विचार

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Published / 2021-12-28 13:36:55
ओमिक्रोन : खतरा है बड़ा, रहें सतर्क और सावधान...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत समेत 100 से अधिक देशों तक फैल चुके कोरोना के नए वैरिएंट ओमक्रोन के चलते ब्रिटेन में विश्व की पहली मौत हुई है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने इसकी पुष्टि की है। नए वेरिएंट की बढ़ती रफ्तार को थामने के लिए आज विश्व में जहां नाना तरह के उपाय खोजे जा रहे हैं, वहीं कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि इसका असर बहुत ही कम होगा। आईआईटी कानपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं शोधकर्ता पद्मश्री प्रोफेसर मनिंद्र अग्रवाल का कहना है कि देश में तीसरी लहर का आना तय है। इसका प्रभाव दिसंबर के अंतिम सप्ताह तक दिखने लगेगा। जनवरी के अंतिम और फरवरी के पहले सप्ताह की शुरुआत में ओमिक्रोन चरम पर होगा। कैंसर होना भी अपने आप में एक तरह का म्यूटेशन है। फर्क सिर्फ इतना है कि कैंसर की वजह से हम बीमार होते हैं और वायरस म्यूटेशन अपने बचाव के लिए करता है। कोरोना वायरस में भी यही हुआ है। इंसान के शरीर में जब इम्युनिटी डेवलप होने लगती है, चाहे वह नेचरल से हो या वैक्सीन से बनने वालीङ्घ इससे पार पाना वायरस के लिए मुश्किल हो जाता है। ऐसे में खुद को बचाए रखने के लिए कोरोना अपना रंगरूप बदलने लगता है। अब तक कोरोना में कई हजार म्यूटेशन हो चुके हैं, लेकिन ज्यादातर ऐसे म्यूटेशन थे जो जल्द ही स्वत: खत्म हो गए। हां, डेल्टा, डेल्टा प्लस और ओमिक्रोन जैसे कुछ मजबूत वैरिएंट्स लंबे समय के लिए रह जाते हैं और हमारे लिए समस्या पैदा करते हैं। अब तक कोरोना के डेल्टा प्लस वेरियंट में सबसे ज्यादा 25 म्यूटेशन हुए थे, लेकिन ओमीक्रोन में 50 से भी ज्यादा म्यूटेशन हुए हैं। इनमें से 30 से ज्यादा म्यूटेशन तो सिर्फ इसके स्पाइक प्रोटीन के स्ट्रक्चर में ही हुए हैं। कहा जा रहा है कि इसी वजह से यह ज्यादा जल्दी इंफेक्शन फैलाता है। कोरोना के नए वैरिएंट को लेकर चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। यह लेख लिखे जाने तक भारत में ओमिक्रोंन के 500 मामले सामने आ चुके हैं तो सभी के कान खड़े हो गए हैं। इन मामलों के अलावा इनके संपर्क में आए कई लोग भी कोरोना संक्रमित हो गए हैं, लेकिन वह ओमिक्रोन वैरिएंट से संक्रमित हैं या डेल्टा वेरिएंट या किसी अन्य से यह अभी साफ नहीं हो पाया है। सभी के सैंपल जीनोम सीक्वेंसिंग के लिए भेजे गए हैं। डॉक्टरों का मानना है कि ओमिक्रोन वैरिएंट कोरोना के डेल्टा वैरिएंट से पांच गुना ज्यादा संक्रामक है। जिस तेजी से यह दक्षिण अफ्रीका से निकलकर दुनियाभर में फैला है, उससे यह तो स्पष्ट है कि यह बेहद संक्रामक है। हालांकि, अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि यह वैरिएंट कितना घातक है। ओमिक्रोन को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच यह जानना भी जरूरी है कि इस वैरिएंट के संक्रिमितों में कैसे लक्षण दिखाई देते हैं। मेट्रो हॉस्पिटल फरीदाबाद में कार्यरत डॉ। भवेश ठाकुर ने बताया है कि चूंकि उनके पास इसके मरीज अभी आए नहीं हैं, लेकिन इसकी संक्रमकता अधिक ही है। इसलिए यह तेजी से फैल रहा है। लेकिन, इसकी मारक क्षमता कितनी है और इस पर हमारी दोनो डोज का कितना असर होगा इसकी अभी कोई जानकारी नहीं है। फिलहाल जो जानकारी है, उसके अनुसार सरकार इसके रोकथाम के लिए पूरी तरह सक्षम है। सरकार के निर्देश भी अस्पतालों में आ चुके हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बचाव का सबसे सुरक्षित उपाय यही है कि आप मास्क पहनें और शारीरिक दूरी का पालन करें। कोरोना का नया वैरिएंट ओमिक्रोंन धीरे-धीरे अपने पैर पसारने लगा है। पूरी दुनिया में इसके मामले तेजी से बढ़ने लगे हैं। भारत में इसके मामले सामने आने के बाद हड़कंप मच गया है। कोरोना की पिछली लहर में डेल्टा वैरिएंट ने यहां भारी तबाही मचाई थी। डेल्टा से संक्रमित होने के बाद सांस लेने में दिक्कत, तेज बुखार, कमजोरी, खाने का स्वाद और सुगंध का पता नहीं चलने जैसे कुछ लक्षण दिखाई दे रहे थे। हालांकि, ओमिक्रोन के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं हैं। ओमिक्रोन वैरिएंट के लक्षण काफी अलग हैं। इसके लक्षण के बारे में कहा जा रहा है कि यह अब तक के सभी वैरिएंट में सबसे ज्यादा संक्रामक है। इसके अब तक जितने भी मरीज मिले हैं, उनमें कोविड-19 के आम लक्षण नहीं पाए गए हैं। किसी में भी फ्लू जैसी समस्या नहीं देखी गई है, जबकि डेल्टा में सबसे प्रमुख लक्षण यही था। जिस डॉक्टर ने पहली बार ओमिक्रोन के बारे में पूरी दुनिया को बताया था, उनके अनुसार इस वैरिएंट के मरीजों में कोविड के क्लासिक लक्षण नहीं थे। ओमीक्रोन के संदर्भ में दक्षिण अफ्रीकी स्वास्थ्य विभाग के अनुसार इस महामारी से संक्रमित कई लोगों में हल्के लक्षण दिख रहे हैं या नहीं दिख रहे हैं। इन्ही लोगों से संक्रमण फैल रहा है। अभी तक जो बातें सामने आईं हैं, उससे साफ लग रहा हैं कि 70 से 80 फीसद लोगों में लक्षण नहीं दिख रहे हैं और लोगों को यह सामान्य सर्दी-खांसी लग रहा है। लक्षण गंभीर भी नहीं है, क्योंकि लोगों को सुगंध जाने या आॅक्सीजन की कमी जैसी समस्या भी नहीं हो रही है। भारत में रविवार को कोविड-19 के ओमिक्रोन के 17 और मामले सामने आए जिनमें नौ मामले राजस्थान की राजधानी जयपुर में, सात महाराष्ट्र के पुणे जिले में और एक मामला दिल्ली का है। इसके साथ ही देश में ओमिक्रोन के मामलों की कुल संख्या 23 हो गई है। जो लोग संक्रमित पाए गए हैं, उनमें से अधिकतर हाल में अफ्रीकी देशों से आए हैं या इस तरह के लोगों के संपर्क में थे। इसके साथ ही चार राज्यों और राष्ट्रीय राजधानी में ज्यादा संक्रामक वैरिएंट के मामले सामने आए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड-19 की तीसरी लहर जनवरी-फरवरी में आ सकती है। उन्होंने कहा कि यदि हर कोई मास्क पहनता है, तो इसे रोका जा सकता है। केंद्र सरकार के अनुसार जिन देशों को खतरे वाले देशों की सूची में डाला गया है उनमें ब्रिटेन सहित यूरोपीय देश, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, बोत्सवाना, चीन, मॉरिशस, न्यूजीलैंड, जिम्बाब्वे, सिंगापुर, हांगकांग, इजराइल शामिल हैं। यदि हमारा देश खतरे वाले देशों से बाहर है तो निश्चित रूप से यह हमारी सजगता और सरकार की दूरदर्शिता है। अच्छी बात यह बताई जा रही है भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में सरकार ने पिछले दिनों हुए महामारी को ध्यान में रखते हुए देश की आधी आबादी को पूरी खुराक लगा दी गई है। लेकिन, महामारी तो विकट परिस्थितियों वाली होती ही है जिसे दुनिया ने पिछले दिनों देखा है। इसलिए इस बार वैज्ञानिकों की शोध के बाद इस बात को बहुत ही गंभीरता से लिया है कि यदि हम स्वयं अपना बचाव करते रहेंगे तो संभव है कि ओमिक्रोन नामक इस महामारी से अपने जीवन की रक्षा हम कर सकेंगे। समस्या जरूर बहुत बड़ी है, लेकिन जीवन रक्षा का भार केवल सरकार का ही नहीं, अपना भी है। हमें इसका ध्यान रखना ही होगा। आरोप—प्रत्यारोप का समय नहीं है। इसलिए सतर्क रहें, सावधानी बरतें।

Published / 2021-12-27 15:11:42
वाम हिंदूवादी है मोदी सरकार की विचारधारा...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रशांत किशोर को रणनीतिकार कहा अवश्य जाता है लेकिन वह खुद को राजनीतिक सलाहकार कहलाना पसंद करते हैं। पिछले दिनों वह हमारे बातचीत पर आधारित शो आॅफ द कफ के लिए आए जहां। हमने उनसे एक ऐसा सवाल किया जो हमेशा हमारे जेहन में रहता है। हमने पूछा कि क्या उनकी कोई विचारधारा है? यह एक स्वाभाविक प्रश्न है क्योंकि वह नरेंद्र मोदी, ममता बनर्जी, कांग्रेस-सपा (उत्तर प्रदेश, 2017), एम के स्टालिन, वाई एस जगनमोहन रेड्डी, अमरिंदर सिंह समेत कई नेताओं के साथ काम कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि वह विचारधारा के स्तर पर नास्तिक नहीं हैं और हम उन्हें वाम-मध्यमार्गी कह सकते हैं। उन्होंने अपनी बात महात्मा गांधी का उदाहरण देकर समझाई। बाद में मैंने देखा कि उन्होंने ट्विटर पर अपने परिचय की शुरूआत इन शब्दों से की है, गांधी का सम्मान करें...। वामपंथी रुझान वाला मध्यमार्गी होने के उनके दावे ने हमें सोचने पर विवश कर दिया। यदि आज हम अन्य प्रमुख राजनेताओं से यही प्रश्न करें तो? यदि राहुल गांधी, ममता बनर्जी, आंध्र के जगन मोहन, तमिलनाडु के स्टालिन, तेलंगाना के केसीआर आदि नेताओं से उनकी विचारधारा पूछी जाए और अगर वे जवाब दें तो कमोबेश यही उत्तर मिलेगा। भारतीय राजनीति में अब हर कोई वाम रुझान का दम भरता है। कोई नहीं कहता कि वह दक्षिणपंथी विचारधारा का है। यहां एक दिलचस्प सवाल पैदा होता है कि नरेंद्र मोदी का जवाब क्या होगा? जाहिर है हम अनुमान ही लगा रहे हैं कि वह हममें से किसी को यह सीधा सवाल करने देंगे: आपकी विचारधारा क्या है प्रधानमंत्री महोदय? आप उनके प्रशंसक हों या आलोचक, पूरी संभावना है कि आपको लगे कि वह स्वयं को दक्षिणपंथी बताएंगे। बीते सात वर्ष यानी जब से मोदी-शाह की भाजपा सत्ता में आई है, दक्षिणपंथ पार्टी तथा उसके पीछे की वैचारिक शक्तियों के लिए व्यापक रूप से स्वीकार्य शब्द है। हमें देखना होगा कि क्या यह बात तथ्यों पर खरी उतरती है। आप तैयार रहिए क्योंकि मैं आपको बताऊंगा कि मोदी और उनकी भाजपा दक्षिणपंथी हिंदुत्व का प्रतिनिधित्व नहीं करती। बल्कि यह वाम हिंदुत्व दर्शाती है। समय के साथ वाम-दक्षिण के भेद में घालमेल हो गया है। शासन के मामले में दक्षिणपंथ का पहला अर्थ है सामाजिक रूढ़िवाद, मजबूत धार्मिकता, कट्टर राष्ट्रवाद, आलोचना की कम गुंजाइश और अधिनायकवादी दृष्टि। इन सभी मानकों पर मोदी सरकार और मौजूदा भाजपा दक्षिणपंथी होने पर खरी उतरती है। परंतु हमें सामान्य विरोधाभास में नहीं उलझना है। भाजपा और मोदी अमेरिका के रिपब्लिकन और ब्रिटेन के कंजरवेटिव से अलग नहीं हैं। अब हम विवादित क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं। हम यह दलील कैसे दे रहे हैं कि मोदी-शाह-योगी की भाजपा विशुद्ध दक्षिणपंथी या हिंदू दक्षिणपंथी नहीं बल्कि वाम हिंदूवादी दल है? मोदी सरकार ने बीते सात से अधिक वर्षों में अर्थव्यवस्था को लेकर जो कदम उठाए हैं उन पर नजर डालिए। ऐतिहासिक संदर्भों के लिए अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली पिछली भाजपा सरकार पर भी नजर डालिए। उसने सरकार को कारोबार से बाहर रखने और विनिवेश मंत्रालय स्थापित करने की प्रतिबद्धता जताई थी। सन 2014 में जब पार्टी सत्ता में लौटी तो आशा के अनुसार वह मंत्रालय वापस आना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हालांकि अब वित्त मंत्रालय के अंतर्गत इसके लिए एक विभाग है जहां एक सचिव नियुक्त हैं। अब जाकर विनिवेश की बात होने लगी है लेकिन एयर इंडिया के अलावा ज्यादा कुछ हुआ नहीं है। निजीकरण के अन्य मामलों में बस बातें ही हो रही हैं या महज स्वामित्व हस्तांतरण। मसलन एक बड़ी सरकारी कंपनी द्वारा छोटी कंपनी का अधिग्रहण करना और सरकार द्वारा बड़े अंशधारक के रूप में घाटे की भरपाई किया जाना। अक्सर देखने में आता है कि सरकार जिस सरकारी उपक्रम का विनिवेश करना चाहती है उसमें एलआईसी या ओएनजीसी के माध्यम से हिस्सेदारी खरीद लेती है। सरकार को इससे पैसा मिलता है। हमारी शिकायत यह नहीं है कि उक्त राशि भारत की संचित निधि में गुम हो जाती है। यदि आप बाजार अर्थव्यवस्था में यकीन करते हैं तो आपको इस बात को लेकर शिकायत नहीं होगी कि एलआईसी या ओएनजीसी ने अपने मुनाफे से सरकार को लाभांश दिया। परंतु जब सरकार उन्हें अपनी परिसंपत्ति खरीदने पर विवश करती है तो जरूरी नहीं कि ये कंपनियां नीतिगत धारक या अल्पांश हिस्सेदार के हित में काम कर रही हों। हम यह नहीं कह रहे हैं कि वह हमेशा उनके खिलाफ होता है लेकिन तथ्य यही है कि इन कंपनियों के बोर्ड इन गैर सरकारी अंशधारकों के हितों को ध्यान में रखकर ही निर्णय नहीं कर रहे होते। यह वाम की विशेषता है, न कि दक्षिण की। वाम को बड़ी, महत्त्वाकांक्षी, कल्याण योजनाओं वाली अर्थव्यवस्थाओं के लिए जाना जाता है जिसमें राजस्व के बड़े हिस्से का पुनर्वितरण शामिल होता है। मोदी सरकार भी कमोबेश यही कर रही है। मनरेगा, ग्राम आवास, शौचालय निर्माण, उज्ज्वला योजना, किसानों और गरीबों को प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण से लेकर नि:शुल्क अनाज वितरण तक उसने ऐसा ही किया। क्या आपने ध्यान दिया है कि सरकार के बजट की आलोचना में विपक्ष कितनी खामोशी बरतता है? मौजूदा सरकार को लेकर अमीर समर्थक होने जैसे कुछ जुमले अवश्य कहे जाते हैं लेकिन इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि व्यक्तिगत स्तर पर लगने वाला कर सुधारों के बाद के दौर में इस समय उच्चतम है। वह लगभग 44 फीसदी है। प्राय: अमीरों के उपभोग की वस्तुओं पर लगने वाला 18 फीसदी जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर इसके अलावा है। वाम दल इसकी सराहना करेंगे। यकीनन वे चाहेंगे कि अमीरों पर और अधिक कर लगाया जाए। आशा है कि वे 97 फीसदी कर नहीं चाहेंगे जो इंदिरा गांधी के समाजवादी चरम दिनों में लगता था और जिसने देश में एक समांतर काली अर्थव्यवस्था की बुनियाद रखी थी। वामपंथियों को विस्तारवादी बड़ी और माई-बाप सरकार पसंद आती है। मोदी युग में हमारी सरकार के विस्तार पर ध्यान दीजिए। दिल्ली में एक के बाद एक बनते भवनों पर निगाह डालिए जो सरकार के बढ़ते आकार को समायोजित करने के लिए बन रहे हैं। अब नई सेंट्रल विस्टा परियोजना में नए भवनों की गुंजाइश बनेगी। वाजपेयी सरकार के साथ तुलना करें तो उन्होंने दिल्ली के केंद्र में स्थित घाटे में चल रहे लोधी होटल को बेचने में हिचकिचाहट नहीं दिखाई थी। होटल जनपथ उससे भी बड़ा सरकारी उपक्रम था जिसे बेचने के बजाय कई सरकारी कार्यालयों में बदल दिया गया है। अशोक होटल के बगल में स्थित सम्राट होटल को बहुत पहले सरकारी भवन में बदल दिया गया था। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि नए लोकपाल (क्या आपको याद भी है कि हमारे यहां एक लोकपाल नियुक्त किया गया था) को भी इसकी एक मंजिल का आधा हिस्सा मिला है। हमारे कर एक पीढ़ी में सर्वोच्च स्तर पर हैं, हमारी सरकार दो पीढ़ियों में सबसे अधिक आकार की है और आकार कम होने का नाम नहीं ले रहा। हम अपनी कंपनियों का निजीकरण अक्सर एक सरकारी कंपनी को दूसरी के हाथों सौंपकर कर रहे हैं। अब हमारी सरकार यह तय कर रही है कि पूरा देश कोविड का कौन सा टीका लेगा, बूस्टर खुराक दी जाए या नहीं और भारत में क्या बेचा जा सकता है। वास्तविक रूप से मुक्त बाजार में कोवैक्सीन, कोविशील्ड, स्पूतनिक, फाइजर और मॉडर्ना के टीकों की दुकानें और खरीदार होते। कार बाजार में उपभोक्ता मारुति या मर्सिडीज का चयन कर सकते हैं लेकिन वे अपने लिए पसंदीदा टीका नहीं चुन सकते। क्यों? इसलिए कि हमारी सरकार दरअसल माई-बाप सरकार है। यह आर्थिक मामलों में दक्षिणपंथी सरकार नहीं है। दक्षिणपंथ केवल धर्म और राष्ट्रवाद के क्षेत्रों तक सीमित है। सरकार का शेष हिस्सा उतना ही वाम रुझान वाला है जितनी कि कांग्रेस या कोई अन्य राजनीतिक दल। यही वजह है कि हम मोदी-भाजपा की विचारधारा को हिंदू वाम विचार कहते हैं।

Published / 2021-12-25 03:57:25
Christmas 2021: पवित्र बाइबल में प्रभु यीशु मसीह के बारे में कुछ इस तरह कहा गया है

एबीएन डेस्क। जिस तरह परमेश्वर की सृजना नहीं हुई, ठीक उसी तरह प्रभु यीशू मसीह भी हैं, जिनका न तो कोई आदि है और न ही अंत। प्रभु यीशू मसीह के आने से 700 वर्ष पहले यशायाह नबी ने मसीह के बारे में भविष्यवाणी की थी जिसके बारे में पवित्र बाईबल में इस तरह लिखा गया है कि प्रभु अर्थात परमेश्वर तुम्हें एक निशान देगा। देखो एक कुंवारी गर्भवती होगी और पुत्र जनेगी। वे उसका नाम इमानुएल रखेंगे। इस भविष्यवाणी की पुष्टि युहन्ना नबी ने मसीह के जन्म के समय की। युहन्ना नबी ने कहा शब्द देहधारी हुआ। शब्द का वर्णन मसीह के जन्म से हजारों वर्ष पहले लिखी गई पवित्र बाईबल में किया गया है। यहां शब्द प्रभु यीशू मसीह के लिए प्रयोग किया गया था। कैसर ओगस्तस की हुकूमत में यहूदिया के बादशाह हैरोदेस, जो अपने आप को परमेश्वर कहता था, अपनी प्रजा पर भारी अत्याचार कर रहा था। उस समय परमेश्वर ने उन मजलूम लोगों को हैरोदेस के जुल्मों से राहत दिलवाने, पाप से मुक्ति का मार्ग दिखलाने और स्वर्ग के राज्य के बारे में जागरूक करवाने के लिए अपने प्यारे बेटे (शब्द) यीशू मसीह को इस संसार में भेजा। प्रभु यीशू मसीह के जन्म के बारे में पवित्र बाईबल में इस तरह लिखा गया है : यीशू की माता मरियम की एक बढ़ई यूसुफ के साथ मंगनी हो चुकी थी और उनके इकट्ठे होने से पहले पवित्र आत्मा से मरियम गर्भवती पाई गई। उन दिनों जब मरियम गर्भवती थी तो कैसर ओगस्तस की हुकूमत की ओर से रायशुमारी के लिए यरूशलम के शहर बैतलहम जाकर अपना नाम लिखवाने के लिए कहा गया जिसके तहत मरियम और यूसुफ को वहां जाना पड़ा। वहां ठहरने के लिए कोई जगह न मिलने पर उनको तबेले में ठहरना पड़ा। वहां यीशू का जन्म हुआ। जब यीशू का जन्म हुआ तो आसमान पर एक रूहानी सितारा दिखाई दिया जिसकी रोशनी को देख कर सारा संसार जगमगा उठा। स रूहानी सितारे की चकाचौंध रोशनी को देखकर संसार की चारों दिशाओं से भविष्यवक्ताओं ने अपने ज्योतिष ज्ञान द्वारा पता लगाया कि वह हस्ती कहां पैदा हो सकती है। तो चारों ज्योतिषी अपने-अपने देश से उस महान हस्ती (यीशू) की तलाश में निकल पड़े। इस तलाश में रूहानी सितारे ने उनकी सहायता की। यीशू मसीह 33 वर्ष तक इस दुनिया में रहे। उन्होंने अपने जीवन में अनेक आश्चर्यजनक कार्य किए। अंधों को आंखें दीं, मुर्दों को जिंदा किया, बीमारों को स्वस्थ किया। अगर प्रभु यीशू मसीह की शिक्षाओं पर नजर डाली जाए तो ये इतनी सरल हैं कि आम आदमी उनको ग्रहण करके अपना जीवन रूहानी बना सकता है। उन्होंने अपने इन उपदेशों में इंसान को अपने आपको पहचानने के लिए बहुत ही सरल ढंग से कहा कि हे इंसान, तू किसी की आंख का तिनका निकालने से पहले अपनी आंख का शहतीर देख अर्थात किसी के बारे में टिप्पणी करने से पहले अपने चरित्र पर नजर डाल। उन्होंने किसी को क्षमा कर देने को सबसे बड़ा धर्म कहा। उन्होंने एक सामरी औरत, जो उस समय की सबसे छोटी जाति कहलाती थी, से पानी पीकर ऊंच-नीच के भेदभाव को समाप्त करने का संदेश दिया। उन्होंने सदैव ही प्रेम, आपसी भाईचारे और एकता का संदेश संसार को दिया इसलिए उनका जन्मोत्सव सारे संसार के लोगों द्वारा बहुत ही श्रद्धा व धूमधाम से मना रहा है। परमेश्वर ने संसार से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना इकलौता बेटा दे दिया ताकि हर एक जो उस पर विश्वास करे उसका नाश न हो बल्कि वह स्थायी जीवन प्राप्त करे।

Published / 2021-12-24 13:56:19
सदैव अटल... जिनके लिए सर्वोपरि था देशहित

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत रत्न भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का आज 25 दिसंबर को जन्म दिन है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी कुल मिलाकर 47 साल तक संसद के सदस्य रहे। वह 10 बार लोकसभा और दो बार राज्यसभा के लिए चुने गए। एकमात्र बार वह 1984 में लोकसभा चुनाव हारे थे जब कांग्रेस के माधवराव सिंधिया ने ग्वालियर में उन्हें करीब दो लाख वोटों से शिकस्त दी थी। वाजपेयी ने 10वीं, 11वीं, 12वीं, 13वीं और 14वीं लोकसभा में 1991 से 2009 तक लखनऊ का प्रतिनिधित्व किया। दूसरी और चौथी लोकसभा के दौरान उन्होंने बलरामपुर का नेतृत्व किया, पांचवीं लोकसभा के लिए वह ग्वालियर से चुने गए जबकि छठीं और सातवीं लोकसभा में उन्होंने नयी दिल्ली का प्रतिनिधित्व किया। वाजपेयी 1962 और 1986 में राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए। मुंबई में पार्टी की एक सभा में दिसंबर 2005 में वाजपेयी ने चुनावी राजनीति से अपने को अलग करने की घोषणा की। वह करीब 47 सालों तक सांसद रहे। वाजपेयी 1996 से 2004 के बीच तीन बार प्रधानमंत्री भी रहे। आखिरी बार उनकी झलक 2015 में दिखी जब तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया। प्रणब मुखर्जी प्रोटोकॉल को तोड़ते हुए खुद उनके घर सम्मान देने के लिए पहुंचे थे। अगर हिंदी को अंतररष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित और प्रसारित करने में किसी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है तो वह थे अटल बिहारी वाजपेयी। 1977 में जनता सरकार में विदेश मंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी का संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिंदी में दिया भाषण काफी लोकप्रिय हुआ था। यह पहला मौका था जब संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे बड़े अतंराष्ट्रीय मंच पर हिंदी की गूंज सुनने को मिली थी। परमाणु परीक्षण से कर दिया था दुनिया को हैरान वाजपेयी का कवि हृदय कोमल नहीं था। भारत को परमाणु राष्ट्र बनाने वाले वाजपेयी ही थे। 11 मई 1998 को राजस्थान के पोखरण में सफल परीक्षण के साथ भारत न्यूक्लियर स्टेट बन गया था। भारत ने शक्ति नामक परमाणु परिक्षण कर पूरी दुनिया को हैरान कर दिया था। वाजपेयी को फिल्मों का भी शौक था। उनके प्रिय गायक लता मंगेशकर, मुकेश और मोहम्मद रफी थे। उनकी पसंदीदा फिल्मे देवदास, बंदिनी और तीसरी कसम थीं। उनका पसंदीदा गाना एसडी बर्मन कृत ओरे मांझी...और मुकेश/लता मंगेशकर द्वारा गाया गया गीत कभी-कभी मेरे दिल में था। आखिर में जाते जाते भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी को समर्पित फिल्म बंदिनी से उनका पसंदीदा गाना ओरे मांझी। अटल बिहारी वाजपेयी 1951 में जनसंघ के संस्थापक सदस्य बने लेकिन लखनऊ में लोकसभा उप चुनाव हार गए, 1957 में जनसंघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया लखनऊ में हारे, मथुरा में जमानत जब्त हुई, लेकिन बलरामपुर से जीतकर दूसरी लोकसभा में पहुंचे, यह उनके अगले पांच दशकों के अटूट संसदीय करियर की शुरूआत थी। अटल जी वे पहले शख्स थे जिन्होने इस मिथक को तोड़ा कि भारतीय राजनीति में नेहरु वंश के सिवा कोई और देश नहीं चला सकता। वे ऐसे अजातशत्रु राजनेता थे जिन्होंने अपनी वाक्पटुता और अद्भुत भाषण कला से ने केवल आम जनता को अपना मुरीद बनाया अपितु उनके कट्टर विरोधी भी उनके कायल रहे। अटल जी में नेहरु ने बहुत पहले ही भावी प्रधानमंत्री देख लिया था। इंदिरा गांधी ने कांगेस में आने को कहा पर अटल नही माने। अटल बिहारी वाजपेयी जीवट के धनी थे उन्होंने सारी दुनिया की परवाह किए बगैर भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश बनाया, विपक्ष में रहकर भी संयुक्त राष्ट्रसंघ में देश का प्रतिनिधित्व किया, वहां पहली बार हिंदी का परचम लहराया। वे लखनऊ में लोकसभा उप चुनाव हार गए, 1957 में जनसंघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया लखनऊ में हारे, मथुरा में जमानत जब्त हुई, लेकिन बलरामपुर से जीतकर दूसरी लोकसभा में पहुंचे, यह उनके अगले पांच दशकों के अटूट संसदीय करियर की शुरुआत थी। 1968 से 1973 तक भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे अटल आपातकाल में जेल में गए व 1977 में जनता पार्टी सरकार में विदेश मंत्री बने, इस दौरान संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया। 1980 में वे बीजेपी के संस्थापक सदस्य रहे और 1986 तक अध्यक्ष व बीजेपी संसदीय दल के नेता भी रहे। 16 मई 1996 को पहली बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 31 मई 1996 को संख्या बल के आगे नतमस्तक होने के वक्तव्य के साथ त्यागपत्र दे दिया। अह्ण२ङ्म फीं ि- राजनाथ सिंह ने राजनेताओं की कथनी और करनी पर दिया बड़ा बयान, पड़ोसी देश से भी पूछा ये सवाल 1999 में एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली इस बार वे पूरे कार्यकाल के प्रधानमंत्री रहे। प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के शासन काल में भारत एक सशक्त परमाणु शक्ति सपन्न राष्ट्र बना और स्वच्छ सुशासन की राजनीति का उद्घोष हुआ। अटलजी महान राजनेता ही नहीं अपितु साहित्यकार, पत्रकार, संपादक व कुशल कवि तथा वक्ता भी थे। उनकी वकतृत्व कला के लिए नेहरु व इंदिरा जैसे विपक्षी नेता भी उन पर फिदा रहे हैं, इसी वजह से विदेशमंत्री के रूप में वें सर्वाधिक लोकप्रिय हुए तथा विदेशों में व अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को निखारने में अद्भुत योगदान दिया। यह अटल जी के व्यक्तित्व का ही प्रभाव था कि अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान जैसी भारत विरोधी शक्तियां भारत के प्रति विद्वेष की भावना भरने में नाकामयाब रहीं। अटल राष्ट्रीय, अन्तरराष्ट्रीय व संवैधानिक विषयों के गूढ़ ज्ञाता रहे। 1946 में वकालत की पढ़ाई बीच में ही छोड़ खुद को संघ के प्रति समर्पित कर दिया। अटल कहते थे कि भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता-जागता राष्ट्र पुरूष है। यह जीवन का आदर्श व एक जीवन पद्धति है जहां से ज्ञान की रश्मियां सम्पूर्ण विश्व में फैली हैं। यही वह देश है जिसने सम्पूर्ण विश्व को आध्यात्म का संदेश दिया है और विश्वगुरू कहलाया है। यह सदैव से धर्म, दर्शन, अध्यात्म के उच्चतम सिध्दान्तों का देश रहा है और जिसके वातावरण में मानवता तथा विश्व के बंधुत्व का राग ध्वनित होता रहता है। हमारी विरासत है, हमारी संस्कृति। भारत वन्दन की, अभिनन्दन की भूमि है। प्रधामंत्रीत्व काल में अटल का रणनीतिक कौशल देखकर राजनीतिक समीक्षक दंग रहे। विपरीत रीतियों-नीतियों वाले दलों के गठबंधन को उन्हानें कुशल ढंग से संभाला। परमाणु बम बनाने के बाद भी उन्होंने देश को अमेरिका व दूसरे देशों के दबाव में नही आने दिया। उस समय वे बहुत कम बोले परन्तु जो बोले वह अन्तर को छूने वाला व रणनीतिक कौशल से भरा होता था। एक परिश्रमी भारत व विजयी भारत बनाने का अटल का सदा ही सपना रहा। जब अटल जी ने राजनीति को अलविदा कह रखा है तब उनके धुर विरोधी रहे नेता भी मानते थे कि उनका चिंतन व मनन अद्भुत रहा, एक हिंदुवादी दल में होते हुए भी धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में अटल बेमिसाल रहे हैं। अटल की खास बात रही है कि वे वक्त पड़ने पर अपनी बेलाग बातें कहने से कभी नहीं चूके। जब लालकृष्ण अडवाणी की रथ यात्रा के बाद संसद में उन्हें संसदीय दल का नेता बनाया जा रहा था तब उन्होंने कहा था, आड़वाणी जी के इन भालू बंदरों को संभालना मेरे बस की बात नहीं है। पर न केवल संभाला अपितु अगले ही चुनाव में सरकार बनाने में सफल रहे। जब गोधरा कांड हुआ तब वे प्रधानमंत्री थे। जब पत्रकारों ने पूछा अब मुख्यमंत्री को क्या करना चाहिए तब अटल ने बेलाग कहा था उन्हे अपना राजधर्म निभाना होगा। बिना किसी के दबाव में आए अटल ने अपना तीसरा कार्यकाल जिस तरह पूरा किया वह भारत के धर्मरिपेक्ष स्वरूप की छवि का एक स्वर्णकाल कहा जा सकता है। दंगे व पंगे से रहित उस काल ने अटल को बहुत पहले ही भारतरत्न बना दिया था जिस पर भारत सरकार की मोहर तो बहुत बाद नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद लगी। अटल 94 साल हमारे बीच रहे अटल 16 अगस्त को इस वर्ष दैहिक से दैविक हो गए पर उनकी छवि, अद्भुत भाषण कला वह रुक-रुककर बोलना और देश के लिए दल को गौण कर देना हमेशा उनकी याद दिलाता रहेगा।

Published / 2021-12-23 13:05:27
मोदी अजेय हैं? लेकिन जय तो आवाम की हो...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। काशी की कायाकल्प में लगे प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तर प्रदेश में विकास की गंगा को भी नमन किया। आधारभूत संरचना के विकास से देश का सबसे अधिक भला होता है। युवाओं में मोदी का जबरदस्त क्रेज है मोदी-मोदी करती युवाओं की भीड़ काशी की सड़कों पर प्रसन्नता से लवरेज दिखी। लेकिन जब एक युवा से संवाददाता ने पूछा कि आप मोदी जी के विकास यात्रा से कितना खुश है तो उसने कहा कि विकास तो ठीक है लेकिन सरकारी नौकरियां भी दें मोदी जी। एचईसी हटिया में हड़ताल 20 दिन पूरा कर चुका है। मात्र एक हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था न कर पाने के कारण एक पूरा हटिया शहर की व्यवस्था छिन्न-भिन्न है। कोरोना की मार में मोदी जी की कंपनी के मजदूर मारे-मारे फिर रहें हैं संदेश तो यही जाता है। लूटा और बर्बाद किसने किया यह तो चुनावी भाषण का विषय है लेकिन गरीबी से कराहते कामगार क्या उत्पादन करेंगे यह यक्ष प्रश्न हैं। संकेत साफ है कि यूपी, बिहार और झारखंड में जॉब का अर्थ ही है सरकारी नौकरियां। आखिर देश के लगभग 25 करोड़ परिवार में लगभग 5 करोड़ ही तो हैं जो सर्व सुविधा संपन्न है। कुल मिलाकर 30 करोड़ लोगों का देश संपन्न भारत। मोदी ने निजीकरण की जो गति तेज की है उससे बिहार, झारखंड और यूपी सहित पूरे उत्तर भारत की राज्यों में जहां औद्यागिक विकास की गति धीमी रही है जॉब नहीं मिले हैं। निजीकरण का लाभ देश में असमान रहा है। आज भी युवाओं को सरकारी नौकरी ही पहली पसंद है। झारखंड सहित उत्तर भारत के राज्यों में न निजीकरण तेज हुआ न उद्योग लगा साथ ही सरकारी नौकरियां नीतिगत तौर पर कम कर दी गयी। बिहार के चुनाव में सबसे हिट नारा था दस लाख नौकरियों का जो तेजस्वी ने दिया और जीते भी, सबसे बड़ी पार्टी बनी लालू यादव के जंगलराज युक्त राष्टÑीय जनता दल (कथित रूप से) आखिर क्यों? क्योंकि बिजली, पानी सड़क के बाद अब सबसे अधिक आवश्यक जॉब है जो महाराष्टÑ गुजरात और दक्षिण भारत की तुलना में उत्तर भारत में कम है। क्या यूपी में यह नारा काम नहीं करेगा? मोदी कांग्रेस से न हारें लेकिन महंगाई से कराहती भारतीय आबादी है लगभग 100 करोड़ से हार सकते हैं। राष्टÑवाद का नारा क्षणिक प्रभाव छोड़ता है। उस वर्ग के लिये बहस का विषय है जो वर्तमान समय में आर्थिक रुप से मजबूत है। इनकी संख्या कुल संख्या में दो करोड़ परिवार तक सीमित है। कंपनियां अरबों के निवेश से विनिर्माण इकाइयां लगाएं, हजारों की संख्या में बढ़िया वेतन वाले रोजगार पैदा हों और संपन्नता का एक पनाहगाह बनकर उभरे, ताकि यह पिछड़ा राज्य आगे बढ़ सके। आलोचकों ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी की उपलब्धियों पर जो सवाल उठाए उसका मुख्य आधार यही रहा है कि उन्होंने इस राज्य में दशकों से कायम संपन्नता एवं सक्षमता का फायदा उठाया। भारत के नेता के तौर पर मोदी आर्थिक एवं बदलावकारी प्रतिभा दशार्ने में बुरी तरह नाकाम रहे हैं और कोविड-19 महामारी के समय उनके कमजोर प्रदर्शन से पहले ही यह बात उजागर हो चुकी थी। मोदी के लिए बिहार अपनी विकासपरक क्षमताएं दर्शाने के लिए एकदम साफ स्लेट है। बिजली, सड़क, पानी देने और कानून व्यवस्था की हालत सुधारने से जुड़ी अपनी उपलब्धियों के लिए तीन बार से मुख्यमंत्री पद पर आसीन नीतीश को सुशासन का खिताब दिया जाता रहा है। अगर बिजली देने के मामले में ही उनकी उपलब्धियां देखें तो बेहतर काम हुआ है। नीतीश के दौर में बिहार में बिजली खपत 700 मेगावॉट से बढ़कर 6,000 मेगावॉट हो गई और लालटेन युग का खात्मा हो गया। लेकिन आज राजद सबसे बड़ा दल क्यों है? यह सवाल बिहारका महत्वपूर्ण सवाल है लेकिन निश्चित रूप से बिहार के लोगों ने इस बदलाव को खुद महसूस किया है। फिर भी यह विडंबना ही है कि सुशासन के बावजूद बिहार अब भी बीमारू राज्यों में बना हुआ है और विकास के तमाम मानदंडों पर होने वाली रैंकिंग में अक्सर निचले पायदानों पर मौजूद रहता है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक कार्यालय के महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त गोविंद भट्टाचार्य ने इकनॉमिक सर्वे आॅफ बिहार का हवाला देते हुए कई विसंगतियों को रेखांकित किया है। उनका कहना है कि बिहार की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत के एक-तिहाई से भी कम है, सकल राज्य घरेलू उत्पाद में विनिर्माण की हिस्सेदारी 2015-16 और 2018-19 के दौरान एक फीसदी अंक गिरी है और राज्य के 38 में से 13 जिले देश के सर्वाधिक पिछड़े 117 जिलों में शामिल हैं। बिहार के निराशाजनक प्रदर्शन के इन संकेतकों को सामने रखने के साथ ही भट्टाचार्य यह भी कहते हैं कि इस स्थिति के लिए अकेले नीतीश को जिम्मेदार ठहराना अनुचित होगा। भारत में जनसेवा में लगा कोई भी व्यक्ति सुधारों की राह में खड़े संस्थागत अवरोधों से बखूबी परिचित होगा। जहां तक बिहार का सवाल है तो वह सामाजिक पिछड़ेपन एवं भ्रष्टाचार के अतीत में इस कदर फंसा हुआ है कि वहां पर बड़े सुधार ला पाना कोई छोटी चुनौती नहीं है। बिहार राज्य की 75 फीसदी से अधिक आबादी के खेती पर ही निर्भर होने से कारखानों के लिए बड़े पैमाने पर जमीन तलाशना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। बिहार उन राज्यों में से एक है जहां जमीन का अधिग्रहण करना बहुत कठिन है क्योंकि यहां पर भूमि स्वामित्व के रिकॉर्ड गड़बड़ हैं। हाल में शुरू की गई स्वामित्व योजना बिहार में जमीन के मालिकाना हक संबंधी रिकॉर्ड की समस्या को काफी हद तक दूर कर सकती है। पहले हर संसदीय क्षेत्र में और अब हर जिले में एक मेडिकल कॉलेज खोलने का दावा करने वाले पीएम मोदी का यह समझ बेहतरीन है लेकिन इसमें झारखंड कहां है? खस्ताहाल स्वास्थ्य देखभाल ढांचे को दुरुस्त करने के लिए केंद्रीय फंड देने के साथ ही केंद्र की स्वास्थ्य बीमा योजना का विस्तार भी कर सकते हैं। उनके सामने बेशुमार मौके हैं। काशी प्रतीक है कायाकल्प का लेकिन दिल्ली का रास्ता झारखंड बिहार और काशी (यूपी)होकर ही जाता है। वैसे युवाओं का काम या स्वरोजगार दोनों एक चुनौती भी है।

Published / 2021-12-21 15:40:17
भारतीय क्रिकेट के अप्रिय दौर की वापसी...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय क्रिकेट और विवादों का अटूट रिश्ता है। ऐतिहासिक रूप से इनकी वजह पराजय और बेइज्जती रही। इसमें तब्दीली तब आई जब 14 मार्च, 2001 को सौरभ गांगुली के नेतृत्व वाली टीम के बल्लेबाजों वीवीएस लक्ष्मण और राहुल द्रविड़ ने पूरा दिन बल्लेबाजी करके बुनियाद रखी और दिन के आखिरी घंटे में आॅस्ट्रेलिया को पराजित किया। उसके साथ ही भारत के दबदबे वाले दो दशकों का दौर शुरू हुआ। खासतौर पर टेस्ट क्रिकेट में। भारत का उभार इतना जबरदस्त रहा कि वह ग्रेग चैपल के कार्यकाल वाले अप्रिय दौर से भी सहजतापूर्वक निपट सका। बीच की अवधि में महेंद्र सिंह धोनी नजर आए लेकिन विराट कोहली गांगुली के वास्तविक उत्तराधिकारी बनकर उभरे। उनमें गली क्रिकेट वाली आक्रामकता भी थी और आॅस्ट्रेलिया को उसी की शैली में मात देने का माद्दा भी। यह विडंबना ही है कि भारतीय क्रिकेट को गौरवपूर्ण ऊंचाई पर ले जाने वाले ही अब उसे नीचे लाते दिख रहे हैं। गांगुली अब भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के प्रमुख हैं। द्रविड़ राष्ट्रीय टीम के कोच हैं और लक्ष्मण राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी (एनसीए) के प्रमुख। जबकि सर्वविजेता (कम से कम टेस्ट में) कप्तान विराट कोहली निशाने पर हैं। हम यहां तक कैसे पहुंचे, यह बताना क्रिकेट रूपी धर्म के बड़े से बड़े जानकार के लिए भी मुश्किल है। प्रशंसकों के लिए तो यह नाराजगी का सबब है ही। पहली बात तो यह कि मौजूदा विवाद खेलों को लेकर लाखों लोगों की एक भ्रामक धारणा को चुनौती देता है। लोग यह मानते थे कि खेलों में और खासकर क्रिकेट में बागडोर ऐसे लोगों के हाथ में है जो खिलाड़ी नहीं हैं। पहली बार एक शीर्ष और प्राय: समकालीन क्रिकेटर को क्रिकेट की सबसे बड़ी संस्था का मुखिया बनाया गया। नतीजा क्या निकला? दक्षिण अफ्रीका दौरे के ऐन पहले तमाम गड़बड़ियांं सामने आईं। हाल के वर्षों में भारत ने आॅस्ट्रेलिया से लगातार दो क्रिकेट शृंखलाओं में जीत हासिल की, इंगलैंड में एक शृंखला जीती और हर घरेलू शृंखला में विपक्षियों का सफाया किया। वेस्ट इंडीज अब श्रेष्ठ टीम नहीं रह गई है, न्यूजीलैंड का हम अक्सर दौरा करते हैं। लेकिन दक्षिण अफ्रीका में हम अब तक कोई शृंखला नहीं जीत सके हैं। इस समय दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेट अपने ही संकट से गुजर रहा है। वहां नस्ली विवाद, चोट और प्रतिभाओं के पलायन की समस्या है। कोहली की टीम के लिए वहां जीत हासिल करने का यह सुनहरा अवसर था। लेकिन बीसीसीआई ने क्या किया? टीम के दक्षिण अफ्रीका प्रस्थान से एक सप्ताह पहले कोहली पर हमला हुआ और आगे चलकर उन्हें और शमिंर्दा किया गया। मीडिया में भी कुछ अटकलबाजी हुई जो काफी हद तक गलत थी। ऐसी ही एक बेतुकी अफवाह यह थी कि उन्होंने एकदिवसीय शृंखला खेलने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि उसी समय उनकी बेटी का जन्मदिन था। पहली बात, विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक उन्होंने बोर्ड से ऐसा कुछ नहीं कहा था। बोर्ड के सूत्रों ने कहा कि भले ही उन्होंने बोर्ड से ऐसा कुछ नहीं कहा लेकिन ड्रेसिंग रूप में अपने साथियों से इस बारे में बात की थी। हमें नहीं पता बोर्ड क्या ड्रेसिंग रूम की जासूसी करता है या उसने खिलाड़ियों के फोन में पेगासस डाला है। परंतु तथ्यों और तारीखों पर नजर डालें तो पता चलता है कि यह बचाव जिसने भी चुना था वह तारीखों से परिचित नहीं था। विराट की बेटी का जन्मदिन उन तारीखों के दरमियान नहीं पड़ता जब एकदिवसीय शृंखला होनी है बल्कि वह कोहली के 100वें टेस्ट के दौरान पड़ेगा (बशर्ते कि वह फिट रहें और चुने जाएं)। बोर्ड के पदाधिकारियों ने ऐसी गलती कैसे कर दी? इसलिए कि उन्होंने तैयारी नहीं की थी। ओमीक्रोन के कारण दौरे की तारीख बदल दी गईं। डालमिया, बिंद्रा, ललित मोदी, श्रीनिवासन या अनुराग ठाकुर के दौर में कई शमिंर्दा करने वाली घटनाएं घटी होंगी लेकिन ऐसा तब भी नहीं हुआ था। आईपीएल के बाद भारतीय क्रिकेट बोर्ड की छवि सर्वाधिक सक्षम प्रबंधन वाले बोर्ड की बनी थी। इसके बाद भारतीय परंपरा के मुताबिक कुछ कुछ छेड़छाड़ शुरू की। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर एक नई व्यवस्था लागू की गई। आखिरकार शुचितावादियों की प्रार्थनाओं का जवाब दिया गया। एक बेहतरीन क्रिकेट खिलाड़ी को बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया। अब कम से कम खेल और कारोबारियों के बीच हितों का टकराव नहीं होगा। इसके बाद बोर्ड के प्रमुख को उन मैचों में एक क्रिकेट गेमिंग ऐप के विज्ञापन में देखा जिनमें उनकी टीम खुद खेल रही थी। दुनिया में यह अपनी तरह का अनूठा मामला है। उसके बाद ताजा गड़बड़ी सामने आई मानो विराट कोहली 2021-22 के लिए वही हैं जो ग्रेग चैपल 2005-06 के लिए थे। टीम के चयनकर्ता और बोर्ड यह दलील दे सकते हैं कि कोहली तीनों प्रारूपों के कप्तान नहीं बने रह सकते। उन्होंने टी-20 की कप्तानी छोड़ने की घोषणा करके उनके लिए रास्ता खोल दिया। तब चयनकर्ताओं का यह तर्क सही है कि सफेद गेंद से खेले जाने वाले दोनों प्रारूपों यानी एकदिवसीय और टी-20 के लिए एक कप्तान रखना सही होगा। विश्व क्रिकेट में अलग-अलग कप्तान रखना एक मानक है। केवल भारत और न्यूजीलैंड इसके अपवाद रहे क्योंकि विराट कोहली और केन विलियमसन के कद तथा उनके और टीम के प्रदर्शन ने उन्हें निर्विवाद नेतृत्वकर्ता बनाया। भारत के लिए यह कारगर नहीं रहा और एक कप्तान के अधीन रहते टीम 2013 के बाद कोई आईसीसी ट्रॉफी नहीं जीत पाई। चयनकतार्ओं का यह सोचना सही है कि रवि शास्त्री और विराट कोहली के रूप में दो लोगों की तानाशाही (हम यह जुमला हल्के में नहीं प्रयोग कर रहे, रविचंद्रन आश्विन से पूछिए) समाप्त होनी चाहिए। कोहली द्वारा टी-20 की कप्तानी छोडने के बाद सफेद गेंद के दो प्रारूपों के अलग कप्तान रखना भी बेतुका था।

Published / 2021-12-20 14:31:30
यूपी सहित पांच राज्यों के चुनाव का देश पर असर...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम से वैसे तो प्रदेशों में सरकारों का गठन होना है लेकिन यह नतीजे केंद्र की राजनीति की दशा-दिशा भी तय करेंगे। साल 2014 से केंद्र में भाजपा का राज उत्तर प्रदेश के बलबूते ही बना हुआ है इसलिए भाजपा हर हाल में यह प्रदेश दोबारा जीतना चाहेगी। यही नहीं उत्तर प्रदेश में यदि योगी आदित्यनाथ दोबारा सत्ता में वापसी करते हैं तो भविष्य में केंद्रीय राजनीति के द्वार भी उनके लिए खुल जायेंगे। इन चुनावों में वर्तमान मुख्यमंत्रियों का राजनीतिक भविष्य तो दांव पर लगा ही है साथ ही विपक्ष के कई नेताओं के लिए अपना आधार बचाये रखने के लिए भी यह चुनाव महत्वपूर्ण हैं। इन चुनावों में गठबंधन राजनीति के उन नये प्रयोगों की भी परख होगी जो भाजपा को हराने के लिए बनाये गये हैं। इन चुनावों के परिणाम इस सवाल का भी कुछ हद तक जवाब तलाशेंगे कि साल 2024 में होने वाले आम चुनावों में किन नेताओं के बीच होगा मुकाबला ? ममता बनर्जी ने अन्य राज्यों में तृणमूल कांग्रेस का आधार बढ़ाने के लिए और विपक्ष का नेतृत्व हासिल करने के लिए जो अभियान चलाया है यदि उसमें उन्हें सफलता मिली तो आगे के लिए उनका हौसला बुलंद हो जायेगा और विपक्ष का नेतृत्व कांग्रेस के हाथ से खिसक जायेगा। सिर्फ उत्तर प्रदेश की राजनीति की ही बात कर लें तो यहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समक्ष सत्ता में वापसी की तगड़ी और मुश्किल चुनौती है। यदि वह सत्ता में वापसी करते हैं तो इतिहास रच देंगे और भाजपा के राष्ट्रीय स्तर के नेताओं में शुमार हो जायेंगे। हो सकता है आगे चल कर उनको पीएम उम्मीदवार भी बना दिया जाये लेकिन यदि उनके नेतृत्व में पार्टी सत्ता में नहीं लौटी तो वह राजनीतिक रूप से एकदम किनारे किये जा सकते हैं। वहीं अखिलेश यादव के लिए भी खुद को साबित करने का अहम मौका है। अखिलेश यादव ने पिता मुलायम सिंह यादव की इच्छा के विपरीत समाजवादी पार्टी का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया और एक के बाद एक ऐसे फैसले किये जिससे पार्टी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। इस बार यदि उनके नेतृत्व में समाजवादी पार्टी ने विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया तो यकीनन उनका राजनीतिक कद बढ़ जायेगा और यदि वह एक बार फिर विफल रहे तो घर से ही उनके खिलाफ बगावत खड़ी हो सकती है। यही नहीं अखिलेश के नेतृत्व वाला गठबंधन अगर हारा तो आगामी चुनावों में राजनीतिक दल उनके साथ गठबंधन के लिए राजी नहीं होंगे। इसी तरह कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के राजनीतिक कॅरियर के लिए भी यह चुनाव बड़ी चुनौती हैं क्योंकि लोकसभा चुनावों में गांधी परिवार का गढ़ अमेठी भी बचाने में नाकामयाब रहीं प्रियंका गांधी वाड्रा यदि विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को नहीं उबार पाईं तो आगे के लिए मुश्किलें और बढ़ जायेंगी। राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष रहे चौधरी अजित सिंह के निधन के बाद अब पार्टी की कमान उनके बेटे जयंत चौधरी के हाथ में आ गयी है। जयंत के समक्ष अपने राजनीतिक कॅरियर को और पार्टी को बचाये रखने की तगड़ी चुनौती है। देखना होगा कि क्या समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर जयंत अपनी पार्टी का खाता विधानसभा में खोल पाते हैं। अन्य राज्यों की पार्टियां जैसे पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस, दिल्ली से आम आदमी पार्टी, तेलंगाना से एआईएमआईएम जैसे दल भी उत्तर प्रदेश में अपने लिये संभावनाएं तलाशने पहुँचे हैं। इन पार्टियों के नेता अपने आप को यूपी के लोगों का सबसे बड़ा हितैषी बता रहे हैं और बड़े-बड़े वादे भी कर रहे हैं। देखना होगा कि प्रदेश की जनता इनके बारे में क्या फैसला करती है। वहीं बात अगर उत्तराखण्ड की करें तो जबसे इस राज्य का गठन हुआ है तबसे एक बार भाजपा और एक बार कांग्रेस सत्ता में आती रही है। यहां अधिकतर मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाये लेकिन राजनीतिक रूप से कभी बड़ी अस्थिरता का सामना इस राज्य ने नहीं किया। इस समय भाजपा सरकार का नेतृत्व पुष्कर सिंह धामी के हाथ में है। धामी जिस स्टाइल में काम कर रहे हैं उसने राज्य सरकार के प्रति नकारात्मक भाव को कुछ हद तक कम जरूर किया है लेकिन देखना होगा कि क्या वह उत्तराखण्ड का राजनीतिक इतिहास बदल पाने में सक्षम हो पाएंगे जिसमें किसी पार्टी की सरकार लगातार दोबारा सत्ता में नहीं लौटी है। उत्तराखंड में भाजपा के समक्ष नेतृत्व का संकट तो नहीं है लेकिन कांग्रेस जरूर इस मुद्दे को लेकर परेशान है। वहीं गोवा राज्य की बात करें तो जिस तरह की राजनीतिक उठापटक यहां देखने को मिल रही है वह चुनाव करीब आते-आते और बढ़ेगी। मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय मनोहर पर्रिकर की पसंद थे। यकीनन वह साफ छवि के मुख्यमंत्री साबित हुए हैं लेकिन पार्टी को सत्ता में लाने की चुनौती पर विजय यदि वह पा लेते हैं तो उनका कद बढ़ जायेगा। दूसरी ओर कांग्रेस में जिस तरह की भगदड़ मची है वह ऐन चुनावों से पहले पार्टी को नुकसान पहुंचा रही है। राहुल गांधी ने कुछ क्षेत्रीय दलों का कांग्रेस के साथ गठबंधन तो करा दिया है लेकिन वहां कांग्रेस ही नजर नहीं आ रही है। कांग्रेस के समक्ष पंजाब में सिर्फ अपनी सत्ता बचाने की चुनौती नहीं है बल्कि गांधी परिवार के फैसले को भी सही साबित करने की चुनौती है। गांधी परिवार के निर्देश पर ही कैप्टन अमरिंदर सिंह को इस्तीफा देना पड़ा और चरणजीत सिंह चन्नी मुख्यमंत्री बनाये गये। यदि कांग्रेस पंजाब हारी तो गांधी परिवार के फैसलों पर जी-23 के नेता बड़े सवाल फिर से खड़े कर सकते हैं। दूसरी ओर पंजाब में सरकार और कांग्रेस का बरसों तक नेतृत्व करने के बाद अब कैप्टन अमरिंदर सिंह अपनी पार्टी बना चुहके हैं और वह भाजपा के साथ गठबंधन कर मैदान में उतरने वाले हैं। देखना होगा कि इस गठबंधन को राष्ट्रवाद का मुद्दा कितना चुनावी लाभ दिला पाता है। भाजपा को उम्मीद है कि कृषि कानून वापस लेने के बाद अब उसके खिलाफ नकारात्मक माहौल नहीं रह गया है। वहीं शिरोमणि अकाली दल के सामने भी चुनौती है कि यदि इस बार उसके गठबंधन की सरकार नहीं बनी तो पार्टी को संभाले रखना मुश्किल हो जायेगा। मणिपुर की 40 सदस्यीय विधानसभा के लिए भी चुनाव कराये जाने हैं। वहां इस समय पहली भाजपा सरकार है। मणिपुर में भाजपा शासन में विकास के कार्य तो कई हुए हैं साथ ही प्रदेश में शांति भी स्थापित हुई है। वरना पहले हड़तालें आदि ही चलती रहती थीं। पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र में विकास कार्यों को जिस तरह से केंद्र सरकार वरीयता दे रही है उसका लाभ यहां भाजपा को मिल सकता है। लेकिन नगालैंड की हाल की घटना के बाद अफ्सपा वापसी की मांग जोर पकड़ रही है। ऐसे में यहां रैलियां करने के लिए जब भाजपा के आला नेता आयेंगे तो उसने जनता जरूर सवाल करेगी। प्रदेश कांग्रेस ने तो आगे बढ़ कर वादा भी कर दिया है कि यदि वह सत्ता में आई तो कैबिनेट की पहली बैठक में पूरे प्रदेश से अफ्सपा हटाने का फैसला लिया जायेगा। कांग्रेस ने यहां हाल ही में पार्टी में कुछ बदलाव कर संगठन में जान फूंकने की कोशिश की है लेकिन पार्टी में चल रही उठापटक उसे नुकसान पहुँचा सकती है। पिछले चुनावों में भी सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद कांग्रेस यहां सरकार नहीं बना पाई थी जबकि भाजपा ने कुछ सहयोगी दलों को साथ लेकर पूरे पाँच साल सरकार चला कर दिखा दिया। मणिपुर में यदि मुख्यमंत्री एन. बीरेंद्र सिंह दोबारा सत्ता में लौटते हैं तो भाजपा के बड़े नेताओं में शुमार हो सकते हैं। बहरहाल, पांच राज्यों के चुनावों में भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश को जीतना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। विपक्ष के अनेक दल भी इस बात को समझ रहे हैं कि यदि साल 2024 में देश में होने वाले आम चुनावों में भाजपा का मुकाबला करना है तो उत्तर प्रदेश में भाजपा के विजय रथ को रोकना होगा। देखना होगा कि सारे दलों का यह संयुक्त प्रयास क्या इस बार कोई रंग लाता है या पाँचों राज्यों में भगवा फहराता है। वैसे यदि पाँचों राज्यों में भाजपा की जीत हुई तो इतना तय है कि 2024 के आम चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुकाबला करना विपक्ष के लिए और कठिन हो जायेगा। लेकिन इसके उलट यदि भाजपा सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही सरकार बनाने से चूकती है तो उसको आगे के लिए अपनी रणनीति नये सिरे से तय करनी होगी।

Published / 2021-12-18 15:18:32
शैक्षणिक माहौल से बढ़ती है युवाओं की क्षमता...

एबीएन डेस्क (डॉ मेरी ग्रेस)। एक कथन है कि अगर यह निश्चित हो जाए कि माता-पिता के जीवन दान से बच्चे का करियर बन सकता है, भवष्यि सुधर सकता है तो माता-पिता अपने बच्चों के लिए प्राण भी दे सकते हैं। पर ऐसा होता नहीं है। उनको अपना कैरियर स्वयं बनाना होता है। माता-पिता उसमें उनका सहयोग कर सकते हैं। प्राय: देखा गया है कि बच्चों के कैरियर को बनाने के उत्साह में बच्चों पर अतिरक्ति दबाव बना देते हैंजो बच्चों के भवष्यि के लिए ज्यादा घातक हो जाता है। माता-पिता को चाहिए कि वे उसका ध्यान रखें वे कुछ महत्वपूर्ण ंिवदुओं पर अमल करने का प्रयास करें। 1. एक काम काजी व्यक्ति का 70 प्रतिशत समय उसके कार्य स्थल पर लग जाता है। अगर व्यक्ति करियर से खुश नहीं होगा औरअपना काम ठीक से नहीं कर पाएगा तो नश्चिति रुप से खुश नहीं रहेगा और तनाम में रहेगा। जीवन में यह आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने करियर को पंसद करें। इसमें माता-पिता की भूमिका महत्वपूर्ण है। वे बच्चोें को प्रात्साहित करेें कि वे अपने पंसद को अपना कैरियर बनाए। इससे बच्चों का भवष्यि खुशनुमा रहेगा। 2. माता-पिता को कभी अपने बच्चों की तुलना किसी अन्य बच्चों या सगे संबंधियों से नहीं करना चाहिए। हर बच्चा दूसरों से अलग होता है साथ ही हर सफल व्यक्ति दूसरे सफल व्यक्ति से कम या अधिक हो सकता है। मेरे एक परिचित सदैव अपने बच्चे को अपना उदाहरण देते रहते थे कि हम एक बडे़ कंपनी के वाईस प्रेंिसडेंट है। एक दिन बच्चें ने कहा कि आप वाईस प्रेंसिडेंट हैं, न बिल गेटस तो नहीं बन सके न। 3. माता-पिता बच्चों के रोल मॉडल होते हैं। बच्चें बचपन में उनकी नकल करते हैं। माता-पिता को कोई ऐसी हरकत नहीं करना चाहिए कि बच्चों पर बुरा असर पड़े। 4. बच्चों से सदैव संवाद बनाए रखना आवश्यक है। उन्हें करियर कोर्स और भवष्यि की योजनाएं समझाया जाना चाहिए। अगर माता-पिता से ये जानकारी मिल जाए तो बच्चों को बाहर जाने की आवश्यकता ही नहीं होगी। बच्चे गलत सलाह पर वश्विास कर सकते हैं इसलिए उन्हें गलत सलाह से बचाया जाना चाहिए। बच्चों से संवाद यहां तक की फल्मि, समाज और देश दुनियां की बात करनी चाहिए। 5. गलतियां सबसे होती है। गलती सफलता की पहली सीढ़ी है यह मानकर उन्हें माफ किया जाना चाहिए। बच्चों को ज्यादा फटकार नहीं लगाना चाहिए। गलतियों पर उनको नई राह दिखाएं। बच्चे सुधर जाएंगें। 6. बच्चे की हां में हां भी करना उचित नहीं है। कभी-कभी उनकी बातों पर न भी करना चाहिए। इससे वे जीवन की सच्चाई भी समझेंगे। विशेषकर कैरियर से संबंधित बातों पर हर बात में हां न करें उन्हें उचित सलाह देने का प्रयास करें। सदैव माता-पिता से हां सुनने के आदि बच्चे जीवन में घोखा खाते हैं। शिक्षकों पर बच्चों को शैक्षणिक भार डालकर आप जिस प्रकार असहयोग करते हैं उससे बच्चे की शैक्षणिक स्थिति में गिरावट आती है। शिक्षको का सहयोग करें जिससे आपका बच्चा शिक्षकों का सम्मान करेगा। (लेखिका उर्सूलाइन इंटर कॉलेज की प्राचार्या हैं।)

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सच तो सामने आकर रहेगा

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