विचार

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Published / 2025-08-06 18:33:38
व्यक्ति के हर उम्र में आती है विचार क्रांति

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। इंसान चाहे जिस भी उम्र का हो ज्ञान ही तो अर्जित करते रहता है। बचपन में ए फॉर एप्पल से शुरू होकर तीन पहिया साइकिल दोपहिया साइकिल फटफटिया कार काफी किताब स्कूली शिक्षा कॉलेज की शिक्षा मास्टर डिग्री आईएएस आईपीएस डॉक्टर इंजीनियर साइंटिस्ट बैंकर और न जाने क्या-क्या...?

कभी सोचा है व्यवहारिक जीवन में इतने सारे ज्ञान काम की वस्तु होती भी है क्या? संसार भर में फैला हुआ अर्थ तंत्र का ताना-बाना और उसमे लिपटा हुआ इंसान चैन की सांस ले पा रहा है क्या?

इंसान ने भौतिक जगत में अद्भुत क्रांति उत्पन्न तो कर दिए हैं, परंतु यदि क्रांति नहीं हुआ है तो वह है विचार जगत में क्रांति और यही कारण है कि छीना-झपटी लूट-खसोट का उत्पात हर ओर उधम मचा रहा है।

आज एक बड़ा और व्यापक विचार क्रांति की आवश्यकता है जिससे इंसान गहरी नींद ले सके, संतोष का सुख भोग सके और सहयोग करके तृप्ति की अनुभूति प्राप्त कर सके, जिसकी शुरुआत स्वयं के साथ किया जा सकता है...।

Published / 2025-08-06 16:24:09
विश्व कवि रवींद्र नाथ टैगोर और हजारीबाग

84वीं पुण्यतिथि पर विशेष

  • गुरुदेव की रचनाओं का सृजन स्थल रहा है शहर
  • अंग्रेज अगर जमीन मुहैया कराते तब हजारीबाग में ही बनता शांति निकेतन!

प्रो. प्रमोद कुमार

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। गुरुदेव रविंद्र नाथ ठाकुर की रचनाओं का सृजन स्थल रहा है हजारीबाग। उनकी कविता की यह पंक्ति जोदी तोर डाक शुने केऊना, आसे तोबे एकला चलो रे... आज भी हर साहित्य प्रेमियों की जुबान पर अनायास ही प्रस्फुटित होते रहती है। इसकी रचना एकीकृत हजारीबाग जिले के गिरिडीह में विश्व कवि ने की थी।

हजारीबाग में गुरुदेव का आगमन होना पूरी इलाके के लिए गौरव का विषय है। एक ऐसा विराट व्यक्तित्व का स्वामी जिसने पूरी एशिया में अपनी प्रतिभा का परचम लहराते हुए नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया। गुरुदेव ने विश्व के मानचित्र पर अपने देश का नाम सर्वोच्च स्थान पर स्थापित करने का काम किया। 

हजारीबाग शहर इस मामले में काफी सौभाग्यशाली रहा है यहां गुरुदेव के चरण पड़े, प्रवास हुआ, सृजन की धारा प्रवाहित हुई तथा इतिहास के अध्याय में कई अविस्मरणीय पन्ने जुट गए। विश्वकवि पर पिछले 55 वर्षों से लगातार शोध कर रहे 86 वर्षीय श्री अमल सेन गुप्ता की चर्चा करना यहां लाजमी होगा। 

श्री सेनगुप्ता न तो विश्वविद्यालय,न किसी कॉलेज और न किसी स्कूल के मास्टर रहे। वे डाक विभाग में पोस्ट मास्टर थे, इसके बावजूद गुरुदेव की रचनाओं के मास्टरपीस के रूप में उनकी चर्चा बांग्ला साहित्य जगत में की जाती रही है। 

श्री सेन गुप्ता से लिए गए साक्षात्कार के अनुसार रविंद्रनाथ टैगोर 1885 ई की अप्रैल माह में पहली बार हजारीबाग पधारे थे। उनके साथ भतीजी इंदिरा देवी तथा भतीजा सुरेंद्रनाथ टैगोर थे। इंदिरा जी के स्वास्थ्य लाभ के क्रम में यहां प्रवास हुआ था।

इंदिरा जी कोलकाता के लोरेटिव कॉन्वेंट की छात्रा थी। उन्होंने अपनी स्मृति गाथा में हजारीबाग के डाक बंगला में ठहरने का वर्णन किया है। प्रवास की क्रम में उनका यदुगोपाल मुखर्जी के घर आना जाना होता था। श्री मुखर्जी स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेता थे। 

प्रोफेसर प्रशांत कुमार पाल ने अपनी पुस्तक रवि जीवनी के खंड 2 के पृष्ठ संख्या 235 में रवि बाबू से जुड़ी यात्रा का उल्लेख किया है। इस पुस्तक में अमल सेनगुप्ता के बारे में उल्लेख करते हुए कहा गया है कि तमाम जानकारी उनके पुस्तक के आधार पर प्रस्तुत की गई है। उसे समय गुरुदेव अपने परिजनों के साथ हजारीबाग रोड में ट्रेन से उतरने के बाद पुश- पुश गाड़ी से हजारीबाग पहुंचे थे।
 

गुरुदेव का हजारीबाग में दूसरी बार 1903 में आगमन हुआ था। लकड़ा गोदाम के जूलु पार्क में बने डाक बंगला में प्रवास हुआ था। लकड़ा गोदाम 29 बीघा जमीन में बसा हुआ था जिसके मालिक गुरुदेव के रिश्तेदार काली कृष्ण ठाकुर थे। लोक निर्माण विभाग के इस निरीक्षण बंगला में रोशनी और हवा की सही व्यवस्था नहीं थी,परिणाम यह हुआ कि गुरुदेव समेत उनके सभी परिजन बीमार पड़ गए।
इस संबंध में अमल दा अपनी प्रकाशित पुस्तकों के पन्ने पलटते हुए बताते हैं कि शहर के नामी बंगाली सज्जन गिरेंद्र कुमार गुप्ता आग्रह पूर्वक गुरुदेव को अपनी बाड़ी  में ले गए। गुरुदेव की देखभाल करने वालों में ऋषिकेश दास गुप्ता,हेमनलिनी देवी और शीर्ष मजूमदार की साली थी। गिरेंद्र बाबू का बाड़ी अभी भी मेन रोड में पैगोड़ा होटल के पीछे अवस्थित है। 
“नौका डूबी’’ गुरुदेव की महत्वपूर्ण कृति है जिसकी रचना गिरेंद्र बाबू की बाड़ी में हुई थी और इसकी नायिका शीर्ष मजूमदार की साली हेमनलनी देवी थी।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अंग्रेज सरकार हजारीबाग में गुरुदेव को जमीन उपलब्ध अगर कराती तो शांति निकेतन की स्थापना यही होती। गुरुदेव ने अपने मित्र शिर्ष मजूमदार को पत्र लिखकर इच्छा जतायी थी कि जमीन अगर मिलती तो शांतिनिकेतन के विद्यार्थियों के लिए तपोवन एवं हेल्थ रिजॉर्ट बनाया जाता। शिर्षदा 1903 में रेलवे एक्विजिशन ऑफीसर के पद पर यहां कार्यरत थे।
गुरुदेव के हजारीबाग में आए 140 वर्ष पूरे हो गए हैं। उनकी स्मृतियों को सहेजने एवं संरक्षित करने का काम बखूबी अमल दा ने किया है। 
भोरे पाखी डाके कोथाए…….. की रचना हजारीबाग की प्राकृतिक खूबसूरती को देखकर हुई थी। इस शहर में एक ऐसे विराट व्यक्तित्व का प्रवास हुआ, जिसमें गुरुदेव का नाम सर्वोपरि है। भावी पीढ़ी को इसकी जानकारी होनी चाहिए, कि एक ऐसा कलम का संवेदनशील व्यक्ति हजारीबाग में सृजन का महाजाल फैलाकर शब्दों को कैद किया था जिसकी 28 वर्षों बाद नोबेल पुरस्कार अपने देश की झोली में आई।
                     प्रो प्रमोद कुमार
                       सहायक प्राध्यापक ( अवकाश प्राप्त)
राजनीति विज्ञान विभाग, विनोबा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग

Published / 2025-08-03 20:25:15
हरिजी का जाना यानी एक स्तंभ का ढह जाना...

विनोद कुमार सिंह 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हरि भाई, यानी हरिनारायण सिंह नहीं रहे। यह एक व्यक्ति का गुजर जाना मात्र नहीं है। यह एक स्तंभ का ढह जाना है। इसलिए उनके निधन की सूचना झारखंड के लोगों के लिए एक बड़ा झटका है। जिसने भी इसे सुना, देखा या पढ़ा, भौंचक रह गया। चाहे वह पत्रकार हो, नेता हो या फिर व्यवसायी या फिर अधिकारी-कर्मचारी से लेकर आम लोग, हर कोई अपने इस प्रिय शख्सियत के अवसान से व्यथित हो गया। 

सहकर्मियों के लिए हरि भाई या हरि भैया, परिचितों के लिए हरि जी और आम लोगों के लिए हरि सर एक ऐसी हस्ती का नाम था, जिसमें मानवता कूट-कूट कर भरी थी। तभी उनके पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन के लिए उमड़े लोग कह रहे थे, ऐसा संपादक तो हमने देखा या सुना भी नहीं था, जो हर किसी से प्रेम करता हो। चाहे निजी जीवन हो या पेशेवर जीवन, हरि भाई ने कभी भी इंसानी रिश्तों को कमतर नहीं होने दिया।  

उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले के पातेपुर में पैदा हुए हरि भाई ने रांची और झारखंड को अपना घर बना लिया था। साढ़े तीन दशक से अधिक समय से रांची, एकीकृत बिहार और झारखंड की पत्रकारिता को नया आयाम देनेवाले हरि भाई ने कलकत्ता (कोलकाता) में रविवार पत्रिका से अपने करियर की शुरुआत की। फिर चौथी दुनिया और आनंद बाजार पत्रिका से होते हुए 23 अक्तूबर, 1989 को प्रभात खबर में काम करने के लिए रांची आये। 

वहां से हिंदुस्तान के रांची संस्करण में वरीय स्थानीय संपादक और फिर झारखंड के स्टेट हेड बने। फिर न्यूज 11, सन्मार्ग और खबर मन्त्र जैसे मीडिया संस्थानों में नेतृत्व की भूमिका का निर्वहन करने के बाद 2015 में अपना अखबार आजाद सिपाही निकालना शुरू किया। बिना किसी बड़ी पूंजी और कॉरपोरेट समर्थन के रांची से निकल कर आजाद सिपाही आज झारखंड के शीर्ष अखबारों की कतार में शामिल है, तो इसके पीछे हरि भाई की सोच, विजन और मेहनत है। उन्होंने अखबार को एक ऐसे परिवार के रूप में बदल दिया, जहां कोई नौकरी नहीं करता है, बल्कि घर का काम करता है। ऊर्जा, उत्साह, जानकारी और मेहनत का ऐसा अद्भुत संगम थे हरि भाई कि मीडिया जगत ही नहीं, दूसरे क्षेत्रों के लोग भी उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते थे। 

हरि भाई ने जिस गंभीरता से पत्रकारिता की, उसी गंभीरता से इंसानी रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं को भी अनुभूति दी। वह ऐसे व्यक्ति थे, जिनको किसी से बैर नहीं था। वह किसी की निंदा नहीं करते थे और न ही किसी को ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करते थे। इसलिए हर कोई उनका दोस्त था और उनसे मिलनेवाला हर व्यक्ति उनसे एक आत्मीय रिश्ता जोड़ लेता था।  

अपने पत्रकारीय जीवन में हरि भाई ने सैकड़ों लोगों को पत्रकार बनाया, रोजगार दिला कर उन्हें संभाला और एक अभिभावक की तरह उनका मार्गदर्शन किया। वह ऐसे संपादक थे, जिन्होंने आज तक किसी को भी काम से नहीं निकाला। बालसुलभ सहजता, हर समय कुछ नया सीखने और करने की ललक और हर रिश्ते से अधिक मानवीय रिश्ते को माननेवाले हरि भाई ने जो रिक्तता पैदा की है, उसे भर पाना मुश्किल ही नहीं, असंभव है। (लेखक आजाद सिपाही के स्थानीय संपादक हैं।)

Published / 2025-07-19 12:16:13
रोजगार से जुड़ी प्रोत्साहन योजना: नौकरियों, आर्थिक विकास और औपचारिकीकरण की एक उत्प्रेरक

सुश्री ज्योति विज

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अब जबकि दुनिया स्वचालन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है, भारत सरकार ने हाल ही में रोजगार से जुड़ी प्रोत्साहन (ईएलआई) योजना को स्वीकृति दी है। यह एक बेहद ही सामयिक और सोचा-समझा कदम है। लगभग एक लाख करोड़ रुपये के परिव्यय वाली यह योजना भारत के उभरते रोजगार परिदृश्य, विशेषकर मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र, में एक साहसिक नीतिगत हस्तक्षेप है।

अगले दो वर्षों में 3.5 करोड़ से अधिक नौकरियों के सृजन को समर्थन देने के उद्देश्य से तैयार की गई यह ईएलआई योजना महज एक आर्थिक उपाय भर नहीं है - यह भारत की श्रमशक्ति के भविष्य में एक ऐसा रणनीतिक निवेश है, जो सीधे तौर पर सरकार के विकसित भारत@2047 के विजन का समर्थन करता है। ईएलआई देश में रोजगार सृजन का एक प्रमुख उत्प्रेरक बनने जा रहा है।

कई अन्य ऐसे देशों के उलट, जहां आबादी शीघ्र ही घटने लगेगी या घट चुकी है, भारत में अभी भी कार्यशील आयु वर्ग की एक ऐसी बड़ी आबादी है, जिसे रोजगार के अधिक अवसरों की जरूरत है। ईएलआई योजना का उद्देश्य नौकरी चाहने वालों और नौकरी देने वालों के बीच ही नहीं बल्कि इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से अनौपचारिक कार्य एवं औपचारिक रोजगार के बीच की खाई को पाटना है। रोजगार संबंधी तात्कालिक नतीजों से परे जाकर, इस बात पर गौर करना महत्वपूर्ण है कि ईएलआई योजना विभिन्न सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) की दिशा में भारत की प्रगति को मजबूत करती है।

खासतौर पर, औपचारिक व दीर्घकालिक रोजगार को प्रोत्साहित करके एसडीजी 8 (सभ्य कार्य तथा आर्थिक विकास) और कम वेतन पाने वालों एवं पहली बार नौकरी चाहने वालों को लक्षित वित्तीय सहायता प्रदान करके एसडीजी 1 (गरीबी उन्मूलन) तथा एसडीजी 10 (असमानताओं में कमी) के संदर्भ में।

आधार-समर्थ प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण प्रणाली (डीबीटी सिस्टम) के जरिए ईपीएफओ पंजीकरण एवं संवितरण के साथ इस योजना का जुड़ाव न केवल रोजगार सृजन बल्कि सामाजिक सुरक्षा कवरेज का विस्तार भी सुनिश्चित करता है, जोकि एक न्यायसंगत और समावेशी अर्थव्यवस्था के निर्माण की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। भारत द्वारा किए गए ऐसे प्रयासों को मान्यता देते हुए, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने हाल ही में भारत की इस उपलब्धि को स्वीकार किया और आधिकारिक तौर पर अपने डैशबोर्ड पर इस तथ्य को प्रकाशित किया कि भारत की 64.3 प्रतिशत आबादी (2015 में 19 प्रतिशत की तुलना में), यानी 94 करोड़ से अधिक लोग अब कम से कम एक सामाजिक सुरक्षा लाभ के दायरे में हैं।

मैन्यूफैक्चरिंग पर जोर खासतौर पर स्वागत योग्य है। जैसे-जैसे वैश्विक मूल्य श्रृंखलाएं नए सिरे से बदल रही हैं, भारत भी कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, उपभोक्ता वस्तुओं और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों में एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में तेजी से उभर रहा है। इन क्षेत्रों में दीर्घकालिक रोजगार सृजन का समर्थन करके, ईएलआई योजना पीएलआई योजनाओं, मेक इन इंडिया तथा स्किल इंडिया जैसी मौजूदा पहलों का पूरक बनने के साथ-साथ शहरी व अर्द्ध-शहरी, दोनों समूहों में औद्योगिक विकास को गति देगी।

अक्सर लागत संबंधी चिंताओं के कारण औपचारिक भर्ती को बढ़ाने में बाधाओं का सामना करने वाले सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को यह योजना महत्वपूर्ण राहत प्रदान करती है। नियोक्ता-पक्ष के प्रोत्साहन नई भर्ती की सीमांत लागत को कम करते हैं। इससे विस्तार, औपचारिकीकरण और श्रमशक्ति के उन्नयन की प्रक्रिया को बढ़ावा मिलता है। वैश्विक स्तर पर, वेतन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाएं रोजगार को बढ़ावा देने में कारगर साबित हुई हैं।

जर्मनी जैसे देश अप्रेंटिसशिप और दीर्घकालिक भर्ती के लिए नियोक्ता सब्सिडी प्रदान करते हैं। दक्षिण कोरिया युवा एवं वृद्ध श्रमिकों के नियोक्ताओं को लक्षित वेतन सहायता प्रदान करता है। सिंगापुर कौशल के उन्नयन (अपस्किलिंग) और रोजगार को कायम रखने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करता है।

संयुक्त राज्य अमेरिका में कार्य अवसर कर क्रेडिट (डब्ल्यूओटीसी) की व्यवस्था है, जो वंचित समूहों के व्यक्तियों की भर्ती करने वाले नियोक्ताओं को पुरस्कृत करता है। भारत की ईएलआई योजना हमारे विशाल अनौपचारिक श्रम बाजार, जनसांख्यिकीय लाभांश और डिजिटल बुनियादी ढांचे के विस्तार जैसी स्थानीय जरूरतों के अनुरूप वैश्विक स्तर की सर्वश्रेष्ठ कार्यप्रणालियों का समावेश करती है।

ईएलआई योजना भारत की रोजगार नीति की परिपक्वता - अल्पकालिक राहत से हटकर दीर्घकालिक श्रम बाजार के विकास की दिशा में बदलाव - को दर्शाती है। ढलती उम्र वाली आबादी के साथ-साथ डिजिटल और हरित बदलावों जैसे व्यापक वैश्विक रुझानों की पृष्ठभूमि में, ऐसी कारगर नीतियां अधिक संख्या में लोगों को गुणवत्तापूर्ण नौकरियां सुलभ कराने की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। फिक्की में, हम अपने सदस्यों से इस योजना का सदुपयोग करने हेतु आगे आने का आग्रह करते हैं।

नियोक्ताओं- खासकर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) से जुड़े- को इसे वित्तीय लाभ से कहीं आगे बढ़कर देखना चाहिए। यह योजना परिचालन को बढ़ाने, युवा प्रतिभाओं का दोहन करने, वेतन भुगतान प्रणाली (पेरोल) का औपचारिकीकरण करने और स्थायी आर्थिक मूल्य सृजित करने का एक उपकरण है। उद्योग जगत के एक शीर्ष चैंबर के रूप में, फिक्की इस उद्देश्य का समर्थन करने के लिए प्रतिबद्ध है। (लेखिका फिक्की कि महानिदेशक हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2025-07-19 12:09:24
आधुनिकता की आंधी में कुंद पड़ती सोहराय कला

हंसराज चौरसिया

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत की सांस्कृतिक विविधता केवल उसके मंदिरों, ग्रंथों और त्योहारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उसके गांवों की मिट्टी में, उसकी लोककथाओं में और उन अनकही कलाओं में बसी हुई है जिन्हें पीढ़ियों तक लोग जीते आए हैं। इन्हीं अनमोल परंपराओं में से एक है सोहराय चित्रकला एक ऐसी दीवार-चित्रण की परंपरा जो झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और ओड़िशा जैसे राज्यों के आदिवासी समुदायों की आत्मा में बसती है। 

सोहराय चित्रकला केवल एक दृश्य कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह एक संस्कृति की जीवंत भाषा है। यह पर्व विशेष रूप से फसल कटाई के समय मनाया जाता है, जब जनजातीय समाज प्रकृति को धन्यवाद देने के लिए अपने घरों और गोठों को सजाता है। महिलाएं दीवारों को लीप-पोतकर उस पर चित्र बनाती हैं पशु-पक्षी, वृक्ष, बेल-बूटे, देवी-देवता, और जीवन के अनेक प्रतीकों को। यह परंपरा न केवल दृश्य रूप में सुंदर होती है, बल्कि इसके पीछे गहरी सांस्कृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक चेतना काम करती है। 

इस चित्रकला की विशेषता यह है कि यह पूरी तरह स्वाभाविक और आत्मप्रेरित होती है। कलाकार यानी गांव की महिलाएं, किसी औपचारिक प्रशिक्षण या डिज़ाइन पाठ्यक्रम से नहीं गुजरतीं। वे इसे अपनी माताओं और दादियों से सीखती हैं, जो स्वयं इसे पीढ़ियों से करती आ रही होती हैं। यह कला श्रुत परंपरा और अभ्यास पर आधारित होती है एक ऐसी परंपरा जिसमें चित्रों के माध्यम से जीवन के विविध अनुभवों को, भावनाओं को और लोकविश्वासों को अभिव्यक्त किया जाता है। 

सोहराय की दीवारें केवल सजावट नहीं हैं। वे एक सामाजिक दस्तावेज़ हैं, जिनमें उस समाज की स्त्रियों का आत्मबोध, उनकी संवेदनाएं, और उनकी प्रकृति के साथ सामंजस्य का चित्रण छिपा होता है। यह चित्रकला केवल उत्सव की प्रतीक नहीं है, यह उस जीवनदर्शन की अभिव्यक्ति है जिसमें मनुष्य और प्रकृति के बीच कोई विभाजन नहीं है, जहां गाय, बैल, वृक्ष, नदी और स्त्री सब एक ही जीवनचक्र का हिस्सा हैं। लेकिन आज इस चित्रकला का स्वर धीमा होता जा रहा है। वह जो कभी हर गांव की हर दीवार पर दिखाई देती थी, वह अब खोजने पर भी मुश्किल से मिलती है। 

इसका एक बड़ा कारण है आधुनिकता की आंधी, जिसने गांवों की संरचना, जीवनशैली और मूल्यों को तेजी से बदला है। पहले जहां मिट्टी की दीवारें आम थीं, आज वहां सीमेंट और पक्के मकान आ गए हैं। इन पक्की दीवारों पर न तो लीपने की परंपरा रह गई है और न ही उस पर चित्रकारी की जरूरत महसूस की जाती है। दूसरी ओर, बाजारवाद और मीडिया ने ग्रामीण समाज को शहरी दिखने की होड़ में डाल दिया है। अब गांवों में भी लोग घरों को शहरों की तरह सजाना चाहते हैं आधुनिक रंग, वॉलपेपर, टाइल्स और प्लास्टिक की सजावटों से। 

ऐसी स्थिति में मिट्टी और गोबर से बनी पारंपरिक चित्रकला पुरानी और गंवारू समझी जाने लगी है। युवा पीढ़ी, जो मोबाइल और इंटरनेट से जुड़ चुकी है, उसे अब इन परंपराओं में न तो गर्व की अनुभूति होती है और न ही उनमें कोई भविष्य दिखता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी शिक्षा प्रणाली और सरकारी नीतियां भी इस दिशा में पूरी तरह निष्क्रिय हैं। आज स्कूलों में बच्चों को अंतरिक्ष विज्ञान, कंप्यूटर और अंग्रेजी सिखाई जाती है, लेकिन उनके अपने समाज की कला, इतिहास और परंपराओं से उन्हें काट दिया जाता है। 

नतीजा यह होता है कि वे अपनी जड़ों से अपरिचित होते जाते हैं और अपने ही समाज की धरोहरों को उपेक्षित कर देते हैं। कुछ स्थानों पर जरूर कुछ संस्थाएं, कलाकार और शोधकर्ता इस चित्रकला को बचाने के प्रयास कर रहे हैं। लेकिन ये प्रयास सीमित और प्रायः शहर केंद्रित हैं। जब तक यह कला उस समाज में, उसी की भाषा में, उसी की जमीन पर नहीं बचेगी, तब तक यह केवल एक लोककला बनकर रह जाएगी, जीवित परंपरा नहीं। सोहराय चित्रकला को केवल फोक आर्ट के नाम पर दीर्घाओं में टांग देने से यह नहीं बचेगी। 

इसे गांवों में, स्कूली पाठ्यक्रमों में, लोकमंचों पर, महिलाओं के स्व-सहायता समूहों में, और जन-चेतना अभियानों में जीवित करना होगा। इसके लिए सरकार, समाज और शिक्षा प्रणाली को मिलकर एक समेकित प्रयास करना होगा। इस चित्रकला का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह आदिवासी स्त्रियों की रचनात्मकता और आत्माभिव्यक्ति का माध्यम है। एक ऐसे समाज में जहां स्त्रियों की आवाज़ें अक्सर दबा दी जाती हैं, सोहराय चित्रकला उन्हें एक ऐसा मंच देती है जहां वे बिना बोले भी बहुत कुछ कह पाती हैं।

चित्रों में उनकी सोच, उनकी भावनाएं, उनका पर्यावरण से रिश्ता, उनकी धार्मिकता और उनकी सामाजिक भूमिका सब कुछ समाहित होता है। ऐसे में इस चित्रकला को बचाना, केवल एक सांस्कृतिक विरासत को नहीं, बल्कि स्त्री स्वाभिमान और सृजनात्मकता को भी बचाना है। सोहराय चित्रकला के साथ-साथ इससे जुड़ी अनेक उपकथाएं, गीत, लोकगीत और मान्यताएं भी हैं जो धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं। अगर यह परंपरा समाप्त हो गई, तो केवल एक दृश्य कला ही नहीं जाएगी, बल्कि उससे जुड़े लोकज्ञान, लोकविश्वास और सामाजिक संरचनाएं भी खो जाएंगी।

आज हमें यह विचार करने की आवश्यकता है कि हम किस प्रकार की आधुनिकता को अपनाना चाहते हैं। क्या वह आधुनिकता जो हमारी जड़ों को काटकर केवल उपभोक्तावाद को बढ़ावा देती है? या वह जो अपनी परंपराओं को समझते हुए, उन्हें साथ लेकर भविष्य की ओर बढ़ती है? सोहराय की दीवारें अब चुप हैं। लेकिन यह चुप्पी केवल एक कला की नहीं है, यह एक चेतावनी है कि यदि हमने समय रहते अपनी परंपराओं की ओर मुड़कर नहीं देखा, तो आने वाली पीढ़ियों के पास इतिहास की केवल तस्वीरें होंगी, अनुभव नहीं। हमें यह याद रखना चाहिए कि परंपरा कोई बोझ नहीं होती, बल्कि वह एक ऐसी विरासत होती है जो हमारी अस्मिता, हमारी पहचान और हमारे सामाजिक ताने-बाने की नींव होती है। 

सोहराय चित्रकला हमें सिखाती है कि प्रकृति, स्त्री, समाज और कला ये सब आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। इन्हें अलग करना, या किसी एक को खो देना, पूरे ताने-बाने को कमज़ोर करना है। इसलिए यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम इस चित्रकला को फिर से गांव की दीवारों पर जीवित करें। इसे स्कूली शिक्षा में लाएं, इसे डिजिटल माध्यमों पर प्रस्तुत करें, इसे महज अतीत की वस्तु न बनाएं। कलाकारों को सम्मान दें, उन्हें मंच दें, और सबसे महत्वपूर्ण  समाज को यह समझाएं कि मिट्टी की दीवार पर बना चित्र किसी ब्रांडेड दीवार घड़ी से अधिक जीवंत और मूल्यवान हो सकता है। यदि हम अब भी चुप रहे, तो एक दिन इतिहास हमें यह कहेगा कि हमने केवल एक चित्रकला को नहीं, एक समाज की स्मृति, स्त्री की रचनाशीलता और प्रकृति से हमारे रिश्ते को खो दिया। सोहराय की दीवारें हमसे पुकार रही हैं क्या हम उनकी आवाज़ सुनने को तैयार हैं?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2025-07-18 21:02:07
नशा मुक्त युवा, विकसित भारत का सारथी

मनसुख मांडविया

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कहा जाता है कि अगर किसी देश को आगे बढ़ना है, विकसित होना है, तो उसका युवा सशक्त और समर्थ होना चाहिए। विश्व में भारत ऐसा देश है, जहां सबसे अधिक युवा आबादी है। 

हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि अगर भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाना है, तो उसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका हमारी युवा शक्ति ही निभाएगी। देश के विकास की रफ्तार युवाओं की ऊर्जा, विचार और संकल्प से ही तय होती है। लेकिन आज राष्ट्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, अपने युवाओं को नशे की लत से दूर रखना। वर्तमान में युवा वर्ग नशे के घेरे में आता जा रहा है।

यह नशा न केवल उनके स्वास्थ्य बल्कि करियर, सपनों और देश की ताकत को भी प्रभावित कर रहा है। एक स्टडी के मुताबिक, भारत में 10 से 24 वर्ष की उम्र के हर 5 में से 1 युवा ने कभी न कभी ड्रग्स का सेवन किया है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की रिपोर्ट के अनुसार, 8.5 लाख से अधिक बच्चे ड्रग्स की लत का शिकार हैं। ये आंकड़े बेहद डरावने और चिंतन योग्य हैं।

ड्रग्स और अन्य नशीले पदार्थों के खात्मे के लिए भारत सरकार ने पिछले 11 वर्षों में कई प्रभावी कदम उठाये हैं। 2020 में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने नशा मुक्त भारत अभियान की शुरुआत की। नशे की लत को रोकने और पीड़ितों की सहायता के लिए सरकार ने राष्ट्रीय नशा मुक्ति केंद्र (IRCAs) और आउटरीच-कम-ड्रॉप-इन सेंटर (ODICs) की स्थापना की। स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता अभियान चलाये गये।

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने ड्रग माफिया के विरुद्ध सशक्त ऑपरेशन्स किए। साथ ही, देशभर में युवाओं की काउंसलिंग हेतु हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर भी स्थापित किए गए। इसके अलावा विभिन्न राज्यों में भी स्थानीय प्रशासन, गैर-सरकारी संस्थाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सहयोग से नशे के विरुद्ध कई बड़े अभियान चलाये जा रहे हैं।

भारत इस लड़ाई को और मजबूत बनाने के लिए लगातार प्रयासरत है। इसी कड़ी में MY Bharat ने एक बड़ी पहल की है। बाबा काशी विश्वनाथ की धरती से 19 से 20 जुलाई तक युवा आध्यात्मिक समिट का आयोजन किया जा रहा है। इसका थीम होगा नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत।

वाराणसी के पावन घाटों पर आयोजित होने वाले इस समिट का उद्देश्य, एक ऐसी राष्ट्रीय नीति बनाना है, जो युवाओं के नेतृत्व में नशा मुक्ति अभियान को सशक्त बनाये। इस समिट में देशभर की 100 से अधिक आध्यात्मिक संस्थाओं के युवा प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया है।

साथ ही स्वास्थ्य मंत्रालय, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो और अन्य महत्वपूर्ण संस्थाएं भी इसमें सहभागिता करेंगी। इसके माध्यम से युवाओं को एक ऐसा मंच मिलेगा, जहां वो अपनी आवाज़ को सरकार और नीति निर्माताओं तक पहुँचा सकेंगे।

इस समिट में देश की नशे के विरुद्ध लड़ाई को मजबूत करने के लिए विभिन्न सेशन्स आयोजित किए जाएंगे। इसमें नशे की प्रवृत्ति, इसकी प्रकृति, प्रकार, पीड़ितों की जनसांख्यिकी, अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव और सरकार तथा MY Bharat के युवा स्वयंसेवकों की भूमिका जैसे विषयों पर गहन विचार-विमर्श और चर्चा होगी। साथ ही नशे की लत से उबरने वाले युवाओं की प्रेरक कहानियां और उनके अनुभव भी साझा किए जाएंगे, ताकि अन्य युवा उनसे प्रेरणा ले सकें।

अंत में एक काशी डिक्लेरेशन जारी किया जाएगा, जो अगले पांच वर्षों के लिए नशा मुक्ति अभियान का रोडमैप होगा। इसमें यह तय किया जाएगा कि युवाओं को किस प्रकार नशे से दूर रखा जाए, नशे की गिरफ्त में आए लोगों की कैसे सहायता की जाए और पूरे देश में जागरूकता अभियान को किस तरह तेज किया जाए।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी हमेशा देश की अमृत पीढ़ी के सपनों का भारत बनाने की बात करते हैं। उनके विजन के अनुरूप, युवा मामले और खेल मंत्रालय द्वारा उठाया गया यह कदम, एक समग्र और प्रभावशाली पहल का उदाहरण बनेगा। यह पहल न केवल युवाओं को नशे से दूर रखने में मदद करेगी, बल्कि उन्हें राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा में भी सशक्त भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करेगी।

देश को विकसित राष्ट्र बनाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी हमारी युवा शक्ति की है। काशी में आयोजित होने वाला युवा आध्यात्मिक समिट इस लक्ष्य की दिशा में केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय चेतना का प्रारंभ स्थल बनेगा।

यह नशे के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी अभियान को नई दिशा और ऊर्जा देगा। साथ ही, युवाओं में नैतिक मूल्यों, सामाजिक ज़िम्मेदारी और आत्म-संयम का ऐसा भाव जागृत करेगा, जो न केवल उन्हें अपने जीवन में सार्थकता देगा, बल्कि देश को भी आत्मनिर्भर, सशक्त और विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित करने का माध्यम बनेगा। काशी की पवित्र धरती से उठने वाली यह पुकार, हर युवा के मन में जागृति और देशभक्ति का नया प्रकाश भर देगी और यही संकल्प 2047 के विकसित भारत की मजबूत नींव बनेगा। (लेखक केंद्रीय श्रम एवं रोजगार तथा युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्री, भारत सरकार हैं।)

Published / 2025-07-14 21:15:41
जानें आखिर क्या है कैटल इंश्योरेंस?

आशीष अग्रवाल 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। किसान के लिए मवेशी केवल पशुधन नहीं; बल्कि परिवार के सदस्य जैसे होते हैं। ये जानवर दैनिक कृषि कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, आय का वैकल्पिक स्रोत पैदा करते हैं और अन्य कृषि गतिविधियों के लिए सामग्री भी प्रदान करते हैं। क्या आप जानते हैं कि जैसे हम अपने जीवन, वाहनों और स्वास्थ्य का बीमा करते हैं, वैसे ही हम अपने पशुधन का भी बीमा करवा सकते हैं? 

गाय, भैंसों, बकरियों और अन्य पशुधन को बीमा द्वारा कवरेज प्रदान की जा सकती है। हमारे पशुधन हमें अत्यधिक लाभ प्रदान करते हैं और देखभाल के लिए हम पर निर्भर होते हैं। उनके लिए बीमा पॉलिसी लेना अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे उनकी देखभाल हो सके और महत्वपूर्ण रूप से, हमारी आजीविका भी सुरक्षित हो सके। इसके अलावा, अगर हमारे पशु बीमार हो जाते हैं या दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं, तो बीमा हमें आर्थिक तनाव से बचायेगा, जिससे कृषि उद्यम में हमारा विश्वास मजबूत होगा। 

आइये समझते हैं कि कैटल इंश्योरेंस के तहत क्या कवर किया जाता है :

  1. दुर्घटना या बीमारी के कारण मृत्यु : अगर आपके पशु किसी अप्रत्याशित दुर्घटना का शिकार होते हैं या उन्हें कोई बीमारी हो जाती है और उचित मेडिकल उपचार प्राप्त होने के बावजूद, वे ठीक नहीं हो पाते हैं और उनकी मृत्यु हो जाती है, तो बीमा कंपनी आपको पॉलिसी की शर्तों के अनुसार बीमा राशि का भुगतान करेगी, जिसका उपयोग आप नये पशु खरीदने के लिए कर सकते हैं।   
  2. स्थायी पूर्ण विकलांगता  : अगर आपके पशुधन को किसी बीमारी/दुर्घटना के कारण स्थायी पूर्ण विकलांगता होती है और वे आगे खेत में काम करने या दूध देने में असमर्थ हो जाते हैं,  तो आपको उनकी विकलांगता के स्तर के आधार पर बीमा राशि में से एक तय प्रतिशत के अनुसार मुआवजा दिया जायेगा। यह मुआवजा आमतौर पर बीमा राशि के 50% से 75% तक होता है।  
  3. सर्जरी के कारण मृत्यु : अगर किसी बीमारी या दुर्घटना के कारण आपके पशु की सर्जरी होती है, तो इसे एक मान्य वेटरनरी डॉक्टर द्वारा की जानी चाहिए। अगर सर्जरी के दौरान पशु की मृत्यु हो जाती है, तो बीमा कंपनी आपको पॉलिसी के अनुसार नया पशु खरीदने या बीमा राशि की तय सब-लिमिट का भुगतान करेगी। 
  4. डॉक्टर से परामर्श और डायग्नोस्टिक टेस्ट (ऐड-आन कवर) : कैटल इंश्योरेंस के तहत यह कवरेज आपके पशु के बीमार होने पर वेटरनरी डॉक्टर के परामर्श से जुड़े खर्चों को कवर करता है। इसमें डॉक्टर द्वारा बताए गए डायग्नोस्टिक टेस्ट के खर्च भी शामिल हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि आपके पशुधन को समय पर और सही मेडिकल सहायता प्राप्त हो, यह अतिरिक्त प्रीमियम के भुगतान पर उपलब्ध है (केयर प्लस ऐड-आन कवर के तहत)। 

अंत में, हमारे पशुओं के लिए बीमा एक महत्वपूर्ण आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती है, जो न केवल हमारे पैसों की सुरक्षा करती है, बल्कि हमारे पशुधन की उचित देखभाल भी सुनिश्चित करती है। चिकित्सा के खर्चों और मृत्यु की स्थिति में नये पशु घर लाने के खर्चों को कवर करके, यह बीमा अप्रत्याशित खर्चों के कारण आने वाले आर्थिक बोझ को कम करती है। इस अतिरिक्त देखभाल को अपनाना न केवल हमारे प्रिय पशुओं की भलाई सुनिश्चित करता है, बल्कि हमें अप्रत्याशित खर्चों के संभावित बोझ से भी राहत देता है और हमारी आर्थिक स्थिरता को मजबूत करता है। (लेखक एग्रीबिजनेस, बजाज आलियांज जनरल इंश्योरेंस के हेड हैं।) 

ध्यान दें: हमेशा सुनिश्चित करें कि आप बीमा प्रदाता से बीमा कवरेज संबंधी सभी नियम व शर्तें अच्छी तरह से समझें, ताकि आप एक सही निर्णय ले सकें और मन की शांति सुनिश्चित कर सकें।  

Published / 2025-07-03 17:53:57
परिवर्तन को समर्थ बनाना समय की मांग

  • परिवर्तन को समर्थ बनाना : महिला एवं बाल विकास में तकनीकी परिवर्तन का एक दशक सशक्तिकरण की शुरुआत पहुँच अधिकारों, सेवाओं, सुरक्षा और अवसरों तक पहुँच से होनी चाहिए

अन्नपूर्णा देवी

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सशक्तिकरण की शुरुआत पहुँच - अधिकारों, सेवाओं, सुरक्षा और अवसरों तक पहुँच से होती है । बीते दशक में, अधिक समावेशी और डिजिटल रूप से सशक्त भारत का निर्माण करने पर केंद्रित मोदी सरकार की प्रतिबद्धता के माध्यम से इस पहुँच को नए सिरे से परिभाषित किया गया है और सभी के लिए सुलभ बनाया गया है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय इस परिवर्तन में सबसे अग्रणी रहा है।

माननीय प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी के विकसित भारत @2047 के विजन से निर्देशित, मंत्रालय ने लाभ को अंतिम छोर तक त्‍वरित, पारदर्शी और कुशल तरीके से पहुँचाना सुनिश्चित करने के लिए अपने कार्यक्रमों में प्रौद्योगिकी को व्यवस्थित रूप से एकीकृत किया है।

हम अक्सर कहते हैं: सशक्त महिलाएँ, सशक्त भारत और सशक्तिकरण की शुरुआत पहुँच - अधिकारों, सेवाओं, सुरक्षा और अवसरों तक पहुँच से होनी चाहिए । आज, यह पहुँच तेज़ी से डिजिटल होती जा रही है। जो कभी आकांक्षापूर्ण था, वह अब क्रियाशील बन चुका है –ऐसा  सरकार द्वारा डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, रियल-टाइम डेटा सिस्टम और उत्तरदायी शासन पर ज़ोर दिए जाने की बदौलत संभव हुआ है।

मंत्रालय ने देखरेख, संरक्षण और सशक्तीकरण पर दृढ़ता से ध्यान केंद्रित करते हुए - पोषण, शिक्षा, कानूनी सुरक्षा और आवश्यक अधिकारों तक पहुँच को मजबूत किया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि महिलाएं और बच्चे न केवल अधिक स्वस्थ, अधिक सुरक्षित जीवन जी सकें, बल्कि वे आत्मविश्वासी नेतृत्‍वकर्ता और अमृत काल के परिवर्तनकर्ता के रूप में भी उभर सकें।

जैसा कि माननीय प्रधानमंत्री ने बहुत सटीक रूप से कहा है, मैं प्रौद्योगिकी को सशक्त बनाने के साधन के रूप में तथा आशा और अवसर के बीच की दूरी को पाटने वाले उपकरण के रूप में देखता हूँ। इस लोकाचार ने मैनुअल प्रक्रियाओं से लेकर रियल-टाइम डैशबोर्ड तक, असंबद्ध  योजनाओं से लेकर एकीकृत प्लेटफार्मों तक हमारे परिवर्तन का मार्गदर्शन किया है। इस परिवर्तन की आधारशिला सक्षम आंगनवाड़ी पहल है।

भारत भर में 2 लाख से ज़्यादा आंगनवाड़ी केंद्रों को आधुनिक और सशक्त बनाने के लिए निरुपित यह कार्यक्रम बाल्‍यावस्‍था देखरेख और विकास की अगली पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है। पोषण, स्वास्थ्य सेवा और पूर्व-विद्यालयी शिक्षा सेवाओं की ज़्यादा प्रभावी प्रदायगी संभव बनाते हुए इन केंद्रों को स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल डिवाइस और नए-नए लर्निंग टूल्स के साथ अपग्रेड किया जा रहा है।

देश भर में 14 लाख आंगनवाड़ी केंद्रों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं को पोषण ट्रैकर के साथ एकीकृत करने से रियल-टाइम डेटा एंट्री, कार्य निष्‍पादन की निगरानी और साक्ष्य-आधारित नीतिगत हस्तक्षेप संभव हो पाया है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को स्मार्टफोन और व्यापक प्रशिक्षण से लैस करके, यह पहल अंतिम छोर तक गुणवत्तापूर्ण सेवा प्रदायगी सुनिश्चित करती है। यह 2014 से पहले मौजूद मैनुअल रिकॉर्ड-कीपिंग और डेटा ब्लाइंड स्पॉट से एक निर्णायक बदलाव का प्रतीक है।

एक दशक पहले, आईसीडीएस प्रणाली असंबद्ध डेटा, विलंबित प्रतिक्रियाओं और रियल-टाइम  ट्रैकिंग की कमी से दबी हुई थी। पोषण ट्रैकर ने - पोषण सेवा प्रदायगी में सटीकता, दक्षता और जवाबदेही की शुरुआत कर इस परिदृश्य को बदल दिया है।

10.14 करोड़ से ज़्यादा लाभार्थी अब इस प्लेटफॉर्म पर पंजीकृत हैं- जिनमें गर्भवती महिलाएँ, स्तनपान कराने वाली माताएँ, छह साल से कम उम्र के बच्चे और किशोरियाँ शामिल हैं। यह प्‍लेटफॉर्म विकास की निगरानी और पूरक पोषण प्रदायगी पर रियल-टाइम अपडेट को सक्षम बनाते हुए समय पर हस्तक्षेप और साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण सुनिश्चित करता है। डिजिटल रूप से सशक्त सामुदायिक केंद्रों के रूप में आंगनवाड़ी केंद्रों की नए सिरे से परिकल्पना कर, शहरी-ग्रामीण विभाजन को पाटते हुए- पोषण ट्रैकर महत्‍वपूर्ण रूप से स्वस्थ भारत, सुपोषित भारत के राष्ट्रीय विजन को आगे बढ़ा रहा है।

लोक प्रशासन में उत्कृष्टता के लिए प्रधानमंत्री पुरस्कार (2025) से सम्मानित यह मंच पोषण भी पढाई भी का भी समर्थन करता है, जो प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा के लिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को डिजिटल प्रशिक्षण मॉड्यूल प्रदान करते हुए विकसित भारत के अमृत काल में समग्र देखभाल को बढ़ावा दे रहा है।

पूरक पोषण कार्यक्रम (एसएनपी) में पारदर्शिता को और मजबूत करने तथा लीकेज कम करने के लिए एक फेशियल रिकॉग्निशन सिस्टम शुरू किया गया है। इस डिलिवरी तंत्र को सुरक्षित, सटीक और सम्मानजनक बनाते हुए यह सुनिश्चित करता है कि पोषण सहायता केवल पात्र लाभार्थियों को ही मिले।

प्रौद्योगिकी-आधारित प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से यह मंत्रालय पोषण से बढ़कर, महिलाओं के लिए सुरक्षा और सहायता सुनिश्चित कर रहा है। शी-बॉक्स पोर्टल हर महिला को, चाहे वह किसी भी रोजगार की स्थिति में हो या संगठित या असंगठित, निजी या सार्वजनिक क्षेत्र में काम करती हो, पॉश अधिनियम के तहत उसे शिकायत दर्ज कराने के लिए सिंगल-विंडो एक्सेस प्रदान करता है - जिससे ऑनलाइन निवारण और ट्रैकिंग संभव हो पाती है।

इस बीच, मिशन शक्ति डैशबोर्ड एंड मोबाइल ऐप संकट से घिरी महिलाओं को एकीकृत सहायता प्रदान करता है, उन्हें निकटतम वन स्टॉप सेंटर से जोड़ता है - जो अब लगभग हर जिले में चालू है। ये कदम इस बात का उदाहरण हैं कि तकनीक का उपयोग न केवल दक्षता के लिए, बल्कि न्याय, सम्मान और सशक्तिकरण के लिए भी किया जा रहा है। एक दशक पहले, मातृत्व लाभ की निगरानी करना मुश्किल था और इसमें देरी होती थी। मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (पीएमएमवीवाई) की शुरूआत की है - जो मातृ कल्याण की दिशा में बहुत बड़ा बदलाव है।

पीएमएमवीवाई नियम, 2022 के तहत, गर्भवती महिलाओं को उनके पहले बच्चे के लिए 5,000 रुपये की राशि मिलती है । मिशन शक्ति के तहत, अगर दूसरा बच्चा लड़की है, तो - बेटियों के लिए सकारात्मक सुदृढ़ीकरण को बढ़ावा देते हुए लाभ की राशि 6,000 रुपये तक बढ़ जाती है। कागज रहित प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) प्रणाली के माध्यम से वितरित, शुरुआत से अब तक 4 करोड़ से अधिक महिला लाभार्थियों तक 1,9000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि पहुँच चुकी है।

पीएमएमवीवाई - आधार-आधारित प्रमाणीकरण, मोबाइल-आधारित पंजीकरण, आंगनवाड़ी/आशा कार्यकर्ताओं द्वारा घर-घर सहायता और रियल-टाइम डैशबोर्ड का लाभ उठाते हुए एक पूर्णतः डिजिटल कार्यक्रम है। एक समर्पित शिकायत निवारण मॉड्यूल तथा पारदर्शिता, विश्वास और जवाबदेही सुनिश्चित करने वाला नागरिकों से संबंधित पोर्टल  है - जो बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को मजबूत करता है।

ये लक्षित प्रयास ठोस नतीजे दे रहे हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (एमओएचएफडब्ल्यू) की स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली (एच एम आई एस) की नवीनतम रिपोर्ट से पता चलता है कि जन्म के समय लिंगानुपात (एसआरबी) 918 (2014-15) से बढ़कर 930 (2023-24) हो गया है, जिसमें 12 अंकों का शुद्ध सकारात्मक परिवर्तन हुआ है। मातृ मृत्यु दर 130 प्रति 1000 जन्म (2014-16) से घटकर 97 प्रति 1000 जन्म (2018-20) हो गई है - जो हमारी सरकार के पिछले एक दशक के निरंतर प्रयासों के सकारात्मक प्रभाव को रेखांकित करता है।

प्रत्‍येक बच्‍चा पोषित, सुरक्षित और संरक्षित वातावरण का हकदार है। हाल के वर्षों में, डिजिटल परिवर्तन ने बाल संरक्षण और कल्याण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। किशोर न्याय अधिनियम के तहत, मंत्रालय ने केयरिंग्स पोर्टल (बाल दत्तक ग्रहण संसाधन सूचना एवं मार्गदर्शन प्रणाली) के माध्यम से गोद लेने के इकोसिस्‍टम को मजबूत किया है। यह डिजिटल इंटरफ़ेस एक अधिक पारदर्शी, सुलभ और कुशल गोद लेने की प्रक्रिया सुनिश्चित करता है।

डिजिटलीकरण ने बाल देखभाल संस्थानों, पालन-पोषण केंद्रों और जेजे अधिनियम के तहत वैधानिक सहायता संरचनाओं की निगरानी में भी सुधार किया है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) द्वारा विकसित प्लेटफॉर्म बाल अधिकारों के उल्लंघन पर सक्रिय रूप से नज़र रख रहे हैं। इस बीच, मिशन वात्सल्य डैशबोर्ड विभिन्न बाल कल्याण हितधारकों के बीच अभिसरण और समन्वय को मजबूत करता है।

यह नया भारत है - जहाँ शासन प्रौद्योगिकी से मिलता है, और जहाँ नीति उद्देश्य से मिलती है। पिछले दशक में, माननीय प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी के ओजस्‍वी नेतृत्व में, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने न केवल डिजिटल परिवर्तन को अपनाया है - बल्कि इसका समर्थन भी किया है।

जैसे-जैसे हम अमृत काल  में आगे बढ़ रहे हैं, मंत्रालय प्रत्येक महिला और प्रत्येक बच्चे का राष्ट्र निर्माण में भागीदार बनना सुनिश्चित करते हुए आगे बढ़कर नेतृत्व करना जारी रखेगा। प्रौद्योगिकी, पारदर्शिता और लक्षित कार्रवाई के माध्यम से, हम एक ऐसे भविष्य का निर्माण कर रहे हैं जहाँ सशक्तिकरण महज नारा भर नहीं है - बल्कि प्रत्येक भारतीय के लिए वास्तविकता है। (लेखिका केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं।)

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