एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पहलगाम में पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवादी कृत्य के प्रति भारत की जवाबी प्रतिक्रिया - आॅपरेशन सिंदूर, जो अभी भी जारी है : आतंकवाद-रोधी और सैन्य सिद्धांत तथा रुख में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। अपने जोशीले भाषण में, जिसकी गूंज पूरे भारत और दुनिया के विभिन्न देशों की राजधानियों में सुनायी दी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने घोषणा करते हुए कहा कि सीमा-पार आतंकवाद के किसी भी कृत्य के खिलाफ निर्णायक सैन्य कार्रवाई की एक नई सामान्य स्थिति स्थापित की गई है।
कोई भी देश, जो आतंकवादी अवसंरचना को पनाह देता है, उसे वित्तीय मदद देता है और उसका पोषण करता है, उसे अपने सैन्य बलों के साथ जोड़ता है और निर्दोष नागरिकों के खिलाफ क्रूर हमलों के लिए भारत को निशाना बनाता है, उसे त्वरित, दंडात्मक और प्रतिशोधी परिणामों का सामना करना पड़ेगा।
सोची-समझी सैन्य कार्रवाई से न केवल पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में बल्कि अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के बीच में भी आतंकवादी नेटवर्क ध्वस्त हो जायेंगे, भले ही राज्य प्रायोजित आतंकवादी ठिकाने आधिकारिक सुरक्षा संरचनाओं के साथ कितने भी जुड़े हुए हों। सिंदूर सिद्धांत, भारत की संप्रभुता और सभ्यतागत लोकाचार को बनाये रखने में निहित है।
इसका उद्देश्य इसकी क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करना, आंतरिक एकता, सद्भाव और शांति सुनिश्चित करना और 2047 तक विकसित भारत बनाने के लिए देश को त्वरित आर्थिक विकास के पथ पर आगे बढ़ाना है। यह सीमा-पार आतंकवाद के प्रति शून्य-सहिष्णुता के रुख की पुष्टि करता है और भारत को अपने सुरक्षा हितों की रक्षा में निर्णायक रूप से कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध करता है, जिसे पुनर्परिभाषित और विस्तृत किया गया है।
प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट रूप से कहा है: भारत के खिलाफ किसी भी तरह की आतंकी कार्रवाई युद्ध मानी जायेगी - अब कोई संदेह की स्थिति नहीं है, किसी दूसरे तरीके से युद्ध को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा, आतंकवाद से होने वाले नुकसान के आगे हार नहीं मानी जाएगी। आॅपरेशन के बाद राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष प्रधानमंत्री का संबोधन सफलता की पुष्टि से कहीं अधिक था। बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर दिए गए इस संबोधन ने एक नई रणनीतिक व्यवस्था का अनावरण किया- दृढ़, गरिमापूर्ण और भारत के सभ्यतागत मूल्यों पर आधारित।
इसने एक सरल लेकिन दृढ़ संदेश दिया: भारत शांति में विश्वास करता है, लेकिन शांति को शक्ति का समर्थन होना चाहिए। अपने मूल में, प्रधानमंत्री मोदी का सिंदूर सिद्धांत तीन अलग सिद्धांतों पर जोर देता है, जिन पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। पहला, भारत उन देशों के साथ कोई बातचीत नहीं करेगा, जो आतंक को बढ़ावा देते हैं; जब बातचीत फिर से शुरू होगी, तो यह द्विपक्षीय होगी तथा इसमें केवल आतंकवाद और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर चर्चा होगी।
दूसरा, भारत आतंकवाद का समर्थन करने वाले देशों के साथ आर्थिक संबंधों को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करता है तथा व्यापार और राष्ट्रीय सम्मान के बीच एक सुदृढ़ रेखा खींचता है। अंत में, भारत अब परमाणु धमकी को बर्दाश्त नहीं करेगा- आॅपरेशन सिंदूर ने निर्णायक रूप से उन सभी भ्रमों को तोड़ दिया है कि परमाणु खतरे, आतंकी कृत्यों के ढाल बन सकते हैं।
विवाहित हिंदू महिलाओं द्वारा पहना जाने वाला लाल सिंदूर - पीड़ित होने के रूपक के रूप में नहीं, बल्कि पवित्र कर्तव्य और राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया गया। आतंकवादियों ने इस सम्मान को अपवित्र करने की कोशिश की; भारत ने पूरी ताकत के साथ जवाब दिया। व्यक्तिगत राजनीतिक हो गया, सांस्कृतिक रणनीतिक हो गया। चूंकि आतंकी हमला कश्मीर में हुआ था, जो भारत माता का भौगोलिक और प्रतीकात्मक सिर है, इसलिए आॅपरेशन सिंदूर भारत माता की रक्षा करने और उसे सलाम करने के लिए है। भारत की प्रतिक्रिया एक सैद्धांतिक विरासत का अनुसरण करती है।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र से लेकर 1980 के दशक के इंदिरा सिद्धांत तक तथा 1998 में पोखरण-कक परीक्षणों के जरिए वाजपेयी जी के साहसिक परमाणु दावे से लेकर —जिसने वैश्विक दबावों और प्रतिबंधों के बावजूद भारत के आत्मरक्षा के संप्रभु अधिकार की पुष्टि की और विश्वसनीय न्यूनतम अवरोध की नीति स्थापित की—से लेकर उरी और बालाकोट में प्रदर्शित मोदी सिद्धांत तक, भारतीय शासन नीति ने लंबे समय से संकट के समय और राष्ट्रीय सुरक्षा के महत्वपूर्ण मामलों में संप्रभु निर्णय लेने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
सिंदूर सिद्धांत इसे आगे बढ़ाता है, आत्मविश्वास से भरे भारत ने इसका समर्थन किया है। देश अपने मूल हितों तथा अपने नागरिकों की संरक्षा और सुरक्षा के लिए स्वतंत्र व मजबूती से काम करने के लिए दृढ़ संकल्पित है। भू-राजनीतिक रूप से, इस आॅपरेशन ने क्षेत्रीय उम्मीदों को फिर से स्थापित किया है। आतंकवाद के लिए ढाल के रूप में परमाणु शक्ति का इस्तेमाल करने के आदी पाकिस्तान का सीधे सामना किया गया है। दंड से मुक्ति का भ्रम टूट गया है।
चीन, हालांकि औपचारिक रूप से तटस्थ है, उसे अपने सहयोगी की कमजोरी को समझना होगा। संयुक्त राज्य अमेरिका से लेकर रूस तक, वैश्विक शक्तियाँ भारत को बाहरी संकेत या समर्थन की प्रतीक्षा किए बिना कार्रवाई करते हुए देख रही हैं। अन्य पड़ोसियों को अब अपनी दुर्भावना और भारत विरोधी कार्रवाइयों के परिणामों का आकलन करना चाहिए।
पिछले 11 वर्षों में, भारत ने कई भौगोलिक क्षेत्रों में और प्रमुख शक्तियों के साथ द्विपक्षीय रणनीतिक साझेदारी का एक सघन और मजबूत नेटवर्क सफलतापूर्वक निर्मित किया है। इसने बहुपक्षीय और लघुपक्षीय, क्षेत्रीय और अंतर-क्षेत्रीय सहयोग व्यवस्थाओं में भाग लिया है और मुक्त व्यापार समझौतों पर बातचीत कर रहा है। आॅपरेशन सिंदूर के दौरान, प्रमुख शक्तियों और इन साझेदारियों से जुड़े भारत के कई रणनीतिक और रक्षा संबंध अग्नि परीक्षा से गुजरे।
पहलगाम के बाद, संतोषजनक बात यह थी कि हमारे भागीदारों द्वारा आतंकवादी हमलों की सार्वभौमिक निंदा की गयी। हालाँकि, आॅपरेशन सिंदूर के जवाब में पाकिस्तान की तीव्र कार्रवाई के बाद, परमाणु-संपन्न पड़ोसियों के बीच तनाव बढ़ने के बारे में चिंताएँ व्यक्त की गईं। प्रतिक्रियाएँ इस बात से भी प्रभावित थीं कि इस सैन्य संघर्ष में उनके हथियार प्रणालियों ने कैसा प्रदर्शन किया या कि क्या प्रदर्शन करने में विफल रहे।
जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे हैं, हमें न केवल अपने रणनीतिक साझेदारों को सावधानी से चुनना चाहिए, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि ये साझेदारियाँ सिंदूर सिद्धांत को शामिल करती हों। इसका मतलब यह है कि उन्हें पाकिस्तान पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके उसके आतंकी ठिकानों को खत्म करना चाहिए और राज्य-नीति के रूप में आतंकवाद का परित्याग करना चाहिए।
यदि हमें पाकिस्तानी आतंकवादी-सैन्य ढांचे के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए सैन्य बल का इस्तेमाल करना पड़ता है, तो उन्हें हमारे साथ एकजुटता दिखानी चाहिए। दुष्टों के लिए कोई शरणस्थली नहीं, कोई बचाव नहीं। महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत जिस आतंकी ढांचे को निशाना बना रहा है, वह न सिर्फ भारत और लोकतंत्र के लिए, बल्कि वैश्विक आर्थिक वृद्धि और विकास के इंजन के रूप में देश की भूमिका के लिए भी खतरा है।
पाकिस्तान से आतंकवाद को वैश्विक स्तर पर निर्यात किया जाता है - यूरोप, यूके, संयुक्त राज्य अमेरिका और उससे आगे। फिर भी, अंतरराष्ट्रीय समुदाय का अधिकांश हिस्सा आंखें मूंद कर बैठा है, जबकि संयुक्त राष्ट्र द्वारा नामित आतंकवादी समूह पाकिस्तान में खुलेआम काम करते हैं। पाकिस्तान पहले भी आतंकवादी समूहों की शरणस्थली था और अब भी है।
आपरेशन सिंदूर 1.0 के दौरान, पाकिस्तान के रक्षा और विदेश मंत्रियों ने सार्वजनिक रूप से इतना स्वीकार किया। भारत ने आतंक के इस असंख्य सिर वाले राक्षस के खिलाफ कार्रवाई करके वैश्विक सेवा की है। यह अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अग्रिम पंक्ति के योद्धा के रूप में खड़ा है।
दुनिया को कार्रवाई करने के लिए जागरूक होना चाहिए और आतंक के अपराधियों और इसके खिलाफ काम करने वालों के बीच नैतिक समानता स्थापित करना बंद करना चाहिए - चाहे उनके संकीर्ण, अल्पकालिक, दिखावटी विचार कुछ भी हों। सिंदूर सिद्धांत का आर्थिक आयाम भी महत्वपूर्ण है। आतंकवाद के साथ कोई व्यापार नहीं की स्पष्ट घोषणा करके, भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आर्थिक उपायों को क्रियान्वित किया है।
व्यापार और सिंधु जल संधि जैसी संधियों को निलंबित करने जैसे कदम आर्थिक संबंधों को राष्ट्रीय सुरक्षा उद्देश्यों के साथ मजबूती से संरेखित करने के भारत के संकल्प को रेखांकित करते हैं। ये उपाय एक स्पष्ट संदेश देते हैं: आतंक के खात्मे के बाद आर्थिक संबंध बनने चाहिए, न कि पहले। अस्तित्व आधारित संदेश यह है कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते
नारी-शक्ति से जुड़ा एक शक्तिशाली आख्यान आॅपरेशन के संदेश को पुष्ट करता है और इसे सुर्खियों में लाता है: भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका। आपरेशन के बाद दो महिला अधिकारियों ने प्रमुखता से सैन्य प्रेस वक्तव्यों का नेतृत्व किया, जो भारत के रक्षा परिदृश्य में महिलाओं के बढ़ते महत्व का प्रतीक है।
नारी शक्ति (महिला सशक्तिकरण) के इस क्षण ने महिलाओं के प्रति भारत के सभ्यतागत सम्मान को मजबूत किया, रानी लक्ष्मीबाई से लेकर समकालीन महिला सैन्य अधिकारियों तक के ऐतिहासिक उदाहरणों की प्रतिध्वनि की, जिससे राष्ट्रीय गौरव को लैंगिक समावेश के साथ जोड़ा गया। भारत की सैन्य ताकत घरेलू नवाचार की मदद से तेजी से बढ़ रही है। हालांकि, कुछ विदेशी प्रणालियों का इस्तेमाल किया गया था, स्वदेशी मिसाइलों, ड्रोन और निगरानी उपकरणों की सफल तैनाती, रक्षा में आत्मनिर्भरता की परिचालन परिपक्वता को उजागर करती है।
यह हमारे निर्यात जोर और मांग को बढ़ाता है। हमने भारत में आयातित और सह-निर्मित हथियार प्रणालियों के साथ-साथ पाकिस्तान द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली हथियार प्रणालियों का भी परीक्षण किया और इनसे हमारे द्वारा लिए गए सही निर्णयों की पुष्टि हुई। आपरेशन सिंदूर से यह स्पष्ट हो गया कि भारत वैधता नहीं चाहता - वह न्याय चाहता है। भारतीय संयम को कभी भी कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए। सिंदूर सिद्धांत केवल प्रतिक्रियात्मक नहीं है; यह सैद्धांतिक स्पष्टता का एक सक्रिय दावा है।
भारत के नागरिकों के, विशेषकर महिलाओं के जीवन, गरिमा, भलाई और सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा। इसी बिंदु पर राष्ट्रीय सुरक्षा का राष्ट्रीय सम्मान के साथ संगम होता है। यहीं पर प्राचीन मूल्य, आधुनिक ताकत के साथ मिलते हैं। और यहीं पर भारत खड़ा है- निडर, अडिग और एकजुट। जय हिंद। (लेखिका संयुक्त राष्ट्र की पूर्व सहायक महासचिव और संयुक्त राष्ट्र महिला की उप कार्यकारी निदेशक तथा भारत की पूर्व राजदूत हैं, ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत सरकार ने हाल के वर्षों में समावेशी शासन पर अत्यधिक बल दिया है। एक ऐसा शासन, जो भूगोल, पृष्ठभूमि या विश्वास की परवाह किए बिना हर नागरिक तक पहुंचता हो। यह बात वार्षिक हज यात्रा के संचालन में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। एक नियमित प्रशासनिक क्रियाकलाप से दूर, यह एक विशाल मानवीय, कूटनीतिक और तार्किक संचालन है, जो अनेक राष्ट्रों और संस्कृतियों तक फैला हुआ है। सबका साथ, सबका विकास के लोकाचार से प्रेरित होकर सरकार ने हज प्रबंधन को 21वीं सदी की सेवा वितरण के मॉडल के रूप में परिणत कर दिया है।
भारत से हर साल लगभग 1.75 लाख तीर्थयात्री पवित्र हज यात्रा पर जाते हैं। सऊदी अरब साम्राज्य (केएसए) के साथ घनिष्ठ समन्वय में, भारतीय हज समिति के माध्यम से चार महीने तक चलने वाले इतने व्यापक और संवेदनशील ऑपरेशन का प्रबंधन करना राष्ट्रीय समन्वय, कूटनीति और सेवा का एक महत्वपूर्ण नमूना है।
अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के माध्यम से भारत सरकार यह सुनिश्चित कर रही है कि यह आध्यात्मिक यात्रा निर्बाध होने के साथ-साथ गरिमापूर्ण, समावेशी और तकनीकी रूप से सशक्त भी हो। बिना किसी पक्षपात के सभी समुदायों की सेवा करने की अपनी दृढ़ प्रतिबद्धता के साथ, सरकार हज के अनुभव को विदेशों में अब तक किए गए सबसे उन्नत सार्वजनिक सेवा संचालन में से एक के रूप में परिणत कर रही है। हज सुविधा ऐप को भारत सरकार ने 2024 में लॉन्च किया था।
इसका उद्देश्य तीर्थयात्रियों के अनुभव को सरल और बेहतर बनाना था। इसके माध्यम से प्रत्येक तीर्थयात्री से जुड़े राज्य हज निरीक्षकों के विवरण के साथ-साथ निकटतम स्वास्थ्य सेवा और परिवहन सुविधाओं सहित आवास, परिवहन और उड़ान संबंधी विवरण जैसी सूचनाओं तक तत्काल पहुंच कायम करना संभव हो रहा है।
यह ऐप शिकायत प्रस्तुत करने, उसकी ट्रैकिंग करने, बैगेज ट्रैकिंग, आपातकालीन एसओएस सुविधाएं, आध्यात्मिक सामग्री और तत्काल सूचनाएं प्राप्त करने में भी सक्षम बनाता है। पिछले साल 67,000 से अधिक तीर्थयात्रियों ने ऐप इंस्टॉल किया था, जो स्वीकृति की उच्च दर का संकेत देता है। केएसए में भारत सरकार द्वारा हाजियों के लिए स्थापित प्रशासनिक ढांचे द्वारा 8000 से अधिक शिकायतें और 2000 से अधिक एसओएस उठाए गए और उनका जवाब दिया गया।
ऐप की फीडबैक- संचालित डिजाइन तीर्थयात्रा की पूरी अवधि के दौरान निरंतर सुधार की सुविधा देती है। हज-2024 के दौरान ऐप से प्राप्त जानकारी ने 2025 के लिए हज नीति और दिशानिर्देश तैयार करने के लिए महत्वपूर्ण इनपुट के रूप में काम किया। ये डेटा-समर्थित निर्णय भारत सरकार के अपने नागरिकों के लिए उत्तरदायी शासन के मॉडल का उदाहरण हैं।
2024 में इस सफलता को आगे बढ़ाते हुए, सरकार ने अब हज सुविधा ऐप 2.0 लॉन्च किया है। यह हज के पूरे दायरे को कवर करता है और तीर्थयात्रियों के लिए वास्तव में एंड-टू-एंड डिजिटल समाधान तैयार करता है।
हज 2.0 में हज यात्रियों के डिजिटल आवेदन, चयन (कुर्रा), प्रतीक्षा सूची का प्रकाशन, भुगतान एकीकरण, अदाही कूपन जारी करने और रद्दीकरण तथा धन वापसी की प्रक्रियाओं से लेकर हज की पूरी प्रक्रिया शामिल है। अपडेट किया गया ऐप बैंकिंग नेटवर्क के साथ सहज एकीकरण प्रदान करता है, जिससे तीर्थयात्री यूपीआई, डेबिट/क्रेडिट कार्ड और इंटरनेट बैंकिंग के माध्यम से भुगतान कर सकते हैं। यात्रा के दौरान सुविधा के लिए तत्काल उड़ान संबंधी सूची और इलेक्ट्रॉनिक बोर्डिंग पास भी प्रदान किए जाते हैं।
ऐप को पेडोमीटर सुविधा के साथ संवर्धित किया गया है। इसका उद्देश्य तीर्थयात्रियों में पैदल चलने की आदत डालना है, ताकि उनमें आगे की कठिन यात्रा के लिए आवश्यक सहनशक्ति विकसित हो सके। तीर्थयात्रियों की सहायता के लिए तत्काल मौसम के अपडेट भी जोड़े गए हैं, ताकि तीर्थयात्रियों को जलवायु संबंधी प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने में मदद मिल सके और साथ ही उन्हें स्वस्थ और हाइड्रेटेड रखा जा सके।
भारतीय हज चिकित्सा दल को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है और यह मक्का एवं मदीना में हज के दौरान स्थापित क्षेत्रीय अस्पतालों तथा औषधालयों के नेटवर्क के माध्यम से तीर्थयात्रियों को विश्व स्तरीय चिकित्सा सेवाएं प्रदान करता है। एम्बुलेंस का एक नेटवर्क आपातकालीन चिकित्सा सहायता प्रदान करता है।
स्वास्थ्य मंत्रालय के ई-हेल्थ कार्ड और ई-हॉस्पिटल मॉड्यूल को इस वर्ष ऐप के साथ जोड़ दिया गया है। इसका लक्ष्य तीर्थयात्रियों के लिए निर्बाध प्रवेश और उपचार सुनिश्चित करना है। इससे डॉक्टरों को उपचार के लिए उपलब्ध डेटा की गुणवत्ता में भी वृद्धि होगी और हज 2025 के लिए तीर्थयात्रियों को समुचित चिकित्सा सेवा प्रदान की जाएगी।
ऐप की बहुविध सराहनीय लगेज ट्रैकिंग प्रणाली को आरएफआईडी आधारित टैगिंग के साथ और उन्नत किया गया है। यह गुम हुए सामान को ट्रैक करने की प्रक्रिया को सरल बनाएगा और उच्चतम स्तर की सेवा सुनिश्चित करेगा। मीना, अराफात और मुजदलिफा सहित माशाएर क्षेत्र की डिजिटल मैपिंग द्वारा हज अनुष्ठानों के नेविगेशन को बदल दिया गया है।
तीर्थयात्रियों को उनके गंतव्य तक मार्गदर्शन करने और रेगिस्तान की अत्यधिक गर्मी में खो जाने के जोखिम को कम करने के लिए शिविर स्थलों की पहचान की जाती है और मानचित्र पर ट्रैक किया जाता है। नमाज अलार्म, किबला कम्पास और अस्पतालों, बस स्टॉप, सेवा केंद्रों और भारतीय मिशन कार्यालयों की स्थान-आधारित मैपिंग जैसी सुविधाएं तीर्थयात्रियों के समग्र अनुभव और सुविधा को काफी समृद्ध करती हैं।
एआई द्वारा संचालित एक चैटबॉट को डिजिटल पर्सनल असिस्टेंट के रूप में शामिल किया गया है। यह चैटबॉट संवादात्मक लहजे में नियमित प्रश्नों का उत्तर देने, तत्काल सहायता और सलाह प्रदान करने के लिए है। सुविधाओं का यह समग्र सेट सरकार की मंशा का संकेत है कि वह न केवल सेवा वितरण के साधन के रूप में प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना चाहती है, बल्कि एक ऐसे उपकरण के रूप में भी है जो आध्यात्मिक पथ पर चलने वालों सहित सभी के लिए सम्मान, सुविधा और सक्षमता को सशक्त बनाता है।
हज सुविधा ऐप 2.0 भारत के डिजिटल सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर में अग्रणी है और यह भारत सरकार के इस दृष्टिकोण का प्रमाण है कि शासन प्रत्येक नागरिक तक सार्थक तरीके से पहुंचे। प्रौद्योगिकी की शक्ति का इस्तेमाल करते हुए, भारत तीर्थयात्रियों के प्रबंधन के लिए नए अंतरराष्ट्रीय मानक स्थापित कर रहा है, जिससे अपने नागरिकों को निर्बाध, सुरक्षित और आध्यात्मिक रूप से बेहतर अनुभव मिल रहा है। (लेखक संयुक्त सचिव, अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय, भारत सरकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। दया और सेवा की प्रतिमूर्ति फ्लोरेंस नाइटिंगेल को आधुनिक नर्सिंग की जन्मदाता माना जाता है, जिनकी आज हम 205वीं जयंती मना रहे हैं। प्रतिवर्ष उन्हीं की जयंती पर 12 मई को अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस मनाया जाता है। लेडी विद द लैंप के नाम से विख्यात नाइटिंगेल का जन्म 12 मई 1820 को इटली के फ्लोरेंस शहर में हुआ था। भारत सरकार द्वारा वर्ष 1973 में नर्सों के अनुकरणीय कार्यों को सम्मानित करने के लिए उन्हीं के नाम से फ्लोरेंस नाइटिंगेल पुरस्कार की स्थापना की गई थी, जो प्रतिवर्ष अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस के अवसर पर प्रदान किये जाते हैं।
फ्लोरेंस नाइटिंगेल खूबसूरत, पढ़ी-लिखी और समझदार युवती थीं। उन्होंने अंग्रेजी, इटेलियन, लैटिन, जर्मनी, फ्रैंच, इतिहास और दर्शन शास्त्र सीखा था, वहीं अपनी बहन और माता-पिता के साथ कई देशों की यात्रा की थी। मात्र 16 वर्ष की आयु में ही उन्हें अहसास हो गया था कि उनका जन्म सेवा कार्यों के लिए ही हुआ है। हालांकि उस दौर में नर्सिंग को एक सम्मानित व्यवसाय भी नहीं माना जाता था। उनके माता-पिता संपन्न परिवार से थे। ऐसे में उनका मानना था कि धनी परिवार की लड़की के लिए वह पेशा सही नहीं है।
दरअसल, वह ऐसा समय था, जब अस्पताल बेहद गंदी जगह पर होते थे और वहां बीमार लोगों की मौत के बाद काफी भयावह माहौल हो जाता था। 1850 में फ्लोरेंस ने जर्मनी में प्रोटेस्टेंट डेकोनेसिस संस्थान में दो सप्ताह की अवधि में एक नर्स के रूप में अपना प्रारम्भिक प्रशिक्षण पूरा किया। मरीजों, गरीबों और पीड़ितों के प्रति उनके सेवाभाव को देखते हुए आखिरकार उनके माता-पिता द्वारा वर्ष 1851 में उन्हें नर्सिंग की आगे की पढ़ाई के लिए अनुमति दे दी गयी।
इसके बाद उन्होंने जर्मनी में महिलाओं के लिए एक क्रिश्चियन स्कूल में नर्सिंग की पढ़ाई शुरू की, जहां उन्होंने मरीजों की देखभाल के तरीकों और अस्पतालों को साफ रखने के महत्व के बारे में जाना। फ्लोरेंस का नर्सिंग के क्षेत्र में पहली बार अहम योगदान 1854 में क्रीमिया युद्ध के दौरान देखा गया। उस समय ब्रिटेन, फ्रांस और तुर्की (तुर्किये) की रूस से लड़ाई चल रही थी और सैनिकों को रूस के क्रीमिया में लड़ने के लिए भेजा गया था। युद्ध के दौरान सैनिकों के जख्मी होने, ठंड, भूख तथा बीमारी से मरने की खबरें आ रही थीं।
युद्ध के समय वहां उनकी देखभाल के लिए कोई उपलब्ध नहीं था। ऐसे में ब्रिटिश सरकार द्वारा फ्लोरेंस के नेतृत्व में अक्तूबर 1854 में 38 नर्सों का एक दल घायल सैनिकों की सेवा के लिए तुर्की भेजा गया। फ्लोरेंस ने वहां पहुंच कर देखा कि किस प्रकार वहां अस्पताल घायल सैनिकों से खचाखच भरे हुए थे, जहां गंदगी, दुर्गंध, दवाओं तथा उपकरणों की कमी, दूषित पेयजल इत्यादि के कारण असुविधाओं के बीच संक्रमण से सैनिकों की बड़ी संख्या में मौतें हो रही थी।
फ्लोरेंस ने अस्पताल की हालत सुधारने के अलावा घायल और बीमार सैनिकों की देखभाल में दिन-रात एक कर दिया, जिससे सैनिकों की स्थिति में काफी सुधार हुआ। उनकी अथक मेहनत के परिणामस्वरूप ही अस्पताल में सैनिकों की मृत्यु दर में बहुत ज्यादा कमी आयी। उस समय किये गये उनके सेवा कार्यो के लिए ही सभी सैनिक उन्हें आदर और प्यार से लेडी विद द लैंप कहने लगे थे। दरअसल, जब चिकित्सक अपनी ड्यूटी पूरी करके चले जाते, तब भी वह रात के गहन अंधेरे में हाथ में लालटेन लेकर घायलों की सेवा के लिए उपस्थित रहती थीं।
1856 में युद्ध की समाप्ति के बाद जब वह वापस लौटीं, तब स्वयं महारानी विक्टोरिया ने पत्र लिखकर उनका धन्यवाद किया। उसके कुछ ही माह बाद रानी विक्टोरिया से उनकी मुलाकात हुई। उनके सुझावों के आधार पर ही वहां सैन्य चिकित्सा प्रणाली में बड़े पैमाने पर सुधार संभव हुआ और वर्ष 1858 में रॉयल कमीशन की स्थापना हुई। उसके बाद ही अस्पतालों की सफाई व्यवस्था पर ध्यान देना, सैनिकों को बेहतर खाना, कपड़े और देखभाल की सुविधा मुहैया कराना तथा सेना द्वारा डॉक्टरों को प्रशिक्षण देने जैसे कार्यों की शुरुआत हुई।
सेवाभाव से किए गए फ्लोरेंस नाइटिंगेल के कार्यों ने नर्सिंग व्यवसाय का चेहरा ही बदल दिया था, जिसके लिए उन्हें रेडक्रॉस की अंतरराष्ट्रीय समिति द्वारा सम्मानित किया गया। मरीजों, गरीबों और पीड़ितों के प्रति फ्लोरेंस की सेवा भावना को देखते हुए ही नर्सिंग को उसके बाद महिलाओं के लिए सम्मानजनक पेशा माना जाने लगा और उनकी प्रेरणा से ही नर्सिंग क्षेत्र में महिलाओं को आने की प्रेरणा मिली।
फ्लोरेंस के अथक प्रयासों के कारण ही रोगियों की देखभाल तथा अस्पताल में स्वच्छता के मानकों में अपेक्षित सुधार हुआ। 90 वर्ष की आयु में 13 अगस्त 1910 को फ्लोरेंस नाइटिंगेल का निधन हो गया, जिनकी कब्र सेंट मार्गरेट गिरजाघर के प्रांगण में है। उनके सम्मान में ही उनके जन्मदिवस 12 मई को अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस के रूप में मनाए जाने की शुरुआत की गयी। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत-पाकिस्तान के बीच 10 मई की शाम 5 बजे से शुरू सीजफायर दुनिया में तनाव कम होने की तरह देखा जायेगा। इसके विपरीत खुद पाकिस्तान में ऐसा नहीं है। इसे उसी रात पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के देश के नाम संबोधन से समझा जा सकता है। शहबाज ने अमेरिका, चीन, सऊदी अरब और तुर्की जैसे देशों को सहयोग अथवा सीजफायर में मदद के लिए शुक्रिया कहा।
गौर करने लायक है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने जनरल मुनीर के लिए भी ऐसा ही शुक्रिया करने के साथ एक कटु बात भी जोड़ दी। वह कठोर तथ्य यह है कि शहबाज ने परोक्ष रूप से मान लिया कि भारत के हमलों से पाकिस्तान को बहुत अधिक नुकसान पहुंचा है। सही मायनों में अब इस नुकसान की जिम्मेदारी तय करने का समय शुरू हो गया है।
पीएम शहबाज के कई देशों और अपने सहयोगियों के लगातार धन्यवाद करते जाने के बीच दुनियाभर के कूटनीतिक विशेषज्ञ सांस रोके भाषण खत्म होने का इंतजार कर रहे थे। उन्हें थोड़ी देर के लिए शायद यह लगा कि शहबाज अपनी कुर्सी छोड़ने जा रहे हैं। लगा कि सीजफायर होते ही शहबाज को विदा करने की योजना बन चुकी है। ऐसा नहीं हुआ। उसके बाद अब शहबाज शरीफ की चाल की चर्चा शुरू हो गयी है।
पाकिस्तानी हुक्मरान ही नहीं, आम लोगों को भी पता है कि भारत-पाक के मध्य हर युद्ध अथवा संघर्ष में पाकिस्तान की बदहाली के लिए किसी के सिर ठीकरा फोड़ने की परंपरा रही है। आमतौर पर इसमें राजनेताओं के बजाय सैन्य अधिकारी हावी होते रहे हैं। फिलहाल स्थिति अलग लग रही है। शहबाज ने संघर्ष में भारत की मजबूती और पाकिस्तान की बबार्दी का जिक्र कर फिलहाल इसकी जिम्मेदारी सेना पर डालने की कोशिश की है। ऐसे में सेना और सरकार के बीच अघोषित संघर्ष शुरू हो चुका है।
इस तरह का ताजा मामला वर्ष 1999 के कारगिल युद्द का है, तब भी कुछ ऐसा ही हुआ था। कहते हैं कि जनरल परवेज मुशर्रफ ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को विश्वास में लिए बिना कारगिल, द्रास और बटालिक की चोटियों पर कार्रवाई शुरू कर दी थी। जब इन जगहों पर पाकिस्तानी सेना हार गयी तो जनरल मुशर्रफ ने पीएम नवाज को आगे कर दिया। बाद में तख्तापलट की कहानी लंबी हो जायेगी।
पाकिस्तान के वर्तमान प्रधानमंत्री को इसका अंदाजा है। तभी उन्होंने जिम्मेदारी के लिए जनरल मुनीर को आगे करने की कोशिश की है। ऐसा करना उन्हें इसलिए भी जरूरी लगा कि सीजफायर तो पड़ाव भर है। अभी भारत की ओर से सिंधु का पानी रोकना,दोनों देशों के बीच राजनयिक रिश्ते फिर से कायम करने के साथ भारत-पाकिस्तान के बीच व्यापारिक रिश्ते बहाल करने जैसे बड़े काम बाकी हैं।
स्वाभाविक रूप से इसके लिए पाकिस्तानी राजनेताओं को ही आगे आना होगा। भारत का लोकतांत्रिक नेतृत्व भी सैन्य शासक की जगह पाकिस्तानी राजनेताओं को ही प्राथमिकता देगा। पाकिस्तान स्वयं इस हार के दंश से किस तरह बाहर निकलेगा, यह समझने के लिए कुछ समय लगेगा। फिलहाल, पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल मुनीर पर आम पाकिस्तानियों का गुस्सा फूटने लगा है।
पाकिस्तान के बुद्धिजीवी खुलेआम पाकिस्तान आर्मी चीफ के अप्रैल में दिए बयान को याद कर रहे हैं। जनरल मुनीर ने अपने उस बयान में हिंदुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे से अलग बताया था। पाकिस्तानी प्रोफेसर डॉ इश्तियाक अहमद ने कहा है कि तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल बाजवा के कार्यकाल में पाकिस्तान में शांति रही।
आसिम मुनीर ने इस बात की चिंता नहीं कि मुसलमानों की एक तिहाई आबादी भारत में ही रहती है। मुनीर ने इस भावना को भड़काया कि हिंदुओं और मुसलमानों में कुछ भी एक जैसा नहीं है। बहरहाल, प्रो इश्तियाक का बयान एक उदाहरण भर है। यह आगाज है,अंजाम क्या होगा, इसे जानने के लिए इंतजार तो करना ही पड़ेगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीनएन एडिटोरियल डेस्क। शनिवार को डीएवी पब्लिक स्कूल बरियातू में स्वामी मुक्तरथ के सान्निध्य में 11वां अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पूर्वाभ्यास कार्यक्रम चलाया गया। इसमें हजारों बच्चों और शिक्षकों को संबोधित करते हुए सत्यानंद योग मिशन रांची के अध्यक्ष स्वामी मुक्तरथ ने कहा कि योग बहुत शक्तिशाली विद्या है। यह तंत्र से निकली हुई एक शाखा है जिसके प्रथम गुरु भगवान शिव हैं।
वैज्ञानिक प्रमाणिकता के साथ योग को सिद्ध करने वाले वर्तमान युग के प्रथम गुरु बिहार योग विद्यालय मुंगेर के संस्थापक परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती हुए जिन्होंने संपूर्ण विश्व में योग को स्थापित किये। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस इन्हीं योगियों के प्रयास का फल है।
योग के प्रभाव को प्राचीनकाल से हमलोग देख रहे हैं, जब भारत के सात ऋषियों के नाम पर आकाश के सात तारों का नाम पड़ा था, जिसे हम सप्तऋषि के नाम से जानते हैं। गौरव की बात यह है कि वर्तमान समय में भी नाशा ने शिवानंद गुरु-शिष्य परंपरा के तीन योगियों के नाम से आकाश के तीन तारों का नामकरण कर दिया है जो हैं स्वामी शिवानंद, स्वामी सत्यानंद और स्वामी निरंजनानंद।
महाभारत के युद्व में जब अर्जुन विषाद में पड़ा था तो भगवान कृष्ण ने इसी योग की शिक्षा को देकर उन्हें अवसाद से मुक्ति दिये थे और युद्ध कौशल में रणविजय बनाये थे और इस काल में जब डॉ एपीजे अब्दुल कलाम डिप्रेशन में फंसे तो शिवानंद का योग उन्हें महान वैज्ञानिक बना दिया। युद्धक्षेत्र में योग के प्रभाव को कारगिल युद्ध में देखा जा चुका है।
दानापुर मिलिट्री छावनी में बिहार योग विद्यालय के संन्यासियों के द्वारा सैनिकों का दो दल बनाकर एक को योग और दूसरे को व्यायाम कराया जाता था। संयोग से कारगिल वॉर में योग करने वाले दल को वहां भेजा गया जो बेहद ही कारगर सिद्ध हुआ। इन सैनिकों का हृदय गति, श्वांस की क्षमता बहुत अच्छी थी, इनकी मारक क्षमता यानी निशाना बहुत अच्छा था और स्टेमिना भी ज्यादा देर तक बनी रहती थी।
आज तो योग की उपयोगिता और भी बढ़ गयी है क्योंकि अब न तो बच्चे साइकिल चलाते हैं न ही फुटबॉल खेलते हैं और न ही संतुलित भोजन करते हैं। यानि अब लगभग लोगों का शारीरिक श्रम नही होता है। शारिरिक श्रम नहीं होने से न तो लोग थकते हैं और न ही उन्हें अच्छी नींद आती है। जीवनशैली बिल्कुल खराब होते जा रही है, मोबाईल की आदत आंखों को दिमाग को और नींद को बर्बाद कर रही है। ऐसे में कुछ शारिरिक व्यायाम और प्राणायाम, मेडिटेशन, जल नेति तथा ध्यान करने की आवश्यकता है।
डीएवी बरियातू के प्राचार्य एस के मिश्रा जी स्वामी मुक्तरथ जी को पुष्पगुछ और शॉल से स्वागत किये। श्री मिश्रा ने कहा कि शारिरिक शौष्ठव और मोरल को डेवलप किये बगैर अच्छा इंसान बनना कठिन है। बच्चों को नियमित रूप से योग करना चाहिए। हर गार्जियन का यह कर्तव्य बनता है कि बच्चों को प्रात:काल में योगाभ्यास करने की प्रेरणा को जागृत करें, उन्हें योग करने की सुविधा दें तभी आप के बच्चे में संस्कार का संवर्धन होगा और आज्ञाकारी भी बनेंगे। आप के सुख-दु:ख में खड़े उतरेंगे। श्री रोहित कुमार और केशव कुमार ने योगाभ्यास की प्रायोगिक शिक्षा का संचालन किया।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हम ग्यारहवें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को मनाने जा रहे हैं और इस वर्ष 2025 का थीम है- मानवता। आज की सबसे बड़ी समस्या बीमारी नहीं है बल्कि सबसे बड़ी समस्या है नैतिकता का तीब्र ह्रास जिस वजह से मानवता खतरे में है। संवेदना हमारी मर रही है दिल के भीतर की भवनायें कमजोर पड़ रही है, विश्वास जो हुआ करता था वो अब मर रही है, समाज के किसी भी व्यक्ति का धौंस किसी के भी बच्चों पर रहता था, किसी भी बच्चे को समाज के अन्य व्यक्ति से अभिभावक जैसा डर रहता था, वो सब इस वर्तमान परिदृश्य से गायब हो गया।
कारण है हमारे अंदर की मानवता सशंकित है,कमजोर हो गयी है, लोभ, नकारात्मक प्रवृत्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। आज मानसिक रोग के बढ़ने का भी यही कारण है। इस वर्ष के अंतर्राष्टीय योग दिवस का पूर्वाभ्यास योग कार्यक्रम रांची शहर में सत्यानन्द योग मिशन के तहत कई स्थानों में चल रहा है। आज 03 मई, शनिवार को डीएवी कपिलदेव के हजारों विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के बीच स्वामी मुक्तरथ जी अपना व्याख्यान एवं योग-ध्यान कार्यक्रम को संचालित कर रहे थे।
मुक्तरथ जी ने कहा बिगड़ता जीवनशैली और संकीर्ण विचारधारा, सीमित सोच से दिमाग में पिट्यूटरी ग्लैण्ड पर बुरा असर होता है, उससे हार्मोन असंतुलित होने लगते हैं, एड्रिनल ग्लैण्ड का हार्मोन असंतुलित होने लगता है जिस कारण अपराध प्रवृत्ति बढ़ती है, नकारात्मकता में वृद्धि होती है और भय बढ़ता है। योग में थोड़ा आसन,कुछ प्राणायाम और दस मिनट ध्यान का ध्यान प्रतिदिन अवश्य करना चाहिये तभी हम मानवता को जिंदा रख पायेंगे।
डीएवी कपिलदेव के प्राचार्य श्री एम के सिन्हा जी पहले स्वामी मुक्तरथ जी के साथ वैदिक हवन किये फिर योगाभ्यास को प्रारंभ किया गया। श्री सिन्हा ने कहा कि योग सबसे बड़ी शक्ति है जो विद्यार्थियों को शरीर से सबल और मन से मजबूत बनाता है। ध्यान से सारी समस्याएं समाप्त हो जाती है और विद्यार्थी को सही दिशा भी मिलता है। (लेखक सत्यानंद योग मिशन रांची के अध्यक्ष हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पोप फ्रांसिस ने अपने पोप बनने के बाद मानवता और दुनिया के लिए कई महत्वपूर्ण योगदान दिए हैं। उनके कार्य और विचार न केवल कैथोलिक चर्च के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रेरणास्त्रोत बने हैं। यहां कुछ उनके महान योगदान दिए जा रहे हैं:
पोप फ्रांसिस ने 2015 में अपनी ऐतिहासिक एनसाइक्लिकल लौदातो सी जारी की, जिसमें उन्होंने जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने दुनिया भर के नेताओं और लोगों से अपील की कि वे पृथ्वी के संसाधनों का संरक्षण करें और अपनी गतिविधियों को प्रकृति के साथ संतुलित रखें।
पोप फ्रांसिस ने हमेशा गरीबों, प्रवासियों, बुजुर्गों, बीमारों और असहाय लोगों की मदद करने की अपील की है। वे सभी के लिए समान अधिकार की बात करते हैं और समाज में असमानता के खिलाफ खुलकर बोलते हैं। उनका मानना है कि यदि हम ईश्वर के सच्चे अनुयायी हैं, तो हमें दुनिया के सबसे कमजोर और जरूरतमंद लोगों के लिए काम करना चाहिए।
पोप फ्रांसिस ने कैथोलिक और गैर-कैथोलिक समुदायों के बीच धार्मिक एकता और संवाद को बढ़ावा दिया। उन्होंने इस्लाम, यहूदी, हिंदू और अन्य धर्मों के प्रतिनिधियों के साथ मुलाकातें की और धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा दिया। उनका मानना है कि धार्मिक विविधता को समझना और सम्मान करना दुनिया के लिए शांति का रास्ता है।
पोप फ्रांसिस ने कैथोलिक चर्च में कई महत्वपूर्ण सुधार किए। उन्होंने चर्च के आंतरिक मामलों में पारदर्शिता बढ़ाई और कलीसिया के भीतर यौन शोषण के मामलों के खिलाफ सख्त कदम उठाए। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि चर्च का नेतृत्व और प्रबंधन सभी के लिए सुलभ हो, और विनम्रता और नम्रता का पालन किया जाए।
पोप फ्रांसिस ने हमेशा दुनिया में शांति और सभी के बीच संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने युद्धों, संघर्षों और हिंसा के खिलाफ बात की है और शांति स्थापित करने के लिए कड़ी मेहनत की है। उन्होंने दुनिया के नेताओं से अपील की है कि वे शांति की ओर कदम बढ़ाएं और संघर्षों को समाप्त करने के लिए मिलकर काम करें।
पोप फ्रांसिस युवाओं को अपने उद्देश्य के लिए समर्पित होने और समाज में बदलाव लाने के लिए प्रेरित करते हैं। वे हमेशा कहते हैं कि अपने सपनों को न खोएं और महान कार्य करने से डरें नहीं। उनका मानना है कि युवा पीढ़ी ही समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकती है। महिलाओं की भूमिका को सशक्त
पोप फ्रांसिस ने महिलाओं के अधिकारों और उनकी भूमिका को बढ़ावा दिया। उन्होंने चर्च में महिलाओं की अधिक भागीदारी को प्रोत्साहित किया और उनकी आवाज को महत्वपूर्ण माना। उनका मानना है कि महिलाओं का योगदान समाज के हर क्षेत्र में होना चाहिए।
पोप फ्रांसिस ने मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए कई बार आवाज उठाई है। उन्होंने मूलभूत अधिकारों, जैसे स्वतंत्रता, समानता और न्याय के लिए लड़ाई लड़ी है। उन्होंने शरणार्थियों, प्रवासियों और कमजोर वर्गों के अधिकारों के लिए भी कई बार संघर्ष किया है।
पोप फ्रांसिस ने मानवता के कल्याण और दुनिया में शांति, समानता, और न्याय की स्थापना के लिए कई कदम उठाए हैं। उनका विनम्रता, सहिष्णुता, और दया का संदेश न केवल कैथोलिक चर्च तक सीमित है, बल्कि यह पूरी दुनिया के लिए एक प्रेरणा है। उनकी कोशिशें मानवता को एक साथ लाने और दुनिया को एक बेहतर स्थान बनाने की दिशा में निरंतर जारी हैं। (लेखक रांची महाधर्मप्रांत हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। ख्रीस्तियों के लिए पास्का का पर्व एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं पवित्र पर्व है। जो प्रभु येशु के पुनरुत्थान का उत्सव मनाता है। यह दिव्या उत्सव हमें प्रेम, आशा, बलिदान और नवजीवन का संदेश देता है।
क्रूस पर उनके बलिदान और तीसरे दिन उनका पुनर्जीवित होना, समस्त मानव के लिए उद्वार का प्रतीक है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि अंधकार के बाद प्रकाश आवश्यक आता है और प्रत्येक संघर्ष के बाद एक नई शुरुआत होती है।
पास्का का यह पावन पर्व हम विश्वासियों के जीवन में प्रेम, विश्वास आशा का प्रकाश लाये। जिससे कि सभी खीस्त भाई -बहन अपने जीवन की कठिनाइयों पर विश्वास और प्रेम से विजय पा सके। प्रभु का पुनरुत्थान सभी खीस्त विश्वासियों में नया उत्साह, शांति, आद्यात्मिक जागृति लाये। (लेखिका प्रभात तारा स्कूल, धुर्वा, रांची की शिक्षिका हैं।)
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