एबीएन डेस्क। काल के कपाल पर नई लकीर खींचने के लिए लंबी उम्र की नहीं बल्कि बड़े हौसले की आवश्यकता होती है। आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह और हिंदी नवजागरण के अग्रदूत भारतेंदु हरिश्चंद्र का जीवन छोटा रहा। वह मात्र 35 सालों तक ही जीवित रहे । बहुत ही कम समय मिलने के बावजूद उन्होंने हिंदी साहित्य की बड़ी सेवा की और उसे नई राह पर लाकर खड़ा कर दिया। भक्ति काल के बाद हिंदी साहित्य का रीतिकाल आया, जिसमें जनता से जुड़ी बातें हाशिए पर डाल दी गईं और राजा-महाराजाओं की कपोल कल्पित दस्तानों पर कविताएं लिखी जा रही थी। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने साहित्य को रीतिकाल की कपोल कल्पना से बाहर निकाला और साहित्य को समाज सुधार एवं राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनाए जाने पर जोर दिया। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, भारतेंदु का पूर्ववर्ती काव्य साहित्य संतों की कुटिया से निकलकर राजाओं और रईसों के दरबार में पहुंच गया था। उन्होंने एक तरफ तो काव्य को फिर से भक्ति की पवित्र मंदाकिनी में स्नान कराया और दूसरी तरफ उसे दरबारीपन से निकालकर लोकजीवन के आमने-सामने खड़ा कर दिया। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म 9 सितंबर 1850 बनारस के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। उनका मूल नाम हरिश्चन्द्र था और भारतेन्दु उनकी उपाधि थी। भारतेन्दु आधुनिक हिंदी साहित्य के साथ-साथ हिंदी थियेटर के भी पितामह कहे जाते हैं। उनके पिता गोपाल चंद्र एक कवि थे। वह गिरधर दास के नाम से कविता लिखा करते थे। भारतेन्दु जब 5 वर्ष के हुए तो मां का साया सर से उठ गया और जब 10 वर्ष के हुए तो पिता का भी निधन हो गया। भारतीय नवजागरण की मशाल थामने वाले भारतेंदु ने अपनी रचनाओं के जरिए गऱीबी, गुलामी और शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद की। हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल का प्रारम्भ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से माना जाता है। सिर्फ पैंतीस वर्ष की उम्र पाने वाले भारतेंदु की अनेक विधाओं पर पकड़ थी। वे एक गद्यकार, कवि, नाटककार, व्यंग्यकार और पत्रकार थे। उन्होंने बाल विबोधिनी पत्रिका, हरिश्चंद्र पत्रिका और कविवचन सुधा पत्रिकाओं का संपादन किया। भारतेन्दु ने सिर्फ 18 वर्ष की उम्र में कविवचनसुधा पत्रिका निकाली, जिसमें उस वक्त के बड़े-बड़े विद्वानों की रचनाएं प्रकाशित होती थीं। हिंदी में नाटकों की शुरूआत भारतेन्दु हरिश्चंद्र से मानी जाती है। नाटक भारतेन्दु के समय से पहली भी लिखे जाते थे, लेकिन बाकायदा तौर पर खड़ी बोली में नाटक लिखकर भारतेन्दु ने हिंदी नाटकों को नया आयाम दिया। भारतेन्दु के नाटक लिखने की शुरूआत बांग्ला के विद्यासुंदर (1867) नाटक के अनुवाद से हुई। तेज याददाश्त और स्वतंत्र सोच रखने वाले भारतेन्दु कई भारतीय भाषाओं के जानकार थे। उन्होंने अपनी मेहनत से संस्कृत, पंजाबी, मराठी, उर्दू, बांग्ला, गुजराती भाषाएं सीखीं। हालांकि, अंग्रेजी उन्होंने बनारस में उस दौर के मशहूर लेखक राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द से सीखी। एक दौर में भारतेन्दु की लोकप्रियता शिखर पर थी, जिससे प्रभावित होकर काशी के विद्वानों ने उन्हें 1880 में भारतेंदु की उपाधि दी। भारतेन्दु के विशाल साहित्यिक योगदान के कारण 1857 से 1900 तक के काल को भारतेन्दु युग के नाम से जाना जाता है। 6 जनवरी 1885 को उन्होंने अंतिम सांस ली। 19वीं शताब्दी में भारतीय समाज करवट ले रहा था। यूरोपीय लोगों के संपर्क और सामंती व्यवस्था से मुक्ति की प्रक्रिया एक साथ चल रही थी। राजा राममोहन राय, रामकृष्ण परमहंस, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, ज्योतिबा फुले सहित अनेक समाज सुधारक स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह आदि की वकालत कर रहे थे तो सती प्रथा जैसी कुरीतियों का विरोध भी कर रहे थे। समाज में आ रहे बदलाव की आहट साहित्यिक क्षेत्र में भी सुनाई देना स्वाभाविक था। भारतेंदु हरिश्चंद्र नई चेतना के अग्रदूत के रूप में सामने आए और उन्होंने सामाजिक एवं राष्ट्रीय उत्तरदायित्व से युक्त रचनाएं की। आर्थिक असमानता, ग्रामीण समाज में गरीबी, पराधीनता, अमानवीय शोषण आदि को उन्होंने अपनी साहित्यिक रचनाओं का विषय बनाया। स्वयं तो लगातार लिखा ही, सैंकड़ों दूसरे लोगों को भी लिखने और सांस्कृतिक गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग लेने के लिए प्रेरित किया। जब वह 18 वर्ष के थे तो उन्होंने कवि वचन सुधा पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। 23 वर्ष की अवस्था में उन्होंने हरिश्चंद्र मैगजीन और 24 वर्ष की अवस्था में स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए बाला बोधिनी पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। पूरे देश के लोगों को इन पत्रिकाओं में लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। वैष्णव भक्ति के प्रचार के लिए उन्होंने तदीय समाज की स्थापना की। नाटक हो, निबंध हो, कहानी हो या आलोचना, सर्वत्र उन्होंने पुराने ढांचे के अवयवों के खिलाफ काम किया जो समय के अनुकूल नहीं रह गए थे। राजनीतिक स्वाधीनता की चाहत तो वह रखते ही थे, मनुष्य की एकता, समानता और भाईचारा को भी उन्होंने समान महत्व दिया। अपने समकालीन साहित्यकारों को प्रोत्साहित करते हुए उन्होंने साहित्य को सामाजिक उत्तरदायित्व की चेतना से युक्त किया। अंधेर नगरी, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, भारत दुर्दशा, जैसी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने प्रगतिशील आधुनिक समाज की परिकल्पना करते हुए दुर्भावना एवं भेदभाव आधारित व्यवस्था की समाप्ति की कामना की। 9 सितंबर को भारतेंदु हरिश्चंद्र की 171वीं जयंती है। उनको याद करना एक ऐसे मनीषी को याद करना है, जिन्होंने हिंदी साहित्य को नए भाव बोध की जमीन पर उतारते हुए लोक को राजसत्ता से अधिक महत्व दिया, जिन्होंने बढ़ते ब्रिटिश आभामंडल को चुनौती देते हुए पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं का नारा बुलंद किया, जिन्होंने दकियानूसी विचारों को चुनौती दी और पाश्चात्य जगत के सुंदर विचारों को साहित्य एवं समाज में स्थान दिया। भारतेंदु हरिश्चंद्र एक ऐसे महामानव थे जिन्होंने साहित्य और संस्कृति के माध्यम से बेहतर समाज की रचना के लिए अपना पूरा जीवन और पुरखों का लगभग पूरा धन समर्पित कर दिया।
एबीएन डेस्क। पूरा देश हर साल पांच सितंबर को शिक्षक दिवस मनाता है। यह दिन भारत के पहले उप-राष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। उन्होंने ने ही इस दिन को शिक्षकों को समर्पित करने की इच्छा जाहिर की थी। भारत में 5 सितंबर का दिन शिक्षक दिवस के तौर पर मनाया जा रहा है। इस मौके पर देशभर में बच्चे अपने शिक्षकों के प्रति अलग-अलग तरह से अभिवादन प्रकट कर रहे हैं। एक शिक्षक का अर्थ आमतौर पर किसी ऐसे व्यक्ति से लगाया जाता है, जिसके पास अपने क्षेत्र में ज्ञान का भंडार हो या वह अनुभवी हो। इसका सीधा सा अर्थ है कि कोई ऐसा व्यक्ति जिसने उम्र के कई पड़ावों में ज्ञानर्जन किया है, वही असली शिक्षक है। हालांकि, धीरे-धीरे यह धारणा या तो बदल रही है या इसे चुनौती दी जा रही है। अमर उजाला पेश कर रहा है ऐसे ही छह युवाओं के नाम जिन्होंने कम उम्र के बावजूद अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और पूरी दुनिया को सीख देकर खुद को शिक्षक के तौर पर पेश किया।
एबीएन डेस्क। विश्व हिंदू परिषद ने पूज्य संतो के आदेश से विश्व का सहस्त्राब्दी का सबसे बड़ा अहिंसक जनांदोलन प्रारंभ की। श्री राम जन्मभूमि आंदोलन के अनतर्गत देश के साढ़े तीन लाख गांवों में श्रीरामशिला पूजन हुई। 9 नवंबर 1989 को श्री कामेश्वर चौपाल जी के हाथों राम मन्दिर का शिलान्यास किए। 30 अक्टूबर,1990 को तत्कालीन मुख्यमंत्री की गर्वोक्ति को चूर कर हजारों कारसेवकों ने रामजी की नगरी में प्रवेश किया परन्तु अवध की इस पावन धरती पर रामभक्त्तों ने जल्लाद सरकार के द्वारा चलाए गए गोली खाकर अपने पवित्र रक्त से लाल करते हुए हिंदू समाज के लिए सैकड़ों कारसेवक सर्वोच्च बलिदान दे दिए। गीता जयंती (6 दिसंबर,1992) को देशभर से एकत्रित कारसेवक के आंखों में मन्दिर निर्माण का संकल्प ने न्यायालय का अवरोध को परवाह किए बगैर 1528 से हिन्दू पौरुष को चुनौती दे रहा कलंक का प्रतीक ढांचा कारसेवकों के कोप से ढह गया। यह हिंदू समाज का शौर्यावतार था। उसी दिन से टाट के मन्दिर में विराजमान रामलला, प्रस्तावित मंदिर के 60 प्रतिशत पत्थर और गांव-गांव से पूजित शिलाएं भव्य राममंदिर निर्माण की प्रतीक्षा श्रीअयोध्या जी में कर रहीं थीं। परिषद ने जागरण के महाभियान के साथ साथ कानूनी लड़ाई भी लड़ी। 30 सितम्बर, 2010 को न्यायालय ने भी रामलला की जन्मभूमि यही है यह मान तो लिया लेकिन जन्मभूमि का विभाजन कर दिया। हिंदू समाज को नैतिक विजय तो मिली लेकिन जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सका। देश की सर्वोच्च अदालत में अपील हुई। 6 वर्ष तक मामला जस का तस। एक बार तो न्यायालय ने यह तक कह दिया यह विषय हमारी प्राथमिकता में नहीं है। पूज्य संतो ने एक बार पुन: आह्वान किया हिन्दू समाज को। देश में 5 विराट सहित सैकड़ों हिन्दू सम्मेलन हुये। 25 नवम्बर 2018 को रामलला की नगरी में एक बार फिर आन्दोलन के प्रारंभिक काल का दृश्य दिखाई पड़ा। जनज्वार उमड़ा। हिन्दू ने अपनी प्राथमिकता बता दी राम जी के जन्मस्थान पर ही भव्य मंदिर बने। अंतत: वह शुभ घड़ी आ ही गयी मुख्य न्यायाधीश गोगोई जी की अध्यक्षता में खण्ड पीठ ने सर्वसम्मत निर्णय सुनाया जहां रामलला टाट के मन्दिर में विराजमान हैं, वही रामलला की जन्मभूमि है। मन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो गया। 76 लड़ाइयों में हमारे लाखों पुरखों के बलिदान का सुफल हिंदू हृदय सम्राट माननीय अशोक सिंघल जी के प्रेरक नेतृत्व, महंथ अवैद्यनाथ जी,परमहंस रामचन्द्र दास जी जैसे हजारों पूज्य संतो के मार्गदर्शन का सुफल हिन्दू समाज के त्याग, साधना व बलिदान का सुफल 5 अगस्त, 2020 को भव्य मंदिर का भूमिपूजन से हुई। विगत 1000 वर्ष में हिंदू समाज के सबसे बड़ी विजय का महापर्व और हिंदू के स्वर्ण युग का पुनरारंभ हुआ। हमारी पीढ़ी भाग्यवान है, हम इस सुदिन के साक्षी रहे। विहिप के अह्वान पर 1996 में काश्मीर के आतंकवादियों की विरोध के चुनौतियों को स्वीकार कर लाखों हिंदुओं की अमरनाथ यात्रा, 2007 में श्रीरामसेतु को बचाने हेतु सड़क पर उतरना, बुढ़ा अमरनाथ यात्रा करना इत्यादि कई बड़े जनआंदोलन हुआ है। महर्षि देवल, परशुरामाचर्य, स्वामी रामानंद तथा स्वामी दयानन्द की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए विश्व हिंदू परिषद अपने स्थापना काल से ही धर्मांतरित बंधुओं के घर वापसी के सत्कार्य में लगा है। मठ मंदिर,अर्चक-पुरोहित तीर्थ और संस्कृत की पुनर्प्रतिष्ठा का कार्य भी परिषद् सफलता पूर्वक कर रहा है। गिरिवासी वनवासी अंचलों में अपने बंधुओं के बीच 1 लाख से अधिक एकल विद्यालयों के माध्यम से सेवा कार्य में निरंतर लगा हुआ ह। प्रतिवर्ष हजारो गोवंश की रक्षा, जेहादियों के चंगुल से हिंदू बहनों को मुक्त कराने सहित अनेक धर्मिक व सांस्कृतिक जनजागरण का कार्य निरन्तर चलाया जा रहा है। कर्नाटक स्थित हिंदू सम्मेलन में पूज्य संतगणों और पूज्य श्री गुरुजी की उपस्थिति में पूज्य संतों द्वारा हिंदू समाज में पराधीनता के लंबे कालखंड के दुष्परिणाम से व्याप्त अश्पृश्यता के विरुद्ध प्रस्ताव पारीत किए गए जो हिन्दू समाज के लिये ऐतिहासिक क्षण था। पूज्य संतो ने घोषणा की कि छुआछूत शास्त्रसम्मत नहीं, जन्म के आधार पर कोई बड़ा अथवा छोटा नहीं, कोई पावन नहीं, कोई अपवित्र नहीं, हम सब ऋषिपुत्र हैं, भारतमाता की सन्तान हैं व सहोदर भाई हैं। यहां हम हिंदू समाज को हिंदव: सोदरा: सर्वे,न हिन्दू पतितो भवेत। मम दीक्षा हिन्दू रक्षा,मम मन्त्र समानता।। एवं धर्मो रक्षति रक्षित: ध्येयवाक्य मिला। विश्व भर में निवास कर रहे हिन्दू समाज को जाति, मत, पंथ, भाषा, भौगोलिकसीमा से ऊपर उठकर आग्रही, संगठित, सशक्त, श्रद्धालु, अपने पूर्वज परम्परामान्यता - मानबिन्दुओं पर गौरव रखने वाले तथा इनकी पुनर्प्रतिष्ठा करने के लिये सर्वस्व न्योछावर करने का संकल्प लेने वाले हिन्दू को खड़ा करना विश्व हिन्दू परिषद मुख्य उद्देश्य है। विहिप के द्वारा गोवंशरक्षा, अपने ही देश में हिन्दू शरणार्थी, बांग्लादेशी घुसपैठिये, जेहादी आतंकवाद, लव जेहाद, नक्सलवाद, विदेशी धन से ईसाईकरण, सिमटती पतिपावनी गंगा तथा पर्यटन केंद्र में बदलता देवतात्मा हिमालय , मुस्लिम तुष्टिकरण, एक ही देश में दो विधान आदि विषयों पर निरन्तर चिन्तन कर समाधान के मार्ग ढुंढे जा रहे है तथा चुनौतियों का सामना करने के लिए अनथक श्रम कर गिरिवासी, वनवासी, नगरवासी,ग्रामवासी हिन्दू समाज में से लक्षाधिक कार्यकर्त्ता खड़ा कर गांव- गांव तक संगठन के तंत्र को फैला रहा है। झारखंड प्रांत के सभी पंचायतों में विहिप स्थापना दिवस कार्यक्रम 6 सितम्बर, 2021 तक मनाया जायेगा।
एबीएन डेस्क। भले ही चुनावों को लेकर औपचारिक प्रावधान बरकरार हैं लेकिन भारतीय लोकतंत्र राजनीतिक संस्कृति के एक बड़े संकट का सामना कर रहा है। इस संकट में सत्ताधारी दल और विपक्ष के बीच के संवाद, एक विविधतापूर्ण समाज में बहुसंख्यकवाद की बढ़ती वैधता, मूल अधिकारों और कानून प्रवर्तन के प्रावधानों के प्रभाव को लेकर भरोसा कम होना, केंद्र सरकार द्वारा राज्यों के अधिकारों के अतिक्रमण के साथ संघवाद का क्षय, विकास संबंधी नीतियों का चुनावी नतीजों को लक्ष्य कर बनाया जाना आदि बातें शामिल हैं। भारतीय संविधान ने देश को धर्मनिरपेक्ष, उदार लोकतांत्रिक मूल्यों वाला बनाया और इसकी वजह थी विभाजन के सांप्रदायिक आधार को लेकर तीव्र प्रतिक्रिया। संविधान सभा की बहसों को पढ़ने से भी यह बात प्रमाणित होती है। नेहरू युग में इसका बचाव एक ऐसे नेता ने किया जो दिल से धर्मनिरपेक्ष था, संसदीय परंपरा की इज्जत करता था और लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका की भी। सच तो यह है कि सत्ताधारी दल स्वयं विविध हितों वाले लोगों का समूह था और इसलिए विचारधारा आधारित शासन रोकने में मदद मिली। आज जिस दल का सत्ता पर कब्जा है वह विचारधारा आधारित राजनीतिक शक्ति है। ऐसा नहीं है कि संसदीय परंपरा और विपक्ष का यह सम्मान नेहरू युग की खासियत रही। बहुत बाद में पीवी नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भी यह देखने को मिला। परंतु इन दिनों विपक्ष और सरकार के साथ रिश्तों की जो स्थिति है और कानून तथा नीतियां बनाने के पहले मशविरों के न होने ने भी उस विश्वास को कमजोर किया है जिसके आधार पर एक लोकतांत्रिक सरकार काम करती है। हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती है एक धर्मनिरपेक्ष और उदार लोकतांत्रिक देश के रूप में हमारे भविष्य में आस्था बहाल करना और विविधता को लेकर व्यापक सहिष्णुता। यह बात संविधान की बुनियाद में अंतर्निहित है जिसके तहत सार्वभौमिक मताधिकार से शासन चलता है। इसका अर्थ है धर्म, जातीय पहचान, भाषा, लिंग और अन्य विविधता वाली बातों की भरपूर इज्जत करना। सन 1940 के दशक में सार्वभौमिक मताधिकार के कारण समाज में समता की भावना पैदा हुई जबकि हमारा समाज ऐसा जहां पदसोपानिक असमानता सामाजिक ढांचे और व्यक्तिगत मनोविज्ञान में गहरे तक धंसी हुई है। इससे संबंधित निर्देश विभिन्न जिलों में पदस्थ सभी अफसरशाहों तक पहुंचाए गए कि ऐसी सार्वभौमिक मतदाता सूची तैयार की जाए। पहले से मौजूद मतदाता सूचियां प्राय: सार्वभौमिक नहीं होती थीं और समुदायों द्वारा तैयार की जाती थीं। अफसरशाहों ने इस आदेश को गंभीरता से लिया। उदाहरण के लिए तत्कालीन बंबई के जिला कलेक्टर ने पूछा कि सड़कों पर रहने वालों को कैसे छोड़ा जा सकता है जबकि उनका तो कोई स्थायी पता भी नहीं होता। मेरा मानना है कि अफसरशाहों ने तय किया कि उनकी सोने की जगह को ही उनका पता माना जाए। यह नियम अब भी जारी है। आज जरूरत इस बात की है कि हमारी अफसरशाही शासन के हर स्तर पर ऐसी ही प्रतिबद्धता दिखाए। सार्वभौमिक मताधिकार जैसा सिद्धांत तब कारगर नहीं है जब समाज के किसी एक समूह की वैचारिकी हावी हो। लोकतंत्र के समक्ष सबसे बड़ा खतरा बहुसंख्यकवादी अधिनायकवाद है। इससे बचने के लिए हमें ऐसी राजनीतिक संस्कृति और मीडिया की जरूरत है जो लोगों के बीच विश्वास बढ़ाए। सबसे पहले इस बात को चिह्नित करना होगा कि हम सब समान हैं और एक व्यक्ति का एक मत है। भले ही बहुसंख्यक वर्ग को जीत हासिल हो लेकिन अल्पसंख्यकों को भी अपने मतांतर के बचाव और संरक्षण का पूरा अधिकार है। यह भरोसा एक सक्रिय लोकतंत्र में पैदा होता है। दूसरी बात, इससे आगे यह भी कहा जा सकता है कि हर व्यक्ति अपना नजरिया पेश करने को स्वतंत्र है। इसका व्यावहारिक उदाहरण है लोकतंत्र में अल्पसंख्यक नजरिये को अभिव्यक्त करना। तीसरा, चरण एक कदम आगे का है जहां कोई व्यक्ति यह कह सकता है कि अगर मैं आपकी जगह रहूं तो ऐसा कहूंगा। ऐसी बातें एक लोकतांत्रिक देश में अल्पसंख्यकों के नजरिये को व्यवहार में जगह देती हैं। मिसाल के तौर पर विद्यालयों में माथे पर स्कार्फ लगाने की इजाजत देना। हमें आज ऐसी राजनीतिक संस्कृति की आवश्यकता है जिसमें सच्चाई, सम्मान, सभ्यता और संयम हों। यदि पुलिस कानून के बजाय अपने राजनीतिक आकाओं द्वारा तय नियमों का पालन करेगी तो ऐसा नहीं होगा। बहुसंख्यक वर्ग के निगरानी दस्ते अल्पसंख्यक प्रदर्शनकारियों को जिस प्रकार प्रताड़ित करते हैं और उन्हें जो बचाव प्राप्त है वह स्तब्ध करने वाला है। पुलिस की कार्यप्रणाली को निष्पक्ष बनाने के अलावा हमें गैर सरकारी संस्थानों के अहम तत्त्वों में भी नई ऊर्जा का संचार करना होगा ताकि लोग साथी नागरिकों के साथ नैतिक बंधन महसूस कर सकें। देश में विविधता के सम्मान का एक अर्थ संघवाद का सम्मान करना भी होना चाहिए। संविधान में केंद्र सरकार शब्द का प्रयोग नहीं किया गया। इसके लिए संघीय सरकार का इस्तेमाल किया गया है जो संविधान में संघवाद पर जोर को उजागर करता है। संभवत: संघवाद का सबसे अहम पहलू जिसमें सुधार की जरूरत है वह है राज्यपालों की नियुक्ति। सरकारिया आयोग ने इसे लेकर कुछ अनुशंसाएं कीं लेकिन उनका पालन नहीं किया गया और हम एक ऐसी व्यवस्था में उलझ गए हैं जहां केंद्र सरकार अपने दल के वफादारों को राज्यपाल बनाकर राज्य सरकारों के कामकाज में बाधा डाल सकती है। परंतु ऐसे भी क्षेत्र हैं जहां सुधार की जरूरत है। मसलन राज्य सूची के विषयों में केंद्र समर्थित योजनाओं का विस्तार। इसकी वजहों में से एक वह विकास नीति भी है जो चुनावी लोकलुभावनवाद पर केंद्रित है। जो लोगों की पसंद के मुताबिक उन्हें घरेलू गैस, बिजली, खाने-पीने की वस्तुएं, स्वास्थ्य सेवा (खासकर मौजूदा कोविड महामारी जैसी आपात स्थितियों में) जैसी सुविधाएं देती है। इसमें कुछ भी अवांछित नहीं है और यह वह तरीका है जिसका इस्तेमाल अमीरों ने हमेशा अपने हितों के बचाव में किया है। अच्छी दीर्घकालिक कल्याण नीति एक कदम आगे की होगी।
एबीएन डेस्क। इन दिनों भारत और अफगानिस्तान के बीच गतिविधियां तेज हो गई हैं। साफ नजर आ रहा है कि तालिबान उभार पर है। इससे भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा? क्या इस बात से भारत का दिल टूट जाना चाहिए कि अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडन ने इस तरह वापस हटने का निर्णय लिया? या इस बदलाव में भी अवसर हैं? क्या तालिबान के साथ शत्रुता का रिश्ता रखना अपरिहार्य है? क्या हम यह मानकर चलें कि यह पाकिस्तान नियंत्रित इस्लामिक लड़ाकू संगठन बना रहेगा? जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने अफगानिस्तान पर आक्रमण करके और मुशर्रफ को साझेदार बनाकर इस क्षेत्र को एक नया नाम दिया: अफ-पाक। क्या भारत अब इसे ऐसे ही स्वीकार कर ले? सन 2011 में मैंने एक आलेख लिखकर कारण बताया था कि क्यों भारत को अफ को पाक के लिए छोड़ देना चाहिए। तब से अब तक हम किस दिशा में बढ़े हैं? पहली बात, क्या ऐसा कोई प्रमाण है कि तालिबान निर्भरता या आभार जताने के लिए हमेशा पाकिस्तान का अनुचर बना रहेगा? एक ऐसा अटूट साझेदार जिसके लिए अगर पाकिस्तान-चीन शिखर बैठकों में इस्तेमाल होने वाला जुमला इस्तेमाल किया जाए तो जिसके साथ पहाड़ों से ऊंची और सागर से गहरी दोस्ती है? आप सोच सकते हैं, क्यों नहीं? क्या पहली पारी में तालिबान और पाकिस्तान के बीच ऐसा ही रिश्ता नहीं था? परंतु जैसा कि म्युचुअल फंड्स पर लिखी वैधानिक चेतावनी में कहा जाता है: अतीत का प्रदर्शन भविष्य के प्रदर्शन का मानक नहीं है। क्या यह कहावत भू-सामरिक हितों पर भी लागू होती है? विभिन्न देशों और समाजों की वैचारिक स्थिति चाहे जो भी हो, अंतत: वे अपने हित में काम करते हैं। क्या ऐसा कोई संकेत है कि इस बार तालिबान अलग साबित हो सकता है? उनके तौर तरीके, इस्लाम की उनकी व्याख्या, महिलाओं, शिक्षा और नागरिक स्वतंत्रता को लेकर उनका नजरिया आदि आधुनिक समाज को बुरे लग सकते हैं। परंतु क्या जरूरी है कि इसके चलते वे भारत के शत्रु बन जाएं? क्या वे भारत से जंग छेड़ सकते हैं या हमारे खिलाफ युद्ध में पाकिस्तान का साथ दे सकते हैं? इसमें उनका क्या फायदा? क्या वे भारत को इस्लामी राष्ट्र बना देंगे और हमें किसी खिलाफत का अंग बना देंगे? तालिबान बर्बर, मध्ययुगीन, स्त्री-विरोधी, गैर भरोसेमंद, दकियानूस हो सकते हैं या शायद इससे भी बुरे। परंतु वे मूर्ख या आत्मघाती नहीं हैं। वरना वे अमेरिका से दो दशक तक जूझने और उसे परास्त करने में कामयाब न हो पाते। अतीत के मुजाहिदीन के उलट उन्हें हथियारों से समर्थन देने वाले भी नहीं थे। बस पाकिस्तान ही चोरी छिपे उनकी मदद करता रहा। भारत के पश्चिम में पाकिस्तान के रणनीतिक नजरिये से देखने में नुकसान भी हैं। हम यह सोच कर परेशान हो जाते हैं कि अमेरिका पाकिस्तान को एक प्रसिद्ध जीत सौंपकर जा रहा है। पाकिस्तान के पास अब कुछ ऐसा है जो वह हमेशा से चाहता था: एक सामरिक गहराई। परंतु यह जीत कितनी भ्रामक है यह समझने के लिए फॉरेन अफेयर्स में हुसैन हक्कानी का लेख पढ़ा जरूरी है। इस क्षेत्र के मानचित्र पर एक नजर डालने पर पता चल जाएगा कि ऐसी कल्पना केवल रावलपिंडी के सैन्य मुख्यालय में बैठे बुद्धिमान ही कर सकते हैं जिनके बारे में माना जाता है कि उनका दिमाग सर में नहीं बल्कि कहीं और होता है। वे सन 1986-87 से ही ऐसे स्वप्न देख रहे हैं। इसलिए क्योंकि जनरल कृष्णास्वामी सुंदरजी के आॅपरेशन ब्रासटैक्स ने यह दु:स्वप्न पैदा कर दिया था कि भारतीय टैंक पाकिस्तान के संकरे इलाकों में वारसा संधि शैली में तेजी से पैठ बना सकते हैं। ऐसे में उसे रणनीतिक गहराई की जरूरत थी। पैंतीस वर्ष बाद दुनिया बदल चुकी है और रणनीतिक और सामरिक तस्वीर भी। इसके अलावा अब परमाणु हथियार भी हैं। यदि पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी अभी भी सोच रहे हैं कि हिंदुकुश पर्वत होते हुए अफगानिस्तान पहुंच सकते हैं या वहां कोई सामरिक बदलाव ला सकते हैं तो वे बहुत मासूम हैं। बीते 75 वर्ष से अधिक समय में दुनिया ने पाकिस्तानी सेना के बारे में एक बात सीखी है। सामरिक दृष्टि से वह शानदार है लेकिन रणनीतिक नजरिये से भ्रमित है। लेकिन क्या वह तालिबान के मित्र होने के नाते अपने परमाणु हथियार या एफ-16 लड़ाकू विमानों के दो बेड़े अफगानिस्तान भेज सकती है? हम तटस्थ आकलन कर सकते हैं कि अफगानिस्तान में कौन जीता और कौन हारा। यकीनन तालिबान जीते और अमेरिका और उसके सहयोगी हारे। लेकिन पाकिस्तान? तालिबान ने गत दो दशक में एक बात साबित की है कि वे उससे अधिक होशियार हैं। पाकिस्तान उनके देश को रणनीतिक गहराई हासिल करने के लिए इस्तेमाल करने की कल्पना कर रहा था लेकिन इन वर्षों में उन्होंने यह समीकरण उलट दिया। उन्होंने पाकिस्तान का इस्तेमाल अपनी रणनीतिक गहराई के लिए किया। ऐसा करके उन्होंने अमेरिका को हराया। बाइडन का जीत का दावा उतना ही खोखला है जितनी जॉर्ज डब्ल्यू बुश की यह आलोचना कि यह वापसी हड़बड़ी में की गई। बाइडन ने उस शर्मनाक हकीकत को स्वीकार किया जिसे बुश नहीं कर सके। अमेरिका वहां से बाहर निकल रहा है और उसने यह घोषणा भी कर दी है कि अफगानिस्तान में नए राष्ट्र का निर्माण कभी अमेरिका का लक्ष्य नहीं था। साफ कहें तो इस्तेमाल करो और फेंको। अमेरिका ने एक निर्वात छोड़ा है। तालिबान की पकड़ दिनबदिन मजबूत हो रही है। देखना है कि पाकिस्तान का क्या होता है? यदि लड़ाई लंबी चली तो तात्कालिक लाभ की आशा समाप्त हो जाएगी। डूरंड रेखा के आरपार घायल, बेघर, शरणार्थी नजर आएंगे। यदि तालिबान इसे जल्द निपटाने में कामयाब रहा तो भी उसे पाकिस्तानियों को कितना नियंत्रण सौंपना होगा? खासतौर पर तब जबकि उन्हें रणनीतिक गहराई की जरूरत नहीं होगी?आप कह सकते हैं कि वे चीन और पाकिस्तान के बीच फंस जाएंगे और एक अधीनस्थ देश के दर्जे में रहेंगे। परंतु अफगानिस्तान का इतिहास ऐसा नहीं बताता। वह इस क्षेत्र में रुचि रखने वाली अन्य शक्तियों मसलन ईरान और रूस के साथ सुलह कर सकता है।
एबीएन डेस्क। देश की आय को मापने के लिए देश में हुए उत्पादन का अनुमान लगाया जाता है। जैसे किसानों द्वारा कितने माल पर जीएसटी दिया गया, रेलवे ने कितनों को यातायात उपलब्ध कराया, बिजली की कितनी बिक्री हुई, इत्यादि। इन आधारों पर आकलन किया जाता है कि देश में कितना उत्पादन हुआ होगा। चूंकि हर ढाबे वाले से पूछना कठिन है कि उसने कितनी रोटी बेची। सरकारी अनुमान के अनुसार इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून 2020 में देश के कुल उत्पादन में 23.9 प्रतिशत की गिरावट आई है लेकिन जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर अरुण कुमार के अनुसार अप्रैल में जीडीपी में 75 प्रतिशत की गिरावट आई है, मई में 60 प्रतिशत और जून में 40 प्रतिशत। यानी औसत 58 प्रतिशत की गिरावट पहली तिमाही में आई है। इस प्रकार सरकार और अरुण कुमार के अनुमान में दुगने से ज्यादा का अंतर दिखता है पर वास्तविकता इन दोनों के बीच है। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ने जो जीडीपी का अनुमान लगाया है, वह कम्पनियों द्वारा प्रकाशित परिणाम के आधार पर लगाया है जो कि सही विधि है। लेकिन कोविड संकट के दौरान पहली तिमाही में विशेषता यह है कि केवल कुछ बड़ी कंपनियों जैसे मोबाइल टेलीफोन, बिजली एवं ई-कॉमर्स का ही कारोबार ठीकठाक चला है। तमाम छोटी कम्पनियों की हालत गड़बड़ रही है लेकिन इन छोटी कम्पनियों द्वारा अपने परिणाम प्रकाशित नहीं किये गये हैं। इसलिए यदि केवल प्रकाशित परिणामों के आधार पर जीडीपी का आकलन करें तो वह बड़ी सफल कम्पनियों के आधार पर हो जाता है जो कि अर्थव्यवस्था की सही स्थिति को नहीं बताता है। सरकार के अनुमान में दूसरी समस्या यह है कि असंगठित क्षेत्र, जिसमें किराना दुकान, दर्जी, टैक्सी, छोटे स्कूल, डाक्टर, ढाबे इत्यादि आते हैं, इनके आंकड़े एकत्रित करना पहली तिमाही में असम्भव था। इसलिए सरकार ने इनके द्वारा उत्पादन में आयी गिरावट का अनुमान कैसे लगाया है, इसका ब्योरा उपलब्ध नहीं है। इसलिए सरकार द्वारा जो 23.9 प्रतिशत की गिरावट बताई गयी है, उस पर विश्वास नहीं होता है। सरकार ने यह भी कहा है कि इस तिमाही में कृषि में 3.4 प्रतिशत की जीडीपी में वृद्धि हुई है। इस पर भी संदेह उत्पन्न होता है। अरुण कुमार के अनुसार अप्रैल में हमारी मंडियों में 50 प्रतिशत की आवक कम हुई है। पर नींबू का मूल्य जो 40 रुपये प्रति किलो पूर्व में था, वह इस अवधि में गिरकर 25 रुपये हो गया है। यदि फल-सब्जी के दाम गिरते हैं तो जीडीपी उसी अनुपात में गिरता है। जैसे 1 किलो नींबू यदि 25 रुपये में बिके तो वह जीडीपी में 25 रुपये की वृद्धि करता है। वही नींबू यदि 40 रुपये में बिके तो जीडीपी में 40 रुपये की वृद्धि होती है। क्योंकि इस अवधि में कृषि उत्पादों के दाम में गिरावट आई है, इसलिए कृषि की जीडीपी में वृद्धि हुई, इस पर विश्वास करना कठिन हो जाता है। यह मान भी लें कि कृषि में 3.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई तो भी कृषि क्षेत्र को अर्थव्यवस्था में आगे बढ़ाने में भरोसा करना उचित नहीं होगा। कारण यह कि जीडीपी में कृषि का हिस्सा मात्र 14 प्रतिशत है। 14 प्रतिशत में यदि 3.4 प्रतिशत की वृद्धि हो तो कुल जीडीपी में 0.24 प्रतिशत की वृद्धि कृषि के कारण हो सकती है जो कि नगण्य है। जीडीपी के कमजोर होने का एक और आंकड़ा छोटे उद्यमों को दिए गये ऋण का है। रिजर्व बैंक के अनुसार बैंकों द्वारा मझले, छोटे एवं अति छोटे उद्योगों को मार्च 2020 में 11.49 लाख करोड़ रुपये का ऋण दिया गया था। अप्रैल-मई में इसमें गिरावट आई, जून में यह सुधरा और 11.32 लाख करोड़ तक पहुंच गया जो कि मार्च से कम था। लेकिन विचारणीय यह है कि छोटे उद्योगों को जो 3 लाख करोड़ रुपये का सरकार ने ऋण का पैकेज जारी किया था, उसके बावजूद कुल ऋण में वृद्धि क्यों नहीं हुई? ऐसा प्रतीत होता है कि बैंकों ने छोटे उद्योगों को दिए पुराने ऋण का भुगतान ले लिया और नये ऋण उन्हें दे दिए। इस प्रकार कुल ऋण पूर्ववत रहे। यह एक और संकट का द्योतक है। इस अवधि में इनका उत्पादन प्रभावित हुआ है और अपने को जीवित रखने के लिए इन्होंने ऋण लेकर अपने को जीवित रखा है। जैसे आईसीयू में मरीज को कुछ समय के लिए भर्ती किया जाता है। इस ऋण को विकास नहीं मान सकते। यह ऋण लेना संकट को बताता है। कुल मिलाकर परिस्थिति यह है कि सरकार द्वारा जो 23.9 प्रतिशत की जीडीपी में गिरावट बताई जा रही है, वह वास्तव में इससे अधिक है। यद्यपि अरुण कुमार द्वारा 58 प्रतिशत की जो गिरावट बताई जा रही है, उसके पीछे कोई ठोस आंकड़े नहीं दिए गये हैं। इसलिए वह वास्तविकता से अधिक दिखती है। बहरहाल इतना स्पष्ट है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था की हालत अच्छी नहीं है। इस परिस्थिति में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत सरकार को सलाह दी है कि वह अपने निर्यात बढ़ाये और वैश्वीकरण को और पुरजोर तरीके से अपनाए, जिससे विदेशी पूंजी मिले इत्यादि। ऐसा ही हम पिछले 6 वर्षों से करते आ रहे हैं लेकिन हमारा जीडीपी लगातार गिर ही रहा है। इस समय इस नीति को अपनाना और ज्यादा घातक होगा। कारण यह कि संकट के समय जब हम वैश्वीकरण को अपनाते हैं तो दूसरे देशों में बना सस्ता माल अपने देश में प्रवेश करता है और हमारे उपभोक्ता के रोजगार साथ -साथ समाप्त हो जाते हैं। रोजगार समाप्त होने से उसके हाथ में क्रय शक्ति नहीं बचती और वह माल दुकान में पड़ा रह जाता है तथा बिक नहीं पाता। इसलिए हमारे सामने विकल्प यह है कि हम जनता को रोजगार उपलब्ध करायें अथवा सस्ता माल? पर रोजगार उपलब्ध करना ज्यादा महत्वपूर्ण है। रोजगार उपलब्ध हो तो व्यक्ति महंगा माल भी बर्दाश्त कर लेता है। लेकिन यदि रोजगार न हो तो दुकान में रखा सस्ता माल भी व्यर्थ है। इसलिए सरकार को चाहिए कि तत्काल विदेश से आने वाले तमाम माल पर आयात कर में भारी वृद्धि करे, जिससे देश के बंद उद्योगों का काम फिर से चालू हो जाये। इन उद्योगों का माल बिकने से इनके द्वारा रोजगार उत्पन्न किये जायेंगे, जिससे पुन: बाजार में माल की मांग उत्पन्न होगी और अर्थव्यवस्था चल निकलेगी। लेकिन इस प्रक्रिया को अपनाने में जनता को महंगा माल स्वीकार करना पड़ेगा। इसलिए सरकार को चाहिए कि जनता को अपने विश्वास में ले। उन्हें बताये कि विदेश में बने सस्ते माल के स्थान पर हमें देश में बने महंगे माल को खरीदना चाहिए, जिससे कि देश में रोजगार उत्पन्न हो और अर्थव्यवस्था चल निकले।
एबीएन डेस्क। उन्हें विश्व के इतिहास में पहले गुरु संपादक के रूप में स्वीकार करते हुए हम उनकी जन्म और कर्म को लोगों तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने जितनी रचना की उतना विश्व के इतिहास में किसी दूसरे ने नहीं किया। उमहाभारत जैसे महान ग्रंथ की रचना करने वाले वेद व्यास के जीवन के बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं। महर्षि वेद व्यास के पिता कौन थे, किन परिस्थितियों में व्यास का जन्म हुआ, उनका जीवनकाल कैसे और कहां बीता, आदि जैसे घटनाक्रम के विषय में ज्यादा चर्चाएं नहीं हुई हैं। वेदों का विस्तार करने के कारण ये वेदव्यास तथा बदरीवन में निवास करने के कारण बादरायण के नाम से भी जाने जाते हैं। वेद व्यास ने चारो वेदों के विस्तार के साथ-साथ अठारह महापुराणों तथा ब्रह्मसूत्र का भी प्रणयन किया। हिन्दू पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने ही व्यास के रूप में अवतार लेकर वेदों का विस्तार किया था। वेद सबसे प्राचीण ग्रंथो में एक है।महर्षि वेदव्यास न केवल महाभारत के रचयिता हैं, बल्कि वह उन घटनाओ के भी साक्षी रहे हैं जो क्रमानुशार घटित हुई हैं। असल में इस महान धार्मिक ग्रंथ में व्यासजी की भी एक अदद भूमिका है। वेदव्यास उन मुनियों में से एक हैं, जिन्होंने अपने साहित्य और लेखन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को यथार्थ और ज्ञान का खजाना दिया है। महर्षि व्यास ने न केवल अपने आसपास हो रही घटनाओं को लिपिबद्ध किया, बल्कि वह उन घटनाओं पर बराबर परामर्श भी देते थे। महर्षि वेदव्यास ने समस्त विवरणों के साथ महाभारत ग्रन्थ की रचना कुछ इस तरह की थी कि यह एक महान इतिहास बन गया। हिन्दू धर्म में मान्यता है कि महाभारत में उल्लखित घटनाएं सत्य और प्रमाणिक वृत्तांत है। भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र भगवान गणेश ने वेदव्यास के मुख से निकली वाणी और वैदिक ज्ञान को लिपिबद्ध करने का काम किया था। आम जनों को समझने में आसानी हो, इसलिए मर्हिष व्यास ने अपने वैदिक ज्ञानन को चार हिस्सों में विभाजित कर दिया। वेदों को आसान बनाने के लिए समय-समय पर इसमें संशोधन किए जाते रहे हैं। कहा जाता है कि वेदव्यास ने इसे 28 बार संशोधित किया था। महर्षि व्यास का जन्म त्रेता युग के अन्त में हुआ था। वह पूरे द्वापर युग तक जीवित रहे। कहा जाता है कि महर्षि व्यास ने कलियुग के शुरू होने पर यहां से प्रयाण किया। महर्षि व्यास को भगवान विष्णु का 18वां अवतार माना जाता है। महर्षि राम विष्णु के 17वें अवतार थे। बलराम और कृष्ण 19वें और 20वें। इसके बारे में श्रीमद् भागवत में विस्तार से लिखा गया है, जिसकी रचना मुनि व्यास ने द्वापर युग के अन्त में किया था। श्रीमद् भागवतम की रचना महाभारत की रचना के बाद की गई थी। महर्षि व्यास का जन्म नेपाल में स्थित तानहु जिले के दमौली में हुआ था। महर्षि व्यास ने जिस गुफा में बैठक महाभारत की रचना की थी, वह नेपाल में अब भी मौजूद है। इस मानचित्र के माध्यम से आप नेपाल में तानहू के बारे में जान सकते हैं। महर्षि वेदव्यास के पिता ऋषि पराशर थे। उनकी माता का नाम सत्यवती था। पराशर यायावर ऋषि थे। एक नदी को पार करने के दौरान उन्हें नाव खेने वाली सुन्दर कन्या सत्यवती से प्रेम हो गया। बाद में सत्यवती ने ऋषि व्यास को जन्म दिया। व्यास पितमाह भीष्म के सौतेले भाई थे। बाद में सत्यवती ने हस्तिनापुर के राजा शान्तनु से विवाह कर लिया। शान्तनु भीष्म के पिता थे। इस विवाह के लिए सत्यवती के पिता ने राजा शान्तनु के समक्ष यह शर्त रखी थी कि सत्यवती के गर्भ से जन्म लेने वाला बालक ही हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी होगा। हालांकि इससे पहले ही शान्तनु ने अपने पुत्र देवव्रत को हस्तिनापुर का युवराज घोषित कर दिया था। इसी प्रतिज्ञा की वजह से उनका नाम भीष्म पड़ा। बाद में उनके पिता शान्तनु ने उन्हें ईच्छा-मृत्यु का वरदान दिया। वेदव्यास धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर के जैवीय या आध्यात्मिक पिता थे। वेदव्यास के जन्मदिन के अवसर पर गुरू पुर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। व्यासजी के बारे में कहा जाता है कि द्वापर युग के दौरान उन्होंने पुराण, उपनिषद, महाभारत सहित वैदिक ज्ञान के तमाम ग्रन्थों की रचना की थी। कलियुग के शुरू होने के बाद वेदव्यास के बारे में कोई ठोस जानकारी या दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। माना जाता है कि वह तप और ध्यान के लिए पर्वत श्रृंखलाओं में लौट गए थे। दो बौद्ध जातक कथाओं ‘कान्हा दीपायना’ और ‘घाटा’ में मर्हिष वेदव्यास का जिक्र किया गया है। प्रथम जातक कथा में उन्हें बोधिसत्व कहा गया है। हालांकि इसमें उनके वैदिक ज्ञान की चर्चा नहीं की गई है। दूसरी जातक कथा में उन्हें महाभारत का रचयिता और इससे जुड़ा हुआ व्यक्ति बताया गया है। अपनी मां के कहने पर वेद व्यास ने विचित्रवीर्य की रानियों के साथ नियोग किया, जिसके बाद पांडु और धृतराष्ट्र का जन्म हुआ। तीन पुत्र: वेद व्यास ने विचित्रवीर्य की रानियों, अंबिका और अंबालिका के अलावा एक दासी के साथ भी नियोग की प्रथा का पालन किया, जिसके बाद विदुर का जन्म हुआ। तीनों पुत्रों में से विदुर वेद-वेदान्त में पारंगत और नीतिवान पुत्र थे। वेद व्यास का नाम: द्वैपायन द्वीप पर जाकर तपस्या करने और काले रंग की वजह से उन्हें कृष्ण द्वैपायन नाम दिया गया, जो आगे चल कर वेदों का भाष्य करने के कारण वेद व्यास के नाम से प्रसिद्ध हुए।महर्षि वेदव्यास ने समस्त विवरणों के साथ महाभारत ग्रन्थ की रचना कुछ इस तरह की थी कि यह एक महान इतिहास बन गया।हिन्दू धर्म में मान्यता है कि महाभारत में उल्लखित घटनाएं सत्य और प्रमाणिक वृत्तांत है। भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र भगवान गणेश ने वेदव्यास के मुख से निकली वाणी और वैदिक ज्ञान को लिपिबद्ध करने का काम किया था। भारत के बहुत से संप्रदाय तो केवल गुरुवाणी के आधार पर ही कायम हैं। भारतीय संस्कृति के वाहक शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रुका का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। आज गुरु पूर्णिमा के अवसर पर जो वेद व्यास जी के जन्म दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। गुरु तत्व की प्रशंसा तो सभी शास्त्रों ने की है।
एबीएन डेस्क। कोविड-19 महामारी ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को भी लगभग तबाह ही कर दिया है। यह सही है कि अब दुनिया भर में टीकाकरण शुरू हो चुका है लेकिन संकट है कि समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा है। निश्चित तौर पर कोरोना वायरस के बदले हुए स्वरूप की यह लहर और कहीं अधिक खतरनाक हो सकती है। अलग-अलग देशों ने इस चुनौती से निपटने के लिए अलग-अलग रणनीति अपनाई है। ऐसे में यह देखना उचित होगा कि वे कौन से देश हैं जो महामारी से बेहतर तरीके से निपटने मेंं कामयाब रहे, कहां मौत के आंकड़े कम रखने में सफलता मिली, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराई गईं और आर्थिक नुकसान कम करने में कामयाबी हाथ लगी? विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से इसे महामारी करार देने के एक वर्ष बाद हम इसका उदाहरण हैं। यह केवल अकादमिक बहस नहीं है: नीति निमार्ताओं को मौजूदा हालात से निपटना होगा और उन्हें सन 2020 की सफलताओं और विफलताओं से सबक लेने की आवश्यकता है। अपेक्षाकृत कम मौतों और बेहतर आर्थिक स्थिरता के साथ जर्मनी, न्यूजीलैंड, जापान, वियतनाम, ताइवान और दक्षिण कोरिया सन 2020 से अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से निपटने में कामयाब रहे। जबकि अमेरिका, ब्राजील, इटली, ब्रिटेन और रूस में मौत के आंकड़े भी अधिक रहे और आर्थिक संकट भी अन्य देशों की तुलना में अधिक रहा। मौत के मामलों में भारत का प्रदर्शन बहुत खराब नहीं कहा जा सकता है। परंतु आर्थिक नुकसान के मामले में हम सबसे खराब प्रदर्शन वाले देशोंं में शुमार हैं। चीन में मौत तथा संक्रमितों के आंकड़ों के बारे में जान पाना कठिन है लेकिन वह अपने यहां आर्थिक गतिविधियों को ठीक रख पाने मेंकामयाब रहा है। पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के व्हार्टन स्कूल के समाजशास्त्री माउरो गुइलेन ने एक पर्चा लिखा है, द पॉलिटिक्स आॅफ पैनडेमिक्स: डेमोक्रेसी, स्टेट कैपिसिटी ऐंड इकनॉमिक इनेक्विलिटी। इसमें 146 देशों में सन 1990 के बाद से संक्रामक रोगों और उनके प्रबंधन पर नजर डाली गई है। उन्होंने इन विषयों पर तीन अध्ययन किए। पहले में सन 1990 और 2019 के बीच संक्रामक रोगों की आवृत्ति और इनके घातक होने का अध्ययन किया गया है। दूसरे में कोविड-19 के दौरान सरकारों की ओर से लगाए गए लॉकडाउन की गति और उसकी गंभीरता का अध्ययन है। तीसरा अध्ययन शारीरिक दूरी के मानकों के अनुपालन पर आधारित है। गुइलेन कहते हैं, लोकतांत्रिक देशों में, गहरी पारदर्शिता, जवाबदेही और जनता के विश्वास ने ऐसे रोगों की आवृत्ति और उनके घातक असर को सीमित किया है, इन्हें लेकर दी जाने वाली प्रतिक्रिया मेंं समय कम लगा है और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े उपायों को लेकर लोगों में अनुपालन की प्रवृत्ति बढ़ी है। खेद की बात यह है कि सालाना वैश्विक लोकतांत्रिक सूचकांक यह संकेत दे रहा है कि लोकतंत्र के स्तर मेंं गिरावट आ रही है। इससे अविश्वास का माहौल उत्पन्न हुआ है। इसका अर्थ यह है कि लोग शारीरिक दूरी का पालन करने, मास्क पहनने और टीका लगवाने से इनकार कर रहे हैं। एक अधिक दिलचस्प नतीजा यह है कि सरकार के स्वरूपों से ज्यादा आर्थिक असमानता ने ऐसी बीमारियों के प्रभाव को बढ़ाया है और क्वारंटीन, शारीरिक दूरी आदि के व्यापक अनुपालन पर भी असर डाला है। कम आय वाले लोगों के लिए काम करना मजबूरी है। उन्हें मामूली लक्षणों की अनदेखी करना और जांच से बचना आसान लगता है क्योंकि वे काम नहीं छोड़ सकते। इतना ही नहीं कम आय का संबंध कमजोर पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं तक अपर्याप्त पहुंच और भीड़भाड़ वाले इलाकों में बिना साफ सफाई के रहने से भी है। मजबूत सरकारी क्षमता और अच्छी नीति हमें खराब नतीजों से बचा सकती है और आय की असमानता में इजाफा भी रोक सकती है। गुइलेन का मानना है कि लोकतांत्रिक और अधिनायकवादी दोनों तरह के शासन जरूरी संसाधन और क्षमता के साथ-साथ आवश्यक संगठनात्मक ढांचा तैयार कर सकते हैं। कुछ भी हो, लोकतांत्रिक व्यवस्था हो अथवा नहीं लेकिन अगर असमानता अधिक हो तो परिणाम भी बुरे होते हैं। यह दलील मजबूत नजर आती है। अमेरिका, भारत और ब्राजील तीनों में असमानता का स्तर बहुत अधिक है। भारत के मामले में दुखद बात यह है कि लॉकडाउन के कारण आय का अंतर काफी बढ़ गया क्योंकि लाखों लोगों को रोजगार गंवाना पड़ा। अमेरिका इस मामले में खुशकिस्मत है क्योंकि वहां सत्ता परिवर्तन हो गया। इससे वहां अधिक बेहतर नीति लागू हुई। अमेरिका में राष्ट्रपति जो बाइडन के नेतृत्व वाले नए सत्ता प्रतिष्ठान ने एक प्रभावशाली टीकाकरण कार्यक्रम की शुरूआत की और प्रोत्साहन के चेकों के माध्यम से राहत में इजाफा किया। भारत में इस बात के प्रमाण हैं कि केंद्र सरकार ने टीकाकरण की प्रक्रिया को भी सहज तरीके से नहीं शुरू किया। अब राज्यों में टीकों की कमी हो गई है और केंद्र, राज्यों पर दोषारोपण कर रहा है। विभिन्न चरणों में चुनाव के आयोजन और असमय कुंभ मेले के लिए भी राजनीतिक कारण ही जिम्मेदार हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि इनके कारण संक्रमण में बेतहाशा वृद्धि होना तय है। आर्थिक मोर्चे पर मांग में जो भी सुधार हुआ है वह ईंधन पर भारी भरकम कर और सख्त वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था के बावजूद हुआ है। सन 2020 में लगाए गए लॉकडाउन ने आर्थिक गतिविधियों को बुरी तरह प्रभावित किया था और अगर दोबारा लॉकडाउन लगता है कि निम्र आय वर्ग वाले लोग मजबूर हो जाएंगे कि वे या तो भूखों मरें या फिर कानून तोड़ें और संक्रमण का खतरा बढ़ाएं। यह देखा जाना है कि क्या यह सरकार टीकाकरण में सुधार कर एक बेहतर प्रोत्साहन योजना पेश कर पाती है या नहीं।
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