एबीएन डेस्क, रांची। बेहद दुखद है कि दुनिया के सबसे बड़े गैर राजनैतिक संगठन के प्रमुख मोहन भागवत जब हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर दे रहे हैं, तब कुछ नेता इसके लिए अतिरिक्त कोशिश कर रहे हैं कि हमारा समाज एकजुटता-सद्भावना की ऐसी बातों पर ध्यान न दे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संघ से जुड़े पूर्वाग्रहों को दूर करते हुए कहा है कि संघ भले हिन्दुओं का संगठन है, लेकिन वह दूसरे धर्म वालों से नफरत नहीं करता। सभी भारतीयों का डीएनए एक है, के कथन को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के आपत्ति एवं असहमति के स्वर राष्ट्रीय एकता की बड़ी बाधा है। अनेकता में एकता भारतीय संस्कृति का आदर्श रहा है। यहां अनेक धर्म, संप्रदाय, जाति, वर्ण, प्रांत एवं राजनैतिक पार्टियां हैं, भिन्नता और अनेकता होने मात्र से सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय एकता को विघटित नहीं किया जा सकता। निश्चित ही मेवाड़ विश्वविद्यालय में दिया गया मोहन भागवत का उद्बोधन देश की एकता को बल देने का माध्यम बनेगा, देश के सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय परिवेश को एक नया मोड़ देगा। यह एक दिशासूचक बना है, गिरजे पर लगा दिशा-सूचक नहीं, यह तो जिधर की हवा होती है उधर ही घूम जाता है। यह कुतुबनुमा है, जो हर स्थिति में सही दिशा एवं दृष्टि को उजागर करता रहेगा। विभिन्न जाति, धर्म, भाषा, वर्ग के लोगों का एक साथ रहना भारतीय लोकतंत्र का सौन्दर्य है, राजनीतिक स्वार्थों के चलते इस सौन्दर्य को नुकसान पहुंचाना राष्ट्रीय एकता को खंडित करता है। भिन्नताओं का लोप कर सबको एक कर देना असंभव है। ऐसी एकता में विकास के द्वार भी अवरुद्ध हो जाते हैं। लेकिन अनेकता भी वही कीमती है, जो हमारी मौलिक एवं राष्ट्रीय एकता को किसी प्रकार का खतरा पैदा न करे। जैसे एक वृक्ष की अनेक शाखाओं की भांति एक राष्ट्र के अनेक प्रांत हो सकते हैं, उसमें अनेक जाति एवं धर्म के लोग रह सकते हैं, पर उनका विकास राष्ट्रीयता की जड़ से जुड़कर रहने में है, जब भेद में अभेद को मूल्य देने की बात व्यावहारिक बनेगी, उसी दिन राष्ट्रीय एकता की सम्यक् परिणति होगी और उसी दिन भारत अखंड बनेगा। मोहन भागवत ने कहा कि अगर कोई हिंदू कहता है कि यहां कोई मुसलमान नहीं रहना चाहिए, तो वह व्यक्ति हिंदू नहीं है। गाय एक पवित्र जानवर है लेकिन जो लोग दूसरों को मार रहे हैं वे हिंदुत्व के खिलाफ जा रहे हैं। कानून को बिना किसी पक्षपात के उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। हिंदू-मुस्लिम एकता शब्द ही भ्रामक है। हिंदू-मुस्लिम अलग हैं ही नहीं, हमेशा से एक हैं। जब लोग दोनों को अलग मानते हैं तभी संकट खड़ा होता है। हमारी श्रद्धा आकार और निराकार दोनों में समान है। हम मातृभूमि से प्रेम करते हैं क्योंकि ये यहां रहने वाले हर एक व्यक्ति को पालती आई है और पाल रही है। जनसंख्या के लिहाज से भविष्य में खतरा है, उसे ठीक करना पड़ेगा। भारत को यदि विश्वगुरु बनाना है तो अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक की शब्दों की लड़ाई में नहीं पड़ना होगा। अल्पसंख्यकों के मन में यह बिठाया गया है कि हिंदू उनको खा जाएंगे। अब समय आ गया है कि मुस्लिम समाज आंखों से पट्टी हटाए और सबको गले लगाए। कट्टरता को छोड़कर आपसी भाई-चारे की राह अपनाए। यही एक आदर्श स्थिति की स्थापना है और इसी के प्रयास में संघ जुटा है। संघ सिर्फ राष्ट्रवाद के लिए काम करता है। राजनीति स्वयंसेवकों का काम नहीं है। संघ जोड़ने का काम करता है, जबकि राजनीति तोड़ने का हथियार बन जाती है। राजनीति की वजह से ही हिंदू-मुस्लिम एक नहीं हो सके हैं। बेहद दुखद है कि दुनिया के सबसे बड़े गैर राजनैतिक संगठन के प्रमुख मोहन भागवत जब हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर दे रहे हैं, तब कुछ नेता इसके लिए अतिरिक्त कोशिश कर रहे हैं कि हमारा समाज एकजुटता-सद्भावना की ऐसी बातों पर ध्यान न दे। इस कोशिश से यही प्रकट हुआ कि कुछ लोगों की दिलचस्पी इसमें है कि हिंदू-मुस्लिम के बीच की दूरी खत्म न हो। इस संदर्भ में संघ प्रमुख ने यह सही कहा कि हिंदू-मुस्लिम एकता की बातें इस अर्थ में भ्रामक हैं, क्योंकि वे तो पहले से ही एकजुट हैं और उन्हें अलग-अलग देखना सही नहीं। कायदे से इसका स्वागत करते हुए अपने-अपने स्तर पर ऐसी कोशिश की जानी चाहिए कि भारतीय समाज एकजुट हो और उसके बीच जो भी वैमनस्य है, जो भी दूरियां हैं, वह खत्म हो। नि:संदेह कुछ लोग ऐसा नहीं होने देना चाहते और इसीलिए किसी ने संघ की कथनी-करनी में अंतर का उल्लेख किया तो किसी ने भीड़ की हिंसा का जिक्र। विडंबनापूर्ण है कि अपने देश में इस तरह की सीधी-सच्ची एवं आदर्श की बात पर भी सस्ती राजनीति की जा रही है, इसका उदाहरण है भागवत के इस प्रेरक एवं क्रांतिकारी उद्बोधन पर आपत्ति और असहमति भरी प्रतिक्रिया का होना। मायावती और असदुद्दीन ओवैसी से लेकर दिग्विजय सिंह ने जैसी प्रतिक्रिया दी, उससे विरोध के लिए विरोध वाली मानसिकता का ही परिचय मिला। इनमें से किसी ने भी यह समझने की कोशिश नहीं की कि मोहन भागवत अपने इस कथन के जरिये सभी देशवासियों में एकता, साम्प्रदायिक सौहार्द एवं भाईचारे की भावना का संचार करने के साथ यह रेखांकित करना चाह रहे थे कि भारत के लोगों में जाति, मजहब, पूजा-पद्धति की कितनी भी भिन्नता हो, उन्हें यह स्मरण रखना चाहिए कि वे सब इस देश की संतान हैं और सबके पूर्वज एक हैं। इस विचार में ऐसा कुछ भी नहीं कि उस पर आपत्ति जताई जाए। बावजूद इसके किसी-न-किसी बहाने आपत्ति जताई गई और विमर्श को खास दिशा में मोड़ने की कोशिश की गई। इसका मकसद लोगों को गुमराह करना और अपने वोट बैंक को साधने के अलावा और कुछ नहीं नजर आता। ऐसा लगता है कतिपय राजनीतिक दलों की राजनीति एवं उनकी सोच विकृत हैं, उनका व्यवहार झूठा है, चेहरों पर ज्यादा नकाबें ओढ़ रखे हैं, उन्होंने सभी आदर्शों एवं मूल्यों को धराशायी कर दिया है। देश के करोड़ों लोग देश के भविष्य को लेकर चिन्तित हैं। वक्त आ गया है कि देश की साझा संस्कृति, गौरवशाली विरासत को सुरक्षित रखने के लिये भागवत जैसे शिखर व्यक्तियों को भागीरथ प्रयास करने होंगे, दिशाशून्य हुए नेतृत्व के सामने नया मापदण्ड रखना होगा।
एबीएन डेस्क। आजादी के बाद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4) के तहत सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े तबकों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। आरंभ में आरक्षण की व्यवस्था 10 वर्ष के लिए होनी थी लेकिन हर 10 वर्ष के बाद उसे आगे बढ़ाने का सिलसिला चलता रहा। फिलहाल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग को सरकारी रोजगार, सरकारी कंपनियों और शैक्षणिक संस्थानों में नौकरी तथा सीटों के मामले में 49.5 फीसदी आरक्षण प्राप्त है। जनवरी 2019 में यानी अप्रैल-मई 2019 के लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले संसद ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 10 फीसदी अतिरिक्त आरक्षण को मंजूरी दे दी। इसके अलावा राज्य विधानसभाओं और लोकसभा में भी अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए सीटें आरक्षित हैं। यह संभव है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए घोषित 10 फीसदी का आरक्षण शायद कुल आरक्षण को बढ़ाकर 59.5 फीसदी नहीं करे क्योंकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और अनुसूचित जाति-जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण उसका अतिव्यापन कर सकता है। बहरहाल यदि आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण लागू होता है तो संभव है कि वह सन 1993 में सर्वोच्च न्यायालय के नौ न्यायाधीशों वाले पीठ के उस निर्णय का उल्लंघन कर दे जिसमें उन्होंने सभी प्रकार के आरक्षण के लिए कुल मिलाकर 50 फीसदी की सीमा तय की थी। फिलहाल 10 फीसदी अतिरिक्त आरक्षण के खिलाफ कई याचिकाएं लंबित हैं। आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण के पहले भी तमिलनाडु विधानसभा ने कुल मिलाकर 69 फीसदी आरक्षण को मंजूरी दे दी थी। अप्रैल 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले तमिलनाडु की द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) ने राज्य के निवासियों के लिए 75 फीसदी आरक्षण का वादा किया है। मध्य प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और हरियाणा पहले ही रोजगार में स्थानीय लोगों के आरक्षण की नीतियां बना चुके हैं। देश भर में कई याचिकाएं दायर कर 50 फीसदी के ऊपर के आरक्षण को समाप्त करने की मांग की गई है। खासतौर पर 8 फरवरी को खबर आई कि सर्वोच्च न्यायालय एक ऐसी याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया है जो तमिलनाडु में 50 फीसदी से अधिक आरक्षण को चुनौती देती है। परिणामस्वरूप अब तक राज्यों में मौजूदा आरक्षण के अतिरिक्त स्थानीय लोगों के लिए आरक्षण के क्रियान्वयन का कानूनी दर्जा अस्पष्ट है। ऐसे आरक्षण के स्तर के पक्ष में दलील यह है कि देश में अभी भी सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से वंचितों की तादाद बहुत अधिक है। शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का पारदर्शी और निष्पक्ष क्रियान्वयन जटिल है जिसके चलते कई कानूनी विवाद पैदा हुए। यदि आरक्षण कोटा विश्वविद्यालय स्तर पर होता है तो व्यक्तिगत विभागों में यह 50 फीसदी का स्तर पार कर सकता है। एक अन्य मुद्दा यह है कि किसे क्रीमी लेयर का हिस्सा होने के कारण अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के लायक नहीं माना जाए। फिलहाल क्रीमी लेयर में वे लोग आते हैं जिनकी सालाना पारिवारिक आय 8 लाख रुपये से अधिक है। गैर पिछड़ा वर्ग के लोगों को लगता है कि यदि पिछड़ा वर्ग के लोग स्वरोजगार में हैं तो उनकी आय का आकलन आसान नहीं है। उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासी श्रमिक दशकों से मुंबई, दिल्ली या बेंगलूरु में किराये के मकानों में रहते हैं। उनके लिए खुद को वहां का निवासी साबित करना मुश्किल है। परिणामस्वरूप राज्यस्तरीय आरक्षण भारतीय श्रम बाजार को आर्थिक रूप से अक्षम बना सकता है। खबरों के मुताबिक सर्वोच्च न्यायालय को 15 मार्च, 2021 से 50 फीसदी सीमा के मामले पर सुनवाई करनी थी। शीर्ष न्यायालय को स्पष्ट करना चाहिए कि देश में आरक्षण के अलग-अलग स्तर नहीं हो सकते और अलग-अलग राज्य ऐसे कानून नहीं बना सकते कि रोजगार वहां के निवासियों के लिए आरक्षित होंगे। समाचार पत्रों में 19 मार्च, 2021 को प्रकाशित खबरों के मुताबिक महाराष्ट्र में राज्य के विशिष्ट आरक्षण से संबंधित याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने चुटीले अंदाज में यह तक पूछ डाला कि क्या आजादी के बाद से कोई सामाजिक-आर्थिक प्रगति हासिल नहीं हुई? यह बात शायद सबसे जानकार भारतीयों पर भी लागू होती है। केंद्र सरकार को संसद में श्वेत पत्र पेश करना चाहिए ताकि आरक्षण के क्रियान्वयन को लेकर स्पष्टता आ सके। हालांकि ऐसा होने की संभावना बहुत कम है क्योंकि आरक्षण मतदाताओं और ज्यादातर राजनीतिक दलों के लिए बहुत संवेदनशील मसला है। आरक्षण में इजाफे के खिलाफ या मौजूदा स्तर का आरक्षण जारी रखने के विरोध में कुछ कहा जाए तो यह भावनात्मक दलील दी जाती है कि अनुसूचित जाति-जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ हजारों साल के भेदभाव को कुछ दशकों में पूरा नहीं किया जा सकता। हालिया अतीत का एक उदाहरण है करीब दो सौ वर्ष के ब्रिटिश शासन के कारण भारतीय उपमहाद्वीप की गरीबी। लब्बोलुआब यह कि अतिरिक्त आरक्षण शासन मानकों को शिथिल करेगा तथा केंद्र, राज्यों और नगर निकाय स्तर के प्रदर्शन पर असर पड़ेगा। शैक्षणिक संस्थान भी अप्रभावित नहीं रह सकेंगे। मिसाल के तौर पर नैशनल एसोसिएशन आॅफ सॉफ्टवेयर ऐंड सर्विस कंपनीज ने संकेत दिया है कि उससे संबद्ध कंपनियों में से 80 प्रतिशत को लगता है कि हरियाणा के नागरिकों की पक्षधर आरक्षण नीतियां उनके कारोबार और भविष्य की निवेश योजनाओं को प्रभावित करेंगी। देश की राष्ट्रीय और राज्य सरकारें न केवल आरक्षण की मदद करती हैं बल्कि अतिरिक्त आरक्षण की मांग को प्रोत्साहन देती हैं। देश में हर प्रकार के आरक्षण को खत्म करने की जरूरत है और इस दौरान उन लोगों को उचित वित्तीय सहायता मुहैया कराई जानी चाहिए जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए हैं।
एबीएन डेस्क। कोविड-19 के कारण गत छह माह के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और रक्षा मंत्रालय के चुनिंदा अधिकारी उद्योग जगत के लोगों से वर्चुअल कॉन्फ्रेंस के जरिये ही रूबरू हुए हैं। अधिकारियों ने 2014 के बाद किए गए रक्षा नीति सुधारों के बारे में बात की। उनका कहना है कि ये सुधार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत के नारे के अनुरूप रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने वाले हैं। अधिकारी रक्षा क्षेत्र की 101 वस्तुओं की नकारात्मक आयात सूची, नई रक्षा अधिग्रहण नीति 2020 (डीएपी 2020) का जिक्र करते हुए स्वदेशीकरण पर जोर देते हैं। वे कहते हैं कि नई रक्षा उत्पादन एवं निर्यात संवर्द्धन नीति (डीपीईपीपी 2020) की मदद से सालाना रक्षा उत्पादन को बढ़ाकर 26 अरब डॉलर पहुंचाया जाएगा और हर वर्ष 5 अरब डॉलर के हथियार निर्यात किए जाएंगे। तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में दो रक्षा उद्योग कॉरिडोर दो स्थापित किए जाएंगे। वे देश के रक्षा उद्योग में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के उदारीकरण का भी जिक्र करते हैं। गत 17 सितंबर को उद्योग संवर्द्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग ने रक्षा क्षेत्र में एफडीआई की सीमा को उन कंपनियों के लिए 49 फीसदी से बढ़ाकर 74 फीसदी (स्वचालित रास्ते के जरिये) कर दिया जो नए लाइसेंस चाहती हैं। महज 13 दिन बाद 30 सितंबर को रक्षा मंत्रालय ने नई रक्षा खरीद नीति 2020 (डीएपी 2020) जारी कर दी जिसमें संशोधित एफडीआई सीमा का जिक्र नहीं था। नई नीति में कहा गया कि किसी कंपनी को भारतीय नागरिक के स्वामित्व वाला माना जाएगा जब उसमें 50 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी भारतीय नागरिक या भारतीय कंपनी के पास होगी। यानी एफडीआई की अधिकतम सीमा 49 फीसदी होगी। डीएपी 2020 में कंपनी अधिनियम 2013 में परिभाषित उपायों का भी हवाला दिया गया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विभिन्न श्रेणियों में रक्षा निविदाओं में भाग लेने वाली कंपनियों का नियंत्रण भारतीय नागरिकों के हाथ में ही रहे। नीति में कहा गया है, नियंत्रण में अधिकांश निदेशकों की नियुक्ति का अधिकार या प्रबंधन पर नियंत्रण या नीतिगत निर्णयों पर नियंत्रण जिसमें उनकी अंशधारिता या प्रबंधन अधिकार अथवा अंशधारक समझौते या वोटिंग समझौते शामिल होंगे। इस विरोधाभास से कुछ सवाल उठते हैं: एफडीआई की सीमा को बढ़ाकर 74 फीसदी करने के पीछे इरादा क्या था? क्या 49 फीसदी विदेशी हिस्सेदारी वाली भारतीय कंपनियों के साथ अलग व्यवहार होगा और 74 फीसदी विदेशी हिस्सेदारी वाली कंपनियों के साथ अलग? अंतरराष्ट्रीय रक्षा कंपनियां भारतीय रक्षा क्षेत्र में 74 फीसदी निवेश क्यों करेंगी जबकि कंपनी को भारतीय माना भी नहीं जाएगा और वे भारतीय कंपनियों के लिए आरक्षित श्रेणी में बोली भी नहीं लगा सकेंगी। रक्षा एफडीआई नीति सन 2001 में निजी क्षेत्र को मंजूरी के समय से ही उद्देश्य विहीन नजर आती है। रक्षा और विमानन क्षेत्र में 2001 से अब तक कुल एफडीआई बमुश्किल 3,454 करोड़ रुपये है। इसमें से 2,133 करोड़ रुपये की राशि वित्त वर्ष 2014-15 के बाद आई। रक्षा मंत्रालय ने कभी यह स्पष्ट नहीं किया कि रक्षा क्षेत्र में एफडीआई को उदार बनाकर क्या हासिल किया जाना है। सन 2001 में 26 फीसदी से 2016 में इसे 49 फीसदी किया गया और फिर यह 74 फीसदी तक पहुंचा। एक ओर इसे आधुनिक सैन्य तकनीक को भारत लाने के तरीके के रूप में देखा गया (मंत्रालय ने कहा भी है कि उच्च तकनीक वाली परियोजनाओं में 100 फीसदी एफडीआई की इजाजत होगी) तो दूसरी ओर एफडीआई को उदार बनाने को रक्षा उत्पादन बढ़ाने के तरीके के रूप में भी देखा जा रहा है। भले ही यहां सस्ते और मझोले तकनीकी उपकरण बनें जिन्हें वैश्विक उपकरण निमार्ता भारत में श्रम सस्ता होने के कारण बनाएं। रक्षा एफडीआई को 100 फीसदी तक बढ़ाने को लेकर दी गई दलील इस गलत धारणा पर आधारित है कि रक्षा उद्योग बाजार संचालित है। बल्कि सरकार उच्च गुणवत्ता वाले सैन्य उपकरणों के निर्माण पर कड़ा नियंत्रण रखती है। बल्कि जब कोई रक्षा कंपनी विनिर्माण को भारत स्थानांतरित करने में बेहतरी देखती है तो यह निर्णय भी उसका बोर्ड नहीं भारत सरकार की मंजूरी पर निर्भर है। उन्नत रक्षा क्षमताओं वाले देशों में विधायी ढांचा मसलन अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय शस्त्र व्यापार नियमन आदि रक्षा तकनीक से जुड़े मसले देखते हैं। रक्षा एफडीआई की सीमा बढ़ाने और उसे 100 फीसदी करने के पीछे दलील यह है कि इससे विनिर्माण को बढ़ाया जा सकता है, रोजगार उत्पन्न किए जा सकते हैं और उत्पादन कौशल में सुधार किया जा सकता है। यह कौशल मध्यम तकनीक वाले उत्पाद मसलन इलेक्ट्रॉनिक सर्किटरी, फ्यूज बॉक्स या विमानों का लैंडिंग गियर बनाने के काम आता है। हम अपनी रक्षा जरूरत का 55-60 फीसदी आयात करते हैं जिसमें अधिकांश रूस, अमेरिका, फ्रांस और इजरायल से खरीदा जाता है। यदि इन देशों की कंपनियों को भारत में पूर्ण क्षमता वाली उत्पादन इकाइयां स्थापित करने दिया जाए तो बड़े आॅर्डर का अहम हिस्सा यहीं बन सकता है। इससे देश में उच्च गुणवत्ता वाली विनिर्माण इकाइयां तैयार होंगी, भले ही स्वामित्व विदेशियों का हो। आॅफसेट करारों के माध्यम से इस विकल्प को टटोला गया है लेकिन भविष्य की सभी प्रत्यक्ष विदेशी खरीद में यह शर्त जोड़ी जा सकती है कि वे भारत में पूर्ण स्वामित्व वाली इकाई स्थापित करेंगे। देश के रक्षा बाजार में पहुंच को सशर्त बनाया जा सकता है। यानी केवल उनके लिए जो देश में लंबी अवधि तक टिक सकें। वैश्विक कंपनियों को पूर्ण स्वामित्व वाली या 74 फीसदी स्वामित्व वाली विनिर्माण इकाइयां भारत में स्थापित करने से उच्च प्रतिस्पर्धा का माहौल बनेगा और भारतीय निजी और सरकारी कंपनियां अंतरराष्ट्रीय स्तर के उत्पाद बनाने के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगी। शायद इससे देश के रक्षा उद्योग में तेजी आए और सामान्य से अलग उत्कृष्ट उत्पाद तैयार हों।
एबीएन डेस्क। क्या भारत में बहुत अधिक बैंक हैं? क्या भारत में बैंकों की संख्या बहुत कम है? आखिर एक देश में कितने बैंक होने चाहिए? भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को असल में इन सवालों पर गौर करना चाहिए, न कि किसी बैंक के स्वामित्व को लेकर फिक्रमंद होना चाहिए। लेकिन हम सब तो भारतीय हैं, लिहाजा आसानी से ध्यान भटकने की गुंजाइश बनी रहती है। शुरूआत दो महत्त्वपूर्ण आंकड़ों से करते हैं। उम्मीद है कि इन्हें देखने के बाद दिमाग को केंद्रित करने में मदद मिलेगी। पहला, भारत में ऋण एवं सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का अनुपात 50 फीसदी के दयनीय स्तर पर है। भारत की समतुल्य अर्थव्यवस्थाओं में यह अनुपात 200 फीसदी से भी अधिक है। दूसरा, इस अनुपात का सीधा संबंध किसी भी देश में मौजूद बैंको की संख्या से है। इस तरह आखिरी बार गिनती के समय अमेरिका एवं चीन दोनों ही देशों में कार्यरत बैंकों की संख्या 4,000 से भी अधिक थी। लिहाजा न केवल ग्रामीण भारत में बैंकों की उपलब्धता कम है बल्कि समूची भारतीय अर्थव्यवस्था ही बैंकों की कमी का सामना कर रही है। वित्तीय क्षेत्र की हालत पर विचार के लिए गठित रघुराम राजन समिति ने वर्ष 2008 में ही कहा था कि हमें सैकड़ों नए बैंकों की जरूरत है। लेकिन यह राय 12 साल पहले की है। आज मेरी यही राय है कि भारत को कम-से-कम 1,000 नए बैंकों की जरूरत है। यह सुनकर गश खाने की जरूरत नहीं है। आज अर्थव्यवस्था का जो आकार है उसका दसवां हिस्सा रहते समय भी भारत में करीब 400 बैंक सक्रिय थे लिहाजा 1,000 बैंकों का आंकड़ा सुनकर अचरज करने की जरूरत नहीं है। इतने बैंक नहीं हुए तो अर्थव्यवस्था कभी भी उस तरलता स्तर को नहीं हासिल कर पाएगी जो हमारी सरकारों के स्वप्निल जीडीपी वृद्धि आंकड़ों को हासिल करने के लिए जरूरी होगा। इसी के साथ अर्थव्यवस्था सही तरह से औपचारिक ढांचा भी नहीं हासिल कर पाएगी। इसमें पैसे का प्रवाह तो होगा लेकिन वह अनौपचारिक क्षेत्र से होगा। इस वजह से अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़ी तमाम अंतर्निहित समस्याएं एवं कारण भी बने रहेंगे। यह मुद्दा दो सवाल भी खड़े करता है। पहला सवाल यह है कि इन नए बैंकों का आकार कितना बड़ा होना चाहिए और दूसरा सवाल है कि इनका स्वामित्व किनके पास होना चाहिए? रघुराम राजन समिति ने इन दोनों ही सवालों के जवाब अपनी रिपोर्ट में दिए थे। समिति ने कहा था कि हमारे पास कुछ सौ छोटे बैंक होने चाहिए और उनमें से किसी भी बैंक का स्वामित्व किसी औद्योगिक घराने के पास तब तक नहीं होना चाहिए जब तक संबद्ध पक्ष (यानी उस औद्योगिक घराने से जुड़ी किसी संस्था) के साथ लेनदेन रोकने के सख्त सुरक्षा उपाय नहीं किए गए हों। दो वजहों से ऐसी अनुशंसा करना एकदम सही था। पहला, वर्ष 1969 में राष्ट्रीयकरण के पहले देश में 600 से अधिक बैंक मौजूद थे और उनमें से तमाम बैंक छोटे आकार के थे और वे मुख्यत: जिंसों के बदले स्थानीय स्तर पर उधारी बांटते थे। उस समय तमाम बैंकों का स्वामित्व बड़े औद्योगिक घरानों के पास हुआ करता था और वे अपने इस्तेमाल के लिए जमाकर्ताओं की रकम आसानी से इस्तेमाल कर सकते थे। इस तरह जमाकतार्ओं के लिए बहुत अधिक जोखिम होता था लेकिन इंदिरा गांधी ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण का फैसला इन वजहों से नहीं किया था। राजन समिति ने यह नहीं बताया कि नए बैंकों का स्वामित्व औद्योगिक घरानों और सरकार के पास नहीं तो किसके पास होना चाहिए? सच तो यह है कि हमें अब भी इसका जवाब नहीं मालूम है। जब कोई समाज एवं सरकार वाणिज्यिक गतिविधि में किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती है तो यह सवाल बहुत मुश्किल हो जाता है। इससे एक सियासी सवाल भी खड़ा होता है जो आर्थिक क्रियाकलाप से भी जुड़ा है। हम जोखिम से बचने की राजनीतिक फितरत से कैसे छुटकारा पा सकते हैं? इसका संक्षिप्त उत्तर है कि वोटों के बेहद प्रतिस्पर्द्धी चुनावी बाजार में हमें इस छुटकारा मिला तो धीरे-धीरे ही मिलेगा। मसलन, एफडीआईएल विधेयक में जोखिम को करदाताओं से हटाकर जमाकर्ताओं पर लादने की कोशिश की गई लेकिन इसका पुरजोर ढंग से विरोध हुआ। अब उसका कोई नामलेवा नहीं है। वास्तव में यह एकदम वैसा ही है जैसा मुखर विरोध इन दिनों कृषि कानूनों का हो रहा है। किसान एक ऐसी आर्थिक गतिविधि में न्यूनतम मूल्य का आश्वासन चाहते हैं जो कि बैंकिंग की ही तरह मूल रूप से जोखिम भरी है। हमें सबसे पहले यह बात याद रखनी होगी कि कांग्रेस शैली वाली फोन बैंकिंग यानी मंत्री जी का फोन आने पर बिना जांच-पड़ताल मोटा कर्ज देना बेहद जोखिम वाला काम था। बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) का पुलिंदा बढ़ने से यह नजर भी आता है। इनमें से लगभग सारे कर्ज सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने बांटे हैं। यह बताता है कि स्वामित्व भी जमाकर्ताओं की लूट रोकने की गारंटी नहीं देता है। सार्वजनिक बैंकों को चलाने के नेताओं के तौर-तरीके और राष्ट्रीयकरण के पहले औद्योगिक घरानों के स्वामित्व वाले कुछ निजी बैंकों को चलाने के तरीके के बीच इकलौता फर्क यह है कि निजी बैंक के डूबने पर उसे बचाने के लिए करदाता नहीं थे।
एबीएन डेस्क, रांची। इस ऐतिहासिक परिघटना संथाल हूल को इतिहासकार संथाल विद्रोह मानते हैं जबकि सच्चाई यह है कि यह कोई विद्रोही आंदोलन नहीं था बल्कि ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ जंग था इसे समझने के लिए जंग और विद्रोह के बीच फर्क को समझना होगा विद्रोह किसी भी सत्ता से असंतुष्ट जन आंदोलन को कहा जा सकता है जबकि जंग दो सत्ताओं के बीच अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए होता है और संथाल हूल संथालो द्वारा अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ जंग था। 30 जून अट्ठारह सौ पचपन को शुरू हुआ भारत में प्रथम सशस्त्र जन संघर्ष जो बाद में चलकर प्रथम छापामार जंग भी बना 26 जुलाई अट्ठारह सौ पचपन को संथाल हूल के सृजनकर्ताओं में से प्रमुख व तत्कालीन संथाल राज्य के राजा सिद्धू और उनके सलाहकार व उनके सहोदर भाई कान्हू को वर्तमान झारखंड के साहिबगंज जिला के बरहेट प्रखंड में भोगनाडीह गांव में 1815 ईसवी को और सिद्धू का जन्म 1820 में हुआ था। संथाल विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभाने वाले इनके और दो भाई भी थे जिनका नाम चांद मुर्मू और भैरव मुर्मू था चांद का जन्म 1825 एवं भैरव का जन्म 1835 ईस्वी में हुआ था इनके अलावा इनकी दो बहने भी थी जिनका नाम फूलों मुर्मू और जानू मुर्मू था इन छह भाई-बहनों का पिता का नाम चुन्नी मांझी था। अपने वतन व जनचेतना की सुरक्षा हेतु वह निरंतर संघर्ष करता है बिहार जनजातीय समाज में अब तक जितने भी संघर्ष हुए उनका प्रमुख पहलू सामुदायिक पहचान बचाना रहा है जोत जमीन जल जंगल की रक्षा व समानता पर आधारित समाज निर्माण हेतु जमीन से जुड़े आदिवासियों के आंदोलन का एक लंबा इतिहास है। पाट,शोषण, बलात्कार जैसे उत्पीड़न व जुल्म से त्रस्त संथाल भागते फिर रहे थे लेकिन उनकी अधीनता स्वीकार करने को कतई तैयार नहीं थे इन तमाम घटनाक्रम को देखते हुए विद्रोह किया 1789 से 1831- 32 के बीच कई जनजातियां आंदोलन हुए हैं जिनके लिए खुंट - कट्टी व्यवस्था के विघटन के प्रति प्रतिशोध की भावना प्रमुख रूप से रही 1831 में मुख्य कोल विद्रोह हुआ मुंडा, हो, उरांव आदि सभी विद्रोह में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया मानसून में भूमिजो का विद्रोह हुआ इस विद्रोह के दौरान गांव लूटे गए जलाए गए तथा पुलिस सैनिकों सहित कई नागरिक मारे गए। रांची पलामू जिले विद्रोह के केंद्रबिंदु रहे। ब्रिटिश शासन के शुरू के 100 वर्षो में नागरिक विद्रोह का सिलसिला किसी खास मुद्दे व स्थानीय असंतोष के कारण चलता रहा 1763 से 1856 के मध्य देशभर में अंग्रेजो के खिलाफ 40 से अधिक बड़े विद्रोह में छोटे पैमाने पर तो इनकी संख्या बेशुमार है धार्मिक नेताओं के मौलवी पंडित ने भी विद्रोह के झंडे लहराए जनजातीय विद्रोह में उनकी जातीय हित की बुनियादी कारण रहे हैं जनजातियों में संथाल का विद्रोह ठोस, व्यापक और आक्रमक था भारत से अंग्रेजों को भगाने के लिए प्रथम जनक्रांति थी जो संथाल हुल के नाम से प्रसिद्ध हुई। संथालों में जनजातियों की संख्या सर्वाधिक है और उनका निवास संथाल परगना है उस समय छोटनागपुर के उत्तरी पूर्वी छोर पर स्थित है। इनकी अधिसंख्या के वजह ही संथाल परगना नाम दिया छोटनागपुर में दाखिल के बाद संथाल में इसी इलाके को अपना निवास स्थल बनाया संथाल परगना तब भागलपुर कमिश्नरी का अंग था हजारीबाग और वीरभूम जिले में संथाल बहुत पहले आ बसे थे इन्हीं इलाको से आकर ये मूल निवासी भोले भाले पहाड़िया की ओर से कोई खास विरोध नहीं हुआ। और कई गैर संथाली लोगों ने बड़ी हिस्सेदारी निभाई जिनमें मंगरा पूजोहर (पहाड़िया) गुरैया पुजहर (पहाड़ियां) हरदास जमादार (ओबीसी) ठाकुरदास (दलित) बेचू अहीर (ओबीसी) गंदू लोहरा, चुकू डोम दलित वर्ग से मानसिंह ओबीसी और गुरु चरण दास शामिल थे। जंगल को साफ कर खेती के लायक जमीन तैयार करते गए गांव बसाते गए सर्वप्रथम 1790- 1810 के बीच यहां बसे इनका आना-जाना जारी रहा 1836 तक 427 गांव से कम नहीं बसाए गए 1851 तक यहां संथालो के 1473 गांव बस चुके थे जिनकी आबादी लगभग 82795 हो गई थी। छोटनागपुर में अंग्रेजों का वर्चस्व 1756 से ही हो चुका था परंतु यहां की जनजातियों पर नहीं धीरे-धीरे शोषण, अत्याचार और जुल्म का शिकंजा जकड़ता गया 1850 तक यहां के चप्पे-चप्पे में शोषण छा चुका था संथाल भी इससे अछूता नहीं रहा। 71 साल बाद संथाल हूल का नेतृत्व भोगनाडीह निवासी चुन्नी मांझी के चार पुत्रों ने किया ये थे सिद्धू कान्हु चांद और भैरव हुल के समय कान्हु की उम्र 35, चांद की आयु 30 वर्ष और भैरव की उम्र 20 वर्ष बताई जाती है सिद्धू सबसे बड़ा था, जब सिधु कान्हू ने शोषण और अत्याचार के विरुद्ध विद्रोह करने का संकल्प ले लिया तो जनमानस तथा जनसमूह को एकजुट करने व अपने मुहिम को मुकाम तक पहुंचाने का अहद लेते हुए जनसमूह को एकजुट व संगठित करने तथा एकत्रित करने के लिए अंग्रेजों हमारी भूमि छोड़ो कि नारे से गूंज उठा और फिर सिद्धू ने ललकारा था करो या मरो अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ दो। अपने परंपरागत ढंग को अपनाया। डुगडुगी पिटवा दी और सालटहनी का संदेश गांव गांव में दिया। सिद्धू को अगस्त 1855 में पंचकठिया नामक स्थान पर बरगद के पेड़ पर फांसी दे दी गई वह पेड़ आज भी उसी स्थान पर स्थित है जिसे शहीद स्थल कहा जाता है जबकि कन्हू को भोगनाडीह ने फांसी दी गई पर आज भी वह संथालो के दिलों में आज भी जिंदा है और याद किए जाते हैं। (लेखक अखिल झारखंड प्राथमिक शिक्षक संघ झारखंड प्रदेश मुख्य प्रवक्ता हैं।)
एबीएन डेस्क, रांची। झारखंड में कोयले का भंडार समृद्ध है। साथ ही सौर और बायोमास जैसी ऊर्जा के प्राकृतिक संसाधन भी राज्य में प्रचुर मात्रा में हैं। ऊर्जा के इतने स्रोतों के बाद भी पूरे राज्य में बिजली की पहुंच अभी दूर के ख्वाब हैं। खासकर ग्रामीण इलाकों में बिजली की पहुंच का न होना, अभी भी चिंता के कारण हैं। ऐसा इसलिए है कि राज्य अपनी क्षमता और उपलब्धता के बराबर अक्षय ऊर्जा के स्रोतों का पूरा इस्तेमाल करने में असमर्थ है। राज्य के नेतृत्व को घरेलू और औद्योगिक उपभोक्ताओं की ऊर्जा मांग पूरा करने के लिए अपने नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों के उपयोग वास्ते एक स्वच्छ ऊर्जा नीति की आवश्यकता है। इनिशिएटिव फॉर सस्टेनेबल एनर्जी पॉलिसी के शोधकर्ताओं ने झारखंड के ऊर्जा क्षेत्र में काम करने वाले कई हितधारकों के साथ बातचीत की। विभिन्न साक्षात्कारों के माध्यम से, उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि राज्य में स्वच्छ ऊर्जा एकीकरण की आवश्यकता अनिवार्य है। इसके अलावा, उन्होंने राज्य के थर्मल पावर प्लांटों के पुराने बेड़े को बदलने के लिए स्वच्छ ऊर्जा समाधानों को लागू करने में आने वाली विभिन्न चुनौतियों की पहचान की। झारखंड की विकास नीतियों, पहलों और उनकी स्थिति की रिपोर्टों की विस्तृत समीक्षा की। इसके बाद अनुसंधान समूह ने राज्य के नेतृत्व के सामने आने वाली चुनौतियों को रचनात्मक रूप से कम करने के लिए दो व्यावहारिक कार्यान्वयन ढांचे बनाए हैं। कोयला के मामले में एतिहासिक रूप से समृद्ध होने के बीच बिजली क्षेत्र की समस्या बनी हुई है। खराब एकीकृत नई नीतियों, कई सरकारी गतिविधियों के बीच समन्वय की कमी, जैसी बाधाओं ने राज्य के क्लीन एनर्जी के विस्तारीकरण को प्रभावित किया है। झारखंड में घरेलू उद्योग न केवल अपनी क्षमता के अनुसार स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग नहीं कर रहे हैं, चुनौतियों को दूर करने और सरकारी प्रोत्साहन की कमी के कारण अक्षय ऊर्जा आधारित समाधान अपनाने से भी हिचक रहे हैं। कोयला आधारित बिजली विकास की प्राथमिकता ने अक्षय और विकेंद्रीकृत ऊर्जा क्षेत्र में विकास को पीछे धकेल दिया है। झारखंड सरकार को निवेश आकर्षित करने और अक्षय ऊर्जा के बुनियादी ढांचे को विकसित करने के लिए एक व्यापक ढांचे का निर्माण करना चाहिए। राज्य में प्रमुख उद्योगों को अक्षय ऊर्जा के उच्च मूल्यों का उपभोग करने के लिए रास्ते बनाना चाहिए। क्लीन एनर्जी की खरीद राज्य की वितरण कंपनियों को उनके नवीकरणीय खरीद दायित्वों (रिन्यूएबल परचेज आॅब्लीगेशंस- आरपीओ) अनुपालनों को पूरा करने में भी सहायता करेगी। समानांतर रूप से, सरकार को विकेंद्रीकृत ऊर्जा क्षेत्र में विकास को गति देने के लिए राज्य में काम कर रहे जमीनी स्तर के संगठनों के साथ साझेदारी करने के लिए स्थानीय अधिकारियों पर जोर देना चाहिए। इस संदर्भ में, हम राज्य की मौजूदा चुनौतियों के लिए कार्य समाधान के रूप में तैयार किए गए दो ढांचे की अनुशंसा करते हैं। यह स्पष्ट है कि कई भौगोलिक बाधाओं के कारण राष्ट्रीय ग्रिड हर घर तक नहीं पहुंच सकता है। जमीनी स्तर के विकास संगठनों के साथ बातचीत से पता चलता है कि ग्रामीण समुदाय बिजली के एक विश्वसनीय स्रोत तक पहुंचने में असमर्थ था। खासकर अविकसित केंद्रीय बिजली ग्रिड के माध्यम से अधिक बिजली कटौती के कारण। चूंकि बिजली एक जरूरी विकास संसाधन है, इसलिए राज्य के ग्रामीण और उप-शहरी क्षेत्रों में आॅफ-ग्रिड ऊर्जा को एकीकृत करना जरूरी है। ताकि बिजली के कारण जो व्यवसाय नहीं हो पा रहा है, उसे विकसित करने में मदद मिल सके। झारखंड में आॅफ-ग्रिड ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए तेजी से अभियान चलाया जाना चाहिए। इसमें झारखंड अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी (जेआरईडीए) और राज्य वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के बीच समन्वय में सुधार करना होगा। ताकि रणनीतिक जागरूकता अभियान के माध्यम से सोलर (आॅफ-ग्रिड) ऊर्जा समाधानों पर सामाजिक स्तर पर सुधार किया जा सके। राज्य-व्यापी कार्यान्वयन तकनीकों के माध्यम से मौजूदा मिनी-ग्रिड को राष्ट्रीय ग्रिड से जोड़ने के लिए एक तंत्र स्थापित किया जा सकता है। राज्य नियामकों और ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं तक पहुंच बनाने के लिए मिनी-ग्रिड एक अधिक कुशल और तेज मार्ग हो सकता है। लेकिन इसके लिए एक मजबूत नीति की आवश्यकता होगी। इससे राज्य की आॅफ-ग्रिड क्षमता में वृद्धि होगी। हालांकि इसे लागू करने में राजनीतिक बाधाएं और जन जागरूकता की कमी बाधा बन सकती है। राज्य में वित्तीय सहायता तंत्र और कौशल विकास में सुधार की योजना बनानी होगी। ऐसे परिदृश्य में, जहां सरकार निवेश करती है और एक गांव में एक संयंत्र स्थापित करती है, यह आवश्यक है कि संयंत्र गांव की बिजली की आवश्यकताओं को पूरा करे और आत्मनिर्भर हो। अक्षय ऊर्जा को वित्तीय और व्यवहारिक तरीके से एकीकृत करना केवल प्रशिक्षित स्थानीय व्यक्तियों द्वारा ही किया जा सकता है। ये व्यक्ति समुदायों में प्रौद्योगिकी को एकीकृत करने वाले आॅन-ग्राउंड कार्यबल के रूप में कार्य करेंगे। इसके अलावा, स्थापना के समय उनकी उपस्थिति राज्य में स्थानीय लोगों के साथ एक भरोसेमंद स्थिति बनाने में मदद करेगी। तेजी से नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन की दिशा में एक रूफटॉप सोलर का उपयोग करके राज्य की उच्च सौर क्षमता का लाभ उठाना होगा। राज्य में 1,300 से अधिक पंजीकृत एमएसएमई, 1,200 हाई स्कूल और कई अन्य सार्वजनिक भवन हैं, जिनका उपयोग रूफटॉप सोलर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने के लिए किया जा सकता है। इस परियोजना को झारखंड सरकार के साथ साझेदारी में रूफटॉप सोलर विकसित करने के लिए चल रहे राष्ट्रीय मिशन से जोड़ा जा सकता है।
एबीएन डेस्क, रांची। योग भारतीय जीवन पद्धति का एक महत्वपूर्ण अंग है भारतीय विज्ञान के अनुसार योग की उत्पत्ति हजारों वर्ष पहले हुई। सिंधु घाटी सभ्यता को योग विद्या का प्रारंभिक उद्गम माना जाता है। यह भारत की प्रथम शहरी सभ्यता है। योग शब्द का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद में हुआ। ऋग्वेद एक प्राचीन भारतीय पाठ संग्रह है जो चार वेदों में सबसे ज्यादा प्रचलित है। आज के समय में अगर योग की बात करें तो योग का अर्थ आसन प्राणायम करना है। लेकिन अगर ग्रंथों में उल्लेखित योग की परिभाषा या अर्थ को देखते हैं, तो किसी भी परिभाषा में आसन प्राणायम का जिक्र नहीं है। योग शब्द संस्कृत के युज धातु से बना है, जिसका अर्थ है जोड़ना अर्थात किसी वस्तु से अपने को जोड़ना। अंग्रेजी का योक शब्द भी उसी धातु से बना है। योग का आध्यात्मिक अर्थ है, वह साधन जिसके द्वारा योगी को जीवात्मा और परमात्मा के साथ ज्ञान पूर्वक संयोग होता है या संयोग कराने की प्रक्रिया बतलाई है। योग का अर्थ सभी आचार्यों ने आत्मदर्शन तथा ब्रह्म साक्षातपूर्वक स्वरूप स्थिति एवं मोक्ष की प्राप्ति से किया है। वेदांतिक शास्त्रों में भी आत्मदर्शन तथा ब्रह्म साक्षात्कार होने की बात कही है। गणित शास्त्र में योग शब्द का अर्थ है जोड़ होता है। रसायन शास्त्र में योग दो विभिन्न पदार्थों को अपना अपना स्वरूप खोकर एक अद्भुत पदार्थ में परिणत होने का ज्ञान भी योग है उदाहरण के लिए एक अनुपात नाइट्रोजन, तीन अनुपात हाइड्रोजन के योग के फलस्वरूप दो अनुपात अमोनिया प्राप्त होता है। महर्षि व्यास ने योग को समाधि बतलाया है, जिसका भाव यह है कि जीवात्मा इस उपलब्ध समाधि के द्वारा सच्चिदानंद (सत + चित + आनंद) स्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार करें। पुरुष प्रकृत्योतियोगेपि योग इत्यभिधीयते- सांख्य शास्त्र अर्थात प्रकृति पुरुष पृथ्कतव स्थापित कर अर्थात् दोनों का वियोग करके पुरुष के स्वरूप में स्थिर हो जाना योग है। कैवल्योपनिषद मे कहा है, श्रद्धा भक्तियोगावदेहि (1/2) अर्थात् श्रद्धा भक्ति और ध्यान के द्वारा आत्मा को जानना योग है। अग्नि पुराण ब्रह्मप्रकाशकं ज्ञानं योगस्तत्रैक चित्तता। चित्तवृत्तिनिरोधश्च जीवब्रह्मात्मनी: पर: ।। अग्निपुराण 183/ 1-2 अर्थात ज्ञान का प्रकाश पड़ने पर चित्त ब्रह्म मे एकाग्र हो जाता है, जिससे जीव का ब्रह्म मिलन हो जाता है। ब्रह्म में चित्त की एकाग्रता ही योग है। स्कंद पुराण जीवात्मा परमार्थोऽयमविभाग: परमतप: स: एव परोयोग: समासा कथितस्तव। अर्थात जीवात्मा और परमात्मा का अलग अलग होना ही दुख का कारण है और इसका अपृथक तक भाव ही योग है (एकत्व की स्थिति ही योग हैं)। लिंग पुराण: योग निरोधो वृत्तेस्तु चितस्य द्विज सत्तमा।अर्थात चित्त की सभी वृत्तियों का निरोध हो जाना उसे पूर्ण समाप्त कर देना योग है । उसी से परमगति अर्थात ब्रह्म की प्राप्ति होती है विष्णुपुराण के अनुसार - योग: संयोग इत्युक्त: जीवात्म परमात्मने, अर्थात् जीवात्मा तथा परमात्मा का पूर्णतया मिलन ही योग है। कठोषनिषद् में योग के विषय में कहा गया है : यदा पंचावतिष्ठनते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहु: परमां गतिम।। तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् ।अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभावाप्ययौ।। कठो.2/3/10-11, अर्थात जब पांचों ज्ञानेन्द्रियां मन के साथ स्थिर हो जाती है और मन निश्चल बुद्धि के साथ आ मिलता है. उस अवस्था को ‘परमगति’ कहते है। इंद्रियों की स्थिर धारणा ही योग है। जिसकी इंद्रियां स्थिर हो जाती हैं, अर्थात् प्रमाद हीन हो जाता है। उसमें शुभ संस्कारो की उत्पत्ति और अशुभ संस्कारो का नाश होने लगता है। यही अवस्था योग है। गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से आध्यात्मिक चर्चा के दौरान योग को कई तरह से परिभाषित किया। योगस्थ: कुरू कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय:। सिद्ध्यसिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।। गीता ( 2/48 ) अर्थात योग में स्थित हुआ कर्म फल को त्याग कर और सिद्धि असिद्धि में सम होकर तू कर्मों को कर, यह समता ही योग है।जब किसी कार्य में अशक्ति होती है तभी उसके भले या बुरे फल का प्रभाव हमारे दिल दिमाग पर पड़ता है और उसके अनुसार ही संस्कार बन जाता है ।फिर वही संस्कार पाप और पुण्य के रूप में कर्म के परिपक्व अवस्था में उदय होते है। योग सूत्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि ने योग को परिभाषित करते हुए कहा है। योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:ह्ण यो.सू.1/2, अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध करना ही योग है। चित्त का तत्पर अंतरण से है। बाहयकरण ज्ञानेन्द्र जब विषयों को ग्रहण करती है, मन ज्ञान को आत्मा तक पहुँचता है। आत्मा साक्षी भाव से देखता है बुद्धि अहंकार विषय का निश्चय करके उसमें कर्तव्य भाव लाते है। इस संपूर्ण क्रिया से चित्त में जो प्रतिबिंब बनता है। वही वृत्ति कहलाता है। यह चित्त का परिणाम है। अत: विषयाकार उसमें आकर प्रतिबिंबित होता है अर्थात चित्त का विषयाकार हो जाता है। महर्षि कहते हैं कि योग के आठ अंगों के अनुष्ठान करने से अर्थात उनको आचरण में लाने से चित्त के मल का अभाव होकर वह सर्वथा निर्मल हो जाता है। उस समय योगी के ज्ञान का प्रकाश विवेकख्याति तक हो जाता है, अर्थात उसे आत्मा का स्वरूप, बुद्धि, अहंकार और इंद्रियों से सर्वथा भिन्न प्रत्यक्ष दिखाई देता है। योग के आठ अंगों को अष्टांग योग की संज्ञा दी गई है। इसका उल्लेख महर्षि पतंजलि योग सूत्र के साधन पाद के 29 श्लोक में किया है उन्होंने कहा है यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि, ये योग के आठ अंग है और हर अंग का अपना महत्व है। निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि योग केवल आसन प्राणायम ही नहीं है उससे भी अधिक है आसन प्राणायम तो मात्र उसकी सीढ़ियां हैं।
एबीएन डेस्क, रांची। कोरोना महामारी की चुनौतियों से इस वक्त भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व लड़ रहा है। वैश्विक महामारी के चलते दुनियाभर के देशों में रोजगार सृजन एक प्रमुख समस्या उभरकर सामने आई है। इस समस्या को देखते हुए ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार अपने भाषणों में आत्मनिर्भर भारत बनाने की बात कर रहे हैं। जिसका उद्देश्य कोरोना महामारी से लड़ना नहीं बल्कि भविष्य के भारत का निर्माण करना है। कई दशकों तक भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया के लिए बंद थी। लेकिन आर्थिक संकटों से जुझ रहे भारत ने अपने बाजार को 1991 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के जरिए दुनिया के लिए खोल दिया। ऐसे वक्त में जब विदेशी कंपनियों ने भारत को अपने आगोश में ले रखा है। उस स्थिति में स्वदेशी वस्तुओं के जरिए बाहरी कंपनियों के उत्पादों को टक्कर देना किसी चुनौती से कम नहीं होगा। भारत को आत्मनिर्भर बनाने का मतलब दुनिया से नाता तोड़ने जैसा नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री जो कह रहे हैं उसे निभाना आसान नहीं होगा। मौजूदा समय में अमेरिका और चीन हमारे जीवन से जुड़ी वस्तुओं के जरिए सीधा दखल दे रहे हैं। इसके अलावा सरकार को स्वदेशी वस्तुओं के निर्माण के लिए निमार्ताओं को आर्थिक सहायता भी मुहैया करानी होगी, जिससे विश्व व्यपार संगठन के साथ भारत का सीधा मुकाबला हो। मार्च 2020 से ही विश्व की लगभग सभी अर्थव्यवस्थाएं परिणामी स्वास्थ्य व आर्थिक क्षेत्र में हो रही गिरावट के चलते तनाव में हैं। इसके परिणामस्वरूप कई उद्योग और संगठन या तो बंद हो गए हैं या न्यूनतम क्षमता पर काम कर रहे हैं और इसका प्रभाव अब वैश्विक स्तर पर दिखाई दे रहा है। एनआईपी के रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया में जनसंख्या के मामले में दूसरे, अर्थव्यवस्था में 5वें और इंफ्रास्ट्राक्चर के मामले में 70वें स्थान पर है। जो एक तरह से चिंताजनक स्थिति है। इस रिपोर्ट में अलग-अलग क्षेत्रों की प्राथमिकताओं और उनकी चुनौतियों की पहचान की गई तथा इसके समाधान के लिये एक रूप रेखा तैयार की गई है। देश में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के क्षेत्र में तीव्र सुधार हेतु विभिन्न क्षेत्रों से 7000 परियोजनाओं को चिन्हित किया गया है। पिछले कई वर्षों में यह देखा गया है कि अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने में इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं बहुत ही सहायक रही हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा 2001 में प्रारंभ किये गए स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना की शुरूआत के दौरान भी देश की आर्थिक स्थिति बहुत ठीक नहीं थी। हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी परियोजनाओं के लंबित होने के कारण अधिकांश बैंक ऐसी परियोजनाओं के लिये ऋण उपलब्ध कराने से बचती नजर आ रही हैं। वर्तमान परिस्थिति में अधिक लागत वाली बड़ी परियोजनाओं को शुरू करना और उनके लिए धन जुटाना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण है। अधिकांश बड़ी परियोजनाओं को पूरा होने में समय लग जाता है। जिससे सरकारों के बदलने और सरकार की नीतियों में बदलाव के कारण निजी क्षेत्रों की भागीदारी पर नाकारात्मक प्रभाव पड़ता है। महामारी के कारण बेहाल अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए केद्र सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदम में ऐसी योजनाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए जिसे कम समय में पूरा किया जा सके। ताकि इन परियोजनाओं से अर्थव्यवस्था को आसानी से पटरी पर लाने में मदद मिल सके। इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी परियोजनाओं में आर्थिक संकटो का सामना करना पड़ता है। जिससे के निजी क्षेत्र के कंपनियों को तय समय सीमा के अंदर काम को पूरा करना कठिन होता है। सरकार को विकास वित्तीय संस्थान की स्थापना के लिए कदम उठाना चाहिए जिससे ऐसी परियोजनाओं के लिए निर्धारित ब्याज दर पर 20-25 वर्षों के लिए ऋण उपलब्ध करा सके। ऐसे संस्थानों के स्थापना से परियोजना से जुड़ी कंपनियों को बैंकों के दरवाजे को खटखटाना नहीं पड़ेगा और एनपीए की समस्या से निजात मिलेगा। दिल्ली मेट्रो जैसी बड़ी परियोजनाओं को इस लिए शुरू किया जा सका था क्योंकि इनके लिए जापान से लंबी अवधि का ऋण उपलब्ध कराया गया था। गौरतलब है कि आम बजट 2021 में सरकार की ओर से भारत की आर्थिक विकास दर स्थिर रखने के लिए लंबे समय तक चलने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर विशेष बल दे रही है। इस योजना के साथ सरकार ने विकास वित्तीय संस्थान (डीएफआइ) की स्थापना पर पुन: विचार करने का प्रस्ताव किया है। आजादी के बाद से देश के विकास को तेज गति देने के लिए डीएफआई 1948 में भारतीय औद्योगिक वित्त निगम (आइएफएसआइ) की स्थापना के साथ प्रारंभ हुआ था। लेकिन 1970-80 के दशक के दौरान डीएफआई में राजनीति हस्तक्षेप के कारण लाभ पहुंचाने के लिए प्रभाव वाले निजी क्षेत्र की कंपनियों को ऋण दिया गया। परिणति के रुप में संस्थान एनपीए हो गया। मामला सामने आने के बाद 1991 में नरसिंहम समिति की सिफारिश के बाद डीएफआई को भंग कर दिया गया और तत्कालीन सक्रिय विकास वित्तीय संस्थानों को वाणिज्य बैंको में बदल दिया गया था। कोरोना के कारण उपजी हुई परिस्थितियों में आत्मनिर्भर भारत अभियान में तमाम चुनौतियों होने के बावजूद मजबूती के लिए औद्योगिक निवेश की आवश्यकता है। जिससे रोजगार सृजन के साथ वैश्विक ताकत के साथ देश को उभारने में मददगार साबित हो। मनरेगा जैसी रोजगार परक योजनाओं में पारदर्शिता लाने, 100 दिन के कार्य दिवस और मजदूरी दर को बढ़ाने पर सरकार को बल देना चाहिए। जिससे गांव के लोगों को असानी से गांव में ही रोजगार मिल सके। भारत में आर्थिक उदारीकरण के बाद कई क्षेत्रों में अपनी उत्पाद क्षमता में वृद्धि की है। परंतु अन्य कई अन्य कई क्षेत्रों में भी जहां बेहतर संभावनाएं हैं। भारतीय कंपनियां उत्पादन से हटकर व्यापार में अधिक सक्रिय रही हैं। पूर्व में भारत को स्टील उत्पाद, सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार में आत्मनिर्भर के लिए किये गए प्रयास में काफी सफलताएं मिली हैं।
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