विचार

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Published / 2024-06-04 19:24:14
धरती, हमलोग और हमारा भविष्य

पर्यावरण दिवस विशेष

गिरीश्वर मिश्र

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पर्यावरण जीवों और उनके जीवन का आधार और एक अनिवार्य घटक है। उसके बिना जीवन अकल्पनीय है। हमारा जीवन-चक्र पर्यावरण में स्थित है और पर्यावरण द्वारा ही आयोजित होता है। हम उसी में जन्म लेते हैं, जीते हैं और मृत्यु के बाद उसी में विलीन हो जाते हैं। हम वनस्पतियों और अन्य प्राणियों की ही तरह पर्यावरण के अंग होते हैं परंतु अपने अहंकार में हम अपनी इस मौलिक सदस्यता को भूल कर अपने को पर्यावरण से अलग तत्व के रूप में देखते हैं। 

हम मनुष्य और पर्यावरण की दो अलग-अलग कोटियां या श्रेणियां बना लेते हैं जो भिन्न मान ली जाती हैं। इनके बीच का रिश्ता भी उपभोक्ता (कंज्यूमर) और उपभोग्य वस्तु (कंज्यूमेबल आब्जेक्ट) मान बैठे हैं। पर्यावरण हमारे लिए एक संसाधन होता गया है जिनमें कुछ नवीकरणीय भी होते हैं और कुछ समाप्त हो कर उस रूप में वापस नहीं मिलते। अपनी संपदाओं के कारण धरती को वसुंधरा कहते हैं। वह हमारे लिए सुख के स्रोत उपलब्ध कराती है। 

पर्यावरण में मौजूद विविध पदार्थों, ऊर्जा के श्रोतों (जैसे : कोयला, पेट्रोल आदि), जल संसाधनों, भिन्न-भिन्न गुणवत्ता के भूमि रूपों (जहां किस्म-किस्म के अन्न, फल, लकड़ी, औषधि और अन्य पदार्थ पैदा होते हैं) को लेकर हम बड़े प्रसन्न होते हैं। पर पर्यावरण की इस सम्पदा को सिर्फ निष्क्रिय निर्जीव वस्तुओं के संसाधन के रूप में मान बैठना भ्रम है। 

इसलिए ऐसा सोचना ठीक तो है परन्तु यह आधी सच्चाई है। पर्यावरण को सिर्फ संसाधन मान बैठना न सही है न वांछित। पर्यावरण से हमारा पारस्परिक रिश्ता है। वह हमें रचता है और हमसे अपेक्षा है कि हम उसकी रक्षा करें। इस तरह पृथ्वी पर एक जीवन-चक्र चलता सदैव चलता रहता है। इन सबको देखते हुए ही धरती को माता कहा गयाझ्र माता भूमि: पुत्रोहं पृथिव्या:। पृथ्वी सभी प्राणियों का बिना भेद-भाव के माता की तरह भरण-पोषण करती है। 

आज इसे भुला कर हम निर्मम भाव से इस पर्यावरण को अपने अविवेकपूर्ण आचरण द्वारा तरह-तरह से आघात पहुंचा कर लगातार उसका हृदय छलनी कर रहे हैं और शरीर नष्ट-भ्रष्ट कर रहे हैं। ऐसा करते हुए अपने ही पैरों पर ही कुल्हाड़ी चला रहे हैं। पेड़ कटते जा रहे हैं, वन जलाये जा रहे हैं, कंक्रीट के जंगल उग रहे हैं, और रासायनिक खाद से धरती की उर्वराशक्ति नष्ट हो रही है। 

हमारी भौतिकवादी दृष्टि कितनी दूषित हो चुकी है कि हम प्रकट सत्य का भी प्रत्यक्ष नहीं कर पाते हैं और न वह क्षति ही महसूस कर पाते हैं जिसकी भरपाई संभव ही नहीं है। ग्रीन गैस का उत्सर्जन जिस तरह हो रहा है और कार्बन डाई आक्साइड जिस तरह बढ़ रहा है वह सब जीवन के विरुद्ध है। पर्यावरण की ओर से हमें लगातार चेतावनी मिल रही है और हम हैं कि उसे अनसुना करते रहे हैं। 

ग्लेशियर का पिघलना, अति वर्षा, सूखा, बाढ़ और गर्मी का अत्याधिक बढ़ना ऐसे ही संकेत हैं। आज धरती और पर्यावरण की सीमाओं को बिना पहचाने उसका अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है। ऐसा करते हुए हम यह अकसर भूल जाते हैं कि हमारा आहार, हमारी सांसें और हमारे कार्य-कलाप सब कुछ पर्यावरण से ही उधार लिया हुआ है। यदि पर्यावरण इसमें कोई कोताही करता है तो परिस्थिति विकट हो जाती है। 

कुछ ही दिनों पहले कोविड झ्र 19 की महामारी के दौरान हम सबने विश्व भर में यह बात अपनी आंखों देखी कि पर्यावरण के साथ रिश्ता कितना नाजुक होता है। उस दौरान आक्सीजन की कालाबाजारी तक हुई थी। मनुष्य की पर्यावरण के साथ रिश्तों में भागीदारी का सबसे घातक पक्ष प्रदूषण है जो वायु, जल, पृथ्वी सब में तेजी से फैलता जा रहा है। विकास के साथ तरह-तरह के कूड़ा-कचरा की मात्रा भी तेजी से बढ़ रही है जिसके निस्तारण की कोई माकूल व्यवस्था हम नहीं कर सके हैं।

हमारी धरती हमारा भविष्य है। हम लोगों को पर्यावरण संरक्षित करने की कोशिश करनी होगी। धरती और उसकी परिस्थितिकी को बचाना हमारा पहला कर्तव्य बनता है। जैव विविधता को बचाना और जलवायु परिवर्तन के खतरों से बचाना मनुष्यता की रक्षा के लिए जरूरी है। धरती हमें जीने का अवसर देती है उसकी रक्षा और हरी-भरी दुनिया के लिए हर स्तर पर प्रयास जरूरी है। 

साइकिल का उपयोग, सार्वजनिक वाहन का उपयोग, वस्तुओं का यथा सम्भव पुन: उपयोग, वृक्षारोपण, और स्थानीय सामग्री का अधिकाधिक उपयोग आदि कुछ छोटी पहल भी हरित आर्थिकी (ग्रीन इकॉनमी) का मार्ग प्रशस्त करने में सहायक होगी। (लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के पूर्व कुलपति हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2024-06-03 21:23:31
मनमोहन के दूसरे कार्यकाल से आगे निकला मोदी का दूसरा कार्यकाल

नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल ने मनमोहन सिंह के कार्यकाल को छोड़ा पीछे

  • अगर हम पहला कार्यकाल देखें, तो सिंह के कार्यकाल में बाजार में 2.7 गुना की वृद्धि हुई, जो मोदी के पहले कार्यकाल में 55 प्रतिशत की वृद्धि से कहीं ज्यादा है

सुन्दर सेतुरामन

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली एनडीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में बाजार का प्रदर्शन यूपीए के दूसरे कार्यकाल से बेहतर रहा है। लेकिन अलग कुल मिलाकर, 10 साल की अवधि में देखा जाये तो मनमोहन सिंह के कार्यकाल में बाजार का प्रदर्शन नरेंद्र मोदी से बेहतर रहा है। हालांकि, अगर अलग-अलग कार्यकालों की तुलना करें, तो नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल में बेंचमार्क सेंसेक्स में 87 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो कि मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में 80 प्रतिशत की वृद्धि से थोड़ा ज्यादा है। लेकिन, अगर हम पहला कार्यकाल देखें, तो सिंह के कार्यकाल में बाजार में 2.7 गुना की वृद्धि हुई, जो मोदी के पहले कार्यकाल में 55 प्रतिशत की वृद्धि से कहीं ज्यादा है। 

इसके परिणामस्वरूप, सन 2004 से 2014 तक यूपीए के शासन के 10 सालों के दौरान सेंसेक्स ने 5 गुना रिटर्न दिया और पिछले 10 सालों के दौरान एनडीए के शासन में 3 गुना रिटर्न दिया। दोनों सरकारों को 2008 में वैश्विक वित्तीय संकट और 2020 में कोविड-19 महामारी जैसे प्रमुख आर्थिक और बाजार झटकों का सामना करना पड़ा। पिछले 10 सालों में अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए लिये गये कुछ बड़े फैसलों की वजह से थोड़ी उथल-पुथल भी देखने को मिली, लेकिन इन फैसलों से भारतीय अर्थव्यवस्था को आधुनिक बनाने में मदद मिली। 

इन फैसलों में कुछ प्रमुख थे : नवंबर 2016 में नोटबंदी, जुलाई 2017 में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करना, मई 2016 में दिवाला और शासी संहिता का कानून बनना और सितंबर 2019 में कंपनी टैक्स में कटौती। भले ही महामारी और कुछ बड़े फैसलों के बाद शेयर बाजार में अचानक गिरावट आयी, लेकिन चीजें जल्दी पटरी पर लौट आयीं। इससे लोगों के लिए अपनी बचत को शेयर बाजार में लगाना आसान हो गया। अब लोग सीधे निवेश या म्यूचुअल फंड के जरिए ज्यादा पैसा शेयर बाजार में लगा रहे हैं। इससे भारत को विदेशी निवेशकों के पैसों पर उतना निर्भर नहीं रहना पड़ रहा है। 

अल्फानीति फिनटेक के सह-संस्थापक यू आर भट ने कहा कि पहले सिर्फ विदेशी निवेशक ही बाजार को प्रभावित करते थे, लेकिन पिछले कुछ सालों में घरेलू निवेशक भी अहम भूमिका निभाने लगे हैं। मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के दौरान अर्थव्यवस्था अच्छी स्थिति में थी, इसलिए उनके लिए आगे बढ़ना ज्यादा मुश्किल नहीं था। 

वहीं दूसरी तरफ, मोदी को उस वक्त अर्थव्यवस्था संभालनी पड़ी थी जब भारत फ्रैजाइल फाइव में शामिल था। लेकिन उनकी खूबी यह है कि उन्होंने उन बड़े सुधारों को भी आगे बढ़ाया जिनसे उनके पूर्ववर्ती नेता दूर ही रहते थे, जैसे जीएसटी या बुनियादी ढांचे में भारी निवेश। उनका कहना है कि घरेलू निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी और बड़े नीतिगत बदलावों का असर भारतीय बाजार को भविष्य में बेहतर रिटर्न देने में मदद करेगा।

Published / 2024-06-02 20:38:59
बदलते सामाजिक परिवेश से डिमेंशिया की गिरफ्त में आते बुजुर्ग

डॉ राजेंद्र प्रसाद शर्मा

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जैसे-जैसे बुजुर्गों की संख्या बढ़ने लगी है वैसे ही डिमेंशिया की बीमारी का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। बहुत कुछ आज की सामाजिक व्यवस्था व सामाजिक परिवेश डिमेंशिया का कारण बनता जा रहा है। एक ओर एकल परिवार, अपने में खोये रहना और दिन-प्रतिदिन की भागमभाग है तो दूसरी और पढ़ने-पढ़ाने की आदत कम होना, प्रमुख कारण है। गूगल गुरु ने तो सबकुछ बदल कर ही रख दिया है। दुनिया में डिमेंशिया प्रभावितों की संख्या में दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो अगले 25 साल में डिमेंशिया की रोगियों की संख्या में तीन गुणा बढ़ोतरी हो जाएगी।

डिमेंशिया खासतौर से बुजुर्गों की होने वाली बीमारी है। इसमें मनोभ्रांति की स्थिति हो जाती है और भूलने या निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है। इसमें बुजुर्ग धीरे-धीरे अपनी याददाशत को खोने लगते हैं। भारत के संदर्भ में यह इसलिए गंभीर हो जाती है कि चीन और जापान की तरह भारत में भी आने वाले सालों में बुजुर्गों की संख्या अधिक हो जायेगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार दुनिया के देशों में डिमेंशिया की बीमारी से पांच करोड़ लोग जूझ रहे हैं। एक अध्ययन के अनुसार 2050 तक डिमेंशिया से प्रभावितों की संख्या 15 करोड़ से अधिक होने की संभावना है। 

दुनिया के देशों में हर साल करीब 10 लाख लोग इस बीमारी की गिरफ्त में आ रहे हैं। वाशिंगटन विश्वविद्यालय के अध्ययन के अनुसार अफ्रीका के उपसहारा क्षेत्र, उत्तरी अफ्रीका और मध्यपूर्व में डिमेंशिया के रोगियों की संख्या अधिक बढ़ रही है। मेलबोर्न के मोनाश विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार रुटीन बदलने से काफी हद तक इस बीमारी के असर को कम किया जा सकता है। इसमें खासतौर से बुजुर्ग व्यस्त रह करके डिमेंशिया के असर को कम कर सकते हैं या यों कहें कि डिमेंशिया का खतरा कम हो सकता है। एक बात और कि इसके लिए बुजुर्गों को कुछ खास करने की आवश्यकता भी नहीं है, बस कुछ कुछ आदतों में बदलाव लाने की जरूरत है।

दरअसल, एक समय लोगों में लिखने-लिखाने और पढ़ने-पढ़ाने की आदत होती थी। किस्सागोई की परंपरा थी तो गांवों-शहरों में चौपालें होती थी। बड़े-बुजुर्ग वहां बैठकर मोहल्ले में घटने वाली घटनाओं पर नजर रखते थे। वहीं आपसी चर्चा, ताश, चौपड़, शतरंज आदि खेल, गाना-बजाना या इसी तरह की गतिविधियां चलती रहती थी। इसके अपने फायदे भी थे। बड़े-बुजुर्गों की इस चौपाल से जहां मोहल्ले की सुरक्षा चाक-चौबंद रहती थी, वहीं मोहल्ले में असामाजिक गतिविधियों पर अंकुश लगता था। 

बड़े-बुजुर्गों की व्यस्तता के साथ ही आपसी दुख-दर्द को भी साझा किया जाता था तो समस्या के समाधान खोजने के साझा प्रयास होते थे। काफी हद तक मन का बोझ भी कम हो जाता था। पर आज हालात इसके ठीक विपरीत होते जा रहे हैं। चौपालों की परंपरा तो लगभग खत्म ही हो गई है। ले देकर ड्राइंम रूम संस्कृति रह गई है। उसमें भी अब सोशियल मीडिया और कम्प्यूटर-मोबाइल ने एक ही कमरे को अलग-अलग हिस्सोें में बांट कर रख दिया है। सब अपने-अपने मोबाईल पर उंगुलियां घुमाने में व्यस्त रहते हैं और एक-दूसरे से बात करने, सुनने-सुनाने का तो समय ही नहीं रह गया है। 

इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं। संवेदनहीनता, एकाकीपन, स्वार्थता, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा और ना जाने कितनी ही समस्याएं सामने आने लगी हैं। यही कारण है कि आज अधिक संख्या में लोग मनोविकारों से पीड़ित होने लगे हैं। एक अध्ययन में सामने आया है कि लिखने-लिखाने और पढ़ने-पढ़ाने की आदत से बुजुर्गों को डिमेंशिया की बीमारी से काफी हद से बचाया जा सकता है। पढ़ने-पढ़ाने से व्यक्ति किताबों की दुनिया में खो जाता हैं। इससे उसे अलग तरह का ही अनुभव होता है। पढ़ने-पढ़ाने या लिखने लिखाने की आदत से डिमेंशिया की बीमारी का खतरा 11 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।

जिसे हम हॉबी कहते हैं वह हॉबी यानी कि चित्रकारी, कुछ गाना बजाना, गुनगुनाना, अखबार पढ़ना, किताबों की दुनिया से जुड़ना आदि से भी डिमेंशिया के खतरे को कम किया जा सकता है। दरअसल जितना अधिक बुजुर्गों का गतिविधियों में इनवोल्वमेंट होगा उतनी ही अधिक संभावनाएं डिमेंशिया के खतरे को कम करने में होगी। परिवार जनों के साथ नियमित रुप से संवाद कायम रखने यानी कि हंसने बोलने, खेलने-खिलाने से भी डिमेंशिया का खतरा कम होता जाता है। 

इसके साथ ही बुजुर्गों का सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय हिस्सेदारी से भी बहुत कुछ राहत मिल सकती है। बुजुर्गों को किसी ना किसी गतिविधि से जोेड़कर उसमें सक्रिय किया जाता है तो डिमेंशिया के शिकार होने की संभावनाएं कम होती जायेगी। आज भूलने भुलाने की आदत तो युवाओं तक में देखने को मिलने लगी है। ऐसे में बुजुर्गों की सक्रियता को बनाये रखना आवश्यक हो जाता है। 

डिमेंशिया के बढ़ते खतरे को देखते हुए गैरसरकारी संगठनों, सामाजिक सस्थानों आदि को भी सक्रिय होना होगा क्योंकि आने वाले समय में यह समस्या और अधिक बढ़ेगी। ऐसे में मनोविश्लेषकों, चिकित्सकों, सामाजिक कार्यकतार्ओं आदि को अधिक गंभीरता से प्रयास करने होंगे। एकल परिवार, नौकरी के कारण एक दूसरे से दूरी, प्रतिस्पर्धा के चलते अलग तरह की कुंठा और मानसिक परेशानी सबको परेशान करने लगी है। समय रहते इसका हल खोजना होगा। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2024-06-02 20:36:14
पर्यावरण हितैषी वाहन है साइकिल

विश्व साइकिल दिवस (3 जून) पर विशेष

रमेश सर्राफ धमोरा

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत की आर्थिक तरक्की में साइकिल ने बहुत अहम भूमिका निभायी है। आजादी के बाद से ही साइकिल देश में यातायात व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा रही है। खासतौर पर 1960 से लेकर 1990 तक भारत में ज्यादातर परिवारों के पास साइकिल थी। यह व्यक्तिगत यातायात का सबसे किफायती साधन था। गांवों में किसान साप्ताहिक मंडियों तक सब्जी और दूसरी फसलों को साइकिल से ही ले जाते थे। दूध की सप्लाई गांवों से पास से कस्बाई बाजारों तक साइकिल के जरिये ही होती थी। डाक विभाग का तो पूरा तंत्र ही साइकिल के बूते चलता था। आज भी पोस्टमैन साइकिल से चिट्ठियां बांटते हैं। चीन के बाद आज भी भारत दुनिया में सबसे ज्यादा साइकिल बनाने वाला देश है। 

दो सौ साल पहले 12 जून 1817 को जर्मनी के मैनहेम में बैरन कार्ल वॉन ड्रैस ने दुनिया की पहली साइकिल पेश की थी। यह लकड़ी से बना था और इसमें पैडल, गियर या जंजीर नहीं थी। उसने खुद को पहले एक पैर से और फिर दूसरे पैर से धकेला। उन्होंने इसे लॉफमाशाइन (जर्मन में चलने वाली मशीन) कहा। अब तो जापान के फुकुकोआ शहर में छात्रों ने एक ऐसी साइकिल बनायी है जो हवा से चलती है। इसकी अधिकतम रफ्तार 64 किलोमीटर प्रति घंटा है। गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड ने इसे कंप्रेस्ड हवा से चलने वाली दुनिया में सबसे तेज साइकिल का सर्टिफिकेट दिया है। 

3 जून 2018 को विश्व में पहला विश्व साइकिल दिवस मनाया गया। तब से दुनिया में प्रतिवर्ष साइकिल दिवस मनाया जाने लगा है। इस बार हम छठवां विश्व साइकिल दिवस मना रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने परिवहन के सामान्य, सस्ते, विश्वसनीय, स्वच्छ और पर्यावरण अनुकूल साधन के रूप में इसे बढ़ावा देने के लिए विश्व साइकिल दिवस को मनाने की घोषणा की थी। भारत में भी विकसित की जा रही ज्यादातर आधारभूत आधुनिक संरचनाएं मोटर-वाहनों को ही सुविधा प्रदान करने के लिए बन रही हैं। साइकिल जैसे पर्यावरण-हितैषी वाहन को नजरअंदाज किया जा रहा है। जबकि शहरी व ग्रामीण परिवहन में भी साइकिल का महत्वपूर्ण स्थान है। 

खासतौर से कम आय-वर्ग के लोगों के लिए साइकिल उनके जीविकोपार्जन का एक सस्ता, सुलभ और जरूरी साधन है। यह इसलिए भी कि भारत का कम आय-वर्ग के लोग अपनी कमाई से प्रतिदिन सौ-पचास रुपये परिवहन पर खर्च करने में सक्षम नहीं हैं। भारत सरकार अपनी साइकिल परिवहन व्यवस्था में कुछ जरूरी मूलभूत सुधार करके आम और खास लोगों को साइकिल चलाने के लिए प्रेरित कर सकती है। सरकार के इस कदम से ऐसे सभी लोग प्रेरणा पा सकते हैं। जिनकी प्रतिदिन औसत यातायात दूरी पांच-सात किलोमीटर के आसपास बैठती हैं। 

हमारे देश की कई राज्य सरकारें अपने स्कूली छात्र-छात्राओं को बड़ी संख्या में साइकिल वितरण कर रही हैं। जिससे साइकिल सवारों की संख्या में वृद्धि हुई है। द एनर्जी ऐंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार पिछले एक दशक में साइकिल चालकों की संख्या ग्रामीण क्षेत्रों में 43 फीसदी से बढकर 46 फीसदी हुई है। जबकि शहरी क्षेत्रों में यह संख्या 46 फीसदी से घटकर 42 फीसदी पर आ गयी है। इसकी मुख्य वजह साइकिल सवारी का असुरक्षित होना ही पाया गया है।

बच्चे सबसे पहले साइकिल चलाना ही सीखते हैं। इसलिए बचपन में हम सभी ने साइकिल चलायी है। पहले के जमाने में जिसके पास साइकिल होती थी वह बहुत प्रतिष्ठित व्यक्ति माना जाता था। गांव के लोग जब कभी शहरों में जाते थे। तब लोगों को साइकिल चलाते हुए देखते थे और फिर वे खुद भी धीरे-धीरे साइकिल चलाना सीख जाते थे। पहले शहरों में किराये पर भी साइकिलें मिलती थी। देश की युवा पीढ़ी को अब साइकिल के बजाय मोटरसाइकिल ज्यादा अच्छी लगने लगी है। शहरों में मोटरसाइकिल का शौक बढ़ रहा था। 

गांवों में भी इस मामले में बदलाव की शुरुआत हो चुकी थी। इसके बावजूद भारत में साइकिल की अहमियत खत्म नहीं हुई है। 1990 के बाद से साइकिलों की बिक्री में बढ़ोतरी आयी है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में इसकी बिक्री में गिरावट आयी है। दरअसल 1990 से पहले जो भूमिका साइकिल की थी। उसकी जगह गांवों में मोटरसाइकिल ने ले ली है। इसके उपरांत भी साइकिल आज भी हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं। देश में लॉकडाउन के दौरान दूसरे प्रदेशों में कमाने गये लाखों लोग साइकिल पर 1000-1500 किलोमीटर की दूरी तय कर अपने घर पहुंचे थे। संकट के समय साइकिल ही उनके घर पहुंचने का एकमात्र साधन बनी थी। 

लॉकडाउन के दौरान लाखों लोगों के घर पहुंचने का सबसे उपयोगी साधन बनने से लोगों को यह बात अच्छी तरह समझ में आ गयी की साइकिल आज भी आम लोगों का सबसे सस्ता व सुलभ साधन है। अब तो विभिन्न प्रकार के फीचर से लैस गियर वाली कीमती साइकिले बाजार में आ गयी है। पहले लोगों के पास सामान्य साइकिले ही हुआ करती थी। जिनके पीछे एक कैरियर लगा रहता था। जिस पर व्यक्ति अपना सामान रख लेता था व जरूरत पड़ने पर दूसरे व्यक्ति को बैठा लेता था। कई बार तो साइकिल सवार आगे लगे डंडे पर भी अपने साथी को बिठाकर 3-3 लोग साइकिल पर सवारी करते थे। 

साइकिल से वातावरण में किसी तरह का प्रदूषण नहीं होता था। पेट्रोल डलवाने का झंझट भी नहीं था। साइकिल उठाई पैडल मारे और पहुंच गये अगले स्थान पर। पहले के जमाने में साइकिल के आगे एक छोटी सी लाइट भी लगी रहती थी। जिसका डायनुमा पीछे के टायर से जुड़ा रहता था। साइकिल सवार जितनी तेजी से साइकिल चलाता उतनी ही अधिक लाइट की रोशनी होती थी। तीन साल पहले विश्व साइकिल दिवस के दिन ही भारत की सबसे बड़ी साइकिल निर्माता कंपनी एटलस बंद हो गयी थी। प्रतिवर्ष 40 लाख साइकिल का उत्पादन करने वाली भारत की सबसे बड़ी व दुनिया की जानी मानी कंपनी एटलस के बंद होने से साइकिल उद्योग को बड़ा धक्का लगा है। 

एटलस की फैक्ट्री बंद होने से वहां काम करने वाले करीबन एक हजार लोग बेरोजगार हो गये। एटलस साइकिल कम्पनी की स्थापना 1951 में हुई थी। इसका कई विदेशी साइकिल निर्माता कंपनियों के साथ गठबंधन था। जिस कारण एटलस कंपनी की साइकिल दुनिया भर की श्रेष्ठ साइकिलों में शुमार होती थी। अमेरिका के बड़े-बड़े डिपार्टमेंट स्टोर में भी एटलस की साइकिलें बेची जाती थी। अब समय आ गया है कि शहर एवं गांवों में साइकिल चालन को एक बड़े स्तर पर प्रोत्साहन देने का। ताकि बढ़ते प्रदूषण को कुछ हद तक रोका जा सके।

शहरों में समर्पित साइकिल मार्गों का निर्माण किया जाना चाहिये। हमें विश्व साइकिल दिवस को महज एक सांकेतिक कवायद के रूप में नहीं देखना चाहिये। आज के दिन हमें मन ही मन इस बात का संकल्प लेना चाहिये कि हम हमारे रोजमर्रा के काम साइकिल से पूरा करेगें। तभी सही मायने में साइकिल दिवस मनाना सफल हो पायेगा। बढ़ते प्रदूषण की वजह से दुनिया के बहुत से देशों में साइकिल चलाने को बढ़ावा दिया जा रहा है। नीदरलैंड की राजधानी एम्सटर्डम में सिर्फ साइकिल चलाने की ही अनुमति है। 

भारत में भी दिल्ली, मुंबई, पुणे, अहमदाबाद और चंडीगढ़ में सुरक्षित साइकिल लेन का निर्माण किया गया है। उत्तर प्रदेश में भी 200 किलोमीटर लम्बा एशिया का सबसे लंबा साइकिल हाइवे बना है। अभी देश में साइकिल चालकों के अनुपात में साइकिल रोड़ विकसित किए जाने की प्रबल आवश्यकता है। पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से देखा जाये तो दुनिया के देशों में साइकिल की वापसी पर्यावरण की दृष्टि से एक शुभ संकेत माना जा सकता है। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

Published / 2024-06-01 11:58:59
सूखती रांची

कीर्तिमान

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। एक ऐसा शहर जिसमें न कभी ज्यादा ठंड, ना गर्मी, ना ही अधिक बारिश की वजह से बाढ़ का डर। प्रकृति भी यहां इतनी प्रसन्न है कि अपने सारे आशीष यहां के वातावरण को दे रही है। जहां शहर से कुछ ही दूरी पर चारों दिशाओं में फैले जंगल और उसमें पानी के झरने धरती पर स्वर्ग की अनुभूति कराता है।

माघ, चैत, वैशाख के महीने में उन जंगलों के साल एवं पलाश के वृक्षों मे खिले फूल और नये-नये हरे पत्ते पूरे वातावरण को सुगंधित करता है और फिर वर्षा ऋतु के क्या कहने। ये तो बात हुई रांची शहर के आसपास की, जो इसे किसी अद्भुत माणिक की तरह सुशोभित करता है।

वहीं दूसरी तरफ शहर के मध्य में स्थित रांची बड़ा तालाब जो कभी कई एकड़ भूमि में हुआ करता था। आज अतिक्रमण की वजह से भले कुछ छोटा हो गया है लेकिन फिर भी शहर के लिए किसी बेशकीमती आभूषण से कम नहीं।

रांची का प्राचीन पहाड़ी मंदिर भगवान शिव और नाग देवता का पावन स्थल है। इस आस्था के स्थल से रांची बड़ा तालाब की खूबसूरती को निहारा जा सकता है। रांची शहर के बिल्कुल मध्य में स्थित ये दो वो जगह हैं जिन्हें उनकी प्रकृति में रखते हुए इसकी साफ सफाई और सौन्दर्यकरण  करना आवश्यक है। 

किसी भी राज्य की राजधानी में ऐसे प्राकृतिक स्थान का होना बहुत ही सौभाग्य की बात होती है। वर्षों से रांची के स्थानीय लोग इन दोनों स्थानों की पूजा तथा अपने आध्यत्मिक क्रियाकलाप इसपे करते आये हैं, आज भी सभी की आस्था इनसे जुड़ी है। इसे विदेशों के विकसित शहरों में स्थित जलाशयों की तरह सजाया जा सकता है, एक पर्यटन स्थल का रूप दिया जा सकता है।

2000ई. में बिहार से अलग हो झारखंड राज्य बनने और रांची शहर को इस नये राज्य की राजधानी के रूप में बनाने के पूर्व इस शहर की प्रकृति को समझने की किसी ने कोशिश ही नहीं की। इसे राजधानी बना दिया गया। सारी व्यवस्था होने के कारण, लेकिन किसी ने नहीं सोचा कि राजधानी बनने से कई परिवार भी बसेंगे, कई लोगों का आना जाना होगा। क्या इसके लिए रांची शहर की प्रकृति तैयार थी ? 

आज चौबीस वर्षों से झारखंड की अस्थिर सरकार कभी इस शहर की प्रकृति को यथा स्थिति रखने के लिए शायद ही किसी प्रकार की परियोजना को व्यवस्थित रूप से संचालित की हो। हम बड़ा तालाब को ही ले लें जिसे इस शहर की शोभा के रूप में माना जाता है। उसे भी नहीं छोड़ा गया। इसकी भूमि का अतिक्रमण किया गया। तालाब के आसपास सरकारी भूमि पर न जाने किसकी अनुमति से मुर्गियों के फार्म खोले गये और इसके बदबूदार मल तालाब एवं इसके आस पास फेके जाते रहे हैं। 

वर्षों पुराने पीपल जैसे वृक्षों को भी नहीं छोड़ा गया, पीपल एक ऐसा वृक्ष जो बिना कुछ मांगे चौबीस घंटे प्राण वायु रूपी आक्सीजन वायुमंडल मे संचालित करता है। पास मे ही कयी वर्षों से बंद पड़े चीनी मिट्टी का कारखाना है, जिसमे कुछ वर्ष हुवे कयी बड़े बड़े वृक्ष लताये हुवा करती थी लेकिन मौजूदा स्थिति ये है कि कारखाने का घेरा को तोड़ कर इसमे कूडो का अम्बार लगा दिया गया।

इन कूडो के चलते वहाँ के पेड़ पोधे या तो सुख गए और जो नही  सूखे उन्हे जला कर सुखा दिया गया या साफ साफ कहें तो कत्ल कर दिया गया। इस हरे भरे स्थान मे कचरे फेकने का सुरूवात उस समय हुवा जब बड़ा तालाब के जल कुमभियों की सफाई की जा रही थी और उन सभी को शहर के बीचों बीच कुछ छेत्रिय नेताओं के संरक्षण मे जमा किया गया, सड़ते जल कुम्भी और इससे उठते दुर्गन्ध से सारा वातावरण कयी दिनो तक प्रदूषित रहा लेकिन किसी को कोई फर्क नही पडा। 

इसी के बाद ट्रैक्टर और अन्य वाहनों के द्वारा पूरे रांची नगर कर कचरा फेकना शुरू किया गया और देखते-देखते कुछ ही वर्ष मे चार फिट ऊँचा कचरा का अम्बार खड़ा हो गया। सारे वृक्ष सुख गए, सहर मे रहने वाले पक्षीयों के घर छीन गए और कई वर्ष पुराने पीपल के वृक्ष को जला कर उसके मुख्य तना को  छील कर वृक्ष को पूर्ण रूप रे सुखा दिया गया। बहुत दुख होता है उस वृक्ष और उसपे विश्राम करने वाले पक्षियों के घोषलों को देख कर। 

इन सबको देख कर ये आसानी से समझा जा सकता है की इस खाली सरकारी भूमि पे भूमि माफिया और आस पास के लोगों का अतिक्रमण करने का मनसा है। शहर मे ऐसे कुछ ही खाली स्थान हैं जहाँ भूमि जल स्तर को सुधारने के लिए वर्षा की पानी को वृक्षों के माध्यम से कुछ देर के लिए रोका जा सकता है, बाकी पूरा शहर तो कंक्रीट का बन ही गया है।

ये बड़ा तालाब और इसके आस-पास सरकारी खाली भूमि जिनमे वर्षा जल जमा होकर वृक्ष के जड़ों के माध्यम से  जल संरक्षण मे मददगार होता है। इन खाली सरकारी भूमि को अतिक्रमण से बचाना बहुत ही आवश्यक है। शहर के ज्यादातर छेत्रों मे भूमि जल स्तर हजारों फिट निचे चले गए हैं, अगर इन जलासयों तथा वृक्षों को अभी नही संजोया सम्हाला गया तो शीघ्र हमारा सुंदर खुशहाल रांची सूख जाएगा और किसी मरभूमि का रूप ले लेगा।

जिसका परिणाम हम रांची वाशियों के लिए बहुत ही घातक होगा, प्रक्रिती इसका पूरा हिसाब पूरे ब्याज के साथ हम रांची वाशियों से वसूल करेगी, पश्चाताप करना भी नामुमकीन होगा। झारखंड वाशी प्रक्रिती की पूजा करते आये हैं और इस लिए प्रक्रिती रूपी माता का सेवा भी इसके वृक्ष और जलासयों को सनरक्षित कर के किया जा सकता है, ये समय की मांग भी है। 

अगर रांची वाशी अभी सचेत नही हुवे, नगर निगम और संबंधित विभाग जागरूकता से काम नही किये तो हमारा प्यारा, सुंदर, खुशहाल रांची शहर सुखता चला जाएगा और ये सभी जीव, जंतु, पशु, पक्षी तथा मानव के लिए किसी मरभूमि कि तरह निवास करने योग्य नही रह जाएगा।

Published / 2024-05-28 20:57:47
बढ़ता ताप, झुलसती धरती

आयुषी दवे

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। दुनिया और कितनी गर्मी झेलने को तैयार है? यह सवाल बेहद गंभीर है और लोग इससे कब तक बेखबर रहेंगे यह समझ से परे है। अब तो इंसान क्या दूसरे जीव, जन्तु भी गर्मी से बेहाल होकर इस कदर बेकाबू हो रहे हैं कि कई तरह की तबाहियों का कारण बने हुए हैं। लेकिन हम हैं कि अपनी प्यारी धरती की तपिश को बजाए कम करने के और बढ़ाये जा रहे हैं। 

दुनिया में क्या धरती का तापमान बढ़ाकर ही विकास की कहानी लिखी जा सकती है? क्या दुनिया में अबकी बार साल 2023 से अधिक गर्म 2024 कहलायेगा? जलवायु शोधकर्ता इसी पर चिंतित हैं। हमें नहीं भूलना चाहिए कि वैज्ञानिकों ने ही खुलासा किया था कि पिछले साल उत्तरी गोलार्ध में इतनी गर्मी पड़ी कि करीब 2,000 साल का रिकॉर्ड टूटा और इसीलिए 2023, धरती पर अब तक का सबसे गर्म वर्ष कहलाया। 

अब इंग्लैंड में रोहेम्पटन विश्वविद्यालय का सामने आया नया शोध बेहद चिंताजनक है जो बताता है कि जब पृथ्वी का बाहरी तापमान 40 डिग्री सेल्सियस पार हो जाता है तो इंसान का शरीर इससे ज्यादा गर्मी सहन करनी की शक्ति खोने लगता है। इसके चलते कई अंग प्रभावित होने लगते हैं। अनेकों चिकित्सकीय शोधों से भी साफ हो चुका है कि मानव शरीर अनुकूल परिस्थितियों तक ही तापमान सहजता से सहन कर पाता है। 

प्रतिकूल परिस्थितियों में कई अंगों के प्रभावित होने या शिथिल या काम बंद कर देने के खतरे बढ़ जाते हैं। सबको पता है कि शरीर का 70 फीसदी से ज्यादा हिस्सा जलतत्व से निर्मित है। यही शरीर के तापमान को स्थिर बनाए रखने के लिए गर्मी से मुकाबला करते हैं। इसका साधारण उदाहरण शरीर में गर्मी लगते ही पसीना आना है। लेकिन जब शरीर में मौजूद जलतत्व, पसीना बनकर उड़ जायेगा तो स्वाभाविक है कि शरीर में पानी की कमीं होगी। 

यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। वहीं शरीर के कई ऐसे संवेदनशील आंतरिक अंग हैं जो पानी या जलतत्व के निश्चित मात्रा में रहे आने पर ही सुचारु पूर्वक काम करते हैं। जब भीषण गर्मीं में लगातार शरीर में पानी की आवश्यक मात्रा को बनाए रखना अनजाने या मजबूरी में संभव नहीं हो पाता है तब इसका असर हमारे आंतरिक अंगों पर भी पड़ता है। इससे शरीर कई गंभीर बीमारियों का अनायास शिकार हो जाता है। 

शरीर में जलतत्व की कमीं का प्रभाव लोगों पर सेहत के हिसाब से अलग-अलग पड़ता है। किसी को चक्कर आता है तो कोई सिरदर्द की शिकायत करता है। कई बेहोश हो जाते हैं तो किसी की नाक से खून आ जाता है। कई लोगों को सांस में दिक्कत होने लगती है। कई कारण हैं जो बाहर से तो समझ आ जाते हैं लेकिन आंतरिक अंगों पर पड़ने वाले गंभीर दुष्परिणाम बाहर न तो दिखते हैं और न ही जल्द समझ आते। यही बहुत हानिकारक होते हैं। 

सांस फूलने से हृदय में रक्त का प्रवाह अनियमित हो जाता है। फेफड़ों पर भी बुरा असर पड़ता है। रक्तचाप भी अनियंत्रित हो जाता है और मौत तक संभव है। हम भारत के संदर्भ में इन दिनों पड़ रही भीषण गर्मी को देखें तो इससे जहां आम मध्यम लोगों में गुर्दों पर बुरा असर पड़ने के साथ हृदय या सांस संबंधी बीमारियां एकाएक बढ़ सकती हैं। वहीं गरीबों या आर्थिक रूप से कमजोर बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं, किसान और रोजाना कमाने खाने वाले मजदूर इसके ज्यादा शिकार होते हैं। 

अब भारत में गर्मियों में पहाड़ों वह भी ठंडे इलाकों के जंगलों में लगातार आग की घटनाएं और भी ज्यादा चिंताजनक हैं। ऐसा नहीं है कि गर्मी को लेकर चिंता केवल भारत में ही सबसे ज्यादा है। यूरोप के तो आंकड़े सामने हैं जब 2022 की गर्मियों में करीब 61,000 लोगों की मौत हुई। वहां भी कुछ वर्षों में तेज गर्मी के चलते जंगलों में भीषण आग लग रही है। बड़े पैमाने पर सूखा पड़ रहा है। यह सब बेहद चिंताजनक है। 

सोचिये, इस स्थिति में पहुंचने के बाद भी हम कब तक अनजान रहेंगे? सबको पता है कि विकास के नाम पर हो रहे ताबड़तोड़ निर्माण और प्राकृतिक संरचनाओं से लगातार छेड़छाड़ के अलावा बेतहाशा कार्बन उत्सर्जन जिनमें प्राकृतिक संसाधनों जैसे जीवाश्म ईंधन जलाने, जंगलों को काटने और पशुधन की खेती से जलवायु और पृथ्वी के तापमान पर तेज प्रभाव पड़ रहा है।

इससे वायुमंडल में प्राकृतिक रूप से मौजूद ग्रीनहाउस गैसों में भारी मात्रा में प्रदूषित गैसें, धुआं आदि जुड़ जाती हैं और ग्रीनहाउस प्रभाव और भूमंडलीय ऊष्मीकरण यानी ग्लोबल वार्मिंग बढ़ जाती है। प्राकृतिक गैसों, पेट्रोलियम, कोयला, खनिज व दूसरे तत्वों के लगातार दोहन और उपयोग से निकलती प्रदूषित गैसों और दूसरे हानिकारक तत्वों से दूषित होते वायुमंडल के अलावा निरंतर छलनी होते जंगल, पहाड़, नदियां अन्य अनेकों प्राकृतिक संपदाओं का क्षरण, दोहन तापमान बढ़ाने के लिए जिम्मेदार हैं। 

इसी बेतरतीब दोहन से निरंतर बढ़ता कार्बन उत्सर्जन भू-तल से लेकर नभ तक प्रदूषित कर रहा है। प्रकृति का सारा का सारा प्राकृतिक नियंत्रण डगमगाया हुआ है। जलवायु परिवर्तन पर नजर रखने वाले 99 प्रतिशत से ज्यादा वैज्ञानिक मानते हैं कि इसका सबसे अहम कारण इंसानी करतूते हैं जो कंक्रीट के विकास के दिखावे के लिए विनाश की गाथा लिख रहे हैं। ग्लोबल वॉर्मिंग से निपटने के लिए दुनिया के क्षत्रपों के पास बड़ी-बड़ी कागजी योजनाएं हैं। 

पेरिस जलवायु समझौता-2015 अहम है जो उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा को सीमित करने पर केन्द्रित है। लेकिन इसे 10 साल होने को हैं पर लगता है कि क्या किसी भी देश ने इस पर ठोस काम किया? जवाब आपके पास भी है। ऐसे में भला कैसे बढ़ता तापमान नियंत्रित होगा, कैसे प्रकृति से इंसाफ होगा और कैसे हम अपनी भावी पीढ़ी को न्याय की गारण्टी दे पायेंगे? 

निश्चित रूप से जब तक पूरी दुनिया में एक-एक इंसान इसे नहीं समझेगा, तब तक विनाश की ओट में विकास की पल-पल लिखी जा रही गाथा भी नहीं रुकेगी। लगता नहीं कि फिर हम जानते हुए, भविष्य में रुग्ण, अशक्त मानव बस्तियों के कंक्रीट महलों की तैयारी में हैं। (लेखिका, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कम्युनिकेशन इंजीनियर हैं।)

Published / 2024-05-27 22:17:10
वादे हैं, वादों का क्या?

एलपीजी मॉडल और कांग्रेस का वो ऐतिहासिक घोषणापत्र, जिसे 2024 के मेनिफेस्टो में पार्टी ने किया संदर्भित 

अभिनय आकाश 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पार्टी के 2024 के घोषणापत्र में 1991 के उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (एलपीजी) सुधारों का उल्लेख किया है। इसके जरिए पार्टी ने लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का श्रेय दिया है। पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव और तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह को सुधार लाने का श्रेय दिया जाता है, इसकी नींव 1991 में पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने कांग्रेस चुनाव घोषणा पत्र जारी करने के साथ रखी गयी थी। 

वादे हैं वादों का क्या? चुनाव में वादों के पिटारे के रूप में घोषणापत्र जारी किये जाते हैं। नेता चाहे जिस पार्टी के हों वे चुनाव से पहले बहुत सारे वादे करते हैं। 2004 में जीत का ताज पहनने के बाद 2009, 2014, 2019 में कांग्रेस का घोषणापत्र एक अलग रूप में था, जो 2024 आते-आते बिल्कुल ही बदल गया। वैसे तो कांग्रेस के घोषणा पत्र में अपनी ही पीठ थपथपाने और तारीफों के पुल बांधते की आदत पुरानी रही है।

लेकिन वह कांग्रेस वादे पूरे करने का वादा कर रही है। 5 अप्रैल को 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस का घोषणापत्र जारी होने के बाद से यह चर्चा का विषय बना हुआ है। राष्ट्रव्यापी जाति जनगणना और नौकरियों की गारंटी सहित वादों के अलावा, भारतीय अर्थव्यवस्था पर पार्टी का स्टैंड विमर्श का केंद्र बना है। पार्टी के 2024 के घोषणापत्र में 1991 के उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (एलपीजी) सुधारों का उल्लेख किया है। इसके जरिए पार्टी ने लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का श्रेय दिया है। 

पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव और तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह को सुधार लाने का श्रेय दिया जाता है, इसकी नींव 1991 में पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गांधी द्वारा कांग्रेस चुनाव घोषणा पत्र जारी करने के साथ रखी गई थी। राजीव गांधी संभवत: 1991 में केंद्र की सत्ता में वापस आने वाले थे, लेकिन 21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर में लिबरेशन टाइगर्स आफ तमिल ईलम के आतंकवादियों द्वारा किए गए आत्मघाती बम हमले में उनकी हत्या हो गई। उनकी हत्या से एक महीने पहले उन्होंने कांग्रेस का घोषणापत्र जारी किया, जिसमें लाइसेंस राज के चंगुल से अर्थव्यवस्था को उदार बनाने के लिए आमूल-चूल परिवर्तन लाने का वादा किया गया था। 

भारत में लाइसेंस राज

लाइसेंस राज, जिसे परमिट राज के नाम से भी जाना जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था के सख्त सरकारी नियंत्रण और विनियमन की एक प्रणाली जो 1950 से 1990 के दशक तक लागू थी। इस प्रणाली के तहत, भारत में व्यवसायों को संचालित करने के लिए सरकार से लाइसेंस प्राप्त करना आवश्यक होता था और इन लाइसेंसों को प्राप्त करना अक्सर मुश्किल होता था। लाइसेंस राज शब्द ब्रिटिश राज जैसे शब्द से उब्जा है, जो भारत में ब्रिटिश शासन की अवधि को संदर्भित करता है। 

इसे स्वतंत्रता सेनानी और राजनेता चक्रवर्ती राजगोपालाचारी द्वारा गढ़ा गया था। लाइसेंस राज का उद्देश्य भारतीय उद्योग की रक्षा करना, आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना और क्षेत्रीय समानता सुनिश्चित करना था। हालाँकि, इसने एक ऐसी प्रणाली का नेतृत्व किया जहां निजी कंपनियों को कुछ उत्पादन करने से पहले 80 सरकारी एजेंसियों को संतुष्ट करना पड़ता था और यदि अनुमति दी जाती है, तो सरकार उत्पादन को नियंत्रित करेगी। आर्थिक विकास को अवरुद्ध करने और भारतीय अर्थव्यवस्था को अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने से रोकने के लिए इस प्रणाली की आलोचना की गयी थी। 

लाइसेंस राज पर अंकुश लगाने के लिए राजीव गांधी ने क्या कदम उठाये 

राजीव गांधी की सरकार ने डिजिटलीकरण, दूरसंचार और सॉफ्टवेयर जैसे उद्योगों के विकास को बढ़ावा देते हुए व्यवसाय निर्माण और आयात नियंत्रण पर प्रतिबंधों में ढील देनी शुरू कर दी। इन प्रयासों के कारण 1970 के दशक में औसत सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 2.9% से बढ़कर 5.6% हो गयी, हालांकि वे लाइसेंस राज के साथ प्रणालीगत मुद्दों को संबोधित करने में विफल रहे। स्वतंत्र भारत में पले-बढ़े राजीव गांधी को जल्द ही एक नए भारत की आकांक्षाओं का एहसास हुआ। 

उन्होंने आय और कॉर्पोरेट टैक्स रेट को कम कर दिया और लाइसेंसिंग प्रणाली को सरल बनाने और कंप्यूटर, कपड़ा और दवाओं जैसे क्षेत्रों को विनियमित करने का प्रयास किया। दूरसंचार में राजीव गांधी ने पीएंडटी विभाग को भंग कर दिया और 1985 में दूरसंचार विभाग बनाया। उन्होंने दूरसंचार उपकरणों के निर्माण पर सरकारी एकाधिकार को भी समाप्त कर दिया, और 1980 के दशक के मध्य में निजी क्षेत्र को इसमें अनुमति दी। 

1991 का कांग्रेस घोषणापत्र 

बोफोर्स तोप सौदे में ली गई दलाली को निशाना बनाकर विपक्षी दलों ने 1989 के चुनाव में अपनी तोपों से कई नायाब नारों के गोले कांग्रेस, विशेषकर राजीव गांधी पर छोड़े। मिस्टर क्लीन मिस्टर क्लीन गंदली क्यों है तोप मशीन, राजीव भाई, राजीब भाई तोप दलाली किसने खायी। 1989 में भ्रष्टाचार के बढ़ते आरोपों और तुष्टिकरण की राजनीति सहित अन्य कारकों के कारण राजीव गांधी को केंद्र की सत्ता गंवानी पड़ी।

हालाँकि, दो साल बाद मतदाताओं को फिर से अपना प्रधानमंत्री चुनने का मौका मिला क्योंकि चन्द्रशेखर के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार 16 महीने में गिर गई। प्रधानमंत्री के रूप में एक और कार्यकाल की मांग कर रहे राजीव गांधी ने 15 अप्रैल, 1991 को कांग्रेस का घोषणापत्र जारी किया, जिसमें उनकी आर्थिक उदारीकरण नीतियों को जारी रखने का वादा किया गया। 

कांग्रेस के घोषणापत्र में उल्लिखित कुछ प्रमुख वादे इस प्रकार थे :

  • सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क के संबंध में वित्तीय वर्ष के दौरान स्थिर कर दरें बनाये रखना 
  • राजमार्गों और उपकरण पुलों के निर्माण को निजी और संयुक्त क्षेत्रों के लिए खुला रखना 
  • विनिर्माण के किसी भी क्षेत्र (रणनीतिक या सैन्य विचारों को छोड़कर) में किसी भी क्षेत्र या किसी व्यक्तिगत उद्यम के एकाधिकार को समाप्त करें और उन्हें प्रतिस्पर्धा के लिए खुला छोड़ दिया जायेगा। 
  • कांग्रेस सरकार, पहले 1,000 दिनों में उन क्षेत्रों से सार्वजनिक क्षेत्र की क्रमिक वापसी की निगरानी करेगी जहां निजी और संयुक्त क्षेत्रों ने क्षमताएं विकसित की हैं। 
  • कांग्रेस जोरदार निर्यात प्रोत्साहन, प्रभावी आयात प्रतिस्थापन, अर्थव्यवस्था में उत्पादकता और दक्षता स्थापित करने और बढ़ाने के द्वारा वर्तमान विदेशी मुद्रा संकट की समस्या से निपटेगी। 

हालांकि, इससे पहले कि वह अपनी पार्टी को केंद्र में वापस देख पाते और एक नये आर्थिक युग की शुरुआत कर पाते, राजीव गांधी की लिट्टे आतंकवादियों द्वारा हत्या कर दी गई। उनकी मृत्यु से कांग्रेस को भावनात्मक समर्थन मिला और पार्टी जनता दल के समर्थन से सत्ता में लौट आई। पीवी नरसिम्हा राव गठबंधन सरकार के प्रधान मंत्री बने और मनमोहन सिंह उनके वित्त मंत्री बने।

एलपीजी सुधारों पर 1991 के कांग्रेस घोषणापत्र की छाप

24 जुलाई 1991 को मनमोहन सिंह ने क्रांतिकारी बजट पेश किया जिसने भारत के आर्थिक परिदृश्य को बदल दिया। इस बजट ने लाइसेंस राज के अंत को चिह्नित किया और यह ऐसे समय में आया जब भारत को केवल दो सप्ताह के विदेशी भंडार के साथ आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। बजट में स्पष्ट रूप से राजीव गांधी द्वारा जारी किए गए कांग्रेस के घोषणापत्र की छाप थी और अपने भाषण के दौरान, मनमोहन सिंह ने आठ बार पूर्व प्रधानमंत्री का उल्लेख किया। 

मनमोहन सिंह ने अपने भाषण में कहा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के प्रयासों की बदौलत हमने एक विविधतापूर्ण औद्योगिक ढांचा विकसित किया है। यह एक बड़ी संपत्ति है क्योंकि हम विभिन्न संरचनात्मक सुधारों को लागू करना शुरू कर रहे हैं। हालांकि, प्रवेश की बाधाओं और कंपनियों के आकार में वृद्धि की सीमाओं के कारण अक्सर लाइसेंसिंग का प्रसार हुआ है और एकाधिकार की डिग्री में वृद्धि हुई है। जैसा कि कांग्रेस के घोषणापत्र में उल्लेख किया गया है, बजट ने निजी खिलाड़ियों को अधिक भागीदारी की अनुमति दी, उत्पाद शुल्क कम किया और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का स्वागत किया। 

शराब, तंबाकू, खतरनाक रसायन, औद्योगिक विस्फोटक, इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और फार्मास्यूटिकल्स जैसे कुछ संवेदनशील क्षेत्रों को छोड़कर, लगभग सभी उत्पाद श्रेणियों के लिए औद्योगिक लाइसेंसिंग समाप्त कर दी गयी थी। टैरिफ दरें कम की गईं और आयात प्रतिबंधों में ढील दी गयी, जिससे प्रतिस्पर्धा और दक्षता को बढ़ावा मिला। विदेशी व्यापार को बढ़ावा देने के लिए निर्यात प्रोत्साहन पेश किये गये। सरकार ने दूरसंचार, बीमा और बैंकिंग जैसे क्षेत्रों को भी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के लिए खोल दिया, जिससे अत्यधिक आवश्यक पूंजी और प्रौद्योगिकी आकर्षित हुई। 

2024 कांग्रेस का घोषणापत्र और आर्थिक रीसेट का वादा

2024 में कांग्रेस का चुनाव घोषणापत्र 1991 के सुधारों से देश को होने वाले लाभों को रेखांकित करता है। 1991 में कांग्रेस सरकार ने औद्योगिक लाइसेंसिंग और नियंत्रण को समाप्त कर दिया था, जो स्वतंत्र नियामक व्यवस्था स्थापित की गई थी वह प्रत्यक्ष और गुप्त नियंत्रण की प्रणाली में बदल गई है। घोषणापत्र में लिखा है कि उद्योग, व्यवसाय और व्यापार में स्वतंत्रता बहाल करने के लिए हम मौजूदा नियमों और विनियमों की व्यापक समीक्षा करेंगे और उन्हें निरस्त या संशोधित करेंगे। 

33 वर्षों के बाद, आर्थिक नीति को फिर से निर्धारित करने का समय आ गया है। हमें एक नव संकल्प आर्थिक नीति की आवश्यकता है। नव संकल्प आर्थिक नीति की आधारशिला नौकरियां होंगी। नौकरियां पैदा करने के लिए, भारत को एक उत्पादक अर्थव्यवस्था बनना होगा। हम हमें अपने लिए और दुनिया के लिए वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करना चाहिए, भारत के लिए दुनिया के सबसे बड़े उत्पादक के रूप में उभरने का एक बड़ा अवसर है। 

2024 का कांग्रेस घोषणापत्र को लेकर दो चीजें हैं जो यह तय करेंगी कि चुनाव दस्तावेज लागू होगा या नहीं। सबसे पहले, कांग्रेस को केंद्र में सत्ता में लाने की जरूरत है। अगर ऐसा होता भी है, तो गठबंधन की खिचड़ी सरकार के बीच पार्टी के लिए अपने वादे निभाना मुश्किल हो सकता है। हालांकि, 1991 के घोषणापत्र का महत्व इस तथ्य से उजागर होता है कि कांग्रेस दो दशकों के बाद भी इसका उल्लेख करती है लेकिव भारतीय यूजर विकल्प चुनने के लिए तैयार नहीं है।

Published / 2024-05-27 21:04:28
जाम से रेंगते शहर

प्रियंका सौरभ

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सड़क जाम जैसी समस्या पहले महानगरों के हिस्से ही थी। छोटे शहर व कस्बे इससे मुक्त थे। मगर अब छोटे-बड़े नगर भी इससे पस्त होने लगे हैं। मध्यम श्रेणी के शहरों में भी सड़कों पर गाड़ियां रेंगती नजर आती हैं। स्थिति यह है कि जो चौक-चौराहे कभी इन शहरों की पहचान हुआ करते थे, आज वे जाम के कुख्यात केंद्र बन गये हैं। 

महानगरों में एलीवेटेड रोड, फ्लाई ओवर, अंडरपास जैसे नव-निर्माण से जाम की समस्या का कुछ हद तक हल निकाला जा सकता है, निकाला जाता भी है, मगर मध्यम व छोटे शहर बड़ू पैमाने पर ऐसा नहीं कर पा रहे। फिर इन नगरों में जाम का चरित्र भी अलग-अलग है। भारत में सड़क जाम की समस्या व्यापक है। 10 लाख से अधिक आबादी वाले नगर इससे सर्वाधिक पीड़ित हैं। अमूमन सड़कों की दुर्व्यवस्था व अनुशासित परिचालन के अभाव के कारण ऐसा होता है।

पहिये के पीछे फंसे हुए निराश होकर हम घोंघे की गति से आगे बढ़ते हैं। दुर्भाग्य से, यातायात सड़क पर जीवन का एक अपरिहार्य हिस्सा है और अधिकांश समय ऐसा महसूस होता है कि जिस भीड़भाड़ में हम खुद को फँसा हुआ पाते हैं, उससे बचने के लिए हम बहुत काम कर सकते हैं। बीआरटी सिस्टम लागू करने से बस सेवाएं सुव्यवस्थित हो सकती हैं, जिससे तेज और अधिक विश्वसनीय सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध हो सकता है। 

उदाहरण के लिए, अहमदाबाद में बीआरटी ने यातायात की भीड़ और यात्रा के समय को सफलतापूर्वक कम किया है। मजबूत लाइट रेल नेटवर्क विकसित करने से सड़क परिवहन के लिए कुशल विकल्प मिल सकते हैं। दिल्ली जैसे शहरों को दिल्ली मेट्रो से लाभ हुआ है, जिससे सड़क पर कारों की संख्या में काफी कमी आयी है। बस कवरेज का विस्तार और समर्पित बस लेन बनाने से अधिक लोगों को सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। बेंगलुरु में उच्च गुणवत्ता वाली बस सेवाओं की शुरुआत ने सकारात्मक परिणाम दिखाये हैं।

पुणे जैसे शहरों ने साइकिल-शेयरिंग कार्यक्रम लागू किए हैं, जो परिवहन के एक व्यवहार्य साधन के रूप में साइकिलिंग को बढ़ावा देते हैं तथा वाहनों की भीड़ को कम करते हैं। सुरक्षित और सुलभ पैदल यात्री मार्ग बनाने से पैदल चलने को बढ़ावा मिलता है, जिससे मोटर वाहनों पर निर्भरता कम होती है। भारत में स्मार्ट सिटीज मिशन में पैदल यात्री अवसंरचना को बढ़ाने की योजनाएं शामिल हैं। ट्रैफिक सिग्नल को प्रबंधित करने और भीड़भाड़ का पूवार्नुमान लगाने के लिए रीयल-टाइम डेटा का उपयोग करके ट्रैफिक प्रवाह को अनुकूलित किया जा सकता है। 

उदाहरण के लिए, हैदराबाद में स्मार्ट ट्रैफिक सिग्नल सिस्ट निर्धारण। सिंगापुर और लंदन जैसे शहरों में देखा गया है कि व्यस्त समय के दौरान उच्च यातायात वाले क्षेत्रों में वाहन चलाने के लिए शुल्क लिया जाए, जिससे अनावश्यक कार उपयोग को हतोत्साहित किया जा सकता है और सार्वजनिक परिवहन में सुधार के लिए धन जुटाया जा सकता है।

विप्रो और इंफोसिस जैसी कंपनियों ने कार पूलिंग और कंपनी बस सेवाएं शुरू की हैं, जिससे सड़क पर निजी वाहनों की संख्या कम हुई है। इन पहलों से यात्रा के समय में उल्लेखनीय कमी आयी है। सब्सिडी और कर लाभ के माध्यम से कार पूलिंग और राइड शेयरिंग के लिए प्रोत्साहन प्रदान करने से इनके अपनाने को और बढ़ावा मिल सकता है। 

सार्वजनिक परिवहन केंद्रों के पास पार्क-ऐंड-राइड सुविधाएं स्थापित करने से शहर के भीतरी इलाकों में यातायात कम हो सकता है। बेंगलुरु जैसे शहरों में ऐसी पहलों से सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं, पार्किंग की कमी दूर हुई है और सड़क पर भीड़भाड़ कम हुई है। निजी वाहन का उपयोग करने के बजाय यदि लोग सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें, साइकिल का उपयोग करें, पैदल चलें आदि। इससे न केवल यातायात की समस्या हल होगी, बल्कि पर्यावरण संबंधी समस्या भी हल होगी और भारत के राजकोषीय घाटे को कम करने में मदद मिलेगी, विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि होगी। 

अपने यहां सड़कों की मरम्मत ही तभी की जाती है, जब वे धंसती या टूटती हैं, जबकि यह काम नियमित तौर पर होना चाहिए। हालांकि, फुटपाथ का न होना या उस पर अतिक्रमण भी एक बड़ी समस्या है, जिसके कारण पैदल यात्री सड़कों पर चलने को मजबूर होते हैं। सड़क जाम हमें कई तरह से प्रभावित करता है। इससे शहरों की आबोहवा तो प्रदूषित होती ही है, अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। 

अवैध कॉलोनियों का बेतरतीब विस्तार हो रहा है। शहरी नियोजन के अभाव में छोटी-छोटी गलियां बन जाती हैं, जो मुख्य सड़कों को प्रभावित करती हैं। यहां सार्वजनिक परिवहन में सुधार करना होगा। अमूमन जब कभी सार्वजनिक परिवहन की बेहतरी की बात उठती है, तो हर शहर मेट्रो मांगने लगता है। मगर मेट्रो के बजाय आवासन और शहरी कार्यमंत्रालय द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का इस्तेमाल अधिक व्यावहारिक है, जिसमें अलग-अलग शहरों की जरूरतों के मद्देनजर अलग-अलग सार्वजनिक परिवहन को विस्तार देने की बात कही गयी है। 

ये परिवहन-माध्यम बस, लाइट रेल ट्रांजिट (एलआरटी), मोनो रेल, मेट्रो कुछ भी हो सकते हैं। प्रमुख भारतीय शहरों में यातायात की भीड़भाड़ से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण आवश्यक है। इसमें सार्वजनिक परिवहन को बढ़ाना, गैर-मोटर चालित परिवहन को बढ़ावा देना, स्मार्ट ट्रैफिक प्रबंधन तकनीकों को लागू करना, कार पूलिंग और राइड शेयरिंग को प्रोत्साहित करना और पार्क-ऐंड-राइड सुविधाओं का विकास करना शामिल है।भविष्य की शहरी योजना को सतत और एकीकृत परिवहन समाधानों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि शहर रहने योग्य और पर्यावरण के अनुकूल बने रहें। इन उपायों को लागू करने से अधिक कुशल और कम भीड़भाड़ वाली शहरी परिवहन प्रणाली का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। (लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

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