विचार

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Published / 2022-02-11 13:30:04
हिजाब या अलगाववादी षडयंत्र...

एबीएन उडिटोरियल डेस्क (विनोद बंसल)। भारतीय संविधान के अनुसार प्राथमिक शिक्षा सबके लिए अनिवार्य है। किन्तु इस अनिवार्यता के बावजूद दुर्भाग्यवश स्वतंत्रता के 75वें वर्ष में भी देश की कुल जनसंख्या का 36.90 फीसदी हिस्सा आज भी निरक्षर है। मुस्लिमों में तो यह निरक्षरता दर 42.7 फीसदी है। यदि महिलाओं की बात करो तो ये आंकड़े और भी भयावय हैं। देश की 66 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं आज भी निरक्षर हैं। उच्च शिक्षा में तो इनकी भागीदारी मात्र 3.56 प्रतिशत ही है जो कि अनुसूचित जातियों के अनुपात 4.25 प्रतिशत से भी कम हैं। क्या कभी सोचा है कि ये सब आखिर क्यों है? स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात एक तो हमारे राजतन्त्र की शिक्षा के प्रति उदासीनता, दूसरा संसाधनों का अभाव तथा ऊपर से धार्मिक कट्टरता ने मुस्लिम महिलाओं की साक्षरता दर को सबसे नीचे रखा। पहले तो बेटियों को घर से ही नहीं निकलने दिया जाता। दूसरा उन पर बुर्के को लाद दिया जाता है। अकेले घर से बाहर पाँव नहीं, मोबाइल नहीं, शृंगार नहीं, मनोरंजन नहीं, पर-पुरुष से बात नहीं, इत्यादि अनेक फतवे थोप दिए जाते हैं। जिसके कारण पहले तो उनके परिजन ही विद्यालय नहीं भेजते और यदि ऐसा हो भी जाए तो ये बंधन बेटियों के पाँवों को बेड़ियों की तरह जकड़े रहते हैं। बेटी-बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान के अंतर्गत वर्तमान केंद्र सरकार ने अपनी विभिन्न योजनाओं के माध्यम से बेटियों की शिक्षा के लिए विशेष प्रयास प्रारंभ किए। जिनका प्रतिफल बेटियों की सुरक्षित व सहज शिक्षा के रूप में सामने आ रहा है। आज चारों ओर के परीक्षा परिणामों पर नजर डालें तो बेटियां सर्वाधिक अंक प्राप्त कर मेरिट में सबसे ऊंचे पायदान पर दृष्टिगोचर हो रही हैं। यह एक सुखद अनुभूति तो है किन्तु अभी जब हम लक्ष्य से कोसों दूर हैं तभी अचानक उन बेटियों की शिक्षा पर अचानक कुछ कट्टरपंथियों का पुन: आक्रमण पीड़ादायी लगता है। अचानक विरोध क्यों : 2022 के प्रथम माह में ही कर्नाटक में उडुप्पी के एक छोटे से स्कूल में प्रारम्भ हुआ अनावश्यक विवाद, जिहादियों या यूं कहें कि कुछ कट्टरपंथियों की हट के चलते कुछ ही दिनों में बागलकोट में पत्थरबाजी तक कैसे ब दल गया जहां के स्थानीय प्रशासन को वहां धारा 144 तक लगानी पड़ी।.... राज्य सरकार को अपने सभी शिक्षण संस्थान तीन दिन के लिए बंद करने पड़े। कुछ अन्य राज्यों में भी प्रदर्शन होने लगे। दिल्ली के शाहीन बाग में भी नाराएतकदीर-अल्लाहहुअकबर फिर से गूंजा। कुछ मंत्रियों के बयान आए तो वहीं विपक्षी दल इस मामले को संसद तक ले गया। उधर, देश में जिहाद, अलगाववाद व इस्लामिक कट्टरता की फैक्टरी कहलाई जाने वाली संस्था पीएफआई की संलिप्तता भी जग-जाहिर हो गई। बच्चों के विवाद में सर्वप्रथम राहुल गांधी कूदे जिसने उसको मुस्लिम व महिला अधिकारों से जोड़ने की कुचेष्टा की। उसके बाद मंगलवार को कर्नाटक के प्रदेश कोंग्रेस अध्यक्ष डी के शिवकुमार ने एक झूठे ट्वीट के द्वारा हिन्दूओं पर आरोप लगाया कि उन्होंने एक कॉलेज में तिरंगे को उतारकर भगवा लहरा दिया जो तिरंगे का अपमान है। जबकि, उसी दिन शिवमोगा के ही पुलिस अधीक्षक श्री बीएम लक्ष्मी प्रसाद ने साफ तौर पर कहा कि पोल पर तिरंगा था ही नहीं। इसमें तिरंगे का अपमान कहां से हुआ। वास्तव में तो कॉंग्रेस की चिढ़ भगवा और भगवा-धारियों से है। यह एक बार पुन: स्थापित हो गया। हिजाबियों की तरफ से न्यायालय में कॉन्ग्रेसी ही तो लड़ रहे हैं। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता व राम द्रोही कपिल सिब्बल तो शुक्रवार को इस मामले को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ही पहुंच गए जैसे कि वे तीन तलाक व बाबरी के लिए लड़े। इसके अतिरिक्त इस्लामिक जिहादियों व कथित सेकलक्यूलरिस्टों की टूल किट गैंग द्वारा भी पूरे देश में अराजकता का वातावरण निर्मित किया जा रहा है। अब बात करते हैं विद्यालय व उसके नियमों की। तो हम सभी को पता है कि विद्यालय में प्रवेश से पूर्व एक फॉर्म भरवाया जाता है कि मैं विद्यालय के सभी नियमों का पूरी निष्ठा से पालन करूंगा तथा उसके उल्लंघन पर दंड का भागी बनूंगा। इन नियमों में विद्यालय के निर्धारित गणवेश (यूनिफॉर्म) की बात भी होती है। साथ ही संभवतया हम सभी ने कभी-ना-कभी (चाहे भूलवश ही सही) गणवेश के किसी अंग की न्यूनता के लिए दंड भी भुगता होगा। किन्तु कभी किसी विद्यार्थी को हिजाब, बुर्का या गोल टोपी में नहीं देखा होगा। होना भी नहीं चाहिए। विद्यालय समता, समानता व एकरूपता के केंद्र हैं। ना कि जाति, मत-पंथ, भाषा-भूषा या खान-पान के आधार पर अलगाववाद के अड्डे। उडुपी की ये छात्राएं गत अनेक वर्षों से उसी विद्यालय में बिना किसी शिकायत के शांति से पढ़ रही थीं। फिर जिस विद्यालय में अचानक हिजाब का उदय हुआ वह तो था ही सिर्फ छात्राओं का जहां, लड़कों का प्रवेश ही वर्जित है। तो फिर हिजाबी पर्दा किस से और क्यों? इस पर एक प्रश्न के जवाब में एक विरोध करने वाली मुस्लिम बेटी ने बगलें झाँकते हुए कहा कि एकाध शिक्षक तो पुरुष हैं हीं इसलिए हिजाब जरूरी है। सोचिए! जिस विद्यार्थी की गुरुजनों के प्रति ऐसी दुर्जनों वाली सोच हो तो उसके विद्या अध्ययन का क्या अर्थ? खैर! ये गलती उस बेटी की नहीं अपितु, उसे बहलाने, फुसलाने, भड़काने व उकसाने वाले उस कट्टरपंथी धडे की है जो कभी चाहता ही नहीं था कि मुस्लिम बेटियां कभी घर की चार दीवारी पार कर अपना जीवन स्वच्छंदता से जी सकें। वे तो उन्हें अपने पैरों की जूती, मर्दों की खेती व मनोरंजन का साधन से अतिरिक्त कुछ समझता ही नहीं। इस सारे षड्यंत्र के पीछे देश की उस कट्टर इस्लामिक जिहादी संस्था पीएफआई की उपस्थिति भी साफ तौर पर स्पष्ट हो चुकी है जिसके विरुद्ध अलगाववादी व आतंकवादी गतिविधियों के संदर्भ में देश की सर्वोच्च सुरक्षा एजेंसी - एनआईए जांच एजेंसी जांच कर रही है और जो देशभर में इस्लामिक कट्टरता और अराजकता फैलाने में लिप्त है। इसकी छात्र विंग कैंपस फ्रंट आॅफ इंडिया का बयान भी मीडिया में आ चुका। यह संयोग है या षड्यंत्र, ये आप तय करें किन्तु यह तथ्य और सत्य है कि जैसे ही कॉंग्रेस ने कट्टरपंथियों की चाल के समर्थन में ट्वीट करना प्रारम्भ किया पाकिस्तान से भी उसी स्वर में अनेक तालियां बजने लगीं। एक ओर जहां कभी कट्टरपंथियों का विरोध व विद्यार्थियों का समर्थन करने वाली पाकिस्तानी नोबल विजेता मलाला, जिसने हलाला पर भी कभी मुंह नहीं खोला, हिजाब का हिसाब मांगने लगी। इतना ही नहीं, पाकिस्तान के अनेक मंत्री, नेता व वहां की पूर्व प्रधानमन्त्री की बेटी भी इस हिजाब जिहाद की समर्थक बन ट्वीट पर टूट पड़ीं। कॉंग्रेस के ट्वीट पर पाकिस्तान ताली ना बजाए ऐसा कैसे हो सकता था! ये कट्टरपंथी हर चीज को शरीयत के पैमाने से नापने लग जाते हैं लेकिन हकीकत में शरीयत उनके हलक से भी नीचे कभी नहीं उतरा। वैसे भी यह भारत है जो, संविधान से चलता है ना कि शरीयत की नसीहतों से। जिसकी आड़ में मुस्लिम महिलाओं को हलाला, तीन तलाक, बहु-विवाह, बहु बच्चे, बाल-विवाह, हिजाब व बुर्के जैसी अनंत बेड़ियों में जकड़ के रखा जाता है। उन्हें मदरसों में मौलवियों के पास तो जाने की छूट है किन्तु मस्जिदों में नहीं? वे मुस्लिम मर्दों को खुश करने की साधन तो होती हैं किन्तु कभी मुल्ला, मौलवी या काजी नहीं बन सकतीं। मोदी सरकार से पूर्व तो पुरुष के बिना महिलाओं को हज तक की अनुमति नहीं थी। पुत्रियों को संपत्ति में अधिकार आज तक नहीं! अपने ही दत्तक पुत्रों से पर्दा कैसा? उन्हें संपत्ति में अधिकार क्यों नहीं? जो लोग इस्लाम को वैज्ञानिक व प्रगतिशील बताते हैं उनके लिए ये बहुत बड़ी चुनौतियां हैं। यदि उनको विरोध ही करना था तो इन बुराईयों व अत्याचारों के विरुद्ध बिगुल फूंकतीं। किन्तु शायद यदि किसी ने ऐसा किया तो उसका अंजाम भी लोगों ने देखा है। वैसे जिन लड़कियों ने हिजाब के लिए विद्यालय में जिहाद किया उनके वे फोटो व वीडियो भी आजकल सोशल मीडिया में खूब वायरल हैं जिनमें वे स्वयं फटी जींस टी-शर्ट में बिना किसी स्कार्फ, हिजाब या बुर्के के सार्वजनिक स्थानों पर मस्ती करते हुए नजर आ रही हैं किन्तु विद्यालयों में..। क्या विद्यालय में घुसते ही उनका इस्लाम खतरे में या जाता है! खैर! अब सीबीएसई ने अपनी फाइनल परीक्षाओं की तिथि घोषित कर दी है। आगामी 26 अप्रेल से वे परीक्षाएं देश भर में होने वाली हैं। अब विद्यार्थियों को स्वयं को राजनीति या कट्टरपंथियों का मुहरा बनने की बजाय अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। गणवेश तो पहनना ही पड़ेगा इसी में सब की भलाई भी है। हम 21वीं सदी के नागरिक हैं जो अपनी आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। हमें किसी टूलकिट गैंग का हिस्सा नहीं अपितु अच्छे अंकों के साथ उत्तम परीक्षा परिणाम प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित करना है। संघर्ष हो तो पढ़ाई के लिए व नंबरों के लिए। वास्तविकता तो यह है कि इस्लामिक कट्टरपंथियों को देश में एकता या एकरूपता पच नहीं रही। वे बारंबार अपनी अलग पहचान चाहते हैं। वे चाहते हैं कि मुस्लिम बेटियाँ अशिक्षित रह कर उनके उत्पीड़न की शिकार बनी रहें। उनका एक ही एजेंडा है जो विभाजन के समय जिन्ना की मुस्लिम लीग ने दिया था। लड़ के लिया है पाकिस्तान, हंस के लेंगे हिंदुस्तान। आज हिजाब, कल बुरखा, परसों नमाज, फिर मस्जिद, मदरसा, हलाल और फिर...। विभाजनकारियों के ये षड्यन्त्र अब सफल नहीं होने वाले। ये अफगानिस्तान नहीं जहां बेटियों को शिक्षा से वंचित किया जाए। हम एक-एक बेटी को शिक्षित व जागरूक नागरिक बनाएंगे चाहे वे किसी भी मत-पंथ, संप्रदाय, भाषा-भूषा या क्षेत्र की हो। (लेखक विहिप के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।)

Published / 2022-02-10 15:58:40
पर्यावरण संबंधी मंजूरी की व्यवस्था ध्वस्त...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सुनीता नारायण)। रैंकिंग इसलिए प्रदान की जाती हैं ताकि सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वालों को पुरस्कृत किया जा सके। परंतु ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इससे यह संकेत निकलता है कि चीजों को कैसे बेहतर ढंग से अंजाम दिया जाए। इसलिए जब केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय कहता है कि वह राज्यों के पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकार को इस आधार पर रैंकिंग देगा कि वे पर्यावरण संबंधी मंजूरी किस गति से देते हैं तो दरअसल इससे यही पता चलता है कि उसका पूरा ध्यान परियोजनाओं को मंजूरी मिलने पर केंद्रित है, न कि आकलन की गुणवत्ता अथवा यह सुनिश्चित करने पर कि विकास परियोजनाओं के पर्यावरण प्रभाव को कम किया जा सके। आप कह सकते हैं कि इसमें लगने वाला समय निगरानी का संकेतक नहीं है तथा मंत्रालय का नोटिस केवल आकलन समितियों को जवाबदेह बनाने तथा यह सुनिश्चित करने पर आधारित है कि परियोजनाओं में अनावश्यक देरी न हो। परंतु यह इतना आसान नहीं है। तथ्य यह है कि रैंकिंग पर्यावरण आकलन के पहले से तैयार ताबूत में आखिरी कील है। बीते एक दशक या उसके आसपास के समय में एक के बाद एक विभिन्न सरकारों ने व्यवस्थित ढंग से उस निर्णय प्रक्रिया को छिन्नभिन्न किया है जो आकलन या जांच-परख की इजाजत देती थी। यह हास्यास्पद है और मेरी नजर में मंत्रालय के इस निर्देश ने उसकी खुद की बनायी प्रक्रिया व्यवस्था की अवमानना की व्यवस्था कर दी है। पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) की शुरूआत 1994 में हुई थी जब विकास परियोजनाएं कम थीं और प्रक्रिया को किसी तरह की चुनौती नहीं दी जाती थी। सन 2000 के दशक से गड़बड़ी की शुरुआत हुई जब परियोजना निर्माण को जांच पड़ताल की इस व्यवस्था में शामिल किया गया। इसमें दो राय नहीं कि विनिर्माण खासकर बड़े पैमाने पर बनने वाली आवासीय, बुनियादी ढांचा अथवा वाणिज्यिक परियोजनाओं का पर्यावरण पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। उनमें पानी का इस्तेमाल होता है, गंदा पानी उत्पन्न होता है, यातायात बढ़ता है और ठोस कचरा भी निकलता है। दिक्कत यह थी कि पूरी व्यवस्था को कभी उन्नत नहीं बनाया गया ताकि परियोजनाओं के निर्माण के साथ तालमेल बिठाया जा सके। इसकी वजह से परियोजनाओं में देरी होने लगी और लेनदेन की लागत में इजाफा हुआ, दूसरे शब्दों में कहें तो भ्रष्टाचार होने लगा। इसलिए 2006 में मंत्रालय ने काम राज्यों को विकेंद्रीकृत और आउटसोर्स कर दिया। उसने केंद्रीय स्तर की व्यवस्था को राज्य स्तर पर अपनाया तथा राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकार गठित किए। परियोजनाओं के लिए ए, बी, बी1 और बी2 जैसी श्रेणियां बनायी गईं। इस दौरान विवेकाधिकार की पूरी गुंजाइश रखी गई। कुल मिलाकर जांच परख की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ तथा विकास परियोजनाएं भी पर्यावरण के अनुपालन के मामले में ज्यादा बेहतर नहीं हुईं। कुल मिलाकर ईआईए की कवायद अधिक पेचीदा साबित हुई। मैं ऐसा क्यों कह रही हूं? जरा इस बात पर विचार कीजिए कि मौजूदा प्रक्रिया कितनी खामी से भरी हुई है। परियोजना शुरू करने वाले से अपेक्षा की जाती है कि वह ईआईए को अंजाम देने वाले सलाहकार को पैसे चुकाए। यह बात केंद्र अथवा राज्य के पर्यावरण प्रभाव आकल प्राधिकार द्वारा मंजूर संदर्भों पर आधारित होती है। ए श्रेणी की परियोजनाएं केंद्र के पास जाती हैं जबकि बी श्रेणी की परियोजनाएं राज्यों को जाती हैं। अब ऐसी परियोजनाएं बी 1 (विस्तृत आकलन जरूरी) श्रेणी की हैं या बी 2 (विस्तृत आकलन की जरूरत नहीं) श्रेणी की, यह तय करने का काम राज्यों का है। समिति कार्य क्षेत्र का दायरा तय कर सकती है, ज्यादा सूचना मांग सकती है या उसे खारिज कर सकती है। इसके बाद ईआईए किया जाता है। इसके लिए कम से कम 12 सक्रिय क्षेत्र विशेषज्ञों एवं प्रबंधन तथा निगरानी योजनाओं की आवश्यकता होती है। मसौदा ईआईए अंग्रेजी में है और इसका संक्षिप्त रूप क्षेत्रीय भाषाओं में है। इसे सार्वजनिक मशविरे के लिए प्रस्तुत किया जाता है। सार्वजनिक सुनवाई के लिए एक विस्तृत प्रक्रिया है जो स्थानीय आपत्तियों की सुनवाई के लिए अहम होगी। इसके बाद मामला आकलन समिति के पास जाता है जिसे मसौदे को परखना होता है, और अधिक सूचना जुटानी होती है और इसे सशर्त स्वीकार या अस्वीकार करना होता है। सच यह है कि परियोजनाओं को शायद ही कभी नकारा जाता है। हमने जुलाई 2015 से अगस्त 2020 तक प्रस्तुत 3,100 परियोजनाओं का विश्लेषण किया। केवल तीन फीसदी परियोजनाएं ऐसी थीं जिनकी अनुशंसा नहीं की गई। ये परियोजनाएं भी जरूरी सूचनाओं के साथ वापस आ जाएंगी। परंतु इस प्रक्रिया में परियोजना शुरू करने वालों से कई बार कहा जाता है कि वे और अधिक आंकड़े और स्पष्टीकरण प्रस्तुत करें। आखिर में, समिति परियोजना को मंजूरी प्रदान करती है और ज्यादातर मामलों में वे कुछ ऐसी शर्तों के साथ खुद को बचा लेते हैं जिनकी शायद कभी निगरानी नहीं की जाएगी। मंजूरी के बाद समितियों को परियोजना के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जाता है। उनका काम मंजूरी के साथ ही समाप्त हो जाता है। इसके बाद निगरानी का काम मंत्रालय के सीमित कर्मचारियों वाले क्षेत्रीय कार्यालयों के भरोसे छोड़ दिया जाता है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इतने सशक्त नहीं होते हैं कि वे प्रभाव की निगरानी कर सकें क्योंकि यह मंजूरी पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के अधीन दी जाती है, न कि हवा या पानी के लिए बने कानूनों के तहत। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान दोहराव होता है, जांच की कमी होती है और यह सुनिश्चित करने का कोई इरादा नहीं होता है कि परियोजना क्रियान्वयन के समय पर्यावरण के हितों का ध्यान रखा जाए। ऐसे में जब हम मंजूरियों की इस ध्वस्त व्यवस्था का बचाव करते हैं तो इससे पर्यावरण बनाम विकास की गलत बहस को बढ़ावा मिलता है। हकीकत में पर्यावरण के हित पहले ही हाशिये पर डाले जा चुके हैं और विकास बेलगाम हो चुका है।

Published / 2022-02-09 14:11:43
डॉ गौंझू की रचनाओं में दिखती है झारखंड की संवेदना...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (विजय केसरी)। डॉ गिरिधारी राम गौंझू की रचनाओं में झारखंड की संवेदना झलकती है। उनका संपूर्ण जीवन नागपुरी और हिंदी भाषा के उत्थान, विकास व प्रचार प्रसार में बीता था। उनकी रचनाओं में झारखंड की सोंधी महक मिलती है। नागपुरी भाषा के प्रति उनके लगाव को देखते बनता था। डॉ गिरधारी राम गौंझू का जन्म खूंटी स्थित बेलवादाग ग्राम में 5 दिसंबर 1949 को हुआ था। खूंटी में अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने एमए, बीएड, एलएलबी और पीएचडी की। अब तक उनकी तीस के लगभग पुस्तकें प्रकाशित हैं। नए शोधार्थियों के लिए उनकी पुस्तकें एक नई राह की ओर मार्ग प्रशस्त करेंगी। बतौर एक प्राध्यापक उन्होंने एक अलग पहचान निर्मित की थी। उनकी सहजता, सरलता मृदुलता सदा विद्यार्थियों व मिलने जुलने वालों को याद आती रहेगी। उन्होंने हिंदी साहित्य के क्षेत्र में भी जितना काम किया, सदा हिंदी अनुरागियों को अपनी ओर आकर्षित करता रहेगा। डॉ गिरधारी राम गौंझू का खूंटी जैसे गांव में जन्म लेकर इस मुकाम तक पहुंचना कोई साधारण बात नहीं है। इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने कड़ा संघर्ष किया था। विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्ति के पश्चात वे नागपुरी भाषा विकास एवं हिंदी साहित्य सृजन के क्षेत्र में और जोर-शोर से जुट गए थे। 2021 में वे कोरोना महामारी की चपेट में आ गए और सदा सदा के लिए हम लोगों को छोड़ कर चले गए। उनका असमय जाना झारखंड के लिए एक अपूरणीय क्षति के समान है। 73 वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत सरकार ने डॉ गिरधारी राम गौंझू को उनके नागपुरी, समग्र भाषा साहित्य सेवा के लिए पद्मश्री पुरस्कार प्रदान करने की घोषणा की। यह खबर जैसे ही झारखंड प्रांत पहुंची, झारखंड के शिक्षाविदों, समाजसेवियों, राजनीतिज्ञों, साहित्यकारों, शोधार्थियों एवं नागपुरी भाषा प्रेमियों ने खुले दिल से प्रशंसा की। गौंझू जी की नागपुरी के साथ हिंदी भाषा में भी समान रूप से पकड़ थी। वे एक शिक्षाविद के साथ समाज सेवी भी थे। वे हमेशा जरूरतमंदों की मदद किया करते थे। वे मित्रों के दुख सुख में हमेशा साथ दिया करते थे। झारखंड की लोक भाषा, कला- संस्कृति, नृत्य- संगीत विकास आदि के प्रति भी उनकी निष्ठा देखते बनती थी। उन्होंने विद्यार्थी जीवन से ही नागपुरी और हिंदी को समृद्ध बनाने के लिए लेखन से नाता जोड़ा लिया था। उनका यह नाता आजीवन बना रहा था। वे नियमित रूप से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में झारखंड की कला संस्कृति,रहन -सहन, भाषा आदि से संबंधित लेख लिखा करते थे। उनकी सामग्रियां रांची सहित देश के विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में स सम्मान प्रकाशित होती रहती थी। जहां तक ज्ञात है कि रांची से प्रकाशित हिंदी दैनिक रांची एक्सप्रेस में उनकी पहली रचना प्रकाशित हुई थी। प्रारंभिक दिनों में इनके कई महत्वपूर्ण आलेख इसी पत्र में प्रकाशित हुए थे। सभी लेख बहुत ही महत्वपूर्ण व शोध परक हैं। उनके लेखों का संकलन पुस्तक रूप में आ जाए तो यहां के सुधी पाठकों के लिए एक संग्रहणीय पुस्तक बन जाएगी। उन्होंने यह भी चिंता व्यक्त की थी कि झारखंड अलग प्रांत का निर्माण जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुआ था, राज्य की दिशा और दशा अच्छी नहीं है। फलस्वरुप यहां की भाषा, संस्कृति पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। प्रांत की इस दशा पर भी झारखंड के लेखकों को अपनी कलम चलानी चाहिए। उन्होंने राज्य की दिशा और दशा पर भी काफी कुछ लिखा था। उन्होंने समय पर मुझे उक्त सीरीज हेतु लेख भेज दिया था मैंने उनके लेख को सचित्र प्रकाशित किया था। लेख प्रकाशन के बाद उन्होंने मुझे बधाई दी थी। उनसे मेरी जब भी बातचीत हुई, उन्हें झारखंड की नहीं बेहद चिंता थी। झारखंड अलग प्रांत के संघर्ष में उन्होंने सौ से अधिक लेख इस आंदोलन को समर्पित किया था। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है। वरिष्ठ पत्रकार संजय कृष्ण जी ने गिरिधारी राम गोंझू के संबंध में ठीक ही लिखा है कि वे एक सहज सरल, मृदुभाषी व्यक्ति थे। उनका अंदर और बाहर एक समान था। वे जब भी किसी से मिलते थे, उनके चेहरे की खुशी देखते बनती थी। वे जितना लिखते थे। उससे कहीं ज्यादा पढ़ते थे। उनकी रचनाओं में गहराई होती है। उनकी रचनाएं लोगों में आशा की किरण पैदा कर देतीं हैं। जब वे मंच से अपनी बातों को रखते थे। उनकी बातें भी गहराई होती थी। वे जिस विषय पर अपनी बातों को रखते थे। बहुत ही तन्मयता के साथ रखते थे। बिल्कुल विषयातर नहीं होते थे। वे गहराई के साथ अपनी बातों को रखते थे। लोग उनकी बातों को बड़े ध्यान से सुनते थे। झारखंड की लोक कला विकास, भाषा विकास और नृत्य विकास के प्रति उनकी रचनाएं निरंतर समय से संवाद करती रहेंगी। उन्हें गर्व था कि उनका जन्म एक झारखंडी परिवार में हुआ। वे झारखंड की रीति रिवाज को सहेजना चाहते थे। इसे आगे बढ़ाना चाहते थे। इस निमित्त उन्होंने असंख्य लेख लिखा जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित है। अब वे उम्र के जिस पड़ाव पर पहुंच चुके थे। उन्होंने लेखों का संकलन और संपादन प्रारंभ कर दिया था। लेकिन उनका यह कार्य अधूरा रह गया। उन्होंने जितना लिखा है, मेरी दृष्टि में पच्चास से अधिक पुस्तकें तैयार हो सकती हैं। लेकिन उनका यह कार्य अधूरा रह गया। झारखंड अलग प्रांत की लड़ाई में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। गिरिधारी राम गौंझू झारखंड के जाने-माने चिर परिचित लेखक थे। उनकी रचनाएं हिंदुस्तान, प्रभात खबर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, खबर मन्त्र, देशप्राण सहित देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहती थी।

Published / 2022-02-08 17:08:40
तेलंगा खड़िया ने हिला दी थी अंग्रेजी हुकूमत की नींव...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ दुलार कुल्लू)। वीर शहीद तेलंगा खड़िया का जन्म 9 फरवरी 1806 ई को गुमला जिला अंतर्गत सिसई थाना के मुरगू ग्राम में हुआ था। उनका जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम ढुलिया खड़िया और माता का नाम पेतो खड़िया था। उनके दादा का नाम सिरू खड़िया और दादी का नाम बुच्ची खड़िया था। तेलंगा खड़िया मूरगू ग्राम के जमीनदार तथा पाहन परिवार से संबंध रखते थे। उनके दादाजी सिरू खड़िया बहुत ही धार्मिक, साहित्यिक एवं सुलझे हुए सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। खड़िया भाषा में वीर, साहसी और अधिक बोलने वाले व्यक्ति को तेब्बलंगा कहा जाता है। वीर शहीद तेलंगा खड़िया बचपन से ही बहुत वीर, साहसी, कर्मठ एवं अधिक बोलने वाले थे। यही कारण रहा कि उनका नाम तेब्बलंगा से तेलंगा हुआ। तेलंगा खड़िया बिलुंग गोत्र से संबंध रखते थे। वैसे तो उनकी पढ़ाई लिखाई बहुत ही कम हुई थी, लेकिन वे सरल स्वभाव वाले ईमानदार, मिलनसार एवं कर्मठ समाज सेवी यक्ति थे। तेलंगा खड़िया का मुख्य पेशा कृषि एवं पशुपालन था। घरेलू कार्य को करते हुए उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति के लिए अपने अनुयायियों को अखाड़े में तीर-धनुष तथा गद्दा चलाने की कला का प्रशिक्षण भी दिया करते थे। ग्राम मूरगू से पूर्व में स्थिति सिसई के अखाड़े में लोगों को एकत्रित कर युद्ध विद्या का प्रशिक्षण दिया करते थे। इनकी सेना की संख्या 9 सौ से 15 सौ तक थी। तेलंगा खड़िया के सैनिकों के संबंध में खड़िया भाषा में एक लोकगीत भी प्रचलित है- तेलंगा भैया बारियो चारियो कोना जाबे। नौ सै कड़म के मलि छोड़ाबे। उपर्युक्त गीत में बताया गया है कि तेलंगा भइया चारो ओर जाइएगा लेकिन नौ सौ सेना को कभी मत छोड़ियेगा। ये नौ सौ सैनिक तो तुम्हारे ही मूल सपना हैं। हे तेलंगा भइया नौ सौ सेना को कभी मत भूलियेगा इन्हें कभी मत छोड़ियेगा। तेलंगा के पिताजी छोटानागपुर के नागवंशी महाराजा रातूगढ़ के भंडारपाल थे। नागवंशी शासन काल में भंडापाल की पदवी बहुत ही इमानदार व्यक्ति को दी जाती थी। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि खड़िया जनजाति के लोग आरंभ से ही बहुत अधिक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ रहे हैं। तेलंगा खड़िया अपने पिता के साथ कभी-कभी महाराजा के दरबार में जाया करते थे। इस क्रम में सामाजिक एवं राजनीतिक बातों को सुनकर परिपक्व हुए। तेलंगा खड़िया आरंभ से ही शोषण और अत्याचार के सतत विरोधी थे। इससे मुक्ति के लिए वे गांव-गांव घूमकर जागृति उत्पन्न करने लगे। गांवों में जाकर ग्रामजूरी पंचायत की स्थापना करने लगे। उन्होंने 13 ग्रामजूरी पंचायत का गठन किया और अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति के लिए बिगूल फूंका। उनके द्वारा गठित 13 ग्रामजूरी की सूची भी अनुसंधान के बाद उपलब्ध हो चुका है। ये हैं- ग्राम मूरगाू सिसई, ग्रामजूरा, ग्राम डाइगढ़ नागर थाना सिसई, ग्राम देठौली थाना गुमला, ग्राम दुन्दरिया थाना गुमला, सोसो थाना गुमला, नीमटोली थाना गुमला, ग्राम बघिमा थाना पालकोट, ग्राम नाथपुर थाना पालकोट, ग्राम कुम्हारी थाना बसिया, ग्राम बेन्दोरा थाना चैनपुर, ग्राम कोलेबिरा थाना कोलेबिरा, ग्राम महाबुआंग थाना बानो। माना जाता है कि इसके अतिरिक्त भी ग्रामजूरी रहे होंगे जो अभी अज्ञात हैं। एक बार तेलंगा जब बसिया थाना में ग्रामजूरी पंचायत का गठन कर रहे थे तभी उन्हें अंग्रेज पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। गिरफ्तार करने के बाद उन्हें लोहरदगा जिला मुख्यालय के जेल में बंद कर दिया गया था। उन्हें पकड़वाने में जमीनदरों का हाथ था। इसका वर्णन भी खड़िया लोकगीत में मिलता है। यह लोकगीत है- लोहारदगाते जोरी बेरी ओबुसुतेमोय, साहेब हुकुम तेरोअ, जोरी बेरी ओबसुतेमोय, कटा रो ती, ते जोरी बेरी ओबसुतेमोय।। इस गीत में कहा गया है कि लोहरदगा में जोड़ा भर बेड़ी (हथकड़ी) पहनाते हैं। यह हुकूम साहब देते हैं। हाथ और पांव में जोड़ा भर बेड़ी पहनाते हैं। लोहरदगा जेल में कुछ दिन रखने के बाद तेलंगा खड़िया को कलकत्ता जेल भेज दिया गया। कहा जाता है कि उन्हें 14 साल की कठोर सजा सुनायी गयी थी। इसका उल्लेख खड़िया लोककथा एवं लोकगीतों में भी मिलता है। एक गीत उदाहरण स्वरूप देखा जा सकता है- कहां कर राइज राजा , कहां का हिरा राजा, राजा भाई कलिकत्ता तेलंगा का डेरा राजा भाई कलिकत्ता तेंलेंगा का डेरा।। जसपुर कर राइज राजा नागपुरी कर हिरा राजा भाई कलिकता ..... बुडु कर कर राइज राजा, राजा भाईकलि ... पांच भाषा पांचों परगना, राजी तोरा के तेलेंगा न डोले देबे।। कलकत्ता जेल से छूटने के बाद तेलेंगा पुन: अपने गांव लौट आये और सिसई अखाड़े में अपने समर्थकों से मिले। आंदोलन के लिए विचार-विमर्श किये और फिर नये सिरे से उलगुलान करने में लग गये। तेलेंगा खड़िया अंग्रेजी हुकूमत को भारत से उखाड़ फेकने के लिए अजीवन संघर्ष किये। स्वतंत्रता आंदोलन उनके द्वारा दी गयी कुबार्नी को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। आज हम आजादी का अमृत महोत्सव कार्यक्रम मना रहे हैं, झारखंड की धरती में जन्मे तेलेंगा खड़िया जैसे प्रत्येक वीर सपूतों के संघर्षपूर्ण जीवन को संकलित कर प्रकाशित कराना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। अंत में प्रेमधवन द्वारा शहीद फिल्म में लिखित गीत की पंक्तियां सहज ही याद आ जाती है- जलते भी गए कहते भी गये आजादी के परवाने जीना तो उसी का जीना है जो मरना देश पर जाने।। (लेखक मानवशास्त्री और खड़िया समाज के चिंतक हैं।)

Published / 2022-02-07 15:56:38
नागपुरी के यशस्वी कवि प्रफुल्ल राय

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ कोरनेलियुस मिंज)। झारखंड की रत्नगर्भा भूमि में जन्में प्रफुल्ल कुमार राय नागपुरी भाषा, साहित्य जगत के ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र थे, जिनका कार्य हम सभी के लिए अनुकरणीय है। आज प्रफुल्ल कुमार राय को छोड़ कर नागपुरी साहित्य का इतिहास नहीं लिखा जा सकता है। नागपुरी भाषा साहित्य के विकास के लिए उन्होंने अथक श्रम किया। साहित्यकार के साथ-साथ प्रफुल्ल कुमार राय गायक, कुशल नेतृत्वकर्ता एवं प्रशासक भी थे। नागपुरी भाषा परिषद 1960 की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसके वे सचिव भी थे। प्रफुल्ल कुमार राय अपनी मातृ भाषा नागपुरी के उत्थान के लिए वे अजीवन समर्पित रहे। प्रफुल्ल कुमार राय ने 1980 ई में जोहार नामक पत्रिका का संपादन किया। 1957 ई. में आकाशवाणी राँची केन्द्र की स्थापना के साथ ही जुड़े। उन्होंने आकाशवाणी राँची से नागपुरी गायन की परंपरा को आगे बढ़ाया। वे आधुनिक नागपुरी साहित्य के अग्रदूत थे। सोनझइर और रिंगचिंगिया नामक पुस्तक में उनकी कविताएं संकलित हैं। संकर गोटेक जिनगी प्रफुल्ल कुमार राय द्वारा लिखित नागपुरी की पहली उपन्यास है। उन्होंने डहर कविता से नागपुरी साहित्य में आधुनिक कविता को स्थापित किया। डहर उनकी पहली कविता है। इस कविता के माध्यम से उन्होंने राष्ट्रीय संकट के समय एकता को बल प्रदान किया है। इस कविता की पृष्ठभूमि भारत-चीन युद्ध एवं भारत पाकिस्तान युद्ध रहा है। प्रफुल्ल कुमार राय ऐसे समय में उत्साह एवं जोश के साथ कह उठते हैं- एक राग दे हमरे एक हइ। एक राग दे हमरे जवान हइ। आउर सउबे जोर से दे- हमरे इंसान ही आउर सेहे तेहें जल्दी झगरा झंझट नई चाही,आउर सेहे तेहें कखनों चुप रइह जाही लेकिन इकर का मतलब हामरे डेरातही आउर अपमान खाय के भी हामरे सेराल हइहर्गिज नहीं कहियो नहीं। डहर नामक इस कविता के माध्यम से कवि प्रफुल्ल कुमार राय दार्शनिक ढंग से आधुनिकता को सामने रखते हैं। उनकी कविताओं में आधुनिक सोच और जोश का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। आब नागपुरी चुप नी रही जैसी कविता के माध्यम से उन्होंने नागपुरी भाषियों को अपने हक अधिकार के लिए आगे आने का आह्वान किया। सोनझइर पुस्तक में संकलित लहरा नामक कहानी की कथा मानवीय रिश्तों और संवेदनाओं को आकर्षक ढंग से व्यक्त करती है। वर्षा ऋतु के समय मानव मन उठने वाली वासनात्मक लहर का अंकन इस कहानी में बड़े ही कलात्मक ढंस से हुआ है। सोनझइर, लहरा, अवसरे नइ मिले बुझू आउर किलकिला, बिन बातक बात, एक चकता रउद, तिरलोचन आउर रिबेनटाप, पुस कर राइत, भाँपल कांदा, दांत, तिरफला, कंचन, सावित्री, बिसाहा, पंच, कांटी जैसी प्रसिद्ध कहानियाँ नागपुरी कहानी साहित्य के रत्न हैं। 2013 में लिखित संकर गोटेक जिनगी उपन्यास प्रफुल्ल कुमार राय की अमर कृति है। इस उपन्यास में उन्होंने 1934 से 1989 ई. तक के छोटानागपुर के परिवेश का चित्रण किया है। मेंजुर पांइख प्रफुल्ल कुमार राय की अप्रकाशित उपन्यास है। वे नागपुरी के युग प्रवर्तक लेखक थे। 1967 में प्रकाशित सोनझइर इनकी पहली प्रकाशित पुस्तक है और चिंगचिंगिया दूसरी पुस्तक है। कांटी, सिलइठ, गरम कोट, टफठेन, चांद आउर सुरूज, सुलेमान, नसीब, बेरा सिरे, तीन बात आदि कहानियाँ आकाशवाणी राँची से प्रसारित हुई है। बरता आउर नागपुरी गीत, बरखा बूँद, नागपुरी भासा कर उदगम उनकी प्रमुख निबंध हैं। ठाकुर विश्वनाथ शाही नागपुरी अनुदित और डोम्बारी पहार उनकी नाटक है। सहजीना, बेतला यात्रा और नगड़ी सम्मेलन उनकी यात्रा संस्मरण रचनाएँ हैं। मुक्त छंद इनकी नागपुरी कविताएँ पद्य साहित्य में मील का पत्थर साबित हुई इैं। बहथी बोहाथी, जनजाइत, तजबीज, गाँधी, अंधार राती, विभोर, फागुन-फागुन, बिसनाथ साही, उनकी प्रसद्धि कविताएँ हैं। शकुन्तला, चकित, पाइलकोट, कसमकस, बिजोग, नागपुर वंदना, छोट परिवार, पंद्रह अगस्त जैसी कुछ फुटकर गीतों की रचना भी उन्होंने की है। प्रफुल्ल कुमार राय को नागपुरी पद्य साहित्य का अनमोल मोती माना जाता है। वे नागपुरी के ऐसे गौरव शिखर हैं, जिसे काल का दीमक भी नहीं खा सकता है और इतिहास हीरे की तरह संजोये रखता है। प्रफुल्ल कुमार राय नागपुरी साहित्य के यशस्वी, लोकप्रिय साहित्य स्रष्टा, महान गायक और कुशल मार्गदर्शक थे। अपनी जिजिविषा से उन्होंने नागपुरी की गरिमा को आकाश मंडल तक विस्तृत किया। वे नागपुरी के यशस्वी कवि और गद्यकार थे। ऐसे महान रचनाकार का जन्म 8 फरवरी 1926 में हुआ था। इनका बचपन गरीबी में व्यतीत हुआ। उसके बावजूद उन्होंने गरीबी को मात देते हुए मैट्रिक की परीक्षा की। तत्पश्चात 12 फरवारी 1945 ई में गुमला के कलेक्टरी में प्रॉवेशनर के रूप में सरकारी नौकरी में योगदान दिया। इस नौकरी में वे 18 फरवरी 1959 तक कार्य किये। 19 फरवरी 1959 ई. को उन्होंने सीसीएल में सहायक के पद पर योगदान दिया और अपने मेहनत, लगन के बदौलत उच्च अधिकारी पद को प्राप्त किया। 1 मार्च 1984 ई. को वे सीसीएल के उच्च अधिकारी पद से सेवानिवृत हुए। नौकरी के क्रम में अपनी सादगी, वाकपटुता, कार्य के प्रति समर्पण व मिलनसार व्यक्तित्व के कारण प्रफुल्ल कुमार राय अपने सह-कर्मियों के बीच लोकप्रिय रहे। उनमें कार्य करने की लगन थी। वे सेवानिवृति के बाद राँची न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में कार्य करते रहे। साथ ही नागपुरी भाषा और साहित्य की समृद्धि के लिए कलम चलाते रहे। 7 फरवरी 1991 ई को प्रफुल्ल कुमार राय भले ही इस संसार को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कह गये लेकिन अपनी रचना एवं कर्म के कारण वे नागपुरी और झारखंडी समाज के दिलों में हमेशा जीवित रहेंगे। तुलसीदास के रामचरितमानस की इस पंक्ति से प्रभावित प्रफुल्ल कुमार राय ने इसे अजीवन अमल भी किया- कर्म प्रधान विश्वास करि राखा। जो जस करै तो तस चाखा।। (लेखक नागपुरी विभाग गोस्नर कॉलेज रांची के व्याख्याता हैं।)

Published / 2022-02-06 13:28:05
देश का स्वर विलीन...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (एनके मुरलीधर)। देश की आवाज स्वर कोकिला के जाने से वह आवाज संसार से चली गयी जिसका कोई जोड़ दुनिया में नहीं थी। उन्होंने कभी संगीत को व्यापार की दृष्टि से नही देखा। इतनी विविधिता वाला गायन का एक इतिहास संसार से चला गया। गायन की विविधता और श्रेष्ठ शैली के साथ संगीत की देवी स्वरूप लता जी ने जो लकीर खींच दी उसे सृष्टि के सजृनहार का एक उपहार मानकर हम सब अनंत काल तक संजोकर रखेंगे। एक दिव्य ज्योंति जो संगी और कला के क्षेत्र को लभगभ 80 साल तक आलोकित करती रही। जीवन संघर्ष के साथ सफलता की राह कभी भी आसान नहीं होती है। लता जी को भी अपना स्थान बनाने में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पडा़। कई संगीतकारों ने तो आपको शुरू-शुरू में पतली आवाज के कारण काम देने से साफ मना कर दिया था। उस समय की प्रसिद्ध पार्श्व गायिका नूरजहां के साथ लता जी की तुलना की जाती थी। लेकिन धीरे-धीरे अपनी लगन और प्रतिभा के बल पर आपको काम मिलने लगा। लता जी देश का स्वर थी, आवाज थी। अब यह स्वर विलीन हो गया। लता मंगेशकर जिस प्रकार दुनिया की संगीत प्रेमियों के लिये आस्था और समर्पण का राह आलोकित करती रहीं हैं उसका दूसरा कोई विकल्प की कल्पना नहीं की जा सकती है। उनका कद इतना बड़ा था कि पूरा राष्ट्र की के स्वर का प्रतिक बन गयी थी। आज हम कह सकते हैं कि देश का स्वर विलीन हो गया। यूनिवर्स ने देश को जो स्वर उपहार में दिया था उसे वापस ले लिया। आने वाली पीढ़ी शायद लता जी के कृति को विश्वास ही न कर सके। देश रत्न, भारत कोकिला की आवाज मानों राष्ट्र की संस्कृति थी जो अब शून्य में विलीन हो गयी है। पूरा राष्ट्र प्रकृति के नियम को लेकर शोकाकुल है। देश को अपनी लता दी पर अभिमान था, अभिमान है। देश के इतिहास में कभी न मिटने वाली हस्ताक्षर हैं लता दी।

Published / 2022-02-05 16:05:40
खत्म करें भेदभाव, देश की आधी आबादी को भी है जॉब का हक...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ रेणु सिंह)। राजपथ पर सीमा भवानी का करतब देखकर पूरे देश का हौसला बढ़ा जब बीएसएफ की महिला बटालियन ने हैरत अंगेज कारनामें दिखलाये। इस साल के शुरू में खबर आई कि सार्वजनिक क्षेत्र की एक दिग्गज कंपनी तेल और प्राकृतिक गैस निगम के इतिहास में पहली बार एक महिला ने अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक का कार्य भार संभाला है। इसके पहले देश के कुछ बैंकों में सर्वोच्च पद पर भी महिलाएं रही हैं। छिटपुट ऐसे और उदाहरण भी हैं। इन सबसे लग सकता है कि भारत के कार्यबल में महिलाओं को वह स्थान हासिल है जिसकी कि वे हकदार हैं, पर यहां जो उदाहरण गए हैं, वे नियम कम अपवाद ज्यादा हैं। जैसे तमाम और मामलों में भारत कई विकासशील देशों से पीछे है, वैसे ही कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी के मामले में भी देश की स्थिति उत्साहजनक नहीं है। देश जिन बड़ी समस्याओं से जूझ रहा है, उनमें बेरोजगारी निश्चित रूप से एक है। देश में बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हैं, पर इन बेरोजगार लोगों में महिलाओं का अनुपात ज्यादा है। और तो और, सभी रोजगारशुदा लोगों में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ने की बजाय घटती जा रही है। चाहे सामाजिक समानता के नजरिए से देखें या मानवाधिकारों के नजरिए से, देश के कार्यबल में महिलाओं का समुचित प्रतिनिधित्व न होना एक गंभीर चिंता का विषय है। देश को आजादी मिलने के साथ जिस भारत की कल्पना की गई थी, करीब पचहत्तर वर्ष बाद की स्थिति भी इससे मेल नहीं खाती। लैंगिक समानता के मामले में भी हम अभी पीछे हैं। इस असमानता के कारणों की तलाश में हमें कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है। समाज का पुरुष प्रधान स्वरूप बना हुआ है और कहीं न कहीं यह दृष्टिकोण भी मौजूद है कि महिलाओं को उनका अधिकार देकर उन पर अहसान किया जा रहा है। मनोवैज्ञानिक और व्यवहार विज्ञानी यह बात बार-बार दोहराते रहे हैं कि प्रतिभा पुरुष और महिला में भेद नहीं करती। किसी भी प्रयोग में यह नहीं सिद्ध हुआ है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में कम बुद्धिमान होती हैं, बल्कि कई ऐसी भूमिकाएं बताई गई हैं जिनमें महिलाओं का प्रदर्शन बेहतर पाया गया है। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है जिनमें महिलाओं की क्षमता पर विश्वास कर उन्हें महत्त्वपूर्ण दायित्व सौंपे गए और उन्होंने इसे बखूबी पूरा कर के दिखाया। बिना किसी आधार के महिलाओं को कमजोर अथवा अक्षम मान लेना कहीं न कहीं अपरिपक्व सोच को ही इंगित करता है। यह सोच बदल रही है, पर उस गति से नहीं जितनी कि होनी चाहिए। महिलाओं की स्थिति में व्यापक सुधार तभी होगा जब यह सोच भी पूरी तरह से सुधर जाए। यदि कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी जनसंख्या में उनके अनुपात के अनुरूप नहीं है तो मुख्यत: यह सामाजिक कारणों से है। तमाम शोधों और अध्ययनों में बताया गया कि किसी भी देश की समृद्धि तथा उसकी अर्थव्यवस्था के फलने-फूलने के लिए उसमें महिलाओं की पूरी भागीदारी होनी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र संघ का भी कहना है कि सतत विकास तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए लैंगिक समानता जरूरी है। सभी प्रगतिशील संगठनों में मानव संसाधन के लिए विविधीकरण तथा समावेशन संबंधी नीतियां लागू की हैं। इसका मकसद जनशक्ति में सभी वर्गों के समुचित प्रतिनिधित्व और कमजोर लोगों को भी मौका देने से है। इसके अच्छे परिणाम निकले हैं और कारपोरेट जगत में महिलाओं के लिए अवसर बढ़ रहे हैं, पर देश में उपलब्ध कार्यबल से सीमित संख्या में ही लोगों को बड़ी कंपनियों तथा फर्मों में रोजगार मिल सकता है, क्योंकि यहां बड़ी संख्या में रोजगार नहीं है। विगत दो दशकों में भारत में महिलाओं की शिक्षा की स्थिति बेहतर हुई है। प्रजनन दर में गिरावट आई है। विश्व भर में इन कारणों से पारिश्रमिक युक्त कार्यों में महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि होना देखा गया है, पर भारत में ऐसा नहीं हो रहा। कार्यबल में जितनी महिलाएं जुड़ रही हैं, उससे कहीं अधिक कार्यबल से बाहर आ रही हैं। वैसे देखा जाए तो बैंकों में ठीक-ठाक संख्या में महिलाएं कार्य करती दिख जाएंगीं, महानगरों तथा बड़े शहरों के रेलवे काउंटरों पर भी उनकी थोड़ी बहुत मौजूदगी है, कुछ हवाई जहाज भी उड़ा रही हैं, पर महिलाएं बस कंडक्टर, टैक्सी और आटो रिक्शा चालक जैसी भूमिकाओं में शायद ही दिखती हैं। बीते समय में भारत में ई-कारोबार का काफी विस्तार हुआ है। घर बैठे सामान, जिसमें तैयार खाना भी शामिल है, मंगाने वालों में पुरुष भी हैं और महिलाएं भी। लेकिन ऐसा कभी नहीं देखने को मिलता कि सामान घर पर पहुंचाने वाली एक महिला हो। कारखानों में भी चाहे वहां गाड़ियां बनती हों अथवा उर्वरक जैसी कोई अन्य सामग्री, महिलाओं की संख्या नगण्य ही है। हां, ऐसी तस्वीरें जरूर दिख जाती हैं जिनमें महिलाएं घड़ी या मोबाइल फोन फैक्टरी में काम कर रही होती हैं। पर कुल मिला कर विनिर्माण क्षेत्र में नियोजित महिलाओं की संख्या काफी कम है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने कुछ वर्ष पहले एक महत्त्वपूर्ण आदेश जारी कर तीन सौ करोड़ रुपए सालाना बिक्री वाली सूचीबद्ध कंपनियों के निदेशक मंडल में एक स्वतंत्र महिला निदेशक का होना अनिवार्य कर दिया था। इसके अलावा बाजार पूंजीकरण के हिसाब से देश की शीर्ष एक हजार सूचीबद्ध कंपनियों के निदेशक मंडल में एक महिला सदस्य को नियुक्त करने की अनिवार्यता भी की गई थी, जो स्वतंत्र निदेशक भी हो। लेकिन इन अपेक्षाओं को पूरा करने कंपनियों को काफी मुश्किलें आर्इं। कई कंपनियां तो इसके लिए मन से तैयार नहीं थीं और उन्होंने खानापूरी करने के लिए इस आदेश का पालन किया तो कुछ कंपनियों के प्रवर्तकों ने अपने सगे संबंधियों में से किसी महिला को निदेशक बना कर छुट्टी पा ली। सेबी का यह आदेश कंपनियों के प्रबंधन वर्ग में लैंगिक विविधता लाने के लिए था, पर आदेश के कार्यान्वयन की प्रक्रिया में कई स्तरों पर साबित हो गया कि कई कंपनियां नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी के प्रति कितनी उदासीन हैं और साथ ही यह भी कि इतनी विशाल आबादी वाले देश में आसानी से इतनी महिलाएं नहीं मिल सकीं जिन्हें निदेशक नियुक्त किया जा सके। व्यक्ति हो या देश, उसकी सफलता इसमें मानी जाती है कि उसमें निहित संभावनाएं उभर कर आएं और इन संभावनाओं का भरपूर उपयोग हो। यदि कार्यबल में महिलाओं के लिए नए द्वार खुलते हैं तो इससे तमाम महिलाओं में निहित संभावनाओं को फलीभूत करने का मार्ग प्रशस्त होगा और हम अपने राष्ट्र की आबादी में मौजूद संभावनाओं का लाभ उठा सकेंगे। इसके लिए सरकार और निजी क्षेत्र दोनों को नए सिरे से आगे आना होगा।

Published / 2022-02-04 14:17:50
अलग झारखंड राज्य के अटल आंदोलनकारी थे लाल रणविजय नाथ शाहदेव

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ कोरनेलियुस मिंज)। स्वतंत्रता तेहें चाही लाल लहूक धार जैसी देश-भक्ति से ओत-प्रोत कविता रचने वाले नागपुरी कवि, गीतकार और आंदोलनकारी लालरण विजयनाथ शाहदेव ने झारखंड राज्य के पुनर्गठन में सक्रिय भूमिका निभायी थी। उनके मन में अलग राज्य के लिए आंदोलन करने की प्रबल इच्छा खरसावां की शहादत भूमि से जागृत हुई थी। जब वे अपने पिताजी पालकोट गढ़ के राजा छोटेलाल लक्ष्मीनाथ शाहदेव के साथ 1952 ई. में सरायकेला खरसावां शहीद स्थल देखने गये थे। वहीं पर शहीद स्थल की पावन माटी को मुट्ठी में लेकर कसम खायी कि झारखंडियों के लिए अलग राज्य की लड़ाई लडेंगे। इस बीच मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा छोटेलाल लक्ष्मीनाथ शाहदेव के घर अक्सर राजाडेरा करमटोली आया करते थे। अंतत: उनसे प्रभावित होकर औपचारिक रूप से झारखंड पार्टी में 1957 ई. में शामिल हुए और झारखंड आंदोलन में कूद पड़े। वे इसके लिए वीर रस के नागपुरी गीतों और कविताओं की रचनाएं करने लगे। उनकी रचनाएं लोगों के रोंगटे खड़े कर देने वाली होती थीं। हास्य कविता और व्यंग्य कविता लेखन में पकड़ अच्छी थी। एक बार रांची के टैगोर हिल में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने व्यंग्य हास्य कविता गांधीक नाम बेइच के आपन पेट भरू प्रस्तुत किया था, जिसे लोगों ने खूब पसंद किया। उनकी जागरण कविता - नरसिंघा बाजी आब फिर नागपुर देस में आमजनों के बीच खूब लोकप्रिय हुआ। उन्होंने 500 से अधिक गीत और कविताओं की रचना की हैं, जिनमें 250 से अधिक आकाशवाणी रांची से प्रसारित हुई हैं। लाल रणविजय नाथ शाहदेव हिंदी फिल्मी गाना भी गाते थे। उनकी पत्नी श्यामा देवी को नागपुरी गीत उतने पसंद नहीं थे। इसलिए प्रारंभ में वे अपनी धर्म पत्नी को हिंदी फिल्मी गाना गाकर सुनाते थे। उन्होंने बकायदा शास्त्रीय संगीत की शिक्षा भी प्राप्त की थी। आरंभ में वे नागपुरी में नहीं अपितु हिंदी में गायन करके अपने दोस्तों का मनोरंजन करते थे। गजल में उनकी पकड़ थी। पुराने हिंदी फिल्मी गीतों के भी शौकीन थे। गीत-गोविंद के साथ-साथ उनका मन अलग राज्य के लिए रमा हुआ था। सो इसे में रत रहते थे। 1963 ई. में जब झारखंड पार्टी का कांग्रेस में विलय हुआ, तब लाल रणविजय नाथ शाहदेव दिल्ली में पंडित जवाहर लाल नेहरू के समक्ष विरोध किया था। उनके नेतृत्व में 21 जलाई 1963 ई. में बहुबाजार में विशाल सभा आयोजित की गयी। इस सभा में झारखंड पार्टी को बनाये रखने का निर्णय लिया गया। लाल रणविजय नाथ शाहदेव के नेतृत्व में ही 27, 28 एवं 29 सितंबर को वीरमित्रापुर में विशाल जुलूस निकाला गया। अलग राज्य के लिए आंदोलन करने के कारण उन्हें 3 जून 1968 ई. में जेल भी जाना पड़ा। झारखंड पार्टी को कांग्रेस में विलय करने के बाद जब जयपाल सिंह मुंडा पुन: झारखंड पार्टी में आना चाहते थे, तब लाल रणविजय नाथ शाहदेव उनसे कहा था - आगे गुरू रहंय, आब गरू बटे गेलंय। इसे सुनकर मरांग गोमके भी ठहाका लगाकर हंस पड़े थे और लाल रणविजय नाथ से वादा किया था - मोंय घुरत हों, मोंय आवत हों। आब दोहरायके आंदोलन खड़ा करब। हालांकि इस वचन को देने के बाद जयपाल सिंह मुंडा की अचानक मृत्यु हो गयी। लाल रण विजय नाथ शाहदेव अलग राज्य के लिए 1977 ई. में तात्कालीन गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह से अलग राज्य पर हुई वार्ता में शामिल हुए। उसके बाद 1999 ई. में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के साथ हुई अलग राज्य वार्ता में भी शरीक थे। लाल रणविजय नाथ शाहदेव के अलग राज्य झारखंड नाम के लिए उनके समक्ष मजबूती से तर्कपूर्ण विचार रखा और इसी नाम अलग राज्य का गठन भी हुआ। लाल रणविजय नाथ शाहदेव नागपुरी कला संगम के निदेशक और नागपुरी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने पझरा और नागपुरी पत्रिका का संपादन किया। उनकी कुछ प्रकाशित पुस्तकें और पत्रिकाएं हैं जिनमें पूजा कर फूल 1984, खोता नागपुरी काव्य 1985, खुखड़ी रूगड़ा संपादन 1985, पझरा पत्रिका 1985, जागी जवानी चमकी बिजुरी 1986 शामिल हैं। लाल रणविजय नाथ शाहदेव को कई सम्मान भी मिले। झारखंड विधान सभा स्थापना के अवसर पर 22 नवंबर 2017 को प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया। दूरदर्शन सम्मान 2011, नागपुरी संस्थान पिठोरिया से 2014 में स्वर्ण सम्मान, 2014 में प्रफुल्ल सम्मान, 2015 में लोक सेवा समिति से झारखंड रत्न सम्मान मुख्य रूप से शामिल है। ऐसे अलग राज्य के आंदोलन में अटल रहने वाले वीर माटी पुत्र लाल रणविजय नाथ शाहदेव का जन्म पांच फरवरी 1940 ई. में हुआ। उनके पिता का नाम छोटेलाल लक्ष्मीनाथ शाहदेव और माता का नाम सीता देवी था। उनका विवाह श्यामा देवी से 1959 ई. में हुआ। उनके तीन बच्चे हैं निर्मला देवी, अजय नाथ शाहदेव और राजश्री सिंहदेव। भले ही लाल रणविजय नाथ शाहदेव अलग राज्य का सपना साकार कर इस धराधाम से 18 मार्च 2019 में विदा हो गये, किंतु हमारे लिए प्रेरणास्रोत बने रहेंगे। (लेखक गोस्सनर कॉलेज, रांची के सहायक प्राध्यापक हैं)।

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