाम पर सब्जियां खरीदते हैं, वे नहीं जानते कि वे अपने बच्चों को जहर खिला रहे हैं।
पिछले वर्ष मसालों में मिलावट के खिलाफ एफएसएसएआई द्वारा अक्टूबर माह में अभियान चलाया गया। जांच में पाया गया कि काली मिर्च में स्टार्च, मिर्च पाउडर में हानिकारक रंग, हल्दी पाउडर में मिट्टी - सब कुछ मिलावट के लिए उपयोग हो रहा है। ये रंग कैंसर का कारण बन सकते हैं। किंतु न तो सरकार के पास संसाधन हैं और न ही राजनीतिक इच्छा है कि इस महामारी को रोका जा सके।
झारखंड हाईकोर्ट ने भी मिलावटी खाद्य पदार्थों की बिक्री को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की नियुक्ति जल्द से जल्द की जाए।किंतु अब तक इस निर्देश का पालन नहीं हुआ है।
साइबर अपराध में झारखंड का नाम शर्म से जुड़ा हुआ है। जनवरी से जून 2025 तक महज छ: महीने में 11910 शिकायतें दर्ज हुईं। यानी हर दिन औसतन 66 शिकायतें। इसी अवधि में 767 साइबर अपराधी गिरफ्तार किए गए। फिर भी संकट थमता नहीं दिख रहा। जनवरी 2024 से जून 2025 तक डेढ़ साल में 390 करोड़ रुपये का साइबर फ्रॉड हुआ है। कल्पना कीजिए, देश का यह हिस्सा कितना असुरक्षित है जहां हर दिन इतनी बड़ी ठगी होती है। पेंशनभोगी, अकेली महिलाएं, छोटे व्यापारी-सभी अपने जीवन भर की बचत को खो देते हैं।
बैंकों को धोखा दिया जाता है, आधार के नाम पर बिना अनुमति के खाते खोले जाते हैं, व्यक्तिगत डेटा चोरी होता है। सबसे दर्दनाक बात यह है कि पीड़ितों को उनका पैसा वापस नहीं मिलता। हालांकि हाल ही में हाईकोर्ट के निर्देश के बाद पुलिस को पीड़ितों को पैसा लौटाने की व्यवस्था करने का आदेश दिया गया है, किंतु यह प्रक्रिया अभी शुरूआती चरण में है। जामताड़ा से लेकर देवघर तक, साइबर अपराधियों का जाल फैला हुआ है।
ये गिरोह विदेशी सर्वर का इस्तेमाल करते हैं। डिजिटल गिरफ्तारी करके पीड़ितों को ब्लैकमेल किया जाता है। यह केवल व्यक्तिगत हानि नहीं है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है। हर वह नागरिक असुरक्षित है जो इंटरनेट का उपयोग करता है। बुजुर्ग, किशोर, महिलाएं, सभी निशाने पर हैं। आॅनलाइन शॉपिंग, बैंकिंग, सोशल मीडिया- हर क्षेत्र में खतरा है।
भ्रष्टाचार ने झारखंड की नसों में जहर घोल दिया है। अबुआ आवास जैसी सरकारी योजनाओं में भी गरीब लाभुकों से घूस मांगी जाती है। कुछ गरीब कर्ज़ लेकर पैसे देते हैं ताकि उन्हें आवास मिल सके। स्वास्थ्य विभाग में अधिकारियों की मिलीभगत से ही नकली दवाओं का सिलसिला चलता है।
पूर्व डीजीपी अनुराग गुप्ता के समय एनजीओ शाखा के प्रभारी इंस्पेक्टर गणेश सिंह के विरुद्ध भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने जांच दर्ज की है। आरोप है कि उन्होंने विभिन्न फाइलों के निष्पादन के बदले में अवैध वसूली की। जब सत्ता का संरक्षण होता है, तो भ्रष्टाचार पनपता है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि झारखंड में भ्रष्टाचार व्यवस्थागत समस्या बन गयी है, न कि अपवाद।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उपभोक्ता मामलों का मंत्रालय और राज्य के आयोग खुद ही सोये हुए हैं। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 को लागू हुए पांच वर्ष हो गये हैं, किंतु झारखंड में इसकी क्रियान्वयन व्यवस्था और स्ट्रक्चर अभी भी कमजोर है। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सीसीपीए) के गठन के बाद भी झारखंड में इसकी कार्यप्रणाली स्पष्ट नहीं हुई है।
बिरसा मुंडा की जयंती और झारखंड स्थापना दिवस केवल राजनीतिक उत्सव नहीं हैं। ये अवसर हैं हमारे प्रतिबद्धता को नवीकृत करने का। झारखंड सरकार को तत्काल निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:
साथ ही, हर झारखंडवासी को भी अपने दायित्व के बारे में जागरूक होना चाहिए। अपने अधिकारों के बारे में जानें। संदिग्ध उत्पादों की शिकायत दर्ज करें। स्थानीय स्तर पर उपभोक्ता समूह बनाएं। सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन पर निगरानी रखें। इंटरनेट के उपयोग में सावधानी बरतें। शिक्षा को बढ़ावा दें।
बिरसा मुंडा को 150 साल पहले राजनीतिक स्वतंत्रता की लड़ाई लड़नी पड़ी थी। आज हमें आर्थिक स्वतंत्रता की लड़ाई लड़नी है। नकली दवा, खाद्य मिलावट, साइबर अपराध, भ्रष्टाचार - ये सब नए अंग्रेज हैं, जो आंतरिक रूप से हमें लूट रहे हैं। हर गली में, हर मोहल्ले में, हर गांव में उपभोक्ता जागरूकता समूह बनने चाहिए। यह नई क्रांति होगी - आंतरिक शत्रुओं के विरुद्ध, आर्थिक न्याय के लिए, सामाजिक कल्याण के लिए।
बिरसा कहते थे: अबुआ राज तोहरो काज। हमारा राज्य, हमारा काम। आज हर झारखंडवासी को यह आह्वान दोहराना चाहिए। अपने राज्य को बचाने के लिए, अपने परिवार को सुरक्षित करने के लिए, अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए, हर नागरिक को सचेष्ट होना चाहिए। यह समय परिवर्तन का है। यह समय आंदोलन का है। यह समय क्रांति का है। जय बिरसा मुंडा! जय झारखंड! (लेखक अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के क्षेत्र संगठन मंत्री हैं।)
एबीएन सेंट्रल डेस्क। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत पत्र सूचना कार्यालय, रांची द्वारा आज मंगलवार 23 दिसंबर 2025 को रामगढ़ के होटल शिवम इन के कॉन्फ्रेंस हॉल में में ग्रामीण क्षेत्रों के पत्रकारों के लिए वार्तालाप कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसका विषय विकसित भारत के संदर्भ में नशा मुक्ति का महत्व था।
कार्यक्रम के पहले चरण के स्वागत व विषय प्रवेश संबोधन में पत्र सूचना कार्यालय, रांची के कार्यालय प्रमुख राजेश सिन्हा ने भारत सरकार के द्वारा नशा विरोधी विभिन्न कार्यों और योजनाओं की जानकारी देते हुए पत्रकारों से अपील की कि इन जानकारी को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचायें। प्रधानमंत्री के विकसित भारत मिशन के प्रावधानों का जिक्र करते उन्होंने कहा कि नशा मुक्ति समाज के निर्माण में पारिवारिक माहौल, सामाजिक मूल्यों और नैतिकता की सही समझ की अहम भूमिका होती है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत का सपना तभी साकार हो सकता है जब समाज का प्रत्येक वर्ग, विशेषकर युवा, नशे से दूर रहे।
कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, रांची इकाई से सहायक निदेशक राणा प्रताप यादव ने कहा कि वर्तमान समय में युवाओं में नशे की प्रवृत्ति एक गंभीर चुनौती के रूप में उभर रही है। उन्होंने बताया कि नशा नियंत्रण के लिए बनाये गये कानूनों का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास के माध्यम से समाज को स्वस्थ दिशा देना है। उन्होंने कहा कि नशा मुक्ति अभियान में समाज और समुदाय की सहभागिता अत्यंत आवश्यक है, केवल सरकारी प्रयासों से यह लक्ष्य पूर्ण नहीं किया जा सकता।
इसी क्रम में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, रांची इकाई के अधीक्षक श्री शारिक उमर ने झारखंड में नशा नियंत्रण की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए बताया कि राज्य में लगातार प्रभावी कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने कहा कि सरकार के निर्देशानुसार अवैध नशीली फसलों की खेती के विरुद्ध व्यापक अभियान चलाये गये हैं, जिनके तहत गांजा जैसी अवैध फसलों को बड़े स्तर पर नष्ट किया गया है।
उन्होंने एनडीपीएस अधिनियम की धारा 46 और 47 की जानकारी देते हुए बताया कि आम नागरिक मानस पोर्टल के माध्यम से अपनी पहचान गोपनीय रखते हुए नशीले पदार्थों से संबंधित सूचनाएं संबंधित प्राधिकरण तक पहुंचा सकते हैं। साथ ही, उन्होंने भारत सरकार द्वारा संचालित टोल-फ्री नंबर 1933 के महत्व के बारे में भी जानकारी दी।
राष्ट्रीय विधि अध्ययन एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय, रांची के सहायक प्राध्यापक प्रो शुभम श्रीवास्तव ने कानूनी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि नशीले पदार्थों की लत से ग्रसित कई लोग कानूनी कार्रवाई के भय से मदद मांगने से कतराते हैं। उन्होंने एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि महानगरों में नशा निरोधक विभिन्न एजेंसियों की कार्रवाई में अक्सर समाज के कमजोर वर्ग अधिक प्रभावित होते हैं। उन्होंने कानून को और अधिक प्रभावी व मानवीय बनाने की आवश्यकता पर बल देते हुए सिक्किम एंटी ड्रग एक्ट, 2006 के लगातार सुधार प्रक्रियाओं का उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे सुधार के मानवीय दृष्टिकोण से इसके सकारात्मक परिणाम सामने देखने को मिले हैं।
दूरदर्शन समाचार इकाई, झारखंड के प्रमुख एवं सहायक निदेशक दिवाकर कुमार ने स्थानीय सामाजिक परिवेश में नशीले पदार्थों के दुष्प्रभावों पर चर्चा करते हुए पत्रकारों से अपील की कि वे सरकार की नशा मुक्ति पहल को जनसामान्य तक पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभायें। कार्यक्रम के अंत में दूरदर्शन समाचार संपादक सह क्षेत्रीय प्रचार अधिकारी गौरव पुष्कर ने अपने निष्कर्ष संबोधन सह धन्यवाद ज्ञापन में कहा कि वार्तालाप जैसे संवाद कार्यक्रम सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों तक सरकार की योजनाओं और अभियानों को प्रभावी ढंग से पहुंचाने का सशक्त माध्यम हैं।
उन्होंने नशा मुक्त युवा पीढ़ी को विकसित भारत के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अनिवार्य बताया। कार्यक्रम में मौजूद सभी पत्रकारों ने आयोजन की सराहना करते हुए सरकार की योजना और अभियान को जनसाधारण तक पहुंचाने के लिए अपनी अहम भूमिका निभाने की बात कही। कार्यक्रम में पत्र सूचना कार्यालय से प्रिंस कुमार, शिवानी कुमारी केसरी एवं शिवेंद्र नाथ तिवारी उपस्थित भी रहे।
टीम एबीएन, रांची। आजकल लोग अपने घर के समारोहों के लिए आमंत्रण सोशल मीडिया के मार्फत भेजने लग गये हैं। विवाह के आमंत्रण भी इ-कार्ड के माध्यम से मोबाइल पर भेज दिये जाते हैं। एक समय था जब विवाह के कई सप्ताह पूर्व विवाह के कार्ड छपवाये जाते थे और फिर मेजबान उनको घर-घर घूम कर बांटते थे।
इस दौरान वे आने वाले मेहमानों से व्यक्तिगत रूप से मिल भी लेते थे और व्यक्तिगत आमंत्रण भी दे देते थे। पर आजकल यह सब बंद सा हो गया है। लोग ई-कार्ड बनवाते हैं और भेज देते हैं। पर क्या यह वास्तव में आमंत्रण है? मेरे विचार से ई-कार्ड भेजने में कोई समस्या नहीं है। अब समय परिवर्तित हो गया है और सब चीजें डिजिटल होती जा रही हैं।
इस कारण आमंत्रित करने के तरीका भी बदल गया है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हमें इस बदलाव को स्वीकार करना चाहिए। पर समस्या तब उत्पन्न हो जाती है जब लोग ई कार्ड भेज कर अपने कार्य की इतिश्री कर देते हैं, और उसको व्यक्तिगत स्वरूप नहीं देते हैं। मेरे विचार से ई कार्ड भेजने के बाद मेजबान को कम से कम एक बार फोन मेहमान को अवश्य करना चाहिए और व्यक्तिगत रूप से आने का आमंत्रण भेजना चाहिए।
मेरा यह मानना है कि ई कार्ड होने वाले कार्यक्रम की सूचना मात्र है, यह वास्तव में आमंत्रण नहीं है। ई कार्ड से कार्यक्रम की सूचना मात्र दी जाती है। अगर इसके बाद मेजबान का फोन नहीं आये तो मेहमान को समारोह में नहीं जाना चाहिए। मैने यह कई लोगों को कहते सुना है कि उन्होंने कई लोगों को ई_कार्ड भेज कर खानापूर्ति कर दी है; जिनको बुलाना है उनके पास स्वयं जायेंगे या फोन करेंगे।
बल्कि संभ्रांत समाज में लोग आने वाले संभावित लोगों की सूची में उनका ही नाम दर्ज करते हैं जिनको उन्होंने व्यक्तिगत रूप से फोन कर बुलाया है। उदाहरण के स्वरूप मेरे एक मित्र ने अपने करीब 1500 जानने वाले लोगों को अपने बेटे की शादी का ई कार्ड भेजा, पर केटरर को सिर्फ 500 लोगों के भोजन की तैयारी का आदेश दिया।
मेरे कारण पूछने पर उसने साफ कहा कि 1500 लोगों को तो उसने सिर्फ खानापूर्ति के लिए विवाह का समाचार भेजा था, ताकि कल को वे लोग न बुलाने का आरोप न लगायें। जिनको सही में बुलाना था उनकी संख्या तो मात्र 550 से 600 के बीच थी और उसने उनको ही महज फोन किया और इसी कारण भोजन भी मात्र 500 के लगभग लोगों का बनाया गया।
उसका मानना था कि एकाध मेहमान ही होगा जो ई कार्ड पर आ जायेगा, वरना वे लोग जिन्हें फोन नहीं किया गया है, नहीं आयेंगे। और ऐसा ही हुआ। उसके समारोह में वही लोग आये जिनको ई कार्ड के अलावा व्यक्तिगत रूप से आमंत्रण दिया गया था। इस कारण हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हम ई कार्ड का प्रयोग करें पर साथ ही इसमें व्यक्तिगत स्वरूप का भी ध्यान रखें।
हमें याद रखना चाहिए कि मेहमान को बुला कर हम उस पर एहसान नहीं करते बल्कि वे हमारे समारोह में आकर हम पर एहसान करते हैं। किसी भी समारोह की शान तो मेहमान ही होते हैं। अगर मेहमान ही नहीं तो समारोह कैसे होगा! मैंने एक ऐसा भी केस देखा है जब मेरे एक सहकर्मी ने कुछ वर्ष पूर्व अपने नए घर के गृह प्रवेश का आमंत्रण ईकार्ड के माध्यम से कार्यालय के लगभग 150 लोगों को दिया और इतने हो लोगों के भोजन की व्यवस्था भी की।
पर एक कार्यालय में होने के बावजूद न उसने व्यक्तिगत रूप से आने के किसी को कहा और न ही किसी को फोन किया। उसके समारोह में मात्र नौ या दस लोग ही आये और वे भी अकेले, परिवार सहित नहीं। इस से न सिर्फ उसका समारोह खराब हो गया बल्कि भोजन भी बर्बाद हुआ। समाज में उसकी छवि भी धूमिल हुई कि उसके लोगों के साथ संबंध अच्छे नहीं हैं और उसके घर कोई नहीं आता!
सामाजिकता का सरोकार भी यही कहता है कि ई कार्ड भेजें पर साथ में व्यक्तिगत फोन कॉल भी अवश्य करें वरना समझदार व्यक्ति ई कार्ड को सूचना मात्र ही समझेगा, आमंत्रण नहीं और वह आपके समारोह में नहीं आयेगा। (लेखक कॉस्ट अकाउंटेंट सह मोटिवेटर हैं।)
टीम एबीएन, रांची। आजकल लोग अपने घर के समारोहों के लिए आमंत्रण सोशल मीडिया के मार्फत भेजने लग गये हैं। विवाह के आमंत्रण भी इ-कार्ड के माध्यम से मोबाइल पर भेज दिये जाते हैं। एक समय था जब विवाह के कई सप्ताह पूर्व विवाह के कार्ड छपवाये जाते थे और फिर मेजबान उनको घर-घर घूम कर बांटते थे।
इस दौरान वे आने वाले मेहमानों से व्यक्तिगत रूप से मिल भी लेते थे और व्यक्तिगत आमंत्रण भी दे देते थे। पर आजकल यह सब बंद सा हो गया है। लोग ई-कार्ड बनवाते हैं और भेज देते हैं। पर क्या यह वास्तव में आमंत्रण है? मेरे विचार से ई-कार्ड भेजने में कोई समस्या नहीं है। अब समय परिवर्तित हो गया है और सब चीजें डिजिटल होती जा रही हैं।
इस कारण आमंत्रित करने के तरीका भी बदल गया है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हमें इस बदलाव को स्वीकार करना चाहिए। पर समस्या तब उत्पन्न हो जाती है जब लोग ई कार्ड भेज कर अपने कार्य की इतिश्री कर देते हैं, और उसको व्यक्तिगत स्वरूप नहीं देते हैं। मेरे विचार से ई कार्ड भेजने के बाद मेजबान को कम से कम एक बार फोन मेहमान को अवश्य करना चाहिए और व्यक्तिगत रूप से आने का आमंत्रण भेजना चाहिए।
मेरा यह मानना है कि ई कार्ड होने वाले कार्यक्रम की सूचना मात्र है, यह वास्तव में आमंत्रण नहीं है। ई कार्ड से कार्यक्रम की सूचना मात्र दी जाती है। अगर इसके बाद मेजबान का फोन नहीं आये तो मेहमान को समारोह में नहीं जाना चाहिए। मैने यह कई लोगों को कहते सुना है कि उन्होंने कई लोगों को ई_कार्ड भेज कर खानापूर्ति कर दी है; जिनको बुलाना है उनके पास स्वयं जायेंगे या फोन करेंगे।
बल्कि संभ्रांत समाज में लोग आने वाले संभावित लोगों की सूची में उनका ही नाम दर्ज करते हैं जिनको उन्होंने व्यक्तिगत रूप से फोन कर बुलाया है। उदाहरण के स्वरूप मेरे एक मित्र ने अपने करीब 1500 जानने वाले लोगों को अपने बेटे की शादी का ई कार्ड भेजा, पर केटरर को सिर्फ 500 लोगों के भोजन की तैयारी का आदेश दिया।
मेरे कारण पूछने पर उसने साफ कहा कि 1500 लोगों को तो उसने सिर्फ खानापूर्ति के लिए विवाह का समाचार भेजा था, ताकि कल को वे लोग न बुलाने का आरोप न लगायें। जिनको सही में बुलाना था उनकी संख्या तो मात्र 550 से 600 के बीच थी और उसने उनको ही महज फोन किया और इसी कारण भोजन भी मात्र 500 के लगभग लोगों का बनाया गया।
उसका मानना था कि एकाध मेहमान ही होगा जो ई कार्ड पर आ जायेगा, वरना वे लोग जिन्हें फोन नहीं किया गया है, नहीं आयेंगे। और ऐसा ही हुआ। उसके समारोह में वही लोग आये जिनको ई कार्ड के अलावा व्यक्तिगत रूप से आमंत्रण दिया गया था। इस कारण हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हम ई कार्ड का प्रयोग करें पर साथ ही इसमें व्यक्तिगत स्वरूप का भी ध्यान रखें।
हमें याद रखना चाहिए कि मेहमान को बुला कर हम उस पर एहसान नहीं करते बल्कि वे हमारे समारोह में आकर हम पर एहसान करते हैं। किसी भी समारोह की शान तो मेहमान ही होते हैं। अगर मेहमान ही नहीं तो समारोह कैसे होगा! मैंने एक ऐसा भी केस देखा है जब मेरे एक सहकर्मी ने कुछ वर्ष पूर्व अपने नए घर के गृह प्रवेश का आमंत्रण ईकार्ड के माध्यम से कार्यालय के लगभग 150 लोगों को दिया और इतने हो लोगों के भोजन की व्यवस्था भी की।
पर एक कार्यालय में होने के बावजूद न उसने व्यक्तिगत रूप से आने के किसी को कहा और न ही किसी को फोन किया। उसके समारोह में मात्र नौ या दस लोग ही आये और वे भी अकेले, परिवार सहित नहीं। इस से न सिर्फ उसका समारोह खराब हो गया बल्कि भोजन भी बर्बाद हुआ। समाज में उसकी छवि भी धूमिल हुई कि उसके लोगों के साथ संबंध अच्छे नहीं हैं और उसके घर कोई नहीं आता!
सामाजिकता का सरोकार भी यही कहता है कि ई कार्ड भेजें पर साथ में व्यक्तिगत फोन कॉल भी अवश्य करें वरना समझदार व्यक्ति ई कार्ड को सूचना मात्र ही समझेगा, आमंत्रण नहीं और वह आपके समारोह में नहीं आयेगा। (लेखक कॉस्ट अकाउंटेंट सह मोटिवेटर हैं।)
टीम एबीएन, रांची। एयूसीएल के संस्थापक अक्षत खेतान ने रांची स्थित रेडिसन ब्लू होटल में मीडिया को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने भारत के विकसित हो रहे कानूनी इकोसिस्टम की उस महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला, जो संकटग्रस्त व्यवसायों के समर्थन, कॉरपोरेट गवर्नेंस की मजबूती और बदलते आर्थिक वातावरण में निवेशकों के विश्वास को पुनर्स्थापित करने में निर्णायक बनता जा रहा है।
इंटरएक्टिव सत्र के दौरान, श्री खेतान ने जोर देकर कहा कि पिछले दशक में भारत के दिवालियापन, कॉरपोरेट गवर्नेस और नियामक ढांचे में उल्लेखनीय परिपक्वता आयी है, जिसने व्यापार पुनरुद्धार के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि समय पर कानूनी हस्तक्षेप, बोर्ड-स्तरीय जवाबदेही, पारदर्शी प्रक्रियाएं और नैतिक निर्णय प्रक्रिया अब पूरे कॉरपोरेट क्षेत्र में विश्वास बहाल करने के लिए अनिवार्य हो गयी हैं।
एमएसएमई क्षेत्र पर ध्यान आकर्षित करते हुए, श्री खेतान ने बताया कि यद्यपि एमएसएमई भारत के औद्योगिक और रोजगार ढांचे की रीढ़ हैं, फिर भी वे सीमित ऋण उपलब्धता, भुगतान में देरी, कमजोर पुनर्गठन व्यवस्था और कम कानूनी जागरूकता जैसी लगातार चुनौतियों से जूझ रहे हैं।
उन्होंने बताया कि कई एमएसएमई का संचालन विफलता के कारण नहीं, बल्कि समय पर कानूनी मार्गदर्शन न मिलने और वित्तीय संकट से निपटने के लिए संस्थागत समर्थन की कमी के कारण बंद हो जाता है। उन्होंने कहा कि एयूसीएल कानूनी इकोसिस्टम को मजबूत करना व्यवसायिक निरंतरता सुनिश्चित करने और आर्थिक प्रगति को बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
वित्तीय संस्थानों के दृष्टिकोण पर बोलते हुए, श्री खेतान ने बैंकों में रिकवरी-ड्रिवन मॉडल से बाहर निकलकर रिवाइवल-ओरिएंटेड सोच अपनाने की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आक्रामक रिकवरी कदम, विशेषकर समय से पहले कानूनी प्रवर्तन, अक्सर ऐसे उद्यमों को बंद होने की ओर धकेल देते हैं जिनमें दीर्घकालिक क्षमता होती है। इससे रोजगार का नुकसान होता है और आर्थिक मूल्य नष्ट हो जाता है।
उन्होंने सुझाव दिया कि पुनर्गठन, एकमुश्त निपटान, मध्यस्थता-आधारित वार्ताएं और चरणबद्ध पुनर्भुगतान मॉडल जैसे समाधान हजारों व्यवसायों को बचा सकते हैं, साथ ही ऋणदाताओं के हितों की भी रक्षा कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि रिकवरी नहीं, रिवाइवल विशेषकर टरटए२ के लिए नया सिद्धांत होना चाहिए।
श्री खेतान ने एयूसीएल द्वारा विकसित कई अभिनव पुनरुद्धार और पुनर्गठन समाधानों के बारे में जानकारी साझा की। इनमें शामिल हैं: सेक्टर-विशिष्ट रिवाइवल रणनीतियां, एमएसएमई-केंद्रित कानूनी टूलकिट, कस्टमाइज्ड एडजस्टेड डेब्ट-रिजॉल्यूशन मॉडल, अक-संचालित वित्तीय जोखिम विश्लेषण, गवर्नेस एन्हांसमेंट फ्रेमवर्क इन समाधानों को एयूसीएल की मजबूत लिटिगेशन और एडवाइजरी क्षमताओं के साथ एकीकृत किया गया है।
ताकि न केवल संकटग्रस्त व्यवसायों को स्थिर किया जा सके, बल्कि निवेशकों के विश्वास को भी बढ़ाया जा सके और दीर्घकालिक आर्थिक मूल्य निर्मित हो सके। इस दौरान श्री खेतान ने कहा कि कॉरपोरेट रिवाइवल केवल वित्तीय सुधार नहीं है; यह पारदर्शिता, जवाबदेही और रणनीतिक कानूनी अंतर्दृष्टि के माध्यम से विश्वास को पुनर्निर्मित करने की प्रक्रिया है।
एक मजबूत कानूनी ढांचा सुनिश्चित करता है कि व्यवसाय संकटों पर काबू पा सकें, निवेश आकर्षित कर सकें और देश की सतत आर्थिक वृद्धि में योगदान दे सकें। सत्र मीडिया के साथ बातचीत और रात्रिभोज के साथ संपन्न हुआ, जिसमें एयूसीएल ने विशेषकर एमएसएमई को कानूनी उपकरण, जागरूकता और सलाह प्रदान करने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया, ताकि वे जटिल चुनौतियों के बीच अपने संचालन को पुनर्जीवित कर सकें और भारत के आर्थिक विकास में सार्थक योगदान दे सकें।
मुंबई के प्रतिष्ठित नरीमन पॉइंट में स्थित अवउछ कॉरपोरेट और कानूनी सलाहकारी क्षेत्र में एक विश्वसनीय नाम है। फर्म की सेवाओं में शामिल हैं कॉरपोरेट रणनीति, मर्जर एवं अधिग्रहण, वित्तीय सलाह, डेब्ट सिंडिकेशन, इनसॉल्वेंसी मैनेजमेंट और लिटिगेशन।
एयूसीएल कॉरपोरेट फ्रॉड, व्हाइट-कॉलर क्राइम, बैंकिंग विवाद, कराधान, संकटग्रस्त ऋण और विवाद समाधान जैसे जटिल मामलों पर भी सलाह देती है। फर्म की विशेष सेवाओं में डिजिटल फॉरेंसिक्स, साइबर सुरक्षा, फॉरेंसिक आॅडिट, एंटरप्राइज रिस्क मैनेजमेंट और बिजनेस प्रोसेस री-इंजीनियरिंग शामिल हैं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पश्चिम बंगाल में मुर्शिदाबाद के भरतपुर से टीएमसी विधायक हुमायूं कबीर पश्चिम बंगाल में बाबरी नाम से मस्जिद बनाने का दावा कर रहे हैं। हालांकि उनकी इस जिद के कारण से टीएमसी से उन्हें हाल ही में पार्टी से बाहर निकाला है, पर समस्या अभी समाप्त नहीं हुई है। उनके समर्थकों ने मुर्शिदाबाद में कई जगहों पर बाबरी नाम से मस्जिद बनाने के पोस्टर भी लगाए हैं।
बात अब उस अस्मिता की है जिसमें सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि आखिर मुसलमान बाबर के नाम की माला क्यों जप रहे हैं, जबकि भारत एक पंथ निरपेक्ष देश है, जिसमें किसी भी अत्याचारी, हिंसा करनेवाले आततायी के लिए कोई जगह नहीं है। वैसे कोई भी मस्जिद बनाने के लिए स्वतंत्र है, किंतु प्रश्न यही है कि इसके बाद भी बाबर के नाम पर इस देश में मस्जिद क्यों मुसलमान बनाना चाहते हैं। हुमायूं आज जो कह रहे हैं उस पर भी सभी को गौर करना चाहिए, वे कहते हैं, नाम पर आपत्ति कैसे है?
अगर मेरा बेटा पैदा हो तो मैं उसका क्या नाम रखूं, ये बताने वाले दूसरे कौन होते हैं। ये मेरे कौम का मामला है। कौम के लोग मदद कर रहे हैं। बात एक दम साफ है, कौम के लोग मदद कर रहे हैं, इसलिए ये बाबर के नाम की फिर से मस्जिद भारत में बनायी जा रही है। वस्तुत: इतिहास में दर्ज घटनाएं उन तारीखों से नहीं मिटाई जा सकती जो बाबर के क्रूर अत्याचार की कहानी कहती हैं। भारत के इतिहास में अनेक आक्रांताओं ने आकर यहां के समाज, संस्कृति और परंपराओं पर गहरे घाव छोड़े हैं, परंतु जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर का नाम उनमें सबसे प्रमुख रूप रहा है।
बाबर को लेकर जो वर्ग उसे एक आदर्श या गौरवपूर्ण चरित्र के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करता है, उसे एक बार उन तमाम प्रामाणिक इतिहास, विशेषकर बाबर की आत्मकथा बाबरनामा, गुलबदन बेगम का हुमायूंनामा और अनेक स्वतंत्र इतिहासकारों के विवरण जरूर देखने चाहिए। यह सभी स्पष्ट करते हैं कि बाबर एक ऐसा विदेशी आक्रांता था जो भारत में सत्ता, लूट और धार्मिक (इस्लामिक) वर्चस्व स्थापित करने आया था। उसकी नीतियां, उसके सैन्य अभियान और उसकी मानसिकता का केंद्र बिंदु विरोध करने वाले काफिरों का विनाश और धन की लूट थी।
बाबर का भारत पर आगमन उसके युद्ध केवल राजनीतिक महत्वाकांक्षा तक सीमित नहीं थे। बाबर स्वयं अपने फतहनामे में लिखता है कि इस्लाम की खातिर जंगलों में भटका, हिंदुओं और मूर्तिपूजकों से युद्ध का संकल्प लिया और अंतत: गाजी बना। यह कथन स्पष्ट संकेत देता है कि बाबर का अभियान धार्मिक इस्लामिक, जिहादी कट्टरता से प्रेरित था। खानवा की लड़ाई में राणा सांगा पर विजय प्राप्त करने के बाद उसने स्वयं को गाजी घोषित किया, एक ऐसी उपाधि जिसका अर्थ है अन्य मत के अनुयायियों को मारने वाला।
यह गौरवपूर्ण उपलब्धि नहीं है, यह तो हिंसा की मानसिकता की स्वघोषित स्वीकारोक्ति है। बाबर जहां-जहां गया, वहां उसने अपनी क्रूरता के निशान छोड़े। हुमायूंनामा में गुलबदन बेगम का वर्णन बाजौर के किले पर हुए उसके हमले का है, जिसमें लिखा है कि बाबर ने दो-तीन घड़ी में दुर्ग जीतकर सभी निवासियों को मरवा दिया क्योंकि वहां कोई मुसलमान नहीं था। यह कोई युद्ध नीति नहीं कही जा सकती, यह तो गैर मुसलमानों के प्रति धार्मिक असहिष्णुता का भयानक उदाहरण है।
यही नहीं, बाबर के आदेश पर या उसके सेनापतियों की कार्रवाई से अनेक मंदिर ध्वस्त किये गये। संभल में मंदिर को मस्जिद में परिवर्तित किया गया, चंदेरी में मंदिर तोड़े गये और उरवा के जैन मंदिरों का विनाश किया गया। अयोध्या में राम जन्मभूमि पर निर्मित प्राचीन मंदिर को उसके सेनापति मीर बाकी ने उसके आदेश पर ध्वस्त कर दिया और उसी स्थान पर मस्जिद बनायी।
इतिहासकार सीताराम गोयल ने अपनी पुस्तक Hindu Temples: What Happened to Them? में इन विध्वंसों को प्रमाणों सहित प्रस्तुत किया है और यह दिखाया है कि बाबर मंदिरों को नष्ट करता ही था और स्वयं इस विनाश को अपने शासन का हिस्सा मानता था। मोहन मुन्दाहिर की घटना बाबर की क्रूरता का एक और प्रमाण है। बाबरनामा के अनुसार, एक काजी की शिकायत पर बाबर ने अली कुली हमदानी को तीन हजार सैनिकों के साथ भेजकर प्रतिशोध की कार्रवाई करवाई।
इसमें लगभग एक हजार हिंदू मारे गये और इतने ही स्त्री-पुरुष और बालक बंदी बनाये गये। यह कोई सैन्य संघर्ष नहीं था, सीधे तौर पर प्रतिशोध की हिंसा थी। बाबर ने मृतकों के कटे हुए सिरों की मीनार बनवायी जो उस समय की मुगल परंपरा में क्रूरता का प्रतीक थी। बंदी बनाए गए हिन्दू लोगों की स्त्रियों को सैनिकों में बांट दिया गया और मोहन मुन्दाहिर को जमीन में गाड़कर तीरों से मार डाला गया। यह दृश्य अपने आप में बहुत कुछ कह देता है, यह कोई विजय का उत्सव नहीं कहा जा सकता है, यह तो अमानवीय अत्याचार का घोर प्रमाण है।
1527 और 1528 के उसके अभियान, विशेषकर राणा सांगा और मेदिनीराय के विरुद्ध, भारतीय इतिहास पर गहरी चोट हैं। चंदेरी के युद्ध के बाद वहां की रानी मणिमाला और लगभग 1600 महिलाओं ने जौहर कर लिया, ताकि वे मुगल सेना के अत्याचारों का शिकार न बनें। कहना होगा कि बाबर का भारत से स्वाभाविक, सांस्कृतिक या भावनात्मक कोई संबंध नहीं था। वह फरगना का निवासी था। भारत उसके लिए मजहबी (धार्मिक) और सैन्य विजय का केंद्र था।
उसने भारत में अपने चार वर्ष के शासन के दौरान सिर्फ लूट, सत्ता विस्तार और गैर मुसलमानों पर घोर अत्याचार, हिंसा की। उसने कोई निर्माण कार्य, प्रशासनिक सुधार या सांस्कृतिक योगदान नहीं दिया जिसके आधार पर उसे भारतीय इतिहास में एक आदर्श शासक माना जा सके। उसका शासन विनाश, लूट और सांप्रदायिक द्वेष की घटनाओं से भरा हुआ है। वस्तुत: भारत में मस्जिदों के निर्माण पर कोई आपत्ति नहीं, किंतु बाबर जैसे आक्रमणकारी के नाम पर मस्जिद का नाम रखना ऐतिहासिक और नैतिक दोनों स्तरों पर अनुचित है।
सम्मान उन व्यक्तियों का होना चाहिए जिन्होंने मानवता, सहिष्णुता और सभ्यता के लिए कार्य किया हो, न कि उन लोगों का जिन्होंने स्वयं अपनी आत्मकथा में नरसंहार और मंदिरों के विध्वंस का बखान किया हो। इस दृष्टि से देखा जाए तो बाबर का बचाव करना, उसे आदर्श बताना या उसकी स्मृति में निर्मित ढांचों को सम्मानजनक स्थान देना एक प्रकार से भारत की सभ्यता, इसकी ऐतिहासिक पीड़ा और इसकी सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति संवेदनहीनता का परिचायक है। यह स्पष्ट है कि भारत जैसे बहु सांस्कृतिक और बहु धार्मिक देश में किसी भी समुदाय के पूजा स्थलों का विरोध नहीं किया जा सकता, परंतु यह भी उतना ही स्पष्ट है कि किसी ऐसे व्यक्ति का सम्मान करना जिसने मानवता और भारतीय समाज पर आघात किया, वास्तव में राष्ट्रीय चेतना के विरुद्ध है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। 1997 के आसपास पश्चिम में किये गये एक अध्ययन में पता चला कि फॉर्च्यून 500 कंपनियों का औसत जीवनकाल 40-50 वर्ष से कम है। 1970 में सूचीबद्ध फॉर्च्यून 500 कंपनियों में से एक-तिहाई 1983 तक लुप्त हो चुकी थीं और सभी नवगठित कंपनियों में से 40% दस वर्ष से भी कम समय तक चलीं। आईआईएम बैंगलोर के एक अध्ययन के अनुसार, इन व्यवसायों में प्रबंधकों को अत्यधिक तनाव, प्रभुत्व और नियंत्रण के लिए संघर्ष, निराशावाद और ऐसे कार्य वातावरण का सामना करना पड़ता है जो मानवीय कल्पना/ रचनात्मकता, जीवन शक्ति और प्रतिबद्धता को दबा देता है।
जीवन की समग्र गुणवत्ता और कार्य जीवन के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है। संगठनात्मक स्थिरता और पर्यावरण पर इसका प्रभाव एक प्रमुख चिंता का विषय बना हुआ है। प्रबंधक और अधिकारी अक्सर इस बात से सहमत होते हैं कि हाल के दशकों में प्रबंधन में उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है। कार्य और जीवन को एक साथ लाने के लिए, व्यक्ति की आंतरिक स्वतंत्रता और स्थिति बाहरी दुनिया के साथ सामंजस्य में होनी चाहिए।
शरीर के सामंजस्य और स्वस्थ स्वास्थ्य के लिए, तीनों गुणों (सत्व, रज और तम) का समन्वय आवश्यक है, क्योंकि असंतुलन व्यक्ति को शारीरिक या मानसिक रूप से अस्वस्थ कर सकता है। परिणामस्वरूप, व्यक्तित्वों के बीच आंतरिक संतुलन की आवश्यकता होती है, जिसे बाहरी स्वास्थ्य के संदर्भ में देखा जा सकता है। हालांकि, आंतरिक शांति तभी प्राप्त हो सकती है जब हमारे बाहरी संबंध संतुलित हों।
किसी व्यक्ति के बाह्य वातावरण में प्रकृति (अग्नि, पृथ्वी, जल, वायु और आकाश), जलवायु परिस्थितियां, दूसरों के साथ संबंध और श्रम जैसे तत्व शामिल होते हैं। भगवद्गीता के अनुसार, जीवन ब्रह्मांडीय और व्यक्तिगत ऊर्जाओं के बीच सतत संघर्ष है। सत्व गुण की उच्च मात्रा आंतरिक और बाह्य संतुलन को बढ़ावा देती है, जिसके परिणामस्वरूप आनंद, हर्ष और खुशी की अनुभूति होती है। तमस गुण का उच्च स्तर व्यक्ति के बाहरी दुनिया के साथ संबंधों को बिगाड़ सकता है और इसके परिणामस्वरूप आनंद की कमी, पीड़ा और दु:ख हो सकता है।
तीसरा गुण, तमस, उदासीनता का प्रतिनिधित्व करता है। कर्म के प्रति प्रतिरोध मृत्यु, विनाश और हानि जैसे नकारात्मक परिणामों की ओर ले जाता है। भगवद्गीता और अन्य शास्त्र उन लोगों के लिए उपलब्ध हैं जिनके पास तर्क और अंतर्दृष्टि है। ये प्राचीन शास्त्र प्रबंधकों को कार्य और गृहस्थ जीवन के संतुलन के लिए आसान और प्रभावी समाधान प्रदान करते हैं, जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।
भगवद् गीता को कर्मचारी की कार्यकुशलता और प्रभावशीलता में सुधार लाने के लिए एक व्यापक मार्गदर्शिका माना जाता है, जो व्यक्ति की कमजोरियों को ताकत में बदलने, जिम्मेदारियों को साझा करने, टीम में सही व्यक्ति का चयन करने, नौकरी के माहौल में चुनौतियों के बारे में जागरूक होने, दुविधाओं में प्रेरित करने, ऊर्जा देने और परामर्श देने वाले करिश्माई नेताओं की आवश्यकता और जमीनी हकीकत का ज्ञान शुरू करने जैसे विचारों का प्रसार करती है। भगवद् गीता विचारों और कार्यों, लक्ष्यों और सफलता, योजनाओं और उपलब्धियों, उत्पादों और बाजारों के माध्यम से कार्य संतुलन में सामाजिक समझौता प्राप्त करती है।
इस पवित्र ग्रंथ में भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश शामिल हैं, जो एक महत्वपूर्ण वास्तविकता को उजागर करते हैं जो आधुनिक कार्यस्थल संबंधों के लिए प्रासंगिक है। आजकल कई पेशेवर महत्वपूर्ण परिस्थितियों में ठिठक जाते हैं, जैसे अर्जुन अपने कर्तव्य के आगे ठिठक गये थे। उनका युद्धक्षेत्र केवल एक भौतिक स्थल नहीं था; यह कार्यस्थल की अंतिम दुविधा का प्रतिनिधित्व करता था, जहां व्यक्तिगत आदर्श पेशेवर प्रतिबद्धताओं से टकराते थे।
अर्जुन के लक्षण आधुनिक मनोविज्ञान में तीव्र तनाव प्रतिक्रियाओं से मेल खाते हैं: मेरे शरीर के अंग कांप रहे हैं और मुंह सूख रहा है, पूरा शरीर कांप रहा है, रोंगटे खड़े हो रहे हैं, और त्वचा पूरी तरह जल रही है। अधिकारी उच्च-दांव वाले निर्णय लेते समय समान शारीरिक लक्षणों की रिपोर्ट करते हैं- मनोवैज्ञानिक तनाव के प्रति शारीरिक प्रतिक्रियाएं जो निर्णय लेने की क्षमता को कमजोर कर देती हैं।
अपनी नौकरी में कर्म योग का उपयोग कैसे करें? आधुनिक कंपनियों को कर्म योग को लागू करने के लिए यथार्थवादी रणनीतियों की आवश्यकता होती है। पुरस्कारों से ज्यादा उत्कृष्ट कार्य को प्राथमिकता दें। भावनाओं पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, ऐसी प्रस्तुतियां दें जो मूल्य और स्पष्टता प्रदान करें। अपने रोजगार को व्यक्तिगत लाभ से परे एक सेवा के रूप में देखें। यह दृष्टिकोण नियमित कामकाज को उद्देश्य प्रदान करता है।
भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के अनुसार, योग: कर्मसु कौशलम् कर्म के कौशल का प्रतीक है। आपके द्वारा किए जाने वाले हर कार्य में उत्कृष्टता झलकनी चाहिए, चाहे आपको कितनी भी प्रशंसा मिले। प्रशंसा और आलोचना दोनों प्राप्त करते समय संतुलित दृष्टिकोण बनाये रखें। इनमें से कोई भी आपकी योग्यता निर्धारित नहीं करता।
भगवद्गीता एक प्राचीन भारतीय साहित्य है जिसमें एक सार्थक और संपूर्ण जीवन जीने के बारे में प्रचुर ज्ञान समाहित है। गीता व्यक्ति के धर्म या जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने की आवश्यकता पर बल देती है। इस धारणा को प्रबंधकीय कार्य में कई तरह से लागू किया जा सकता है।
पहला, अपने धर्म को जानना और उसका पालन करना प्रबंधकों को अपनी टीम या व्यवसाय के लिए स्पष्ट लक्ष्य और उद्देश्य निर्धारित करने में सहायता कर सकता है, जो प्रबंधक अपनी गतिविधियों को एक उच्च उद्देश्य के साथ जोड़ते हैं, वे अपनी टीम से अधिक समर्पण और प्रतिबद्धता को प्रेरित कर सकते हैं। इसके अलावा, प्रबंधक इस ध्यान का उपयोग व्यापक हित को ध्यान में रखते हुए कठिन निर्णय लेने के लिए कर सकते हैं।
दूसरा, योग और ध्यान पर भगवद्गीता की शिक्षाएं प्रबंधकों को अधिक आत्म-जागरूकता और भावनात्मक बुद्धिमत्ता प्राप्त करने में सहायता कर सकती हैं। ये रणनीतियां प्रबंधकों को तनावपूर्ण परिस्थितियों में अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना और अपने कर्मचारियों की आवश्यकताओं और प्रेरणाओं को बेहतर ढंग से समझना सीखने में मदद कर सकती हैं। अंत में, भगवद्गीता दूसरों की सेवा के महत्व पर प्रकाश डालती है।
इस धारणा को प्रबंधन में एक ऐसी कंपनी संस्कृति को बढ़ावा देकर लागू किया जा सकता है जो समाज को वापस देने पर जोर देती है। उदाहरण के लिए, प्रबंधक कर्मचारियों से अपना समय स्वेच्छा से देने या धर्मार्थ संगठनों को धन और समय दान करने का आग्रह कर सकते हैं। प्रबंधक कार्यस्थल में करुणा का दृष्टिकोण विकसित कर सकते हैं, जिससे यह अधिक प्रसन्न और उत्पादक बन सकता है।
गीता कहती है, सबसे बुनियादी विचारों में से एक पृथक्करण है। एक प्रबंधक को अपनी गतिविधियों के परिणामों से खुद को अलग करने में सक्षम होना चाहिए और उनसे जुड़ा नहीं होना चाहिए। इससे वह योजना के अनुसार काम न होने पर निराश या हताश होने के बजाय अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने पर ध्यान केंद्रित कर पाता है। अनासक्ति बेहतर निर्णय लेने में भी सक्षम बनाती है क्योंकि यह भावनाओं या परिणामों से अप्रभावित रहती है।
भगवद् गीता का सारांश दशार्ता है कि अनासक्ति विकसित करने का अर्थ काम की परवाह न करना नहीं है। इसके बजाय, यह हमारी सोच में बाधा डालने वाले भावनात्मक अवरोधों को दूर करके हमारी उत्पादकता में सुधार करता है। कृष्ण कहते हैं कि निरंतर ज्ञान वाला व्यक्ति इंद्रिय तृप्ति की सभी इच्छाओं का त्याग कर देता है और शांति प्राप्त करता है। एक अन्य महत्वपूर्ण सिद्धांत धर्म या दायित्व का है।
एक प्रबंधक को अपनी टीम और संगठन के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करना चाहिए। उसे सही काम करना चाहिए, भले ही वह लोकप्रिय या सरल न हो। इसके लिए नैतिकता और नैतिक अखंडता की एक मजबूत भावना आवश्यक है। अंतत:, एक नेता को हमेशा करुणा और सहानुभूति का प्रदर्शन करना चाहिए। उसे अपने कर्मचारियों के साथ सम्मान और दयालुता से पेश आने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि वे सभी मनुष्य हैं और काम के बाहर भी उनकी निजी जिंदगी है।
इन अवधारणाओं का पालन करने से एक प्रबंधक एक खुशहाल और उत्पादक कार्य वातावरण स्थापित कर सकता है जिसमें सभी फल-फूल सकें। भगवद्गीता भौतिक संपत्ति से अलगाव की आवश्यकता पर जोर देती है। इस धारणा का उपयोग प्रबंधन द्वारा व्यक्तिगत लाभ या सत्ता संघर्ष में उलझने के बजाय संगठन के लक्ष्यों और मिशन पर केंद्रित रहकर किया जा सकता है।
आज के युवा हमारे राष्ट्र के अमूल्य उपहार हैं। गीता के माध्यम सें उन्हें उचित रूप से आकार देना और ढालना, साथ ही उनके व्यक्तित्व को निखारने में उनकी सहायता करना, उनके हृदय को पूर्णत: शुद्ध महसूस कराना, साथ ही उन्हें ब्रह्मांड के बेहतर नागरिक बनाकर उन्हें एक कदम आगे ले जाना, जो आगे चल कर बेहतर दुनिया का निर्माण करेंगे।
ब्रह्मांड के आधुनिक युवा आज अत्यधिक तनाव, दबाव और चिंता झेल रहे हैं। वे जल्दी बूढ़े हो जाते हैं और विभिन्न प्रकार की बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। भगवद्गीता में निहित शिक्षाओं का उपयोग जनरेशन जेड को अपने जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखने, आध्यात्मिक रूप से विकसित होने और उन्हें एक महान और शांत जीवन जीने का तरीका बताने में मदद करने के लिए किया जा सकता है।
भगवद्गीता का दिलचस्प पहलू यह है कि यह अनुयायी को इस सांसारिक जगत में सब कुछ त्यागने का औचित्य नहीं बताती। यह केवल मन और आत्मा को शुद्ध करती है, जो व्यक्ति को पूरी तरह से व्यथित करती है और उसे अपने आंतरिक स्व और परम सत्ता की खोज करने का अवसर देती है। इसके अलावा, यह युवाओं में मूल्यों और नैतिकता का संचार करता है, उन्हें भारत और शेष विश्व के नए स्वर्ण युग के लिए बेहतर वैश्विक नागरिक बनने के लिए तैयार करता है।
भगवद्गीता का प्रतिदिन पाठ करना और उसके पाठों व श्लोकों को समझना, साथ ही दैनिक चिंताओं और समस्याओं से मुक्त जीवन जीना, आपको युवा बने रहने और अपने जीवन में वर्षों जोड़ने में मदद करता है, जिससे युवाओं का भविष्य शांतिपूर्ण व प्रगतिशील बनता है। भगवान कृष्ण ने अर्जुन को भगवद्गीता का उपदेश दिया ताकि उन्हें अपना कार्य और कर्तव्य पूरा करने के लिए प्रेरित किया जा सके, जब वह कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अपने सगे-संबंधियों और मित्रों को पराजित और मार डालने या न करने के नैतिक दुविधा का सामना कर रहे थे।
भगवद्गीता इस मायने में गंगा के समान है कि यह ज्ञान, कर्तव्य और कर्म पर बल देती है। जिस प्रकार गंगा नदी इस धरती पर अनेक युगों से बहती आ रही है और जाति, रंग, पंथ या मूल देश की परवाह किये बिना हर प्यासे व्यक्ति की प्यास बुझाती आ रही है, उसी प्रकार भगवद् गीता भी जाति, पंथ, धर्म या राष्ट्र की परवाह किए बिना मानव जाति के कल्याण के लिए उपयोगी साबित हो रही है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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