विचार

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Published / 2026-04-28 23:11:38
आत्मा की अभिव्यक्ति और संस्कृति की शाश्वत धारा नृत्य

  • आत्मा की अभिव्यक्ति और संस्कृति की शाश्वत धारा नृत्य
  • विश्व नृत्य दिवस 29 अप्रैल विशेष 

डॉ. दीपक प्रसाद

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस हर वर्ष 29 अप्रैल को मनाया जाने वाला केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की उस जीवंत परंपरा का स्मरण है, जिसमें देह, मन और आत्मा एकाकार होकर सृजन की पराकाष्ठा को स्पर्श करते हैं। नृत्य मानव की सबसे प्राचीन अभिव्यक्तियों में से एक है। एक ऐसी भाषा, जिसे शब्दों की आवश्यकता नहीं होती, परंतु जो भावों की सम्पूर्णता को संप्रेषित कर देती है। 

नृत्य की उत्पत्ति उतनी ही प्राचीन है जितनी स्वयं मानव सभ्यता। आदिमानव ने जब पहली बार प्रकृति के साथ संवाद स्थापित किया, तब उसके आनंद, भय, विजय और उत्सव के भाव देह की गतियों में प्रकट हुए। गुफा चित्रों, सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तियों विशेषकर नर्तकी की कांस्य प्रतिमा से यह स्पष्ट होता है कि नृत्य का अस्तित्व हजारों वर्ष पूर्व भी था। भारतीय परंपरा में नृत्य को दिव्यता से जोड़ा गया है। 

भगवान शिव का नटराज रूप सृष्टि, स्थिति और संहार के चक्र को नृत्य के माध्यम से ही अभिव्यक्त करता है। यही नहीं, वैदिक युग में भी नृत्य यज्ञों और अनुष्ठानों का अभिन्न अंग था। भारतीय शास्त्रीय परंपरा में नृत्य और नृत के बीच सूक्ष्म किंतु महत्वपूर्ण अंतर है नृत शुद्ध शारीरिक गतियों का प्रदर्शन, जिसमें भाव या कथा का अभाव होता है। यह तकनीकी दक्षता और ताल-लय की सटीकता पर आधारित होता है। वहीं नृत्य इसमें भाव, रस और अभिव्यक्ति का समावेश होता है। यह दर्शकों के साथ संवाद स्थापित करता है।

इसके अतिरिक्त नाट्य में कथा, अभिनय और संवाद का समावेश होता है। यह त्रिविध विभाजन भारतीय नृत्य की वैज्ञानिकता और गहनता को दर्शाता है। भारतीय नृत्य की आधारशिला नाट्यशास्त्र में निहित है, जिसे भरतमुनि ने रचा। इसमें नृत्य के अंग, उपांग, मुद्राएं, रस, भाव और अभिनय के नियमों का विस्तृत वर्णन है। रस सिद्धांत के अनुसार नृत्य का उद्देश्य दर्शकों में भावों का संचार करना है। श्रृंगार, वीर, करुण, रौद्र, हास्य, भयानक, बीभत्स और अद्भुत। 

नर्तक की देह, नेत्र, मुखमुद्राएं और हस्तमुद्राएं मिलकर इन भावों को सजीव करती हैं। नृत्य का आध्यात्मिक आयाम भारतीय दृष्टि में नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि साधना है। यह योग की तरह आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का माध्यम है। भक्ति आंदोलन में मीराबाई, चैतन्य महाप्रभु जैसे संतों ने नृत्य को ईश्वर भक्ति का साधन बनाया। नृत्य में लय और ताल का समन्वय ब्रह्मांड की गति का प्रतीक है। भारत में शास्त्रीय नृत्य की परंपरा हजारों वर्ष पुराना है।

भारत विविधताओं का देश है, और यहां नृत्य की परंपरा अत्यंत समृद्ध है। यहां की प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैलियां हैं तमिलनाडु भरतनाट्यम, केरल कथकली, मोहिनीअट्टम, उत्तर प्रदेश कथक, ओडिशा ओडिसी, आंध्र प्रदेश कुचिपुड़ी, मणिपुर मणिपुरी, असम सत्रिया इन सभी नृत्य शैलियों की अपनी विशिष्ट शैली, वेशभूषा, संगीत और कथा परंपरा है, किंतु इनका मूल आधार नाट्यशास्त्र ही है। जनजीवन की धड़कन कहीं जाने वाली जो नृत्य है वह है लोक नृत्य।

यदि शास्त्रीय नृत्य आत्मा की साधना है, तो लोक नृत्य जनजीवन की धड़कन है। भारत के प्रत्येक राज्य में लोक नृत्य की अपनी अलग पहचान है जैसे पंजाब भांगड़ा, गिद्धा, गुजरात गरबा, डांडिया, राजस्थान घूमर, बिहार झूमर, जट-जटिन, झारखंड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल छऊ, लोक नृत्य समाज के उत्सव, कृषि, विवाह और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़े होते हैं। इनमें सहजता, सामूहिकता और आनंद की प्रधानता होती है। झारखंड की धरती नृत्य और संगीत की जीवंत प्रयोगशाला है। यहां के जनजातीय समुदायों के जीवन में नृत्य केवल कला नहीं, बल्कि जीवन पद्धति है। 

झारखण्ड के प्रमुख लोक नृत्य है छऊ नृत्य (सरायकेला) झ्र मुखौटा नृत्य, जिसमें वीरता और पौराणिक कथाओं का प्रदर्शन होता है। जोहड़ा (झूमर) महिलाओं द्वारा किया जाने वाला सौंदर्यपूर्ण नृत्य। डोमकच विवाह अवसर का उल्लासपूर्ण नृत्य। करमा नृत्य प्रकृति और वृक्ष पूजा से जुड़ा हुआ। पाइका नृत्य युद्ध कौशल का प्रतीक माना जाता है। इन नृत्यों में प्रकृति के साथ गहरा संबंध दिखाई देता है। जंगल, पहाड़, नदियां और ऋतु परिवर्तन सभी नृत्य के भावों में समाहित हैं। 

नृत्य न केवल मनोरंजन का माध्यम है, बल्कि यह व्यक्तित्व विकास, शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन का भी सशक्त साधन है। शिक्षा के क्षेत्र में नृत्य आत्मविश्वास बढ़ाता है, अनुशासन सिखाता है, सांस्कृतिक चेतना विकसित करता है, सृजनात्मकता को प्रोत्साहित करता है। आज के डिजिटल युग में जहां मानवीय संवेदनाएं क्षीण होती जा रही हैं, वहां नृत्य हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है।

वैश्वीकरण और पाश्चात्य प्रभाव के कारण पारंपरिक नृत्य शैलियां संकट का सामना कर रही हैं। युवा पीढ़ी का झुकाव आधुनिक और फ्यूजन नृत्य की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में आवश्यक है कि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में नृत्य शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए, लोक कलाकारों को मंच और सम्मान मिले, डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग कर परंपराओं को संरक्षित किया जाए।

अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस हमें यह याद दिलाता है कि नृत्य केवल कला नहीं, बल्कि जीवन की लय है। यह शरीर की गति में आत्मा की अभिव्यक्ति है। झारखंड जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध प्रदेश में नृत्य की परंपरा न केवल अतीत की धरोहर है, बल्कि भविष्य की दिशा भी है। आज आवश्यकता है कि हम नृत्य को केवल मंच तक सीमित न रखें, बल्कि इसे अपने जीवन का हिस्सा बनाएं—ताकि हमारी संस्कृति, हमारी पहचान और हमारी आत्मा सदैव गतिमान बनी रहे। (लेखक असिस्टेंट प्रोफेसर, सांस्कृतिक शोधकर्ता और रंगनिर्देशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2026-04-24 21:52:03
जानलेवा हो सकती है मलेरिया के इलाज में लापरवाही

  • जानलेवा हो सकती है मलेरिया के इलाज में लापरवाही
  • विश्व मलेरिया दिवस (25 अप्रैल) पर विशेष

योगेश कुमार गोयल

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मलेरिया एक गंभीर और कभी-कभी प्राणघातक हो जाने वाली बीमारी है, जो आमतौर पर एक निश्चित प्रकार के मच्छर को संक्रमित करने वाले परजीवी के कारण होती है और इन संक्रमित मच्छरों के काटने से मलेरिया होता है। अमेरिका से करीब 70 साल पहले ही मलेरिया को पूरी तरह खत्म घोषित कर दिया गया था लेकिन अभी भी प्रतिवर्ष दो हजार अमेरिकी इससे संक्रमित होते हैं। भारत में तो हर साल लाखों लोग मलेरिया से संक्रमित होते हैं।

चिंता की स्थिति यह है कि दुनियाभर में मलेरिया से हर साल लाखों लोग मौत के मुंह में समा रहे हैं, जिनमें ज्यादातर छोटे बच्चे हैं। पांच साल से कम उम्र के बच्चे मलेरिया से असमान रूप से प्रभावित होते हैं, जो मलेरिया से होने वाली कुल मौतों का करीब 82 प्रतिशत है। 2021 में मलेरिया से दुनियाभर में 6.19 लाख लोगों की मौत हुई थी जबकि 2022 में 6.08 लाख लोग मलेरिया के कारण मारे गये और 2024 में मलेरिया से 6.1 लाख मौतें दर्ज की गयी।

हालांकि मलेरिया ऐसी बीमारी है, जिसकी रोकथाम करके बड़ी संख्या में होने वाली इन मौतों को रोका जा सकता है लेकिन यह दुनियाभर में रोकी जा सकने वाली बीमारी और मृत्यु का एक प्रमुख कारण बना हुआ है। इसीलिए मलेरिया को लेकर लोगों में जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से 2008 से ही 25 अप्रैल को एक खास विषय के साथ विश्व मलेरिया दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष मलेरिया दिवस की थीम है- मलेरिया को समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध अब हम कर सकते हैं। अब हमें करना ही होगा। इसका प्रमुख संदेश यही है कि मलेरिया मुक्त विश्व के लक्ष्य को प्राप्त करना है। 

भेदभाव और कलंक को खत्म करना, स्वास्थ्य संबंधी निर्णय लेने में समुदायों को शामिल करना, प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के माध्यम से स्वास्थ्य देखभाल को उस स्थान के करीब लाना, जहां लोग रहते हैं और काम करते हैं, मलेरिया के खतरे को बढ़ाने वाले कारकों को संबोधित करना, सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज में मलेरिया नियंत्रण हस्तक्षेप इत्यादि मलेरिया दिवस मनाने के प्रमुख उद्देश्य हैं। दरअसल, विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि हर किसी को मलेरिया की रोकथाम, पता लगाने और इलाज के लिए गुणवत्तापूर्ण, समय पर और सस्ती सेवाओं का अधिकार तो है लेकिन यह सभी के लिए वास्तविकता नहीं है। 

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनियाभर में मलेरिया के बीस करोड़ से भी ज्यादा नए मामले दर्ज किये जाते हैं, जिनमें से कई लाख लोगों की हर साल मौत हो जाती है। हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि मलेरिया की रोकथाम के मामले में बीते कुछ वर्षों में महत्वपूर्ण प्रगति तो हुई है लेकिन मलेरिया के खिलाफ लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है और मलेरिया मुक्त विश्व के लक्ष्य को प्राप्त करना अभी भी गंभीर चुनौती है। चिंता का विषय यह भी है कि प्रभावित क्षेत्रों में यह बीमारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों और अर्थव्यवस्थाओं पर बड़ा बोझ भी डालती है।

मलेरिया एनोफेलीज मादा मच्छर के काटने से होता है, जो प्लाज्मोडियम परजीवी से संक्रमित होता है और जब यह मच्छर किसी को काटता है तो ये परजीवी मानव रक्त में प्रवेश करके लिवर तथा लाल रक्त कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने लगते हैं और व्यक्ति को बीमार बना देते हैं। इस रोग की गंभीरता परजीवी पर ही निर्भर करती है। मनुष्यों में सबसे आम मलेरिया परजीवी प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम है, जो बीमारी के सबसे घातक रूप के लिए जिम्मेदार है। एनोफेलीज मच्छर वाहक के रूप में कार्य करते हैं, जब वे एक संक्रमित व्यक्ति को काटते हैं और फिर दूसरे व्यक्ति को काटते हैं तो परजीवियों को प्रसारित करते हैं। 

जब परजीवी एक बार मानव शरीर के अंदर यकृत में चले जाते हैं तो ये लाल रक्त कोशिकाओं के अंदर गुणन करते हैं, जिससे कई प्रकार के लक्षण पैदा होते हैं। मनुष्यों को मलेरिया के चार मुख्य प्रकार (प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम, प्लाज्मोडियम विवैक्स, प्लाज्मोडियम ओवले और प्लाज्मोडियम मलेरिया) संक्रमित करते हैं। प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम सबसे खतरनाक प्रकार है जबकि मलेरिया के अन्य प्रकार आमतौर पर हल्की बीमारी का कारण बनते हैं।

गंभीर मलेरिया गंभीर एनीमिया, गुर्दे की विफलता, दौरे, कोमा और यहां तक कि मृत्यु जैसी जटिलताओं का कारण भी बन सकता है, खासकर यदि तुरंत निदान और इलाज नहीं किया जाये। हालांकि दुनियाभर में शोधकर्ता मलेरिया को नियंत्रित करने और अंतत: खत्म करने के लिए टीकों और अन्य नवीन समाधानों पर काम कर रहे हैं लेकिन इसकी रोकथाम के मुख्य उपायों में उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में मच्छरदानी, कीट विकर्षक और मलेरिया-रोधी दवाओं का उपयोग करना शामिल है। 

जटिलताओं और मृत्यु को रोकने के लिए प्रभावी मलेरिया-रोधी दवाओं के साथ शीघ्र निदान और उपचार महत्वपूर्ण है। मलेरिया होने पर आमतौर पर तेज बुखार होता है, जो 103 से 105 डिग्री तक हो सकता है। सिरदर्द, बदन दर्द, घबराहट, अत्यधिक पसीना आना, जी मिचलाना, उल्टी होना, अत्यधिक ठंड लगना, कमजोरी इत्यादि मलेरिया के अन्य प्रमुख लक्षण हैं। इन लक्षणों को लंबे समय तक नजरअंदाज करना भी खतरनाक हो सकता है। 

वैसे तो मलेरिया के लक्षण प्राय: 24 से 48 घंटे में ही नजर आ सकते हैं लेकिन कई बार लक्षण सामने आने में ज्यादा समय भी लग सकता है। मलेरिया की जांच से ही पता चल पाता है कि मरीज किस तरह के मलेरिया से ग्रसित है और उसी के आधार पर विभिन्न दवाओं से उसका इलाज शुरू किया जाता है। साधारण मलेरिया होने पर सही इलाज से मरीज 3-5 दिनों में ठीक हो सकता है लेकिन यदि सीवियर फाल्सीपेरम मलेरिया हुआ तो समय पर और सही इलाज नहीं कराने पर मरीज की मौत भी हो सकती है।

इसलिए बेहद जरूरी है कि मलेरिया की जांच और इलाज में कोताही न बरतें। गर्मी और मानूसन के दौरान मच्छरों की संख्या बहुत बढ़ जाती है, इसलिए आमतौर पर मलेरिया इन्हीं मौसम में सबसे ज्यादा होता है। वैसे मलेरिया के मच्छर अधिकांशत: उन्हीं जगहों पर पनपते हैं, जहां गंदगी होती है या गंदा पानी जमा होता है। इसलिए मलेरिया की रोकथाम के लिए सबसे जरूरी है कि अपने घरों में तथा आसपास गंदगी और गंदा पानी एकत्र न होने दें। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2026-04-24 18:02:38
शिक्षा और स्थानीय ज्ञान से ही संभव है मलेरिया उन्मूलन

  • शिक्षा और स्थानीय ज्ञान से ही संभव है मलेरिया उन्मूलन
  • विश्व मलेरिया दिवस (25 अप्रैल) विशेष 

डॉ. दीपक प्रसाद

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हर वर्ष 25 अप्रैल को पूरी दुनिया विश्व मलेरिया दिवस के रूप में मनाती है। यह दिन केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि मानव सभ्यता को सदियों से चुनौती देती आ रही एक घातक बीमारी मलेरिया के विरुद्ध वैश्विक संकल्प का प्रतीक है। 

वर्ष 2007 में वर्ल्ड हेल्थ आॅगेर्नाइजेशन द्वारा इसकी शुरुआत की गयी थी, ताकि दुनिया भर में इस बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ायी जा सके और इसके उन्मूलन की दिशा में ठोस प्रयास किये जा सकें। मलेरिया, प्लाज्मोडियम नामक परजीवी से फैलने वाली बीमारी है, जो मादा एनोफिलीज मच्छर के काटने से मनुष्य के शरीर में प्रवेश करती है। आज भी यह बीमारी दुनिया के कई विकासशील देशों के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई है। 

ताजा वैश्विक आंकड़ों के अनुसार हर वर्ष लगभग 20-25 करोड़ लोग मलेरिया से संक्रमित होते हैं, करीब 6 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हो जाती है। इनमें अधिकतर अफ्रीका और दक्षिण एशिया के गरीब और ग्रामीण क्षेत्र प्रभावित होते हैं। भारत की स्थिति पर नजर डालें तो पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। भारत ने मलेरिया के मामलों में बड़ी गिरावट दर्ज की है, लेकिन अभी भी देश पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।

भारत ने राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम  के माध्यम से मलेरिया नियंत्रण में महत्वपूर्ण प्रगति की है। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक मलेरिया उन्मूलन का है। फिर भी चुनौतियां बनी हुई हैं, दूर-दराज ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्र। स्वच्छ जल और स्वच्छता की कमी, स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुंच, जागरूकता का अभाव। बात अगर हम झारखंड की करें तो झारखंड जैसे राज्य में मलेरिया एक गंभीर जनस्वास्थ्य समस्या के रूप में उपस्थित है। 

इसके पीछे कई कारण हैं, घने जंगल और आर्द्र जलवायु, आदिवासी बहुल क्षेत्र, जहां स्वास्थ्य सेवाएं सीमित हैं। जलभराव और साफ-सफाई की कमी। राज्य के कई जिले जैसे सिमडेगा, गुमला, गोड्डा, लातेहार और पश्चिमी सिंहभूम मलेरिया के हॉटस्पॉट माने जाते रहे हैं। हालांकि, राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग द्वारा किये गये प्रयासों से स्थिति में सुधार आया है जैसे मच्छरदानी का वितरण, आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से घर-घर जांच। 

इसके बावजूद भी अगर नियमित फॉगिंग और दवा छिड़काव चाहे गांव हो या शहर होता रहे तो इस ओर बहुत सुधार हो सकेगा। फिर भी, हर वर्ष झारखंड में सैकड़ों लोगों की जान इस बीमारी के कारण चली जाती है जो इस बात का संकेत है कि अभी और सतत प्रयास आवश्यक हैं फाइलों में नहीं धरातल पर। मलेरिया कोई नई बीमारी नहीं है। इसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है आयुर्वेद में इसे विषम ज्वर कहा गया है। 

चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में इसके लक्षण और उपचार का वर्णन मिलता है। झारखंड की आदिवासी संस्कृति में भी प्राकृतिक उपायों का उल्लेख मिलता है। नीम, तुलसी, गिलोय जैसी औषधियों का प्रयोग घरों के आसपास धुआं करके मच्छरों को भगाना, जल स्रोतों को साफ रखना ये पारंपरिक उपाय आज भी प्रासंगिक हैं, लेकिन आधुनिक चिकित्सा के साथ इनका समन्वय आवश्यक है। 

बचाव ही सबसे बड़ा उपचार है। मलेरिया का सबसे प्रभावी इलाज उसका बचाव है, व्यक्तिगत स्तर पर मच्छरदानी का नियमित उपयोग, पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनना, घर के आसपास पानी जमा न होने देना, समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराना, सामुदायिक स्तर पर स्वच्छता अभियान चलाना। जल निकासी की उचित व्यवस्था करना। 

नियमित सरकार द्वारा गली, मोहल्लों, गांवों, शहरों में फॉगिंग होना अति आवश्यक है। यदि मलेरिया को जड़ से समाप्त करना है, तो शिक्षा को केंद्र में रखना होगा। स्कूल और कॉलेज एवं किसी भी प्रकार की शिक्षण संस्थाओं की भूमिका तय करनी होगी। पाठ्यक्रम में स्वास्थ्य शिक्षा को शामिल करना, मलेरिया जागरूकता सप्ताह का आयोजन करना। नाटक, पोस्टर, रैली और नुक्कड़ नाटक के माध्यम से रोकथाम के लिए प्रचार प्रसार करना। 

मलेरिया से लड़ाई केवल सरकार की नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग की जिम्मेदारी है। विविध प्रकार से जागरूकता फैलाने के उपाय ढूंढ़ा जा सकता है जैसे पंचायत स्तर पर बैठकें हो, सोशल मीडिया और रेडियो का उपयोग करके, स्थानीय भाषा और लोक कला के माध्यम से संदेश फैलाकर। मलेरिया केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि यह हमारे सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक ढांचे की परीक्षा है। 

यदि हम इसे हराना चाहते हैं, तो हमें सरकार, समाज, शिक्षा और संस्कृति सभी को एक साथ जोड़ना होगा। विश्व मलेरिया दिवस हमें यह याद दिलाता है कि स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी है। झारखंड जैसे राज्यों में यदि हम स्थानीय परंपराओं, आधुनिक चिकित्सा और शिक्षा को एक सूत्र में पिरो दें, तो वह दिन दूर नहीं जब मलेरिया केवल इतिहास का एक अध्याय बनकर रह जायेगा। (लेखक असिस्टेंट प्रोफेसर, सांस्कृतिक शोधकर्ता और रंगनिर्देशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2026-04-21 12:40:00
युद्ध नहीं, धरती के संरक्षण का संकल्प

विश्व पृथ्वी दिवस के उपलक्ष में

युद्ध नहीं, धरती के संरक्षण का संकल्प

डॉ. दीपक प्रसाद

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हर वर्ष 22 अप्रैल को मनाया जाने वाला विश्व पृथ्वी दिवस केवल एक औपचारिक अवसर नहीं है, बल्कि यह हमारी चेतना को जगाने का दिन है, यह याद दिलाने का दिन है कि यह पृथ्वी ही हमारा एकमात्र घर है। आज जब पूरी दुनिया तकनीकी प्रगति और विकास की दौड़ में आगे बढ़ रही है, उसी समय युद्ध, संघर्ष और पर्यावरणीय विनाश की भयावह छाया भी इस धरती को लगातार कमजोर कर रही है।

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में युद्धों की विभीषिका केवल मानव जीवन को ही नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को गहरी चोट पहुँचा रही है। बमों की गूंज, रासायनिक हथियारों का उपयोग, जंगलों का विनाश, जल स्रोतों का प्रदूषण ये सब मिलकर पृथ्वी को एक असंतुलित और असुरक्षित स्थिति में धकेल रहे हैं। युद्ध का प्रभाव केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर हवा, पानी, मिट्टी, पशु-पक्षियों और आने वाली पीढ़ियों तक फैलता है।

भारतीय संस्कृति में पृथ्वी को माता का दर्जा दिया गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने सदैव प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने की प्रेरणा दी। पेड़-पौधों, नदियों, पर्वतों और जीव-जंतुओं को पूजनीय माना गया। लेकिन आधुनिकता के अंधाधुंध विस्तार और उपभोगवादी मानसिकता ने इस संतुलन को तोड़ दिया है। आज मनुष्य विकास के नाम पर जंगल काट रहा है, नदियों को प्रदूषित कर रहा है और जीव-जंतुओं के अस्तित्व को खतरे में डाल रहा है। युद्ध इस विनाश को और तेज कर देता है।

युद्ध केवल राजनीतिक या सामरिक मुद्दा नहीं है, यह पर्यावरणीय संकट का भी सबसे बड़ा कारण है। युद्ध के दौरान भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है, जिससे जलवायु परिवर्तन तेज होता है। रासायनिक और परमाणु हथियारों से मिट्टी और जल स्रोत लंबे समय तक प्रदूषित रहते हैं। लाखों पशु-पक्षी और वन्यजीव अपने आवास खो देते हैं। खेत-खलिहान बंजर हो जाते हैं, जिससे खाद्य संकट उत्पन्न होता है। इस प्रकार युद्ध, मानव और प्रकृति दोनों के लिए विनाशकारी है। 

पृथ्वी केवल मनुष्यों की नहीं है। यह पक्षियों की उड़ान, पशुओं के जीवन, कीट-पतंगों की गतिविधियों और जलचर जीवों का भी घर है। जब जंगल कटते हैं, तो पक्षियों का बसेरा खत्म होता है। जब नदियाँ प्रदूषित होती हैं, तो मछलियाँ मरती हैं। जब हवा जहरीली होती है, तो हर जीव प्रभावित होता है। आज जरूरत है कि हम इस समग्र दृष्टिकोण को समझें पृथ्वी का संरक्षण तभी संभव है जब हम सभी जीवों के अधिकारों को स्वीकार करें। पर समाधान क्या किया जाए? 

  1. युद्ध नहीं, शांति का मार्ग : सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम है विश्व में शांति की स्थापना। राष्ट्रों को यह समझना होगा कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि नई समस्याओं की शुरुआत है। संवाद, कूटनीति और सहयोग ही स्थायी समाधान हैं। 
  2. पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी : वृक्षारोपण को जीवन का हिस्सा बनाना होगा। जल संरक्षण के लिए वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना होगा। प्लास्टिक के उपयोग को कम करना होगा। स्वच्छ ऊर्जा (सौर, पवन) को अपनाना होगा। 
  3. पारंपरिक ज्ञान का पुनर्जीवन : हमारे पूर्वजों ने प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने की कला सिखाई थी। जल स्रोतों का संरक्षण, सामूहिक खेती, प्राकृतिक संसाधनों का सीमित उपयोग इन परंपराओं को फिर से अपनाना होगा।
  4. जन-जागरूकता और शिक्षा : स्कूलों, कॉलेजों और समाज में पर्यावरण शिक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। लोगों को यह समझाना होगा कि छोटी-छोटी आदतें जैसे पानी बचाना, पेड़ लगाना बड़े बदलाव ला सकती हैं। 

जीव-जंतुओं का संरक्षण। वन्यजीवों के लिए सुरक्षित क्षेत्र बनाए जाएं। शिकार और अवैध व्यापार पर कड़ी रोक लगे। पक्षियों के लिए जल और भोजन की समुचित व्यवस्था की जाए। विश्व पृथ्वी दिवस केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि एक सतत जिम्मेदारी का प्रतीक है। यदि हम आज भी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियों को एक बंजर, प्रदूषित और असुरक्षित पृथ्वी विरासत में मिलेगी। 

अब समय है कि हम युद्ध की राह छोड़कर शांति और संरक्षण का मार्ग अपनाएं। पृथ्वी हमारी माता है और एक संतान के रूप में हमारा कर्तव्य है कि हम उसकी रक्षा करें। आइए, इस पृथ्वी दिवस पर हम संकल्प लें कि न युद्ध करेंगे, न प्रकृति का शोषण करेंगे, बल्कि मिलकर इस धरती को सुरक्षित और समृद्ध बनाएंगे। (लेखक सांस्कृतिक शोधकर्ता, रंगनिर्देशक, और असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।) 

Published / 2026-04-21 12:32:11
जनजातीय दर्शन में छुपा है प्रकृति संरक्षण

  • जनजातीय दर्शन में छुपा है प्रकृति संरक्षण

डॉ मंजूषा पूर्ति 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज जब विश्व पर्यावरणीय संकट के गंभीर दौर से गुजर रहा है तब जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का ह्रास, जल संकट और प्रदूषण जैसी समस्याएँ पृथ्वी के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न खड़े कर रही हैं, तब समाधान के लिए हमें आधुनिक तकनीकों के साथ-साथ अपनी जड़ों की ओर लौटने की आवश्यकता है। यह जड़ें हमें जनजातीय (आदिवासी) दर्शन में मिलती हैं, जहाँ प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार, पूज्य तत्व और सह-अस्तित्व का साथी है।

जनजातीय दर्शन में प्रकृति संरक्षण केवल एक विचार नहीं, बल्कि जीवन जीने की शैली है। यह दर्शन हमें सिखाता है कि मनुष्य पृथ्वी का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक अंश है। यही विचार भारतीय ऋषि परंपरा और वैदिक संस्कृति में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। इस प्रकार, जनजातीय और वैदिक दर्शन दोनों ही एक ही मूल चेतना से प्रेरित हैं—प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व।जनजातीय समाज में प्रकृति को जीवंत माना जाता है। जंगल, पहाड़, नदियाँ, वृक्ष, पशु-पक्षी—सभी को आत्मा युक्त और सम्माननीय समझा जाता है।

जंगल उनके लिए केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि जीवनदाता है। नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि माँ के रूप में पूजनीय हैं। पशु-पक्षियों को परिवार का हिस्सा माना जाता है। यह दृष्टिकोण पारिस्थितिकी (Ecology) का सबसे व्यावहारिक रूप है, जिसमें मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहता है। जनजातीय समाज उतना ही लेता है जितनी उसे आवश्यकता होती है, जिससे संसाधनों का संरक्षण स्वतः सुनिश्चित होता है।

भारतीय वैदिक साहित्य में भी प्रकृति को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः यह मंत्र स्पष्ट करता है कि पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। ऋषियों ने पंचमहाभूत पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को जीवन का आधार माना। उन्होंने इन तत्वों के संरक्षण को धर्म का हिस्सा बनाया। यज्ञ के माध्यम से पर्यावरण शुद्धि का विचार किया। वृक्षों और नदियों की पूजा को जीवन का आधार बनाया। जीवों के प्रति करुणा और अहिंसा अपना कर उसे अपना परिवार बनाया। 

ये सभी सिद्धांत जनजातीय जीवन में भी सहज रूप से देखने को मिलते हैं। स्पष्ट है कि जनजातीय और वैदिक दर्शन में कोई विरोध नहीं, बल्कि गहरा सामंजस्य है। आदिवासी समाज का जीवन पूर्णतः प्रकृति पर आधारित है, और उनका हर कार्य पर्यावरण संतुलन को ध्यान में रखकर किया जाता है।

  1. सीमित उपभोग (Sustainable Use) आदिवासी समुदाय केवल उतना ही संसाधन उपयोग करते हैं, जितना आवश्यक होता है। अत्यधिक संग्रह या दोहन उनकी संस्कृति के विरुद्ध है। 
  2. सामूहिकता और साझेदारी के कारण वन, जल और भूमि को व्यक्तिगत संपत्ति नहीं, बल्कि सामूहिक धरोहर माना जाता है। इससे संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण और संरक्षण सुनिश्चित होता है। 
  3. पारंपरिक ज्ञान प्रणाली के कारण औषधीय पौधों का ज्ञान, मौसम की पहचान, खेती के पारंपरिक तरीके ये सभी पर्यावरण के अनुकूल होते हैं और जैव विविधता को बनाए रखते हैं। 
  4. उत्सव और अनुष्ठान में भी सरहुल, करमा जैसे त्योहार प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम हैं। इन अवसरों पर वृक्षों, जल स्रोतों और धरती की पूजा की जाती है। देवी-शक्ति और प्रकृति संरक्षण होने से भारतीय संस्कृति में देवी-शक्ति को प्रकृति का प्रतीक माना गया है दुर्गा, काली, सरस्वती, लक्ष्मी ये सभी शक्तियाँ प्रकृति के विभिन्न रूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

इसी प्रकार जनजातीय समाज में भी धरती माता, जाहेर आयो, वन देवी जैसे रूपों में प्रकृति की पूजा की जाती है। यह आस्था केवल धार्मिक नहीं, बल्कि संरक्षण का माध्यम है। जब हम किसी तत्व को देवी मानते हैं, तो उसके प्रति हमारा व्यवहार स्वतः संवेदनशील हो जाता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में संकट और चुनौतियाँ लगातार बढ़ती जा रही हैं आज आधुनिकता और विकास के नाम पर जो अंधाधुंध दोहन हो रहा है, उसने प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ दिया है। 

जंगलों की कटाई, जल स्रोतों का प्रदूषण, खनन और औद्योगीकरण, वन्यजीवों का विलुप्त होना इन सबका सबसे अधिक प्रभाव जनजातीय समाज पर पड़ रहा है, क्योंकि उनका जीवन प्रकृति से जुड़ा हुआ है। विडंबना यह है कि जो समाज प्रकृति का सबसे बड़ा रक्षक है, वही आज विस्थापन और उपेक्षा का शिकार है। जनजातीय समाज में भी अपने ऋषि या ज्ञान परंपरा के संरक्षक होते हैं बुजुर्ग, पाहन,  ओझा, पुजारी जो पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान का हस्तांतरण करते हैं।

 वे सिखाते हैं कि प्रकृति का सम्मान करो, जरूरत से ज्यादा मत लो, हर जीव के साथ सह-अस्तित्व में रहो यह ज्ञान आज के वैज्ञानिक सिद्धांतों से भी मेल खाता है और सतत विकास (Sustainable Development) का आधार बन सकता है। तो फिर बात यहीं आकर रूकती है कि हम जनजातीय समाज से क्या सीखें और क्या करें? 

  1. जनजातीय ज्ञान को अपनाना होगा। हमें आदिवासी जीवन शैली से सीख लेकर उसे आधुनिक संदर्भ में लागू करना होगा। 
  2. नीतिगत बदलाव करके सरकारों को विकास परियोजनाओं में पर्यावरण और जनजातीय हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
  3. शिक्षा में समावेशन होने से स्कूलों और विश्वविद्यालयों में जनजातीय दर्शन और पारंपरिक ज्ञान को शामिल किया जाए। 
  4. सामुदायिक भागीदारी होने से स्थानीय समुदायों को संरक्षण कार्यों में शामिल किया जाए, क्योंकि वे प्रकृति को सबसे अच्छी तरह समझते हैं। 
  5. आध्यात्मिक दृष्टिकोण का विकास होने से प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार मानने की मानसिकता विकसित करनी होगी। जनजातीय दर्शन हमें यह सिखाता है कि पृथ्वी का संरक्षण कोई विकल्प नहीं, बल्कि हमारी जिम्मेदारी है। यह दर्शन न केवल पर्यावरणीय संकट का समाधान प्रस्तुत करता है, बल्कि हमें एक संतुलित, शांतिपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण जीवन की दिशा भी दिखाता है।

आज आवश्यकता है कि हम अपने अहंकार को त्यागकर प्रकृति के साथ जुड़ें, उससे सीखें और उसे बचाने का संकल्प लें। यदि हम जनजातीय और वैदिक ज्ञान को अपनाते हैं, तो निश्चित ही हम अपनी पृथ्वी को सुरक्षित और समृद्ध बना सकते हैं। यह केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का प्रश्न है और इसका उत्तर हमारी परंपराओं में पहले से मौजूद है। (लेखिका बिरसा महाविद्यालय खूंटी के दर्शनशास्त्र विभाग की विभागाध्यक्ष हैं।) 

Published / 2026-04-21 12:27:22
जनजातीय दर्शन में छुपा है प्रकृति संरक्षण

  • जनजातीय दर्शन में छुपा है प्रकृति संरक्षण

डॉ मंजूषा पूर्ति 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज जब विश्व पर्यावरणीय संकट के गंभीर दौर से गुजर रहा है तब जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का ह्रास, जल संकट और प्रदूषण जैसी समस्याएँ पृथ्वी के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न खड़े कर रही हैं, तब समाधान के लिए हमें आधुनिक तकनीकों के साथ-साथ अपनी जड़ों की ओर लौटने की आवश्यकता है। यह जड़ें हमें जनजातीय (आदिवासी) दर्शन में मिलती हैं, जहाँ प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार, पूज्य तत्व और सह-अस्तित्व का साथी है।

जनजातीय दर्शन में प्रकृति संरक्षण केवल एक विचार नहीं, बल्कि जीवन जीने की शैली है। यह दर्शन हमें सिखाता है कि मनुष्य पृथ्वी का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक अंश है। यही विचार भारतीय ऋषि परंपरा और वैदिक संस्कृति में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। इस प्रकार, जनजातीय और वैदिक दर्शन दोनों ही एक ही मूल चेतना से प्रेरित हैं—प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व।जनजातीय समाज में प्रकृति को जीवंत माना जाता है। जंगल, पहाड़, नदियाँ, वृक्ष, पशु-पक्षी—सभी को आत्मा युक्त और सम्माननीय समझा जाता है।

जंगल उनके लिए केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि जीवनदाता है। नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि माँ के रूप में पूजनीय हैं। पशु-पक्षियों को परिवार का हिस्सा माना जाता है। यह दृष्टिकोण पारिस्थितिकी (Ecology) का सबसे व्यावहारिक रूप है, जिसमें मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहता है। जनजातीय समाज उतना ही लेता है जितनी उसे आवश्यकता होती है, जिससे संसाधनों का संरक्षण स्वतः सुनिश्चित होता है।

भारतीय वैदिक साहित्य में भी प्रकृति को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः यह मंत्र स्पष्ट करता है कि पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। ऋषियों ने पंचमहाभूत पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को जीवन का आधार माना। उन्होंने इन तत्वों के संरक्षण को धर्म का हिस्सा बनाया। यज्ञ के माध्यम से पर्यावरण शुद्धि का विचार किया। वृक्षों और नदियों की पूजा को जीवन का आधार बनाया। जीवों के प्रति करुणा और अहिंसा अपना कर उसे अपना परिवार बनाया। 

ये सभी सिद्धांत जनजातीय जीवन में भी सहज रूप से देखने को मिलते हैं। स्पष्ट है कि जनजातीय और वैदिक दर्शन में कोई विरोध नहीं, बल्कि गहरा सामंजस्य है। आदिवासी समाज का जीवन पूर्णतः प्रकृति पर आधारित है, और उनका हर कार्य पर्यावरण संतुलन को ध्यान में रखकर किया जाता है।

  1. सीमित उपभोग (Sustainable Use) आदिवासी समुदाय केवल उतना ही संसाधन उपयोग करते हैं, जितना आवश्यक होता है। अत्यधिक संग्रह या दोहन उनकी संस्कृति के विरुद्ध है। 
  2. सामूहिकता और साझेदारी के कारण वन, जल और भूमि को व्यक्तिगत संपत्ति नहीं, बल्कि सामूहिक धरोहर माना जाता है। इससे संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण और संरक्षण सुनिश्चित होता है। 
  3. पारंपरिक ज्ञान प्रणाली के कारण औषधीय पौधों का ज्ञान, मौसम की पहचान, खेती के पारंपरिक तरीके ये सभी पर्यावरण के अनुकूल होते हैं और जैव विविधता को बनाए रखते हैं। 
  4. उत्सव और अनुष्ठान में भी सरहुल, करमा जैसे त्योहार प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम हैं। इन अवसरों पर वृक्षों, जल स्रोतों और धरती की पूजा की जाती है। देवी-शक्ति और प्रकृति संरक्षण होने से भारतीय संस्कृति में देवी-शक्ति को प्रकृति का प्रतीक माना गया है दुर्गा, काली, सरस्वती, लक्ष्मी ये सभी शक्तियाँ प्रकृति के विभिन्न रूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

इसी प्रकार जनजातीय समाज में भी धरती माता, जाहेर आयो, वन देवी जैसे रूपों में प्रकृति की पूजा की जाती है। यह आस्था केवल धार्मिक नहीं, बल्कि संरक्षण का माध्यम है। जब हम किसी तत्व को देवी मानते हैं, तो उसके प्रति हमारा व्यवहार स्वतः संवेदनशील हो जाता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में संकट और चुनौतियाँ लगातार बढ़ती जा रही हैं आज आधुनिकता और विकास के नाम पर जो अंधाधुंध दोहन हो रहा है, उसने प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ दिया है। 

जंगलों की कटाई, जल स्रोतों का प्रदूषण, खनन और औद्योगीकरण, वन्यजीवों का विलुप्त होना इन सबका सबसे अधिक प्रभाव जनजातीय समाज पर पड़ रहा है, क्योंकि उनका जीवन प्रकृति से जुड़ा हुआ है। विडंबना यह है कि जो समाज प्रकृति का सबसे बड़ा रक्षक है, वही आज विस्थापन और उपेक्षा का शिकार है। जनजातीय समाज में भी अपने ऋषि या ज्ञान परंपरा के संरक्षक होते हैं बुजुर्ग, पाहन,  ओझा, पुजारी जो पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान का हस्तांतरण करते हैं।

 वे सिखाते हैं कि प्रकृति का सम्मान करो, जरूरत से ज्यादा मत लो, हर जीव के साथ सह-अस्तित्व में रहो यह ज्ञान आज के वैज्ञानिक सिद्धांतों से भी मेल खाता है और सतत विकास (Sustainable Development) का आधार बन सकता है। तो फिर बात यहीं आकर रूकती है कि हम जनजातीय समाज से क्या सीखें और क्या करें? 

  1. जनजातीय ज्ञान को अपनाना होगा। हमें आदिवासी जीवन शैली से सीख लेकर उसे आधुनिक संदर्भ में लागू करना होगा। 
  2. नीतिगत बदलाव करके सरकारों को विकास परियोजनाओं में पर्यावरण और जनजातीय हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
  3. शिक्षा में समावेशन होने से स्कूलों और विश्वविद्यालयों में जनजातीय दर्शन और पारंपरिक ज्ञान को शामिल किया जाए। 
  4. सामुदायिक भागीदारी होने से स्थानीय समुदायों को संरक्षण कार्यों में शामिल किया जाए, क्योंकि वे प्रकृति को सबसे अच्छी तरह समझते हैं। 
  5. आध्यात्मिक दृष्टिकोण का विकास होने से प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार मानने की मानसिकता विकसित करनी होगी। जनजातीय दर्शन हमें यह सिखाता है कि पृथ्वी का संरक्षण कोई विकल्प नहीं, बल्कि हमारी जिम्मेदारी है। यह दर्शन न केवल पर्यावरणीय संकट का समाधान प्रस्तुत करता है, बल्कि हमें एक संतुलित, शांतिपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण जीवन की दिशा भी दिखाता है।

आज आवश्यकता है कि हम अपने अहंकार को त्यागकर प्रकृति के साथ जुड़ें, उससे सीखें और उसे बचाने का संकल्प लें। यदि हम जनजातीय और वैदिक ज्ञान को अपनाते हैं, तो निश्चित ही हम अपनी पृथ्वी को सुरक्षित और समृद्ध बना सकते हैं। यह केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का प्रश्न है और इसका उत्तर हमारी परंपराओं में पहले से मौजूद है। (लेखिका बिरसा महाविद्यालय खूंटी के दर्शनशास्त्र विभाग की विभागाध्यक्ष हैं।) 

Published / 2026-04-19 13:59:16
ठंडे बस्ते में जाता महिला आरक्षण

  • महिला आरक्षण का ठंडा ( Freeze) हो जाना...

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। केंद्र की मोदी सरकार ने संसद का विशेष सत्र बुलाकर महिलाओं के लिए 33% आरक्षण तथा सभी राज्यों में 50% लोकसभा सीट बढ़ाने के लिए संविधान संशोधन विधेयक लाया वह मत विभाजन में विपक्ष के विरोध के कारण पारित नहीं किया जा सका। 

विपक्ष सदन में इस घटना को अपनी जीत समझ कर मेज तो थपथपा सकता है, लेकिन देश को कैसे समझ पाएगा कि आधी आबादी के लिए किए जा रहे आरक्षण को उसने आखिर क्यों रोका। दिनांक 18 अप्रैल 2026 को रात्रि 8:30 बजे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए देश की नारी शक्ति से क्षमा याचना की और आरक्षण बिल के नहीं पारित होने पर अपना दुख साझा किया। 

मोदीजी ने विधेयक नहीं पास होने के लिए कांग्रेस सपा रिमूव कांग्रेस और डीएमके को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि देश की महिलाएं इन राजनीतिक दलों को कभी माफ नहीं करेगी। मोदीजी ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि कांग्रेस आरंभ से ही सुधार विरोधी, लटकने और भटकाने वाली पार्टी रही है। महिला आरक्षण  का विरोध करके समाजवादी पार्टी ने लोहिया जी के सपनों को रौंद दिया है जिसे अप की महिला कभी भूल नहीं पाएगी। 

मोदीजी ने यह भी कहा कि परिवारवादी पार्टियों ने अपने भय के कारण कि यदि देश की महिलाएं सशक्त हो जाएंगी तो उनके परिवार के महिलाओं का राजनीति में प्रभुत्व समाप्त हो जाएगा, वे कभी नहीं चाहते हैं कि उनके परिवार के बाहर की कोई भी महिला राजनीति में स्थापित हो सके।

Published / 2026-04-18 21:03:58
क्या गलत नीति ही नासिक टीसीएस प्रकरण में समस्या की जड़ है!

डॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वाल 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। नासिक स्थित टीसीएस मामले में हिंदुओं और हिंदू महिलाओं के खिलाफ सामने आए भयावह खुलासों ने सच्चाई का पिटारा खोल दिया है। विभिन्न कंपनियों के कई कर्मचारियों ने अपने कार्यस्थलों पर इसी तरह की समस्याओं को उजागर किया है। इस बात का विश्लेषण जरुरी है कि वामपंथी इस्लामी कट्टरपंथी हिंदुओं को क्यों निशाना बना रहे हैं। इसके प्रमुख कारणों में से एक विविधता, समानता और समावेशन (डीईआई) की गलत नीति है। इसकी आड़ में वामपंथी विचारधारा के समर्थक कई कंपनियों में महत्वपूर्ण पदों पर पहुंच गये हैं। 

वे अपने पद का उपयोग कंपनी या संगठन के निर्माण के लिए नहीं बल्कि भारत में स्थापित कंपनियों में भारतीय संस्कृति को नष्ट करने के लिए कर रहे हैं। वामपंथी विचारधारा के लिए कंपनी और प्रबंधन उनके हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाने का एक हथियार मात्र हैं, जो अंतत: अविश्वास, दबाव, धर्मांतरण, उत्पीड़न और यौन शोषण के माध्यम से कॉरपोरेट जगत और भारत को कमजोर करते हैं। 

कर्मचारियों की कार्यकुशलता, प्रभावशीलता और कार्य की गुणवत्ता पर अत्यधिक तनाव, नैतिक मानकों के विरुद्ध कार्य करने और जन्म से ही उनमें समाहित भारतीय संस्कृति का प्रभाव के विरुद्ध काम तणाव निर्माण करता है। टीसीएस मामला सभी कॉरपोरेशनों के लिए एक चेतावनी है; अब समय आ गया है कि वे अपनी वर्तमान स्थिति का आकलन करें और उचित कानूनी कार्रवाई करें। अगला कदम कंपनी में डीईआई नीति को सही तरीके सें लागू करना है। डीईआई रणनीति को सर्वे भवन्तु सुखिन: और वसुधैव कुटुंबकम जैसे भारतीय आदर्शों के अनुरूप पूरी तरह से संशोधित करने की आवश्यकता है। 

कई कॉरपोरेशनों में मौजूदा डीईआई प्रणाली इन मानवीय आदर्शों का उल्लंघन करती है। वर्तमान सिद्धांत विभाजन और ध्यान भटकाने के लिए विविधता, प्रवर्तन के लिए समानता और इस्लाम के लिए समावेशन हैं। अंतत:, मानवता का ऐसा विकृत दृष्टिकोण कॉरपोरेट विनाश का कारण बनेगा। कॉपोर्रेट सामाजिक उत्तरदायित्व के संदर्भ में आप जो भी अच्छा काम करें, आपकी विविधता और समावेशन नीति आपकी प्रतिष्ठा और विकास सहित सब कुछ बर्बाद कर देगी। 

पिछले कुछ दशकों में डीईआई की अवधारणा एक प्रतीकात्मक महत्वाकांक्षा से विकसित होकर नियोक्ता की विश्वसनीयता, संस्कृति और अनुपालन परिपक्वता के आकलन के लिए एक परिभाषित मानक बन गई है, जिसका उपयोग उसके स्वयं के कर्मचारियों के साथ-साथ नियामकों, हितधारकों और आम जनता द्वारा भी किया जाता है।

हालांकि कई संगठनों ने औपचारिक डीईआई प्रतिबद्धताएं की हैं, जैसा कि आंतरिक नीतियों, नेतृत्व के बयानों और सार्वजनिक घोषणाओं के साथ-साथ समावेशी भर्ती, मातृत्व सहायता, सुलभता अवसंरचना, उचित समायोजन और लैंगिक विविधतापूर्ण नेतृत्व की दिशा में उठाये गये कदमों से स्पष्ट है, फिर भी कार्यबल प्रणालियों में डीईआई का व्यावहारिक एकीकरण असमान बना हुआ है, क्योंकि कई कंपनिया हिंदुओं के प्रति पूर्वाग्रह का विशिष्ट एजेंडा अपना रहे हैं। 

विविधता, समानता, समावेशन और संवेदनशीलता डीईआई एक व्यापक शब्द है जिसका उद्देश्य हमारा ध्यान एक स्वस्थ और अधिक खुली कॉर्पोरेट संस्कृति की ओर आकर्षित करना है जो लोगों को उनके वर्ग, जाति, बोली, लिंग, पंथ, शारीरिक विशेषताओं आदि की परवाह किए बिना समान अवसर प्रदान करती है। हालांकि, अच्छे इरादों के बावजूद, वामपंथी विचारधारा ने इसका दुरुपयोग अपने स्वार्थी लाभों और उद्देश्यों के लिए किया है, जो कॉर्पोरेट सिद्धांतों और मानवता के बिल्कुल विपरीत हैं। 

अमेरिका में विविधता, समानता और समावेशन 

हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन के अनुसार, अमेरिका में डीईआई प्रशिक्षण कार्यक्रम हिंदू विरोधी भावना को बढ़ावा दे रहे हैं। फाउंडेशन ने न्यूयॉर्क टाइम्स और ब्लूमबर्ग पर इस अध्ययन को छिपाने का आरोप भी लगाया है। हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन ने दो प्रमुख अमेरिकी मीडिया संस्थानों, न्यूयॉर्क टाइम्स और ब्लूमबर्ग पर एक रिपोर्ट को छिपाने का आरोप लगाया है, जिसमें यह खुलासा किया गया है कि अमेरिका में जाति-आधारित विविधता, समानता और समावेशन (डीईआई) प्रशिक्षण कार्यक्रमों के परिणामस्वरूप हिंदुओं को किस प्रकार पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ता है। 

नेटवर्क कंटैजियन रिसर्च इंस्टीट्यूट ने रटगर्स विश्वविद्यालय के साथ साझेदारी में यह अध्ययन किया, जिसमें विशेष रूप से इक्वालिटी लैब्स के जाति-विरोधी प्रशिक्षण कार्यक्रमों की जांच की गई और पाया गया कि ऐसे कार्यक्रम हिंदू विरोधी भेदभाव और घृणा को बढ़ाते हैं। नेटवर्क कंटैजियन रिसर्च इंस्टीट्यूट और रटगर्स विश्वविद्यालय द्वारा किये गये इस अध्ययन में दलित नागरिक अधिकार संगठन इक्वालिटी लैब्स की सामग्री का विश्लेषण किया गया। 

इस शोध में पाया गया कि इन प्रशिक्षणों में शामिल प्रतिभागियों द्वारा ब्राह्मणों को परजीवी या वायरस के समान बताने जैसी अमानवीय शब्दावली का प्रयोग करने की संभावना काफी अधिक थी। एचएएफ ने यह भी दावा किया कि शोध से पता चलता है कि इस तरह के डीईआई कार्यक्रम नस्लीय भेदभाव को कम करने के बजाय उसे और बढ़ा सकते हैं। प्रमुख मीडिया संगठनों की रुचि जताने के बावजूद, एचएएफ का आरोप है कि हिंदुओं के प्रति दंडात्मक प्रतिशोध और बढ़ती शत्रुता के सबूतों को इन मुख्यधारा के मंचों ने लगभग अनदेखा कर दिया है। 

भारत पर प्रभाव 

विविधता, समानता और समावेशन के नाम पर चल रहे वोक के औजार भारत तक भी पहुंच रहे हैं। सभ्यता अध्ययन के क्षेत्र में प्रख्यात शोधकर्ता, लेखक और अग्रणी राजीव मल्होत्रा ने अपनी पुस्तकों में कहा है कि वोक तंत्र अब विविधता और समावेशन को बढ़ावा देने के बहाने भारत के शीर्ष शिक्षण संस्थानों, जैसे कि आईआईटी को निशाना बना रहा है। 

भारतीय संदर्भ में, वोक लॉबी द्वारा दलितों के अधिकारों की वकालत करने का दिखावा तथाकथित उच्च जातियों को बदनाम कर रहा है और दलितों, अनुसूचित जनजातियों और अल्पसंख्यकों को उनके खिलाफ खड़ा कर रहा है। यह एक घातक प्रयोग है, और भारत पहले से ही इसका परीक्षण स्थल बन रहा है। इसी प्रकार, जैसा कि राजीव मल्होत्रा चेतावनी देते हैं, विविधता और समावेशन की बयानबाजी भारत के सॉफ्टवेयर व्यवसायों में भी अपना प्रभाव दिखा रही है, जिससे हिंदुओं को विभाजित करने और योग्यता-आधारित व्यवस्था को नष्ट करने के प्रयास में जातिगत मुद्दा और भी गंभीर हो रहा है। 

प्रेम जिहाद और धर्मांतरण ने कई कंपनियों पर गहरा प्रभाव डाला है, जो हिंदुओं, व्यावसायिक विकास और भारतीयता के लिए अत्यंत चिंताजनक है। जो लोग यह मानने से इनकार करते हैं कि ऐसी घटनाएं नहीं होतीं, उन्हें प्रेम जिहाद और धर्मांतरण के पीड़ितों से मिलना चाहिए। यदि उन्हें कुछ भी गलत नहीं लगता, तो यह स्पष्ट है कि वे मनुष्य नहीं, बल्कि आधुनिक सभ्यता के राक्षस हैं। 

भावी पीढ़ियों और भारतीयता को इस विषैली पारिस्थितिकी से बचाने के लिए विश्वविद्यालयों को भी इस मुद्दे को समयबद्ध और प्रभावी ढंग से संबोधित करना चाहिए। कंपनियों, सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ), कर्मचारियों और प्रबंधन के लिए अब समय आ गया है कि वे सक्रिय रूप से काम करना शुरू करें और उचित कदम उठाएं। डीईआई पर विचार-विमर्श किया जाना चाहिए, सभी हितधारकों के साथ चर्चा की जानी चाहिए और फिर इसे अंतिम रूप दिया जाना चाहिए। 

व्यवहार में, डीईआई को अनुसंधान और नवाचार क्षमताओं को मजबूत करना चाहिए, कार्यस्थल संस्कृति में सुधार करना चाहिए, तनाव को कम करना चाहिए और बिना किसी भेदभाव के व्यावसायिक और राष्ट्रीय लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

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