एबीएन एडिटोरियल डेस्क। इस्लामिक अतिवादियों, उपद्रवियों और आतंकवादियों ने छात्र आंदोलन के नाम पर बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के इस्तीफे के बाद कई जगहों पर हिंदुओं पर हमले करना जारी रखा है। आधिकारिक तौर पर 500 से अधिक हिंदू मंदिरों, सैकड़ों घरों और हजारों व्यापारिक प्रतिष्ठानों को शरिया की चाह रखनेवाले और गैर मुस्लिम को अपना शत्रु समझनेवाले मुसलमानों ने निशाना बनाया है।
हिंदुओं की संपत्ति लगातार लूटी जा रही है। उनकी हत्या की जा रही है और उनके शवों को लटकाया जा रहा है। दूसरी ओर हिन्दू महिलाओं के साथ सामूहिक रेप हो रहे हैं। ये जिहादी इस्लामवादी बच्चियों को भी नहीं छोड़ रहे और इस प्रकार की घटनाओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही हैं । कई कट्टरपंथी तो साफ तौर पर हिन्दुओं को निशाना बनाने की बात कहकर सोशल मीडिया में वीडियो वायरल कर रहे हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा हिन्दुओं को निशाना बनाया जा सके।
ये इस्लामवादी यहां तक नीचता पर उतर आए हैं कि मारते वक्त पैंट नीचे उतारकर देखते हैं कि हिन्दू ही है या नहीं। जैसे ही पिटनेवाले का हिन्दू होना कन्फर्म हो जा रहा है कि इसका खतना नहीं हुआ, सभी ओर से उसे जान से मार देने के लिए टूट पड़ रहे हैं । पिछले तीन दिन में इस प्रकार के अनेक वीडियो सामने आ चुके हैं और अत्याचार के ये वीडियो लगातार सामने आते ही जा रहे हैं ।
ऐसे में गाजा पर, हमास और फिलिस्तीनियों के नाम पर इजराइल की सैन्य कार्रवाई को लेकर आंसू बहानेवाले मानवाधिकार संगठनों, यूनिसेफ समेत अन्य वैश्विक संस्थाओं की हिन्दू अत्याचार पर चुप्पी बहुत चुभ रही है। जबकि कहने को ये अपने आप को मानवाधिकार का सबसे बड़ा झण्डाबरदार मानते हैं । यूएन का बयान आया भी तो वह हिन्दुओं के ऊपर हो रहे कई दिन के अत्याचार के बाद । बांग्लादेश के कुल 64 जिलों में 50 से अधिक में हिन्दू विरोधी हिंसा जारी है।
दरअसल, अभी यूनाइटेड नेशन (यूएन) जिसकी अधिकारिक वेबसाइट पर तमाम मानवीयता का दावा करनेवाली स्टोरी तैरती नजर आ रही हैं, लेकिन यदि कुछ उसमें गायब है तो वह है हिन्दू अत्याचार से जुड़ी बांग्लादेश की एक भी स्टोरी का वहां नहीं पाया जाना । सबसे ज्यादा यूएन यदि मानवीयता के नाम पर कवरेज किसी को देता दिख रहा है तो वह गाजा है। उसके बाद दूसरे नंबर पर सूडान की समस्याओं का निदान है, उसके लिए किए जा रहे कार्य हैं ।
वहीं दिनांक 07 अगस्त के ताजा अपडेट में संयुक्त राष्ट्र को चिंता अफगान महिलाओं की सबसे ज्यादा दिखाई दे रही है और इसलिए वह ऑस्ट्रेलिया सरकार, अफगान हत्याओं के लिए मुआवजा दे, मानवाधिकार विशेषज्ञ शीर्षक से स्टोरी कर रहा है । वह कवरेज दे रहा है गाजा में स्कूलों पर इजराइली हमलों में तेजी पर गम्भीर चिन्ता शीर्षक के माध्यम से वहां की इस्लामिक जनता की चिंता उसे है, यह बताने की ।
यूनाइटेड नेशन (यूएन) को इस वक्त सबसे ज्यादा लेबनान, सीरिया गोलान पहाड़ियां और ईरान की राजधानी तेहरान में हुए हमलों से पूरे क्षेत्र में टकराव भड़कने की आशंका सता रही है। इसे मुस्लिम बच्चों और महिलाओं की चिंता है। इससे जुड़े सभी मानवाधिकार कार्यकर्ता और संगठन इन्हीं पर फोकस कर कार्य करते नजर आ रहे हैं, जैसा कि इसने अपनी रिपोर्ट्स में अधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से बताया है, लेकिन उसे बांग्लादेश में जो अमानवीयता-अत्याचार हो रहा है, वह दिखाई नहीं दे रहा ।
हालांकि कुल तीन स्टोरी बांग्लादेश पर यूएन ने करवाई हैं, किंतु ये सभी सतही हैं। सामान्य डेटा है इसमें । यहां हिन्दुओं पर जो भयंकर अत्याचार हो रहे हैं, उस पर एक शब्द भी यूएन के माध्यम से अब तक नहीं बोला गया और न ही कोई स्टोरी फ्लेश की गई है । जबकि यूएन अपनी अधिकारिक वेबसाइट पर यह दावा जरूर करता दिखा है कि यूएन न्यूज यानी कि वैश्विक परिप्रेक्ष्य में मानवीय कहानियां (Global perspective Human stories) यही साझा करना उसका अहम कार्य है।
दूसरी ओर वास्तविकता में यहां यही दिखाई दे रहा है कि उसे ईसाईयत और इस्लाम से जुड़े लोगों की चिंता सबसे अधिक है, उनके मानवाधिकार उसे याद हैं, जैसा कि उसकी वेबसाइट https://news.un.org में देखा जा सकता है लेकिन वैश्विक मानवाधिकार की पैरोकार बननेवाले इस संगठन को हिन्दुओं के अत्याचारों से कोई भी लेना-देना नहीं है।
यही हाल यहां दूसरे सबसे बड़े बच्चों और महिलाओं के वैश्विक मंच होने का दावा करने वाले उनकी सर्वाधिक चिंता जतानेवाले संगठन यूनिसेफ का नजर आ रहा है । कहने को इस संगठन का दावा है कि दुनिया के हर देश में उनके वॉलंटियर एवं पेड वर्कर्स हैं, जिनके माध्यम से यह बच्चों एवं महिलाओं के हित में चहुंमुखी और सर्वाधिक कार्य करता है, लेकिन बांग्लादेश हिन्दू हिंसा पर ये संगठन भी पूरी तरह से गायब है, कहीं कोई आवाज इसकी सुनाई नहीं दे रही। ये पूरी तरह से चुप नजर आ रहा है ।
इसे भी आज यदि किसी की सबसे ज्यादा चिंता हो रही है जैसा कि दिखाई भी दे रहा है तो वह गाजा में रह रहे मुसलमान हैं। वे ही इस यूनिसेफ संगठन की नजरों में सबसे बड़े पीड़ित हैं, इसलिए ही यह अधिकारिक तौर पर Children in Gaza need life-saving support, UNICEF and partners are on the ground स्टोरी को पहले स्थान पर रखकर चल रहा है।
इसके बाद https://www.unicef.org/ जो विशेष स्टोरी महिलाओं एवं बच्चों के हित में यहां देता दिख रहा है, उसमें भी अफ्रिका के सूडान, हेती एवं अन्य देश शामिल हैं लेकिन बांग्लादेश के इस्लामिक जिहादियों से प्रताड़ित होते बच्चे और महिलाएं कहीं भी अपनी स्टोरी या दर्द भरी दांसता में (यूनिसेफ़) इसके यहां अपनी जगह नहीं बना सके हैं।
इसी तरह से कई वैश्विक एवं स्थानीय मानवाधिकार संगठनों, मानवाधिकार समूह एमनेस्टी इंटरनेशनल एवं अन्य की पहली प्राथमिकता में गाजा, फिलीस्तीन अफ्रीका, अफगानिस्तान एवं अन्य इस्लामिक देश एवं युरोपियन देश तो हैं, लेकिन बांग्लादेश में हिन्दू प्रताड़ित और अत्याचार से अपनी जान गंवा रहे हैं, यह उनके लिए भी कोई महत्व नहीं रखता है। जबकि वास्तविकता बांग्लादेश में सर्वत्र भयावह है।
ढाका के धामराई में एक हिंदू परिवार के घर पर 100-150 इस्लामिक चरमपंथियों की एक भीड़ आती है, घर को तोड़ देती, सारी संपत्ति लूट लेती है और घर में बने मंदिर को क्षत-विक्षत कर दिया जाता है। हिंदू परिवार पर हुए हमले की इस घटना को बांग्लाादेशी अखबार ढाका ट्रिब्यून ने प्रकाशित किया है। यहां ऐसे अनेक परिवारों पर लगातार हमले हो रहे हैं।
प्रश्न यह है कि ये सब कुछ बांग्लादेश में आरक्षण समाप्त करने के लिए छात्र आंदोलन के नाम पर हो रहा है! एक सवाल लगातार उठ रहे हैं, कि आखिर छात्र आंदोलन इतना हिंसक क्यों हो गया? आज यह सवाल उठना बहुत लाजमी भी है क्योंकि छात्रों के प्रदर्शन का मकसद सिर्फ आरक्षण को खत्म करना नहीं दिखा है, इससे इतर इसकी आड़ में इस्लाम का अतिवादी चेहरा दुनिया को दिखाना और यहां के अल्पसंख्यकों को समाप्त करके शरिया राज की स्थापना करना दिखाई दे रहा है !
जिस सरजिस आलम, छात्र नेता की बात जोरशोर के साथ शेख हसीना सरकार के खिलाफ हुए आंदोलन में केन्द्रीय भूमिका निभाने को लेकर हो रही है, उसके बारे में भी यह सामने आ चुका है कि उसका मूल मकसद छात्र आन्दोलन एवं अवाम को भड़काकर बांग्लादेश में शरिया आधारित इस्लाम की स्थापना करना है। सरजिस आलम ने फेसबुक पोस्ट में लिखा था, कल का राष्ट्र इस्लाम होगा, संविधान अल कुरान होगा - इंशा अल्लाह। जब उसकी इस पोस्ट से इस पूरे आन्दोलन का पर्दाफाश हुआ तो उसने फिर दूसरा चेहरा दिखाना शुरू कर दिया और इसलिए इस सरजिस आलम ने अपना फेसबुक पोस्ट डिलीट कर दिया। लेकिन बांग्लादेश को शरिया राष्ट्र में बदलने की उसकी मंशा अब दुनिया के सामने उजागर हो चुकी है।
बांग्लादेशी पत्रकार सलाह उद्दीन शोएब चौधरी इस बारे में जानकारी देते हुए लिख रहे हैं, कि सरजिस आलम बांग्लादेश में जिस इस्लाम की स्थापना करना चाहता है, उस शरिया देश में हिंदुओं और गैर-मुस्लिमों को जजिया देना होगा, जबकि गैर-मुस्लिम लड़कियों और महिलाओं को गनीमत की संपत्ति माना जाएगा, जिसका अर्थ है कि इस्लामवादी उन्हें यौन दास के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। उन्होंने आगे लिखा है, कि विवेक रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति नैतिक रूप से इसका सामना करने के लिए बाध्य है। कृपया इस जानकारी को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं। आइए, हम इस्लामवादियों को बांग्लादेश को नव-तालिबान राज्य में बदलने से रोकें।
इस सब के बीच बड़ी और दुखभरी बात यह है कि दुनिया में एक देश जिसमें कि एक करोड़ से अधिक हिन्दू आबादी है, आज उनके घर लूटे जा रहे हैं, उनसे जीवन जीने का हक छीना जा रहा है, उन्हें अपना गुलाम बनाने पर ये इस्लामवादी मुसलमान मजबूर कर रहे हैं या फिर उन्हें अपना सब कुछ छोड़कर बांग्लादेश से बाहर जाने को कह रहे हैं।
दुखद है कि इन सभी हिन्दुओं पर होता अत्याचार वैश्विक स्तर पर बड़े बड़ों को जो अपने को शक्तशाली कहते हैं, उन्हें दिखाई नहीं दे रहा है। हर साल दुर्गापूजा पर इन्हें (हिन्दुओं को) निशाना बनाया जाता है। भारत में कुछ सांप्रदायिक मामले होते हैं तो हिंसा बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर शुरू हो जाती है। 1992 में भी निशाना बनाया गया था, जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिरा दिया था और पिछले 10 सालों में यहां पर कम से कम 05 हजार से अधिक हमलों की रिपोर्ट हुई है , जिसमें बर्बरता, आगजनी और लक्षित हिंसा शामिल है।
अभी तख्तापलट की स्थिति में यहां पर 27 जिलों में हिन्दुओं को मुस्लिम भीड़ ने अपना निशाना बनाया है। कई तस्वीरें विचलित करने वाली हैं। हालांकि, कई जगहों पर भीड़ को दूर रखने की पूरी कोशिश करते हुए, कुछ लोग मंदिरों के बाहर पहरा देते देखे जा रहे हैं। उनके भी वीडियो सामने आए हैं लेकिन फिर बाद में वे वीडियो भी आ रहे हैं कि वहां जैसे ही भीड़ पहुंचती है, उसने सभी कुछ नष्ट कर दिया।
जो मंदिर को बचाने के लिए पहले खड़े दिखाई दे रहे थे, वे भी फिर गायब हो गए । फिलहाल कोई मानवाधिकार संगठन हिंदुओं की रक्षा के लिए यहां दिखाई नहीं दे रहा है । इसमें भी दुख इस बात का सबसे अधिक यह है कि भारत में भी वह वर्ग जो अल्पसंख्यक अत्याचार के नाम पर या अन्य विवाद पैदा कर बार-बार आंसू बहाता, सड़कों पर निकलता, अधिकारों की बात करता हुआ दिखाई देता है, यहां वह वर्ग भी चुप्पी साधकर बैठा हुआ है।
यूएन, यूनिसेफ तो छोड़िए भारत के इन कथित सेक्युलरों के मुंह बंद होने पर आज इनका दोगलापन साफ दिखाई दे रहा है। इस सेक्युलर जमात में से वह भीड़ भी आज होते हिन्दू अत्याचार पर चुप और गायब है जो भारत में छोटी-छोटी बातों को बड़ा बनाकर हिन्दुओं के विरोध में लगातार एक प्रोपेगेंडा तथा नैरेटिव खड़ा करती है । जिन्होंने हमास के समर्थन में, गाजा में हिंसा के नाम पर इजराइल के विरोध में, फिलिस्तीन के हक में और न जाने ऐसे कितने ही वीडियो बना डाले।
सोशल मीडिया पर अभियान ले चला डाले तथा लम्बी-लम्बी पोस्ट उनके समर्थन में लिखी हैं; यहां ये सभी बांग्लादेश में हो रहे हिन्दू अत्याचार पर मौन दिखाई दे रहे हैं। अब इसे क्या कहें? मानवता की हत्या या संवेदनशीलता की मौत, जोकि हिंसा को हिंसा नहीं मानते, उसमें भी पंथ, मजहब, धर्म और मत देखते हैं और लाशों पर चुप रहते तथा हर वक्त अपने हित की राजनीति करते हैं। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हमारे शहरों के हर कोने में, जहां पर जीवन एक अलग लय में बहता है और जहां सपनों को उड़ने के लिए पंख मिलते हैं, इसके पीछे एक कड़वी हकीकत छिपी है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। शहरी जरूरतमंद, जो शहर को जीवित रखने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, उन्हें जीवन की बुनियादी जरूरतों के बिना, खुद को ही संभालना पड़ता है। गर्म भोजन, साफ कपड़े और सोने के लिए सुरक्षित जगह उनके लिए सिर्फ एक दूर का सपना होता है।
सोचिये, यदि आपका घर सड़क के किनारे हो और पूरी तरह से अस्थायी हो, जो मौसम की मार झेलने के लिए सबसे आगे खड़ा हो और सड़क के किनारे होने की वजह से हर पल अपने ऊपर खतरा मोल लिये हो, तो यह कैसा लगेगा? यह कल्पना में भी अच्छा प्रतीत नहीं हो रहा है न...! लेकिन कई लोगों के लिए, यह सिर्फ एक काल्पनिक स्थिति नहीं है, बल्कि एक कठिन सच है, जिसका सामना वे हर दिन करने को मजबूर हैं।
सड़कें, जो प्रगति का प्रतीक होनी चाहिए, एक जेल बन जाती हैं जिसमें कोई बचाव, कोई सुरक्षा नहीं है। इन सड़कों पर रहने वाले परिवार, जिसमें छोटे बच्चे और बुजुर्ग भी शामिल हैं, अपने ही जीवन से संघर्ष करते हैं, और साथ ही किस्मत की मार और समाज की उदासीनता बिना किसी शिकायत के सहते चले जाते हैं।
आप अक्सर इन लोगों को सड़क के किनारे देख सकते हैं, जो फटे हुए कंबल के नीचे सिमटे हुए मिल जाएँगे। उनके सपने बड़े ही सरल होते हैं, सिर्फ एक ऐसी जगह मिल जाए, जहां वे सुरक्षित रह सकें, बिना डर के उठें और अपने परिवार के साथ सुकून से रह सकें। फिर भी, ये सपने कई लोगों को हासिल नहीं हो पाते, और ये लोग गरीबी के लगातार संघर्ष के साए में ही अपना सारा जीवन निकाल देते हैं।
यह कितना हृदयविदारक है कि किसी की एक पल की जरा-सी लापरवाही कैसे किसी के जीवन को बर्बाद कर सकती है। एक तेजी से चलती कार, एक ध्यान भटका हुआ ड्राइवर और एक पल में एक जीवन समाप्त हो जाता है। निर्दोष पीड़ित, जिसकी केवल इतनी गलती थी कि उसने एक रात बिताने के लिए सड़क के किनारे का सहारा लिया था, एक्सीडेंट की वजह से मरने वालों की संख्या में महज एक दु:खद आंकड़ा बन कर रह जाता है।
हाल ही में वित्त वर्ष 2024 के लिए बजट पेश किया गया, जिसमें हाशिये पर खड़े लोगों के लिए एक उम्मीद की किरण उभरी है। सरकार ने अगले पांच सालों में एक करोड़ शहरी गरीबों और मध्यम वर्गीय परिवारों की आवासीय जरूरतों को पूरा करने के लिए 2.2 लाख करोड़ रुपए की केंद्रीय सहायता की घोषणा की है, जो प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी के तहत आयेगी। यह पहल सिर्फ एक नीति नहीं है, बल्कि उन लोगों के लिए एक वरदान भी है, जो प्रगति की दौड़ में सबसे पीछे रह गये हैं।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की घोषणा में एक ब्याज सब्सिडी भी शामिल है, जो सस्ती दरों पर लोन देने का वादा करती है, जिससे कई लोगों का अपने घर का मालिक बनने का सपना सच हो सकेगा। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत तीन करोड़ अतिरिक्त घरों की योजना के साथ, सरकार हर नागरिक को एक सुरक्षित जगह देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठा रही है।
यह पहल हमारे देश के कमजोर और जरूरतमंद लोगों के लिए एक अत्यंत आवश्यक कदम है। यह उनकी संघर्षों की मान्यता है और उन्हें एक बेहतर भविष्य देने की प्रतिबद्धता है। सिर पर छत की परिभाषा केवल आश्रय मात्र ही नहीं होती है, बल्कि यह गरिमा, सुरक्षा और उम्मीद का प्रतीक भी होती है। यह लोगों को बिना लगातार विस्थापन के डर के, एक बेहतर जीवन बनाने के लिए आवश्यक आधार प्रदान करती है।
अगले पांच वर्षों की ओर गौर करेंगे, तो हम पायेंगे और यह सच भी है कि हर आंकड़े के पीछे एक इंसान होता है, जिसे सपने, आकांक्षाएं और गरिमा के साथ जीवन जीने का हक है। आइये, हम भी सरकार के साथ मिलकर उन सभी पहलों का समर्थन करें, जो शहरों में रहने वाले गरीबों को बेहतर जीवन देने का प्रयास करती हैं और सुनिश्चित करें कि वे शहर की सड़कों पर अपना जीवन जीने के लिए मजबूर न हों।
साथ मिलकर, हम एक ऐसे समाज की स्थापना कर सकते हैं, जहां हर किसी को एक बेहतर जीवन का उचित मौका मिले और जहां सड़कें प्रगति के रास्ते हों; गरीबी की जेल नहीं। एक घर सिर्फ चार दीवारें और एक छत से ज्यादा होता है। यह एक आश्रय, आराम का स्थान और उम्मीद का प्रतीक होता है।
आइये, इस सपने को हर नागरिक और विशेष रूप से हर एक जरूरतमंद के लिए वास्तविकता बनाने की कोशिश करें और साथ ही यह सुनिश्चित करें कि हमारी और हमारे देश की प्रगति और समृद्धि की यात्रा में कोई भी पीछे न छूटे। (लेखक और राजनीतिक रणनीतिकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन सेंट्रल डेस्क। मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल का चिर प्रतीक्षित पहला बजट अनुमानों के अनुरूप ही रहा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लगातार अपना सातवां बजट पेश किया है। बजट में भारत को विकसित देश का दर्जा दिलाने के लिए आवश्यक दीर्घ अवधि के लक्ष्य निर्धारित करने को प्राथमिकता दी गयी है।
बजट में गठबंधन सरकार के लिए जरूरी राजनीतिक कसरत का भी बखूबी ध्यान रखा गया है और सरकार उन दलों की मांगों के आगे नतमस्तक हुई है जिनका समर्थन उसके अस्तित्व के लिए अति आवश्यक है। पूर्ण बजट में राजस्व एवं व्यय के आंकड़े अंतरिम बजट के प्रावधान के करीब ही हैं।
अंतरिम बजट में व्यक्त अनुमानों की तुलना में भारी भरकम लाभांश मिलने से केवल गैर-कर राजस्व के आंकड़ों में इजाफा किया गया है। राजकोषीय घाटे के अनुमान में मामूली सुधार किया गया है।
वित्त वर्ष 2024-25 के बजट में तीन जरूरी बातों का समावेश किया गया है। पहली बात, यह बजट काफी पारदर्शी रहा है और कोई बात या बजट से इतर देनदारी पर्दे के पीछे नहीं रखी गयी है। इसका फायदा यह है कि इससे वृहद आर्थिक हालात पर बजट प्रावधानों के असर को समझने में मदद मिलती है। दूसरी बात, कोविड महामारी के बाद राजकोषीय स्थिति सुदृढ़ बनाने के प्रयास तेज हो गये हैं।
इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए वित्त वर्ष 2025-26 तक राजकोषीय घाटे का लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 4.5 प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा गया है। वित्त मंत्री ने कहा है कि राजकोषीय ढांचा घाटा धीरे-धीरे घटाने के बाद भी सरकार इसे और कम करने के लिए काम करती रहेगा ताकि कर्ज बोझ घटाया जा सके। हालांकि, कितनी कमी संभव हो पाएगी और इसमें कितना समय लगेगा इसे लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
तीसरी बात, सरकार राजकोषीय स्थिति सुदृढ़ करने के साथ ही पूंजीगत आवंटन भी बढ़ाती रही है ताकि अर्थव्यवस्था की रफ्तार तेज बनी रहे। जीडीपी के सापेक्ष केंद्र सरकार का पूंजीगत आवंटन निरंतर बढ़ रहा है और यह 2024-25 के बजट में बढ़कर 3.4 प्रतिशत हो गया है, जो 2020-21 में 1.7 प्रतिशत था। जैसा ऊपर चर्चा की गयी है, अंतरिम बजट की तुलना में राजकोषीय घाटे से जुड़े आंकड़े बेहतर नजर आ रहे हैं। राजकोषीय घाटा 5.1 प्रतिशत के बजाय 4.9 प्रतिशत तक सीमित करने का लक्ष्य रखा गया है और राजस्व घाटा अंतरिम बजट के 2 प्रतिशत की तुलना में 1.8 प्रतिशत रखा गया है।
अस्थायी वास्तविक आंकड़ों की तुलना में राजकोषीय घाटा 5.6 प्रतिशत से 0.7 प्रतिशत कम यानी 4.9 प्रतिशत है। राजकोषीय घाटा भी 2.6 प्रतिशत की तुलना में 0.8 प्रतिशत कम यानी 1.8 प्रतिशत है। राजकोषीय घाटा 4.5 प्रतिशत तक समेटने का लक्ष्य प्राप्त करना और अगले साल इसे और कम करना मुश्किल भी नहीं है।
अंतरिम बजट में व्यक्त अनुमान की तुलना में सरकार को लाभांश के रूप में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से 1.1 लाख करोड़ रुपये अधिकांश मिले हैं। इस रकम का इस्तेमाल मोटे तौर पर दो बड़ी सहयोगी दलों की मांग पूरी करने में हुआ है। केंद्र सरकार आंध्र प्रदेश और बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने से दूर रही है मगर दोनों महत्त्वपूर्ण सहयोगी भारी भरकम राशि झटकने में जरूर कामयाब रहे हैं।
बिहार को बक्सर में गंगा पर दो लेन वाले पुल के लिए 26,000 करोड़ रुपये मिले हैं और 21,000 करोड़ रुपये पीरपैंती में 2,400 मेगावॉट बिजली संयंत्र स्थापित करने के लिए आवंटित किए गए हैं। इनके अलावा राज्य में कई सड़क संपर्क परियोजनाएं, मेडिकल कॉलेज, पर्यटन परियोजनाएं, खेल ढांचे तैयार करने के भी वादे किए गए हैं।
बिहार प्रस्तावित पूर्वोदय (देश के पूर्वी भाग के सर्वांगीण विकास की योजना) का भी हिस्सा है। आंध्र प्रदेश भी केंद्र सरकार ठीक ठाक रकम अपने नाम कराने में सफल रही है। राज्य को प्रस्तावित नई राजधानी बसाने के लिए 15,000 करोड़ रुपये मिलेंगे। पोलावरम सिंचाई परियोजना पूरी करने के लिए राज्य को आवश्यक राशि दी जायेगी।
बजट में विशाखापत्तनम-चेन्नई औद्योगिक गलियारे और हैदराबाद-बेंगलूरु औद्योगिक गलियारे पर जल, बिजली, रेल और सड़क जैसी आवश्यक सेवाओं के विकास के लिए रकम देने का वादा किया गया है। रायलसीमा, प्रकाशम और उत्तर तटवर्ती आंध्र के पिछड़े क्षेत्रों के आर्थिक विकास के लिए अतिरिक्त पूंजी निवेश की भी घोषणा की गई है। आंध्र प्रदेश वैसे तो देश के दक्षिणी हिस्से में है मगर इसे भी पूर्वोदय परियोजना में रखा गया है। इस घोषणाओं पर न केवल इस वित्त वर्ष बल्कि आने वाले वर्षों में भी भारी भरकम रकम खर्च की जायेगी।
ऐसी असमान व्यवस्थाओं के साथ समस्या यह है कि इनमें कोई सधी नीति नहीं दिखाई दे रही है। ये निर्णय बदले राजनीतिक समीकरणों के कारण लिये जाते हैं और सत्ताधारी दल हमेशा दूसरे दलों को अपने साथ जोड़ने के बदले वित्तीय लाभ देने की पेशकश कर सकती है। यह एक स्वस्थ संघीय व्यवस्था के दीर्घ अवधि के हित के लिए शुभ नहीं है।
संविधान में वर्णित वित्त आयोग के माध्यम से राज्यों को रकम देने का प्रावधान पहले से मौजूद है। वित्त आयोग एक संवैधानिक संस्था है जिसे राज्यों की आवश्यकताओं की समीक्षा करने का उत्तरदायित्व दिया जा सकता है। आने वाले समय में केंद्र सरकार में सहयोगी और कई मांगें रख सकते हैं। देखने वाली बात यह है कि केंद्र सरकार अपने सहयोगी दलों की मांगों से कैसे निपटती है।
विकसित देश का ओहदा हासिल करने के लिए किसी देश को प्रतिस्पर्द्धी बनना पड़ता है। कोई भी देश शुल्कों को ऊंचे स्तरों पर रखकर सालाना 8 प्रतिशत औसत वृद्धि दर हासिल नहीं कर पाया है। बजट में प्रस्तावित दरों में बदलाव भारत के संरक्षणवादी रुख को नहीं बदल पा रहा है, इसलिए इस विषय पर दोबारा विचार करने की जरूरत है। इसी तरह, पुरानी आयकर व्यवस्था के अनुसार आयकर भुगतान करने का विकल्प समाप्त करने और नई प्रणाली में दरें तर्कसंगत बनाने का समय आ गया है।
कर सुधार करने का सबसे बढ़िया एवं व्यावहारिक तरीका यह हो सकता है कि एक व्यापक आधार और दरों में कम भिनन्ता वाली एक सरल प्रणाली तैयार की जाये। कराधान में तरजीह देकर कर नीति से कई लक्ष्यों के साधना केवल अनुपालन लागत बढ़ाता है और बाधाएं उत्पन्न करता है। व्यक्तिगत आय कर में अब छह नयी दरें हैं और राजस्व का नुकसान उठाए बिना इन्हें घटाकर तीन किया जा सकता है।
उम्मीद तो यही की जा रही है कि देर सबेर कर दरों में संशोधन किए जाएंगे। वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में जीएसटी का दायरा बढ़ाने की बात की है और उम्मीद की जा सकती है कि जीएसटी परिषद की अगली बैठक में इस पर चर्चा होगी। (लेखक 14वें वित्त आयोग के सदस्य रह चुके हैं)
अंबानी जी ने अपने सागर में से एक गागर पानी निकाला है, सागर भी उन्हीं का, और गागर भी उन्हीं का, लेकिन सारी की सारी समस्या हमें है.. सच में बड़े ही अजीब लोग हैं हम..
आजकल की शादियाँ रीति-रिवाजों पर नहीं, बल्कि दिखावे पर आधारित होती हैं। अच्छे से अच्छा खाना, साज-सज्जा, मेहमानों के लिए बेहतर से बेहतर सुख-सुविधाएँ, ठहरने की उत्तम व्यवस्था, अच्छे-से अच्छा स्वागत-सत्कार आदि, ये ऐसे बिंदु हैं, जिन पर जितनी बात की जाए, कम ही होगी। लेकिन, लोगों की दूसरों पर ऊँगली उठाने की आदत, मेरी समझ के बाहर है। चंद दिनों पहले देश के एक बड़े घराने यानि अंबानी परिवार के बेटे अनंत अंबानी की शादी का आयोजन हुआ। सोशल मीडिया उठा लो या प्रिंट मीडिया, टेलीविज़न पर देख लो या फिर आम आदमी के समूह में खड़े हो जाओ, हर जगह इस शादी और इसमें हुए खर्चों को गंभीर मुद्दा बनाकर रखा हुआ है लोगों ने।
लोगों को यह बात फूटी आँख नहीं सुहा रही है कि शादी में 5000 हजार करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। अब लोगों को गरीबी रेखा और देश में बढ़ते भूखमरी इंडेक्स की चिंता सताने लगी है। स्वस्थ्य और शिक्षा का निरंतर महँगा होना भी खटकने लगा है। गैस-पेट्रोल की महँगाई का रोना भी अब रोने लगे लोग। मोबाइल फोन के रिचार्ज महँगे हो रहे हैं, यह भी लोगों को दिख रहा है। इस महँगाई का शादी से क्या लेना-देना? और तो और लोग यह भी कह रहे हैं कि शादी का खर्चा निकालने के लिए अंबानी जी ने रिचार्ज महँगा कर दिया। तो आप क्या यह चाहते हैं कि व्यक्ति इतनी महँगी शादी न करके आपके लिए महँगाई कम करने का काम करे? यानी वह अपना पैसा, आपकी सुख-सुविधाओं के लिए लगा दे। आप कर सकेंगे क्या ऐसा कुछ, यदि आप इतने सक्षम होंगे तो?
कोई कह रहा है किसानों की समस्या हल कर देते, तो कोई कहता है गरीबों के लिए मकान ही बना देते। कोई कहता है हॉस्पिटल बनवा देते, तो कोई कहता है देश की सड़कें ही दुरुस्त करवा देते। आखिर क्यों कर देते? उस शख्स ने आपके पैसों का उपयोग अपने घर की शादी में किया क्या, जो आपको उन पैसों की इतनी चिंता हो रही है? आपकी शादियों में होने वाले खर्चों से तो कई गुना कम ही खर्च किया है अंबानी जी ने। अब आँकड़ों पर बात करेंगे, तो उन लोगों के हाथ सिवाए शर्मिंदगी के कुछ भी नहीं लगेगा, जो बार-बार इस शादी को पैसों की बर्बादी करार दे रहे हैं। सभी लोग अपनी हैसियत के अनुसार काम करते हैं, इस परिवार ने तो अपनी आमदनी के सिर्फ 0.5 प्रतिशत हिस्से का ही इस्तेमाल अनंत की शादी के लिए किया है।
दोनों ने एक फंक्शन में सोने की ड्रेस पहनी, उस पर भी बड़े मुद्दे उठा रहे हैं लोग.. वह कहते हैं न, व्यक्ति दुनिया पर लाख सवाल उठा लेता है, लेकिन कभी झाँकता नहीं खुद के गिरेबान में। एक माध्यम वर्गीय परिवार की ही बात करते हैं, चलिए.. रस्में निभाने तक की बात अलग है, लेकिन अब हमारे समाज में चलन दिखावे का चल पड़ा है.. हल्दी के फंक्शन में साज-सज्जा अलग और पीले वस्त्र धारण किए हुए तमाम मेजबान, फिर होती है मेहँदी, तमाम साज-सज्जा हरे रंग की और उसी रंगों के परिधान.. शादी तो रस्मों से होती है न! महिला संगीत कैसी रस्म है?? इसमें भी बड़ी-बड़ी रंग-बिरंगी एलईडी वाली साज-सज्जा अलग, थीम अलग और फिर फेरों, बारात और रिसेप्शन की तो क्या ही बात की जाए.. हर फंक्शन के लिए अलग ड्रेस कोड और थीम..
मैं यहाँ पूछना चाहता हूँ कि क्या हर फंक्शन में साज-सज्जा में खर्च नहीं होता या फिर जो अलग-अलग रंग की थीम हर फंक्शन के लिए विशेष रूप से रखी जाती है और इसके लिए अलग-अलग कपड़े खरीदे जाते हैं, वो मुफ्त में मिल जाते हैं? एक आम आदमी इस तरह के आयोजनों में कम से कम 20 से 25 लाख रुपए खर्च कर देता है। एक आम आदमी की हैसियत से यह राशि काफी अधिक है। लेकिन, वहाँ इन मुद्दों को उठाने वाले लोगों को कोई आपत्ति नहीं होती। इन पैसों से करवाइए न गरीबों की सेवा.. अपने क्षेत्र की सड़कें बनवा दीजिए इन पैसों से.. आप कीजिए यह पहल, फिर बेशक उम्मीद करें अंबानी जी से..
करिए कोर्ट या मंदिर में बढ़िया रीति-रिवाज से शादी, लाखों रुपए स्वाहा होने से बच जाएँगे.. समाजसेवा करने में और जरूरतमंदों की मदद करने के लिए इन रुपयों का इस्तेमाल कीजिएगा फिर.. इसमें क्या गलत है? अफसोस, नहीं कर पाएँगे आप, क्योंकि ऊँगली उठाना बहुत आसान है, उसे खुद के लिए अमल में लाना उतना ही कठिन। जब आपकी हैसियत हजारों की है और आप लाखों खर्च कर रहे हैं वह भी एक शादी में, तो उस व्यक्ति की हैसियत तो अरबों की है, उसके बावजूद उसने करोड़ों ही खर्च किए हैं.. लगाइए अब गणित..
अंबानी जी ने अपने सागर में से एक गागर पानी निकाला है, सागर भी उन्हीं का, और गागर भी उन्हीं का, लेकिन सारी की सारी समस्या हमें है.. सच में बड़े ही अजीब लोग हैं हम.. जितने भी लोग सवाल उठा रहे हैं, सब के सब बेबुनियाद हैं। जरूरतें बनी रहेगी संघर्ष होता रहेगा, रोटी कपड़ा मकान के लिए। लेकिन, जीवन में खुशियों को बाँटने और जीने का अधिकार सभी को है, सो उन्होंने भी शादी के इस आयोजन में किया। उन्होंने जिस तरह की शाही शादी की है, अन्य देशों के लोग उसकी तारीफें कर-करके थक नहीं रहे हैं, और एक हम, अपने ही लोगों की टाँग खींचने का काम करने में लगे रहते हैं। उम्मीद है, मुद्दा उठाने वाले तमाम लोगों को सारे सवालों का जवाब मिल गया होगा.. मेरी ओर से नव जोड़े को परिणय सूत्र में बँधने की अनंत शुभकामनाएँ..
एबीएन सेंट्रल डेस्क। 18वीं लोकसभा के गठन तथा शपथ ग्रहण के साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राजग गठबंधन की सरकार ने अपना कामकाज प्रारम्भ कर दिया है। कठिन चुनौतियों में भी अवसर खोजने वाली भाजपा व प्रधानमंत्री मोदी ने अपना संकल्प पत्र अमल में लाकर राजनैतिक गणित ठीक करने का अभियान भी आरम्भ कर दिया है। राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि नए दौर की भारतीय जनता पार्टी सदा चुनावी मोड में रहती है। वो बात अलग है कि चुनावों में कभी सफलता मिलती है और कभी नहीं भी मिलती।
वर्तमान लोकसभा में भाजपा को 241 सीटें प्राप्त हुई हैं। उसे उप्र, राजस्थान, हरियाणा और महाराष्ट्र में अच्छा खासा नुकसान हुआ किंतु प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में तनिक भी विलम्ब न करते हुए भाजपा ने सबकुछ ठीक करने के लिए कमर कर कर अभियान आरम्भ कर दिया है। लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने पहली फाइल पर हस्ताक्षर करके किसानों की सम्मान निधि की अगली किश्त को मंजूरी दी। वहीं, कैबिनेट ने अपनी बैठक में गरीबों के लिए 3 करोड़ आवास बनाने का निर्णय लिया।
प्रधानमंत्री मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद जहां जी 7 में भाग लेने के लिए इटली गये, वहीं भारत में उन्होंने सर्वप्रथम अपने संसदीय क्षेत्र काशी की यात्रा की और किसानों को सम्मान निधि जारी करते हुए मतदाताओं को धन्यवाद दिया। प्रधानमंत्री ने काशी में बन रहे स्टेडियम की प्रगति का अवलोकन भी किया। काशी में प्रधानमंत्री मोदी व उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पूरी तरह से साथ तथा तनाव मुक्त दिखे। साथ ही अगली अग्निपरीक्षा के लिए तैयार भी।
प्रधानमंत्री मोदी ने संसदीय क्षेत्र वाराणसी से किसान सम्मान निधि के तहत 20 हजार करोड़ रुपये किसानों के खाते में डाले। अभी जब विपक्ष यही दिखाने में जुटा हुआ है कि इस बार भाजपा का अपने दम पर बहुमत नहीं है तब भाजपा मतदाता अभिनंदन यात्रा के माध्यम से यह बताने के लिए जुट गई है कि ऐतिहासिक रूप से तीसरी बार सरकार बनाने का अवसर जनता ने भाजपा को ही दिया है।
आंकड़ों के अनुसार विगत चुनावों में भाजपा के पास ग्रामीण इलाके की 201 सीट थीं जबकि पार्टी इस बार ग्रामीण क्षेत्रों में मात्र 126 सीट ही जीत पाई है। माना जा रहा है कि किसानों, युवाओं और महिलाओं का एक बड़ा वर्ग इस बार किसी न किसी कारण से भाजपा से नाराज हो गया जिससे उसकी सीटें काफी कम हो गयी। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी से किसान सम्मेलन के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी के नाराज मतदाता को मनाने के साथ कई समीकरण साधने व संदेश देने का प्रयास किया है।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि 18वीं लोकसभा के लिए हुआ ये चुनाव भारत के लोकतंत्र की विशालता, लोकतंत्र के सामर्थ्य, भारत के लोकतंत्र की व्यापकता, भारत के लोकतंत्र की जड़ों की गहराई को दुनिया के सामने पूरे सामर्थ्य के साथ प्रस्तुत करता है। उन्होंने अपने संबोधन में एक बार फिर कहा कि मां गंगा ने मुझे गोद लिया है। मैं यहीं का हो गया हूं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि मैंने किसान, नौजवान, नारी शक्ति और गरीब को विकसित भारत का मजबूत स्तंभ माना है और सरकार बनते ही सबसे पहले और सबसे बड़ा किसान और गरीब परिवारों से जुड़ा फैसला लिया है। उन्होंने बताया कि आज 3 करोड़ बहनों को लखपति दीदी बनाने के लिए भी बड़ा कदम उठाया गया है। कृषि सखी के रूप में बहनों की नई भूमिका उन्हें सम्मान और आय के लिए नये साधन दोनो सुनिश्चित करेगी। कृषि निर्यात में हमें और आगे जाना है।
किसान सम्मेलन को उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी संबोधित किया और प्रदेश के किसानों को बड़ा संदेश देते हुए उनकी नाराजगी को कम करने का प्रयास किया है ताकि उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा उपचुनावों तक किसानों की नराजगी को कम करके लाभ लिया जा सके। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कृषि व किसानों के लिए बहुत बड़ी बातें कही हैं। उनका कहना है कि खेती हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और किसान आत्मा। किसान भगवान के रूप हैं। इसी को ध्यान में रखकर सरकार किसानों के हित के लिए बहुत काम कर रही है।
2024 के लोकसभा चुनावों में ग्रामीण क्षेत्रों में हुए नुकसान को देखते हुए भाजपा ग्रामीण क्षेत्रों में अपना विशेष अभियान चलाने जा रही है। आगामी दिनों में हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। जिसमें हरियाणा की 90 में से 35 सीट का फैसला किसान करते हैं। झारखंड की 81 में से 31 सीटों पर भी किसान असरकारी हैं। जबकि महाराष्ट्र में 288 विधानसभा सीटों मे से 134 सीटें ऐसी हैं जहां किसान चुनाव परिणामों पर सीधा असर डालते हैं। भाजपा मतदाताओं का आभार जताने के लिए मतदाता अभिनंदन यात्रा भी निकालेगी। स्पष्ट है भाजपा एक गतिमान पार्टी है और वह अपने कार्यकर्ताओं को भी गतिमान बनाये रखना जानती है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। योग की आड़ में देश में धंधा पनप गया है। महानगरों से लेकर कस्बों-गांवों में भी इंस्टीट्यूट, प्रशिक्षण केंद्र, योग टीचर्स की फौज तैयार हो गई है। योग पर किसी का पेटेंट नहीं होना चाहिए और न ही कोई इसकी किसी को ठेकेदारी करनी चाहिए। योग शरीर को चंगा रखने का मजबूत हथियार है और सदैव रहेगा। देखकर दुख होता है जब योग का शारीरिक जरूरतों से कहीं ज्यादा मौजूदा समय में उसका व्यावसायिक, धार्मिक और सियासत में इस्तेमाल होता है।
योग को मात्र स्वस्थ काया तक ही सीमित रखना चाहिए। उसकी आड़ में राजनीतिक जरूरतें पूरी नहीं करनी चाहिए। योग गुरु कहलाकर समूचे संसार में प्रसिद्धि पा चुके बाबा रामदेव ने निश्चित रूप से योग का प्रचार जबरदस्त तरीके से किया। इस दरम्यान उन्होंने बड़ा व्यवसाय भी स्थापित किया। बाजार में हजारों प्रोड्क्ट्स उतारकर उनकी कंपनी का टर्नओवर लाखों-करोड़ों में नहीं, बल्कि अरबों में पहुंच गया है।
विवादों के इतर देखें तो बाबा रामदेव की कोशिशों की बदौलत ही योग को वैश्विक मान्यता मिली। केंद्र सरकार ने भी प्रचार-प्रसार में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। उसके बदले सरकार ने भी उनका फायदा चुनाव में जमकर उठाया। इस सच्चाई से भी इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन इससे योग विज्ञान का कुछ समय बीतने के बाद नुकसान हुआ।
योग सत्ता पक्ष और विपक्ष में बंटकर भाजपा और कांग्रेस हो गया। जब पहला योग दिवस मना, तो कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों ने आयोजन का वॉकआउट किया। यहां तक उन्होंने और उनके कार्यकतार्ओं ने भी योग नहीं किया। लेकिन भाजपा ने हर्षोल्लास से मनाया। दरअसल, उनके मनाने का कारण क्या था, सभी को पता था। ठीक है, अगर विपक्षी दलों को बाबा रामदेव से कोई आपत्ति या ना-खुशी है, तो उनको योग को विरोध की केटेगरी में नहीं रखना चाहिए।
बहरहाल, कोई कहे बेशक कुछ न, पर सियासत ने योग को धर्म से छोड़ने की भी कोशिशें की। योगासनों में भी धर्मों की एबीसीडी खोजी जाती है। दूसरा, सबसे दु:खद पहलू योग के साथ ये जुड़ा, योग का व्यावसायीकरण कर दिया गया। कइयों की दुकानें योग की आड़ में चल पड़ी हैं। बड़े-बड़े प्रतिष्ठान, कॉलेज, स्कूल, प्रशिक्षण केंद्र संचालित हो गए हैं, जहां योग सिखाने के नाम पर मोटा माल काटा जा रहा है।
योग गुरुओं, एक्सपर्ट्स व प्रशिक्षकों की तो फौज ही खड़ी हो गई है। बड़े-बड़े नेताओं ने अपने लिए पर्मानेंट योग प्रशिक्षक हायर किये हुए हैं। कुल मिलाकर योग को लोगों ने अब पूरी तरह से स्टेटस सिंबल बना डाला है। यानी मध्यम वर्ग और गरीबों की पहुंच से बहुत दूर कर दिया गया है। योग विधा नयी नहीं है। पांच हजार पूर्व ऋषि परंपराओं से मिली अनमोल धरोहर जैसी है। ज्यादा पुराने समय की बात न करें, सिर्फ आजादी तक का इतिहास खंगाले तो पता चलता है कि उस वक्त तक भी चिकित्सा विज्ञान ने उतनी सफलता नहीं पायी थी, जिससे अचानक उत्पन्न होने वाली बीमारियों से तुरंत इलाज कराया जाये।
उस वक्त भी जड़ी-बूटियों और नियमित योगासन पर ही समूचा संसार निर्भर हुआ करता था। अंग्रेजी दवाओं का विस्तार कोई चालीस-पचास के दशक से जोर पकड़ा है। तब मात्र एकाध ही फार्मा कंपनियां हुआ करती थी, जो अंग्रेजी दवाइयों का निर्माण करती थीं। विस्तार अस्सी के दशक के बाद आरंभ हुआ। आज तीन से चार हजार के करीब फार्मा कंपनियां अंग्रेजी दवा बनाने में लगी हैं। बावजूद इसके योग का बोलबाला दिनों दिन बढ़ रहा है।
जानकार बताते हैं कि अंग्रेजी दवाएं तुरंत असर तो करती हैं पर, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता हिला देती हैं। शायद, इस सच्चाई से आम लोग अनभिज्ञ होते हैं कि बड़ी-बड़ी फार्मा कंपनियों के मालिक भी नियमित योगासन करते हैं। क्योंकि उनको योग के फायदे पता होते हैं। योग को एक नहीं, बल्कि हजारों बड़ी और गंभीर बीमारियों से लड़ने का हथियार माना गया है।
वक्त फिर से पलटा है, इसलिए लोग धीर-धीरे पुरानी दवा पद्धितियों की ओर लौटने लगे हैं। सालों पुरानी हेल्थ प्रॉब्लम से छुटकारा पाने के लिए मरीज योग की मदद लेने लगे हैं। अनुभवी डॉक्टर्स भी अपने पेशेंट को डेली रूटीन में योग शामिल करने की सलाह देते हैं। योग चिकित्सक मंगेश त्रिवेदी की माने तो ऐसे कई केस सामने आए हैं, जिसमें 15-20 साल पुरानी बीमारी को खत्म करने के लिए लोगों ने पहले योग की मदद ली और 3 से 4 महीने में इसका असर भी देखा है।
बहरहाल, जरूरत इस बात की है कि योग को राजनीति और धर्म के मैदान में न घसीटा जाए। कुछ राजनीतिक दल योग और योग को नियमित अपनाने वालों को अपना वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। कुछ लोग योग पर एक छत्र राज और अपनी ठेकेदारी भी जमाते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए, योग सबके लिए है और वह भी नि:शुल्क। योग हमें ऋषियों-मुनियों द्वारा दी गई बेशकीमती सौगात है। हमारी धरोहर है जिसे हमारे पूर्वज हमारे लिए छोड़कर गये हैं। इसे सजोकर रखना हम सबका परमदायित्व बनता है।
योग के फायदों से हम परिचित हैं। योग को लेकर हमें किसी लोभ-लालच में नहीं पड़ना चाहिए। योग करने वालों को भाजपा का कार्यकर्ता, रामदेव का अनुयायी या आरएसएस का शुभचिंतक नहीं समझना चाहिए। हालांकि, ऐसी मिथ्या अब लोगों से दूर हुई है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी अपने स्वास्थ्य की परवाह करते हुए योग को अपनाएं। विश्व योग दिवस का मकसद हममें योगासन के प्रति ललक पैदा करना और दूसरों को योग के लिए जागरुकता करना मात्र होता है। योग स्वस्थ शरीर का मुख्य सारथी है, इसे दूर न करें, नियमित अपनायें। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रतिवर्ष 21 जून को दुनियाभर के 170 से भी ज्यादा देश अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाते हैं और योग को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाने का संकल्प लेते हैं। संयुक्त राष्ट्र ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 69वें सत्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा रखे गये प्रस्ताव के जवाब में 11 दिसंबर 2014 को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की स्थापना की और वैश्विक स्तर पर पहला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 21 जून 2015 को मनाया गया।
इस वर्ष पूरी दुनिया स्वयं और समाज के लिए योग थीम के साथ 10वां अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मना रही है। प्रतिवर्ष यह दिवस मनाने का उद्देश्य योग को एक ऐसे आंदोलन के रूप में बढ़ावा देना है। वैसे तो योग को विश्वस्तर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सतत प्रयासों के चलते वर्ष 2015 में अपनाया गया, किंतु भारत में योग का इतिहास सदियों पुराना है। माना जाता रहा है कि पृथ्वी पर सभ्यता की शुरुआत से ही योग किया जा रहा है लेकिन साक्ष्यों की बात करें तो योग करीब पांच हजार वर्ष पुरानी भारतीय परंपरा है।
करीब 2700 ईसा पूर्व वैदिक काल में और उसके बाद पतंजलि काल तक योग की मौजूदगी के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं। महर्षि पतंजलि ने अभ्यास तथा वैराग्य द्वारा मन की वृत्तियों पर नियंत्रण करने को ही योग बताया था। हिंदू धर्म शास्त्रों में भी योग का व्यापक उल्लेख मिलता है। विष्णु पुराण में कहा गया है कि जीवात्मा तथा परमात्मा का पूर्णतया मिलन ही अद्वेतानुभूति योग कहलाता है।
इसी प्रकार भगवद्गीता बोध में वर्णित है कि दु:ख-सुख, पाप-पुण्य, शत्रु-मित्र, शीत-उष्ण आदि द्वंदों से अतीतय मुक्त होकर सर्वत्र समभाव से व्यवहार करना ही योग है। भारत में योग को निरोगी रहने की करीब पांच हजार वर्ष पुरानी मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक पद्धति के रूप में मान्यता प्राप्त है, जो भारतीयों की जीवनचर्या का अहम हिस्सा है।
सही मायनों में योग भारत के पास प्रकृति प्रदत्त ऐसी अमूल्य धरोहर है, जिसका भारत सदियों से शारीरिक और मानसिक लाभ उठाता रहा है, लेकिन कालांतर में इस दुर्लभ धरोहर की अनदेखी का ही नतीजा है कि लोग तरह-तरह की बीमारियों के मकड़जाल में जकड़ते गये। वैसे तो स्वामी विवेकानंद ने भी अपने शिकागो सम्मेलन के भाषण में संपूर्ण विश्व को योग का संदेश दिया था लेकिन कुछ वर्षों पूर्व योग गुरु स्वामी रामदेव द्वारा योग विद्या को घर-घर तक पहुंचाने के बाद ही इसका व्यापक प्रचार-प्रसार संभव हो सका और आमजन योग की ओर आकर्षित होते गये। देखते ही देखते कई देशों में लोगों ने इसे अपनाना शुरू किया। आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में योग का महत्व कई गुना बढ़ गया है।
योग न केवल कई गंभीर बीमारियों से छुटकारा दिलाने में मददगार साबित होता है बल्कि मानसिक तनाव को खत्म कर आत्मिक शांति भी प्रदान करता है। दरअसल यह एक ऐसी साधना, ऐसी दवा है, जो बिना किसी लागत के शारीरिक एवं मानसिक बीमारियों का इलाज करने में सक्षम है। यह मस्तिष्क की सक्रियता बढ़ाकर दिनभर शरीर को ऊजार्वान बनाए रखता है।
यही कारण है कि अब युवा एरोबिक्स व जिम छोड़कर योग अपनाने लगे हैं। माना गया है कि योग तथा प्राणायाम से जीवनभर दवाओं से भी ठीक न होने मधुमेह रोग का भी इलाज संभव है। यह वजन घटाने में भी सहायक माना गया है। योग की इन्हीं महत्ताओं को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 27 सितम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा से आह्वान किया था कि दुनियाभर में प्रतिवर्ष योग दिवस मनाया जाये ताकि प्रकृति प्रदत्त भारत की इस अमूल्य पद्धति का लाभ पूरी दुनिया उठा सके।
यह भारत के बेहद गर्व भरी उपलब्धि रही कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रधानमंत्री के इस प्रस्ताव के महज तीन माह के भीतर 177 देशों ने अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाये जाने के प्रस्ताव पर स्वीकृति की मोहर लगा दी, जिसके उपरांत संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 11 दिसम्बर 2014 को घोषणा कर दी गयी कि प्रतिवर्ष 21 जून का दिन दुनियाभर में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाया जायेगा।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के लिए 21 जून का ही दिन निर्धारित किए जाने की भी खास वजह रही। दरअसल, यह दिन उत्तरी गोलार्ध का पूरे कैलेंडर वर्ष का सबसे लंबा दिन होता है। इस दिन की तिथि को ग्रीष्म संक्रांति के साथ मेल खाने के लिए बनाया गया था, जो उत्तरी गोलार्ध में वर्ष का सबसे लंबा दिन होता है और प्रकाश और स्वास्थ्य का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति के नजरिये से देखें तो ग्रीष्म संक्रांति के बाद सूर्य दक्षिणायन हो जाता है तथा यह समय आध्यात्मिक सिद्धियां प्राप्त करने में लाभकारी माना गया है।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी योग के महत्व को स्वीकारने लगा है। इसलिए स्वस्थ जीवन जीने के लिए जरूरी है कि योग को अपनी दिनचर्या का अटूट हिस्सा बनाया जाये। बहरहाल, योग केवल एक व्यायाम नहीं है बल्कि यह शरीर और मन के साथ-साथ स्वयं को सशक्त बनाने का एक बेहतरीन तरीका है। (लेखक,स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। विश्व को कल्याण का मार्ग दिखाने के लिए भारत का चिंतन पुरातन काल से रहा है। विश्व का कल्याण करने का भाव भारतीय चिंतन में हमेशा से रहा है। वर्तमान में विश्व में जितनी भी ज्ञान और विज्ञान की बातें की जाती हैं, वह भारत में युगों पूर्व की जा चुकी हैं। इससे कहा जा सकता है कि भारत में ज्ञान और विज्ञान की पराकाष्ठा थी, लेकिन यह हमारा दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि हम विदेशी चमक के मोहजाल में फंसकर अपने ज्ञान को संरक्षण प्रदान नहीं कर सके। जिसके कारण हम स्वयं ही यह भुला बैठे कि हम क्या थे।
भारत की भूमि से विश्व को एक परिवार मानने का संदेश प्रवाहित होता रहा है, आज भी हो रहा है। यह अकाट्य सत्य है कि विश्व को शांति के मार्ग पर ले जाने का ज्ञान और दर्शन भारत के पास है। योग विधा एक ऐसी शक्ति है, जिसके माध्यम से दुनिया को स्वस्थ और मजबूती प्रदान की जा सकती है। 21 जून को मनाए जाने वाले अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के माध्यम से आज विश्व के कई भारत के साथ खड़े हुए हैं। यह विश्व को निरोग रखने की भारत की सकारात्मक पहल है।
देव भूमि भारत में वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा को आत्मसात करने वाले मनीषियों ने बहुत पहले ही विश्व को स्वस्थ और मजबूत देने का संदेश दिया है। वास्तव में योग में राजनीति देखना संकुचित मानसिकता का परिचायक है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर विश्व में योग का जो स्वरूप दिखाई दिया है, वह अपने आप में एक करिश्मा है।
करिश्मा इसलिए क्योंकि ऐसा न तो पहले कभी हुआ है और न ही योग के अलावा दूसरा कार्यक्रम हो सकता है। इतनी बड़ी संख्या में भाग लेने वाले लोगों के मन में योग के बारे में अनुराग पैदा होना वास्तव में यह तो प्रमाणित करता ही है कि अब विश्व एक ऐसे मार्ग पर कदम बढ़ा चुका है, जिसका संबंध सीधे तौर पर व्यक्तिगत तथा सामूहिक उत्थान से है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर भाग लेने वालों ने एक कीर्तिमान बनाया है।
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के योग साधकों के साथ मिलकर योग विद्या को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की जो पहल की थी, आज उसके सार्थक परिणाम भी दिखाई देने लगे हैं। अब विश्व के कई देशों ने स्वस्थ और मजबूती की राह पर अपने कदम बढ़ा दिए हैं। अब विश्व को निरोग बनाने से कोई ताकत नहीं रोक सकती।
वर्तमान में विश्व के अनेक देश इस सत्य से भली भांति परिचित हो चुके हैं कि योग जीवन संचालन की एक ऐसी शक्ति है, जिसके सहारे तनाव मुक्त जीवन की कल्पना की जा सकती है। हम जानते हैं कि विश्व के कई देशों में जिस प्रकार का विचार प्रवाह है, उससे जीवन की अशांति का वातावरण तैयार हो रहा था और अनेक लोग इसकी गिरफ्त में आते जा रहे हैं।
विश्व के कई देश इस बात को जान चुके हैं कि योग के सहारे ही मानसिक शांति को प्राप्त किया जा सकता है। योग दिवस को मिले भारी वैश्विक समर्थन के बाद यह तो तय हो गया है कि विश्व को सुख और समृद्धि के मार्ग पर ले जाने के लिए भारत के दर्शन को विश्व के कई देश खुले रूप में स्वीकार करने लगे हैं।
इससे पहले जो भारत विश्व के सामने अपना मुंह खोलने से कतराता था, आज वही भारत एक नये स्वरूप में विश्व के समक्ष अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। विश्व को भारत की विराट शक्ति का अहसास हो चुका है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब से देश के प्रधानमंत्री बने हैं, तब से हमारे देश के बारे में वैश्विक दृष्टिकोण में गजब का बदलाव दिखाई दे रहा है।
सवाल यह है कि क्या यह बदलाव नरेन्द्र मोदी को देखकर आया है, नहीं। इसका जवाब यह है कि भारत के पास पूर्व से ही ऐसी विराट शक्ति थी, जिसका भारत की पूर्व सरकारों को भारतीय जनता को बोध नहीं था। हर भारतवासी के अंदर शक्ति का संचय है, हम शक्ति को प्रदर्शित नहीं कर पा रहे थे, इतना ही नहीं हम यह भूल भी गए थे कि हमारे अंदर भी शक्ति है।
नरेन्द्र मोदी ने जामवंत की भूमिका अपनाकर देशवासियों एवं अप्रवासी भारतीयों के मन में इस भाव को जाग्रत किया कि आप महाशक्ति हैं। जैसे ही नरेन्द्र मोदी ने अमेरिका के मेडीसन एस्क्वायर में भारतीय शक्ति का प्रस्फुटन किया, वैसे ही भारत के नागरिकों के अंदर गौरव का अहसास तो हुआ ही साथ ही विश्व के विकसित देश भारत को अपना समकक्ष मानने लगे।
भारत के दर्शन में एक ठोस बात यह भी है कि भारत में हमेशा सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया वाला भाव ही रहा है। जो भी देश भारत के इस दर्शन से तालमेल रखता हुआ दिखाई देता है, वह कभी दूसरे का अहित सोच भी नहीं सकता। जबकि विश्व के अनेक देश केवल स्वयं का ही हित सबसे ऊपर रखकर दूसरों के हितों पर चोट करते हैं।
आतंक फैलाकर अपना वर्चस्व स्थापित करने वाला समाज मारकाट करने की मानसिकता के साथ जी रहा है। ऐसे लोगों का न तो कोई अपना है, और न ही कोई परिवार। कई मुस्लिम देशों के नागरिक आज मुसलमानों के ही दुश्मन बनकर मारकाट का खेल खेल रहे हैं। ऐसे लोगों से शांति का बातें करना भी बेमानी है। हमारी सलाह है कि ऐसे लोग भी योग की क्रियाएं अपनाकर शांति के मार्ग पर चल सकते हैं। योग जहां स्वस्थ मानािकता का निर्माण करने में सहायक है वहीं शांति स्थापना का उचित मार्ग है।
सवाल उठता है कि वर्तमान के मोहजाल में फंसे विश्व के अनेक देश आज किसी भी चीज में राहत नहीं देख रहा है। पैसे के पीछे भाग रहा पूरा विश्व तनाव भरा जीवन जी रहा है। इस तनाव से मुक्ति पाने का एक ही मार्ग है योग को अपनाना। जिसने अपने जीवन में योग को महत्व दिया है, वह इस तनाव से छुटकारा पाने में सफल रहा है। आज सबसे ज्यादा तनाव का जीवन मुस्लिम देशों में दिखाई देता है। वहां केवल मारकाट की भाषा के अलावा कुछ भी नहीं है। इन देशों में हमेशा अशांति का वातावरण दिखाई देता है और सरकार नाम की कोई चीज नहीं है।
यह इस बात का ध्यान रखना होगा कि आध्यात्मिकता और ध्यान योग के मामले में हम विश्व के सभी देशों से बहुत आगे हैं। इस बारे में दुनिया का ज्ञान भारत के समक्ष अधूरा ही है। भारत को जब तक इस बात का बोध था, तब तक विश्व का कोई भी देश भारत का मुकाबला करने का सामर्थ्य नहीं रखता था। आज इस शक्ति के प्रदर्शन की शुरूआत हो चुकी है, जरूरत इस बात की है कि हम सभी सरकार के कदम के साथ सहयोग का भाव अपनाकर अपना कार्य संपादित करें। आने वाले समय में भारत का भविष्य उज्ज्वल है। (लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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