विचार

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Published / 2025-09-10 20:18:37
पड़ोसी देशों में दंगे देख हर गांव में करें देशभक्तों के लोकतांत्रिक ताकतों का निर्माण

केशवराजु आकारपु 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका दंगों के बाद, हम अपने देश के हर गांव में देशभक्तों द्वारा निर्मित लोकतांत्रिक ताकतों का निर्माण करें। दंगे और अराजकता, नेपाल संसद का दहन। ऐसी घटना किसी भी देश को आर्थिक रूप से कम से कम 10 साल पीछे धकेलने के लिए काफी है। रोजाना कमाने वालों को तुरंत सड़क पर लाकर खड़ा कर देती है। कल श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश, और आज... नेपाल...। अगला भूटान, भारत..??। अगर हम यह सोचें कि ये महज संयोग हैं, तो यह बहुत बड़ी भूल है। यह सब किसी योजना की चमक-दमक से हो रहा है और कुछ विदेशी ताकतें यह देशों को अपने कब्जे में ले रही हैं। 

2014 में मोदी किसी संयोग से जीत गये थे, और 2019 में हमारे हाथों में एक कमजोर सरकार बनेगी और उन अंतरराष्ट्रीय ताकतों का समर्थन करने वाली कुछ आंतरिक ताकतों को उम्मीद थी कि भारत पर हमारी पकड़ फिर से स्थापित हो जायेगी। लेकिन 2019 में, वे ताकतें इस बात को पचा नहीं पायी कि मोदी पहले से ज्यादा बहुमत के साथ सत्ता में लौटे हैं। 

इसीलिए उपर्युक्त देशों में जिस प्रकार की अराजकता हुई/हो रही है, वैसी ही अराजकता इस देश में भी पैदा हुई है और देश को अस्थिर करने के षड्यंत्र विशेषकर 2019 के बाद से बढ़ गये हैं। कुछ अंतरराष्ट्रीय शक्तियां, जिन्हें भारत का विकास बर्दाश्त नहीं है, उन्होंने आंतरिक शत्रुओं के साथ मिलकर ऐसी स्थिति पैदा करने का कई बार प्रयास किया है। 

  • सीएए के नाम पर दिल्ली में आम लोगों के घर जलाए गए और उनकी हत्या की गयी। 
  • गुर्जर दंगे फिर भड़के और राजस्थान व हरियाणा में अराजकता फैल गयी। 
  • पटेल दंगों के कारण गुजरात में तबाही। 
  • किसान आंदोलन के नाम पर दिल्ली की घेराबंदी और लाल किले का अपमान। 
  • रक्षा बलों में भर्ती के लिए शुरू की गयी अग्निवीर योजना के खिलाफ देश भर में आंदोलन हुए और कई ट्रेनों में तोड़फोड़ की गयी। 

इन विरोध प्रदर्शनों के दौरान, प्रदर्शनकारियों ने उन्हें चाहे जितना भी उकसाया हो, एनडीए मोदी सरकार शांत रही और उसने पुलिस फायरिंग या सेना बुलाने का सहारा नहीं लिया, बल्कि प्रदर्शनकारियों के खुद ही अपना विरोध प्रदर्शन खत्म करने का इंतजार किया। मोदी के प्रशंसकों ने भी मोदी सरकार की कड़ी आलोचना की कि उसने विरोध करने वालों या उनके पीछे की ताकतों के खिलाफ सख्त कार्रवाई किये बिना, बहुत नरम रुख अपनाया। 

इन विरोध प्रदर्शनों को भड़काने वालों की यही मंशा है। आम लोगों और मोदी समर्थकों में असंतोष पैदा करने और मोदी विरोधी माहौल बनाने के लिए, यानी अगर पुलिस गोलीबारी होती है और किसान या युवा मरते हैं, तो कुछ दुष्ट ताकतों ने उन मौतों का विरोध प्रदर्शनों को और तीव्र व हिंसक बनाने की योजना बनायी है। यही कारण है कि एनडीए सरकार ने सोशल मीडिया के जरिए अपने समर्थकों द्वारा डाले जा रहे दबाव के बावजूद संयम बनाये रखा है और रणनीतिक रूप से शांतिपूर्ण तरीकों से विरोध प्रदर्शनों का सामना किया है और उन्हें दबा दिया है। 

लेकिन, हर दिन एक जैसा नहीं होता। अगर हम रोजाना बहुत सावधानी से गाड़ी चलायें, तो भी दुर्घटना होने की संभावना हमेशा बनी रहती है। इसलिए गाड़ी चलाते समय आलस्य ठीक नहीं है। साथ ही, सरकार चाहे कितने भी आंदोलन कुशलता से निपटा ले, यह नहीं कहा जा सकता कि सरकार हर बार आंदोलनकारियों के खिलाफ सफल होगी। तो सुरक्षा मार्ग क्या है। 

इसलिए, हमारे आम लोगों को अपनी संपत्ति, बीवी-बच्चों की रक्षा के लिए चौबीसों घंटे सतर्क रहना चाहिए और देशभक्ति से ओतप्रोत होना चाहिए। ऐसी चिंता की घड़ी में, हमारी पहली जिÞम्मेदारी अपनी संपत्ति और अपने परिवार के सदस्यों की रक्षा करना है। कुछ लोग सोच रहे हैं कि अगर एनडीए मोदी सरकार बांग्लादेश, नेपाल जैसे आंदोलनों के कारण, एनडीए, मोदी या भाजपा के खिलाफ नफरत के कारण सत्ता से गिर जाए, तो बस इतना ही काफी होगा। अगर ऐसा सचमुच होता है और मोदी सत्ता खो देते हैं, तो उन्हें कुछ नहीं खोना पड़ेगा।

लेकिन देश में मौजूद विनाशकारी ताकतें इन चिंताओं को रोककर सार्वजनिक और निजी संपत्तियों को भारी नुकसान पहुंचाती हैं। अगर अर्थव्यवस्था अकल्पनीय तरीके से ढह जाती है, तो रोजाना कमाई पर गुजारा करने वाले छोटे व्यापारी और मजदूर अपनी नौकरियां खोकर सड़क पर आ जायेंगे आम लोग। हिंसक घटनाओं में वे अपनी संपत्ति, जैसे स्कूटर, कार और घर, गँवा देते हैं। अपनों को खोने की भी संभावना रहती है। क्योंकि भीड़तंत्री लोगों में विवेक नहीं होता। 

अब हमें क्या करना चाहिए 

घटनाक्रम के प्रति सजग रहें और सावधान रहें। देश में ऐसी परिस्थितियां न आयें, इसके लिए आइये, हर गांव के देशभक्तों के साथ मिलकर ग्राम रक्षा दल बनायें। आइये, युवाओं को अच्छाई और बुराई की जानकारी दें और उनके मन में यह सही ज्ञान डालें कि देश में सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान न पहुंचायें। 

नेपाल देखता है 

1990 में, विदेशी देशों की प्रेरणा और उनके आर्थिक सहयोग से राजशाही के विरुद्ध बड़े पैमाने पर आंदोलन चलाया गया। इसके परिणामस्वरूप, संसदीय लोकतंत्र भी अस्तित्व में रहा और राजशाही भी चलती रही। वर्ष 2000 के बाद, एक और चिंता उत्पन्न हुई जिसके परिणामस्वरूप राजशाही व्यवस्था को हटा दिया गया और प्रत्यक्ष संसदीय प्रणाली डेमोक्रेसी के नाम पर पड़ोसी देश के हाथों में कठपुतली सरकार आ गयी। उनका औपनिवेशिक शासन जारी है। यह सच है कि नेपाल सैकड़ों पहाड़ों से सारे संसाधन ले लिया जा रहा है। 

इस स्थिति को देखते हुए, कुछ नेपाली लोग, जिन्हें लगा कि पुरानी राजशाही व्यवस्था उनके लिए बेहतर है, सड़कों पर उतर आये और अपनी राय व्यक्त की। आज नेपाल गंभीर संकट में है क्योंकि अब डीप स्टेट के नाम से दूसरे देशों के अस्तित्व को चुनौती देने के लिए शुरू की गयी एक व्यवस्था ने उन देशों को लूटा और अस्थिर किया है। 

वर्तमान में नेपाल में काठमांडू के मेयर... बालेन शाह उनको नेपाल के भावी प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद है। नेपाल में जेन-जेड विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशियों के हाथ में यही ताकत है। बालेन शाह सिविल इंजीनियर... पॉप सिंगर... पद्मा ग्रुप आफ कंपनीज के संयुक्त प्रबंध निदेशक। 

न्यूयॉर्क टाइम्स ने उनके बारे में काफी कुछ लिखा है। उसी न्यूयॉर्क टाइम्स ने पहले अरविंद केजरीवाल के बारे में भी काफी कुछ लिखा था... न्यूयॉर्क टाइम्स डीप स्टेट के माउथपीस। 

क्या आप समझते हैं कि वह किसके हाथों में हैं! कई देशों को अस्थिर करने वाली डीप स्टेट शक्तियां भारत में भी उथल-पुथल मचा रही हैं। भारत का लोकतंत्र, जिसने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, इतना मजबूत है कि सरकार, सैन्य बल और देशभक्त शहर एवं ग्रामीण जनता किसी भी आंदोलन से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए तैयार हैं। (लेखक राष्ट्रीय गोरक्षा प्रमुख हैं।)

Published / 2025-09-08 22:00:38
पितृपक्ष : पांच ग्रास और प्राणियों के निमित्त संदेश

रमेश शर्मा 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पूरे संसार में अपने पूर्वजों के स्मरण करने और श्रृद्धांजलि अर्पित करने की परंपरा है। लेकिन भारत में अपने पूर्वजों के स्मरण की यह पितृपक्ष की अवधि व्यक्तित्व निर्माण, कुटुंब महत्ता और प्रकृति से समन्वय की अद्भुत अवधि है। वस्तुत: भारतीय और पश्चिमी चिंतन में एक आधारभूत अंतर है। पश्चिमी चिंतन केवल वाह्य जगत अर्थात भौतिक सृष्टि तक सीमित है जबकि भारतीय चिंतन लौकिक से अधिक अलौकिक सृष्टि तक व्यापक है। 

विकास के लिये जितना जोर वाह्य शक्ति और साधनों पर दिया जाता है उससे अधिक आंतरिक ऊर्जा के संचार पर दिया जाता है। इसे हम सनातन परंपरा के सभी सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक समागमों से समझ सकते हैं और यही विशेषता पूर्वजों के स्मरण के लिये पितृपक्ष के इन दिनों की है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक की पूरी दिनचर्या आंतरिक ऊर्जा जाग्रत करने और आरोग्य शक्ति अर्जित करने की अद्भुत प्रक्रिया है। जबकि इसके कर्मकांड कुटुम्ब समन्वय और प्रकृति से समन्वय बनाकर पर्यावरण संरक्षण के निमित्त हैं। 

पितृपक्ष की दिनचर्या पर चर्चा करने से पहले इन तीन बिन्दुओं को समझना आवश्यक है। पहली व्यक्ति के अवचेतन की शक्ति, दूसरी आंतरिक ऊर्जा और तीसरी कुटुम्बिक शक्ति एवं ऊर्जा। आंतरिक ऊर्जा और अवचेतन की शक्ति जाग्रत करने के लिये एकाग्रता चाहिए। ऐसी एकाग्रता जिसमें मन के साथ सभी ज्ञानेन्द्रियां और कर्मेन्द्रियों संयुक्त हों। इसके लिए पितृपक्ष में ब्रह्म मुहूर्त में उठना, सूर्योदय से पूर्व नदी या सरोवर पर स्नान करके सूर्य को जल अर्पित करने का विधान बनाया गया। 

घर से नदी या सरोवर जाने में दिवंगत पूर्वजों का स्मरण रहता है। इससे चित्त में एकाग्रता आती है। स्नान करके लौटने में सबका स्मरण बना रहता है। इतनी देर किसी सकारात्मक विचार की एकाग्रता से आत्मशक्ति जाग्रत होती है। यही आत्मशक्ति व्यक्ति पराक्रम और पुरुषार्थ में गुणवत्ता प्रदान करती है। घर आकर पूजन हवन और पांच ग्रास निकालना मनोवैज्ञानिक रूप से व्यक्ति, परिवार और प्रकृति से समन्वय का साधन है। इन पांच ग्रास में मछली, चींटी, कौआ, गाय और कुत्ता होते हैं। अर्थात जलचर, थलचर और नभचर तीनों प्रकार के जीवों के संरक्षण का संदेश है।

पितृपक्ष या पितरों की महत्ता का उल्लेख सभी पुराणों में है । श्रीमद्भागवत की रचना ही पूर्वजों की मुक्ति केलिये मानी जाती है। विस्तृत वर्णन गरुण पुराण में है। पितृपक्ष में दिवंगत कुटुम्बजनों का स्मरण करने को श्राद्ध कहा जाता है। श्रद्धा की केंद्रीभूत चेतना को श्राद्ध कहा जाता है।सबसे पहले पूर्वजों के प्रतीक के रूप में जौं के आटे का एक छोटा पिण्ड बनाया जाता है। 

पिंड स्थापित करके पितृ गायत्री मंत्र के साथ 108 बार जल अर्पित किया जाता है। पूजन-अर्पण के बाद इस पिण्ड को पीपल के नीचे रखकर अर्पित किये गये जल को किसी बहते जल स्त्रोत में प्रवाहित कर दिया जाता है। फिर कमसे कम एक अभ्यागत अर्थात आमंत्रित अतिथि को भोजन कराने का विधान हैं। यह माना जाता है कि हमारे परिवार जन भले हमारे बीच से विदा हो गये हैं पर उनकी ऊर्जा अवश्य परिवार में रहती है। 

पांच ग्रास निकालने का महत्व 

  1. इसमें पूजन हवन विधि के बाद महत्वपूर्ण है पांच अलग-अलग प्राणियों के लिये ग्रास निकालना। इनमें गाय, कुत्ता, मछली, चींटी और कौआ हैं। पितरों के संदर्भ इन पांच प्राणियों का जो महत्व पुराणों में वर्णित है उससे अलग इनका समाज और व्यक्तित्व निर्माण से गहरा संबंध है। पितृपक्ष में ग्रास निकालने की परंपरा बनाकर इनका समाज से अटूट रिश्ता बनाने का प्रयास किया गया है। सबसे पहले गाय की महत्ता को देखिये। गाय का दूध हृदयरोग, मधुमेह, कैंसर उपचार में उपयोगी है। गाय का गोबर कृषि के लिये उपयोगी है। गौमूत्र से औषधि तैयार होती है। गाय की श्वांस से हानिकारक बैक्टीरिया नष्ट होते हैं। इसीलिए भारत के विभिन्न तीज त्योहारों में अलग-अलग माध्यम से गाय को जोड़ा गया और महत्व को स्थापित किया गया है। गाय व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिये तो उपयोगी है ही साथ ही परिवार और समाज की अर्थव्यवस्था में भी बहुत उपयोगी है। इसके साथ गाय के जीवन से व्यक्ति और समाज को सर्व उपयोगी होने और सेवाभाव में जीने का संदेश भी मिलता है । गाय सबसे सरल, सहज और सेवाभावी जीव है। तभी सरल सज्जन और सहनशीलता के लिये गाय का उदाहरण दिया जाता है। 
  2. दूसरा ग्रास कुत्ते के लिए निकाला जाता है। कुत्ता जैसा स्वामी भक्त जीव दूसरा नहीं होता। वह कभी भी पीठ नहीं दिखाता, यदि रणनीति के अंतर्गत वह पीछे हटता है तब भी भौंकता रहता है और अवसर मिलते ही पलटकर हमला करता है। अपने प्राण देकर भी स्वामी की रक्षा करता है। उसकी सूंघने की शक्ति अद्भुत होती है। वह नींद में भी जागरुक रहता है। इसीलिए दत्तात्रेय जी ने कुत्ते को एक आदर्श प्राणी बताया समाज से सदैव सीखने का आव्हान किया। भारतीय मनीषियों ने भी विभिन्न कथाओं के माध्यम से कुत्ते के महत्व को समझाया। धर्मराज युधिष्ठिर के साथ कुत्ते की स्वगार्रोहण यात्रा सुप्रसिद्ध है । यहां भी पितरों की सेवा को साक्षी बनाकर कुत्ते से परिवार और समाज को जोड़ा गया है । 
  3. पितृपक्ष एवं श्राद्ध में तीसरा ग्रास मछली के लिए निकाला जाता है तथा नदी तालाब में जाकर डाला जाता है। जल किसी भी प्राणी के जीवन का आधार होता है जल की कमी हो या जल अशुद्ध हो तो जीवन संकट में पड़ जाता है और जल का सबसे महत्वपूर्ण स्त्रोत नदी और सरोवर होते हैं। जहां मछलियां रहतीं हैं। नदी सरोवर या कुएं के जल को शुद्ध रखने का काम मछली करती है। नदी तालाबों में जल को प्रदूषित करने वाले कीटों को मछली अपना आहार बना लेती है। लगता है कि प्रकृति ने जल शुद्धिकरण के लिये ही मछली को बनाया है। अज्ञानता में मनुष्य मछली का कोई अहित न करे इसलिये पितृपक्ष के माध्यम से मछली के संरक्षण को महत्व दिया गया। अलग-अलग पुराण कथाओं में मछली के महत्व को समझाया गया है। मछली के रूप में नारायण के अवतार की कथा भी है। मछली के महत्व को समाज भूले नहीं इसलिये पितृ पूजन से भी मछली को जोड़ा गया। आज भी भारतीय वाड्मय के जानकार लोग मछलियों को दाना डालने जाते हैं। 
  4. चौथा ग्रास चींटी के लिये निकाला जाता है। पितृपक्ष में चींटी को भी समाज से जोड़ा गया। आधुनिक विज्ञान के शोध के अनुसार चींटी धरती के पुनर्चक्र को सक्रिय करने में सबसे महत्वपूर्ण होती है। धरती का यह पुर्नचक्र ही धरती के पोषक तत्वों को पुनर्जीवित करता है। इसी से प्राणियों के जीवन श्रृंखला को निरंतर रहती है। समाज चींटी का संरक्षण करे, इसके लिये विभिन्न कथाओं के माध्यम से समाज को जागरुक किया गया और पितृपूजन से भी जोड़ा। चींटी की सूंघने की शक्ति अद्भुत है। चींटियों में सामाजिक अनुशासन भी है । वे श्रृंखला बद्ध होकर चलतीं हैं। कभी कतार नहीं तोडतीं। कतार को अनुशासित करने केलिये एक टीम चलती है। भोजन खोजने वाली टीम अलग होती है और भोजन ढोकर लाने वाली भी टीम अलग होती है। चीटियों में सामाजिक एकत्व और संगठनात्मक अनुशासन अद्भुत होता है। चींटी से यह संदेश भी है कि भले हमारा अस्तित्व कितना ही लघुतम हो किन्तु मनोबल ऐसा होना चाहिए कि हाथी समान विशालकाय जीव भी भयभीत रहे और संकट आने पर हाथी को भी धराशाई किया जा सके। 
  5. पितृपक्ष में पांचवां ग्रास कौए के लिये निकाला जाता है। कौए की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी जीवन शैली सर्वाधिक आत्म अनुशासित है इसीलिए यह सबसे कम बीमार होता है, यह भोजन को देखकर उसमें अशुद्धता भांप लेता है और हानिकारक होने का आभास होते ही ग्रहण नहीं करता। यह भूख से तो मर जाता है पर बीमारी से कभी नहीं मरता। कौए को कभी थकान नहीं होती। कौआ उन विरले प्राणियों में से एक है जो नर और मादा दोनों एक ही आकार के होते हैं। कौये समूह बनाकर रहते हैं। यदि एक साथी कौए को कुछ हो जाये तो दूसरा कौआ साथी भोजन ग्रहण नहीं करता। इसकी समझ और देखने की सामर्थ्य भी बहुत तीखी होती है। पौराणिक महत्व के अतिरिक्त कौए को समाज से जोड़ने का संदेश यही है कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति कुशाग्र हो, दूरदृष्ट हो, समाज संगठित हो। 

भारतीय वाड्मय में समाज जीवन में अच्छे व्यवहार की सीख देने वाली अनेक कथाएं हैं पर समाज व्यवहारिक रूप से भी अपने प्रेरणादायकों से जुड़ा रहे। इसलिये पितृपक्ष में इन प्रतीकों के माध्यम से समाज को जाग्रत करने का कर्मकांड निर्धारित किया गया है। (लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

Published / 2025-09-07 18:08:52
नये भारत के नव निर्माण में शिक्षकों का योगदान कार्यक्रम का दीप जला कर उद्घाटन

ब्रह्माकुमारी निर्मला

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। रप्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के स्थानीय सेवा केन्द्र चौधरी बागान, हरमू रोड में दीप जला कर उद्घाटन करते हुये डॉ० त्रिवेणी नाथ साहू, उपकुलपति झारखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय ने कहा कि शिक्षक बच्चों को सही मार्ग पर ले जाने वाला मार्गदर्शक होता है, जिसका मार्गदर्शन अभी पर्याप्त नहीं है। 

हमें नैतिक ज्ञान देने वाला एक सच्चा मार्गदर्शक परमशिक्षक परमात्मा है, जिनसे हम शुद्ध ज्ञान प्राप्त करते हैं। जिसका ज्ञान ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय में सिखाया जाता है। कार्यक्रम में जी० एण्ड एच० स्कूल के प्राचार्य दिलीप झा ने कहा कि हर किसी का कोई न कोई गुरु अवश्य होते हैं। 

प्रत्येक को अपने जीवन को सुगम व अच्छा बनाने के लिये एक शिक्षक की आवश्यकता है और प्रथम गुरु शिक्षक माता होती हैं। आध्यात्मिक एवं नैतिक रूप से सोचा जाये तो परमात्मा ही हमारे परमशिक्षक हैं।

कार्यक्रम में लाला लाजपत राय पब्लिक स्कूल के प्राचार्य शैलेन्द्र कुमार ने कहा कि किसी भी रूप में शिक्षकों को सम्मान व आदर देना जरूरी है। शिक्षकों को इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि उन्हें बच्चों का सर्वांगीण विकास कर अपना योगदान देना होगा।

कार्यक्रम में मैनाक बनर्जी, सहायक प्रोफेसर आर० के० कॉलेज ने कहा कि अच्छे शिक्षक व मार्गदर्शक बनने के लिये पहले स्वयं को सही रखना है नैतिक ज्ञान रखना है। भौतिक जगत में ज्यादा उलझ नहीं जाना है, तभी हम समाज एवं परिवार में बच्चों को अच्छा संस्कार, ज्ञान दे पायेंगे।

कार्यक्रम में स्नेहा राय, सेन्ट्रल एकेडमी स्कूल की प्राचार्या ने कहा कि परमात्मा ही हम सभी का परमशिक्षक है। अच्छे शिक्षक होने के लिये शिक्षक में तीन चीजों का होना आवश्यक है-परमात्मा की शक्ति, संस्कार से युक्त और अनुशासन का। जिसका ज्ञान ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय में बताया जाता है।

कार्यक्रम में आनंद कुमार मिज, राजकीय हाई स्कूल बोड़ेया के प्राचार्य ने कहा कि शिक्षक ही बच्चों को सही ज्ञान देकर उन्हें अच्छी जीवन दे सकते हैं या फिर उन्हें उल्टी दिशा का ज्ञान दे सकते हैं, यह शिक्षक की प्रबुद्धता और योग्यता पर निर्भर है।

कार्यक्रम में डॉ० रानी प्रगति प्रसाद, प्रोफेसर एस०ओ०एस० मेमोरियल कॉलेज राँची ने कहा कि हमें बच्चों को ऐसी शिक्षा देनी चाहिए जिससे बच्चे अंधकार से प्रकाश की ओर जा सके। इसके लिये शिक्षक को स्वयं नशामुक्त रहना चाहिए। दहेज प्रथा को प्रोत्साहन नहीं करना चाहिए।

कार्यक्रम में ब्रह्माकुमारी निर्मला बहन ने कहा कि नये भारत के नव निर्माण में शिक्षकों का एक बहुत ही अहम योगदान है। उन्होंने कहा कि 21वीं सदी के सशक्त भारत के नवनिर्माण अथवा भारत को पुनः विश्व गुरु जैसे सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित करने के लिये केवल कम्प्यूटरयुक्त फैक्ट्री में तीव्र गति से गुणात्मक वस्तुओं का उत्पादन ही पर्याप्त नहीं है। 

हमारा वर्तमान संसार भौतिक वस्तुओं के उत्पादन से सम्पन्न हो रहा है परंतु समाज और संसार की व्यवस्था को संचालित करने वाला मानव मन मनोविकारों के दुष्चक्र में फंसकर स्वयं समस्याओं का उत्पादन करने की फैक्ट्री बन गया है। आज हमारे समाज में स्कूल एवं कॉलेज में बच्चों को किताबी जानकारियों ही उपलब्ध कराते हैं, जिससे बच्चों को नैतिक ज्ञान व संस्कार से युक्त ज्ञान का आधारशिला मजबूत नहीं हो पाती। 

भारत के नवनिर्माण में हमारे समाज में शिक्षकों के अतिरिक्त परमशिक्षक परमपिता परमात्मा की भी आवश्यकता होनी चाहिए जिससे परमात्मा के सहयोग से मानव मन को पहले विकारों के दुष्चक्रों और अन्य समस्याओं से मुक्त करें, फिर भारत को एक सशक्त देश बनाने की दिशा में कार्य करने की हमें आवश्यकता है। 

कार्यक्रम में प्रोफुल्ल कुमार उपप्रधानाचार्य लाला लाजपत राय पब्लिक स्कूल, डॉ० शमीक चटर्जी सहायक प्रोफेसर आर० के० कॉलेज, कल्याणी कुमारी प्राचार्या राजकीय हाई स्कूल, तृप्ति प्रसाद इनर्जी सेंट माइकल स्कूल, अमृता पांडे, सजय बेदी, शिल्पा बेदी, महेन्द्र कुमार, शशांक शर्मा, चन्द्रभूषण, पूजा कुमारी, महेन्द्र कुमार, अशोक सिन्हा सहित अन्य लोग शामिल थे। सभी का नृत्य द्वारा स्वागत हुआ एवं पटटा ओढ़ाकर अभिनंदन हुआ।

Published / 2025-09-05 20:49:52
सिखाने के साथ सीखने का परिवेश भी बनायें शिक्षक

टीचर्स डे - 5 सितंबर पर विशेष 

अजय सानी 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। बच्चों का भविष्य बेहतर बनाने में पाठ्यक्रम संबंधी शिक्षण के अलावा भी शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका है। खासकर अपने सहज व्यवहार से स्कूल में बेहतर माहौल निर्मित करने में। जरूरी है कि वह बालमन को समझे। ऐसा वातावरण बनाए जिसमें बच्चा पढ़ाई के साथ जीने का सबक सीखे। नया व लीक से हटकर सीखने में उसकी रुचि पैदा हो। वहीं दो-तरफा संवाद भी सुनिश्चित बनाना शिक्षक का अहम दायित्व है। 

सीखने के लिए सहज परिवेश का होना जरूरी है। क्लासरूम हो या स्कूल का परिसर, बच्चों पर पूरे वातावरण का असर पड़ता है। इस माहौल को सहज रखने में शिक्षकों की अहम भूमिका होती है। बालमन को समझने से जुड़ा टीचर्स का नजरिया बहुत अहमियत रखता है। कहते हैं कि बच्चों का भविष्य बनाने में सबसे बड़ी जिम्मेदारी शिक्षकों के हिस्से ही आती है। इस दायित्व का अहम हिस्सा बालमन को समझना ही है। फिर बात चाहे किसी विषय का पाठ पढ़ाने की हो या जिंदगी जीने का सबक समझाने की। टीचर्स के व्यवहार की सहजता बहुत कुछ आसान कर देती है। 

मन से सीखना सिखायें 

बच्चों के मन को समझते हुए शिक्षक उन्हें सहजता से सीखना सिखायें। हमारे यहां पढ़ाई सिर्फ अंकों की दौड़ बनकर रह गयी है। ऐसे में शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को उनके रुचिकर विषयों से जोड़ें। रटने और परीक्षा पास करने की दौड़ से बाहर लाकर, सही मायने में शिक्षित होने की ओर मोड़ें। अध्ययन ही नहीं, समाज का सहज अवलोकन भी बताता है कि शिक्षक अपने विद्यार्थियों में सीखने के प्रति जुनून पैदा करने में हम भूमिका निभा सकते हैं। सकारात्मक शैक्षिक वातावरण बनाकर बालमन पर गहरा प्रभाव डाल सकते हैं। 

सार्थक संवाद कर मन को साधना सिखा सकते हैं। इसीलिए टीचर्स बच्चों की कमियों और अच्छाइयों, दोनों पर बात करें। पढ़ाई को बोझ ना बनायें। कहते हैं कि ज्ञान की बातें तो किताबों में लिखी ही होती हैं। इन बातों को सही ढंग से समझाने का काम शिक्षक ही कर सकते हैं। अच्छे विचारों को व्यवहार में उतारने की प्रेरणा सिखाने वालों से ही मिलती है। किसी कला या खेल का प्रशिक्षण हो या पढ़ाई, अध्यापकों का यह सहज सा तरीका ही पढ़ने-सीखने के भाव को सार्थक बनाता है। 

रचनात्मकता सोच को दिशा दें 

आज के दौर में शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि वे बंधी-बंधाई लीक पर चलने के बजाय बच्चों को नवाचार से जोड़ें। नयी चीजें सीखने को प्रेरित करें। तकनीक से जोड़ते हुए उसका संतुलित उपयोग करने का भाव जगायें। मौजूदा दौर में कृत्रिम सुविधाओं से अटते संसार में बच्चों के भीतर छुपी रचनात्मक प्रतिभा को निखारने का प्रयास बहुत आवश्यक हो चला है। 

क्लासरूम में तयशुदा पैटर्न पर चलने के बजाय बच्चों को नया और बेहतर सोचने के लिए मोटिवेट करना जरूरी है। इतना ही नहीं, शिक्षक ही बच्चों को सकारात्मक प्रतिस्पर्धा की ओर मोड़ सकते हैं। ऐसा होने पर बच्चे ना तो बेहतर प्रदर्शन करने पर दिशाहीन होंगे और न ही पीछे रह जाने पर उनका मन डिगेगा। 

स्पष्ट है कि ऐसा प्रेरणादायी माहौल बनाने के लिए बच्चों के मन और सोच की दिशा को समझना जरूरी है। इसके लिए शिक्षकों का सहज व्यवहार बहुत जरूरी है। औपचारिकता अध्यापकों को बच्चों के मन के करीब नहीं ला सकती। शिक्षकों और बच्चों का सहज जुड़ाव उनकी प्रतिभा और विचार की दिशा को समझने में मददगार बनता है। बालमन में नई चीजों को समझने और कुछ नया करने की दिलचस्पी जगाता है। अमेरिकी लेखक मार्क वैन डोरेन के अनुसार शिक्षण की कला खोज में सहायता करने की कला है।

जीवन संवारने का पाठ भी

हमारे यहां शिक्षकों और बच्चों में बहुत औपचारिकता भी देखने को मिलती है। यह बात क्या, कैसे और क्यों सीखना है की यात्रा में बाधा बनती है। असल में शिक्षक की जिम्मेदारी होती है कि वह बच्चों को केवल किताबी ज्ञान ही नहीं बल्कि मन-जीवन संवारने वाले अच्छे संस्कार भी दे। शिक्षकों का काम स्कूली पाठ्यक्रम पूरा करवाना भर नहीं। चर्चित लेखक और स्पोर्ट्स राइटर बॉब टाल्बर्ट के मुताबिक बच्चों को गिनती सिखाना ठीक है, लेकिन उन्हें क्या गिनना है यह सिखाना सबसे अच्छा है। 

ऐसे में जिंदगी से जुड़ा पाठ पढ़ाना, बच्चों के व्यवहार और विचारों को तराशना भी टीचर्स की जिम्मेदारी है। बालमन को समझते हुए बच्चों से सकारात्मक ढंग से जुड़ने से इस जिम्मेदारी को निभाना आसान हो जाता है। आपसी समझ की इस बुनियाद पर नयी पीढ़ी के भविष्य की इमारत खड़ी होती है। जीवन को संवारने की राह पकड़ने के मार्ग पर चलते हुए बच्चों को जिंदगी के हर पहलू से जुड़ी सीख सहजता से दी जा सकती है। 

संबल बनें शिक्षक

स्कूलों में हर तरह की पारिवारिक पृष्ठभूमि से बच्चे आते हैं। हर बच्चा अपने आप में खास होता है। इसीलिए शिक्षकों को संवेदनशीलता के साथ बच्चों को समझना चाहिए। शिक्षकों की बातों का ही नहीं बर्ताव का भी बच्चों पर गहरा असर होता है। कहते भी हैं कि ह्यक्लासरूम की चार दीवारें हो सकती हैं, लेकिन शिक्षक के प्रभाव की कोई सीमा नहीं होती। 

यही वजह है कि पढ़ाने-सिखाने के दायित्व का निर्वहन बहुत सधेपन और संवेदनशीलता से होना चाहिए। टीचर्स को अपनी भावनाओं पर काबू रखते हुए बच्चों की भावनाओं को समझने का प्रयास करना चाहिए, ताकि हर बच्चे का संबल बन सकें। कई बार बच्चों के नकारात्मक व्यवहार और सीखने के प्रति उदासीनता की वजह उनके घर का माहौल भी होता है। इसीलिए क्लास में दो-तरफा संवाद जरूरी है। ताकि बच्चे भी अपनी बातें साझा कर सकें। 

इस सार्थक संवाद के लिए भी बच्चों के साथ संजीदगी से व्यवहार करना जरूरी है। इतना ही शिक्षकों का यह सहज और संवेदनापूर्ण जज्बा बच्चों को सफलता या असफलता के दौर में भी संभाल सकता है। उनकी सीखने-समझने की क्षमता पर भरोसा बनाये रखता है। ऐसा व्यवहार हर बच्चे के मन में यह भावना जगाता है कि वह अपने क्लासरूम और स्कूल का अहम हिस्सा है।                                                        (लेखक एबीएन के सीईओ हैं।)

Published / 2025-09-05 17:45:23
कहीं स्त्री सम्मान की बात कोरी गप्प तो नहीं??

राजीव थेपड़ा

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अपने होश संभालने के बाद से दुनिया के और खासकर के भारत के जिस समाज को मैंने देखा-जाना-समझा और महसूस किया है, उसमें ज्यादातर स्त्रियों को अपने परिवार के लिए किसी अनवरत चलती हुई चक्की की तरह घूमता हुआ ही पाया है और मजा यह कि परिवार के किसी सदस्य को इसका कदापि भान तक भी नहीं होता। 

यहां तक कि एक स्त्री भी दूसरी स्त्री की स्थिति को या उसकी मानसिकता को बिलकुल नहीं समझती या फिर समझ कर भी नासमझ बनी रहती है। कुछ भी हो मगर इस प्रकार एक स्त्री के द्वारा ही स्त्री की समस्याओं और दूसरी महत्वपूर्ण बातों को बहुत ही चतुरता पूर्वक बल्कि यूं कहें कि कुटिलता पूर्वक नजरअंदाज कर दिया जाता है, इस प्रकार जो सम्मान एक स्त्री को मिलना चाहिए अपने कुटुंब में उसपर सम्मान उसी परिवार की एक अन्य सदस्य स्त्री अथवा स्त्रियां एकदम से कैंची चला देती हैं। 

मैं लगातार यह महसूस करता आया हूं कि घर में काम को लेकर होने वाले लड़ाइयां या किसी एक स्त्री के पक्ष में झुका हुआ माहौल एक दूसरी स्त्री को अक्सर ईर्ष्या भाव में डाल देता है और वह स्त्री अन्य सदस्यों के साथ मिलकर अपने ऊपर भारी पड़ती स्त्री की आलोचना करने लगती है या निंदा करने लगती है। 

इसी प्रकार इसका उल्टा भी कई बार सही होता है की एक भारी पड़ती स्त्री या यूं कहें कि एक मजबूत स्त्री अपनी मजबूत स्थिति का भरपूर दुरुपयोग करती है और नाजायज फायदा उठाती है और यहां तक कि वह सामने वालों को नीचा तक दिखाती रहती है, बहुत सी स्त्रियां तो परपीड़क भी हो जातीं है, जो एक प्रकार का रोग है, किंतु जिसको कोई समझ नहीं पाता, बल्कि इसे उस स्त्री-विशेष की विशेषता समझता रहता है। इस प्रकार स्त्रियां अपने ही घर में अपने निंदक पैदा कर लेती हैं। 

तो इस प्रकार की जो व्यवस्थाएं घर में स्वत: पैदा हो जाती हैं, उससे घर के पुरुष सदस्य अपने-आप यह समझने लगते हैं कि स्त्रियां तो होती ही ऐसी हैं, क्योंकि अपने-अपने पुरुषों से घर की अन्य स्त्री सदस्यों की चुगली हर रोज रात को एक स्त्री ही किया करती है और इस प्रकार एक घर में दुराव-वैमनस्य होते-होते एक स्थायी फूट का वातावरण तैयार हो जाता है, किंतु चूंकि पुरुष और स्त्री दोनों ने मिलकर ही यह वातावरण तैयार किया होता है इसलिए इस खाई को दूर करने का प्रयास कोई नहीं करता, तो फूट के कारणों पर तो जाने की बात ही बहुत दूर है।

इस प्रकार हम अपनी नासमझी की वजह से या फिर अपनी आंखें बंद करने की वजह से और अपने कच्चे कानों की वजह से हर बार कुछ ऐसी बातों पर विश्वास कर लेते हैं, जो हमारे घर में फूट डालती है। मजेदार बात यह है कि ज्यादातर मामलों में हम अपने परस्पर निकट के लोगों पर भरोसा नहीं करते बल्कि दूर वालों की बात पर भरोसा कर के निकट वालों पर अविश्वास करने लगते हैं। हालांकि यह जरुरी नहीं कि निकट वाला ही सही हो या गलत हो, लेकिन यह भी तो सही नहीं कि दूर वाला सही हो।

तो जीवन में हर जगह अपनी आंखें खुली रखना बहुत न केवल जरूरी होता है, बल्कि अनिवार्य होता है और हम सब इस अनिवार्य अनिवार्यता को जानते ही नहीं। तो फिर हम लगातार गलत सूत्रों पर भरोसा करते चले जाते हैं और अपने घर में अपने ही लोगों के स्वभाव को, यानि कि उनकी विशेषताओं और खामियों तक को नजरअंदाज करते हैं। हमें कम से कम यह तो मालूम ही होना चाहिए कि कौन कैसा है और किस हद तक जा सकता है?

मेरी समझ से स्त्रियों के प्रति सम्मान में कमी का एक बहुत बड़ा कारण स्त्रियां ही रही हैं, क्योंकि स्त्रियों ने दूसरी स्त्रियों को हमेशा प्रतिद्वंद्वी और यहां तक कि शत्रु की नजर से देखा है तथा तदनुरूप ही उनसे बर्ताव करती आयी हैं और इस प्रकार सदियों से पुरुष की नजरों में स्त्री को गिराती चली आ रही है और ऐसी स्त्रियों ने कुछेक तत्कालिक लाभ के लिए जाने या अनजाने स्त्री को एक जींस में परिणत कर दिया है।

हो सकता है मेरी सोच में बहुत से लोगों को आपत्ति लगे, लेकिन मैंने हरगिज-हरगिज लगभग हर घर में यही सब देखा है और रोज देख भी रहा हूं। तो एक बार दुराव की बात शुरू हो जाने पर वह दुराव दोनों ओर से बढ़ता ही चला जाता है, कोई उस दुराव को कम करने का प्रयास बस इसलिए नहीं करता क्योंकि अंतत: सब के सब कानों के कच्चे होते हैं और इस प्रकार वे बातें एक कान से दूसरे कान तक पहुंचती चली जाती हैं, जो सामने वाले ने कभी कही ही नहीं और तब सामान्य बातों के भी मनमाने अर्थ निकाल कर यहां तक कि प्रतिद्वंद्वी के मन के भीतर की भी बातों तक का भी अंदाजा लगा लिया जाता है  आपस में शत्रुता पाले बैठे लोगों द्वारा।

फिर इसका इलाज क्या है? एक इलाज तो समझ में आता है कि स्त्री के द्वारा ही स्त्री के सम्मान को इस प्रकार ठेस नहीं पहुंचायी जानी चाहिए और दूसरा है कि पुरुषों को भी अपनी आंखें कम से कम इतनी तो खुली रखनी ही चाहिए कि वह सच को सच की तरह देख सकें और अपने घर में कार्य कर रही और रह रही स्त्रियों के काम को संपूर्णतया वाजिब नजरों से देख सकें और उस पर अपना उचित निर्णय ले सके जब तक यह दोनों बातें नहीं होंगी कोई भी किसी भी स्त्री को उसका सम्मान हरगिज-हरगिज नहीं दिला सकता। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2025-09-01 20:15:05
करमा : प्रकृति, संस्कृति और भाईचारे का पर्व

देवेन्द्र कुमार नयन 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। झारखंड की मिट्टी और यहां की संस्कृति की आत्मा अगर किसी एक पर्व में सजीव होती है तो वह है करमा पूजा। भादो मास की एकादशी को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल पूजा-अर्चना भर नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक चेतना, सामाजिक एकजुटता और प्रकृति के साथ अटूट रिश्ते का उत्सव है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक हैं, अगर प्रकृति सुरक्षित है तो जीवन सुरक्षित है। 

करमा पर्व की विशेषता यह है कि इसमें न तो किसी मूर्ति की आवश्यकता होती है और न ही किसी भव्य मंदिर की। यह सीधा प्रकृति की पूजा है। करम डाली, मिट्टी, बीज, पानी और सूरज की किरणें ही इसके देवता हैं। यही कारण है कि करमा पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि जीवन-दर्शन है, जो कहता है प्रकृति ही ईश्वर है। झारखंडी परंपरा में करमा की शुरुआत तब से मानी जाती है जब इंसान ने खेती को अपना मुख्य जीवन-धर्म बनाया। यही कारण है कि करमा पर्व को कृषि और बीजों से जोड़कर देखा जाता है।  

लोकमान्यता के अनुसार करमा और धरमा दो भाई थे। दोनों हमेशा साथ रहते और धर्म-कर्म में लीन रहते। लेकिन एक बार करमा ने क्रोध में आकर करम डाली का अपमान कर दिया। इसके बाद उसके जीवन में दुख-तकलीफ आने लगी। अंतत: एक वृद्धा ने उसे समझाया कि यह सब करम देव के अपमान का परिणाम है। तब करमा ने पुन: करम डाली की पूजा की, और उसके जीवन में खुशियां लौट आयीं। यह कथा हमें यही सिखाती है कि कर्म और धर्म अलग नहीं हो सकते। धर्म बिना कर्म अधूरा है और कर्म बिना धर्म का कोई मूल्य नहीं। यही करमा का सबसे बड़ा संदेश है। 

करमा पर्व का माहौल बनते ही कुंवारी लड़कियां तो घर पर रहकर इस पर्व को बड़े आनंद के साथ मनाती हैं, लेकिन इस बीच नवविवाहिताओं को विशेष तौर पर अपने मायके की याद आने लगती है। इसर दौरान उन्हें आस होती है कि अब उनके भाई लियावन कराने अवश्य आयेंगे। भाई भी पूरे सम्मान के साथ अपनी बहनों को ससुराल से मायके लाते हैं। बहनों की प्रतीक्षा और भावनाएं करमा गीतों में झलकती हैं। बहनें राह देख देखकर गुनगुनाती है। 

बड़का हो भइया मति लेगे अइहा, कहां पावब पाकल पान हो... 

मइझला हो भइया मति लेंगे अइहा, कहां पावब बांधल खसिया... 

छोटका हो भइया तोहें चइल अईहा, कांदि-कांदि मांगभे विदाई हो... 

दीदी के कर दे विदाई हो, अरे हो... 

गीत का भाव बड़ा मार्मिक है- बहन अपने बड़े और मंझले भाइयों को आने से मना करती है, क्योंकि उन्हें लगता है कि वे जल्दी विदाई नहीं करा पायेंगे। लेकिन छोटे भाई के आने पर वह आश्वस्त होती है कि वह तो छोटा है, वह रो-धोकर भी अपनी बहन की विदाई करा लेगा, फिर वो मायके जाकर करमा पूजा कर सकेंगी। हालांकि अपना मायके नहीं जा पाने की दशा में ससुराल में भी करमा पूजा करने की मान्यताएं है।

इस पर्व में सात या नौ दिन पूर्व करमइतिन लोग नहा-धोकर गांव से दूर नदी-नाला से बांस के डाला में बालू उठाकर लाती हैं। उस डाला में गेहूं, जौ, चना, उरद, धान, कुरथी, मूंग आदि बीज बो दिये जाते हैं। अब इस डाला को प्रतिदिन पानी से सींचने और रखरखाव की जिम्मेदारी कुछ मुख्य करमइतिनों को दी जाती है, जिन्हें डलइतिन कहा जाता है। यह जावा डाला गांव के पाहन (पुजारी) या मुख्य डलइतिन के घर रखा जाता है।

जावा डाली को रोज शाम को अखरा में लाकर सभी करमइतिन एकत्र होकर जावा डाली के चारों ओर गोल घेरा बनाकर गीत गाते हुए उसे जगाती हैं, जिसे  जावा जागा गीत कहते हैं। दो-चार दिनों में जब बीज अंकुरित हो जाते हैं, तब उसमें हल्दी पानी का छिड़काव किया जाता है ताकि पौधा पीला और सुंदर दिखे। यही जावा फूल कहलाता है। 

करम पूजा के दिन गांव के करमइतिनों के भाई या ग्राम के पाहन सुबह-सुबह नहा-धोकर जंगल जाते हैं और वहां से करम के एक ही वृक्ष की दो डालियां काटकर लाते हैं और ढोल-मांदर बजाते हुए, गीत-नृत्य करते हुए अखरा में गाड़ देते हैं जिसे करम गोसाई कहा जाता है। फिर उन करम डालियों को फूलों और जगमगाती लाइटों से सजाया जाता है। रात को सभी उपवास की हुई करमइतिन साड़ी पहनकर पूजा की थाली में सभी सामग्री सजाती हैं और घी का दिया जलाकर प्रार्थना करती हैं। फिर करमइतिनें अपने भाई के कान में जावा फूल खोंसती हैं और हाथ में धागा बांधती है। 

तब भाई से बुलवाया जाता है केकर करम, केकर धरम? 

और बहन गर्व से जवाब देती है- आपन करम, भैयाक धरम। 

यह संवाद करमा पर्व की आत्मा है, जो कर्म और धर्म को अविभाज्य बताता है। जिसके बदले में भाई अपनी बहनों को उपहार और आजीवन साथ निभाने का वचन देते हैं। इसलिए करमा पर्व को भाई-बहन का पर्व भी कहा जाता है। करम पर्व में युवतियां केवल अपने भाई की ही नहीं, बल्कि पिता की लंबी उम्र और घर की सुख-शांति की भी प्रार्थना करती हैं। यह लोकभावना इन खोरठा गीतों में झलकती है- 

दिहो दिहो करम गोसाईं दिहो आशीष हो, 

भइया बप्पा जिये हमर लाखों बरीस हो। 

और तब करम राजा मानो आशीर्वाद देते हैं- 

देलियो गे करमइतीन, देलियो आशीष गे, 

भइया बप्पा जियतो लाखों बरीस गे। 

करमा को मनौती पर्व भी कहा जाता है। इस पर्व में वैसी विवाहिताएं जिनकी शादी हो चुकी है लेकिन संतान नहीं हुआ है, जिन्हें स्थानीय बोली में डंगुवा बेटी-छऊवा कहा जाता है। वे करमा पूजा के दिन अपनी थाली में एक पुष्ट, सुडौल खीरा रखती हैं और करम राजा से प्रार्थना करती हैं कि उन्हें भी वैसा ही स्वस्थ और सुडौल बेटा मिले। वहीं, अविवाहित युवतियां जिनका कोई भाई नहीं होता है, वे करम राजा से सुंदर और स्नेही भाई की मनौती करती हैं, ताकि आने वाले समय में वे भी भाई की लंबी उम्र के लिए करमा पूजा कर सकें। 

करमा पर्व बिना गीत-संगीत के अधूरा है। करमा गीतों में प्रकृति की सुंदरता, उसकी रचनात्मकता और मानव जीवन के उतार-चढ़ाव का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। जावा उठाने से लेकर करम डाली विसर्जन तक, हर चरण पर गीत गाए जाते हैं। जावा जगाने के गीत, करम काटने के गीत, फूल तोड़ने के गीत, विदाई गीत और विसर्जन गीत शामिल है। 

विदाई के समय गाए जाने वाले खोरठा गीत अत्यंत मार्मिक होते हैं, जैसे-  

आज रे करम गोसाईं घरे दुआरे रे, 

काल रे करम गोसाईं कांस नदी पारे रे। 

जाहो जाहो करम गोसाईं जाहो ससुराल हो, 

आवते भादर मास आनबो घुराय हो।

इन दोनों गीतों में पूजा का भाव, विदाई की पीड़ा और पुनर्मिलन की आशा सब कुछ झलकती है। आज जबकि डीजे और आधुनिक साधन करमा पूजा का हिस्सा बनते जा रहे हैं, पारंपरिक वाद्य यंत्र जैसे ढोल, मांदर, बांसुरी, तीरियो और टुहीला धीरे-धीरे गुम होते जा रहे हैं। सामूहिक अखड़ा संस्कृति, जहां मालिक से लेकर मजदूर सब साथ नाचते-गाते थे, अब मंच और दर्शक की रेखा में बंटने लगी है। करमा हमें यही सिखाता है कि अगर अपनी संस्कृति, अपनी भाषा और अपने वाद्य को नहीं बचाया तो हमारी पहचान खो जायेगी। 

करमा पर्व हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है। यह भाई-बहन के अटूट प्रेम, पिता-माता की सेवा, संतान-सुख की आशा और समाज की एकजुटता का उत्सव है। जावा का हर अंकुर हमें याद दिलाता है कि जीवन नये सृजन की प्रक्रिया है, और करमा राजा का हर गीत यह सिखाता है कि बिना प्रकृति के कोई भी जीवन संभव नहीं। आज जब पूरी दुनिया आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी जड़ों को भूल रही है, करमा पर्व हमें वापस हमारी मिट्टी, हमारे लोकगीत और हमारी सामूहिक संस्कृति से जोड़ता है। यही वजह है कि करमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि झारखंड की आत्मा है। (लेखक देवेन्द्र कुमार नयन देवघर, झारखंड के निवासी हैं।)

Published / 2025-08-30 22:02:39
मौत जब आती है, तो किसी की नहीं चलती...

पवन कुमार पांडेय 

एबीएन हेल्थ डेस्क। 39 साल के एक युवा कार्डियोलॉजिस्ट की अस्पताल में राउंड लेते समय ही अचानक हार्ट अटैक से मृत्यु हो गयी। न वे मोटे थे, न इलाज मिलने में देर हुई। सब कुछ सेकेंडों की दूरी पर था, फिर भी नहीं बच पाये। हाल ही में एक डॉक्टर की कैथलैब में ही मृत्यु हुई थी। डॉ साहब को मेरी तरफ से विनम्र श्रद्धांजलि...। 

पर ऐसे में गोल्डन आवर वाली अवधारणा पर भी भरोसा डगमगाने लगता है। आधुनिक विशेषज्ञों ने कारण बताये हैं, जिसमें क्या हुआ इसका जबाब मिल भी जाता है, पर क्यों इसका मुझे नहीं मिला। मैं आयुर्वेद की दृष्टि से अगर देखता हूं तो असली जड़ कहीं और दिखती है। आचार्य चरक और आचार्य सुश्रुत दोनों एक बात कहते हैं। 

  • वेगान् धारयतो रोगान् बहव: सम्प्रजायन्ते (चरक) जो लोग शरीर के प्राकृतिक वेगों को रोकते हैं, उनमें अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। 
  • वेगान् धारयतो मृत्युर्भवति। (सुश्रुत)  वेगों को रोकने वाला मनुष्य मृत्यु तक को प्राप्त हो सकता है। तेरह ऐसे वेग बताये गये हैं जिन्हें रोकना नहीं चाहिए।

पेशाब, मल, गैस, छींंक, डकार, उल्टी, जम्हाई, आंसू, भूख, प्यास, नींद, हांफ और वीर्य। इन्हें दबाने से शरीर का प्रवाह रुकता है और रोग बनते हैं। आज का जीवन देखिये। अस्पताल या दफ्तर में बैठे-बैठे लोग गैस रोकते हैं, पेशाब रोकते हैं, भूख और नींद को टालते हैं। यही धीरे-धीरे हृदय तक असर करता है।  आप खुद सोचिये आप ने कब खोल के मन से हवा खोली है? 

घर पर फिर भी संभव है, आफिस वाले क्या करें? जहां दिन भर कुर्सी पर बैठना है। आप खुद महसूस कीजिये जब आप हवा की वेग को रोकते हैं, तुरंत आपके शरीर में उसका असर दिखता है, अजीब सा अनकंफर्टेबल महसूस होता है। यहीं से शुरुआत होती है, उदावर्त नामक रोग की। आचार्य चरक ने साफ कहा है कि वायु का वेग रोकने से उदावर्त होता है। उदावर्त के लक्षण रोजमर्रा में महसूस होते हैं। 

पेट में भारीपन, दर्द या ऐंठन। डकार उल्टी दिशा में आना। छाती में जकड़न और दबाव। गले में अटकाव, कभी सिर तक चढ़ जाना। बार-बार गैस रोकने के बाद ऊपर की ओर उसका फील होना। यह सब वही है जिसे आयुर्वेद ने उदावर्त कहा है। इसी स्थिति में अगर तनाव और रात्रि जागरण भी जुड़ जाये तो हृदय के लिए खतरा और बढ़ जाता है। 

इसलिए इन अचानक हृदयाघातों के पीछे केवल ब्लॉकेज या कोलेस्ट्रॉल नहीं, बल्कि यह भी एक गहरी सच्चाई है। नैसर्गिक वेगों को रोकना, उदावर्त की स्थिति बनना और उस पर जागरण और तनाव। यही तीन बातें हृदय के असली शत्रु हैं। गोल्डन आवर तभी काम करेगा जब शरीर को पहले से स्वाभाविक चलने दिया जाये।  

नोट : मेरी बात को किसी पैथी की तारीफ और किसी की बुराई की नजर से ना देखें। मैंने केवल अपनी समझ की बात लिखी है।

Published / 2025-08-25 23:18:57
वॉटरशेड से साकार होता विकसित भारत का सपना

  • जल और मिट्टी संरक्षण से कृषि और किसान समृद्धि की ओर

शिवराज सिंह चौहान

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जल ही जीवन है और मिट्टी हमारा अस्तित्व, हमारा आधार है। जल और मिट्टी के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। आज जब पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है, कुएं सूख रहे हैं, नदियों की धाराएं कमजोर हो रही हैं और भूजल पाताल में समा रहा है, तब यह हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जल और मिट्टी की रक्षा करें। जब हमारे खेत हरे-भरे होंगे और किसान खुशहाल होंगे, तभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत-2047 के संकल्प को साकार किया जा सकेगा, क्योंकि इस संकल्प का रास्ता हमारे गांवों की पगडंडियों, उपजाऊ मिट्टी और लहलहाती फसलों से होकर ही गुजरता है। आज बिगड़ते पर्यावरण के कई जगहों पर भूजल का स्तर हजार-डेढ़ हजार फीट नीचे चला गया है।

अगर हमारी उपजाऊ मिट्टी इसी तरह बहती रही और जमीन बंजर होती रही, तो हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य कैसा होगा? इसी दूरदर्शी सोच और भविष्य की चिंता को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हमारी सरकार ने एक बीड़ा उठाया है। प्रधानमंत्री मोदी ने हमेशा दूरदृष्टि से काम किया है। वे सिर्फ आज की नहीं, आने वाले 50-100 वर्षों की सोचते हैं। उनके नेतृत्व में भारत सरकार का भूमि संसाधन विभाग, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत वॉटरशेड विकास घटक को पूरे देश में लागू कर रहा है। लेकिन यह काम अकेले सरकार नहीं कर सकती। इस महायज्ञ में सरकार के साथ समाज को भी खड़ा होना पड़ेगा।

यह धरती को बचाने का अभियान है। पानी, माटी, धरती बचेगी तो भविष्य बचेगा। यह योजना विशेष रूप से उन क्षेत्रों में लागू की जा रही है जो सूखे और वर्षा पर निर्भर हैं और इन इलाकों में बसे हमारे किसान भाई-बहनों के जीवन में समृद्धि लाने का एक महाभियान है, जहाँ कभी पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष करना पड़ता था। 
कई लोग मुझसे पूछते हैं कि आखिर यह वाटरशेड योजना है क्या? मैं उन्हें सरल भाषा में बताता हूं कि यह केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि लोगों की अपनी, लोगों के लिए चलाई जाने वाली एक क्रांति है। इस योजना का मूलमंत्र है- खेत का पानी खेत में और गांव का पानी गांव में। इसके तहत हम सब मिलकर खेतों की मेड़ें मजबूत करते हैं, खेत में ही छोटे तालाब बनाते हैं, और छोटे-छोटे नालों पर चेक डैम जैसी जल- संरचनाएं खड़ी करते हैं।

इससे बारिश का पानी बहकर बेकार नहीं जाता, बल्कि धीरे-धीरे धरती की प्यास बुझाता है, जिससे भूजल का स्तर बढ़ता है और मिट्टी में लंबे समय तक नमी बनी रहती है। इस योजना की सबसे बड़ी शक्ति इसकी जन-भागीदारी है। गांव के लोग खुद बैठकर यह तय करते हैं कि तालाब कहा खोदना है, मेड़ कहां बनानी है और पेड़ कहां लगाने हैं। भूमिहीन परिवारों और महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को भी मुर्गीपालन और मधुमक्खी पालन जैसे कामों से जोड़कर उनकी आमदनी बढ़ाने का काम किया जा रहा है। इस योजना के बहुत सुखद परिणाम मिल रहे हैं।

इसका सबसे बड़ा लाभ हमारे किसान भाई-बहनों को मिला है, जिनकी आमदनी में 8% से लेकर 70% तक की ठोस वृद्धि हुई है। यह इसलिए संभव हुआ है क्योंकि 2015 से अब तक, सरकार ने 20,000 करोड़ से अधिक की धनराशि खर्च करके देशभर में 6,382 से अधिक परियोजनाएं चलाई हैं और लगभग 3 करोड़ हेक्टेयर भूमि को फिर से उपजाऊ बनाने का काम किया है।

मध्य प्रदेश के झाबुआ में, जहां कभी सूखा एक बड़ी समस्या थी, आज आदिवासी गांवों में पानी भरपूर है और मिट्टी की उर्वरक शक्ति भी बढ़ गई है। परियोजना क्षेत्र के 22 गाँवों में भूजल स्तर एक मीटर तक बढ़ गया है। इससे खेती में भी परिवर्तन आया है। यहीं के किसान भाई बताते हैं कि गांव में चेकडैम बनने से अब वे मक्के के साथ-साथ चने की फसल भी ले रहे हैं, जिससे उनकी आमदनी 50,000 से 60,000 तक बढ़ गयी है। साथ ही झाबुआ की ही परवलिया पंचायत में 12 खेतों में बने खेत तालाबों से किसानों की आमदनी 1 लाख से 1.5 लाख प्रति हेक्टेयर तक बढ़ी है।

इस योजना के तहत 9 लाख से ज्यादा चेक डैम, रिसाव तालाब, खेत तालाब, जैसी वाटरशेड संरचनाएं बनी हैं। 5.6 करोड़ से ज्यादा श्रम दिवस उपलब्ध हुए हैं, जिससे ग्रामीण रोजगार में वृद्धि हुई है। वाटरशेड विकास परियोजनाओं के लागू होने से गांवों में उल्लेखनीय बदलाव आया है। जहां पहले पानी की कमी थी, उन परियोजना क्षेत्र में अब 1.5 लाख हेक्टेयर से ज्यादा नये इलाके में जल स्रोत फैले हैं, यानी 16% का इजाफा हुआ है। साथ ही अब किसान पारंपरिक फसलों के अलावा फलों और अन्य पेड़- पौधों की खेती भी करने लगे हैं, जिससे बागवानी और पेड़-पौधों की खेती का दायरा 12% बढ़कर 1.9 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है।

राजस्थान के बाड़मेर जैसे रेगिस्तानी इलाके में, जहां पानी की कमी किसानों को पलायन पर मजबूर कर रही थी, आज अनार की खेती से हरियाली लौट आयी है। योजना के अंतर्गत 120 से अधिक किसानों को अनार के पौधे उपलब्ध कराए गये, जो वहां की बालू मिट्टी और सीमित पानी जैसी कठिन परिस्थितियों में भी आसानी से पनप जाते हैं। अनार की खेती ने न केवल आमदनी बढ़ायी, बल्कि बूड़ीवाड़ा गांव के मांगीलाल परांगी का कहना है कि उनके जैसे किसान अब अरंडी छोड़कर बागवानी की ओर बढ़ गये हैं। 

त्रिपुरा के दाशी रियांग और बिमन रियांग जैसे किसान योजना की मदद से अनानास की बागवानी करके अपनी बंजर भूमि को फिर से उपजाऊ बना रहे हैं और अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं। इस पूरी क्रांति को जन-जन तक पहुंचाने और इसे एक जन-आंदोलन बनाने के लिए हमने वॉटरशेड यात्रा भी निकाली। इस यात्रा के माध्यम से हमने देशभर में जल संरक्षण और भूमि संवर्धन के लिए एक जनजागरण अभियान चलाया।

हमने इस योजना में तकनीक का भी भरपूर उपयोग किया है। भुवन जियोपोर्टल (सृष्टि) और दृष्टि मोबाइल ऐप जैसे डिजिटल उपकरणों से योजनाओं की प्रगति की सटीक निगरानी हो रही है। किसानों की मेहनत और हमारी योजनाओं की वजह से, देशभर के फसल क्षेत्र में बढ़ोतरी हुई है। सैटेलाइट से मिले आंकड़े बताते हैं कि फसल क्षेत्र में लगभग 10 लाख हेक्टेयर (5% की वृद्धि) और जल स्रोतों के क्षेत्र में 1.5 लाख हेक्टेयर (16% की वृद्धि) का इजाफा हुआ है। सबसे बड़ी बात यह है कि 8.4 लाख हेक्टेयर से ज्यादा बंजर जमीन अब फिर से खेती के योग्य बन चुकी है।

प्रधानमंत्री मोदी के कुशल नेतृत्व में आज अमृतकाल में हम सब मिलकर भूमि संरक्षण की एक नई गाथा लिख रहे हैं। यह सिर्फ आँकड़े नहीं हैं, यह हमारे किसानों की मेहनत और उनके बेहतर भविष्य की जीती-जागती कहानी है। जब हम पानी और मिट्टी को बचायेंगे, तभी हम अपनी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित कर पायेंगे। इस संकल्प को मिलकर पूरा करें और किसानों को समृद्ध तथा भारत को विकसित बनाएं। प्रधानमंत्री मोदी जी का मानना है कि केवल सरकार नहीं, समाज की भागीदारी से ही यह अभियान सफल होगा।

उसी सोच के तहत वॉटरशेड यात्रा जैसी पहल से इस योजना को जन-जन तक पहुंचाया गया है और यह एक जनांदोलन बन चुका है। यह भारतीय किसानों की मेहनत और बदलते भविष्य की कहानी है। जब जल और मिट्टी सुरक्षित होंगी, तभी भारत सुरक्षित रहेगा। 2047 तक विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब गांवों की धरती समृद्ध होगी और किसान खुशहाल होंगे। आइये, मिलकर जल और माटी के इस रक्षा संकल्प को आगे बढ़ाएं। (लेखक केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री है)

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