एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज के समय में समाज का चेहरा लगातार बदल रहा है। तकनीक, मनोरंजन और आधुनिक जीवनशैली के बीच युवा पीढ़ी की आदतें और सोच भी बदल रही हैं। इन्हीं बदलावों के बीच धूम्रपान और शराब का प्रचलन तेजी से युवाओं के जीवन का हिस्सा बनता जा रहा है। यह केवल व्यक्तिगत पसंद नहीं रह गई है, बल्कि एक प्रकार से सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है। कॉलेज कैंपस, पार्टियों, कॉर्पोरेट जगत, यहां तक कि सोशल मीडिया पर भी धूम्रपान और शराब को एक कूल या स्टाइलिश छवि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन इस आभासी आकर्षण के पीछे छिपे खतरों और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
युवा अवस्था जीवन का वह दौर है, जब व्यक्ति अपनी पहचान खोज रहा होता है। इस दौर में मित्रों का प्रभाव, मीडिया का असर और फैशन का दबाव काफी हद तक व्यवहार को प्रभावित करता है। कई युवा केवल सामंजस्य बैठाने के लिए या दूसरों को प्रभावित करने के लिए धूम्रपान और शराब की शुरूआत कर देते हैं। धीरे-धीरे यह आदत लत में बदल जाती है और जीवन भर उनके स्वास्थ्य, करियर और रिश्तों पर असर डालती है। धूम्रपान को अक्सर एक छोटे से शौक की तरह देखा जाता है।
शुरुआत में यह महज तनाव कम करने या समय बिताने का साधन लगता है। लेकिन तंबाकू में मौजूद निकोटीन इतनी तेजी से शरीर और दिमाग पर असर डालती है कि कुछ ही दिनों में व्यक्ति इसके बिना असहज महसूस करने लगता है। युवाओं के लिए सिगरेट हाथ में पकड़ना मानो आत्मविश्वास या परिपक्वता की निशानी बन जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि यह धीरे-धीरे शरीर के प्रत्येक अंग को क्षतिग्रस्त करने वाली आदत है। धूम्रपान फेफड़ों के कैंसर, हृदय रोग, श्वसन संबंधी विकार और अनेक अन्य बीमारियों का कारण है।
इसके अलावा यह त्वचा की गुणवत्ता घटाता है, समय से पहले बुढ़ापा लाता है और प्रजनन क्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इसी तरह शराब का सेवन भी युवाओं के जीवन में मॉडर्न लाइफस्टाइल का प्रतीक बन चुका है। जन्मदिन, पार्टी, प्रमोशन या कोई भी खुशी का अवसर अक्सर शराब के बिना अधूरा माना जाने लगा है। युवाओं के लिए यह एक सामाजिक जुड़ाव का माध्यम बन गया है। लेकिन शराब शरीर और मन दोनों पर गंभीर दुष्प्रभाव डालती है। लंबे समय तक शराब का सेवन करने से लिवर सिरोसिस, उच्च रक्तचाप, स्ट्रोक और विभिन्न प्रकार के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका गहरा असर पड़ता है अवसाद, चिंता और आक्रामक व्यवहार शराब की लत के कारण आम हो जाते हैं। कई बार यह लत इतनी गहरी हो जाती है कि व्यक्ति अपने रिश्तों, शिक्षा और करियर तक को दांव पर लगा देता है। धूम्रपान और शराब की संस्कृति केवल स्वास्थ्य को ही नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि समाज पर भी गहरा प्रभाव डालती है। सड़क दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण शराब के नशे में गाड़ी चलाना है। नशे की स्थिति में लिए गए निर्णय अक्सर गलत साबित होते हैं, जिससे न केवल व्यक्ति स्वयं बल्कि उसका परिवार और समाज भी प्रभावित होता है।
इसके अलावा, यह आदतें आर्थिक बोझ भी बढ़ाती हैं। एक औसत युवा हर महीने सिगरेट और शराब पर इतनी राशि खर्च कर देता है, जिससे उसकी पढ़ाई, करियर या भविष्य की योजनाओं में निवेश किया जा सकता था।मीडिया और विज्ञापनों का योगदान भी इस संस्कृति को बढ़ावा देने में अहम रहा है। फिल्मों में नायक को सिगरेट पीते या शराब पीते दिखाना मानो एक ग्लैमरस छवि प्रस्तुत करना है। सोशल मीडिया पर भी विभिन्न ब्रांड्स अपनी मार्केटिंग रणनीति में युवाओं को लक्ष्य बनाते हैं।
इस सबके बीच एक युवा यह मान बैठता है कि अगर वह धूम्रपान या शराब नहीं करता तो शायद वह समूह का हिस्सा नहीं बन पाएगा। यह मानसिक दबाव कई बार अधिक खतरनाक साबित होता है। हालांकि, यह भी सच है कि धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ रही है। कई स्वास्थ्य संगठनों, गैर-सरकारी संस्थाओं और शैक्षणिक संस्थानों ने इस दिशा में प्रयास शुरू किये हैं। तंबाकू और शराब से होने वाले दुष्परिणामों के बारे में जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। कुछ स्थानों पर तो युवाओं के लिए परामर्श केंद्र भी खोले गए हैं, जहां उन्हें स्वस्थ विकल्प अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
योग, ध्यान, खेलकूद और रचनात्मक गतिविधियों को अपनाकर तनाव कम करने और आत्मविश्वास बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस संदर्भ में परिवार की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। अगर माता-पिता स्वयं स्वस्थ जीवनशैली अपनाते हैं और बच्चों के साथ खुलकर संवाद करते हैं तो युवाओं को धूम्रपान और शराब जैसी आदतों से दूर रखना आसान हो सकता है। शिक्षा प्रणाली में भी जीवन कौशल आधारित पाठ्यक्रमों की आवश्यकता है, जिससे बच्चों को शुरूआत से ही यह समझाया जा सके कि असली आत्मविश्वास और आधुनिकता नशे में नहीं, बल्कि स्वस्थ और संतुलित जीवनशैली में है।
धूम्रपान और शराब का आकर्षण भले ही क्षणिक सुख प्रदान करे, लेकिन यह शरीर और मन पर स्थायी क्षति पहुंचाता है। युवा पीढ़ी को यह समझना होगा कि उनकी वास्तविक पहचान, उनकी प्रतिभा और उनके विचारों में है, न कि एक सिगरेट या शराब के गिलास में। यदि हम समाज को स्वस्थ, सशक्त और प्रगतिशील बनाना चाहते हैं तो युवाओं को इस लत से दूर रखना ही होगा। अंतत: यह कहा जा सकता है कि धूम्रपान और शराब संस्कृति एक सामाजिक चुनौती बन चुकी है, जो युवाओं के स्वास्थ्य, परिवार और भविष्य को गहराई से प्रभावित कर रही है।
इस चुनौती का सामना करने के लिए व्यक्तिगत जागरूकता, पारिवारिक सहयोग, सामाजिक प्रयास और सरकारी नीतियां सभी का योगदान आवश्यक है। जब तक युवा स्वयं यह संकल्प नहीं लेंगे कि वे अपने जीवन को स्वस्थ विकल्पों से भरेंगे, तब तक इस आदत से छुटकारा पाना मुश्किल होगा। लेकिन आशा की किरण यह है कि धीरे-धीरे बदलती सोच और जागरूकता से एक ऐसा समाज संभव है, जहां युवा अपनी ऊर्जा और क्षमता को सिगरेट और शराब में नहीं, बल्कि सृजन, नवाचार और प्रगति में लगायेंगे।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। लोकसभा में 20 अगस्त 2025 को जब इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने आनलाइन खेल संवर्धन और विनियमन विधेयक, 2025 प्रस्तुत किया तब इस दिशा में यह भी स्पष्ट हो गया कि यह केवल एक विधायी औपचारिकता नहीं थी, डिजिटल युग की नई चुनौतियों के प्रति सरकार के दृष्टिकोण में आए बदलाव का इसे आप पुख्ता प्रमाण मान सकते हैं।
इस विधेयक में रियल मनी गेमिंग और उसके विज्ञापनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने, उल्लंघन करने वालों के लिए जेल और जुमार्ने जैसी कठोर सजा का प्रावधान करने और साथ ही ई-स्पोर्ट्स, शैक्षणिक तथा सामाजिक खेलों को बढ़ावा देने का प्रावधान करता है। विधेयक में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि इस कदम का उद्देश्य समाज, विशेषकर युवाओं और कमजोर वर्गों को डिजिटल व्यसन के दुष्प्रभावों से बचाना है।
भारत में एक तरह से देखा जाए तो आनलाइन गेमिंग इंडस्ट्री पिछले एक दशक में अप्रत्याशित रफ्तार से बढ़ी है। आज इसका आकार 32,000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है और अनुमान था कि 2029 तक यह उद्योग 80,000 करोड़ रुपये के स्तर को छू लेगा। लेकिन इस वृद्धि की असल नींव रियल मनी गेमिंग यानी पैसों के लालच और जुए जैसे खेलों पर आधारित रही। आंकड़े बताते हैं कि इंडस्ट्री का 86 प्रतिशत राजस्व इन्हीं खेलों से आता रहा है। यह वही खेल हैं, जिनमें किशोर और युवा अपनी मेहनत की कमाई, यहां तक कि उधार लिए पैसे भी गंवाते रहे।
परिवार टूटे, सामाजिक रिश्ते बिगड़े, अवसाद और आत्महत्या के मामले बढ़े। अब तक हजार से कई अधिक की संख्या में लोग गेम के चक्?कर में मौत को गले लगा चुके हैं। ऐसे में सवभाविक है कि देश भर में सरकार का यह कदम ऐसे हालात में न केवल उचित है बल्कि यह समय की माँग भी है। लेकिन इसके साथ ही जिम्मेदारीपूर्ण यह मांग भी उठना स्वाभाविक है कि यदि सरकार डिजिटल व्यसन की इस समस्या को आॅनलाइन गेमिंग के संदर्भ में गंभीरता से देख सकती है तो क्या वही तर्क सोशल मीडिया पर लागू नहीं होना चाहिए?
इससे जुड़े तथ्य दुनिया के सामने आज मौजूद है, फिर अनुभव भी यही बताता है कि सोशल मीडिया का असर कहीं अधिक व्यापक और कहीं अधिक गहरा है। यह न केवल आर्थिक नुकसान का कारण बनता है बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक ताने-बाने और लोकतांत्रिक विमर्श के लिए भी गंभीर खतरा है। आस्ट्रेलिया का हालिया निर्णय इस संदर्भ में बेहद प्रासंगिक है। वहां संघीय सरकार ने ऐलान किया है कि 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, यूट्यूब, स्नैपचैट, रेडिट और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म्स पर किसी भी रूप में सक्रिय रहने की अनुमति नहीं होगी।
यह कानून आने वाले चार महीनों में लागू होगा और सोशल मीडिया कंपनियों को 10 दिसंबर तक सभी नाबालिग खातों को हटाना होगा। केवल इतना ही नहीं, इन कंपनियों को आयु सत्यापन की ऐसी प्रणाली लागू करनी होगी जिससे भविष्य में नाबालिग नए खाते न बना सकें। यह प्रतिबंध इतना कठोर है कि माता-पिता की अनुमति से भी बच्चों को इन प्लेटफॉर्म्स तक पहुंचने की छूट नहीं दी जायेगी।
आस्ट्रेलिया में यह निर्णय एकाएक नहीं लिया गया है, सोशल मीडिया ने बच्चों और किशोरों को जिस तरह की लत में जकड़ा है, उसने मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं को कहीं अधिक बढ़ा दिया है। आत्महत्या के मामलों में वृद्धि, अवसाद और चिंता जैसी बीमारियों का फैलाव और नींद के गंभीर संकट अब विश्व स्तर पर दर्ज किए जा रहे हैं। स्वाभाविक है आस्ट्रेलिया में यही सब कुछ बड़े स्तर पर देखा गया, जिसके बाद आस्ट्रेलियाई सरकार इस निष्कर्ष पर पहुंची कि बच्चों को वास्तविक जीवन और डिजिटल जीवन के बीच संतुलन बनाना सिखाना होगा और इसके लिए कठोर कानून ही कारगर उपाय है। भारत के संदर्भ में स्थिति और भी गंभीर है।
यहां युवाओं की संख्या सबसे अधिक है और इंटरनेट तक पहुंच अब गांव-गांव तक हो चुकी है। रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय किशोर प्रतिदिन औसतन चार से पांच घंटे सोशल मीडिया पर बिताते हैं। यह समय उनके अध्ययन, परिवार के साथ बिताए जाने वाले पलों और वास्तविक सामाजिक संबंधों से छीन लिया जाता है। जिस दौर में शिक्षा और कौशल विकास पर अधिक ध्यान देना चाहिए, उसी समय उनका मन टिकटॉक, इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स जैसी सतही चीजों में उलझा रहता है। सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव केवल समय की बबार्दी तक सीमित नहीं हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन और अनेक मानसिक स्वास्थ्य अध्ययनों ने स्पष्ट किया है कि इन प्लेटफॉर्म्स का अत्यधिक प्रयोग अवसाद, चिंता और नींद की कमी का कारण बन रहा है। किशोरावस्था में यह मानसिक असंतुलन और भी खतरनाक रूप ले लेता है। भारत जैसे देश में, जहां मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी है, वहां यह समस्या एक राष्ट्रीय संकट से किसी भी स्तर पर कम नहीं मानना चाहिए।
इसके अतिरिक्त, सोशल मीडिया बच्चों के लिए आर्थिक शोषण का कारण भी बन रहा है। इन-ऐप परचेज और वर्चुअल गिफ्टिंग जैसी व्यवस्थाओं ने नाबालिगों को पैसे खर्च करने की आदत डाल दी है। कई बार यह खर्च उनकी आर्थिक क्षमता से कहीं अधिक होता है, जिससे परिवारों पर बोझ पड़ता है। सांस्कृतिक दृष्टि से भी यह प्रवृत्ति चिंताजनक है। हिंसा, अश्लीलता और असंस्कारी कंटेंट ने किशोरों के मन-मस्तिष्क को गहराई से प्रभावित किया है और पारंपरिक भारतीय मूल्यों से उन्हें दूर कर दिया है।
यदि भारत ने आनलाइन गेमिंग पर सख्ती दिखाते हुए रियल मनी गेमिंग को पूरी तरह प्रतिबंधित किया है तो अब समय है कि वही दृष्टिकोण सोशल मीडिया पर भी अपनाया जाए। इसके लिए सरकार को सबसे पहले आयु-आधारित प्रतिबंध लागू करना चाहिए। 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण रोक लगायी जाये और 16 से 18 वर्ष तक के किशोरों के लिए प्रतिदिन अधिकतम एक घंटे की सीमा तय की जाये। कंपनियों पर यह जिम्मेदारी डाली जाये कि वे आयु सत्यापन और स्क्रीन टाइम नियंत्रण सुनिश्चित करें।
साथ ही, हानिकारक सामग्री के प्रसार पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। एल्गोरिद्म आधारित डोपामीन ट्रैप यानी बार-बार दिखाए जाने वाले शॉर्ट वीडियो, रील्स और ट्रेंड्स को सीमित किया जाना चाहिए क्योंकि ये युवाओं को लगातार स्क्रीन से चिपकाये रखते हैं। इस दिशा में यूरोप और अमेरिका में भी बहस चल रही है, लेकिन भारत को आस्ट्रेलिया की तरह ठोस कदम उठाने होंगे।
शिक्षा और जागरूकता का पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। स्कूलों में डिजिटल साक्षरता और सोशल मीडिया व्यसन पर अध्याय जोड़े जाने चाहिए ताकि बच्चों को छोटी उम्र से ही इन खतरों की समझ हो। साथ ही युवाओं को विकल्प उपलब्ध कराना भी जरूरी है। कला, खेल, संगीत, हस्तशिल्प और सामुदायिक गतिविधियां इसका अच्छा विकल्प हैं। इसके अलावा सरकार द्वारा सुरक्षित भारतीय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को प्रोत्साहित करना चाहिए जो ज्ञान, संवाद और रचनात्मकता पर आधारित हों।
यदि भारत समय रहते इस दिशा में कदम उठाता है तो इसके दूरगामी लाभ होंगे। युवाओं का मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होगा, वे पढ़ाई और करियर पर अधिक ध्यान देंगे, परिवार और समाज में वास्तविक संबंध मजबूत होंगे और राष्ट्र की सांस्कृतिक दिशा सुरक्षित रहेगी। फेक न्यूज और नफरत की राजनीति का असर भी कम होगा और लोकतंत्र अधिक स्वस्थ बनेगा।
यहां कहना यही है कि जैसे भारत ने आनलाइन गेमिंग पर सख्ती दिखाकर यह संकेत दिया है कि वह युवाओं के भविष्य को लेकर गंभीर है। अब आवश्यकता है कि यही दृष्टिकोण सोशल मीडिया पर भी अपनाया जाये। युवा पीढ़ी राष्ट्र की रीढ़ है। यदि उसे डिजिटल गुलामी, व्यसन और मानसिक असंतुलन की ओर धकेल दिया गया तो यह केवल परिवारों का नहीं, पूरे राष्ट्र का संकट होगा।
इसलिए भारत सरकार को आस्ट्रेलिया के उदाहरण से प्रेरणा लेकर, अपने संदर्भ के अनुसार, कठोर और स्पष्ट नीति तुरंत लागू करनी चाहिए। यही समय की मांग है और यही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है। (लेखिका, मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की सदस्य हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां सब कुछ स्थायी नहीं होता। विचारधाराएं भी अक्सर परिस्थिति के अनुसार बदल जाती हैं, रिश्ते भी बदल जाते हैं और सहयोगी भी। जनता कभी-कभी सोचती है कि दलों के बीच दीवारें बहुत ऊंची होंगी, लेकिन अचानक किसी घटना से वही दीवारें गिर जाती हैं और जिनके बीच खाई दिखाई देती थी, वे हाथ मिलाते नजर आते हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति तो इस संदर्भ में और भी दिलचस्प है, क्योंकि यह राज्य भारतीय लोकतंत्र का प्रयोगशाला रहा है, जहां जाति, वर्ग, अपराध, धर्म और नेतृत्व सभी एक साथ राजनीति के ताने-बाने को बुनते हैं।
ऐसी ही एक ताजा घटना हाल ही में देखने को मिली जब समाजवादी पार्टी से निष्कासित विधायक पूजा पाल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उनके लखनऊ स्थित सरकारी आवास पर मुलाकात की। यह एक साधारण औपचारिक भेंट नहीं थी, बल्कि एक ऐसा प्रसंग था जिसने राजनीति की जमीन को हिला दिया और सत्ता तथा विपक्ष दोनों में हलचल मचा दी। पूजा पाल का नाम उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया नहीं है। वे लंबे समय से प्रयागराज की राजनीति से जुड़ी रही हैं और उनका राजनीतिक सफर कई तरह की त्रासदियों और संघर्षों से होकर गुजरा है।
राजनीति में उनका प्रवेश व्यक्तिगत जीवन की पीड़ा के साथ हुआ। पति रंजन पाल की हत्या के बाद उन्होंने राजनीति का रास्ता चुना। इस चुनाव के पीछे न तो कोई महत्त्वाकांक्षा थी और न ही सत्ता की कोई स्वप्निल तस्वीर, बल्कि यह पीड़ा थी जिसने उन्हें राजनीतिक मंच पर ला खड़ा किया। समाजवादी पार्टी ने उन्हें अवसर दिया और उन्होंने पार्टी के सहारे अपने क्षेत्र में पैठ बनाई। वे धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति का हिस्सा बनीं और विधानसभा में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। लेकिन राजनीति का मैदान बहुत कठोर होता है।
यहाँ केवल जनाधार ही काफी नहीं होता, बल्कि संगठनात्मक अनुशासन, नेतृत्व की नीतियों से सामंजस्य और पार्टी लाइन पर चलना भी अनिवार्य होता है। इसी कसौटी पर पूजा पाल फंस गयीं। विधानसभा सत्र में उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उस नीति की प्रशंसा की जिसके अंतर्गत अपराधियों और माफियाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा रही थी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि योगी सरकार के कारण ही अतीक अहमद जैसे अपराधियों को कानून के शिकंजे में लाया जा सका। यह वक्तव्य विधानसभा की कार्यवाही में दर्ज तो हुआ ही, मीडिया के जरिए व्यापक चर्चा में भी आ गया।
यही वह क्षण था जब समाजवादी पार्टी की नेतृत्व टीम असहज हो गयी। एक विधायक, जो विपक्षी पार्टी से चुनी गयी हो, अगर सत्ता पक्ष की नीति की सार्वजनिक सराहना करे तो यह पार्टी की केंद्रीय रणनीति के खिलाफ माना जाता है। अखिलेश यादव ने इसे अनुशासनहीनता के रूप में देखा और तत्काल प्रभाव से पूजा पाल को पार्टी से निष्कासित कर दिया। इस निर्णय ने सबको चौंका दिया। जनता को यह महसूस हुआ कि सपा अब उस लोकतांत्रिक परंपरा को जगह नहीं देना चाहती जहाँ विधायक अपनी अंतरात्मा की आवाज भी बुलंद कर सके।
यहाँ पर एक गहरी विडंबना छुपी है। समाजवादी पार्टी का इतिहास बताता है कि यह पार्टी हमेशा हाशिये पर खड़े लोगों की आवाज रही है। मुलायम सिंह यादव के समय में यह पार्टी पिछड़े वर्गों, किसानों और अल्पसंख्यकों की आकांक्षाओं को आवाज देने के लिए पहचानी जाती थी। लेकिन धीरे-धीरे जैसे-जैसे संगठन सत्ता के इर्द-गिर्द केंद्रित होता गया, आंतरिक लोकतंत्र कमजोर होता गया। पार्टी में अब वैचारिक बहस की जगह कम होती जा रही है।
पूजा पाल के निष्कासन ने इस विडंबना को उजागर कर दिया कि पार्टी अब अपने विधायकों की स्वतंत्र राय को जगह देने में सक्षम नहीं रही। दूसरी तरफ भाजपा की राजनीति को देखिये। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा ने एक ऐसा नैरेटिव तैयार किया है जिसमें अपराध और माफियागिरी के खिलाफ कठोर कार्रवाई को जनता के बीच सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। जनता की स्मृति में दशकों तक अपराध-राजनीति का गठजोड़ रहा है।
उत्तर प्रदेश में माफिया डॉन और अपराधी लंबे समय तक चुनाव जीतते रहे, सत्ता के गलियारों में पैठ बनाते रहे और प्रशासन को चुनौती देते रहे। अतीक अहमद जैसे नाम तो मानो इस स्याह दौर के प्रतीक बन गए। योगी आदित्यनाथ ने जब इस पूरी परंपरा को तोड़ने का अभियान शुरू किया और माफिया राज को समाप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाये, तो जनता को लगा कि सरकार पहली बार गंभीरता से अपराधमुक्त शासन का सपना साकार कर रही है।
पूजा पाल ने जब मुख्यमंत्री की इसी नीति की सराहना की, तो वस्तुत: उन्होंने जनता की भावना को ही अभिव्यक्त किया। लेकिन उनकी यह अभिव्यक्ति उनकी पार्टी को नागवार गुजरी। भाजपा ने इस अवसर को तुरंत पहचाना। निष्कासन के अगले ही दिन पूजा पाल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने पहुँचीं। यह मुलाकात महज संयोग नहीं थी, बल्कि राजनीति की दूरगामी रणनीति का हिस्सा थी। इस भेंट से भाजपा को यह कहने का अवसर मिला कि उनकी नीतियाँ इतनी स्पष्ट और प्रभावी हैं कि विपक्ष के नेता भी उन्हें नकार नहीं सकते।
भाजपा इस घटना को अपने पक्ष में भुनाने में देर नहीं करेगी। आने वाले चुनावों में भाजपा यह तर्क रख सकती है कि जब विपक्ष के विधायक भी सरकार की अपराध-विरोधी नीतियों को सही मान रहे हैं, तो जनता को अब संदेह करने की आवश्यकता ही नहीं है। इससे भाजपा के राजनीतिक नैरेटिव को और बल मिलेगा। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी इस घटना से कमजोर होती दिख रही है। पार्टी का संदेश यह जा रहा है कि वह असहमति बर्दाश्त नहीं कर सकती।
जनता के बीच यह छवि बन सकती है कि सपा अब लोकतांत्रिक संवाद की बजाय केवल नेतृत्व की हाँ में हाँ मिलाने वाली पार्टी बन गई है। इस पूरी घटना में महिला नेतृत्व की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य की राजनीति लंबे समय तक पुरुष नेताओं और दबंग छवियों पर केंद्रित रही। महिलाओं की भागीदारी सीमित रही और जब रही भी तो अक्सर उन्हें किसी राजनीतिक वंश या पुरुष नेता की छाया में देखा गया। पूजा पाल ने इस धारणा को चुनौती दी।
उन्होंने विधानसभा में स्वतंत्र रूप से अपनी राय रखी और मुख्यमंत्री की नीति का खुलेआम समर्थन किया। इस साहसिक कदम ने उन्हें अन्य महिला नेताओं से अलग पहचान दी। भाजपा के लिए यह भी एक अवसर है, क्योंकि पार्टी लंबे समय से महिला सशक्तिकरण को अपने एजेंडे में प्रमुखता देती रही है। अगर पूजा पाल भाजपा के साथ जुड़ती हैं, तो यह भाजपा को महिला मतदाताओं के बीच एक नया संदेश देने का मौका देगा।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपराध और सत्ता का गठजोड़ इतना गहरा रहा है कि वह राजनीति की छवि को हमेशा कलंकित करता रहा है। जनता बार-बार यही चाहती रही है कि अपराधियों का राजनीति से सफाया हो। योगी आदित्यनाथ ने इस दिशा में कदम उठाकर एक नई परंपरा शुरू की है। पूजा पाल ने जब इस परंपरा की प्रशंसा की, तो यह जनता की भावना का प्रतिनिधित्व था। लेकिन विडंबना यह रही कि उनकी पार्टी ने इस परंपरा की बजाय अनुशासन के चश्मे से देखा और उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया।
भविष्य की राजनीति के संदर्भ में देखें तो यह घटना निर्णायक साबित हो सकती है। भाजपा इसे अपने पक्ष में भुनाने में सफल होगी।
भाजपा का यह कहना आसान होगा कि हमारे शासन की ताकत इतनी है कि विपक्षी भी इसकी सराहना करने से खुद को रोक नहीं पाते। दूसरी ओर, सपा के लिए यह संकट का संकेत है। पार्टी पहले ही लगातार चुनावी पराजयों से जूझ रही है। यदि उसके विधायक और नेता धीरे-धीरे पार्टी से अलग होने लगते हैं, तो जनता में यह संदेश जाएगा कि पार्टी अब विकल्प के रूप में मजबूत नहीं रही। पाल का भविष्य चाहे जिस दिशा में जाए वे भाजपा में शामिल हों या स्वतंत्र राजनीतिक राह चुनें इतना निश्चित है कि उनका यह कदम उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर चुका है।
अब वे केवल एक विधायक नहीं रहीं, बल्कि वे उस बहस का केंद्र बन चुकी हैं जिसमें यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या राजनीतिक दल अपने नेताओं को स्वतंत्र राय रखने देंगे या नहीं, क्या राजनीति अब भी विचारों और नीतियों की प्रतिस्पर्धा का मंच है या केवल नेतृत्व के आदेशों का पालन करने की मशीन? पूजा पाल का निष्कासन और योगी से मुलाकात लोकतंत्र की उस गहरी सच्चाई को उजागर करता है कि राजनीति में असहमति को दबाने के बजाय उसका स्वागत करना चाहिए। क्योंकि असहमति ही लोकतंत्र की आत्मा है।
यदि असहमति को जगह नहीं मिलेगी तो लोकतंत्र खोखला हो जाएगा।समाजवादी पार्टी ने इस असहमति को दबाकर अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार ली है, जबकि भाजपा ने इस असहमति को अवसर बनाकर अपनी राजनीति को और मजबूत कर लिया है। जनता सब देख रही है। जनता यह भी देख रही है कि एक महिला विधायक ने अपने साहस से पार्टी लाइन को तोड़ा और जनता की भावना को व्यक्त किया। जनता यह भी देख रही है कि सत्ता पक्ष ने इस अवसर को अपने पक्ष में कैसे बदल लिया। और जनता यह भी देख रही है कि विपक्षी पार्टी ने अपने ही विधायक को निकालकर अपनी कमजोरी उजागर कर दी।
आने वाले चुनावों में जनता इन सब बातों का हिसाब करेगी। उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह घटना आने वाले वर्षों तक याद रखी जाएगी। क्योंकि यह केवल एक विधायक का निष्कासन और मुख्यमंत्री से मुलाकात नहीं थी, बल्कि यह लोकतंत्र, असहमति, अपराध-राजनीति और महिला नेतृत्व इन सबका संगम था। राजनीति में कभी-कभी ऐसी घटनाएँ होती हैं जो एक नया विमर्श खड़ा करती हैं। पूजा पाल का यह प्रसंग भी वैसा ही है। यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर राजनीति किस दिशा में जा रही है और लोकतंत्र में असली ताकत किसके पास है नेताओं के पास, जनता के पास, या पार्टी के अनुशासन के पास?
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। संसार में पैदा लेने के बाद सांसारिक वातावरण का प्रभाव विशुद्ध 100% स्वाभाविक है। अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों से दो-चार होना सामान्य बात है। सांसारिक आकर्षण, वातावरण में व्याप्त अनावश्यक शोरगुल और अनंत इच्छाएं आज तनाव, उलझन, अवसाद इत्यादि से ग्रसित कर रहा है।
जिनका दुष्प्रभाव प्रभाव हमारे देह के ऊपर भी होते हुए उसे रोगी बना रहा है। समुचित निर्देशन और समाधान के लिए हम यहां-वहां भटकते रहते हैं जबकि हमारा निर्देशक स्वयं हमारे अंतःकरण में बैठा हुआ है। हम उसकी आवाज को अनसुनी कर देते हैं अथवा उसकी उपस्थिति को अस्वीकार करते रहते हैं।
ध्यान पूर्वक एकाग्रचित होकर अपने अंतःकरण में गोता लगाया जा सकता है। सतत अभ्यास से यह धीरे-धीरे सरल हो जाता है। उसके निर्देशन से हमारी अनिश्चितता तथा अनिर्णय की दुविधा समाप्त हो जाती है। हमारा व्यक्तित्व और कार्य सांसारिक जगत में अद्भुत परिणाम उत्पन्न करता है और परिष्कृत अंतस के संतुष्टि और तृप्ति के औषधि से काया और मन शक्ति-संपन्न सदैव स्वस्थ रहता है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। संसार में पैदा लेने के बाद सांसारिक वातावरण का प्रभाव विशुद्ध 100% स्वाभाविक है। अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों से दो-चार होना सामान्य बात है। सांसारिक आकर्षण, वातावरण में व्याप्त अनावश्यक शोरगुल और अनंत इच्छाएं आज तनाव, उलझन, अवसाद इत्यादि से ग्रसित कर रहा है।
जिनका दुष्प्रभाव प्रभाव हमारे देह के ऊपर भी होते हुए उसे रोगी बना रहा है। समुचित निर्देशन और समाधान के लिए हम यहां-वहां भटकते रहते हैं जबकि हमारा निर्देशक स्वयं हमारे अंतःकरण में बैठा हुआ है। हम उसकी आवाज को अनसुनी कर देते हैं अथवा उसकी उपस्थिति को अस्वीकार करते रहते हैं।
ध्यान पूर्वक एकाग्रचित होकर अपने अंतःकरण में गोता लगाया जा सकता है। सतत अभ्यास से यह धीरे-धीरे सरल हो जाता है। उसके निर्देशन से हमारी अनिश्चितता तथा अनिर्णय की दुविधा समाप्त हो जाती है। हमारा व्यक्तित्व और कार्य सांसारिक जगत में अद्भुत परिणाम उत्पन्न करता है और परिष्कृत अंतस के संतुष्टि और तृप्ति के औषधि से काया और मन शक्ति-संपन्न सदैव स्वस्थ रहता है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। लालकिले की प्राचीर से लगातार 12वीं बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का स्वाधीनता दिवस का इस बार का संबोधन कुछ अलग और कई संकेतों से भरा था। उनका 103 मिनट का भाषण न केवल अब तक का सबसे बड़ा बल्कि सख्त और साफ इरादों को दशार्ने वाला था। यह कूटनीति लिहाज से भी गहरे मायनों से भरा था। जहां एक ओर शुरुआत में ही अनुच्छेद 370 को हटाकर, एक देश एक संविधान की बात कही। वहीं, आॅपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए सेना को खुली छूट देने का सच भी सामने रखा।
दरअसल, प्रधानमंत्री का यह संबोधन कई मायनों में बेहद अलग, सख्त और दुनिया के लिए कूटनीतिक बयानों जैसा था। साथ ही साथ देश में भी घट रही अस्वीकार्य घटनाओं से निपटने की चेतावनी भी। इसके अलावा देश की तरक्की, युवाओं को प्रोत्साहन, उपब्धियों और दुनिया के महत्वपूर्ण मिशन में भारतीय योगदान पर भी केन्द्रित था। प्रधानमंत्री ने शायद ही ऐसा कोई विषय छोड़ा हो जो जरूरी न हो। इतना ही नहीं इशारों ही इशारों में जहां अमेरिका और चीन को उसकी हैसियत बताई वहीं खुलेआम पाकिस्तान को भी लताड़ लगायी।
पहले जानते हैं कि उन्होंने क्या-क्या कहा। पहलगाम हमले पर पाकिस्तान को आड़े हाथों लेते हुए उनके आतंकी हेडक्वार्टर्स को मिट्टी में मिलाने का जिक्र कर पाकिस्तान की नींद गायब होने की भी बात कही। लंबे समय से चल रहे न्यूक्लियर ब्लैकमेल को नहीं सहने और सेना की शर्तों पर मुंह तोड़ जवाब देने की बात भी कही। पुराने सिंधु जल समझौते को अन्याय पूर्ण बताया और कहा कि भारत की नदियां दुश्मनों के खेत सींचे और देश के किसान की धरती प्यासी रहे? सिंधु समझौते के उस स्वरूप को आगे नहीं सहा जायेगा।
21वीं सदी टेक्नोलॉजी ड्रिवन सेंचुरी है। 50-60 साल पहले सेमीकंडक्टर पर विचार हुआ लेकिन फाइलें वहीं अटक गयीं। सेमीकंडक्टर के विचार की भ्रूण हत्या हो गयी। बाद में कई देश सेमीकंडक्टर में महारत हासिल कर दुनिया को अपनी ताकत को दिखा रहे हैं। मिशन मोड में इस काम को आगे बढ़ाने तथा 6 अलग-अलग सेमीकंडक्टर यूनिट्स लगाने जिसमें चार की स्वीकृति की जानकारी दी। वर्ष के अंत तक मेड इन इंडिया यानी भारत की बनी हुईं चिप्स बाजार में होना बड़ी उपलब्धि होगी।
प्रधानमंत्री ने अन्य कई योजनाओं, उपलब्धियों की भी चर्चा की। 11 वर्षो में सोलर एनर्जी का उपयोग 30 गुना बढ़ना। नये-नये डैम बना जल शक्ति का विस्तार कर क्लीन एनर्जी की ओर बढ़ना। 10 नये न्यूक्लियर रिएक्टर तेजी से काम करना। 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करना ताकि देश की आजादी के 100 साल पर हमारी परमाणु ऊर्जा क्षमता 10 गुना से भी अधिक हो।
उन्होंने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिेए तय साल 2030 तक क्लीन एनर्जी में 50 प्रतिशत लक्ष्य 5 साल पहले ही हासिल करना हमारी प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता है। नेशनल क्रिटिकल मिशन लॉन्च कर 1200 से अधिक स्थानों पर खोज अभियान से हम क्रिटिकल मिनरल में भी आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं जो बहुत बड़ी उपलब्धि है। युवाओं का आह्वान किया कि क्या हमारे अपना मेड इन इंडिया फाइटर जेट्स खातिर जेट इंजन भी हमारे हों? हम फार्मा आफ द वर्ल्ड हैं। अब समय की मांग नहीं कि हम रिसर्च और डेवलपमेंट में और ताकत लगाएं। हमारे अपने पेटेंट हों। मानव कल्याण हेतु सस्ती, सबसे कारगर नयी-नयी दवाइयों पर शोध हो। संकट में बिना साइड इफेक्ट के जन कल्याण में काम आये।
प्रधानमंत्री मोदी ने आह्वान किया कि आईटी का युग है, डेटा ताकत है। क्या समय की मांग नहीं है कि आपरेटिंग सिस्टम से लेकर के साइबर सुरक्षा, डिप टेक से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक, सारी चीजें हमारी अपनी हों। अपनी सामर्थ्य शक्ति से विश्व को परिचित कराने की बात कहते हुए कहा कि हमारा यूपीआई दुनिया को अजूबा लग रहा है। रियल टाइम ट्रांजैक्शन 50 प्रतिशत अकेला भारत यूपीआई से कर रहा है। क्रिएटिव वर्ल्ड, सोशल मीडिया जितने भी प्लेटफॉर्म्स हैं हमारे अपने क्यों ना हों? क्यों भारत का धन बाहर जाए? मुझे युवाओं के सामर्थ्य पर भरोसा है।
प्रधानमंत्री ने ईवी बैटरी, सोलर पैनल, महिला स्वसहायता समूह, गुणवत्तापूर्ण उत्पाद में पहचान के साथ ही नेक्स्ट जनरेशन रिफॉर्म्स के लिए टास्क फोर्स गठन व समय सीमा में काम पूरा करने ताकि वर्तमान नियम, कानून, नीतियां, रीतियां 21वीं सदी के और वैश्विक वातावरण के अनुकूल हो, भारत को 2047 में विकसित राष्ट्र बनाने के संदर्भ में हो। नेक्स्ट जनरेशन जीएसटी रिफॉर्म्स को दिवाली का तोहफा बताते हुए लोगों की जरूरतों पर लग रहे भारी टैक्स को बहुत कम करने से एमएसएमई, लघु उद्यमियों को लाभ मिलने और रोजमर्रा की चीजें बहुत सस्ती होने से इकॉनामी को नया बल मिलने की बात भी कही।
प्रधानमंत्री मोदी ने षड्यंत्र के तहत, सोची समझी साजिश के जरिए देश की डेमोग्राफी को बदलने को नया संकट बताया। घुसपैठिए, देश के नौजवानों का हक छीन रहे हैं, बहन बेटियों को निशाना बना रहे हैं। यह बर्दाश्त नहीं होगा। हमारे पूर्वजों ने त्याग और बलिदान से आजादी पाई है। एक हाई पावर डेमोग्राफी मिशन शुरू करने का निर्णय किया है। जो ऐसे भीषण संकट से निपटने के लिए तय समय में कार्य करेगा, उस दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं।
इस बार के संबोधन से इतना तो साफ हो गया कि प्रधानमंत्री ने ज्यादा फोकस बजाए दीर्घ कालिक योजनाओं के मौजूदा चुनौतियों और उनसे निपटने के मंसूबों को देश के सामने रखा।
ब्लैकमेलिंग नहीं सहने, आपरेशन सिंदूर का जिक्र, स्वदेशी मजबूरी नहीं मजबूती सहित पाकिस्तान को खुलेआम तो अमेरिका को संकेतों में चेताया भी। पहली बार लालकिले से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 साल की राष्ट्र की सेवा का जिक्र करना और मां भारती के कल्याण का लक्ष्य लेकर सेवा, समर्पण, संगठन और अप्रतिम अनुशासन की चर्चा के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दुनिया का यह सबसे बड़ा एनजीओ है बताना तथा आपातकाल का हवाला भी देने के कई राजनीतिक मायने निकाले जाएंगे। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने 12वीं बार सबसे ज्यादा देर, 103 मिनट संबोधित कर, दुनिया को अपने इरादे साफ कर दिये हैं। अब वक्त है पक्ष-विपक्ष का जो उनके भाषण के अपने-अपने, कैसे-कैसे और क्या-क्या मायने निकालता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत के लोकतंत्र की संरचना संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती पर टिकी हुई है। ये संस्थाएं न केवल शासन के संचालन के लिए आवश्यक हैं, बल्कि वे लोकतंत्र के मूल्यों और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा का भी अभिन्न हिस्सा हैं। आज जब हम 2025 के उपराष्ट्रपति चुनाव की ओर देख रहे हैं, तो यह चुनाव केवल एक औपचारिक प्रक्रिया से कहीं अधिक, हमारे संवैधानिक तंत्र की परीक्षा बन गया है। क्योंकि देश की संवैधानिक संस्थाओं पर जो राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है, वह लोकतंत्र की आत्मा को चुनौती दे रहा है।
संविधान के निर्माताओं ने भारत के संवैधानिक ढांचे में एक सशक्त और स्वतंत्र संस्थागत तंत्र स्थापित करने का विशेष ध्यान रखा था। यह तंत्र सुनिश्चित करता है कि लोकतंत्र का संचालन केवल राजनीतिक दलों या सत्ता समूहों की मनमानी पर निर्भर न रहे, बल्कि संविधान के अनुशासन और मयार्दाओं के भीतर हो। इसमें न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता, राज्यपालों और अन्य संवैधानिक पदों की निष्पक्षता शामिल है। परंतु समय के साथ यह देखा गया है कि ये संस्थाएं राजनीतिक प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं रह पाईं हैं।
यह राजनीतिक दबाव कभी स्पष्ट रूप से और कभी छिपकर सामने आता है। राजनीतिक दबाव की शुरुआत सबसे पहले संस्थाओं की नियुक्ति प्रक्रियाओं में दिखाई देती है। संवैधानिक पदों पर नियुक्ति में पारदर्शिता की कमी, राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं का प्रभाव, और कभी-कभी सीधे राजनीतिक गठजोड़ के कारण ये संस्थाएं उस स्वायत्तता से काम नहीं कर पातीं, जिसकी आवश्यकता लोकतंत्र के लिए होती है। न्यायपालिका का उदाहरण लें, तो जहां एक ओर उसकी भूमिका संविधान की अंतिम प्रहरी के रूप में है, वहीं कुछ हालिया घटनाओं में नियुक्ति प्रक्रियाओं और महत्वपूर्ण फैसलों के संदर्भ में राजनीतिक संकेतों ने इस स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह लगाया है।
यह वह संवेदनशील विषय है जो बार-बार लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी बजाता है। इसी प्रकार निर्वाचन आयोग की स्थिति भी चिंता का विषय रही है। निर्वाचन आयोग, जो देश में चुनावों की निष्पक्षता की गारंटी देता है, ने कई अवसरों पर अपने निर्णयों में विलंब, पक्षपात या राजनीतिक दलों के प्रति असंतुलित रवैया दिखाने के आरोप झेले हैं। राजनीतिक दलों के दबाव में आकर आयोग के निर्णयों की आलोचना जनता के बीच विश्वास की कमी पैदा करती है। लोकतंत्र का मूल आधार यदि चुनाव प्रक्रिया पर सार्वजनिक भरोसा कम हो जाये, तो उसकी नींव डगमगा जाती है।राज्यपालों के मामले में भी राजनीतिक दबाव की छाया स्पष्ट देखी जा सकती है।
संवैधानिक पद के रूप में राज्यपालों को केंद्र और राज्य के बीच संतुलन बनाए रखना होता है, लेकिन कई बार यह पद सत्ता पक्ष के हितों की रक्षा के लिए एक राजनीतिक हथियार बन जाता है। विधानसभा सत्र बुलाने में विलंब, बहुमत साबित करने की प्रक्रिया में अनावश्यक देरी, और राजनीतिक दलों के दबाव में हस्तक्षेप जैसी घटनाएं इसे प्रमाणित करती हैं। यह स्थिति लोकतंत्र के तंत्र में असंतुलन उत्पन्न करती है और संवैधानिक मयार्दाओं को कमजोर करती है। इन सभी संदर्भों में उपराष्ट्रपति चुनाव 2025 विशेष महत्व रखता है।
उपराष्ट्रपति पद न केवल राज्यसभा के सभापति का पद है, बल्कि वे राष्ट्रपति की अनुपस्थिति या असमर्थता में देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद का कार्यभार भी संभालते हैं। यह पद संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की गरिमा का एक प्रतीक है। इसलिए इसका चुनाव एक गहन राजनीतिक और संवैधानिक चुनौती बन गया है। इस चुनाव में संसद के दोनों सदनों के सदस्य मतदान करते हैं, और गुप्त मतदान की प्रक्रिया के बावजूद दलगत राजनीति का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
राजनीतिक दल अपने सदस्यों को आदेश देते हैं, जो उनकी पार्टी की नीति के साथ चलने के लिए बाध्य करते हैं। यह व्यवस्था संसद सदस्यों की स्वतंत्र निर्णय क्षमता को सीमित करती है और संवैधानिक पदों की गरिमा को प्रभावित करती है। लोकतंत्र का उद्देश्य केवल सत्ता की पीठ थपथपाना नहीं है, बल्कि निर्णयों में स्वतंत्रता और संविधान के प्रति निष्ठा होनी चाहिए।2025 के इस उपराष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी दल भी एक संयुक्त उम्मीदवार पेश कर सकता है, जो राजनीतिक दलों से ऊपर उठकर संविधान की रक्षा और लोकतांत्रिक आदर्शों की सेवा करने का वचन देता है।
दूसरी ओर सत्ताधारी दल अपने उम्मीदवार के पक्ष में पूर्ण बहुमत का उपयोग करता नजर आता है। इस परिदृश्य में यह चुनाव केवल एक पद के चयन का मामला नहीं रह जाता, बल्कि यह राजनीतिक संस्कृति, संवैधानिक मयार्दाओं और लोकतंत्र की दिशा पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। यदि संवैधानिक पदों पर राजनीति हावी हो जाती है, तो देश के संवैधानिक तंत्र की विश्वसनीयता खत्म होने लगती है। लोकतंत्र की आत्मा संविधान और उसके तंत्रों की स्वतंत्रता में निहित है। उपराष्ट्रपति चुनाव जैसे संवेदनशील अवसरों पर यदि राजनीतिक दबाव अधिक हो, तो यह केवल एक चुनाव नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नींव पर चोट होगी।
देश के संवैधानिक संस्थान कमजोर होंगे, निर्णयों में पारदर्शिता और निष्पक्षता का अभाव होगा, और जनता का विश्वास लोकतंत्र से कम होने लगेगा। ऐसे में इस चुनाव में पारदर्शिता, निष्पक्षता और संवैधानिक मयार्दाओं का सख्ती से पालन अनिवार्य हो जाता है। राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे इस पद को सत्ता के साधन के रूप में न देखें, बल्कि उसे लोकतंत्र के रक्षक के रूप में स्वीकार करें। उपराष्ट्रपति का कार्यभार उन लोगों को सौंपा जाना चाहिए जो संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को समझें और उसे बनाये रखने के लिए प्रतिबद्ध हों।
इस संघर्ष में नागरिक समाज, मीडिया और जनता की भूमिका अहम होती जा रही है। जब तक जनता संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और गरिमा के प्रति जागरूक नहीं होगी, तब तक राजनीतिक दल इस पर दबाव बनाए रखेंगे। समाचार माध्यमों को चाहिए कि वह केवल समाचार न प्रस्तुत करे, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं के साथ हो रहे अन्याय और राजनीतिक हस्तक्षेप को उजागर करके लोकतांत्रिक चेतना को मजबूत करे। जनता की सजगता ही अंतत: संवैधानिक संस्थाओं को बचा सकती है। 2025 के उपराष्ट्रपति चुनाव में इसीलिए न केवल राजनीतिक दलों के बीच टक्कर है, बल्कि संवैधानिक मयार्दाओं और लोकतंत्र की आत्मा के संरक्षण की लड़ाई है।
यह चुनाव दर्शाएगा कि क्या भारत के लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाएं अपने कर्तव्यों को स्वतंत्र रूप से पूरा कर सकेंगी, या वे राजनीतिक दबावों के कारण कमजोर पड़ जाएंगी। संविधान के मूल उद्देश्यों और लोकतंत्र की सर्वोच्चता के लिए यह आवश्यक है कि इस चुनाव को राजनीति से ऊपर उठकर देखा जाये। यह केवल एक व्यक्ति का चयन नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक आदर्श का चयन है। यदि हम इस अवसर को खो देते हैं, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए यह एक दुर्भाग्यपूर्ण युग का आरंभ होगा जब संवैधानिक संस्थाएं केवल सत्ता के अधीनस्थ ही रहेंगी।
इसलिए देश की राजनीतिक शक्ति, नागरिक समाज, और समाचार माध्यमों को मिलकर इस चुनाव को स्वतंत्र, निष्पक्ष और संवैधानिक मयार्दाओं के अनुरूप संपन्न कराने के लिए काम करना होगा। तभी भारत का लोकतंत्र अपने मूल स्वरूप में जीवित और मजबूत रह सकेगा। (लेखक एबीएन के प्रधान संपादक हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। श्रावण पूर्णिमा के दिन संस्कृत भाषा दिवस भी मनाया जाता है। इसे विश्व संस्कृत दिवस भी कहा जाता है। यह दिवस प्राचीन भारतीय भाषा संस्कृत के सम्मान में मनाया जाता है। श्रावण पूर्णिमा अर्थात् रक्षाबंधन के दिन को संस्कृत दिवस के रूप में मनाने का निर्णय भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने 1969 में लिया था। संस्कृत को देवों की भाषा कहा गया है और यह भारत की कई भाषाओं की जननी मानी जाती है।
श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन भारतीय संस्कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह केवल रक्षाबंधन का पर्व नहीं, बल्कि एक और दिव्य उद्देश्य से भी जुड़ा हुआ है — संस्कृत भाषा दिवस। हर वर्ष श्रावण पूर्णिमा के दिन संस्कृत दिवस के रूप में एक विशेष आयोजन अखिल भारतीय स्तर पर किया जाता है, जो हमें हमारी गौरवशाली भाषा, उसकी परंपराओं और उसके अमूल्य साहित्य की स्मृति दिलाता है।
संस्कृति और भाषा को जोड़ने वाले सूत्र को पुन: जागृत करना
उदाहरण रूप में - एक प्रेरणास्पद संस्कृत श्लोक है -
सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यमप्रियम।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात, एष धर्म: सनातन:॥
अर्थात सत्य बोलो, प्रिय बोलो। अप्रिय सत्य मत बोलो। प्रिय हो परंतु असत्य न बोलो- यही सनातन धर्म है।
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