विचार

View All
Published / 2021-04-29 14:14:27
कोरोना की विकरालता से डंटकर निपटना होगा

एबीएन डेस्क। देश में चल रही कोरोना की दूसरी लहर हर दिन विकराल होती जा रही है। पूरा देश इसकी चपेट में आ चुका है। नये कोरोना संक्रमण मरीज आने की संख्या के लिहाज से भारत दुनिया में पहले स्थान पर पहुंच गया है जो बहुत बड़ी चिंता की बात है। यदि कोरोना संक्रमित मरीजों का मिलने का सिलसिला इसी रफ्तार से बढ़ता रहा तो आने वाले कुछ दिनों में ही भारत में प्रतिदिन चार लाख से अधिक कोरोना मरीज मिलने लगेंगे। कोरोना के बढ़ते प्रभाव को काबू में करने के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास किए जाने लगे हैं। मगर सरकारी प्रयासों के बावजूद भी कोरोना संक्रमितो के आने की संख्या में कमी नहीं हो पा रही है। कोरोना विशेषज्ञों व वैज्ञानिकों का मानना है कि मई मध्य तक कोरोना का कहर पीक पर होगा। उसके बाद इसकी संख्या में कमी आनी शुरू होगी। लेकिन अभी अप्रैल में ही जब प्रतिदिन इतनी बड़ी संख्या में कोरोना पॉजिटिव लोग मिल रहे हैं तो मई में तो इनकी संख्या में बहुत अधिक बढ़ोतरी हो जाएगी। ऐसी स्थिति का मुकाबला करने के लिए सरकार को अभी से युद्ध स्तर पर काम करना चाहिये। कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या में बढ़ोतरी के साथ ही देश में आॅक्सीजन की भयंकर कमी महसूस की जा रही है। आॅक्सीजन की कमी के चलते कई स्थानों पर कोरोना संक्रमित लोगों की मौत भी हो चुकी है। जो सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है। हालांकि आॅक्सीजन संकट व्याप्त होते ही केंद्र सरकार ने शीघ्रता से आपदा नियंत्रण की दिशा में सार्थक कार्यवाही करते हुये पूरे देश में आॅक्सीजन उत्पादन संयंत्रों का केंद्रीकरण कर उसका राज्यवार आवंटन का कोटा तय किया ताकि देश के सभी राज्यों को समान रूप से आवश्यकतानुसार आॅक्सीजन गैस मिल सके। इसके साथ ही सरकार ने वायु सेना के विमानों के माध्यम से विदेशों से आॅक्सीजन के कंटेनर व आॅक्सीजन उत्पादन से संबंधित मशीनों का भी तेजी से आयात करना प्रारंभ कर दिया है। इसके साथ ही देश में आॅक्सीजन के टैंकरों को निर्धारित स्थान तक पहुंचाने के लिए वायु सेना के परिवहन विमानों व रेलवे की माल गाड़ियों का उपयोग किया जाने लगा। जिससे एक स्थान से दूसरे स्थान तक आॅक्सीजन तेजी से पहुंचने लगी। हालांकि आज भी देश में आवश्यकता अनुसार आॅक्सीजन उपलब्ध नहीं है। मगर केंद्र सरकार ने देश की जनता को आश्वस्त किया है कि जरूरत पड़ने पर विदेशों से भी आॅक्सीजन का आयात किया जाएगा और ऐसा किया भी जा रहा है। सरकार ने आॅक्सीजन के निर्यात पर पूर्णतया रोक लगा दी है। इसके साथ ही औद्योगिक इकाइयों में इस्तेमाल होने वाली आॅक्सीजन पर रोक लगाते हुए उसे अस्पतालों में भर्ती मरीजों के उपयोग में लाया जा रहा है। हाल ही में देश में उपजे आॅक्सीजन विवाद के चलते कई प्रदेशों में उच्च न्यायालय को दखल देना पड़ा। उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान सामने आया कि केंद्र सरकार द्वारा पिछले जनवरी माह में विभिन्न राज्यों के सरकारी अस्पतालों में आॅक्सीजन बनाने के प्लांट लगाने हेतु धनराशि जारी होने के उपरांत भी राज्य सरकारों द्वारा अभी तक आॅक्सीजन संयंत्र लगाने की दिशा में कोई कार्यवाही नहीं की गई। जबकि यदि समय रहते अस्पतालों में आॅक्सीजन प्लांट लगा लिए जाते तो आज देश को विकट स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता। कोरोना संक्रमण के बाद हालात ऐसे बन गए कि विकास कार्यों की बजाए सरकार को लोगों की जान बचाने की तरफ अधिक ध्यान देना चाहिए था। मगर ऐसा नहीं किया गया। आज भी केंद्र व राज्य सरकारें अस्पताल बनाने के स्थान पर नई सड़कें बनाने, नए पावर हाउस बनाने, नई बिजली की लाइनें डालने, नए भवन बनाने व सरकार से जुड़े लोगों को अधिकाधिक सुख सुविधाएं उपलब्ध करवाने पर अधिक ध्यान दे रही हैं। सरकारों का अधिकांश बजट भी इन्हीं सब कार्यों पर खर्च किया जा रहा है। जबकि कोरोना की पहली लहर के समय ही केंद्र व राज्य सरकारों को सचेत होकर भविष्य में लोगों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध करवाने पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए था। कहने को तो केंद्र सरकार व राज्य सरकारों ने अपने बजट में स्वास्थ्य के क्षेत्र में खर्च करने के लिए पहले से अधिक राशि का आवंटन किया है। मगर सरकारों को चाहिए था कि अधिक की बजाय सबसे अधिक राशि इस साल के बजट में चिकित्सा के क्षेत्र पर खर्च की जानी चाहिए थी। ताकि हमारी चिकित्सा व्यवस्था इतनी मजबूत हो सके कि हम आने वाली किसी भी बीमारी का अपने संसाधनों के बल पर सुदृढ़ता से मुकाबला कर सकें। देश में कोरोना की वैक्सीन लगाने का कार्य तेजी से चल रहा है। लेकिन उसमें भी केंद्र व राज्य सरकारों में टकराव देखने को मिल रहा है। राज्यों की मांग पर केंद्र सरकार ने 18 वर्ष से अधिक की उम्र के सभी लोगों को टीका लगवाने की इजाजत दे दी है। मगर उसके साथ ही केंद्र सरकार ने वैक्सीन उत्पादन करने वाली कंपनियों से आधा वैक्सीन केंद्र सरकार को व आधा वैक्सीन राज्य सरकारों व खुले बाजार में बेचने की छूट प्रदान कर दी है। उसमें कई राज्य सरकारें वैक्सीन का खर्च उठाने में असमर्थता जता रही हैं जिसको लेकर भी आए दिन आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं। इसके साथ ही सरकार को ऐसा नियम बनाना चाहिए कि सभी बड़े निजी अस्पतालों में भी आॅक्सीजन बनाने का संयंत्र लगाना आवश्यक हो ताकि आॅक्सीजन को लेकर जैसा संकट इस वक्त देश की जनता झेल रही है, वैसी स्थिति फिर कभी नहीं देखनी पड़े। देश में एम्स जैसे बड़े चिकित्सा संस्थान, मेडिकल कॉलेज और अधिक संख्या में स्थापित किए जाने चाहिए ताकि लोगों को अपने क्षेत्र में ही उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधा सुलभता से मिल सके।

Published / 2021-04-28 12:45:53
कोरोना वायरस के समय में समुचित नीति

एबीएन डेस्क। कोविड-19 महामारी के कारण अब तक दुनिया में 30 लाख से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। इसने दुनिया की अर्थव्यवस्था को भी लगभग तबाह ही कर दिया है। यह सही है कि अब दुनिया भर में टीकाकरण शुरू हो चुका है लेकिन संकट है कि समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा है। निश्चित तौर पर कोरोनावायरस के बदले हुए स्वरूप की यह लहर और कहीं अधिक खतरनाक हो सकती है। अलग-अलग देशों ने इस चुनौती से निपटने के लिए अलग-अलग रणनीति अपनाई है। ऐसे में यह देखना उचित होगा कि वे कौन से देश हैं जो महामारी से बेहतर तरीके से निपटने मेंं कामयाब रहे, कहां मौत के आंकड़े कम रखने में सफलता मिली, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराई गईं और आर्थिक नुकसान कम करने में कामयाबी हाथ लगी? विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से इसे महामारी करार देने के एक वर्ष बाद हम इसका उदाहरण हैं। यह केवल अकादमिक बहस नहीं है: नीति निमार्ताओं को मौजूदा हालात से निपटना होगा और उन्हें सन 2020 की सफलताओं और विफलताओं से सबक लेने की आवश्यकता है। अपेक्षाकृत कम मौतों और बेहतर आर्थिक स्थिरता के साथ जर्मनी, न्यूजीलैंड, जापान, वियतनाम, ताइवान और दक्षिण कोरिया सन 2020 से अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से निपटने में कामयाब रहे। जबकि अमेरिका, ब्राजील, इटली, ब्रिटेन और रूस में मौत के आंकड़े भी अधिक रहे और आर्थिक संकट भी अन्य देशों की तुलना में अधिक रहा। मौत के मामलों में भारत का प्रदर्शन बहुत खराब नहीं कहा जा सकता है। परंतु आर्थिक नुकसान के मामले में हम सबसे खराब प्रदर्शन वाले देशोंं में शुमार हैं। चीन में मौत तथा संक्रमितों के आंकड़ों के बारे में जान पाना कठिन है लेकिन वह अपने यहां आर्थिक गतिविधियों को ठीक रख पाने मेंकामयाब रहा है। पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के व्हार्टन स्कूल के समाजशास्त्री माउरो गुइलेन ने एक पर्चा लिखा है, द पॉलिटिक्स आॅफ पैनडेमिक्स: डेमोक्रेसी, स्टेट कैपिसिटी ऐंड इकनॉमिक इनेक्विलिटी। इसमें 146 देशों में सन 1990 के बाद से संक्रामक रोगों और उनके प्रबंधन पर नजर डाली गई है। उन्होंने इन विषयों पर तीन अध्ययन किए। पहले में सन 1990 और 2019 के बीच संक्रामक रोगों की आवृत्ति और इनके घातक होने का अध्ययन किया गया है। दूसरे में कोविड-19 के दौरान सरकारों की ओर से लगाए गए लॉकडाउन की गति और उसकी गंभीरता का अध्ययन है। तीसरा अध्ययन शारीरिक दूरी के मानकों के अनुपालन पर आधारित है। गुइलेन कहते हैं, लोकतांत्रिक देशों में, गहरी पारदर्शिता, जवाबदेही और जनता के विश्वास ने ऐसे रोगों की आवृत्ति और उनके घातक असर को सीमित किया है, इन्हें लेकर दी जाने वाली प्रतिक्रिया मेंं समय कम लगा है और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े उपायों को लेकर लोगों में अनुपालन की प्रवृत्ति बढ़ी है। खेद की बात यह है कि सालाना वैश्विक लोकतांत्रिक सूचकांक यह संकेत दे रहा है कि लोकतंत्र के स्तर मेंं गिरावट आ रही है। इससे अविश्वास का माहौल उत्पन्न हुआ है। इसका अर्थ यह है कि लोग शारीरिक दूरी का पालन करने, मास्क पहनने और टीका लगवाने से इनकार कर रहे हैं। एक अधिक दिलचस्प नतीजा यह है कि सरकार के स्वरूपों से ज्यादा आर्थिक असमानता ने ऐसी बीमारियों के प्रभाव को बढ़ाया है और क्वारंटीन, शारीरिक दूरी आदि के व्यापक अनुपालन पर भी असर डाला है। कम आय वाले लोगों के लिए काम करना मजबूरी है। उन्हें मामूली लक्षणों की अनदेखी करना और जांच से बचना आसान लगता है क्योंकि वे काम नहीं छोड़ सकते। इतना ही नहीं कम आय का संबंध कमजोर पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं तक अपर्याप्त पहुंच और भीड़भाड़ वाले इलाकों में बिना साफ सफाई के रहने से भी है। मजबूत सरकारी क्षमता और अच्छी नीति हमें खराब नतीजों से बचा सकती है और आय की असमानता में इजाफा भी रोक सकती है। गुइलेन का मानना है कि लोकतांत्रिक और अधिनायकवादी दोनों तरह के शासन जरूरी संसाधन और क्षमता के साथ-साथ आवश्यक संगठनात्मक ढांचा तैयार कर सकते हैं। कुछ भी हो, लोकतांत्रिक व्यवस्था हो अथवा नहीं लेकिन अगर असमानता अधिक हो तो परिणाम भी बुरे होते हैं। यह दलील मजबूत नजर आती है। अमेरिका, भारत और ब्राजील तीनों में असमानता का स्तर बहुत अधिक है। भारत के मामले में दुखद बात यह है कि लॉकडाउन के कारण आय का अंतर काफी बढ़ गया क्योंकि लाखों लोगों को रोजगार गंवाना पड़ा। अमेरिका इस मामले में खुशकिस्मत है क्योंकि वहां सत्ता परिवर्तन हो गया। इससे वहां अधिक बेहतर नीति लागू हुई। अमेरिका में राष्ट्रपति जो बाइडन के नेतृत्व वाले नए सत्ता प्रतिष्ठान ने एक प्रभावशाली टीकाकरण कार्यक्रम की शुरूआत की और प्रोत्साहन के चेकों के माध्यम से राहत में इजाफा किया। भारत में इस बात के प्रमाण हैं कि केंद्र सरकार ने टीकाकरण की प्रक्रिया को भी सहज तरीके से नहीं शुरू किया। अब राज्यों में टीकों की कमी हो गई है और केंद्र, राज्यों पर दोषारोपण कर रहा है। विभिन्न चरणों में चुनाव के आयोजन और असमय कुंभ मेले के लिए भी राजनीतिक कारण ही जिम्मेदार हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि इनके कारण संक्रमण में बेतहाशा वृद्धि होना तय है। आर्थिक मोर्चे पर मांग में जो भी सुधार हुआ है वह ईंधन पर भारी भरकम कर और सख्त वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था के बावजूद हुआ है। सन 2020 में लगाए गए लॉकडाउन ने आर्थिक गतिविधियों को बुरी तरह प्रभावित किया था और अगर दोबारा लॉकडाउन लगता है कि निम्र आय वर्ग वाले लोग मजबूर हो जाएंगे कि वे या तो भूखों मरें या फिर कानून तोड़ें और संक्रमण का खतरा बढ़ाएं। यह देखा जाना है कि क्या यह सरकार टीकाकरण में सुधार कर एक बेहतर प्रोत्साहन योजना पेश कर पाती है या नहीं।

Published / 2021-04-26 14:55:50
संवैधानिक मूल्यों पर आधारित हो राजनीति

एबीएन डेस्क। भले ही चुनावों को लेकर औपचारिक प्रावधान बरकरार हैं लेकिन भारतीय लोकतंत्र राजनीतिक संस्कृति के एक बड़े संकट का सामना कर रहा है। इस संकट में सत्ताधारी दल और विपक्ष के बीच के संवाद, एक विविधतापूर्ण समाज में बहुसंख्यकवाद की बढ़ती वैधता, मूल अधिकारों और कानून प्रवर्तन के प्रावधानों के प्रभाव को लेकर भरोसा कम होना, केंद्र सरकार द्वारा राज्यों के अधिकारों के अतिक्रमण के साथ संघवाद का क्षय, विकास संबंधी नीतियों का चुनावी नतीजों को लक्ष्य कर बनाया जाना आदि बातें शामिल हैं। भारतीय संविधान ने देश को धर्मनिरपेक्ष, उदार लोकतांत्रिक मूल्यों वाला बनाया और इसकी वजह थी विभाजन के सांप्रदायिक आधार को लेकर तीव्र प्रतिक्रिया। संविधान सभा की बहसों को पढ़ने से भी यह बात प्रमाणित होती है। नेहरू युग में इसका बचाव एक ऐसे नेता ने किया जो दिल से धर्मनिरपेक्ष था, संसदीय परंपरा की इज्जत करता था और लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका की भी। सच तो यह है कि सत्ताधारी दल स्वयं विविध हितों वाले लोगों का समूह था और इसलिए विचारधारा आधारित शासन रोकने में मदद मिली। आज जिस दल का सत्ता पर कब्जा है वह विचारधारा आधारित राजनीतिक शक्ति है। ऐसा नहीं है कि संसदीय परंपरा और विपक्ष का यह सम्मान नेहरू युग की खासियत रही। बहुत बाद में पीवी नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भी यह देखने को मिला। परंतु इन दिनों विपक्ष और सरकार के साथ रिश्तों की जो स्थिति है और कानून तथा नीतियां बनाने के पहले मशविरों के न होने ने भी उस विश्वास को कमजोर किया है जिसके आधार पर एक लोकतांत्रिक सरकार काम करती है। हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती है एक धर्मनिरपेक्ष और उदार लोकतांत्रिक देश के रूप में हमारे भविष्य में आस्था बहाल करना और विविधता को लेकर व्यापक सहिष्णुता। यह बात संविधान की बुनियाद में अंतर्निहित है जिसके तहत सार्वभौमिक मताधिकार से शासन चलता है। इसका अर्थ है धर्म, जातीय पहचान, भाषा, लिंग और अन्य विविधता वाली बातों की भरपूर इज्जत करना। सन 1940 के दशक में सार्वभौमिक मताधिकार के कारण समाज में समता की भावना पैदा हुई जबकि हमारा समाज ऐसा जहां पदसोपानिक असमानता सामाजिक ढांचे और व्यक्तिगत मनोविज्ञान में गहरे तक धंसी हुई है। इससे संबंधित निर्देश विभिन्न जिलों में पदस्थ सभी अफसरशाहों तक पहुंचाए गए कि ऐसी सार्वभौमिक मतदाता सूची तैयार की जाए। पहले से मौजूद मतदाता सूचियां प्राय: सार्वभौमिक नहीं होती थीं और समुदायों द्वारा तैयार की जाती थीं। अफसरशाहों ने इस आदेश को गंभीरता से लिया। उदाहरण के लिए तत्कालीन बंबई के जिला कलेक्टर ने पूछा कि सड़कों पर रहने वालों को कैसे छोड़ा जा सकता है जबकि उनका तो कोई स्थायी पता भी नहीं होता। मेरा मानना है कि अफसरशाहों ने तय किया कि उनकी सोने की जगह को ही उनका पता माना जाए। यह नियम अब भी जारी है। आज जरूरत इस बात की है कि हमारी अफसरशाही शासन के हर स्तर पर ऐसी ही प्रतिबद्धता दिखाए। सार्वभौमिक मताधिकार जैसा सिद्धांत तब कारगर नहीं है जब समाज के किसी एक समूह की वैचारिकी हावी हो। लोकतंत्र के समक्ष सबसे बड़ा खतरा बहुसंख्यकवादी अधिनायकवाद है। इससे बचने के लिए हमें ऐसी राजनीतिक संस्कृति और मीडिया की जरूरत है जो लोगों के बीच विश्वास बढ़ाए। सबसे पहले इस बात को चिह्नित करना होगा कि हम सब समान हैं और एक व्यक्ति का एक मत है। भले ही बहुसंख्यक वर्ग को जीत हासिल हो लेकिन अल्पसंख्यकों को भी अपने मतांतर के बचाव और संरक्षण का पूरा अधिकार है। यह भरोसा एक सक्रिय लोकतंत्र में पैदा होता है। दूसरी बात, इससे आगे यह भी कहा जा सकता है कि हर व्यक्ति अपना नजरिया पेश करने को स्वतंत्र है। इसका व्यावहारिक उदाहरण है लोकतंत्र में अल्पसंख्यक नजरिये को अभिव्यक्त करना। तीसरा, चरण एक कदम आगे का है जहां कोई व्यक्ति यह कह सकता है कि अगर मैं आपकी जगह रहूं तो ऐसा कहूंगा। ऐसी बातें एक लोकतांत्रिक देश में अल्पसंख्यकों के नजरिये को व्यवहार में जगह देती हैं। मिसाल के तौर पर विद्यालयों में माथे पर स्कार्फ लगाने की इजाजत देना। हमें आज ऐसी राजनीतिक संस्कृति की आवश्यकता है जिसमें सच्चाई, सम्मान, सभ्यता और संयम हों। यदि पुलिस कानून के बजाय अपने राजनीतिक आकाओं द्वारा तय नियमों का पालन करेगी तो ऐसा नहीं होगा। बहुसंख्यक वर्ग के निगरानी दस्ते अल्पसंख्यक प्रदर्शनकारियों को जिस प्रकार प्रताड़ित करते हैं और उन्हें जो बचाव प्राप्त है वह स्तब्ध करने वाला है। पुलिस की कार्यप्रणाली को निष्पक्ष बनाने के अलावा हमें गैर सरकारी संस्थानों के अहम तत्त्वों में भी नई ऊर्जा का संचार करना होगा ताकि लोग साथी नागरिकों के साथ नैतिक बंधन महसूस कर सकें। देश में विविधता के सम्मान का एक अर्थ संघवाद का सम्मान करना भी होना चाहिए। संविधान में केंद्र सरकार शब्द का प्रयोग नहीं किया गया। इसके लिए संघीय सरकार का इस्तेमाल किया गया है जो संविधान में संघवाद पर जोर को उजागर करता है। संभवत: संघवाद का सबसे अहम पहलू जिसमें सुधार की जरूरत है वह है राज्यपालों की नियुक्ति। सरकारिया आयोग ने इसे लेकर कुछ अनुशंसाएं कीं लेकिन उनका पालन नहीं किया गया और हम एक ऐसी व्यवस्था में उलझ गए हैं जहां केंद्र सरकार अपने दल के वफादारों को राज्यपाल बनाकर राज्य सरकारों के कामकाज में बाधा डाल सकती है। परंतु ऐसे भी क्षेत्र हैं जहां सुधार की जरूरत है। मसलन राज्य सूची के विषयों में केंद्र समर्थित योजनाओं का विस्तार। जो लोगों की पसंद के मुताबिक उन्हें घरेलू गैस, बिजली, खाने-पीने की वस्तुएं, स्वास्थ्य सेवा (खासकर मौजूदा कोविड महामारी जैसी आपात स्थितियों में) जैसी सुविधाएं देती है। इसमें कुछ भी अवांछित नहीं है और यह वह तरीका है जिसका इस्तेमाल अमीरों ने हमेशा अपने हितों के बचाव में किया है। अच्छी दीर्घकालिक कल्याण नीति एक कदम आगे की होगी।

Published / 2021-04-16 14:03:07
श्रमिक की उत्पादकता भी बढ़ायें लेबर कोड

एबीएन डेस्क। वर्तमान में देश में लगभग 40 श्रम कानून लागू हैं। सरकार ने इन्हें समेट कर 4 लेबर कोड में संकलित कर दिया है। इन नये कानूनों को एक अप्रैल से लागू होना था, जिसे सरकार ने चुनाव के कारण कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया है। चुनाव के बाद इन्हें शीघ्र ही लागू किये जाने की पूरी संभावना है। इन लेबर कोड को बनाने के पीछे सरकार की मंशा श्रम कानूनों को सरल करने की थी, जिससे कि देश के उद्यमियों के लिए श्रमिकों को रोजगार देना आसान हो जाए और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में अधिक संख्या में रोजगार उत्पन्न हो सकें। लेबर कोड के प्रावधानों में कुछ श्रमिकों के पक्ष में हैं तो कुछ उनके विपरीत हैं। जैसे यदि किसी श्रमिक को कोई आरोप लगाकर मुअत्तल किया जाता है तो अब व्यवस्था कर दी गयी है कि 90 दिन में उसकी जांच पूरी की जायेगी। पूर्व में ग्रेच्युटी कई वर्षों के बाद लागू होती थी, जिसे अब एक वर्ष के बाद लागू कर दिया गया है। अल्पकाल के लिए रखे गये श्रमिकों को अब वे सभी सुविधाएं उपलब्ध होंगी जो स्थाई श्रमिकों को उपलब्ध हैं। ये प्रावधान श्रमिकों के हित में हैं।इसके विपरीत उद्यमों को बंद करने अथवा श्रमिकों की छंटनी करने के लिए पूर्व में 100 से अधिक श्रमिकों को रोजगार देने वाली कम्पनियों के लिए सरकार से अनुमति लेनी जरूरी थी। अब इसे 300 से अधिक श्रमिकों को रोजगार देने वाली कम्पनियों पर लागू किया गया है। 100 से 300 श्रमिकों को रोजगार देने वाली कम्पनियों को सरकार से अनुमति लेने से मुक्त कर दिया गया है। यह श्रमिकों के विपरीत है। इस प्रकार नया लेबर कोड मिश्रित है। देखना यह है कि नये लेबर कोड से रोजगार उत्पन्न करने को कितना प्रोत्साहन दिया जाएगा? इसके लिए हमें समझना होगा कि उद्यमी द्वारा रोजगार किन परिस्थितियों में उत्पन्न किये जाते हैं। उद्यमी को सस्ता माल बनाना होता है, जिससे कि वह बाजार में अपना माल बेच सके। सस्ता माल बनाने के लिए जरूरी है कि वह उत्पादन में श्रम की लागत को कम करे। उसके लिए जरूरी है कि वह श्रम की उत्पादकता बढ़ाये, यानी एक श्रमिक से ही पूर्व की तुलना में अधिक उत्पादन कराए। जैसे एक श्रमिक पूर्व में 10 मीटर कपड़ा एक दिन में बुनाई करता था वही श्रमिक यदि अब 20 मीटर कपड़ा बुनाई करने लगे तो उद्यमी की उत्पादन लागत कम हो जाती है और वह बाजार में अपने सस्ते माल को बेच पाता है। लेकिन अधिक उत्पादन करने के कारण अब कम श्रमिकों की जरूरत पड़ती है। मान लीजिये पूर्व में उद्यमी प्रतिदिन 100 मीटर कपड़ा एक दिन में बेच पाता था और वह 10 मीटर प्रति श्रमिक की दर से 10 श्रमिकों को रोजगार देता था। उत्पादकता बढ़ाने के बाद उसी 100 मीटर कपड़े का उत्पादन करने के लिए अब 20 मीटर प्रति श्रमिक की दर से उसे केवल पांच श्रमिकों की जरूरत होगी। इस प्रकार सस्ते माल और रोजगार के बीच सीधा अन्तर्विरोध है। यदि माल सस्ता बनाते हैं तो रोजगार कम होते है। चीन का माडल इससे भिन्न था जो विशेष परिस्थितियों में लागू हुआ था। चीन ने श्रमिक की उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ अपने बाजार का भारी विस्तार किया। जैसे मान लीजिये पूर्व में चीन में एक श्रमिक 10 मीटर कपड़े की बुनाई करता था, उत्पादकता बढ़ाने के बाद वह 20 मीटर कपड़ा बुनने लगा। लेकिन इसी अवधि में चीन का बाजार 100 मीटर से बढ़कर 400 मीटर हो गया तो 400 मीटर कपड़े का उत्पादन करने के लिए बढ़ी हुई उत्पादकता के बावजूद 20 श्रमिकों की जरूरत पड़ेगी। 20 श्रमिक 20 मीटर कपड़ा प्रतिदिन बुनेंगे तब 400 मीटर कपड़े का उत्पादन होगा। इस प्रकार यदि बाजार का भारी विस्तार होता रहे तो श्रमिक की उत्पादकता के बढ़ने के साथ-साथ रोजगार भी बढ़ सकते हैं। लेकिन यह विशेष परिस्थिति थी जब चीन ने विश्व बाजार पर अपना प्रभुत्व बनाया था। यदि बाजार का तीव्र विस्तार न हो तो उत्पादकता बढ़ने के साथ-साथ रोजगार के बढ़ने की संख्या निश्चित रूप से घटेगी। कटु सत्य यह है कि यदि श्रम की उत्पादकता बढ़ाई जाती है तो सीमित बाजार होने के कारण रोजगार घटते हैं और यदि श्रम की उत्पादकता नहीं बढ़ाई जाती है तो उद्यमी के लिए श्रम के स्थान पर मशीन का उपयोग करना लाभप्रद हो जाता है और पुन: रोजगार में गिरावट आती है। इन दोनों कठिन विकल्पों के बीच हमें श्रम की उत्पादकता तो बढ़ानी ही पड़ेगी। यदि श्रम की उत्पादकता नहीं बढ़ाई जायेगी तो उद्यमी स्वचालित मशीनों का उपयोग करेगा और श्रमिक पूरी तरह बाजार से बाहर हो जाएगा। श्रम की उत्पादकता बढ़ाने के दो प्रमुख उपाय हैं। एक यह कि उत्तम मशीनों का उपयोग किया जाये, जिससे कि उसी कुशलता के स्तर का श्रमिक अधिक उत्पादन कर सके। दूसरा यह है कि श्रमिक की कुशलता में विस्तार किया जाए। अक्सर उद्योगों में देखा जाता है कि श्रमिक पूरी तत्परता और मनोयोग से काम नहीं करते। वर्तमान श्रम कानून में व्यवस्था है कि यदि कोई उद्यमी श्रमिक को बर्खास्त करना चाहे तो उसे प्राकृतिक न्याय के अनुरूप उसकी सुनवाई करनी होती है और उसके बाद श्रम न्यायालय में उसका विवाद चलता है, जिस भय के कारण उद्यमी अक्सर श्रमिक को रखना ही नहीं चाहते। लेबर कोड ने श्रम कानून की इस बाधा को दूर नहीं किया है। पश्चिमी देशों में उद्यमी को छूट है कि वह अपनी मर्जी से श्रमिकों को रख सकता है अथवा बर्खास्त कर सकता है। इसलिए पश्चिमी देशों में उद्यमी के लिए कुशल श्रमिक को रखना और अकुशल श्रमिक को बर्खास्त करना, दोनों ही आसान हैं। श्रम कानून में इस दिशा में कोई सुधार नहीं किया गया है। इसलिए यह लेबर कोड नये रोजगार उत्पन्न करने में सहायक नहीं होगा। अपने देश के श्रमिक चीन आदि देशों के श्रमिकों की तुलना में अकुशल हैं और उनकी कुशलता में सुधार करने के लिए लेबर कोड असफल है। ऐसे में अपने देश में श्रम की उत्पादकता न्यून स्तर पर बनी रहेगी, उद्यमी अधिकाधिक मशीनों का उपयोग करते रहेंगे और हमारे श्रमिकों के रोजगार के अवसर घटते ही जायेंगे। इस दिशा में लेबर कोड में मूल चिन्तन बदलने की जरूरत है।

Published / 2021-04-15 12:05:30
प्रकृति संरक्षण का संदेश देता सरहुल पर्व

सरहुल झारखंड में मनाया जाने वाला किया जाने वाला एक प्रमुख त्योहार है। इस त्योहार को झारखंड में जनजातियों के साथ सदानों में भी मनाने की परंपरा है। इसमें मुख्यत: साल वृक्ष की पूजा होती है। पूजा में सखुए का फूल प्रयोग में लाया जाता है। यह त्योहार स्थान विषेष पर अलग-अलग दिनों में मनाया जाता है परंतु विगत कुछ दषकों से त्योहार में एक रूपता लाने के लिए विषेष रूप चैत महीने के शुुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने लगा है। सरहुल पर्व के दिन षोभायात्रा निकालने की परंपरा भी चल पड़ी है। सरहुल पर्व चैत महीने (मार्च-अप्रैल) के पहली तिथि से षुरू होकर बैशाख पूर्णिमा तक मनाया जाता है। इसे झारखंड की प्राय: प्रत्येक जनजातियों में अलग अलग नामों से जाना जाता है। कुड़ुख में खद्दी, मुण्डारी में बा, सथाली में बाहा, खड़िया में जंकोर और हो में बाह्य पर्व कहते हैं। हो की बाह्य, मुंडारी की बा, संथाल की बाहा, खड़िया की जंकोर, एवं कुड़ुख की खद्दी पर्व का अर्थ सरई फूल है। इस तरह कहा जा सकता है कि सरहुल फूलों का त्योहार है। यह प्रकृति के नव स्वरूप के उत्सव का त्योहार है। यहाँ की जनजातीय समुदाय में इस त्योहार के बाद ही नये फल-फूल का सेवन आरंभ होता है। यह जनजातियों के लिए नव वर्ष है। इस त्योहार के साथ ही जनजातीय समुदाय में नव वर्ष का आगाज भी होता है। हो समुदाय सरहुल पर्व की षुरूआत होली के आस पास से ही करता है। इस समुदाय में सरहुल पूजा में अपने पूर्वजों की भी पूजा की जाती है। पूर्वजों की पूजा के साथ आम और महुआ फूल की भी पूजा करते हैं। पूजा के बाद ही नये फलों का सेवन आरंभ होता है। हो समुदाय में सरहुल पर्व के अवसर पर युवक-युवतियां एक साथ जोड़ कर नृत्य नहीं करते हैं। लड़के सिर्फ वाद्य-यंत्रों के माध्यम से युवतियों का साथ देते हैं। रांची वीमेंस कॉलेज के हो भाषा के सहायक प्राध्यापक विजय सिंह गागराई ने बताया कि हो जनजातियों में बाह्य पर्व का महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने सरहुल पर्व पर हो समुदाय में गाया जाने वाला एक गीत बताया- एलागो सारजोम बाड़ा एलागो नाड़ादुन बेन, देलागो सारजोम बाड़ा देलागो नोसोरेन बेन ओअ: दोको सरिल तडा देलागो नोसोरेन बेन रचा दोको गुरि: तडा एलागो नाड़ादुन बेन लुकु बुड़ा गोआरितना देलागो नोसोरेन बेन लुकु बुड़ि गेरंतना एलागो नाड़ादुन बेन।। संथाल समुदाय में भी सरहुल पर्व होली के आस पास से ही अरंभ होता है। जाहेर में नायके सरहुल पूजा संपादित करते हैं। पूजा के बाद एक साथ मिलकर नृत्य किया जाता है। संथालों में भी सरहुल के बाद ही नये फल-फूलों का सेवन किया जाता है। खड़िया समुदाय में सरहुल पर्व होली के दिन ही मनाया जाता है। कालो (पुजारी) पूजा संपन्न कराते हैं। इसके बाद प्रसाद के रूप में लेटो (खिचड़ी) ग्रहण किया जाता है। खड़िया समुदाय में सखुए के फूल को जंकोर कहते हैं और पेड़ को दारू कहा जाता है। मुण्डा समुदाय में भी होली के बाद से ही सरहुल मनाया जाता है। पहान पुजा कराते हैं। इस समुदाय में भी सरहुल के दिन लेटो खाया जाता है। कुड़ुख समुदाय में सरहुल पर्व का बड़ा ही महत्व है। फागुन कटने के बाद इस समुदाय के लोग सरहुल पर्व मनाना प्रारंभ करते हैं। कुड़ुख समुदाय में बैषाख पूर्णिमा तक सरहुल पर्व मनाय जाता है। इस त्योहार को धरती और सूर्य के विवाह के रूप में मनाया जाता है। यह त्योहार सृष्टि से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए कुड़ुख समुदाय के लोग इस त्योहार को खेखे़ल बेंज्जा कहते हैं। सरहुल पूजा से पहले इस समुदाय में नये फल-फूलों के सेवन पर प्रतिबंध रहता है। इसके पीछे भी वैज्ञानिक कारण है। इस त्योहार में सखुए फूल का बड़ा महत्व है। उरांव समुदाय में सखुए के फूल को नौर पूंप कहा जाता है। उराँव समुदाय में सरहुल से संबंधित एक गीत इस प्रकार है- हरे टोड़ंग नू एंदेर पूंप पूंइदा गोटा टोड़ंग पंडरू इथिरिई हरे टोड़ंग नू नौर पंूप पंूइदा गोटा टोड़ंग पंडरू इथिरिई सरहुल प्रकृति से जुड़ा एक महान पर्व है। यह सृष्टि को आगे बढ़ाने के लिए पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है। इस त्योहार की प्रसांगिकता आज कोरोना महामारी के दौर में और भी अधिक हो गयी है। जब पूरा विश्व कोरोना महामारी के भयंकर परिणाम से जूझ रहा है तो यह त्योहार हमें प्रकृति की गोद में लौटने को कह रहा है। सरहुल के पहले नये फल-फूलों का सेवन नहीं करके आदिवासी समुदाय पर्यावरण की रक्षा का बहुत बड़ा संदेश देते हैं। जब तक फूल, पत्ते और फल बालिग नहीं हो जाते हैं तब तक यह समुदाय इनका सेवन करना अपराध मानता है। जियो और जीने दो के सिद्धांत का इससे उत्तम उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है। पेड़-पौधों के महत्व को इनके पूर्वज हजारों साल पहले समझ गये थे। इसका उत्तम उदाहरण हजारों वर्ष पहले से मनाया जाने वाला यह सरहुल पर्व है। पूरी दुनिया में पर्यावरण की सुरक्षा, सरंक्षण, विकास और जीवन मूल्यों में शामिल किये जाने की यह बड़ी परम्परा का वाहक परम्परा है। इस पर्व के महत्व को सबसे पहले आदिवासी समाज ने ही समझा था। पर्यावरण ही जीवन श्रोत है इस बात का संदेश सरहुल ही देता है। झारखंड का यह प्रमुख पर्व है जिसे कोरोना काल में हम जितनी सादगी से मनायेंगे उतना ही बेहतर संदेश जाएगा। (लेखक नागपुरी विभाग, गोस्सनर कॉलेज रांची के विभागध्यक्ष हैं।)

Published / 2021-04-13 14:03:57
आप हिंदू राष्ट्रवादी और आंबेडकरवादी दोनों हैं

एबीएन डेस्क। डॉ भीमराव आंबेडकर ने 1938 में मनमाड रेलवे वर्कर्स कॉन्फ्रेंस में कहा था, मुझे धर्म के प्रति युवाओं की बढ़ती उदासीनता को देख कर पीड़ा होती है। धर्म कोई अफीम नहीं है। जैसा कि कुछ लोग मानते हैं। मुझमें जो कुछ भी अच्छा है या मेरी शिक्षा से समाज का जो भी भला होता है, मैं उसका श्रेय अपने अंदर की धार्मिक भावनाओं को देता हूं। यह कथन उन लोगों को चौंकाने वाला लग सकता है जो कि आंबेडकर को पढ़े बिना आंबेडकरवाद का अनुसरण करते हैं। ये स्थिति इसलिए है क्योंकि भारत के वामपंथी आंबेडकरवादी कार्यकतार्ओं ने उन्हें धर्म के विरोधी के रूप में चित्रित कर रखा है। जबकि आंबेडकर कार्ल मार्क्स जैसे नहीं थे। इसलिए एक व्यक्ति बिना किसी विरोधाभास के एक ही साथ तीनों हो सकता है एक हिंदू, एक राष्ट्रवादी और एक आंबेडकरवादी। यह बात उस वैचारिक कथानक के बिल्कुल विपरीत है. जो कि एक झूठे विचार की वकालत करता है कि आंबेडकर के विचार और राष्ट्रवाद एक साथ नहीं रह सकते। आंबेडकर ने धर्म को बहुत महत्व दिया था, और यह बात उनकी विरासत पर एकाधिकार की हसरत रखने वाले साम्यवादियों की आज की पीढ़ी को रास नहीं आएगी.शांतिपूर्ण विरोध के जरिए दलित वर्ग के मंदिर प्रवेश की हिमायत करना आंबेडकर की विशेषता थी। तमिलनाडु में पेरियार के अनुयायी बड़ी अस्पष्टता की स्थिति निर्मित करते हैं। जबकि एक तरफ तो वे हिंदू प्रतिष्ठानों के तर्कहीन उन्मूलन का समर्थन करते हैं, पर साथ ही वे आंबेडकरवादी होने का दावा भी करते हैं। अपने जीवन के निर्णायक चरण में आंबेडकर धर्मांतरण के सवाल से जूझ रहे थे। धर्मशास्त्र संबंधी गहन विद्वता के मद्देनजर, वह तमाम भारतीय धर्मों की ताकतों और कमजोरियों को लेकर आश्वस्त थे। कोई दृढ़ कारण जरूर रहा होगा कि बहुत सोच-विचार और विभिन्न धार्मिक नेताओं से चर्चा के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म को अपनाया, जिसे आमतौर पर हिंदू धर्म की ही एक शाखा के रूप में देखा जाता है। क्या वह इस्लाम या ईसाई जैसे गैर-भारतीय धर्म को अपनाने के संभावित परिणामों से बचना चाहते थे? सामाजिक इतिहासकारों को इस सवाल पर रोशनी डालनी चाहिए, इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। आंबेडकर के विचार जाति संघर्ष की उपज थे। उनका जीवन इस निरंतर संघर्ष का प्रमाण है। पर जाति के खिलाफ अपने वैचारिक रुख के कारण आंबेडकर को पूर्वाग्रहों का भी सामना करना पड़ा, यहां तक कि साम्यवादियों से भी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) की केंद्रीय कमेटी ने 1952 में आंबेडकर की अगुआई वाले संगठन अनुसूचित जाति महासंघ (एससीएफ) के खिलाफ एक विशेष प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें कहा गया था कि आर्थिक बेहतरी और सामाजिक बराबरी की आकांक्षा को उनके साम्राज्य-समर्थक और अवसरवादी नेता डॉ. आंबेडकर ने एक विकृत और अवरोधकारी रूप दे दिया है, जिन्होंने कि उनको एससीएफ में सांप्रदायिक और जाति-विरोधी हिंदुओं के तौर पर संगठित किया है। चुनाव के साथ भयादोहन भी आता है आरक्षण, हिंदुत्व और सामाजिक न्याय के लिए संवैधानिक गारंटियों को लेकर। पर, ये कांग्रेस पार्टी ही है जिसने स्वतंत्रता सेनानी और दलितों के सबसे बड़े नेताओं में से एक बाबू जगजीवन राम को कभी भी पार्टी या सरकार में सम्मानजनक पद नहीं दिया. आखिरकार, जगजीवन राम को पार्टी से अलग होना पड़ा था। वे जनता पार्टी में शामिल हो गए और अंतत: जनसंघ समर्थित जनता पार्टी सरकार में उप-प्रधानमंत्री बने। एक दलित नेता के रूप में बाबू जगजीवन राम वामपंथियों के कथानक में फिट नहीं बैठते थे, क्योंकि वह एक समर्पित हिंदू थे। जिन्होंने हिंदू धर्म में रहते हुए इसकी बुराइयों का मुकाबला करने के विकल्प को चुना। कांशीराम और मायावती ने भी किसी अन्य धर्म को नहीं अपनाया। दलित आस्थावान हिंदू होते हैं। परंतु, भारतीय राजनीतिक इतिहास में किसी राष्ट्रीय दल की कमान संभालने वाला पहला दलित बंगारू लक्ष्मण बने, जो 2000 से 2001 तक भाजपा के अध्यक्ष रहे थे. भाजपा की ही अगुआई वाली एनडीए सरकार के कार्यकाल में जीएमसी बालायोगी, एक वकील, लोकसभा का पहला दलित स्पीकर बने थे। और एक बार फिर भाजपा ने ही रामनाथ कोविंद के रूप में भारत को पहला दलित राष्ट्रपति दिया। (भारत के दसवें राष्ट्रपति केआर नारायणन एक दलित-ईसाई थे.) इस समय सर्वाधिक दलित सांसद भाजपा से ही हैं। आंबेडकर ने लिखा था, जातीय रूप से हर व्यक्ति परस्पर भिन्न है। एकरूपता का आधार तो सांस्कृतिक एकता है। इस बात को मानते हुए, मैं यह कहना चाहूंगा कि सांस्कृतिक एकता में कोई भी देश भारतीय प्रायद्वीप की बराबरी नहीं कर सकता है। इस संदर्भ में संस्कृति की बारीकी से व्याख्या करने पर हमारी कालातीत सभ्यतामूलक अंत:चेतना सामने आती है जो कि युगों की कसौटी पर खरी उतरी है। आंबेडकर की बुनियाद भारतीय सभ्यता और संस्कृति में थी। ये भी कहा जाता है कि आंबेडकर संस्कृत को भारत की आधिकारिक भाषा बनाने के प्रस्ताव के पक्ष में थे। वह हमारी सांस्कृति समृद्धि का हवाला देते रहते थे। मौजूदा वक़्त आंबेडकर के व्यक्तित्व के विविध पहलुओं के ईमानदार विश्लेषण का है। और आंबेडकर जयंती (14 अप्रैल) उनकी विरासत को लेकर एक नया, निष्पक्ष और रचनात्मक सार्वजनिक संवाद शुरू करने का उचित अवसर है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर आंबेडकर की पकड़, चीन को लेकर उनकी चेतावनी, और अर्थशास्त्र में उनकी असाधारण विद्वता को मौजूदा पीढ़ी के सामने लाया जाना चाहिए। आंबेडकर को मात्र सामाजिक न्याय का योद्धा और एक विशिष्ट दलित नेता के रूप में देखना उनकी विरासत के साथ बड़ा अन्याय होगा।

Published / 2021-04-12 13:26:25
एनपीए से जूझ रहे बैंक बने बैड बैंक

एबीएन डेस्क। पिछले लंबे समय से एनपीए (नॉन परफार्मिंग एस्सेट्स) की समस्या से जूझ रहे बैंकों की मुश्किलों को आसान करने के तमाम प्रयास चल रहे हैं। फरवरी माह में केन्द्रीय बजट में सुझाया गया एस्सेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी (एआरसी), यानी बैड बैंक का प्रावधान भी उसी शृंखला में इस समस्या के समाधान का एक और प्रयास कहा जा सकता है। सबसे पहले सरकार इन्सालवेंसी एवं बैंकरप्सी (आईबीसी) एक्ट लेकर आई और पहली बार दिवालियापन के लिए कोई ठोस कानूनी पहल की गई। माना गया कि इससे ईज आफ डूईंग बिजनेस में सुधार होगा, क्योंकि नुकसान के कारण देनदारिया चुका नहीं पाने की स्थिति में परिसंपत्तियों को आसानी से बेचकर व्यक्ति छुटकारा पा सकता है, लेकिन साथ ही इसका लाभ यह था कि बैंकों के लिए भी अपनी बैलेंस शीट साफ रखना संभव हो पाएगा। उसके उपरांत देखा गया कि पिछली सरकारों के समय दिए गए कर्ज की अदायगी में कोताही होने के कारण बैंकों की आर्थिक हालत बिगड़ने के कारण उन्हें पूंजीगत मदद की भी जरूरत है। ऐसे में अधिकांश बैंक सरकारी क्षेत्र में होने के कारण उनकी पूंजीगत जरूरतों की पूर्ति हेतु भी सरकार को ही मदद देनी जरूरी थी। केन्द्र ने पिछले वर्षों में अपने खजाने से अभी तक 2.5 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया है ताकि बैंकों के घाटे की भरपाई हो सके। हालांकि इन सभी प्रयासों से बैंकों को डूबने से तो बचा लिया गया, लेकिन उनकी एनपीए की समस्या बदस्तूर बनी रही। हालांकि बैंकों के एनपीए जो 2017-18 तक आते-आते 11.2 प्रतिशत तक पहुंच गए थे, सितंबर 2020 तक वे 7.5 प्रतिशत तक कम हो गए थे, लेकिन पिछले वर्ष में कोविड महामारी के कारण व्यवसायों को नुकसान के चलते ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि सितंबर 2021 तक वे फिर से बढ़ जाएंगे। रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट के हवाले से पता चलता है कि वे 13.5 प्रतिशत तक भी बढ़ सकते हैं। हालांकि कोर्ट के आदेश के अनुसार जिन ऋणों की अदायगी कोरोना के चलते आगे बढ़ा दिया गया था, उच्चतम न्यायालय ने उन ऋणों को एनपीए घोषित करने के लिए रोक लगा दी थी, लेकिन अब चूंकि न्यायालय ने इस रोक को हटा दिया है, अब बैंकों को उन ऋणों जिनकी वापसी नहीं हो रही, को एनपीए घोषित करना पड़ेगा। इससे एनपीए की प्रमाण में भारी वृद्धि हो सकती है। जानकारों का मानना है कि कोविड के कारण उत्पन्न अन्य समस्याओं का भी प्रभाव एनपीए पर पड़ सकता है। वर्ष 2021-22 का बजट प्रस्तुत करते हुए वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने बैंकों की एनपीए की समस्या से निपटने के लिए एआरसी यानी बैड बैंक का प्रस्ताव रखा है। बैंकों की विषम एनपीए स्थिति के चलते पहले से ही बैड बैंक का प्रस्ताव आर्थिक जगत से जुड़े लोगों की ओर से आ रहा था। चूंकि भविष्य में एनपीए की समस्या बढ़ सकती है, ऐसे में बैड बैंक की अवधारणा और उससे जुड़े अन्य पहलुओं की जांच जरूरी हो जाती है कि क्या बैड बैंक बैंकों को उनकी समस्याओं से निजात दिला सकेगा। बैड बैंक की अवधारणा विदेशों से आई है। गौरतलब है कि जब अमेरिका में 2007-08 में बैंक धराशायी हो रहे थे, उस समय अमेरिका के राजस्व विभाग ने बैंकों के उन ऋणों को खरीद लिया, जिनकी वापसी नहीं हो पा रही थी। बाद में बाजार स्थितियां ठीक होने के बाद उन्हें बाजार में बेहतर कीमत पर बेच दिया। पूर्ण लॉकडाउन की तरफ न बढ़े देश लगभग वैसा ही कदम भारत सरकार भी उठाने जा रही है, जिसे एआरसी का नाम दिया गया है। यह कंपनी सेक्यूरटाइजेशन एंड रिकंस्ट्रक्शन एंड एनफोर्समेंट और सेक्यूरिटीज इंटरेस्ट एक्ट (सरफायेसी एक्ट) 2002 के अंतर्गत स्थापित होगी। इस एआरसी की स्थापना हेतु उस कंपनी के पास स्वयं स्वामित्व की 100 करोड़ की राशि का फंड होना जरूरी है। जिन दबावग्रस्त परिसंपत्तियों को यह कंपनी खरीदेगी, उसके 15 प्रतिशत के बराबर उसके पास पूंजी अनुपात का होना जरूरी होगा। यह एआरसी बैंकों के पास दबावग्रस्त परिसंपत्तियों को उचित कीमत पर खरीदेगी। बैंकों को उस परिसंपत्ति के मूल्य का 15 प्रतिशत नकद प्राप्त होगा और शेष 85 प्रतिशत राशि उसे बॉन्ड और ऋण पत्र के रूप में प्राप्त होगी, जिसकी देयता अधिकतम 6 वर्ष की होगी। अपने कार्य को करने हेतु एआरसी डिबेंचर और बॉन्ड तो जारी कर ही सकता है, इसके साथ वह प्रतिभूति (सिक्योरिटी) रसीद भी जारी कर सकता है। सिक्योरिटी रसीद धारक के पास उस वित्तीय परिसंपत्ति का अधिकार होगा। वित्त की मदद से बैड बैंक (एआरसी) दबावग्रस्त ऋणों को खरीद सकेगा। इन दबावग्रस्त ऋणों को बट्टे पर खरीदने के बाद एआरसी के पास वो तमाम अधिकार होंगे जो बैंक के पास थे। यानी वह उन ऋणों का पुनर्गठन या पुनर्निर्धारण कर सकता है, समाधन कर सकता है, ऋणी के व्यवसाय को बेच सकता है या लीज पर दे सकता है अथवा प्रबंधन को बदल सकता है, लेकिन इस प्रकार की कार्यवाही को अंजाम देने के लिए ऋण दाताओं के 75 प्रतिशत और एआरसी की सहमति जरूरी होगी। यदि ऋण प्रतिभूति रहित है तो ऐसी हालत में ऋणी पर मुकदमा करने का भी अधिकार एआरसी के पास रहेगा। यह भी प्रश्न उठता है कि इंसोलवेंसी और बैकरप्सी कोड और एआरसी में अंतर क्या है? दोनों में ही अंतोत्गत्वा उद्देश्य एनपीए से छुटकारा पाना ही है, लेकिन समझना होगा कि आईबीसी उधारी के समाधान के लिए बनाया गया है। गौरतलब है कि आईबीसी से पहले इस काम को वर्षों लग जाते थे। दूसरी तरफ एआरसी का मकसद एनपीए ऋणों को बेचकर बैंकों की बैलेंस शीट को जल्द साफ करने का है, लेकिन देखा जाए तो दोनों के माध्यम से बैंकों की समस्याओं को कम करने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन आलोचकों का मानना है कि बैड बैंक से भी एनपीए की समस्या का समाधान नहीं होने वाला। अधिकांश बैंक सरकारी क्षेत्र में हैं और एआरसी भी सरकारी स्वामित्व में होंगे। लेकिन समझना होगा कि बैंकों के आत्मविश्वास को बढ़ाने हेतु उनके एनपीए का हस्तांतरण दूसरी संस्था को करना एक अच्छा कदम हो सकता है।

Published / 2021-04-10 14:39:09
भारत कर वसूली में आगे, नागरिक सुविधा में पीछे

एबीएन डेस्क (डॉ नीलम महेंद्र)। कर प्रणाली की बात करें तो मनुस्मृति और वेदों से लेकर कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इसका स्पष्ट एवं सुव्यवस्थित उल्लेख मिलता है। भारत के प्राचीन ग्रंथों में राजा के द्वारा लिए गए कर एवं राजस्व पद्धति की व्याख्या राजा के शासन संबंधी सेवाओं के वेतन के रूप में किया गया था। वैदिक काल में भी ग्राम वासियों द्वारा कृषि एवं पशु संपति पर एक निर्धारित राशि बलि के रूप में चुकाई जाती थी। कृषकों से प्राप्त राशि को बलि तथा विक्रय वस्तु से प्राप्त राशि को शुल्क कहा जाता था जो सामान्यत: उसके मूल्य का छटवां अथवा आठवां हिस्सा होता था। वहीं कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी विस्तारपूर्वक राजकीय आय के स्रोतों का वर्णन किया गया है। मौर्यकाल में भू राजस्व समेत अनेक शुल्क नगरवासियों पर लगाए जाते थे जैसे,1. षड भाग: छठवें अंश के रूप में प्राप्य राज कर 2. सेना भक्त: युद्धकाल में राज्यादेश से प्रजा जनों द्वारा प्राप्त खाद्य पदार्थ 3. बलि: करों के अतिरिक्त अन्य उपहार के रूप में प्राप्त धन4. कर: अधीनस्त राजाओं से मिलने वाला कर5. उत्संग: उत्सव आदि अवसरों पर भेंट स्वरूप प्राप्त वस्तुएं 6. पाश्व: नियत कर से अधिक की वसूली 7. पारीहीणक: पशुओं द्वारा खेत आदि की हुई हानि के कारण पशु स्वामी को दिए गए अर्थ दंड से उपलब्ध धन8. औपयानिक: राजा को उपहार में प्राप्त धन 9. कौष्टयेक: खुदाई से सहसा प्राप्त धन।करों की इतनी वृहद व्याख्या करने के साथ साथ कौटिल्य ने राजा और प्रजा दोनों के लिए यह भी स्पष्ट किया है कि राज्य कर आदि का अधिकारी है तो प्रजा के प्रति उसके कर्तव्य भी हैं। और प्रजा कर देने के लिए कर्तव्यबद्ध है तो उसके अधिकार भी हैं, अगर राजा कर लेने के बाद भी अपने कर्तव्यों का ठीक से निर्वहन नहीं करता तो प्रजा उसके प्रति अपनी निष्ठा छोड़ सकती है। मध्यकालीन भारत में विभिन्न रियासतों का वर्चस्व था जो अपने अपने हिसाब से प्रजा से कर लेती थीं। सल्तनत काल से लेकर मुगल काल मेँ यह कर छठवें हिस्से से बढ़कर आय के आधे हिस्से तक पहुंच गया था। आधुनिक भारत में आयकर प्रणाली 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार पर आए वित्तीय संकट के कारण 1860 में अंग्रेजों द्वारा लाई गई थी। मजेदार बात यह है कि भारत के तत्कालीन ब्रिटिश वित्तमंत्री जेम्स विल्सन ने भी आयकर की शुरूआत करते हुए मनु को उदृत किया था। 1886 में भारत में इनकम टैक्स एक्ट पास हुआ था तब से उसमें कई बार बदलाव किए गए। प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात 1918 में फिर 1922 में नया एक्ट लाया गया। स्वतंत्र भारत में वर्तमान में जो आयकर कानून चल रहा है वो 1 अप्रैल 1962 को लागू किया गया था। भारत में दो प्रकार के कर लिए जाते हैं प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर। 2017 में जीएसटी लागू कर के अप्रत्यक्ष करों में क्रांतिकारी बदलाव लाकर कर सुधारों की तरफ एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया था। प्रत्यक्ष करों में भी सरकार हर बजट में कुछ बदलाव करती रहती है। लेकिन इसके बावजूद जब विश्व के देशों की टैक्स कंपेटेटिव इंडेक्स 2020 की रिपोर्ट आती है तो 36 देशों की इस सूची में न्यूजीलैंड, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, फ्रांस, जर्मनी और पुर्तगाल जैसे देशों के नाम हैं लेकिन भारत का कोई स्थान नहीं है। जब व्यक्तिगत आयकर वसूलने वाले देशों से तुलना की जाती है तो वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में यह 37%, न्यूजीलैंड में 39% और भारत में 35.88% है। जीएसटी की बात की जाए तो भारत में 28% के साथ यह 140 देशों की तुलना में सबसे ज्यादा है 27 % के साथ दूसरे स्थान पर अर्जेंटिनिया है जबकि यूके और फ्रांस में यह 20% तो सिंगापुर में 7% है।

Page 67 of 69

Newsletter

Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.

We do not share your information.

abnnews24

सच तो सामने आकर रहेगा

टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।

© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse